सनातन धर्मालोक ४ — पृष्ठ 161–170

सनातन धर्मालोक ४ · पृष्ठ 161–170

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२५० श्रीसनातनधर्मालोकः ( x ) इस जन्म में नहीं; अथवा निन्दार्थवादमात्र है । ' जातिपरिवृत्ति ' ) वह. ' जम्मपरिवर्तन ' है; इसका अर्थ स्वा. द. जीने अपनी ' ऋग्वेदादिभाष्य- का अर्थ यजाति ' भूमिका में बहुत बिगाड़ा है; पदोंका अर्थ, अपनी इच्छानुसार । २ । ७० ) भाषाशास्त्रपर आक्रमण करना है । विश्वामित्र कर्रना ही हैं- तथा वाल्मीकि श्रादिके. विषयमें भिन्न निबन्ध में कहा जायगा * । मापर्यंत जायते ( २४ ) आगे डा ० जीं लिखते हैं- " उन्हींकी देखा - देखी औ इति । शूद्रं भी स्वस्वप्रवृत्त्युचितं काम, दाम, आरामका न्यायानुसार नहीं करना चाहते । सब वस्तुओंके लोलुप सभी हो रहे हैं । बटवारा शिक्षक जन्मम तो बुंचक, रक्षक तो भक्षक, पोषक तो मोषक हो गया है और सेवक भी श्रय धर्षक हुआ जाता है ' यहां पर डा ० जीको जानना चाहिये कि - यह नष्ट होकर कृपा ब्राह्मणोंकी नहीं, बल्कि श्राप जैसे सुधारक नांमघारियोंकी ही है । सनातनं- क्योंकि आप लोगोंने ' स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धि लभते नरः ' सिद्धान्त ( गीता १८।४५ ) श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् ( ३।३२ ) तिनम है, ' सहजं कर्म: कौन्तेय! सदोपमपि न त्यजेत् । सर्वारम्भा हि दोषेण. की सकि धूमेनाग्निरिवावृताः ( १८४८ ) एतदादि श्लोकोंको भुलवाकर वा उन्हें चरणा उन्नतिका बाधक सिद्ध करके ' सभी उन्नति करो... ऐसी प्रेरणा करके योनि. स्वातन्त्र्य जारी कराया, तभीसे स्वयं ही कर्मसाङ्कर्य जारी हुआ । श्राचरंग इसमें ब्राह्मणों का क्या अपराध? ब्राह्मणोंके ही कर्म वा वृत्तिको सब देखा है । छीन रहे हैं चा छीनना चाहते हैं । ब्राह्मण फिर भी पढ़ने - पढ़ाने, यजन-याजन, दानप्रतिग्रह आदि मनुप्रोत कर्मोंमें प्रायः लगे हुए हैं ।, परन्तु पहुंचे हुए तन्त्रिय आदि ही ब्राह्मण. आादियोंका संरक्षण कर्म छोड़कर ब्राह्मणोंके ही 1. उपदेश तथा अध्यापन एवं प्रतिप्रहादि स्वीकार करनेको उद्यत हो - प्रशांसार्थ-थां करता । वाल्मीकिके विषयमें ' श्रीसनातन धर्मालोकय पुष्प में देखें । वह. हमारे पतेसे ३ ) में मंगावें!..? CC - 0. Ankur Joshi Collection वर्णव्यवस्था परवर २८१ गये हैं । तब ब्राह्मण भी अपने लिए श्रापत्काल देखकर लाचारीसे मनु ० ( १० / ८१-८२ ) के संकेतसे कहीं क्षत्रिय, वैश्योंके कर्म करते भी दीख जाते हैं । इस प्रकार ब्राह्मण लोग ब्राह्मणोंकी हुए ब्राह्मणोंकी भी हानि करने वाले सिद्ध हो रहे हैं; अपनी भी वृत्ति छीनकर हैं । तब वे ही लोग ' इतो भ्रष्टास्ततो नष्टाः ' के हानि करते ब्राह्मणोंको गालियां दें; तो इसमें ब्राह्मणोंका उदाहरण बनकर यदि क्या दोष? " यह सब ' जन्मनैव वर्णः ' का विलसित विक्रीड़ित " हैं यह भगवानदासजीका कथन निर्मूल ही है । वस्तुतः. श्राप लोगोंसे प्रवर्तित बाबू कर्मस्वातन्त्र्यका ही यह फल है । सनातनधर्मं उन - उन वर्णोंक कर्म बताता है, कम से वर्ण नहीं बताया । परन्तु थाप लोग इस सिद्धान्तको पलटकर स्वयं ही पूर्वोक्त हानियाँ करवा रहे हैं । और सनातन धर्म जन्मसे वर्ण स्वीकार करके भी उन - उनके लिए कर्मो का कहीं निषेध नहीं करता; बल्कि अपने कर्मको छोड़ने वालोंकी अग्रिम जन्ममें बढ़ी दुर्दशा बतलाता है । तब डा ० जीका तथाकथित दोष कैसे उपस्थित हो सकता है?. यह आलोचना विस्तीर्ण हो गई है । डा ० जीको वर्ण - व्यवस्था-विषयक हमारे सब निबन्ध पढ़ लेने चाहियें - जिनसे उनके सब संशय मिट जावें । डा ० जीको यह जानना चाहिये कि सर्वभक्षोः च गौ: श्रेष्ठः सर्वत्यागी न गर्दभः । निदुग्धापि च गौः पूज्या न तु दुग्धवंती खरी ( सत्यार्थप्रकाशमें, पराशरस्मृतिके नामसे उद्धृत ) ' दुःशीलोपि द्विजः पूज्यो न तु शूद्रो जितेन्द्रियः । कः परित्यज्य गां दुष्टां दुहेच्छोल-वतीं खरीम् ' ( पराशरस्मृति ८ ( ३३ ) इस बातको अवलम्बन करके यदि शास्त्रकारोंने - कहीं कर्महीन भी ब्राह्मणको प्रशंसा की है; वहां कारण वास्तविकता ही है, कर्मत्यागकी वहां प्रोत्साहना नहीं है । स्वकर्महीनता Gujarat. An eGangotri Initiative

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२८२ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) में शास्त्रकाराने अग्रिम जन्म में उनकी दुर्दशा सूचिताभकर ही दी है, देखिये मनुस्मृति ( १२।७०-७१-७२ । ऐहिक - कर्मश्वेत सो ब्राह्मणकी प्रशंसा जो कि शास्त्रकारोंने सूचित की है; वह गतजन्मके सुकमोंके ही कारणसे है । जबकि ऐहिक- कर्मोंसे होनको अग्रिम् जन्ममें दुर्दशा शास्त्रकारों ने बताई है; तब वहां गतजन्म के सुकर्म वाले उन ब्राह्मणोंकी प्रशंसा - प्रतिपादक श्लोक प्रक्षिप्त कैसे माने जा सकते हैं?.. हमारा यह शरीर गतजन्मके कर्मोसे बना हुआ है । इस जन्मके क्रर्मोसे बनने वाला शरीर तो अग्रिम जन्ममें होगा । इस कारण पूर्वजन्मके सुकम से ही ब्राह्मण वर्ण वाले पिताके घरमें उत्पन्न हुए ब्राह्मणकी इस जन्ममें फर्म-हीन होने पर भी यदि प्रशंसारूप पूजनीयता न मानी जावे, ' यदि पूर्व जन्मके कुकर्मोसे हो शूद्र ' घरों वाले पिताके घरमें उत्पन्न शुद्धकी अब सुकर्ममें लगे होने पर भी अपूजनीयता न ' मानी ' जांबे, ती स्पष्ट होगा कि इस प्रकारके लोग पूर्वजन्म ' और ' पुनर्जन्मको नहीं मानते | इस कारण यह दीख रहे हुए चन्द्रको मानने वाले नास्तिक हैं या प्रच्छन्न-बौद्ध हैं, या स्वेच्छाधर्मी है. या शास्त्रोंके उल्लंघन करने वाले है । ' वे इसी वर्तमान जन्मको तथा उसीके कर्मोंको मानते हैं, पूर्व और परजन्मों तथा उनके कर्मोंकि फल नहीं मानते । परन्तु यदि वे पूर्वजन्म तथा पुनर्जन्मवादको मानते है; तब पूर्वजन्मकर्मानुसार ही हुए हुए इस जन्मसे ही उन्हें’वर्ण - व्यवस्था माननी चाहिये । इस जन्मके कर्मोसे तो उन्हें अग्रिम ही जन्ममें वर्ण व्यवस्था माननी पड़ेगी, नहीं तो गंतजन्मके कर्मर्थ ' हो जाएंगे । जबकि कर्म मरण तक होते ही रहते हैं; तब उनका परिणाम भी उस समय तक कैसे निकल सकता है । उन कर्मेका परिणाम तो मरण और पुनर्जन्म के बीच के समयमें ही घोषित होता - है । वादियोंके मतानुसार इस जन्मके कर्मका फल यदि यहीं मिल · जाय, तो अग्रिम जन्म ही न हो सकेगा, क्योंकि अग्रिम जन्मके मूल इस पूर्व जन्मके कर्म हो हुआ करते हैं । CC - 0. Ankur Joshi Collection वया व्यवस्था पर विचार यह है शास्त्र व्यवस्था, शेष है लोक - सम्मान, सो वह अपने कर्मे श्रेष्ठ, अवर जाति चालेका भी होता है । सनातनधर्मी ही I क . जैसे जुलाईका भी सम्मान करते हैं, १० मी. खुल्लर जैसे विक ( १० ) वैदेशिक को भी सभापति पद देकर सम्मानित कर चुके हैं भगवानदासजी जैसे वैश्यको भी ' श्रद्धेय ' मानते हैं । श्री गान्सर । डा -7666 वैश्यको भी ' महात्मा ' मानते हैं । वही सनातनधर्मी रावण जैसे मामल गुणकर्म को भो प्रतिवर्ष अपमानित करते ही रहते हैं । इस प्रकार सम्मान दे श्रालोचन सगुण 100 होने पर ही होता है । निगुण होने पर तो ब्रह्म की चित किय -नहीं होती, ब्रह्मको भी सगुण ईश्वर होने पर ही पूजा हुआ करती पर इससे सनातनधर्मी वर्ण - व्यवस्थामे परिवर्तन नहीं चाहते । कुकर्मा रावणको भी ब्राह्मण ही कहते हैं, ज्ञानी धर्मव्याधको भी ( १ ) ही जान कहते है हैं । वह वस व्यवस्था जन्म से ही सिद्धान्तित की हुई कई प्रकार ब्राह्मणश्च > हानियाँले ब्रुचायगी हुलसे वैसे कह रहे हुए शास्त्रका उलाहन हैं, और नहीं होगा । श्राशा है बा ० भगवान्दास M. A. महाशय, तथा जैसे दूसरे सुधारक भोनित होकर ध्यानसे विचार कर इस विष प्रत्यु farahtar, प्रा आदिके बहानेसे शास्त्रवचनोका तिरस्कार सिद्ध हुई ' करेंगे । " उन्हें हमारे वर्ण - व्यवस्था विषयक सबै निबन्धाँका मनोबो “ अध्ययन कर ही जाएं । i .... [ डाक्टर न % F Gujarat. An eGangotri Initiative ' लेना चाहिये; महाशयने इस 11: a सकता है । जिनसे एतत्सम्बन्धी उनकी शा कहा कर का पहले व हमारे निबन्धका प्रत्युत्तर नहीं दिय ] बादी इन्ह है । जब शूद्र ब्राह्म m लोक उनक पूर्वका श्लो ( युग्मक प

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अपने गुरु | श्री ही ( १० ) वर्ण - व्यवस्थाविषयक कुछ भ्रमों का परिहार | डान्स " कई महाशय कुछ ऐसे प्रमाण उपस्थित करते हैं, जिसमें उन्हें कसे वर्ण - व्यवस्था प्रतीत होती है । कुछ थोडेसे प्रमाणोंकी यहां सम्मान र श्रालोचना दी जाती है; शेष प्रमाण अग्रिम पुष्पोंमें उद्धृत तथा बाली-चित किये जायेंगे | करती मनुका प्रसिद्ध श्लोक चाहते । को भी ( १ ) स्वा ० दयानन्द आदि बहुतसे सुधारक ' शूद्रो ब्राह्मणतामेति कई... प्रकार ब्राह्मणश्चैव शुद्धताम् ' ( मनु ० १०/६५ ) इस लोकको बड़े संरम्भसे देते उस हैं, और इससे गुणकर्मकृत वर्ग - व्यवस्था सिद्ध हुई समझ लेते हैं । य, तथा स प्रत्युत्तर — यहां प्रष्टव्य है कि उक्त पद्यमें ' शुद्ध ' शब्द जन्मसिद्ध से इष्ट है, वा गुणकर्मसे? यदि जन्मसिद्ध, तब वर्ण - व्यवस्था भी जन्मले तिरस्कार / सिद्ध हुई । यदि गुणकर्मसे शूद्र इष्ट है, तब वह ब्राह्मण, कैसे हो. मनोबो सकता है? इस पद्यमें गुणकर्मका कहीं गन्ध भी नहीं है । तब ऐसा कह देना वादियोंका पहला छल है । दूसरा छल यह है कि इस लोक-का पहलेके ६४ वें श्लोकले सम्बन्ध है, क्योंकि ६४-६५ श्लोक युग्मक हैं । ' दि. ] बाद इन्हें इकट्ठा नहीं कहते, क्योंकि वैसा करनेसें उनका पत्रका है । जबकि उनसे दिये जाते हुए पद्यमें कोई हेतु नहीं कहा गया कि-शुद्ध ब्राह्मण कैसे होता है और ब्राह्मण शूद्र कैसे होता है, तब उक्त लोक उनका इष्टसाधक कैसे हो सकता है? इससे स्पष्ट उन्हें भी इससे पूर्वका श्लोक मानना पड़ेगा, जिससे यह विषय स्पष्ट हो जाता है । ह युग्मक पद्य इस प्रकार हैं-CC - 0. Ankur Joshi • कुछ भ्रमका परिहार २८५ ' शूङ्गायां ब्राह्मणाज्जातः श्रेयसा चेत् प्रजायते । श्रेयान् जांविं गच्छेत्यासप्तमाद्युगात् श्रेयस ' ( मनु ० १०/६४ ) शुद्धो ब्राह्मणतामेति ब्रह्मणश्चैति शूद्रताम् । क्षत्रियाज्जातमेवं तु विद्याद् ( १०।६५ यदि ६५ पद्यका ६४ पद्यसे वैश्यात्तथैव च में ' एवं ' पदका कथन भी सम्बन्ध न माना जावे; तो ६५ भी सम्बद्ध व्यर्थ हो जाता है । और फिर ६४ पथ हो जाता है ।. Collection Gujarat. इस पद्यमें पारशवका सातवें जन्ममें ( एक जन्ममें नहीं ) ब्राह्मण ' हो जाना कहा है । ब्राह्मणसे शूद्रामें उत्पन्न हुआ है । यहां रक्तकी अपेक्षा वीर्यकी पारशव कहा जाता जन्ममें वर - परिवर्तन प्रधानता बताई गई है । जब इसी नहीं कहा गया, किन्तु सातवें जन्ममें, तब ' वादियोंका पक्ष तो कट गया । वैसेकी ब्राह्मणवा भी सप्तम जन्ममें अपेक्षा शुक्रकी प्रधानता - प्रतिपादनार्थ है; नहीं तो तत् ' प्रत्यय रक्तकी तद्धर्मत्व, तथा तद्भावकों बताता है; साक्षात् उसीको नहीं, नहीं भी ' अयं जनः पशुतामुपसन्नः ' का अर्थ साक्षात् पशु होना माना जावेगा तो? पशुभावका अर्थ ‘ पशुधर्मा ' ही होता है, साक्षात् पश्शु नहीं । 17. ' उक्त पद्योंका स्पष्ट तात्पर्य यह है- ब्राह्मणसे शूद्रामेंयदि कन्या उत्पन हो; उससे यदि ब्राह्मण विवाह करे, उससे भी कन्या हो, और उससे ब्राह्मण विवाह करे, इस प्रकार सातवीं पीढ़ी तक उत्पन्न होती हुई कन्याका सम्बन्धं लगातार सातवें ब्राह्मण पुरुष तक हो जावे, तंब ब्राह्मणसे शूद्रामें उत्पन्न कन्या शुद्धत्वसे हटकर शुद्ध ब्राह्मणी हो जाती है फिर उससे ब्राह्मण द्वारा उत्पन्न बालक शुद्ध ब्राह्मण होता है । यहां वर्णसङ्करीका प्रकरण चला हुआ है— गुणकर्मसे वर्ण - व्यवस्था का कुछ भी प्रकरण नहीं । " न यहां पर ऐसा करना विधि है । वर्णसङ्करकी शुद्ध वर्णता कैसे हो सकती है — यही यहां बताया गया है । An eGangotri Initiative

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२८६ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) इस प्रकार यदि शूद्धसे ब्राह्मणीमें लड़की उत्पक्ष हो, उसका संबन्ध कन्याओंोंका सम्बन्ध शुद्ध पुरुषोंसे होता जावे, तब सप्तम तथा तदुत्पच्च ब्राह्मणी न रहकर शुद्ध शुद्र वर्णकी हो जावेगी; जन्ममें उत्पन्न लड़की फिर उसके लड़के भी असंकीर्ण शुद्ध होंगे । इस प्रकार शूद्रामें क्षत्रियसे कन्या उत्पन्न होवे, उससे उत्पन्न कन्याओं का उत्तरोत्तर क्षत्रियसे विवाह होता रहे, तब सातवीं कन्या शूद्रात्वके सङ्करसे हटकर शुद्ध क्षत्रिय वर्ण की हो जावेगी । इसी प्रकार यदि शूद्धसे ब्राह्मणीमें बालक हो, उसका सम्बन्ध तथा उससे उत्पन्न बालकोंका सम्बन्ध सात पीढ़ी तक शूद्राओंसे होता रहे, तो सातवें जन्ममें उत्पन्न बालक ब्राह्मणत्वके संकरसे हटकर शुद्ध शूद्र वर्णका हो जावेगा । इसी भान्ति शूद्रायें क्षत्रिग़से लड़का हो, उसका तथा उससे उत्पन्न बालकोंका विवाह सम्बन्धः क्रमशः सात ' पीढ़ी तक शूद्राओंसे होता चले, तो सातवें, जन्ममें वह क्षत्रियत्वके सङ्कर से हटकर शूद्र हो जावेगा । इस प्रकार सप्तम जन्म तक शूद्र - सङ्कर शुद्ध क्षत्रिय और क्षत्रिय - संकर शुद्ध शुद्ध हो जाता है! इसी भान्ति शूद्रामें वैश्यसे उत्पन्न लड़की क्रमसे सातवें जन्म वैश्योंसे सम्बद्ध होती रहे, वो वह सातवें जन्म में शूद्राः सर हटकर शुद्ध वैश्य वर्णकी हो जाती है । वैश्यसे शुद्वामें उत्पन्न बालक उत्तरोत्तर सांत पुरुष तक शूद्धाओंसे सम्बद्ध होता रहे, वहां सातवें जन्ममें वैश्यता हटकर शुद्ध शुद्धता उपस्थित हो जाती है । इस प्रकार वैश्य सातवीं पीढ़ी तक शूद्ध, और शुद्ध सातवीं पीढ़ी तक जाकर वैश्य हो जाता ' है! मनुस्मृतिके सभी टीकाकारोंने इन पद्योंका यही श्रर्य किया है, सङ्कर प्रकरण होनेसे यह प्राकरणिक भी है । श्रार्यसमाजी श्रीतुलसीराम स्वामीने ‘ भास्करप्रकाश ' में इसके निराकरणकी चेष्टा करते हुए भी कोई CC - 0. Ankur Joshi Collection कुछ मौका परिहार उल्लेखयोग्य उपपत्ति नहीं दी । जब यह विधिवाक्य FCC ब्राह्मण शूद्रासे विवाह करनेसे भ्रष्ट बन, अपना ब्राह्मणत्व नहीं है, ' स्वा ० यह आपकी वर्णोति हो, यह लोक ब्राह्मणोंके बिगाड़ने खोवें ह वाच्ये ' ( -१ ) जो बात एक जन्ममें न मानी वह सात जन्ममें का है, अच्छेत्पत्ति मानी ' ऐसा श्रीतुलसीरामजीके पक्षको शिथिल सिद्ध कर रहा है । जो कसे वर्ण परिवर्तन अर्थ किसी ने भी नहीं किया इन पशुमि गुरुगाँका श्र , तब सत्यार्थप्रम स्वा ० दयानन्दजीका वैसा अर्थ करना निराधार है । उक्त ही पुष्टं कर स्पष्ट करनेके लिए हम कई उदाहरण देते हैं; तब पाठकोंको पद्य होते हैं, ऐ ठीक समझ आ जावेगी । यह यह हो सकता । प्रकाश पड बकरीके साथ यदि मृगका मैथुन हो जाए, और बकरीको गर्म श्रथव हो जावे, श्रीर स्त्री सन्तान हो, तो उसका रूप दोनोंका मिला- दह भ्रामक होगा । उसका संयोग भी फिर मृगसे हो, उससे भी उत्तम जो श्रम स्त्री सन्तानका संयोग फिर मृगसे हो, सात जन्म तक ऐसे ही हो, प्रकार सात क्रमसे वह सङ्करता इंटकर सातवें जन्ममें शुद्ध मृग जाति हो जाबे हो जायगा इस प्रकार बकरेका मृगीले मैथुन हो, उससे उत्पन्न स्त्री अंग्रेजसे स संयोग सात जन्म तक फिर बकरे से होता रहे तो धीरे - धीरे उस मं दोनों संकी सन्तानले मृगकी सङ्कीर्णता उत्तरोत्तर कम होती जावेगी । सातवें उत्पन्नं लव मृगीकी संङ्करता बिल्कुल हटकर शुद्ध बकरा जाति हो जावेगी । स पन्न लड़क समय मृगल्लका कुछ भी अंश उसमें नहीं रहेगा । ऋषि - मुनि वैज्ञानिक होनेसे इस बातको जानते थे कि छठी पोड़ी तक भी, संकीर हिन्दुस्थान दोनों जाति का कुछ अंश रहेगा, सातवें जन्म में सर्वथा शुद्धता हो जावेगी । ' न यह कि पहले छः नीच रहें और सातवां उच्च बने ' यह श्रीतुलसी स्तानीसे वि रामजीका कथन वस्तुस्थिति न समझनेका परिणाम हैं । इस मेल हो, हिन्दुस्तान सुधरका भेदके साथ संयोग होने पर भी जान लेना चाहिये । प्रकार हिन्द समझा जा Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) १८० ० दयानन्दजीने ' स्त्रेणताद्धित ' के ३८ पृष्ठमें ' वडवाया वृपे खोवं स्वा ) इस वार्तिकमें टिप्पणी की है- " यहां " घोड़ीसे बैक वाच्ये ' ( १६६ उत्पत्ति असम्भव तो है, तथापि बीजके [ कीं ] प्रधान [ ता ] के पक्षमें ऐसा घर र्थात जो - जो बीज बोया जाता है, वही उत्पन्न होता है. खेत के पामिरु गणका अनुयायी बीज नहीं होता, किन्तु खेत के गुण बीजके गुणांक त्यार्थप्रक ही पुष्ट करते हैं । गेहूँ आदि अन्न जो - जो बोये जाते हैं, वे ही उत्पन्न पद्यके श्रद होते हैं, ऐसे ही जो बैल और घोड़ीका समागम होवे, तो घोड़ीसे बैल यह हो सकता है ” स्वा ० दयानन्दजीको इस व्याख्यासे पूर्वोक्त विषय पर प्रकाश पड़ता है । नीको अथवा पाठक श्रन्य सुगम उदाहरण देखें- बम्बई के श्रममें माल-गर्म मिला दह धमकी कलीका बन्द किया जावे, उससे दोनों जातियोंका संकर - पुर भी उतन श्री श्राम होगा, उसकी शाखा फिर बम्बईके श्राम में जोड़ी जावे, इस प्रकार सातवीं उत्पत्ति में वह मालदह श्राम बम्बई जाति वाला श्राम ही हो, हो हो जायगा । श्रथवा यह समझें कि - किसी भारतीय सुधारक रमणीका जावेगी । अंग्रेजसे संयोग हो जाये, उससे उत्पन्न लड़कीमें कालापन गोरापन सन्दाक दोनों संकीर्ण होंगे । फिर उस लड़कीका भी संयोग अंग्रेजसे हो, उससे उस सं उत्पन्नं लड़कीका भी संयोग अंग्रेजसे हो, इस प्रकार सातवीं अंग्रेजो-नातवें जन् सैन्न लड़कीसे उत्पन्न हुआ बालक पूरा अंग्रेज हो जायेगा; भारतीयता-वेगी । स का थोड़ा भी कालेपनका चिन्ह उसमें नहीं रहेगा । इससे उल्टा किसी - मुनि हिन्दुस्थानीका अंग्रेज लड़कीसे विवाह होवे, उससे उत्पन्न लड़की भी श्री. संकीर दोनों जातियोंको धारण करनेसे सङ्कर होगी । फिर उसका अन्य हिन्दु-वेगी । स्तानीसे विवाह हों, उससे भी उत्पन्न लड़कीका अन्य हिन्दुस्तानीसे .. श्री तुल मेल हो, इस प्रकार सातवीं पोढ़ीमें उत्पन्न हुई लड़कीका लड़का पूरा इस प्रक हिन्दुस्तानी हो जाता है, उसमें गोरापन बिल्कुल नहीं रह जाता । इस प्रकार हिन्दु - मुसलमान तथा हिन्दु - पठान के पारस्परिक सम्बन्धमें भी समझा जा सकता है । CC - 0. Ankur Joshi कुछ भ्रमका परिहार २८६ यही उक्त युग्मक श्लोकका श्राशय है । पूर्व श्लोकका तोड़कर गुणकर्मसे वर्ण - परिवर्तनका तात्पर्य इस पद्यसे सम्बन्ध का अपने पक्षको शिथिल सिद्ध करना निकालना वादियों सङ्करवर्णकी संकरता है । इसका संक्षेप यह है कि --पद्य में दिखलाया नष्ट होकर कब शुद्ध वर्ग बन जाता है - यही इस गया है । वह यह कि वीर्य ब्राह्मणका हो, रक्त उनके संयोगले जो सन्तान होती हैं, उसमें वीर्यकी शूद्धाका, ब्राह्मणत्व अधिक होता हैं, रक्तकी प्रधानता के कारण गौणता के कारण शूद्रत्व थोड़ा होता है, इस प्रकार सङ्करता होती है । यह संकरता क्या कभी सकती है, यदि हां, तो कब किस प्रकार से? यह हट भी है । उसीका उत्तर उक्त युग्म पद्यसे प्रश्न उपस्थित होता है कि - यदि शुद्ध - सन्तान कन्या हो उसका सम्बन्ध ब्राह्मणके साथ हो, उससे जो लड़की होगी, उसमें ब्राह्मणता पहलेसे बढ़ेगी और शूद्रत्व पहले की अपेक्षा घटेगा | फिर उस कन्याका भी ब्राह्मणसे ही सम्बन्ध हो, तो उसमें पूर्व की अपेक्षा ब्राह्मणव और बढ़ेगा. शुद्धता और घटेगी । इस प्रकार उत्तरोत्तर लड़कियोंका उत्तरोत्तर ब्राह्मणके साथ सम्बन्ध उत्पन्न हुई होनेसे तदुत्पन्न कन्याओं का ब्राह्मणत्व बढ़ते - बढ़ते सप्तम जन्ममें उत्पन्न कन्या पूर्ण ब्राह्मणी हो जाती है, क्रमशः क्षीण होता हुआ उनका शूद्रत्व सप्तम जन्ममें नेष्ट ' हो ' जाता है । वह शुद्ध ब्राह्मणी हो जाती है । तब उस सातवीं सर्वथा ब्राह्मणसे उत्पन्न लड़का शुद्ध ब्राह्मण हो जाता है, यह श्राशय है में । इससे वादियोंका पक्ष कुछ भी सिद्ध नहीं होता, प्रत्युत उनका खण्डन होता है- क्योंकि - यहाँ ब्राह्मण वीर्यसे उत्पत्ति के कारण ही ब्राह्मणता कही गई है । 18.3 इस प्रकार ब्राह्मणी में शूद्र द्वारा उत्पन्न कन्या वर्णसङ्कर होती है; उत्तरोत्तर उत्तसे उत्पन्न कन्याका शूद्रसें सम्बन्ध होनेसे सातवीं पीढ़ीमें पैदा हुई कन्या शुद्ध शुद्रा हो जाती हैं, क्योंकि - उन कन्याओंमें बिद्य-मान ब्राह्मणता उत्तरोत्तर शुद्रके वीर्थ सम्बन्ध होने परं घटती - घटती Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 166

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२६० श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) सातर्ची पीढ़ीमें सर्वथा नष्ट हो जाती है । इस प्रकार क्षत्रिय, वैश्य वर्णों में भी जान लेना चाहिये । सो यहाँ वर्णसङ्करका ही शुद्ध वर्ण हो जाने 4 का प्रकार बताया गया है, जो वीर्य - सम्बन्धसे उत्पत्ति - मूलक ही है । इसमें जन्मसे ही वर्ण - व्यवस्था सिद्ध है, गुणकर्मोंका गन्ध भी नहीं । यही मनुका हृदय है । यही समस्त टीकाकारोंका श्राशय हैं । ' शूद्रायां ब्राह्मणाज्जातः.... प्रजायते ' यहाँ पर ' प्रजायते ' का अर्थ ' प्रसूयते ' है; सो उसकी सामथ्यसे ' जात ' का यहाँ ' स्त्री - रूपः ' यह अर्थ है । ' जाति शब्द ' के स्त्री - पुरुष दोनों ही अर्थ हो जाते हैं । जैसे– ' जातस्य हि ध्रुव मृत्युः ' ( गीता २।२७ ) यहाँ ' जात ' से स्त्री भी श्रर्थ गृहीत हो जाता हूँ । पुरुष अर्थ में सामर्थ्य से ' प्रजायते ' का ' प्रजनयति ' अर्थ है । ' आ ' सप्तमात् ' का अर्थ यद्यपि ' सप्तम जन्म तक ' है, अर्थात् सात जन्म तक ऐसा होते - होते यह सङ्कीर्ण वर्ण सङ्करतासे हटकर शुद्ध हो जाता है; तथापि ' आ सप्तमात् ' का तात्पर्य अन्तिम अवधि होनेसे ' सातवें जन्ममें ' ही होगा । क्योंकि — उसके आगे कोई अवधि नहीं बताई गई । जब सातवें में ही शुद्धता बताई गई है, तो पहले छः जन्मोंमें सङ्गरताका श्रंश होनेसे, शुद्ध वर्णकी अपेक्षा अशुद्धता होनेसे नीचता भी हुई । इस प्रकार ' भास्कर प्रकाश ' में श्रीतुलसीराम स्वामीसे की हुई " जातः श्रेयान् ' इन पुल्लिङ्ग पदोंसे ' कन्या ' घर्थ कहाँसे आया? [ यहाँ श्रीतुलसीराम-जी ' मन्त्रिका तु कार्येयं ' इस मनुके पद्मकी अपनी टीकामें लिखे ' यो-त्रागमिष्यति, स मृत्यु प्राप्स्यति ' इस वाक्यको भूल गये ], तथा ‘ श्रासप्तमात् ’ का अर्थ ‘ सातवें जन्ममें ' कैसे हुआ जबकि –श्रा के अर्थ. मर्यादा और श्रभिविधि हैं । तो यह अर्थ होगा कि सात तक नीचा वर्ण टच्च जातिको प्राप्त होता रहता है, न यह कि - पहले छः नीच रहें और सातवाँ उच्च बने [ छः तक सङ्करताका अश रहनेसे नीचता, सातवें में सङ्करताका श्रंश सर्वया हट जानेसे उच्चता स्वाभाविक है । ' सात-पीढ़ी ' शब्द इसीलिए प्रचलित है, जैसेकि मनुस्मृति में ही कहा है-CC = 0. Ankur Joshi Collection कुछ भ्रमका परिहार ' सपिण्डता तु पुरुषे सप्तमे विनिवर्तते ' ( १६० ) सो " लिख शुद्धि की भी है ] । यह श्लोक ब्राह्मणों के बिगाड़नेका यह अवधि व पर मनुजीको आप ब्राह्मणाँको बिगाड़ने वाला कहते है " [ तो क्या चाश निकालिये हैं! यदि ऐसा है श्रभि स प्र.से मनुके समस्त श्लोक, जिससे स. प्र. की तब हलकी तो हो जावे ] यह सभी आपत्तियाँ निरस्त हो गई, हमारा पक्ष शब्दोंका अर्थ यद्यपि थोड़ा होता है, तथापि सिद्ध हो गया । जो पर स्वा ० द ० जीनें इस पद्यमें तात्पर्य बढ़ा हो जाता है । भी पर तुलसीरामजीकी गुणकर्मीको निमूल घुसेड़ दिया- इस हैं-आंख नहीं पड़ी और पं ० ज्वालाप्रसादजीके श्रर्य पर पड़ गई — इसका कारण ही जान सकते हैं | पर प्राया चार ' भविष्य पुराणके कई श्लोक । बहुप बिर ( २ कई श्रार्यसमाजी महाशय भविष्य पुराणके कई उधृत करके जन्मसे वर्ण - व्यवस्थाको खण्डन करनेकी श्लोकोंको मत तथा गुण कर्मणा ( स वर्ण - व्यवस्था सिद्ध करनेकी चेष्टा करते हैं । वे उन पद्योंको उधृत करते हुए एक धूर्तता करते हैं - वह यह कि -कभी पूर्वापर प्रकरण छिपा कर बीच के पुराणके श्लोकोंको दे देते हैं. ऐसा करने पर उनमें सनातनधर्म प्रसि के सिद्धान्तसे विरुद्धता दीखने लग जाती है । ' इस विषय में उन्हें अपने को-स्वा ० द ० जीके शब्द याद रखने चाहियें कि- ' जैसे शरीर सब ग्रङ्ग पुरा जब तक शरीर के साथ रहते हैं, तब तक कामके और अलग होने से अप निक्रम्मे हो जाते हैं, वैसे ही प्रकरणस्थ वाक्य सार्थक, और प्रकरणसे तथा अलग करने या किसी अन्य के साथ जोड़नेसे अनर्थक हो जाते हैं ' सिद्ध ( सत्यार्थ ० पृष्ठ १३० ) । श्लो श्राच वादी भी ऐसा ही करते हैं । श्रार्यसमाजी विद्वान् श्रीनर देवशास्त्री क्या Gujarat. जीने eGa आर्यसमाज का इतिहास ' ( प्रथम भाग म

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२६२ श्रीसनातनधर्मालांक: ( ४, ' लिखा है- ' मनुष्यको अधिकार है कि वह अपना जो चाहे मत रखे; पर उसको यह अधिकार कदापि नहीं कि वह वक्ता या ग्रन्थकर्ताकै श्राशयको मनमानी रीतिसे तोड़ - मरोड़कर उस ग्रन्थकर्ताके आशय या अभिप्राय से विरुद्ध जो चाहे निकाले ' । इसमें स्वामी द ० जीका निम्न वचन भी दृष्टव्य है । वह यह है-या । ' जो कोई इसे ग्रन्थकर्ता तात्पर्य से विरुद्ध मनसे देखेगा, उसको कुछ है । भी अभिप्राय विदित न होगा; क्योंकि – वाक्यार्थ में चार कारण होते हैं— श्राकाङ्क्षा, योग्यता, श्रासत्ति और तात्पर्य । जब इन चारों बातों - इस पर ध्यान देकर जो पुरुष ग्रन्थका देखता है, तब उसको ग्रन्थका अभि-प्राय यथायोग्य विदित होता है । 1. तात्पर्य - जिसके लिए वक्काने शब्दो-चारण वा लेख किया हो, उसीके साथ वचन वा लेखको युक्त करना । बहुतसे हठी दुराग्रही मनुष्य ऐसे होते हैं, जोकि - वक्ता के श्रभिप्रायसे विरुद्ध कल्पना किया करते हैं, विशेषकर - मतवाले लोग, क्योंकि— को मतके आग्रहसे उनकी बुद्धि अन्धकारमें फंसके नष्ट हो जाती हैं ' " । ( सत्यार्थप्रकाश भूमिका पृष्ठ ४ ) । रते इसी अभिप्राय से यत्परः शब्दः स शब्दार्थः ' यह न्याय भी पा प्रसिद्ध है । इस प्रकार कई लोग भविष्यपुराणके ब्राह्मपर्वके कई श्लोकों-चर्म को - जो वहाँ पूर्वपत हैं — सुनाकर जनतामें जन्मना वर्ण - व्यवस्थाको ने पुराण - विरुद्ध और कर्मणा वर्ण - व्यवस्थाको पुराण- सिद्ध बतलाकर रङ्ग अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहते हैं, परन्तु जब उन श्लोकोंका उपक्रम से तथा उपसंहार देखा जाता है, तब वहाँ स्पष्ट ही सनातनधर्मका सिद्धांत सिद्ध हो जाता है । यदि उनके मतसे जन्मना वर्ण - व्यवस्थाका उनः

श्लोकों में खण्डन माना जावे; तो वहाँ ऐसे भी श्लोक हैं- जहाँ विद्या,

श्राचार, संस्कार तथा कर्मोंसे भी वर्णका खण्डन सिद्ध होता है, तब ची क्या वादी अपने पक्षका भी खण्डन मान लेंगे? देखिये Ankur Joshi Collection कुछ भ्रमका परिहार २६३ संस्कारतः सोतिशयो यदि स्यात् सर्वस्य पुंसोऽस्यति संस्कृतस्य । यः संस्कृतो विप्रगणप्रधानो व्यासादिकस्तेन न तस्य साम्यम् ' ( ४१।३० ) यहां वादिसम्मत संस्कारका खण्डन है । ' वेदाध्ययनमप्येतद् ब्राह्मण्यं प्रतिप्रद्यते । विप्रवद् वैश्यराजन्यौ राचसा रावणादयः ' ( ४१ । १ ) यहाँ बादिसम्मत वेदविद्याद्वारा ब्राह्मणत्वकी प्राप्तिका खण्डन किया गया है कि - संस्कार करने पर भी ब्राह्मणोंका व्यास धादिसे साम्य नहीं हो जाता । वेद तो क्षत्रिय वैश्यको भी ब्राह्मण इतने पढ़ने पड़ते हैं और फिर वेदाध्येता रावण भी राक्षस ही रहा । ' जातिधर्मः स्वयं किञ्चिद् विशेषः श्रुतिसङ्गमात् । श्रसिद्धः शूद्वजातीनां प्रसिद्धो विप्रजातिषु ' ( ४१/२१ ) यहाँ वादिसम्मत जाति - श्राचार द्वारा वर्ण - परिवर्तनका खण्डंन है अर्थात् —जब शूदोंके लिए वेदमें श्राचारका विधान ही नहीं है, तो शूद्रोंका वेद - बिरुद्ध श्राचार ही कैसे हो सकता है? वा उनकी उन्नति कैसे हो सकती है? ' देहशक्तिगुणैः क्षीणैः कायभस्मादिरूपवत् । तस्माद् देहात्मके नैतद् ब्राह्मण्यं नापि कर्मजम् ' ( भविष्य ० ४१/१७ ) यहाँ शरीर द्वारा और कर्म द्वारा अन्य वर्णकी प्राप्तिका खण्डन किया गया है, इससे वादिसम्मत कर्मणा वर्ण - व्यवस्थाका भी पुराणने खण्डन कर दिया । कई छली लोग ' नापि कर्मजम् ' यहाँ ' नापि ' का सम्बन्ध ' देहात्मके ' से जोड़ देते हैं । यह स्पष्ट उनका स्वार्थ हैं । ' अपि ' शब्द पूर्व तथा उत्तर दोनोंका परामर्श करता है । पहले ' नैतद् ' यह निषेध ' देहात्मक ' के लिए है; दूसरे ' नापि ' का सम्बन्ध ' कर्मजम् ' इससे है, इससे कर्मणा वर्ण - व्यवस्थाका भी खण्डन हो गया; पर वादी लोग यह

श्लोक जनताके सामने नहीं श्राने देते - यही छल 1

अन्य छल यह है कि — वादी लोग इसके पूर्वापर प्रकरणको सामने नहीं आने देते | मध्यके कई श्लोक उठाकर रख देते है, और अपने पक्षकी पुष्टि भोले - भाले लोगोंके श्रागे कर देते हैं । हम वह पूर्वापर Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) प्रकरण सामने रख देते हैं! भविष्य पुराण ब्राह्मपर्व ४० वें अध्याय में ' जातिः श्रेष्ठा भवेद् वीर! छत कम ' भवेद् वरम् ' ( १1४० | १ ) एतद् वद विनिश्चित्य न यथा संशयो भवेत् । जन्मतः कर्मणश्चैव यज्ज्यायस्तद् ब्रवीहि मे ' ( ४०।२ ' यहाँ जाति और कर्म में कौन श्रेष्ठ है — यह शता-नीकका सुमन्तुके प्रति प्रश्न है । भो ब्रह्मन्! श्रादिकल्पे हि ब्राह्मण्यं ब्रूहि किं भवेत्? जात्यध्ययन देहात्मसंस्काराचारकर्मणाम् ' ( ४०1८ ) बाह्याभ्यन्तर - सामान्यविशेषा यदि कृत्रिमाः । ( ३ ) संत्यक्तव्याः प्रसिद्धा ये जातिभेदविधायिनः ' ( १० ) अव्यक्तागमसिद्धश्चेद् जातिभेदविधिन्-णाम् । विकल्पोऽयं न पुष्णाति भवतः शेमुषीबलम् ' ( ११ ) यह ऋषियों का ब्रह्माके प्रति ४० वें अध्यायमें प्रश्न है । फिर ४१-४२-४३-४ श्रध्यायोंमें पूर्वपक्ष अच्छी तरह दिखलाया गया है, जिन पद्योंको वादी बड़े प्रेमसे उद्धृत करते हैं । उसमें ब्रह्माजी का उत्तरपक्ष ४५ वें अध्यायमें दिखलाया गया है । ब्रह्मोवाच- ' इदं शृणु मयाख्यातं तर्क- पूर्वमिदं वचः । युष्माकं संशये जाते कृते वै जाति-. कर्मणोः ' ( ४१/१ ) इति पृष्टः पुरा ब्रह्मा ऋषीन् प्रोवाच भारत! सवि-वर्कमिदं वाक्यं विप्रर्षे! जीति- कर्मणः । ( ४५५ ) अर्थात् आप लोगों-को जो जाति और कर्मके विषय में संशय हुआ था; उसमें मैंने पहले तर्कयुक्त वचन कहा था । इसी तरह ' शृणुध्वं योगिनो वाक्यं सतर्क ' ( ४४।१२ ) यहां भी तर्कसहित वाक्यका कहना माना है । सो ' तर्कपूर्व ' और ' सतर्क ' का अर्थ है कि पूर्वपक्ष । श्रर्थात् मैं ( ब्रह्मा ) ने ४०-४१-४२-४३-४४ अध्यायोंमें केवल जाति तथा केवल कर्मका खण्डन किया है । इससे ब्रह्माजीने दोनोंका समुच्चय ही सिद्धान्तपक्ष माना है । ' जैसेकि – शुक्लयजुर्वेद ( वा ० सं ० ).जैं ' अन्धं तमः प्रविशन्ति ये अविद्या-मुपासते । ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायाँ रताः ' ( ४०।१२ ) इस मन्त्रमें केवल अत्रिद्या तथा केवल विद्याका खण्डन किया है; यह पूर्व -CC - 0. Ankur Joshi Collection कुछ भ्रमों का परिहार २६६ पक्ष है; फिर ' विद्यां विद्यां च वेदोभय सह । अविदेश मृत्यु ' तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते ' ( ४०।१४ ) यहां पर 1 अविद्या . तथा दिया केवल दोनोंका समुच्चय ही सिद्धान्तपक्ष माना गया है, वैसे ही ब्रह्माजीने जाति ( जन्म ) और कर्म दोनोंका समुच्चय ही सिद्धान्तपक्ष बताया भो है । । जैसे कि-' पुनर्वच्मि निबोधध्वं समासान्नतु विस्तरात् । संसिद्धिं यान्ति संयुगा जाति ( जन्म ) कर्मसमुच्चयात् ( १।४१।२ ) अर्थात् जन्म और दोनोंसे ही ब्राह्मणत्व श्रादिकी सिद्धि होती है । इसी बातको पट करनेके लिए श्रीब्रह्माजी एक सुन्दर दृष्टान्त वा उपमा देते -'सिद्धिं गच्छेद् यथा कार्यं दैव - कर्मसमुच्चयात् । एवं संसिद्धिमामोति पुरुषो एकरूप ब्राह्मणव जाति - कर्मणोः ' ( ४५।३ ) यहां बात स्पष्ट हो गई कि केवल दैवाधीन भी प्राचार सिद्धिको नहीं पाता, केवल कर्म पर भी सिद्धिको नहीं पाता । म जैसे कार्यसिद्ध्यर्थं ऐहिक कर्म और उसके साथ दैव- पूर्वजन्मके कम खादू, की अपेक्षा रहा करती है; वैसे " ही ब्राह्मणत्वादिके लिए मैनु चाहिये । प्रोक्त ऐहिक कर्म तथा उसके साथ जाति ( पूर्वजन्म के कर्मसे उत्पन्न दिशरीर जाति ) यह दोनों ही अपेक्षित हैं - यह बहुत ही स्पष्ट है । ब्राह्मण गई है । इससे जो कि पूर्वपक्ष में जातिका खण्डन किया था - इधूमें उसका " त उद्धार कर दिया गया । ज्ञातिके साथ कर्मकी आवश्यकता भी बढ़ा दी जातिसम गईं । उसमें भी कर्मको अपेक्षा जातिके अभ्यर्हित होनेसे प्रधानताक कुशांत्, कारण उस ( जाति ) की पूर्व रखा गया । यह वर्ण - व्यवस्थाके शरपृष्ठाद सम्बन्धमें जाति - कर्मका समुच्चय सनातनधर्मका ही सिद्धान्त है । पर त्वात् । छलके बल वाले वादी उपक्रम और उपसंहारको छोड़कर पुराणके बीच वाले पद्म ही उद्धृत कर दिया करते है - जिससे अर्थका अर्थ हो जाता है — यह उनका बढ़ा साहस है । उनसे दिये जाते हुए पूर्वपद सिद्धान्त ' श्लोकोंमें केवल कर्मका तथा केवल जातिका खण्डन किया है । जाति सेना Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनंधर्मालोकः २६६ अविदेश केवल देह, केबल आत्मा, केवल जाति और कमों में केवल अध्ययन, REESEE केवल संस्कार तथा केवल श्राचारका ब्राह्मणत्वमें खण्डन किया जीने ' वज्रसूचिका उपनिषद् ' जोया है । म ' तत्र चोद्यमस्ति — को वा ब्राह्मणो नाम? किं जीवः? किं देहः? किं जातिः १ किं " ज्ञानम्? किं किं कर्म? किं धार्मिक इति? ' यह प्रश्न है I । वहां पर, इनको पृथक पृथक खण्डित किया गया है । जैसे कि - ' प्रथमो जीवो ब्राह्मण इतिचेत्, तन्न श्रतीतानागतानेकदेहानां जीवस्य III एकरूप-स्पष्ट त्यातु । एकस्यापि कर्मवशाद् अनेकदेहसम्भवात्, सर्वशरीराणां जीवस्य BS एकरूपत्वाच्च । तस्मान्न जीवो ब्राह्मणः " । यहां पर केवल जीवका त ब्राह्मणत्व खण्डित किया है । “ तर्हि देहो ब्राह्मण इति चेत्, तन्त– धीन भी श्राचाण्डालादिपर्यन्तानां मनुष्याणां पाञ्चभौतिकत्वेन देहस्य एकरूप-ना । तब त्वाद्, जरामरणधर्माधर्मादिसाम्यदर्शनाद्, ब्राह्मणः श्वेतवर्णः, क्षत्रियो के कम आदिखे रक्तवर्णः, वश्यः पीतवर्णः, शूद्रः कृष्णवर्ण इति नियमाभावात्, पिना-उत्पन्न दिशरीरदहने पत्रादीनां ब्रह्महत्यादिदोषसम्भवाच्च;. तस्मान्न देहो ब्राह्मण इति ' । यहां पर केवल देहूकी ब्राह्मणता भी खण्डित कर दी गई है । में उसका " " तहिं जातिर्ब्राह्मण इति चेत्, तन्न — ' तत्र जात्यन्तरजन्तुषु श्रनेक-बढ़ा दी जातिसंम्भवा बहवो महर्षयः सन्ति । ऋष्यशृङ्गो मृग्याः, कौशिकः— व्यवस्था के कुशांत्, जाम्बुको जम्बुकाद्, वाल्मीको वल्मीकाद्, व्यासः कैवर्तकन्यायाम्, ग्ररपृष्ठाद् गौतमः, वसिष्ठ उर्वश्याम्, अगस्त्यः कलशे जात इति श्रुत-त्वात् । एतेषां जात्या विनापि श्रम ज्ञानप्रतिपादिता ऋषयो बहवः के बीच महो पूर्वपदके कई कहते हैं कि - वज्रसृन्त्रिकोपनिषत् ' बौद्ध श्रश्वघोषने वैदिक़ जाहि सिद्धान्त ‘ जन्मना वर्ण - व्यवस्था ' में प्रहार के लिए बनाई है - यह श्रीतिलकजी से बनाये ‘ गीता - रहस्य ' ( ५६१ पृष्ठमें ) सूचित किया गया है I CC - 0. Ankur Joshi "कुछ भ्रमका परिहार २६७ सन्ति । तस्मान्न जातिर्ब्राह्मण इति " । यहां केवल जातिका ब्राह्मणत्व भ खण्डित हो गया । ' तहि ज्ञानं ब्राह्मण इति चेत् तन्न - t पत्रियां-दृयोपि परमार्थदर्शिनोभिज्ञा बहुवः सन्ति, तस्मान्न ज्ञानं ब्राह्मण इति ' यहां पर बाढिसस्मत केवल ज्ञानसे ब्राह्मण होने का मत भी खण्डित कर दिया गया है । " कर्म हा इति चेत् तन्न सर्वेषां प्राणिनां प्रारब्धसञ्चितागामिकर्मसाधनातु कर्माभिप्रेरिता. सन्तो जनाः क्रियाः कुर्वन्ति । तस्मान्न कर्म ब्राह्मण इति " । यहां वादिसम्मत कर्मका भी रेखण्डन करे दिया गया । ' तर्हि धार्मिको ब्राह्मण इति चेत्, तन्न-क्षत्रियादयो हिरण्यदातारो बहवः सन्ति, तस्मान्न धार्मिंको ब्राह्मणः इति " यहाँ पर वादिसम्मतं धर्म - कर्म से भी ब्राह्मणत्व प्राप्तिका खण्डन कर दिया गया है | इस प्रकार ‘ भविष्य पुराण ' में भी केवल देह आदियोंका भी खण्डन किया है । जैसे कि – ' गोवर्गमध्यं च गतो यथाश्वो निर्धार्यते ज्ञैः सुविचक्षणत्वात् । मनुष्यमाबाद् श्रविशिष्यमाणः तद्वद् द्विजः शूद्रगणान्न भिन्नः ( ४०/२० ) तस्मान्न गोश्ववत् कश्विजातिभेदोस्ति ' देहिनाम् । कार्यशक्तिनिमित्तस्तु संकेतः कृत्रिमो भवेत् ' ( ३४ ) यहां पर केवल जाति से ब्राह्मणत्वकी परीक्षा न होनेसे उसका खण्डन कर दिया गया है । अब केवल जीवका ब्राह्मणस्य काटते हैं -- जीवोपि ब्राह्मणः प्रोक्तो यैरतत्त्वज्ञमानवैः । प्रभ्रष्टब्राह्मणत्वास्ते जायन्ते विप्रसङ्गतः ' ( २२ ) नरतिर्यगसच्छूद्रयोनिदुःखेऽतिसंकटम् ( २३ ) श्वानशूकर- चाण्डाल - कृमि--कर्मादिकायताम् ' ( २४ ) भूरिपाप अराक्रान्तः स जीवो ब्राह्मणः कथम्? ( २५ ) अब वेदाध्ययन भी ब्राह्मणत्वप्रयोजक है - इस बादीके पक्षको काटते हैं – ‘ वेदाध्ययनमप्येतद् ब्राह्मण्यं प्रतिपद्यते । विप्रचद् वैश्य-' राजन्यो राक्षसा रावणादयः ' ( ४१ | १ ) श्वादचाण्डालदासाश्च लुब्धका-Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक्ः ( ( 8 ४ ) भीरभीवराः । येऽन्येपि वृषलाः केचित् तेपि वेदानधीयते ' ( २ ) सहां केवल वेदाध्ययनसे भी ब्राह्मणत्वका खण्डन कर दिया गया । ' शुद्धो देशान्तरं गत्वा ब्राह्मण्यं क्षत्रियं श्रितः । व्यापाराकारभावादुयैर्विप्रतुल्यैः प्रकल्पितैः? ( ३ ) वेदानधीत्य वेदौ वा, वेद वापि यथाक्रमम् । r मोहन्ति शुभां कर्म्मा शुद्ध - ब्राह्मणजा नरा: ' ( ४ ) अपरिज्ञातशूद्रत्वाद् ब्राह्मण्य यांति कामतः । तस्मान्न ज्ञायते भेदी वैदाप्याय - क्रियाकृतः ( १ ) इससे केवल वेदाध्ययनसे भी ब्राह्मणता काट दी गई 1 अय यज्ञोपवीतादि चिन्ह द्वारा ब्राह्मणत्व श्रादिका: खण्डन -करते. हैं । ' शिखाप्रणव संस्कारसन्ध्योपासनमेखलाः । दण्डाज्ञिनपवित्राद्याः शूद्र ेष्वपि निरङ्कुशाः ' ( १० ) तस्मान्नैतेपि: लक्ष्यन्ते विलक्षणतया नृणाम् । यज्ञोपवीतसंस्कार - मेखला चूलिकादयः ' । अब वादिसम्सत संस्कारका पुराण खण्डन करता है- ' संस्कारतः सोतिशयो यदि स्यात् सर्वस्य पु ंसोऽस्त्यतिसंस्कृतस्य । यः संस्कृतो विप्रगणप्रधानो व्यासादिक-स्तेन न तस्य साम्यम् ' ( ४१,३० ) अर्थात् संस्कार वालेकी भो ' बिना संस्कारोंवाले ब्यासादिसे समता नहीं होती; तो संस्कार भी ब्राह्मणत्व-कारक न हुआ । आगे कहते हैं— ' तस्मान्नं च विभेदोस्ति, न बहिर्नान्तरात्मनि । न सुखादौ नचैश्वर्ये नाज्ञायां नाभयेष्वपि । ( ३५ ) न वीर्ये नाकृतौ नाते न च व्यापारे न चायुषि । नाङ्गो पुष्टे न दौर्बल्ये न ' स्थैर्ये नापि चापले ( ३६ ) न प्रज्ञायां न वैराग्ये न धर्मे न पराक्रमे । ने त्रिवर्ग, न नैपुण्ये, न रूपादौ न भेषजे । ( ३७ ) न स्त्री - गर्भे, न गमने, न देहमलसंप्लवे । नास्थिरन्ध्र, न च प्रेम्णि प्रमाणे न च लोमसु ( ३८ ) शूद्र - ब्राह्मणयोर्भेदो मृभ्यमाणोपि यत्नतः । नेचयते सर्वधर्मेषु संहतैखिदशैरपि । ( ३६ ) इन

श्लोकोंमें गाय घोड़े आदि की तरह ब्राहाण - शूद्रादिमें स्थूल भेद न मिल

सकना माना है । इसमें हमारा भी विवाद नहीं । इसीलिए तो

CC - 0. Ankur Joshi Collection कुछ भ्रमका परिहार ३०० व्याकरण ( स्त्रीप्रत्ययों ) में ' आकृतिग्रहणा जाति: ' इस शूद्र श्रादिके श्राकृति - भेद न मिलनेसे जाति - संज्ञाकी प्राप्ति तवया सकृदाख्यातनिर्माया ' ऐसा ब्राह्मणादि जातिका न मार ( ३४ ) या हमारे पक्षकी कुछ भी हानि नहीं । लक्षण किया है । । इअं बताते ह इस प्रकार आगे रंगोंसे भी ब्राह्मणत्व आदिकां निषेध ' हि करते है संस्कारस्त ' न ब्राह्मणाश्चन्द्रमरीचिशुभ्राः ( सुफेद ), न क्षत्रियाः किंशुकंपुष्यवा ( लाल ), न चेह वैश्या हरितालतुल्याः ( पीले ), शूद्रा नचाङ्गार ( कोया ) पार्थित्र महामुनि! समानवर्णाः ( काले ) ' ( ४१।११ ) पादप्रचारैस्तनुवर्णकेशैः सुखेन हुने तपसा + च शोणितेन । त्वङ्मांसमेदोऽस्थिरसैः समानाश्चतुः प्रभेदा हि भवन्ति ( ४२ ) वर्णप्रमाणाकृति - गर्भवासबाग्बुद्धिकर्मेन्द्रियजीवितेषु तपसा पूर्वपक्ष ब्राव बलत्रिवर्गामयभेषजेपु न विद्यते जातिकृतो विशेष: ' ( ४३ ) वा विप्राणाम एकस्य पितुः सुताश्च तेषां सुतानां खलु जातिरेका । एवं प्रजानां होत्रं वा पितैक एव पित्रेकभावान्न च जातिभेदः ( ४१ ) श्रागे देहसे ब्राह्मणवादं यथा ' ( १ ९ काटता है - ' एकैकोवयवस्तेषां ने ब्राह्मण्यं समश्नुते । नचानेकस स्वात् संस्व सर्वथातिप्रसंगतः ( ४१।१३ ) मृग्यमाणे प्रयत्नेन देहे तन्नोपलभ्यते । के लिए. दि तस्मान्न देहें ब्राह्मण्यं नापि देहात्मकं भवेत् ' ( २५ ) तस्माद् देहालां स्थूल भेद नैतद् ब्राह्मण्यं, नापि कर्मजम् ' ( ४११२७ ) यहां देहके साथ बादि सम्त उपस्थित कर्म से भी ब्राह्मणत्वका खण्डन कर दिया है । लोक हैं, पक्षी श्रागे ( ख ) अब पुराण वादिसम्मत संस्कारोंसे भी ब्राह्मणत्वको काठारे ' श्राचारमनुतिष्ठन्ती व्यासादिमुनिसत्तमाः । गर्भाधानादि संस्कारकार रहिताः स्फुटम् ’ ( ४२।२० ) विप्रोत्तमाः श्रियं प्राप्ताः सर्वलोकनमस्कृतः विप्रो रागि बहवः कथ्यमाना ये, कतिचित् तान् निबोधत ' ( २१ ) जातो ब्यास्तु समागमे I कैत्रर्त्याः, श्वपाक्याश्च पराशरः । शुक्याः शुकः, कणादाख्यस्तयोतूरू ब्राह्मण्ये ते सुतोभवत् ' ( २२ ) मृगोजोऽथ शृङ्गोपि, वसिष्ठो गणिकात्मजः । मनः ज्ञाः ' ( ४० ) I पालो मुनिश्रेष्ठो नाविकापत्यमुच्यते ' ( २३ ) माण्डव्यो सुनिराह गोरेव कामं Gujarat. An eGangotri Initiative