सनातन धर्मालोक ४ — पृष्ठ 171–180

सनातन धर्मालोक ४ · पृष्ठ 171–180

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३०० श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) खसे बाह मण्डूकीगर्भसम्भवः । बहवोम्येपि विप्रत्वं प्राप्ता: ये. पूर्वबद् द्विजाः ’ न सरध ( १४ ) यहां पर ' कथ्यमानाः, उच्यते ' वह शब्द वैसी लोकप्रसिद्धिको ना है । इस बताते हैं - वास्तविकताको नहीं । इसे श्रागे स्पष्ट करते हैं ---: ' हरिणीगर्भसम्भूतः ऋप्यशृङ्गो महामुनिः । तपसा ब्राह्मणो जातः करते संस्कारस्तेन कारणम् ). ( ४२१२६ ) खाकीगर्भः सम्भूतः पिल्ला ब्यासस्य पुष्प पार्थित्र! तपसा ब्रा XXX ( २७, उलूक्कीगर्भसम्भूतः कणादाख्यो ( कोपवा महामुनिः । तपसा ब्रा. २८ ) गणिकागर्भसम्भूतो वसिष्ठश्च महामुनिः । सुखेन तपसा +++ ' ( २ ९ ) नाविकागर्भसम्भूतो, मन्दपालो महामुनिः । दाहि तपसा ब्रा ' ( ३० ) । [ इनकी समीक्षा आगे होगी । ] आगे पुराणकार जयजीवितेषु पूर्वपक्ष कहता है - शूद्राणां यान्यनिष्टानि सम्पद्यन्ते स्वभावतः । ४३ ) वा विप्राणामपि तान्येव निर्विघ्नानि भवन्ति च ' ( ४३ १० ) तस्मान्मन्त्रोग्नि-प्रागं होत्रं वा वेद्यां पशुवधोपि वा । हेतवो नहि विप्रत्वे शूद्रः शक्या क्रिया ब्राह्मण यथा ' ( ११ ) शूद्रबिमादयो योनौ न भिद्यन्ते परस्परम् | ' सर्वधर्मसमान-वाकसमूह स्वाद संस्कारादि निरर्थकम् ' ( १५ ) यहाँ पर सस्कार आदि भी ब्राह्मणत्व नोपलो के लिए निरर्थक कहे हैं । इस प्रकार इस पूर्वपक्षमें ' शूद्र और ब्राह्मणका देहा स्थूल भेद नहीं है? यही बताया गया है । हमने यह श्लोक इसलिए बादि - सम् उपस्थित किये हैं कि - जनताको पता लग जाय कि - यह पूर्वपक्षके

श्लोक हैं, उत्तरपक्षके नहीं । वादी इन्हींको उठाकर दे देते हैं । पूर्व-पक्षी श्रागे कहता है—

को काटता रेन संस्कारकबा ' दौःशील्य - दौर्मनस्याद्यै स्तुल्यजातीयबन्धनात् । शृद्धां प्ररोचते कनमस्कृतः विप्रो रागिणीं मैथुनं प्रति ' ( ४३ | ३८ ) सा कामदुःखविगमे गर्भं धत्ते तो व्याप्त समागमे । कामं कामातुराभ्यस्तु रोचन्ते शूद्रमानवाः ' । ३६ ) मैथुनं प्रति स्तोतु ब्राह्मण्ये तेपि तस्य सुखावहाः । ये तु जात्यादिभिर्भिन्ना गवाश्वोष्ट्रमतङ्ग-जः । मर जा. ' ( १० ) ते विजातिषु नो गर्भं कुर्वतेपि सुखार्थिनः । श्रनढ्वानेव मुनिराक्ट गौरव कामं पुष्णाति सङ्गमे ( ४१ ) घोटकाश्च रतिं सम्यक् कुर्वते वडवासु CC - 0. Ankur Joshi कुछ भ्रमका परिहार २०१ च । पतिं करभमेवाऽऽप्य करभी रमते मुदा ( ४२ ) गजमेव पतिं लब्ध्वा सुखं तिष्ठति हस्विनी । तिर्यग्जातिस्त्रिया साकं कुर्वाणो हि न मैथुनम् ( ४३ ) न तस्याः कुरुते गर्भं नरो नापि सुखासिकाम् । तिरश्चा सह कुर्वाणा मैथुनं मनुजाङ्गना । नाधत्ते तत्कृतं गर्भे न युक्तं मैथुनं तयोः । नैव कश्चिद् विभागोस्ति मैथुने स्त्रीमनुष्ययोः ' ( ४५ ) येन सचीयते भेदः प्रस्फुटं द्विजशूद्रयोः ( ४६ ) तस्मान्मनुष्यभेदोऽयं संकेतबलनिवृतः ” ( ४३।५० ) इन सभी पूर्वपक्ष के पद्योंमें भी सूक्ष्म दृष्टि डाली जाय, तो " इनसे भी जन्मना वर्ण - व्यवस्था ही सिद्ध होती हैं । ' वागीश्वरेण देवेन - नाभेदेन भवच्छिदां । पुरुणा कृतमर्यादास्त एव ब्राह्मणाः स्मृताः ' ( ४४।७ ) । आगे ' शूद्रोपि शीलसम्पत्री ब्राह्मणादधिको भवेत् । ब्राह्मणो विगताचारः शूद्राद् होनतरो भवेत् ' ( ४४।३१ ) यहाँ तो स्पष्ट हो अर्थ-वाद है, केवल प्रशंसा और निन्दा रखी गई है, वर्ण - परिवर्तन नहीं कहा गया । Collection Gujarat. अगले ४५ अध्यायमें ब्रह्माजीने जाति और कर्म दोनोंका समुच्चय उत्तरपक्ष बताया है, उसे हम पूर्व उद्धृत कर चुके हैं । इससे यह सिद्ध हो जाता है कि केवल देह एवं कर्म यादि ब्राह्मणत्व श्रादिकं कारण नहीं, किन्तु सबका समुच्चय ही कारण हैं । जैसे विभाव, अनुभाव और व्यभिचारिभाव तीनोंके संयोगसे एक रसकी निष्पत्ति हुआ करती है, वे अलग - अलग ठहरे हुए श्रनैकान्तिक हो जाते हैं, जैसे कि - शक्ति, निपुणता और अभ्यास यह समुदित होकर ही काव्यका हेतु बन जाते हैं, और अलग - अलग हुए अनैकान्तिक हो जाते हैं, जैसे — खुर- विषाण-शुकादि वर्ण, इङ्गित, निमिषित, सामान्य आदि पृथक - पृथक नहीं, किन्तु ' समुदित होकर ही ' गो ' शब्दवाच्य होते हैं, जैसे कि जाति, प्राकृति और व्यक्ति समुदित होकर ही एक पदार्थ बनते हैं, वैसे ही जा ( माता - पिता द्वारा जन्म ) और कर्म जिसमें संस्कार- अध्ययन आदि सभी An eGangotri Initiative

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२०२ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) गुणकर्म अन्वभूत हो जाते हैं ) इन दोनोंका समुच्चय ही ब्राह्मणत्व में कारण है । यही भविष्य पुराणके इस प्रकरणका श्राशय है । हाँ, यहाँ यह अवश्य है कि जाति वस्तुका स्वरूपाधायक, प्राणप्रद सिद्ध धर्म होता है, और गुण विशेषाधानहेतु उत्कर्षाधायक सिद्ध वस्तुधमं हुआ करते हैं, और कर्म उत्कर्षाधायक वस्तुके सांध्य, धर्म हुआ करते हैं । वर्ण - व्यवस्था तो भविष्य पुराणके मतमें भी जन्म हुआ करती है । पूर्वपक्ष के श्लोकोंसे भी यही संकेत मिलता है । अन्यत्र भी उसमें स्पष्ट है । उसमें भी ब्राह्मणादिकी उत्पत्ति ब्रह्माके मुख श्रादिसे बताई गई । है । जैसे कि - ' लोकस्येह विवृदुष्य मुखबाहूरुपादतः । ब्रह्मक्षत्रं तथा चोभौ वैश्यशूद्ध नृपोत्तम! ' । २।१२ ) इत्यादि में उत्पत्ति - निबन्धन ही ब्राह्मणादि संज्ञा मानी गई है । २।१२१-१२२-१२३-१२४ पद्य में मनु-स्मृतिकी तरह ब्राह्मणादिके जन्मसे ही कर्म बताये गये हैं । तब वादियों का पूर्वोत्तर प्रकरण छिपाकर बीचके पद्योंका उद्धरण देना उनके छलका तथा उनके पक्षको शिथिलता का द्योतक है । यहाँ हमने प्रायः पूरा प्रकरण उद्घृत कर दिया है | अब यहाँ स्पष्ट हो गया है, कि यह पूर्वपक्ष के पद्म हैं । पूर्वपक्ष माननीय नहीं हुआ करता । यदि पूर्वपक्ष ही माननीय हो जावे, तो क्या वादी सत्यार्थप्रकाशके पूर्वपत्तोंको अपना सिद्धान्त मान लेंगे? ( ख ) अब ' हरिणी - गर्भसम्भूतः, श्वपाकी - गर्भसम्भूतः, गणिका-गर्भसम्भूतः, जातो व्यासस्तु कैवर्त्याः ' इत्यादि पूर्वोष्टत. पद्यों पर विचार किया जाता है । इस पर यह जानना चाहिये कि वाद द्वारा उपस्थापित उक्त श्लोकोंको अभ्युपगम – सिद्धान्त द्वारा स्वीकृत करके सिद्धान्तीने इनके मुख्य विषयको परीक्षा की है; वस्तुतः इस बातको सिद्धान्तीने कहीं माना नहीं " । ‘ न्यायदर्शन ' में कहा है – ' अपरीक्षिता-म्युपगमात् तद्विशेषपरीक्षणमभ्युपगम – सिद्धान्तः ' ( ashi Colection कुछ मका परिहार २०४ बिना परीक्षा किये वह अशुद्ध सिद्धान्त मान लिया जाय; फिर सिकस विशेष बात ( मुख्य विषय की परीक्षा की जाय उसे उपहा नाविक ' सिद्धान्त कहते हैं । जैसेकि - शब्द गुण है, दुष्य, नहीं अभ्युपगम और पद से न्याय के मत में अनित्य है । अब वादीने कह दिया कि शब्द, च यह पूर्व द्रव्य है ॥ दिखला यह शुद्ध सिद्धान्त था । पर सिद्धान्तीने कहा कि- चलो तुम्हारी बात हम बिना कोई आपत्ति किये मान लेते हैं कि- शब्द हो भीगत इग्य पर वह नित्य है या अनित्य- इस उसके मुख्य विषयकी हम परीक्षां करते पुष्पह , व्यासस्य हैं । यह सिद्धान्त अपनी प्रतिभाकी प्रबलताका परिचायक और बादी । बुद्धिकी मन्दताका प्रकाशक हुआ करता है; यह भाष्यकार श्रीवारस्या इसमें व यनको श्राशंय है । सिद्धान्तीने ' श्वपाकीगर्भसम्भूतः, जातो व्यासस श्र कैवर्त्याः इन अशुद्ध भौं बातोंकी खोद खादसे जांचं न करके इसे काही विशेष विषय कि वर्ण जाति से हैं या गुणकर्मसे इस बातकी परीक्षा ऋपिया की हैं; श्रुतः श्रभ्युपगमसिद्धान्तवश जैसे शब्दको द्रव्य नहीं मा थी । प लिया जाता; वैसे यहां भी उक्त सभी उत्पत्तियों मान नहीं ली वांगे । तो ' स्त्री श्रीन्यासकी माताको वाढीने केवती ' लिखा है; परं वह कैवर्त ( मज़ार ) अभ्यनु की लड़की नहीं थीं, किन्तु उपरिचरवसुको लड़की थी यह इतिहास- स्वीका सिद्ध बात है, यह हमने ' श्रीसनातनधर्मालीक ' के गत तृतीय पु हो । त ( २८२ पृष्ठ ) में सिद्ध कर दिया है । इस प्रकार श्रीवसिष्ठ साधार होता है, गणिकाकें ' पुत्र नहीं थे, किन्तु उच्चयोनि देवाप्सरा उर्वशी के मनसे ( योनिं सन्तान हो गई । नहीं ) उत्पन्न हुए थे, यह भी हम तृतीय पुष्प ( २८३ पृष्ठ ) में का चुके हैं । वादीने भी यहां इन बातोंको सुना - सुनाया कह दिया- अ पर स्वयं कुछ भी विचार नहीं किया । साधारण जननि जो प्रसिद्धि उक्त सकळी, होती है; वह सर्वोशमें सत्य हो - यह आवश्यक नहीं । सीतांक दिपकने संस्कार भी रावणके घरमें निवासमात्रले साधारण जनसमाजमें श्रशुद्ध अव संस्कार फैल गया था । इसलिए कवि कहते हैं— ' जनानने कः करमपयिष्यति । वर्णं होने F Gujarat. An eGar श्रीपाद श्वपाकी पुत्र कहना भी इसी प्रकार से है - इसमें ऐतिहा

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) ३०४ सत्यता सर्वथा नहीं । इसलिए ' बहवः कथ्यमानाः ये ' ( ४२।२१ ) फिर उपड़ी • सिक ' नाविकापत्यमुच्यते ' ( ४२।२३ ) इन पद्योंमें कथ्यमानाः, तथा ' उच्यते ' श्राम्युपगम पदसे ' तथाकथित ' अर्थका बोध है, वास्तविकता नहीं । वादियोंको और ग यह पूर्वपक्ष के पद्य न दिखाकर उसके इतिहाससे उसका श्वपाकीत्व द्रव्य है । दिखलाना चाहिये; श्रदृश्यन्ती श्वपाकी कहीं नहीं कही गई इस विषयमें तुम्हारी हो भी गत पुष्पके २८३ पृष्ठमें हम स्पष्ट कर चुके हैं- जिज्ञासुओंको ३ नृष्य है पुष्प हमसे अवश्य मंगा लेना चाहिये । तब ' श्वपाकी - गर्भसम्भूतः पिता रीवा व्यासस्य ' यह वादीका कथन ' वादी भद्र ' न पश्यति ' इस न्यायसे है, र बादीकी इसमें वास्तविकता नहीं । श्रीवारस्या-और फिर अपकृष्ट - प्रसूति भी स्त्री हो; पर सन्तति पर प्रभाव बीज, व्याससु का ही पड़ता है; नहीं तो इनमें कई स्त्रियां पक्षिणियाँ भी थी, तब करके इफे की ऋपियोंसे उनमें उत्पन्न सन्तान भी स्त्रीके अनुसार पक्षी होनी चाहिये. परीक्षा थी । पर वे ऋषियोंके वीजसे उत्पन्न होनेसे मनुष्य ही हुए । तभी नहीं मन ली नांग तो ' स्त्रीरत्नं दुष्कुलादपि ' ( २२३८ - २४० ) इस प्रकार दुष्कुला स्त्रीकी ( मलाई ) अभ्यनुज्ञा भी दी गई है, इससे भी प्रतीत होता कि- दुष्कुला भी इतिहास- स्त्रीका प्रभाव सन्तानके ऊपर नहीं होता, जबकि बीज तीय प हो । तो जब बीजक्षेप्ता ऋषि थे, और बीज योनिकी साधारव होता है, जैसे कि - ' तस्माद् बीजं प्रशस्यते ' ( मनु ( योि सन्तान भी बीजानुसार ही मानी जावेगी । वादीकी हो गई । = ) में बा दया प्रसिदि -29 उक्त पध अनुसार वर्ण व्यवस्था गुणकर्मसे भी किसीका प्रबल अपेक्षा प्रबल भी ० १०।७२ ) तब शंका समाहित नहीं मानी जा सकती, क्योंकि — जहां उन पूर्वपक्षके पद्योंमें जन्मुका खण्डन है, वहां · के दिपव ; F संस्कार ( ४१।३० ) विद्या ( ४१1१ ), रंग ( ४१ | ४१, जीव ( ४२।२ ) अपवर संस्कार ४० २० ) तथा कर्म ( ४१।२७ ) आदि वादीसे इष्ट सिद्धान्तों विप्पति होने का भी खण्डन है । उन पद्योंकी हम उद्धृत कर चुके हैं; में ऐतिहा CC - 0. Ankur Joshi कुछ भ्रमका परिहार ३०५ तब पूर्वपच होनेसे जन्मका ं खण्डन महत्त्व नहीं रखता, उत्तरपक्षमें ' जातिकर्मसमुच्चय ' ( ४५१२ - ३ ) हमारा पक्ष दिखला दिया । तथापि वादियोंसे दिये हुए पद्यों पर भी कुछ विचारना चाहिये । इनमें मृगी, उलूकी, शुकी, मणदूकियोंसे ऋष्यशृङ्ग, कणाद, शुक्र और मान्यकी उत्पत्ति बताई गई है । क्या वादी मनुष्य द्वारा पशु - पक्षी स्त्रियों में मनुष्योत्पत्ति सम्भव मानते हैं? यदि नहीं, तब तो उनके प्रश्नका ही उन्मूलन हो गया । यदि वे अपने पक्षको रक्षार्थ इसमें सम्भव मानें, तब उनसे प्रष्टव्य है कि अब ऐसा क्यों नहीं होता? श्रथवा - यह सामान्य शास्त्र है या अपवाद है? अन्ततः यह श्रपवाद ही मानना पड़ेगा । तब वादियोंको ऋषियोंसे उत्पन्न सन्धानोंकी ब्राह्मणतामें भी अपवाद ही मानना पड़ेगा, सामान्य शास्त्र नहीं । लौकिक व्यवहार सामान्य - शास्त्रसे ही चलते हैं । इसलिए अपवाद-शास्त्र के उदाहरणभूत इन पुत्रोंके विषय में बृहस्पतिने कहा है- ' तपो-ज्ञानसमायुक्ताः कृत - त्रेतायुगे नराः । द्वापरेच कली नृणां शक्तिहानिर्हि निर्मिता । श्रनेकधा कृताः पुत्रा ऋषिभिश्च पुरातनैः । न शक्यन्तेऽधुना कर्तुं शक्तिहीनैरिदन्तनैः ' यदि ऐसा हैं, तब शक्ति न होनेसे इस युगमें भी उससे वर्णं परिवर्तन सम्भव नहीं । यह भी जानना चाहिये कि - पशु - पक्षी श्रादि योनियोंमें पुराणने जो पुत्र दिखलाये हैं, वहीं यह भी बताया गया है कि- श्रमोघवीर्य ऋषियोंने ही उनमें पुत्र पैदा किये । श्रव जबकि उत्पादक ही ब्राह्मण थे, तब उनके पुत्र भी जब ब्राह्मण हुए, इससे तो वादियोंके पक्षका ही खण्डन हो गया । यहां जन्मसे ही वर्ण व्यवस्था सिद्ध हुई । श्रवशिष्ट प्रश्न यह है कि माताएँ तो नीच योनिकी थीं, इस पर यह जानना चाहिये कि - मनुजीने ( ३।१३ ) ब्राह्मणका सद वर्णोंकी स्त्रियोंके साथ भी विवाह श्रभ्यनुज्ञात किया है, तब उसके वचनसे तदुत्पन्न सन्तान M Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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३०६ श्रीसनातनधर्माल्लोकः ( ४ ) भी ब्राह्मण ही होंगे । तब ब्राह्मणोंने ही यदि उससे भी बढ़कर पशु-पक्षी स्त्रियोंमें भी पुत्र पैदा किये, तब बीजकी प्रधानवासे वे भी ब्राह्मण हुए - इसमें भी सनातन धर्मके सिद्धान्तकी ही पुष्टि हैं । बीज और योनिमें बीज ही प्रधान होता है ( मनु ० १०/७२ ) मनुजीने कहा है- ' विशिष्टं कुत्रचिद् बीजं स्त्रीयोनिस्त्वेव कुत्र-चित् ' ( ६३४ ) इस न्यायसे बीजकी प्रधानतामें विश्वामित्र, व्यास और कक्षीवान् ब्राह्मण हुए । कहीं योनि ( क्षेत्र ) की प्रधानतासे श्रीव्यास द्वारा अम्बा, अम्बालिकामें धृतराष्ट्र और पाण्डु क्षत्रिय हुए, क्योंकि सत्यवती भी अपने ही क्षत्रियकुलानुरूप उत्पत्ति चाहती थी — जैसे कि ' तयोर-स्पादयापत्यं.. अनुरूपं कुलस्यास्य ' ( महा ० १ | १०१/३४ ) । उक्त मनु-( ३४ ) वचनमें मेधातिथिने लिखा है- ' बीजस्य वैशिष्ट्य व्यास-शृङ्ग्ग्यादीनां महर्षीणां दृष्टम्, स्त्रीयोनिस्स्वेव क्षेत्रजादि - पुत्रेषु धृत-राष्ट्रादिषु; ते ब्राह्मणाज्जाता श्रपि मातृजातयः चत्रियाः । इसी प्रकार कुल्लूक भट्टने भी लिखा है । उक्त पद्यमें मनुजीने सामान्य- शास्त्र बताया है! ' क्षेत्रभूता स्मृता नारी बीजभूतः स्मृतः पुमान् । क्षेत्रबीज-समायोगात् सम्भवः सर्वदेहिनाम् ' ( ६३३ ) यह कहकर मनुने बीज और योनि दोनोंमें बीजको ही उत्कृष्ट माना है । जैसेकि - ' बोजस्य चैत्र योन्याश्च बीजमुत्कृष्टमुच्यते । सर्वभूतप्रसूतिर्हि बीजलक्षणलक्षिता ' ( १।३५ ) यादृशं तृप्यते बीजं क्षेत्रे कालोपपादिते । तादृग् रोहति तंत् तस्मिन् बीजं स्वैन्यंञ्जितं गुणैः ' ( ३६ ) इयं भूमिर्हि भूतानां शाश्वती योनिरुच्यते । न च योनिगुणान् काँश्चिद् बाजं पुष्यति पुष्टिषु ' ( ६ ( ३७ ) ( अर्थाद - बीज भूमिके गुणोंको पुष्ट नहीं करता; किन्तु अपने ही गुणों को करता है — यह श्चार्यसमाजी श्रीतुलसीरामने आशय बताया है । ) यहां पर मनुजीने बीजको ही उत्कृष्ट सिद्ध किया है । तभी तो आगे कहा है - ' अन्यटुप्तं जातमन्यद् —— इत्येतन्नोपपद्यते । उप्यते॒ यृद्धि यद् CC - 0. Ankur Joshi Collection कुछ का परिहार ३० बीजं तत् तदेव प्ररोहति ' ( ६४० ) अर्थात् - बोया जावे उत्पत्ति हो और यह नहीं हो सकता । और ' स्त्री पा तब जब बीजरूप इसमें थे तपस्वी ब्राह्मण; तो सन्तान चाहि ही होनी थी; क्योंकि — अमोघवीर्य वाले तपस्वियोंके ब्रह्मतेजको भी वैसी रण क्षेत्रदोष नहीं दबा सकता । तभी तो क्षत्रिय माताके भी साधा- इम सम विश्वामित्र ऋचीक ब्राह्मणके चरुसे विश्वामित्र - ब्राह्मण सन्तान हुए । पराशरके चेजसे सत्यवती क्षत्रिय - कन्यामें वेदव्यास ब्राह्मण हुए । इसलिए मनुजीने भी कहा है - ' यस्माद् बीजप्रभावेण तिर्यग्जा ऋषयोऽभवन्! पूजिवाश्च प्रशस्ताश्च तस्माद् बीजं प्रशस्यते ' ( १०।७२ ) तब पशु - पक्षियोंमें भी ब्राह्मण ऋऋषियोंसे उत्पन्न सन्तान ब्राह्मण हुई, यह हमारा ही पढ़ ग्राह ' जन्मना वर्णः ' सिद्ध हुआ । तब उक्त ऋषि जन्मसे तो ब्राह्मण थे ही; मी फिर तपस्यासे माता के परमाणुओं को हटाकर शुद्ध ब्राह्मण हो गये- हैं, यही पुराणके पद्योंका श्राशय है । यदि वादी लोग पशु - पक्षियोंसे प्रमा सन्तानकी उत्पत्तिमें असम्भव मानें; और मृगी, उलूकी, शुकी, मण्डूकी श्रदि उन मानुषियोंके जन्मनाम मानें, वा गुणनाम मानें कि - शुक्र के ब्रह्म गुण होनेसे उस मानुषीका नाम शुकी था, वैसे ' श्वपाकीगर्भसम्भूतः ' में. वत भी ' श्वपाको ' यह उस ब्राह्मणीका नाम मानें । अथवा श्वपाक चाण्डाल सम का नाम हुआ करता है । ' ब्राहाणका एक भेद ' चाण्डाल ' भी माना श्रन गया है । जैसे कि त्रिस्मृति में - ' देवो, मुनिः, द्विजो, राजा, वैश्यः, प्रसा शूद्रो, निषादकः । पशुम्लेच्छोपि, चाण्डालो विप्रा दशविधाः स्मृताः ' ब्राह ( ३७१ ) तब पराशरकी माता भी ब्राह्मण थी; चाण्डाल उसका भेद था । चाण्डाल - ब्राह्मणका लक्षण श्रनिने इस प्रकार दिया है -! क्रिया-हीनश्च मूर्खश्च सर्वधर्मविवर्जितः । निर्दयः सर्वभूतेषु त्रिचाण्डाल यहा मॅ उच्यते ' ( ३८१ ) यहां चाण्डाल - ब्राह्मण पारिभाषिक हीं इष्ट है, वास् विक मानने पर उक्त भेदोंमें गणित पशु - ब्राह्मण भी वस्तुत: ही पशु Gujarat, An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) ३०८ हां जावे, पर ऐसा नहीं । तब ब्राह्मण वर्णकी भी अदृश्यन्तीको न श्रीर स्त्रीत्व- सुलभ क्रियाहीनता, मूर्खता, निर्दयता श्रादिके कारण कहीं पाकी कहा गया हो, वहां वास्तविक चाण्डाली नहीं समझना चाहिये । इसी प्रकार अक्षमाला के चाण्डालीत्वमें भी जान लेना चाहिये । भी वैसी इस प्रकार भविष्यपुराण - सम्बन्धी वादियोंकी सभी थाशंकाओंका साधा- समाधान हो गया । सन्तान राशर के पुराणोंके कई लोक मनुजीने निवाश्र ( ३ ) पूर्वपक्ष - पुराणों में वर्ण - व्यवस्था गुणकर्मसे दीखती है ॥ में भी ब्राह्मणके भी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र पुत्र देखे गये हैं । तंत्रिके ही पद मी ब्राह्मण पुत्र दीखते हैं । किसी क्षत्रियके पुत्र वैश्य हुए दिखाये गये हो है, अतः वर्ण - व्यवस्था जन्मसे ठीक नहीं । देखिये इसमें पुराणोंके. प्रमाण-दियाँसे नरद्‌को ( क़ ) ' गोर्वचनमात्रेण स च ब्रह्मर्षितां गतः । वीतहव्यो महाराज! ' - शुक के ब्रह्मवादित्वमेव च । वस्य गृत्समदः पुत्रो रूपेणेन्द्र इवापरः ।... ऋग्वेदे वर्तते चाद्र्या श्रुतिर्यस्य महात्मनः । यत्र गृत्समदो राजन्! ब्राह्मणैः गडाल स महीयते । स ब्रह्मचारी विप्रर्षिः श्रीमान् गृत्समदोऽभवत् ' ( महाभारत माना अनुशा ० ३०।१७-६० ) एवं विप्रत्वमगमद् वीतहव्यो नराधिपः । मृगोः प्रसादाद् राजेन्द्र! क्षत्रियः क्षत्रियर्षभः ( ६६, यहां क्षत्रिय वीतहव्यका मृग ' ब्राह्मण हो जाना लिखा है । भेद क्रिया- ( ख ) पृपधस्तु गुरुगोवधात् शूद्रत्वमगमत् ( विष्णुपुराण ४ | १ | १४ ) गडाल यहां पृषधको शुद्धता दिखलाई है । इसी प्रकार हरिवंश ( ६५६ पद्य ) में भी कहा है, श्रीमद्भागवतमें भी ' न क्षत्रबन्धुः शूद्रस्वं कर्मणा वास्त • भविताऽसुना ' । पशु CC - 0. Ankur Joshi Collection कुछ मोंका परिहार ३०६ ( ग ) नाभागो नेदिष्ठपुत्रस्तु वैश्यतामगमत् ( विष्णु ० ४ | १ | १६ ) यहां नाभागकी वैश्यता दिखलाई गई है । यद्यपि नाभागः वैश्यवृत्ति में लगा, तथापि उसके पुत्र ब्राह्मण बताये गये - ' नाभागादिष्टपुत्रौ द्दौ वैश्यो ब्राह्मणतां गतौ ' ( ११ श्र ० ) । ( घ ) ' गृत्समदस्य शौनकः चातुर्वएर्यप्रवर्तयिताऽभूत् ' ( विष्णु ४ । ८ । १ ) यहां शौनकको चार वर्ण बनाने वाला कहा है । हरिवंश ( २१८ ) में भी कहा है – ' पुत्रो गृत्समदस्यापि शुनको यस्य शौनकाः । ग्राह्मणाः क्षत्रियाश्चैव वैश्याः शूद्रास्तथैव च ' यहां भी एक ही गृत्समदके ब्राह्मणादि शूद्रान्व चारों वर्णोंके लड़के बताए हैं । इस प्रकार वायु-पुराणमें भी कहा है । इस प्रकार - हरिवंशके ३२ श्रध्यायमें ' तथा गृत्समतेः पुत्रा ब्राह्मणाः, क्षत्रिया विश: ' गृत्समतिकी सन्तानें तीनों चकी दिखलाई हैं । इस प्रकार अनिराके पुत्रोंका भी वर्गान है--' एते स्वङ्गिरसः पुत्रा जाता वंशेऽय भार्गवे । ब्राह्मणाः चत्रिया वैश्याः शूद्राश्च भरतर्षभ ' ( ३२ / ३६-४० ॥ इस प्रकार गर्गभूमि और वत्सके लड़के भी चारों वर्णों के बताये हैं; जैसेकि ब्रह्माण्डपुराण में ' ब्राह्मणाः क्षत्रियाश्चैव तयोः पुत्रास्तु धार्मिंकाः ' । श्रीमद्भागवतमें भी कहा है-' रम्भस्य रभसः पुत्रो गम्भीरश्चाक्रियस्तत: ' । तस्य क्षेत्रे ब्रह्म जज्ञे ' ( ६।१७ । ११ । यहां पर क्षत्रियके घर ब्राह्मणका उत्पन्न होना कहा है । विष्णुपुराण में कहा है- ' भर्गस्य भर्गभूः, अतः चातुर्च पर्यप्रवृत्तिः ' ( ४८६ ) यहां एक के घर चार वर्णों वाले लड़कोंकी उत्पत्ति बताई है । इस प्रकार मनुके विषयमें भी कहा है- ' ब्रह्मक्षत्रादयस्तस्मान्मनोर्जा-तांस्तु मानवाः ' ( महाभा ० यादि ० ७५।१५ ) । इससे यह भी सिद्ध होता है कि - पहले चार वर्णों की प्रवृत्ति नहीं थी । तब उन राजाओंने गुणकर्मानुसार उनकी प्रवृत्ति की । इसमें ज्ञापक है एकके चार वर्ण चाले पुत्र होना । जैसेकि - हरिवंशके २६ अध्यायमें ' पुते ह्यङ्गिरसः Gujarat. An eGangotri Initiative

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३१० श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) पुत्रा जाता वंशेध भार्गवे । ब्राह्मणाः सत्रिया वैश्यास्त्रयः पुत्राः सहस्रशः । ( ङ ) लिङ्गपुराण में भी कहा है- ' एते ह्यङ्गिरसः पक्षे क्षत्रोपेता द्विजा-तय: ' । इस प्रकार वायुपुराण में भी कहा है । अन्यत्र भी कहा है-' दिवोदासस्य दायादो ब्रह्मर्षिर्मित्रयुनृपः । मैत्रायणास्तथा सोम मैत्रेयास्तु ततः स्मृताः । एते वै संश्रिताः पक्षे क्षेत्रोपेतास्तु मार्गवाः । यहाँ पर क्षत्रियों का भार्गव ब्राह्मण हो जाना कहा है । ( च ) ' करूषात् कारूषा महाबलाः क्षत्रिया बभूवुः ' ( विष्णुपुराण ४११०११ ). इनके विषय में भागवतमें— ' कारूषाः क्षत्रजातयः 1.. ब्रह्मण्यां धर्मवत्सल्वाः ' ( ३।२।१५ ) इन क्षत्रियोंको ब्राह्मण कहा है । ( छ ) ' ट्रष्टस्यापि धाष्टकं तत्रं समभवत् ' ( विष्णु ० ४/२/२ ) इसके विषयमें, भागवत में — ' घृष्टाद् घाटमभूत् चत्रं ब्रह्मभूयं गतं क्षितौ ' ( ३२।२७ ) इन क्षत्रियोंको ब्राह्मण कहा है । ( ज ) ' ततोऽग्निवेश्यो भगवान्... ततो ब्रह्मकुलं जातमग्निवेश्यायनं नृप! ' ( भाग ० २१-२२ ) यहाँ श्रग्निवेश्यके वंशको ब्राह्मण कहा गया । ( झ ) ' रथोतरके विषयमें विष्णुपुराण में – ' एते क्षेत्रप्रसूता वै पुन-श्वाङ्गिरसाः स्मृताः । रयीतरस्य प्रवराः क्षत्रोपेता द्विजातयः ' ( ४/२ ) यहाँ क्षत्रियोंको रथीतर गोत्रका ब्राह्मण कहा है । इस विषय में भागवतमें कहा है -- ‘ रथीतरस्य अप्रजस्य भार्यायां तन्तवेर्धितः । श्रङ्गिरा जनया-मास ब्रह्मवर्चस्त्रिनः सुतान् । एवे क्षत्रे प्रसूता वै पुनस्त्वाङ्गिरसाः स्मृताः । रथीतराणां प्रवराः क्षत्रोपेता द्विजातयः ' ( ६ / ६ / २२-२३ ) यहाँ पर स्थीवर CC - 0. Ankur Joshi Collection कुम परिहार ३१२ के सन्तानहीन होनेसे घङ्गिराने उसकी स्त्रीमें महावचसी ब्राह्मणं लड़के उत्पन्न किये । इस प्रकार स्पष्ट है कि - प्राचीनोंने गुणकर्मानुसार चलाई थी । तभी ब्राह्मणवंशसे शूद्र और शूद्रवंशसे भी जन्मस श्रतिरागोव कर च पाए और वर्ण - व्यवस्था ब्राह्मण भूत ह हुए । तो इसीलिए ही एक - एक पुरुषके चार बर्णवाले लड़के बताये गये 1 । विष्णु वायु और हरिवंश पुराण शौनक के ब्राहाण, सत्रिय, वैश्य, शुद्ध इन चार मिलत वर्णों वाले लड़कोंको बताते हैं- इससे स्पष्ट है कि- शौनक गुणकमी को देखकर योग्यतानुसार अपने पुत्रोंको ब्राह्मण यादि पदवियाँ दीं । भी कि हास में ( छं । इस प्रकार ‘ तस्य मेधातिथिस्तस्मात् प्रस्कण्वाद्या द्विजातयः ही जा ( भाग ० हा २०७ ) ' अजमीढस्य वंश्याः स्युः प्रियमेघादयो द्विजाः कोई ( २१२१ ) यहाँ श्रजमीढके वंशमें प्रियमेध श्रादिका ब्राह्मण हो जाना बताया है । ‘ मुद्गलस्यापि मौद्गल्याः क्षत्रोपेता द्विजातयः ' ( मत्स्यपु ० ) यु ‘ गर्गाः संस्कृतयः काव्याः क्षत्रोपेंता द्विजातयः ' ( मंत्स्यें ο ' ) ' गर्गाद ' त्रियो शिनिस्तती गार्ग्यः तत्राद् ब्रह्म ह्यवर्तत ' ( भाग ० ६६ ) उरुक्षयसुता तन्मे ह्य तें सर्वे ब्राह्मणतां गताः ( मत्स्यपुराण इस प्रकार अन्य भी प्रमाण वा? व हैं । ( यह पक्षं श्रार्यसमाजी विद्वान् श्रीशिवशंकर काव्यतीर्थजीने ' जाति- वैश्य, निर्णय ' के २५०-२६० पृष्ठों में रखा है ) । अध्ययन दुष्प्रापं उत्तरपक्ष- इस पर यह जानना चाहिये- जिन व्यासजी के पुराणोंमें प्रि यह घटनावली दिखाई गई है; उन्हीं व्यासजीने अपनी स्मृति में लिखा वात! क हैं — ‘ श्रुतिस्मृति · पुराणानां विरोधो यदि दृश्यते । तत्र श्रौतं प्रमाणं तु द्वयोर्द्वैधे स्मृतिर्बरा ' ( व्यास - स्मृति १।४ ) श्रर्थात् - जहाँ वेद, स्मृति धौर किसी पुराण इनमें विरोध दीखे; वहाँ पर वेदको ही अधिक प्रमाण मानौ; ए तथा पुर और जहाँ स्मृति और पुराण में विरोध दीखे; वहां स्मृतिको ही अधिक Gujarat. An मीना दो सी श्रुति और स्मृतिमें चारों वर्णोंकी व्यवस्था जब कि

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३१२ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) ३ ॥ धम्मसे है. गुणकर्मसे नहीं, यह हम गत निबन्धों में सम्यक्तया सिद्ध कर चुके हैं, तब यदि पुराण में श्रुति एवं स्मृतिसे विरुद्ध कई बच पाए जावें, तो वे अनुसरणीय नहीं हो सकते । व्यवस्थाएँ सदा श्रुति और स्मृतिके विधायक तथा निषेधक वचनोंसे हुआ करती हैं । अपबाद--व्यवस्था भूत दृष्टान्त वा इतिहासोंसे कभी व्यवस्था नहीं हुआ करती । इतिहासमें हुए । तो अच्छी - बुरी, अनुकरणीय एवम् अनादरणीय सब प्रकारको घटनाएँ विष्णु, मिलती हैं । उनके आधारसे शास्त्रीय वचनोंकी प्रवृत्ति वा निवृत्ति नहीं इन चार हो सकती । इस प्रकारके हजारों भी दृष्टान्त - वचन श्रुति स्मृतिकै ‘ एक गुणकमो भी विधायक- निषेधक वचनसे बाधित हो जाया करते हैं । पुराण - इति-हासमें भी जब - तव विधायक एवं निषेधक वचन प्रसक्तानुप्रसक्त था ही जाया करते हैं — वही सिद्धान्तरूप होते हैं, किसीके इतिहासकी जातयः कोई अपवाद घटना प्रमाण - भूत नहीं हो जाती । हो जाना = स्य ५० ) युधिष्ठिरने श्रीभीष्मजी से महाभारतके अनुशासनपर्वमें पूछा था कि ' गर्गात् ' त्रियो यदि वा वैश्यः शूद्रो वा राजसत्तम! ब्राह्मण्यं प्राप्नुयाद् येन ईयसुता तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ' ( २७/३ ) तपसा वा सुमहता कर्मणा वा श्रुतेन प्रमाण वा? ब्राह्मण्यमथ चेदिच्छेत् तन्मे ब्रूहि पितामह ' ( ४ ) अर्थात् क्षत्रिय, ' जाति- वैश्य, शूद्र यदि ब्राह्मणं बनना चाहें, तो कौनसा कर्म वा तपस्या वा अध्ययन करें? इस पर भीष्मजीने उत्तर दिया – ' ब्राह्मण्यं तात! दुष्प्रापं वर्णैः क्षत्रादिभिस्त्रिभिः । परं हि सर्वभूतानां स्थानमेतद् युधि-लिखो प्रि ' ( २७/२ ) बह्वीस्तु संसरन् योनीर्जायमानः पुनः पुनः । पर्याये मयं तु तात! कस्मिँश्चिद् ब्राह्मणो नाम जायते ( ६ ) यहाँ पर क्षत्रिय, वैश्य, और शूद्रोंका ब्राह्मणत्व एक जन्ममें न बताकर अन्य बहुतसे जन्मोंके मध्यके माना; किसी एक जन्ममें जाकर ब्राह्मण होना कहा है । जब यह महाभारत तथा पुराणोंका सिद्धान्तपक्ष है, तब पुराणोंसे भला एक जन्ममें क्षत्रि-CC - 0. Ankur Joshi कुछ भ्रम का परिहार ३१३ यादिका ब्राह्मणव कैसे कहा जा सकता है? स्पष्ट है कि उस उस स्थलमें वर्ण - परिवर्तनमें तात्पर्य न होकर कर्मप्रशंसा में तात्पर्य है । श्राशय यह है कि ब्राह्मणमें भी ब्राह्मणशब्दका प्रयोग, अक्ष-त्रिन श्रादिमें भी क्षत्रियादि शब्दका प्रयोग गौण हुआ करता है । कहीं प्रशंसार्थवाद हुआ करता है - कहीं निन्दार्थवाद । निम्नको उत्तम बताने-में प्रशंसार्थवाद हुआ करता है, जैसे शूद्धादिको ब्राह्मण कह देना । वहाँ वस्तुत वैसे नहीं होता । इस प्रकार उत्तमको निम्न बताना निन्दार्थवाद से होता हैं, जैसे- ब्राह्मण यादिको शुद्ध कह देना । वस्तुत: वहाँ वैसा -नहीं होता । इसी कारण ' न्यायदर्शन ' में कहा है- ' प्रधानशब्दानुपप-तेगुणशब्देन अनुवाद:, निन्दाप्रशंसोपपत्तेः ' ( ४/१/६० ) यहाँ वारस्या-यनभाष्य में उदाहरण दिया गया है — ' प्रयुक्तोपमं चैतद्- श्रग्निर्माणवकः ' धर्थात् -'यह लड़का भाग है ' यहाँ लड़का वस्तुतः श्राग नहीं होता; " किन्तु श्रग्निकी तरह तेजस्वी है, यह वहाँ तात्पर्य होता है । यह बात पृषध के विषय में भी जान लेनी चाहिये कि वह शुद्धताको प्राप्त हुआ । ' शूद्रस्य भावः शूद्रत्वम् ' यहाँ ' त्व ' प्रत्यय ' तस्य भावस्वतलो ' ( पा o -५ | १ | ११६ ) तद्भाव श्रर्थमें तत्सादृश्य अर्थ में है, साक्षात् उसमें नहीं; नहीं तो ' अनाचाराद् श्रयं पशुतां प्राप्तः ' इत्यादिमें वादी क्या अनाचारीको वास्तवमें पशु मान लेंगे? और यह भी कहना चाहिये कि क्या गायका मारना शुद्धका भी साक्षात् धर्म है? मनुजीने तो " अहिंसा सत्यमस्तेयं... एवं सामासिकं धर्मे चातुर्वएर्येऽब्रवीन्मनुः ' . ( १०/६३ ) शूद्रके लिए भी श्रहिंसा माना है । और फिर पृपधने गायको भी सिंहके भ्रमसे ही रावके गहरे अन्धेरेमें मारा, न कि जान - बूझकर । तब यहाँ उसकी शुद्धसदृशतामे तात्पर्य है, साक्षात् शूद्ध हो जाने में वहाँ । Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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२१४ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) कहीं ब्राह्मणको क्षत्रिय और वैश्य श्रादि कहना उसकी उनं कम में प्रवीरताको सूचित कर रहा होता है । जैसा कि शुद्धा लक्षका साक लक्षणसम्बन्धमें ‘ अतक्षा तक्षा ' यह उदाहरण आता है । उसमें अतक्षा होने पर भी उसे तक्षा ( बढ़ई ) कहना उसको तक्षाके कर्ममें प्रवीण बता रहा होता है; वास्तवमें उसे तक्षाजातिवाला नहीं बता रहा होता । इसलिए महाभाष्यमें, ' न वैसे ' को वैसा कहने में ४ | १ | ४८ सूत्रके भाष्य में विशेष कारण कहे हैं । जैसे कि — ' चतुर्भिः प्रकारैः ' ऋतस्मिन् सः ' इत्येतद् भवति - १ तात्स्य्यात्, २ ताद्धर्म्यात्, ३ तत्सामीप्यात्, ४ तत्साह-चर्यात् ' । तब १ उसमें रहने से, २ उसके धर्म करनेसे, ३ उसकी समी-पतासे, और ४ उसके साहचर्य से वह वस्तुतः ' वह ' नहीं हो जाया करता है, किन्तु केवल उस शब्दसे कहा जाता है । इस भांति ' न वह ' होता ' हुधा भी जो कि वह ' वह ' कहा जाता है, उसमें उसकी तद्वत्ता ही वोधित होती हैं, न कि वह सचमुच वही हो जाता है । इसीलिए ११२३१, तथा २/३/६६ सूत्रके महाभाष्यमें श्रीपतञ्जलिने कहा है किं-' अन्तरेणापि वतिमतिदेशो गम्यते, तद् यथा- एष ब्रह्मदत्तः । श्रब्रह्मदत्तं ब्रह्मदत्त इत्याह,, तेन मन्यामहे -- ब्रह्मदत्तवद् श्रयं भवति- ' इति । इस प्रकार क्षत्रियादिको भी जहाँ ब्राह्मण कहा है-- वहाँ ब्राह्मणसदृशता ही इष्ट होती है, उसका साक्षात् ब्राह्मण होना नहीं । इसके अतिरिक्त ब्राह्मण क्षत्रियादि शब्द लाक्षणिक भी होते हैं । वहाँ उन शब्दोंके लक्षण में ही तात्पर्य होता है, उसे जातिवाला हो . जाने में वात्पर्य नहीं रहता । इस पर श्रत्रिस्मृतिका प्रमाण द्रष्टव्य है । वह यह है- ' देवो, मुनिद्दिजो, राजा, वैश्यः, शूद्रो, निषादकः । पशु-म्लेच्छोपि चाण्डालो विप्रा दशविधाः स्मृताः ' ( ३७१ ) यहां पर ब्राह्मण के दस नामभेद बताये हैं । उनके लक्षण निम्न है- उसमें देव - ब्राह्मण का लक्षण यह है- ' स्नानं सन्ध्यां जपं होमं देववादिय Collection पूजनम् । श्रतिथिं मुनि ब्राह्मण का rease: लक्षण -- ' वेदान्तं कुछ का परिहार ३१६ वैश्वदेवं च [ कुर्वन् ] देव - ब्राह्मण उच्यते ' लक्षण - ' शाके पत्र फले मूले धनवासे ( २७२ ) || विप्रश्चारा स विप्रो मुनिरुच्यते ' ( ३७३ ) द्विज संदा रखः । चाण्डाल - ब्राह्मण लक्षणों पठते नित्यं सर्वसङ्ग परित्यजेत् । सांख्ययोग " रथः स विप्रो द्विज उच्यते ' ( ३७४ ) । क्षेत्रिय ब्राह्मणका - विचः यह ' वाहताश्च धन्वानः संग्रामे सर्वसम्मुखे । श्रारम्भे निर्जिता लड़ए- स्मृतिको विप्रः क्षत्र उच्यते ' ( ३७५ ) । यहाँ क्षत्रिय ब्राह्मणका लक्षण कहा येन है । प्रसिद्ध स्पष्ट हैं कि— वह ब्राह्मण क्षत्रिय जैसा है । इससे वह ब्राह्मण सच्मुः । धप्रमाण क्षत्रिय नहीं हो जाता, अन्यथा उसके लिए ब्राह्मण शब्द होता ही नहीं । ऋषि - वि वैश्य - ब्राह्मणका लक्षण - ' कृषिकर्मरतो यश्च गवां च प्रतिपाठकः । । ११ । १४ । वाणिज्य - व्यवसायश्च स विप्रो वैश्य उच्यते ( ३७६ ) । पद्यत है- इस अव शूद्र - ब्राह्मणका लक्षण बताते हैं - ' लाक्षालवणसंमिश्रः कुसु इस प्रक म्भक्षीरसर्पिषः । विक्रेता मधुमांसानां स विप्रः शूद्र उच्यते ' ( ३०३ ) । ब्राह्मण निषाद - ब्राह्मणका लक्षण – -'चौरस्तस्करकश्चैव सूचको दशकस्तथा । शब्द स्त मत्स्यमांसे सदा लुब्धो निषादो विप्र उच्यते ' ( ३७८ ) । श्रथ पशुविधा बताया लक्षण कहते हैं— ' ब्रह्मतत्त्वं न जानाति ब्रह्मसूत्रेण गर्वितः । तेनैवस इष्ट नही च पापेन विप्रः पशु रुदाहृत: ' ( ३७६ ) अब ' आलोक ' के पाठकगण सत वो जिस सकते हैं कि - ऐसा ब्राह्मण क्या सचमुच पशु हो जाता है? यी ( बगल नहीं. किन्तु वह पशु- जैसा कहा जाता है, वैसे ही पुराण में भी वह बगला, ब्राह्मणको क्षत्रिय, वैश्य वा शूद्र कहा गया है; वहां भी वह उस - उ मेघ समान माना जाता है, ब्राह्मण वर्णकी व्यवस्था तो जन्मले ही रही नहीं नही है । इसी प्रकार थागे भी जान लेना चाहिये । श्रव म्लेच्छ - बार होता है लक्षण कहते हैं— ' वापीकूपतडागानामागमस्य सरस्सु च । निश कहा गय रोधकश्चैव स विप्रो म्लेच्छ उच्यते ( ३८० ) । चाण्डालविप्रका बा हैं । स देखिये – क्रियाहीनश्च मूर्खश्च सर्वधर्मविवर्जितः । निर्दयः सर्वभूवु Gujarat, An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) ३१६ उच्यते ' ( ३८१ ) इस प्रकार किसी ब्राह्मणीको इतिहास में ( ३७३ ) । ' विप्रश्चाण्डाल गया हो, वहां जन्म से चाण्डाली न सममंकर उसे सदा: चाण्डाली कहा उक्त चाईमेरा लक्षणों वाला ही समझना चाहिये । श योग विच -कालदर यह लाक्षणिक ब्राह्मणके भेद केवल अत्रिस्मृतिके हैं, अतः उस नेता स्मृतिको हो अप्रमाण मानकर उनसे अपनी जान छुड़ाई नहीं जा सकती । येन प्रसिद्ध चाणक्यनीतिमें भी यही प्रकार देखा गया है, अतः इन भेदोंकी कहा श्रप्रमाणता भी नहीं कही जा सकती । चाणक्यनीतिके ११।११ पद्य सचमु ऋपि विप्रका, ११।१२. पद्यमें द्विज - विप्रका, ११११३ पद्यमें वैश्य विप्रका, ही नहीं । १११४ में शुद्ध विमका, ११।१५ पथमें मार्जार- विप्रका, ११११६ तिपालकः । पद्यमें म्लेच्छ ब्राह्मणका, ११।१७ पद्यमें चाण्डाल - विप्रका लक्षण कहा ' है - इससे स्पष्ट हैं कि ब्राह्मण श्रादि शब्द लाक्षणिक भी होते हैं । मिश्रः सु इस प्रकार क्षत्रिय, वैश्य श्रादिके लिए भी ब्राह्मण - क्षत्रिय, वैश्य क्षत्रिय, ( ३०० ) । ब्राह्मण - वैश्य, शूद्र- तैश्य, ब्राह्मण - शूद्र, क्षत्रिय शूद्ध ' इत्यादि लाक्षणिक शकस्तथा । शब्द स्तुति - निन्दाफलक हुया करते हैं । इससे उन - उनका तत्सादृश्य पशुविशा बताया जाता है; उसे साक्षात् वैसा बतांना, वा उसका जाति परिवर्तन । तेनैव र इष्ट नहीं होता, किन्तु तत्तत्कर्मप्रवीणता ही उसकी इष्ट होती है; नहीं कगण सोन तो जिस ब्राह्मणको पशु कहा गया है, मार्जार ( बिलाव ) वा बक है? यी ( बगला कह दिया है; तो क्या वह ब्राह्मण न रहकर बिलाव, वा भी वहां बगला, कौवा, वा, बैल पशु हो जाता है; अब उसे चूहे वा मछलियाँ, उस - उसके वा श्रमेध्य वस्तु, वा खलो - भूसा ही खाना शुरू कर देना चाहिये? ही रहती नहीं - नहीं; किन्तु उसे बगले- जैसा, वा बिलाव - जैसा कहना ही इष्टं - ब्राहारा! होता है । वैसे ही पुराण में भी क्षत्रिय यादिको जहां ब्राह्मण - शब्दसे । निःश कहा गया है, वहां ब्राह्मणवृत्ति वाला, ब्राह्मण- जैसा ही अर्थ इष्ट होता प्रका बदर है । सचमुच ब्राह्मण जाति वाला बन जाना यह अर्थ इष्ट नहीं होता । सर्व CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. कुछ भ्रमका परिहार ३१७ • केवल चाणक्यनीति ही नहीं, वादि - प्रतिवादि मान्य महाभारत यही बताता है, अतः इसमें श्रप्रमाणताकी कोई गुजायश भी जाती । ' बल्कि – महाभारतने तो उन ब्राह्मणोंको ही नहीं रह स्पष्ट ही ' वैश्यसमाः, शूद्रसमाः ', ऐसा सदृशार्थक ' सम ' शब्दसं कहकर हमारे पक्षको बिल्कुल स्पष्ट कर दिया है । देखिये शान्तिपर्व ' स्वकर्मण्यपरे युक्तास्तथैवान्ये विकर्मणि । तेषां विशेषमाचच्व, ब्राह्मणानां पितामह ' ( ७६।१ ) यहां अच्छे कर्मों तथा बुरे कामोंमें लगे ब्राह्मणेकि लिए युधिष्टिर द्वारा किया गया हैं । इस पर भीष्मजी उत्तर देते हैं- ' विद्यालक्षणसम्पन्नाः प्रश्न: सर्वत्र समदर्शिनः । एते ब्रह्मसमा राजन्! ब्राह्मणाः परिकीर्तिताः ( ७६।२ ) यहां ब्रह्मसम ब्राह्मणोंका. लक्षण " श्राया है । अब देवसम ब्राह्मणोंका लक्षण देखिये – ' ऋग्यजुःसामसम्पन; स्वेषु कर्मस्ववस्थिताः । एते देवसमा राजन्! त्राह्मणानां भवन्त्युत ' ( ३ ) । शूद्रसम ब्राह्मणका लक्षण --- जन्मकर्मविहीना ये कदर्या ब्रह्मबन्धवः । एते शूद्रसमाराजन्! त्राह्मणानां भवन्त्युत ( ४ ) । ' श्रह्वायका देवलका नाक्षत्रा ग्रामयाजकाः ।-एते ब्राह्मणचाण्डाला महापथिकपञ्चमाः ' ( ६ ) यहां चाण्डाल - ब्राह्मणका लक्षण हैं । ' ऋत्विक पुरोहितो मन्त्री दूतो वार्तानुकर्षकः । एते क्षत्रसमा राजन्! ब्राह्मणानां भवन्त्युत ' ( ७ ) यह क्षत्रिय ब्राह्मणका लक्षण हैं । ' अश्वारोहा गजारोहा रथिनोथ पदातयः ( वाणिज्यायम् ) । एते वैश्यसमा राजन्! ब्राह्मणानां भवन्त्युत ( ८ ) यह वैश्य -ब्राह्मणका लक्षण कहा है । यह कहकर भीष्मजी कहते हैं - ' ब्राह्मणानां वित्तस्य स्वामी राजेति वैदिकम् । ब्राह्मणानां च ये केचिद् विकर्मस्था भवन्तु ते । ( १० ) विकर्मस्थाश्च नोपेच्या विद्या राज्ञा कथञ्चन । नियम्याः संविभज्याश्च धर्मानुग्रह - कारणात् ' ( ७६।११, ७७/३३ ) अर्थात् राजा विकर्मी ब्राह्मणों- ' को नियम में, सुमार्ग में लावे - जिससे धर्म व्यवस्था बनी रहे । An eGangotri Initiative

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३१८ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) फलतः पूर्वपक्ष में श्रीशिवशङ्कर काव्यतीर्थजीने पुराण - इतिहासके दृष्टान्तोंसे जो गुणकर्मसे वर्ण - व्यवस्था सिद्ध करनी चाही है; वह असंगत है, इन प्रमाणोंसे उसका खण्डन हो गया । वहां वस्तुतः वर्ण- परिवर्तन इष्ट नहीं है । इस प्रकार ज्यौतिषमें पुष्य, श्राश्लेषा, धनुराधा, ज्येष्ठा, उत्तराभाद्रपदा,, रेवती आदि नक्षत्रोंमें उत्पत्ति वालेको ब्राह्मण कहा है, चाहे जिस भी वर्णका हो; श्रार्द्रा, पुनर्वसु, स्वाति, विशाखा, शतभिषा आदि नक्षत्रोंमें उत्पन्न जिस किसी भी वर्ण वालेको शुद्ध कहा है । वहीं नक्षत्रानुसार किसीकी वानरयोनि किसीकी व्याघ्रयोनि, किसी की सिंह-राशि तो किसीकी कन्या राशि, किसीका भूषक वर्ग तो दूसरेका मृगवर्ग होता है; पर यह शब्द वहां पर पारिभाषिक ही होते हैं; उस - उस योनि वाले वास्तविक शेर, बन्दर, मेष, वृषभ श्रादि नहीं हो जाते; किन्तु वहां उनका लक्षणमात्र ही लिया जाता है । वैसे हो पुराण में भी ब्राह्मणादिके लिए कहे गये क्षत्रिय, शूद्र आदि शब्द तथा क्षत्रिय श्रादिके लिए कहे गये ब्राह्मणादि शब्द भी लाक्षणिक वा पारिभाषिक ही होते हैं, वहां जाति वा वर्ण उनके माता - पिता वाला ही माना जाता है । वहाँ वहाँ उनके भिन्न - वर्ण वाला लक्षण ही लिया जाता है कि उस वर्णने भिन्न वर्णकी वृत्ति अपना ली, वा उस वर्णकी वृत्तिमें वह -ब्राह्मणादि चतुर है । वह भिन्न वर्ण सचमुच उस वर्णंका मान नहीं लिया जाता । इससे पुराणोंका ' नाभागो वैश्यतामगमत् ' ( विष्णु ० ४।१।१६ ) एतदादिक प्रक्षेप्य स्थलोंका समाधान हो गया । क्षत्रिय नाभागकां वहां पर वैश्यकर्मप्रवीण होना ही इष्ट है, वास्तविक वैश्य होना नहीं; तभी वहां उसके पुत्रोंको क्षत्रिय कहा गया है । वादी लोग वर्ण - व्यवस्था गुणकर्मानुसार मानते हैं, तब उन्हें कहना चाहिये कि - वीतहव्य जो क्षत्रिय था; तथा उसी वर्णके गुण-कर्मों वाला भी था; वह बिना ही कोई ब्राह्मणोंके कर्म किये ब्राह्मण CC - 0. Ankur Joshi Collection कुछ अमोंका परिहार ३ ३२० कैसे बन गया! वहां वादीको स्वयं ही कहना पड़ेगा शक्तिसम्पन्न तपस्वीके कथनमात्रसे ही वह कि दिव्य ' बा ब्राह्मण हो गया । तो वरं - शापादिकै कारण पुराण महाभारत आदिमें स्त्रीका पुरुष बना ॐ औ श्रर्यात् पुरुषका खी बनना कहा है, स्त्रीका पत्थर बन जाना कहा है दूसरा जन्म लिये नहीं हो सकता; फिर भी जैसे ' यद् दुस्तरं, वह दिना यद् दुर्गे यच दुष्करम् । सर्वे तत् तपसा साध्यं तपो हि यद् दुरा ( १४३1८ दुरतिक्रमम् ( मनु ० ११/२३८ ) इस श्लोक कहे हुए तपस्याके माहात्म्यसे परिभ्रष्टः शरीरका परिवर्तन वहाँ कर लिया जाता है, यह अपवाद हैं, जन्म वैसे वा | लिङ्गसे वीवहन्यका भी दूसरा जन्म कर देना, क्षत्रिय शरीरके परमाणुनाश | इस सर्वथा बदल देना अपवाद ही है, उत्सर्ग नहीं । व्यवस्था उत्स दुर्लभं प्र ( सामान्यशास्त्र ) से हुआ करती है, अपवाद ( विशेषशास्त्र ) से नहीं । शुद्धतामि तब उसका तात्पर्य तपस्याके माहात्म्यमें लेना चाहिये, वर्णं परिवर्तनमें एतदादि नहीं । इस प्रकारके अर्थवाद सब स्थान मिल जाते हैं, जिनमें शब्दार्थ प्राप्तो व नहीं, किन्तु तात्पर्य ही लेना पड़ता है । ( १४३० सेवी वि पुराण - इतिहासका यह सिद्धान्त है कि - प्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, रतिश्च शूद्र श्रादि जन्मसिद्ध होते हैं । वे अपने - अपने कर्मके त्याग से श्रीर एभिस्तु दूसरेके कर्म लेनेसे उस जन्ममें नहीं, किन्तु दूसरे जन्म में भिन्न वं वैश्यः च बनते हैं । जैसे कि महाभारत में अनुशासनपर्व में उमाने श्रीमहादेवसे ( ३४ ) पूछा कि - ' चातुर्वर्ण्यं भगवता पूर्व सृष्टं स्वयम्भुवा । केन कर्मविकिन भारतीय वैश्यो गच्छति शूद्रताम् ' ( १४३ / २ ) वैश्यो वा क्षत्रियः केन द्विजी वा शूद्रादि क्षत्रियो भवेत् ( ३ ) केन वा कर्मणा विप्रः शूद्रयोनौ प्रजायते । ' त्रिवः तब जह शूद्रतामेति केन वा कर्मणा विभो! ( ४ ) इस प्रश्नसे तथा ' शूद्रयोगों है - वह प्रज्जायते ' कहनेसे स्पष्ट सिद्ध हो रहा है कि यहां अन्य जन्म में ही वर्ष हो जान बदलनेके • र्मं पूछे हैं । उसके उत्तरमें श्रीमद्देश्वरने कहा— ज गये हैं! Gujarat. An eGangotri Initiative