सनातन धर्मालोक ४ — पृष्ठ 151–160
सनातन धर्मालोक ४ · पृष्ठ 151–160
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२६४ श्रीसनातनधर्मालोक; ( ४ ) बहुश्रुतम् । श्राततायिनमायान्तं हन्यादेवाविचारयन् ' ( ८३५० ) इस दंत कुछ विरोध दिखलाकर ' न जातु ब्राह्मयां हन्यात् सर्वपापेष्वपि त्यजप्रदेश मनुषयका स्त्रिॉका, स्थितम् ' ( ८ | ३८० ) इस मनुस्मृतिके श्लोकको प्रक्षिप्त माना है; ' इसमें लंघन भी धैर्य रखने की आवश्यकता है, जल्दबाजीकी नहीं । यहां उत्सर्गापवाद व्याप करने व्यवस्थासे विरोध वा प्रक्षिप्तता नहीं रहती - वे यह ध्यानसे सुनें । लोग तः विरोध ( १८ ) यदि एतदादिक श्लोकोंमें उत्सर्गापवाद - व्यवस्था न मानी मे उच्छडू. ज्ञावे, तो ' एनस्त्रिभिर निणिक्तैर्नार्थं किञ्चित् सहाचरेत् । कृतनिर्णेजनाँ-चैव न जुगुप्सेत कर्हिचित् ' ( ११११८६ ) इस और ' बालघ्नश्च ही हृतर्ध्नाश्च विशुद्धानपि धर्मतः । शरणागतहन्तृ च स्त्रीहन्तृ श्च न संवसेत् ’ दुराचार, ( ११।११० ) इस मनुश्लोकका भी आपस में विरोध हो जावे, परन्तु वैसा कोई भी नहीं मानता । सभी विद्वान् पूर्वश्लोकको उत्सर्ग और दूसरेको हि अपवाद मानते हैं । तब ' अपवादविषयपरिहारेण उत्सर्गस्य व्यवस्थिति-कैसे कवति ' इस न्याय से उत्सर्ग में श्रपत्रादातिरिक्तता ही माननी पड़ती है, तिष्ठा है जो इससे विरोध हट जाता है । ) के अनु. चार इस प्रकार ' न जातु ब्राह्मणं हन्यात् यदि यह उत्सर्ग है; तो ' गुरु ' गया वा बालवृद्धौ वा ब्राह्मणं वा बहुश्रुतम् । श्राततायिनमायान्तं हन्यादेवा-उत्सर्गमाः विचारयन् ' ( ८३५० ) यह अपवाद भी मिलता है । इसमें विरोध क्या · अपवाद मी है? ' परीवादात् खरो भवति ', श्वा वै भवति निन्दकः ' ( मनु ० २१२०१ ) हीँ होत विमान दोपका कहना ' परीवाद ' होता है, अविद्यमान दोषका कहना से उत्सर्ग ' निन्दा ' होता है । यहाँ पर गुरुके विद्यमान दोषके कहनेसे भी दूसरे श्राव जन्ममें गधेकी योनि पाना कहा है । यदि यह सामान्यशास्त्र है; तो दीखेगा । ' गुरुं वा बालवृद्धौ वा ब्राह्मणं वा बहुश्रुतम् । श्राततायिनमायान्तं खीन हो । या ( ८३५० ) इस डा ० जीसे उद्धृत श्लोकमें श्राततायित्व दोषसे मिल्जे हुए गुरुका मारना भी कहा है । क्या यहाँ डा ० जी विरोध मानेंगे? CC - 0. Ankur Joshi वर्ण - व्यवस्था पर विचार ०६५ अथवा पहले श्लोकको गुरुको दोष करने के प्रोत्साहनसे प्रक्षिप्त लेंगे? प्रक्षिप्तता वे कहाँ - कहाँ मानेंगे? इसी श्रपनेसे उधृत मान डा ० जी सोचें । इसमें आततायी भी ब्राह्मणको श्लोकको इस श्लोक के देनेवाले ' कर्मणा वर्ण ब्राह्मण कहकर मनुने. - व्यवस्था ' के पक्षपाती डा ० जी का पक्ष क्या समूल नहीं काट दिया, क्योंकि - डा ० जी सुकर्माको ही ब्राह्मण सिद्धान्तित करते हैं, पर यहाँ मनुजीने कुकर्मा श्राततायीको भी ब्राह्मण मान लिया । जब डा ० जीके शब्दोंमें इस ' सच्छास्ख ' ने उनके पक्षको काट दिया है, तो वे इस श्लोकको तो मनुका ' सच्छाख ' मानते हैं, और पहलेको ' असच्छास्त्र ' तो क्या यहाँ उनके पक्षका स्पष्ट खण्डन नहीं? इस श्लोकको भी कर्मणा वर्ण - व्यवस्था रूप अपने पक्षका खडक होनेसे प्रक्षिप्त क्यों नहीं मानते? तब इस श्राततायी ब्राहाणके मारनेको बताने वाले मनुके अपवाद-श्लोकसे ' न जातु ब्राह्मणं हन्यात् सर्वपापेष्वपि स्थितम् ' इस उत्सर्ग
श्लोकके ' सर्वपापेषु ' इस शब्दमें सब पाप श्राततायित्वसे भिन्न ही इष्ट
हैं; क्योंकि — उत्सर्गकी व्यवस्था अपवाद - विषयको छोड़कर ही हुआ करती है, क्योंकि - श्राततायीपन एक विशेष पाप है, इसीलिए मनुजीने उसकी निन्दार्थ एक अलग श्लोक ही बना दिया कि - ' नाततायिवधे दोषो हन्तुर्भवति कश्चन ' ( ८।२५१ ) इससे मनुजीने श्राततायित्वको एक अक्षम्य पाप घोषित करके, श्राततायी भी ब्राह्मणके वघनें श्रदोष कहकर, दूसरे सब पापोंमें ब्राह्मणका वध न कहकर देशसे निर्वासनमात्र कहकर पूर्व पद्यको स्वसम्मत तथा श्रप्रक्षिप्त सूचित कर दिया है । डा ० जी कहें कि - अब उनका बताया हुआ विरोध कहाँ गया? क्या वे ' अपवादविषयपरिहारेण उत्सर्गस्य व्यवस्थितिर्भ-वति ' ( काव्य - प्रकाश १० उ ० असङ्गति अलं ० ) ' प्रकल्प्य चापवाद-Collection Gujarat. An eGangotri Initiative '
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२६६ श्रीसनातनधर्मालांक: ( ४, विषयं तत उत्सर्गोभिनिविशते ' ( महाभाष्य ३।२।१२४ ) इन न्यायको नहीं जानते? वस्तुतः श्राततायी ब्राह्मणका वध भी शास्त्रानुसार शारीरिक नहीं होता । इसीलिए डा ० जीसे भी मान् श्रीमद्भागवत में श्राततायी ब्राह्मण अश्वत्थामाके लिए उक्ति आई है - ' ब्रह्मबन्धुर्न हन्तव्य श्राततायी वधा-र्हणः । वपनं, द्रविणादानं, स्थानान्निर्यापणं तथा । स एष ब्रह्मबन्धूनां चधो, नान्योस्ति दैहिकः ' ( १ / ७ / २३-२७ ) । इस प्रकार डा ० जीसे महामान्य महाभारतमें भी पाण्डवाने आततायी अश्वत्थामाके न मारनेका हेतु कहा है- ' जित्वा मुक्तो [ नं निहतो ] द्रोणपुत्रो ब्राह्मण्याद् ( ब्राह्मणत्वाद ) गौरवेण च । यशोस्य पतितं देवि! शरीरं त्ववशेषितम् ' ( सौप्तिकपर्व १६ । ३२ ॥ इस प्रकार श्राततायी ब्राह्मणको दण्ड बताने चाले मनुपद्यकी व्यवस्था भी जाननी चाहिये । यहां पर आततायी तथा ' विदितं चापलं ह्यासीद् श्रात्मजस्य ( अश्वत्थाम्नः ) दुरात्मनः ' ( महा o सौप्तिक ० १२।७ ) इस प्रकार दुष्टात्मा तथा चञ्चल ' न स्वं जातु सतां मार्गे स्थावेति ' ( १२।१ ) यह द्रोणाचार्यका कथन है ' स तदाज्ञाय दुष्टात्मा पितुर्वचनमप्रियम् । निराशः सर्वकल्याणैः शोकात् पर्यचरन्महीम् ' ( १२।१० ) ' स संरम्भी दुरात्मा च चपलः क्रूर एव च ' ( १२ । ४१ ) इस प्रकार दुराचारी, क्रोधी और क्रूर अश्वत्थामाको ब्राह्मण कहना जहां ‘ कर्मणा वर्णः ' के मूलको काट रहा है, वहां वैसे ब्राह्मणका भी दैहिक चध नहीं होता, किन्तु मुण्डनादि रूप वध ही वहां इष्ट होता हैं, ऐसा कहना हमारे तथा आपके उद्घृत मनुके पहले तथा दूसरे श्लोक के विरोध को काट रहा है ॥ मनुस्मृतिकी भांति महाभारतमें भी ' दुर्वेदा वा सुवेदा वा प्राकृताः संस्कृतास्तथा । ब्राह्मणा नावमन्तव्या भस्माच्छन्ना इवाग्नयः ' ( वनपर्व CC - 0. Ankur Joshi Collection वर्ण व्यवस्था पर विचार २६८ २००१८ ) यथा श्मशाने दीप्तौजाः पावको नैव शाम्यति । एवं विद्वान धा दर विद्वान् वा ब्राह्मणो देवतं महत् ' ( २००८ ) यह कहा है । । मनुजीने श्रन्य कितनी स भी कहा है — ‘ नहि मे ब्राह्मणो बध्यः पापेष्वपि रतः सदा ' ( श्रादित २२ ) ' सापराधानपि हि तानू ( ब्राह्मणान् ) विषयान्ते ( देशतो पूर्वापर समुत्सजेत् ' ( शान्ति ० २६/३१ ) ' विधीयते न शारीरं दण्डमेषां बहि नहीं है; प्र कदावर ( शान्ति ० १६३२ ) ' क्षत्रियेण हि हन्तव्यः क्षत्रियो लोभमास्थितः हुआ है; अक्षत्रियो वा दाशार्ह! स्वधर्ममनुतिष्ठता । अन्यत्र ब्राह्मणात् ठात! । के लिए स सर्वपापेष्ववस्थितात् । गुरुर्हि सर्ववर्णानां ब्राह्मणः प्रसृताग्रभुक ' ( उद्योगः ) पत्र. ( ८२ | १६-१७ ) इस प्रकारके महाभारतीय श्लोक मनुस्मृतिके डा ० में हमसे दिया आक्षिप्त उक्त पथके उपजीवक हैं; तब वह प्रक्षिप्त कैसे हो सकता है! उनके विचार ब्राह्मण होन क्या सब स्थान डा ० जी प्रक्षिप्तता ही मानेंगे? ऐसा नहीं हते नहीं हो सक सकता । वास्तवमें उक्त पथ ठीक भी है, क्योंकि इससे ब्राह्मण के पूर्व वर्णकी शास जन्मके कर्मोंका – जिनसे इस वर्ण नें उसका जन्म हुआ है -- सम्मान धर्मायैव च ही किया जाता है, उसकी अग्रजन्मताका यह सम्मान किया जाता है..यावज्जीवं अग्रज और अवरजके दण्ड में तारतम्य भी स्वाभाविक ही होता है । इस पुत्रको ब्राह्मर कारण मनुजी डा ० जीसे उद्धृत श्लोक में श्राततायी ब्राह्मणका वध कल | प्रबन्धका ढंग भी उसके बधकी व्यवस्था यह कहते हैं— ' मौण्ड्यं प्राणान्तिको दण्ड ब्राह्मणस्य विधीयते । इतरेषां तु वर्णानां दण्डः प्राणान्तिको भवेत् - ( १६ ) ( ८ ) ३३७-३३ ( ८३७६ ) यहां पर मेघातिथि लिखता है — ' यत्र क्षत्रियादीनां वध न् शेरीके पाप तत्र ब्राह्मणस्य मौण्ड्यम् ' । सर्वज्ञनारायण टीका करता है [ ब्राह्मएव ' स्वेये भवति के प्राणान्तिकदण्डस्थाने मुण्डनमेव कार्यम् ' । श्रीकुल्लूकने लिखा है- । होता है, सच ‘ ब्राह्मणस्य वध्र्दण्ढस्थाने शिरोमुण्डनं दण्डः शास्त्रेण उपदिश्यते ॥ बासी गुना; राघवानन्दने लिखा है — श्रन्येषां प्राणान्तिके दण्डे ब्राह्मणस्य मौरा | बुध - दोष जान विधत्ते । जात्यन्तरस्य ‘ प्राणान्तिकेऽपराधे यत्र दण्डस्तत्र विशस तितस्तु यथ मौण्ढ्यमात्रमिति सार्वत्रिकः ' । नन्दनने यहां लिखा है -- ' वाहणार Gujarat. An eGangotri Initiative
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२६ क श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) क्याहें दण्डे प्राप्ते मौण्ड्यमेव, न वधः, इतरेषां वध एवं ' । इस प्रकार वं विद्वान | मनुजीने ब्राह्मणका सिर मुण्डवा देना ही प्राणदण्डस्थानीय माना है ॥ धन्यव - कितनी स्पष्टता है? इससे डा ० जीसे दिखलाया हुआ मनुजीका ( श्रादिप पूर्वापर विरोध कट गया । यह ब्राह्मणको पापकरणार्थ प्रोत्साहन.मी कदाच बहि नहीं है; प्रत्युत जिन गतजन्मके कर्मो से उसका ब्राह्मण वर्णमें जन्म मास्थितः हुआ है; उनका सम्मान करके उसे भविष्य में भी ब्राह्मण वर्णके पाने तू तात! ॥ के लिए कम करनेका प्रोत्साहन दिया गया है । ' सत्यम् उत्तरः # ( उद्योगः पद्मः ' ( तैत्तिरीयोपनिषत् २४ ) यही मनुजीका उत्तरपक्ष है । तब डा ० | हमसे दिया उक्त मनुका पद्य प्रक्षिप्त कैसे हो सकता है? डाक्टरजी वा कता है! उनके विचार वाले वादी इधर ध्यान दें । श्राततायी श्रश्वत्थामाको ब्राह्मण होनेके नाते मृत्युदण्ड न देने वाली प्रसिद्ध घटना कभी प्रक्षिप्त 1 नहीं हो नहीं हो सकती । इसलिए महाभारत में राजाको ब्राह्मणसे अतिरिक्तही के पूर्व वर्णकी शासना में अधिकृत कहा है । जैसेकि - ' ब्राह्मणेभ्यो नमेन्नित्यं -सम्मान धर्मायैव च सञ्जय! नियच्छनितरान् वर्णान् विनिघ्नन् सर्वदुष्कृतः जाता है... यावज्जीवं तथा भवेः ' ( उद्योग ० १३४।४०-४१, यहां विदुला । ता है । स पुत्रको ब्राह्मणातिरिक्त अन्य वर्णोंके नियमनकीबात कहकर बघ कहन | शन्धका ढंग सिखला रही है I तको दखी को भवेद ( १६ ) जोकि - ' अष्टापाद्य तु शूद्रस्य.... ब्राह्मणस्य वध उक | ( ३३७-३३८ ) यह मनुके श्लोक डा ० जीने उद्धृत किये हैं अपने उसे राज्य-चतुःषष्टिः ' , वे वर्णोंको [ ब्राह्मणस | के पाप के परिणाम को दिखाने वाले हैं; दण्ड बताने वाले लिखा है- ' स्वेये भवति किल्विषम् ' अर्थात् चोरी करने नहीं । पदिश्यते । होता है, तत्रियको १६ गुना, वैश्यको ३२ गुना में शूद्रको पाप ठगुणा , ब्राह्मणको ६४ गुना न्य मौ वा सौ गुना; क्योंकि - ' तद्दोषगुणविद् हि सः ' ब्राह्मण चोरी आदिके । उप - दोष जानता है । सो पापका फल जन्मान्तरमें होता उत्र अतितस्तु है, जैसेकि— ' ब्राह एस यथान्यायं हव्यकव्ये द्विजोत्तमः । कथञ्चिदप्यतिक्रामन् पापः CC - 0. Ankur Joshi वर्ण - व्यवस्था पर विचार २६६ सूकरतां व्रजेत् ' ( मनु ० ३ | ११० ) यहां पर पापसे सुधर बनना कहा है-सो इस जन्ममें न होकर परलोक वा जन्मान्तरमें इष्ट है - यह स्पष्ट है । ' न जातु ब्राहाणं हन्यात् ' यह पूर्व मनुपद्य ब्राह्मणको इस लोक में हिंसा-का निषेधक था; परन्तु परलोक में उसको पापका फल भला कौन मानेगा? क्योंकि इस जन्मके पाप - पुण्य अग्रिम जन्मके शरीरके आर-म्भक होते हैं । अथवा ‘ श्रष्टापाद्य ' वाला इलोक चोरीके ऐहिक दण्डके लिए भीमाना जाय; तथापि इस श्लोकसे धर्मके ग्रङ्ग अस्तेय कर्मसे होन चोरको भी ब्राह्मण कहकर कर्मसे वर्ण - व्यवस्था पक्षको काट ही दिया है । चोर शूद्धको भी दिखलाया गया है, ब्राह्मणको भी, क्षत्रिय - वैश्यको भी । ' न जातु ब्राह्मणं हन्यात् ' से इन श्लोकोंका विरोध भी नहीं । उसमें तो यह लिखा है कि- पापी भी ब्राह्मणको मृत्युदण्ड ' अष्टापाद्य ' वाले पद्यमें कोई मृत्युदण्डकी बात न दे; नहीं है; जो कि इनका आपस में विरोध हो । हां, वर्णोंके दण्ढों में तारतम्य तो सर्वसम्मत है । कई अपराधोंमें ब्राह्मणको शूद्रादिकी अपेक्षा अधिक प्रायश्चित्त, तथा अधिक पवित्रता रखना, तथा श्रधिक दण्ड कहा है; कई अपराधों में अल्पतम दण्ड कहा है- पर विशेष अपराधों में अन्य वर्णोंको कहकर ब्राह्मणको वहीँ मृत्युदण्ड न दिलवाकर राष्ट्र बहिष्कार मृत्युदण्ड दण्ड ही दिया है — यह अवसर अवसरकी दण्ड - व्यवस्था होती हैं, इससे प्रक्षि-तता प्रक्षिप्तता नहीं हुआ करती । ' श्रनार्यमार्यकर्माणमायें चानायं-कर्मिणम् । सम्प्रधार्ग्राब्रवीद् धाता न समौ नासमौ इति ( मनु ० १०.७३ ) अर्थात् शूद्ध द्विजोंके कर्म करता हुआ, द्विज शूद्धोंके कर्म करता हुआ-' न सम हैं, न विषम हैं; इस पर श्रीकुल्लूकने भाव दिया है- ' शूद्र द्विजोंके कर्म करता हुआ भी द्विजके समान नहीं हो जाता, क्योंकि-अनधिकारी होनेसे द्विजकर्म करने पर भी उसमें उनकी समता नहीं होती । इस प्रकार द्विज शूद्रकर्मा भी शूद्धसमान नहीं होता, क्योंकि - निषिद्ध सेवन करने पर भी उसकी उत्कृष्ट जाति नहीं हटती । वे दोनों श्रसम Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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२६६ श्रीसनातनधर्मालांक: ( ४, विषयं तत उत्सर्गोभिनिविशते ' ( महाभाष्य ३ । २ । १२४ ) इन न्यायको नहीं जानते? वस्तुतः श्राततायी ब्राह्मणका वध भी शास्त्रानुसार शारीरिक नहीं होता । इसीलिए डा ० जीसे भी मान् श्रीमद्भागवत में आततायी ब्राह्मण अश्वत्थामाके लिए उक्ति श्राई है - ' ब्रह्मबन्धुर्न हन्तव्य आततायी वधा-र्हणः । वपनं, दविणादानं, स्थानान्निर्यापणं तथा । स एष ब्रह्मबन्धूनां चधो, नान्योस्ति दैहिकः ' ( १।७।२३-५७ ) । इस प्रकार डा ० जीसे महामान्य महाभारतमें भी पाण्डवाने आततायी अश्वथामाके न मारने का हेतु कहा है- ' जित्वा मुक्तो [ न निहतो ] द्रोणपुत्रो · ब्राह्मण्याद् ( ब्राह्मणत्वाद् ) गौरवेण च । यशोस्य पतितं देवि! शरीरं त्ववशेषितम् ' ( सौप्तिकपर्व १६ । ३२ ) । इस प्रकार आततायी ब्राह्मणको दण्ड बताने चाले मनुपद्यकी व्यवस्था भी जाननी चाहिये । यहां पर आततायी तथा ' विदितं चापलं ह्यासीद् श्रात्मजस्य ( श्रश्वत्थाम्नः ) दुरात्मनः ' ( महा 0 सौप्तिक ० १२७ ) इस प्रकार दुष्टात्मा तथा चञ्चल ' न त्वं जातु सतां मार्गे स्थावेति ' ( १२।६ ) यह द्रोणाचार्यका कथन है ' स तदाज्ञाय दुष्टात्मा पितुर्वचनमप्रियम् । निराशः सर्वकल्याणैः शोकात् पर्यचरन्महीम् ' ( १२1१० ) ' स संरम्भी दुरात्मा च चपलः क्रूर एव च ' ( १२/४१ ) इस प्रकार दुराचारी, क्रोधी और क्रूर अश्वथामाको ब्राह्मण कहना जहां ‘ कर्मणा वर्णः ' के मूलको काट रहा है, वहां वैसे ब्राह्मणका भी दैहिक चध नहीं होता, किन्तु मुण्डनादि रूप वध ही वहां इष्ट होता हैं, ऐसा कहना हमारे तथा आपके उद्धृत मनुके पहले तथा दूसरे श्लोकके विरोध को काट रहा है । मनुस्मृतिकी भांति महाभारतमें भी ' दुर्वेदा वा सुवेदा वा प्राकृताः संस्कृतास्तथा । ब्राह्मणा नावमन्तव्या भस्माच्छन्ना इवाग्नयः ' ( पर्व CC - 0. Ankur Joshi Collection वर्ण व्यवस्था पर विचार २६८ २६७ २००१८८ ) यथा श्मशाने दीप्तौजाः पावको नैव शाम्यति । एवं विद्वान् बधाइँद विद्वान् वा ब्राह्मणो देवतं महत् ' ( २००८ ) यह कहा है । श्रन्य । मनुजीने भी कहा है- ' नहि मे ब्राह्मणो वध्यः पापेष्वपि रतः सदा ' ( श्रादिप कितनी स २६२ ) ' सापराधानपि हि तान् ( ब्राह्मणान् ) विषयान्ते ( देशती बहिः पूर्वापर चि समुत्सजेत् ' ( शान्ति ० १६।३१ ) ' विधीयते न शारीरं दण्डमेषां कदाचन ) ' नहीं है; प्र ( शान्ति ० १६ । ३२ ) ' क्षत्रियेण हि हन्तव्यः क्षत्रियो लोभमा स्थितः हुआ है अक्षत्रियो वा दाशार्हं! स्वधर्ममनुतिष्ठता । अन्यत्र ब्राह्मणात् । के लिए स तात! सर्वपापेष्ववस्थितात् । गुरुर्हि सर्ववर्णानां ब्राह्मणः प्रसृताप्रभुक् ' ( उद्योगः पत्र. ( ८२।१६-१७ ) इस प्रकारके महाभारतीय श्लोक मनुस्मृतिके ढा ० जीव हमसे दिया श्राक्षिप्त उक्त पद्यके उपजीवक हैं; तब वह प्रक्षिप्त कैसे हो सकता है । उनके विचार ब्राह्मण होने क्या सब स्थान डा ० जी प्रक्षिप्तता ही मानेंगे? ऐसा नहीं हो नहीं हो सक सकता । वास्तवमें उक्त पद्य ठीक भी है, क्योंकि इससे ब्राह्मण के पूरे वर्णकी शास जन्मके कर्मोंका – जिनसे इस वर्णन उसका जन्म हुआ है - सम्मान धर्मार्थव च ही किया जाता है, उसकी अग्रजन्मता का यह सम्मान किया जाता है,..... यावज्जीवं अग्रज और अवरजके दएड में तारतम्य भी स्वाभाविक ही होता है । इस पुत्रको ब्राह्मण कारण मनुजी ढा ० जीसे उद्धृते श्लोक में श्राततायी ब्राह्मणका वध कर | प्रशन्धका ढंग भी उसके वधकी व्यवस्था यह कहते हैं- ' मौण्ड्य प्राणान्तिको दण्डे ब्राह्मणस्य विधीयते । इतरेषां तु वर्णानां दण्डः प्राणान्तिको भ - ( १६ ) ज | ( १३३७-३३६ ( ३७६ ) यहां पर मेधातिथि लिखता है — ' यत्र क्षत्रियादीनां वध उ ओरीके पापके तन्त्र ब्राह्मणस्य मौण्ड्यम् ' । सर्वज्ञनारायण टीका करता है ' [ ब्राह्मण || ' स्वेये भवति प्राणान्तिकदण्डस्थाने मुण्डनमेव कार्यम् ' | श्रीकुल्लूकने लिखा है- होता है, क्षत्र ‘ ब्राह्मणस्य वध्रदण्डस्थाने शिरोमुण्डनं दण्डः शास्त्रेण उपदिश्यते । सौ मौर गुना; क राघवानन्दने लिखा है— श्रन्येषां प्राणान्तिके दण्डे ब्राह्मणस्य ए - दोष जान विधत्ते । जात्यन्तरस्य प्राणान्तिकेऽपराधे यत्र दण्डस्तत्र विस ईतितस्तु यथ मौण्ढ्यमात्रमिति सार्वत्रिकः ' । नन्दनने यहां लिखा है -- ' " ब्राह्म एस Gujarat. An eGangotri Initiative
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२६८ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) वं बधाई दण्डे प्राप्ते मौण्डयमेव, न वधः, इतरेषां वध एकू ' । इस विद्वान मनुजीने ब्राह्मणका सिर मुण्डवा देना ही प्राणद एंडस्थानीय माना प्रकार है । | अन्यत्र कितनी स्पष्टता है? इससे डा ० जीसे दिखलाया हुआ मनुजीका श्रादिप पूर्वापर विरोध कट गया । यह ब्राह्मणको पापकरणार्थ प्रोत्साहन.भी कदाचन नहीं है; प्रत्युत जिन गतजन्मके कर्मोसे उसका ब्राह्मण वर्णमें जन्म मास्थितः हुआ है; उनका सम्मान करके उसे भविष्यत्में भी ब्राह्मण वर्णके पाने तू बात! । के लिए सुक्मों के करनेका प्रोत्साहन दिया गया है । ' सत्यम् उत्तरः ( उद्योगः प ' ( तैत्तिरीयोपनिषत् २४ ) यही मनुजीका उत्तरपक्ष है । तब डा ० से हमसे दिया उक्त मनुका पद्य प्रक्षिप्त कैसे हो सकता है? डाक्टरजी वा कता है? उनके विचार वाले वादी इधर ध्यान दें । श्राततायी अश्वत्थामाको ब्राह्मण होनेके नाते मृत्युदण्ड न देने वाली प्रसिद्ध घटना कमी प्रक्षिप्त नहीं हो नहीं हो सकती । इसलिए महाभारत में राजाको ब्राह्मणसे केप वर्णकी शासना में अधिकृत कहा है । जैसेकि - ' ब्राह्मणेभ्यो अतिरिक्त हो -सम्मान धर्मायैव च सञ्जय! नियच्छनितरान् वर्णान् नमेन्नित्यं जाता है,.... यावज्जीवं तथा भवेः ' ( उद्योग ० १३४।४०-४१ विनिघ्नन् सर्वदुष्कृतः । है । इस पुत्रको ब्राह्मणातिरिक्त अन्य, यहां विदुलां अपने वर्णोंके नियमनकी बात कहकर उसे राज्य-( का ढंग सिखला रही है । को दो को भवेन - ( १६ ) जोकि - ' श्रष्टापाद्यं तु शूद्रस्य.... ब्राह्मणस्य वध ( ३३७-३३८ ) यह मनुके श्लोक डा ० जीने उद्धृत किये चतुःषष्टिः " | गेोरीके पापके परिणाम को दिखाने वाले हैं, वे वर्णोंको ब्राह्मणस ' स्वेये भवति हैं; दण्ड बताने वाले नहीं । लिखा है- किल्विषम् ' अर्थात् चोरी करनेमें शूद्रको पदिश्यते । । होता है, सत्रियको १६ गुना, वैश्यको ३२ गुना पाप ठगुणा सौ गुना क्योंकि— ' तद्दोषगुणविद्, ब्राह्मणको ६४ गुना | सु - दोष जानता हि सः ' ब्राह्मण चोरी आदिके नत्र विप्रस श्रविवस्तु है । सो पापका फल जन्मान्तरमें होता है, जैसेकि -- ' ब्राह्म एस यथान्यायं हव्यकव्ये द्विजोत्तमः । कथञ्चिदप्यतिक्रामन् पापः CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. वर्ण - व्यवस्था पर विचार ०६६ सूकरतां व्रजेत् ' ( मनु ० ३ | १६० ) यहां पर पापसे सुधर सौ इस जन्म में न होकर परलोक वा जन्मान्तरमें बनना कहा है-' न जातु ब्राह्मणं हन्यात् ' यह इष्ट है - यह स्पष्ट है । का निषेधक था; परन्तु पूर्व मनुपद्य ब्राह्मणको इस लोक में हिंसा-मानेगा? परलोक में उसको पापका फल भला कौन न क्योंकि इस जन्मके पाप - पुण्य अग्रिम जन्मके शरीरके म्भक होते हैं । श्रथवा ' श्रष्टापाद्य ' वाला इलोक चार-लिए भीमाना जाय; तथापि इस श्लोकसे चोरीके ऐहिक दण्डके चोरको भी ब्राह्मण कहकर धर्मके ग्रङ्ग अस्तेय कर्मसे होन है । चोर शूद्धको कर्मसे वर्ण - व्यवस्था पक्षको काट ही दिया भी दिखलाया गया है, ब्राह्मणको भी, क्षत्रिय - वैश्यको भी । ' न जातु ब्राह्मणं हन्यात् ' से इन श्लोकोंका विरोध भी उसमें तो यह लिखा है कि पापी भी ब्राह्मणको नहीं । ' अष्टापाद्य ' वाले पद्य में कोई मृत्युदण्डकी मृत्युदण्ड न दे; आपस बात नहीं है; जो कि इनका में विरोध हो । हां, वर्णोंके दण्डोंमें तारतम्य तो सर्वसम्मत कई अपराधोंमें ब्राह्मणको शूद्रादिकी है । अपेक्षा अधिक प्रायश्चित्त, तथा अधिक पवित्रता रखना, तथा अधिक दण्ड कहा हैं; कई अपराधों में अल्पतम दण्ड कहा है- पर विशेष अपराधों में अन्य वर्णोंको कहकर ब्राह्मणको वहाँ मृत्युदण्ड न दिलवाकर राष्ट्र - बहिष्कार मृत्युदण्ड दण्ड ही दिया है - यह अवसर अवसरकी दण्ड - व्यवस्था होती हैं, इससे प्रक्षि-प्तता प्रतिप्तता नहीं हुआ करती । ' अनार्यमार्यकर्माणमायें चानायं-कर्मिणम्ः । सम्प्रधार्याब्रवीद् धाता न समौ नासमौ इति ( मनु ० १०:७३ ) अर्थात् शुद्ध द्विजोंके कर्म करता हुआ, द्विज शूद्रोंके कर्म करता हुआ-न सम हैं, न विषम हैं; इस पर श्रीकुल्लूकने भाव दिया है- ' शूद्र द्विजोंके कर्म करता हुआ भी द्विजके समान नहीं हो जाता, क्योंकि-श्रनधिकारी होनेसे द्विजकर्म करने पर भी उसमें उनकी समता नहीं होती । इस प्रकार द्विज शूद्रकर्मा भी शुद्धसमान नहीं होता, क्योंकि - निषिद्ध सेवन करने पर भी उसकी उत्कृष्ट जाति नहीं हटती । वे दोनों श्रसम An eGangotri Initiative
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२७० श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) भी नहीं; क्योंकि - निषिद्धाचरण में दोनों समान हैं । इससे मनुजीको जन्मसे वर्ण - व्यवस्था इष्ट है, कर्मणा वर्ण - व्यवस्था इष्ट नहीं - यह स्पष्ट है । एक मनुजीका अन्य श्लोक भी देखें । डाक्टर भगवान्दासजी ' भारतीय संस्कृति सम्मेलन ' के चतुर्थ अधिवेशन में अपने ' सभापतिके भाषण ' ( पृ ० ८१-८२ ) में लिखते हैं- मनुने तो यहां तक कहा है-' जप्येनैव तु संसिध्येद् ब्राह्मणो नात्र संशयः । कुर्याद् अन्यद् न कुर्याद् ‘ मैत्रो ’ ब्राह्मण उच्यते ' [ २'८७ ] [ ब्राह्मण ] और कुछ करै वा न करे, केवल गायत्रीका जप करे, उसके अर्थकी भावना करै, तो भी ब्राह्मण सिद्ध हो जायगा । ब्राह्मण ' मैत्र ' है, मित्र अर्थात् सूर्य... उसके देवता हैं ' । इसमें कुछ न करते हुए भी गायत्रीऩपमात्रमें लगे भी ब्राह्मणको ब्राह्मण माना गया है । इससे जन्मना ही ब्राह्मणत्व- सिद्धि स्पष्ट है । ( २० ) धागे डा ० जी लिखते हैं- ' लिखनेको तो बहुत कुछ लिखा जा सकता है और जैसा ऊपर कहा- बहुत वर्षोंसे लिखता ही रहा हूँ, पर निष्कर्ष यह है कि- ' कर्मणा वर्णः ' का ही सिद्धान्त माननेसे हिंदू-समाज क्या, मानवसमाजकी सुव्यवस्था और कल्याणसाधना हो सकती है ' । यहाँ डा ० जी ' जन्मनां वर्णका ही सिद्धान्त माननेसे तथा तदनुकूल कर्माचरणसे ' इस पाठको करके अपने वाक्यको पढ़ लें, तो हमारा इसमें प्रत्युत्तर हो जायगा । क्योंकि- कर्मणा वर्ण - व्यवस्था तो अव्यवस्था तथा कई प्रकारकी हानियाँ पैदा करने वाली है, कारण-पुरुषका चित्त परिवर्तनशील तथा नवीनताप्रिय होनेसे समान कर्मों में स्थिर नहीं रहता | ऐसा होनेसे अपने वर्णके कार्यभारका उत्तरदायित्व कोई भी न लेगा; न उसे इस विषय में कुछ पूछा भी जा सकता है; फिर तो वर्ण प्रतिक्षण बदलते रहेंगे, व्यवहारमें बहुतसी श्रव्यवस्थाएँ होंगी - स्थानाभावसे उन विषमताओं का यहाँ निरूपण न कर उन्हें भिन्न निबन्धमें बताया जायगा । वर्ण - व्यवस्था पर विचार २७२ डा ० जी ' जन्मना वर्ण: ' मानने से इसके विपरीत वस्था, समाजमें अनन्त प्रकारके दोषों और मानस और शारीर समाजकी एवं शा और रोगोंकी वृद्धि और नित्य नयी श्रापत्ति विपत्ति होती दुराचारों कुछ भी हो रही है ' इस अपने वाक्य में ' जन्मना वर्णः ' के स्थान ' कर्मणा रहेगी, जैसी कर दें तो यही वाक्य हमारा पक्ष पोषक हो जायगा । वर्ण ' पाठ । चाक्यों म इस पर विश्वास न हो, तो ' कर्मणा वर्ण व्यवस्थामें हानि यदि ' डा ० ओ निबन्ध देखें । पर यह लोग अपनी ही बात सुनाते हैं यह हमारा । ' न न तो सुनते हैं, और न उस पर ध्यान ही देते हैं;, दूसरेको वात कर्मणा पाप समझकर उस जीको पर दृष्टि ही नहीं डालते । है । य यदि डा ॰ जी वर्ण - व्यवस्था कर्मसे मानते हैं, तो कर्म तो जन्मसे ' श्रप्रसि शुरू करके मरने तक होते ही रहते हैं, तब तदनुकूल वर्ण वे कब लिए हर देंगे? कर्मोंके समकाल तो आप वर्ण दे ही नहीं सकते, क्योंकि- विषय • आपके अनुसार ऐहिक कर्मोंका परिणाम ही वर्ण है । पर परीक्षा और उसका परिणाम समकाल कदापि नहीं होते और फिर समय - समय पर ' व कर्म बदलते भी रहते हैं; तब क्या आप भी वर्ण बंदलते रहेंगे? यदि भेद नही एक बार एक वर्णको स्थिर करके फिर कर्म - परिवर्तन में भी आप उस ' ब्राह्म ' वर्णको नहीं बदलेंगे; तव फिर श्रापका जन्मना वर्ण - व्यवस्थापक सना- अनुपप तनधर्मियोंसे क्या भेद रहेगा? क्या यही भेद रहेगा कि वे परमात्मासे प्रत्ययान दिये हुए जन्म प्राप्त वर्णकों ही स्वीकार करते हैं और श्राप विस्मृति. । श्रीपाणि शील, प्रमाद - पक्षपात यादि " दोषोंसे व्याप्त, कुछ चान्दीके सिक्के शब्दसे लेकर बिना योग्यताके ब्राह्मणत्व आदिके प्रमाण - पत्रको दे देने वाले महाभार अनीश्वर मनुष्यसे दिये हुए कृत्रिम वर्णको स्वीकार कर लेते हैं । यदि यह दूस ऐसा है तो ईश्वरका उल्लङ्घन कर देने वाले आप धन्य हैं! यदि डा ० है, तीस जी गुणकर्मकी परीक्षाके बाद वर्ण दे देना मानते हैं; तो यह बात लोक शब्द स विशेषता CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) २७१ २७२ जकी शास्त्र विरुद्ध ही है ॥ उनके वचनोंका मूल्य बहानेबाज़ीके अधिक दूर · एवं । दुराचारों कुछ भी नहीं बी, जैसी ( २१ ) अब डा ० जीके ‘ न विशेषोस्ति वर्णानां ' तथा दो - तीन अन्य वर्णपाठ वाक्याम प्रकाश डालकर यह निबन्ध समाप्त किया जाता है । To सोको ह हमारा ' न विशेषोस्ति वर्णानां सर्वं ब्राह्ममिदं जगत् । ब्रह्मणा पूर्वसृष्टं हि निकी वाह कर्मणा वर्णतां गतम् ' ( महा ० शान्ति ० १८८ १० ) इस पच पर डा ० कर उस जी को बड़ा गर्व है । अतएव इसको उन्होंने ' बहुत प्रसिद्ध श्लोक ' कहा है । यदि हम भी महाभारतके श्लोकोंको अपने पक्षकी पुष्ट्यर्थं दें; और मतङ्ग श्रादिके वहां इतिहास दें, तो डा ० जी उन्हें तत्क्षण जन्मसे ' अप्रसिद्ध, प्रक्षिप्त ' श्रादि विशेषणोंसे सस्कृत करने लग जायेंगे । इस - वे कब लिए हम उन्हें छोड़कर डा ० जीके प्रिय पद्यको ही अपनी मीमांसाका योंकि- विषय बनाते हैं । इसका अर्थ यह है कि— श्रीर ' वर्णानां कोपि विशेषो नास्ति — ब्राह्मणादि वर्णोंमें कोई श्राकारका समय पर ? यदि मेद नहीं है । सर्वमिदं जगद् ब्राह्मम्, हि ब्रह्मणा पूर्वसृष्टम् – यह जगत् ' ब्राह्म ' है, क्योंकि ब्रह्मासे उत्पन्न हुया हुआ है । इस अर्थ में कोई भी आप उस श्रनुपपत्ति नहीं । यहां ब्रह्माकी सन्तान होनेसे उसे श्रपत्यार्थक -- सना मात्मा से प्रत्ययान्त होनेसे शब्दमात्र से ' ब्राह्म ' कहा गया है । इसी कारण श्रीपाणिनिने भी कहा है- ' ब्राह्मोऽजातौ ' ( ६ | ४ | १७१ ) यहां ' ब्रह्मन् ' विस्मृति.. - सिक्के शब्दसे अपत्य और जाति श्रर्थमें टिलोपका निपात हो जाता है । नं वाले महाभारतीय उक्त पद्यमें ' सर्वं ब्राह्ममिदं जगत् । ब्रह्मणा पूर्वसृष्टं हि ' यदि यह दूसरा- तीसरा पाद थापसमें सम्बद्ध हैं । दूसरा पाद प्रतिज्ञावाक्य दिडा ० है, तीसरा पाद हेतुवाक्य है; इसीलिए तीसरे पादमें हेतु अर्थवाला ' हि ' त लोक शब्द साक्षात् लिया गया है । इसमें पहले पाद में वर्णोंकी कोई विशेषता नहीं कही गईं, दूसरे और तीसरे पाद में जन्मसे वर्ण - व्यवस्था CC - 0. Ankur Joshi वर्ण - व्यवस्था पर विचार २७३ सिद्ध की गई है; क्योंकि ब्रह्मोसे सृष्ट ( निर्मित ) होनेसे ही उसे ब्राह्म कहा गया है, गुणकर्मसे नहीं । ' चौये ' पादमें ब्रह्मासे सृष्ट वयका भेदक कर्म कहा गया है । इससे वादियोंकी कोई भी इष्ट सिद्धि नहीं, क्योंकि -- यहाँ यही विचारणीय है कि - यहाँ ब्रह्मासे सृष्ट वर्णोंक जो कर्म संकेतित किये गये हैं, वे पूर्व जन्म के हैं या इस जन्मके? यदि संसारप्रवाहके अनादि होने से पूर्वजन्मके ही कर्म हैं जिनसे ब्रह्माने उन वर्णोंको बनाया; वे ही ब्रह्मासे सृष्ट वर्णोंकि मूल हैं; तब तो जन्मसे ही वर्ण - व्यवस्थाका ' सिद्धान्त सिद्ध हो ही गया, क्योंकि – जन्मसे वर्ण - व्यवस्था पूर्वजन्मके कर्म से ही मानी जाती है, इस जन्मके कर्मसें नहीं । Collection Gujarat. यदि डा ० जी श्राग्रहवश इस जन्मके कर्मोंको ही मानें तो ठीक नहीं, क्योंकि वोंकी जब ब्रह्माजीने सृष्टि की, उस समय उनके ऐहिक वर्ण कहांसे आ गये? क्या जन्मके समकालमें ही बच्चा उस - उस -वर्णके योग्य कर्मों को कर लेता है, जिनसे उसे जन्मसे ही ब्राह्मणादि कहा जा सके? यदि हाँ, तो यह प्रत्यक्षका अपलाप है । यदि जन्मके साथ ही ऐहिक कर्म असम्भव हैं, वैसे ही वर्णोंके ब्रह्मा द्वारा सृष्टिके समयमें भी उनके ऐहिक कर्म असम्भव हैं । इस लोकके श्रागेके श्लोकों -में सुफेद, लाल, पीले, काले रन जो दिखलाये गये हैं, उनसे भी वर्ण-' परिवर्तनका अन्य जन्ममें होना स्पष्ट है । उसी जन्ममें पुरुषका जो रङ होता है - वह बदलता नहीं, वही रहता है, अग्रिम जन्म में भिन्न शरीरको प्राप्तिले रङ्गमें परिवर्तन आना तो सम्भव है । इससे पूर्वजन्म के इस जन्ममें कारणता होनेसे डा ० भगवानदासजी का इस लोक-से भी पक्ष ' उष्ट्रलगुड ' न्यायसे कट गया । तभी तो न्यायदर्शन में भी -कहा गया है — ' अथापि.... धर्माधर्मलक्षणमदृष्टमुपादीयतेः, तथापि पूर्वशरीरयोगोऽप्रत्याख्येयः । तत्र [ पूर्वजन्म शरीरे ] हि तस्य [ धर्मा-An eGangotri Initiative
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२७४ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) धर्मलक्षणदृष्टस्य ] निवृति: ( सत्त ), न अस्मिन् जन्मनि [ पूर्वजन्म-कृत - कर्मणामेव यत्र जन्मनि भोगस्वीकारात् ] । [ पूर्वजन्मनः ] कर्म खलु इदं जातिविशेषनिर्वर्तकम् ' ( वात्स्यायन ० ३।१।२७ ) तब पूर्वजन्मके ही कमोंके कारण होनेसे इस जन्ममें तदनुसार भिन्न - भिन्न एक वर्ण उत्पत्ति स्वाभाविक ही हैं । इससे सनातनधर्मके ही सिद्धान्त ' जन्मना ' वर्ण - व्यवस्था ' का मण्डन होंगया । फिर इस जन्मके कसे अग्रिम ज़न्ममें ही वर्ण - परिवर्तन होता है क्योंकि महाभारतके उक्त प्रकरणमें इसी जन्म में वर्ण - परिवर्तन स्वीकृत: नहीं किया गया । तभी इसी अध्यायके श्रादिम लोकोंमें ' असृजद् ब्राह्मणानेव पूर्वे ब्रह्मा प्रजापतीन् । ' ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्च द्विजसत्तम! ये चान्ये भूतसङ्घानां वर्णास्ताँश्चापि निर्ममे ' ( शान्ति ०. १८८ १-४ ) यहाँ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्रोंकी ब्रह्मा द्वारा उत्प कही गई है, ऐहिक गुणकर्मसे नहीं । इस प्रकार श्रीभगवानदासजी के प्रधान प्रमाणका उत्तर हो गया । ( २२ ) सत्ययुगके लिए ' वर्णाश्रमव्यवस्थाश्च न तदासन् न संकर " ( ६१ ) इस ' वायुपुराण ' के श्लोकार्धको उद्घृत करके न मालूम डा ० जीने अपना पक्ष कैसे सिद्ध करना चाहा है, प्रत्युत इससे तो उनके पक्षका खण्डन हो रहा है; क्योंकि जब उस समय वर्णाश्रमकी व्यवस्था नहीं थी; तब भी ब्राह्मणादि थे या नहीं? यदि थे; तो वे जन्मसे ही सिद्धं हुए । यदि नहीं थे; तो क्या लोग तब कोई भी कर्म नहीं करते थे? यदि करते थे फिर भी यदि किसी वर्णको प्राप्त नहीं होते थे; तब कर्मसे वर्ण - व्यवस्था कट गई । इस श्लोकमें सङ्करकां श्रभाव दिखानेसे स्पष्ट मालूम होता है कि तब पूर्वजन्मके कर्मोंसे उत्पन्न वर्ण थे, परन्तु वर्णोंका आपसमें सङ्कर, कर्मसंकर, और विवाहादि - सङ्कर नहीं CC - 0. Ankur Joshi Collection वर्ण - व्यवस्था पर: विचार २७६ था । अन्यथा वर्णोंके न होनेसे संकर - निषेधका बताने वाला यह होती व्याहत हो जायगा । इस पथ में सङ्करकी निन्दा की गहू ६ नियंत अन्तर्वर्णविवाहके पक्षपाती डा ० जो उसकी प्रशंसा करते हैं । तब प श्यकत यह श्लोक उनके मतमें प्रक्षिप्त नहीं? क्या वे पुराणों में प्रक्षेप क्या आजक नहीं मानते, जोकि उनके वचन अपने पक्षकी पुष्टिमें देने को उद्यत वणिक ये हैं? हो । देते हैं, डा ० जीसे प्रष्टव्य है कि वेद पहले थे, वा सत्ययुग पहले था । प्रकरण यदि वेद पहले थे, तो उसके ' ब्राह्मणोस्यमुखमासीद् ' ' ( ** प्रजाः प्रजाकी यजुः ३१।११, अथवं ० १६।६।६ ) इत्यादि मन्त्रोंमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र वर्णोंका वर्णन आता है, इससे स्पष्ट है कि सत्ययुग में भी वर्ष थे । कर लिय यदि सत्ययुग वेदले पहले था, तब वेदोंका धनादित्व करता है, दो आपको भी अनिष्ट है 1. क्या सत्ययुग में ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ जो संन्यास - यह आश्रम भी नहीं थे, क्योंकि उक्त पुराण - पथमें आश्रमोंका जी कहत भी निषेध किया गया है? तब पुरुष उत्पन्न कैसे होते थे! बहुता ' उसमें तस्माद् व यहाँ डा ० जीसे सम्मत अर्थ नहीं । उक्त प्रद्युमें एवं i ( ४५१२-निषेध नहीं कहा गया, किन्तु वर्णाश्रमकी व्यवस्थाका निषेध किया गया । ४ ) ' वर्णाश्रम व्यवस्थाश्च न तदासन् ' यही पाठ वहां पर है । " पुराणका स्पष्ट है कि तब ‘ वर्ण - आश्रम ' थे, तभी तो ‘ ' न न सङ्करः वर्णसङ्कर ए यदि श्राश्रमसङ्कर नहीं थे — यह कहना सङ्गत हो जाता है; नहीं तो यहाँ पर स्मृतिर्बरा ' यावज्जीवमहं मौनी ब्रह्मचारी " तु मैं पिता । माता तु मम वन्ध्यासी है । पुरा पुनश्च पितामहः ' यह न्याय चरितार्थ हो जायगा । लोकवृत्तको विक न्यायदर्शन * P ( तब ' वर्णाश्रमकी व्यवस्था न होने का यह प्राशय है किं तद वयं धर्मशास्त्र कुमार्गगामी नहीं थे. अपने धर्मका अनुसरण करते थे इस कारण मितिहास पुर समय व्यवस्था अर्थात् नियन्त्रण कण्ट्रोल नहीं थामा धर्मशास्त्रक संकरता, श्राश्रमसंकरताको हटानेके लिए नियन्त्ररूप व्यवस्था थपेक्षि Gujarat. An eGangotri Initiative
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२७६ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) २०८ होती है । परन्तु जब सत्ययुगमें स्वभावत: ही सभी वर्ण अपने अपने यह व नियत कमोंमें लगे थे; तब उस युगमें व्यवस्था । नियन्त्रण ) की - श्राव-है परन्तु श्यकता भी क्या थी? - नियन्त्रण तो श्राजकतके समय उपयोगी है, प्रक्षेप नही आजकल अब्राह्मण भी याजन, अध्यापन, प्रतिग्रह कर रहे हैं, ब्राह्मण भी उद्यत हो बणिकवृत्ति, सेवावृत्ति कर रहे हैं । जय वर्णं अपने - अपने कर्मको छोड़ देते हैं, तब उनके प्रबोधनार्थ व्यवस्था आवश्यक होती है । तभी उसी प्रकरणमें कहा है — ' तासां ( प्रजानां ) विशुद्धात् संकल्पाजायन्ते मिथुनाः महले था । प्रजाः ' ( वायुपुराण ८१२८ ) क्या श्राप बिना ही मैथुनके संकल्पमात्रसे = १०११ प्रजाकी उत्पत्ति मान लेंगे? यदि नहीं, तो पहला पद्य ही कैसे प्रमाणित वैस कर लिया? वानप्रस्थ जोकि - भविष्यपुराणको ' कर्मणा वर्णव्यवस्था ' बताने वाला डा ० जी कहते हैं - यह भी ठीक नहीं, वहां तो कर्मणाका भी खंडन किया है-' तस्मा॑द् दॆहात्मके नैतद् ब्राह्मण्यं नापि कर्मजम् ' ( ब्राह्मपर्व ४१।२७ ) । बाथम ब उसमें वर्ण व्यवस्थाका सिद्धान्त जन्म और कर्मका समुच्चयमाना है कया गया ( ४५।२-३-४ ) इसे अग्रिम निबन्धमें स्पष्ट किया जायगा । श्रुतः पुराणका वचन भी श्रन्ततः कर्मप्रशंसामात्रपर्यवसायी ही रहता है । नहर एवम यदि किसी पुराणवचनमें स्मृतिविरुद्धता मिले; तो वह ' द्वयोर्द्वधे यहाँ पर स्मृतिर्वरा ' ( व्यासस्मृति १/४ ) इस कथनसे स्मृतिसे बाधित हो जाता बन्ध्यासद है । । पुराणका मुख्य विषय लोकव्यवहारकी व्यवस्था करना नहीं; किंतु लोकवृत्तको यताना ही उसका मुख्य विषय है । जैसे कि - ४ । १ । ६२ क, न्यायदर्शन के वात्स्यायनभाष्यमें कहा है- ' लोकव्यवहार - व्यवस्थापनं तव धर्मशास्त्रस्य विषयः । पुराण - इतिहासका विषय वहां पर ' लोकवृत्त-कारण मितिहासपुराणस्य ' लोकवृत्तका प्रतिपादनमात्र TH धर्मशास्त्रका बताया है । पुराण तथा अपेक्षित वहां अपने - अपने विषयमें ही अधिक प्रामाण्य माना गया CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. वर्ण - वस्था पर विचार २७७ है । जैसेकि - ' यथाविषयमेतानि [ मन्त्रब्राह्मण धर्मशास्त्र इतिहास-पुराणानि ] प्रमाणानि इन्द्रियादिवदिति ' । ( २३ ) आगे डा ० जी कहते हैं- ' वर्णपरिवर्तन के लिए स्वयं मनुमें तथा आपस्तम्ब श्रादिमें वचन हैं [ यह स्वच्छ असत्य है 1 पर उनकी व्याख्यामें लोग विवाद करते हैं । जैसे वकील लोग अपने पत्रके अनु-कूल ही कानूनके शब्दोंका लापन और प्रतिकूलका अपनापन करते हैं, जिससे भी अवान्तररूपसे यही सिद्ध होता है कि शेखिका श्रयं व्याख्याता की बुद्धि है ' यह डा ० जीका वाक्य सनातन धर्मियों में वस्तुत: नहीं घटता; जैसा श्राप लोगोंमें । उसका श्रादर्श भारतीय संस्कृतिसम्मेलनके चतुर्याधिवेशन ( २ मार्च १ ९ ५२ ) के अपने भाषण (.४६. पृष्ठ. ) में देखिये- उसमें श्रापने, ' तपो विद्या च विप्रस्य निःश्रेयसकरं परम् ' यह मनुका श्राधा लोक दिया है । उसका उत्तरार्ध ' तपसा किल्विषं हन्ति विद्ययामृतमश्नुते ' ( १२/१०४ ) यह छिपा लिया है - उसका अर्क बलसे खींचा - तानीका क्रिया है कि- ' जिस मनुष्यमें तपस्या और विद्या · नहीं, वह ब्राह्मण नहीं 1 जिसमें यह हों, वही ब्राह्मण है ' । यहाँ यह आशय नहीं है । यहाँ तो यह आशय है— तपस्यासे ब्राह्मणका पाप चीय होता है और ज्ञानसे उसे मोक्ष मिलता है, यहाँ पर ज्ञान, और तपस्या पारलौकिक. सुर्गातमें सुविधा करने वाले माने गये हैं, उनके होने न होनेसे ब्राह्मणताका होना न होना कहीं नहीं माना गया । ' विद्यातपोभ्या भूतात्मा शुध्यति ' ( मनु ० ५/१०१ ) यहां मनुजीने विद्या और तपस्यासे आमाकी शुद्धि कहकर उनको उत्कर्षाधायक- माना हैं, स्वरूपाधायक वा जातिप्रद सर्वथा नहीं माना । निःश्र यसका अर्य पारलौकिक - कल्याण है, ब्राह्मण बनना न बनना नहीं । इस प्रकार तोड़-मरोड़ आप लोगोंमें स्पष्ट हैं । श्राप हमें उपालम्भ कैसे दे सकते हैं? आपने मनुका 65 वचन कोई ' दिया नहीं - जिससे वर्णपरिवर्तन सिद्ध होता हो । An eGangotri Initiative
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२७८ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) ( ख ' ' आपस्तम्बको भी ' चत्वारों ' वर्णा ' प्राह्मणं - क्षत्रिय - वैश्य शूद्राः, तेषां पूर्वंपूर्वी जन्मतः श्रेयान् ' ( आप. धर्मसूत्र १ / १ / ४-५ ): इन शब्दोंसे जन्मसे: पूर्ण - व्यवस्था इष्ट है, । ' ब्राह्मणमात्रं च [ हत्वा ब्रह्मस्नो भवति ] १/२४७ ) इस आपस्तम्बके वचनमें मात्रशब्दले जन्मना वर्ण व्यवस्था इष्ट है । इसलिए यहां श्रीदत्तने टीका की है- ' मात्रग्रहणाद् नाऽभिजन-विद्या संस्काराद्यपेक्षा ' कितनी स्पष्टता है? और देखिये –'गर्भं च तस्य [ ब्राह्मणस्य ] अविज्ञातम् ' [ स्त्रीपु नपुंसकभेदेन श्रविज्ञातम् ] ' ( १/२४८ ) ' आत्रेय [ रजस्वला ] च स्त्रियम् ' ( आ. ध. सू. ११२४/६ ) यहां पर ब्राझणीके गर्भको मारनेसे भी ब्रह्म - हत्या मानी गई है, इससे भी ब्राह्मणवर्ण जन्म बल्कि गर्भसे ही सिद्ध हो रहा है । तभी यहां श्रीहर दत्तने लिखा है- सम्भवत्यस्यां ' ब्राह्मणगर्भः । इत्यादि बहुत स्थलों में जन्मना वर्ण व्यवस्था सिद्धान्तित है । तब डा ० जी श्रापस्तम्बका नाम कर्मणा वर्ण - अवस्थामें कैसे लेते हैं? कदाचित् डा ० जीको श्रापस्तम्य का'धर्मचर्यया जघन्यो जघन्यो वर्णः पूर्व - पूर्व वर्णमापद्यते जातिपरिवृत्तौ । ' अधर्मचर्यया ' पूर्व: पूर्वो वर्णो जघन्यं जघन्यं वर्णमापद्यते जातिपरिवृत्तौ ' ( २१११११६-११ ) स्वा ० द ० जीसे स ० प्र ० में उष्टत यही वचन गुणकर्मणा वर्ण व्यवस्थामें अभिमतं हो जैसे कि उन्होंने उसे ' मानव-" धर्मसार ' ( ४४ पृष्ठ ) में उद्घृत किया है — यहां पर ' मी डा ० जीका ' ' श्रम है । जैसे स्वाद: जीने ' स ० प्र ० के ' ५३ पृष्ठमें ' जातिपरिवृत्तौ ' पदका ' श्चर्य छिपाकर अपने एतद्विषयक मतको निर्मूल सूचित किया हैं वैसे डा ० ' जीनें भी उस पदमें ध्यान न देकर अपने पक्षको ' सिकतांमित्ति ' सिंद्ध कर दिया है । 1: क्रि ज्ञातिपरिवृत्तौ ' का अर्थ है ' जातेः — जन्मनः मनुष्यत्वजातेर्वा परिवृचौ परिवर्तने । ' जाति ' का अर्थ जन्म होता है, जैसे कि – ' मृच्छ कटिक ' में – ' अन्यस्यामपि जातौ ( जन्मनि ) मा बेश्या भूस्त्वं हि CC - 0. Ankur Joshi Collection वर्ण - व्यवस्था पर विचार २५० सुन्दरि? ( ३ ) । ' जातिः सामान्य - जन्मनोः ' ( ३ श ३६८ ) वह इस वचन भी इसमें साक्षी है । ' जाति ' का अर्थ ' मनुष्यजाति · ' जन्म ' भी होता है जैसे कि - ' समानप्रसवात्मिका जातिः ' ( न्यायदर्शन २/२/७० | भूमिक ) भाषा यहाँ पर श्री हरदत्तमिश्रकी टीका भी हमारे पक्षको स्पष्ट कर रही है-‘ धर्मचर्यया - स्वधर्मानुष्ठानेन जघन्यों वर्णः शूद्रादिः पूर्व - पूर्व वर्णमापदेते विषय वैश्यादिकं प्राप्नोति जातिपरिवृत्तौ - जन्मनः परिवर्तने शूद्रो वैश्यो जायते तत्रापि स्वधर्मनिष्ठः तन्नियो जायते 1 ।; तत्रापि स्वधर्मपरो ब्राह्मण इति । एवं क्षत्त्रिय - वैश्ययोरपि द्रुष्टव्यम् । ' । ' ' नहीं क सो जन्मका परिवर्तन, ' मेरकर पुनर्जन्ममें होता है । इस जन्म में तो चंच स्वकर्म करके ' और ' मरकर शूद्रादि नीच चणं पुनर्जन्ममें उत्तम वर्ष बघ प्राप्त करे, और ब्राह्मणादि उत्तम वर्ण इस जन्म में स्वकर्मभ्रष्ट होकर कृपा फिर मरकर पुनर्जन्मे शूद्रादि नीच वर्णको प्राप्त करें " इसमें सनातन- क्योंकि धर्मकै पक्षकी कोई हानि नहीं; क्योंकि यहीं तो सनातनधर्मका सिद्धान्त ( गीता. ' सहज ' ' है । विप्रतिपत्तिं " तो इस जन्मके कमसे इसी जन्म में चरों - परिवर्तनमें है, जन्मान्तरमें वर्ण - परिवर्तनमें तो विपत्तिपत्ति नहीं । बल्कि उसका साधक धूमेनागि उन्नतिक चंचन ' ' छान्दोग्योपनिषद् ' में सुप्रसिद्ध है— ' यथा हि रमणीयचरणा अभ्याशी हे यत् ते रमणीयां योनिमापद्यरन् श्वयोनिं वा, सुकरयोर्निया, कर्म स्वात चाण्डालयोनिं चा ' ( २११७१७ ) तो क्या डा ० " जीने ' कुत्सित श्राह इसमें छीन रहे चांले पुरुषको इस जन्ममें कुत्ता वा सुवर आदि बनी हुआ देखा है । कॆति॑ित॑स्तु॒ ‘ ययान्या॑यं ह॒व्यकव्ये द्विजोत्तमः । कर्याञ्चिदप्यतिक्रामन् पापः याजन त्रिय: शुकरतां व्रजेत् ' ( मनु ० ३।१६० ) तो माने हुए न्यौते में न पहुंचे हुए कम. उपद ब्राह्मणको डॉक्टर जोने इस जन्म में सुअर बना हुआ देखा है? य नहीं; किन्तु जन्मान्तरमें वैसा बनता है, वा ऐसे वंचन विहित के प्रशंसार्थ-व चाद तथा निषिद्धके निन्दार्थवाद है; वस्तुतः वैसा वह नहीं हुआ कर हमारे पते चैसे ही आपस्तम्बादिके वचनमें भी अन्य वर्णता- धन्य जन्ममें इट Gujarat. An eGangotri Initiative