सनातन धर्मालोक ४ — पृष्ठ 181–190

सनातन धर्मालोक ४ · पृष्ठ 181–190

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) ३२० ' ब्राह्मण्यं देवि! दुष्प्रापं निसर्गाद् ब्राह्मणः शुभे! क्षत्रियो वैश्य-शुद्धौ वा निसर्गादिति मे मतिः ' ( १४३।६ ) यहाँ ब्राह्मणादि स्वाभाविक अर्थात् जन्मसे कहे गये हैं । पर इस कर्ममें भिन्न कर्म करनेसे भिन्न बनना और वर्णकी प्राप्ति अगले जन्म में होती है, यह कहते हैं- ' स्थितो ब्राह्मण-वह विना धर्मेण ब्राह्मण्यमुपजीवति । क्षत्रियो वाथ वैश्यो वा ब्रह्मभूयं स गच्छति यद् दुरा रतिक्रमस् ( १४३।८ ) यस्तु चिप्रत्वमुत्सृज्य दात्रं धर्मे निषेवते । ब्राह्मण्यात् स. - परिभ्रष्टः क्षत्रयोनौ प्रजायते ' ( ६ ) यहाँ पर ' क्षत्रयोनौ प्रजायते ' इ जन्म वा लिङ्गसे वर्ण - परिवर्तन श्रन्य जन्ममें होता है — यह सिद्ध हो रहा है । • इसी भांति ' वैश्यकर्म च यो विप्रो लोभमोह - व्यपाश्रयः । ब्राह्मण्यं मागुधारा दुर्लभं प्राप्य करोत्यल्पमतिः सदा । स द्विजो वैश्यतामेति वैश्यो वा उत्सर्ग से नहीं । शुद्धतामियात् । स्वधर्मात् प्रच्युतो चिप्रस्ततः शुद्धत्वमाप्नुते ' ( १०-११ ) ' परिवर्तनमें एतदादिक पद्य अन्य जन्मके लिए हैं । नभी कहा है -- ' तत्रासौ निरयं में शब्दार्थ प्राप्तो वर्णभ्रष्टो बहिष्कृतः । ब्रह्मलोकात् परिभ्रष्टः शूद्रः समुपजायते ' ( १४३ १२ ) ' तां तां योनि व्रजेद् विप्रो यस्यान्नमुपजीवति ( २१ ) निहीन -सेवी विप्रो हि पतति ब्रह्मयोनित: ' ( २४ ) गुरुतल्पी गुरुद्रोही गुरुकुत्सा-य, वैश्य, रतिरच यः । ब्रह्मविच्चापि पतति ब्राह्मणो ब्रह्मयोनित: ( २५ ) [ ग से श्रीर एभिस्तु कर्मभिर्देवि! शुभैराचरितैस्तथा । शुद्धो ब्राहमणतां यातिः भन्न व वैश्यः क्षत्रियतां व्रजेत् । ( २६ ) स वैश्यः क्षत्रियकुले शुचौ महत जायते. महादेवसे ( ३४ ) एते योनि - फला देवि! स्थानभागनिदर्शका: ' ( २३ ) इन महा-भारतीय श्लोकोंसे शुभ - अशुभ कर्मोंसे अन्य जन्मों में ही ब्राह्मण, द्विी वा शूद्रादियोनि - प्राप्ति सूचित होती है, इसी जन्म में नहीं - यह स्पष्ट है । क्षत्रियः तब जहाँ कहीं ब्राह्मणका क्षेत्रिय - वैश्य यादि होना पुराएमें कहा शुद्धयोगों है - वहाँ तद्धर्मता होनेसे वह शब्दमात्र कहा है, वहां वस्तुतः वैसा ही वर्ष हो जाना इष्ट नहीं । जहां कहीं एक ही ऋषिके चारों वर्ण वाले सन्तान दिखलाय गये हैं; वहाँ बहुत से कारण हो सकते हैं । अन्य युगोंमें पुरुष न्य CC - 0. Ankur Joshi कुछ भ्रमका परिहार ' ३२१ वर्णकी स्त्रियोंको भी लिया करते थे । ' ब्राह्मण चोरों वर्णोंवाली स्त्रीको ले सकता था । जैसे कि मनुस्मृतिमें कहा है- शूद्र भार्या शूद्रस्य, साच स्वा च ( वैश्या और शूद्रा ) विशः स्मृते । ते च स्वा चैव ( क्षत्रिया वैश्या - शूद्राः ) राज्ञश्च ताश्च ( ब्राह्मणी- चत्रिया वैश्या - चंद्राः ) स्वा चाग्रजम्मनः ' ( ३।१३ ) तब जो सन्तानें होती हैं, वे कहीं बीजकी प्रधानता पिताके वसे कही जाती हैं । कहीं योनिकी प्रधानवासे माताके वर्णसे बोली जाती है । तब आपस में भेद दिखलानेके लिए योनिकी प्रधानताके निदर्शनार्थं चारों वर्णोंकी स्त्री वाले एकके भी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्रं सन्तान कहे जा सकते हैं । इसके अतिरिक्त कई ऋषियोंने बिना मैथुनके अपने तपोबलसे चारों वर्णके सन्तान उत्पन्न कर दिये । इन बातोंसे हमारे पक्षको कुछ भी हानि नहीं पड़ती । यदि कहीं सृष्टिके आदिकालका वर्णन है, तो वहाँ धर्म - व्यवस्थाका दृढ़ बन्धन रह भी नहीं सकता । ब्यवस्था के श्रारम्भमें कहीं विशृङ्खलता भी हो सकती है, जैसे कि- · श्रारम्भिक कई विवाह बहिनोंसे भी हुए; परन्तु अब उस विशृङ्खलताका प्रचार करना विश्वारहीनता यदि कहीं ‘ ब्राह्मणतां गताः ' पाठ ' श्राया हो; वा ' ब्रह्मभूयं गताः ' वहाँ ब्रह्मरूप-( मुक्त ) हो गये. यह अर्थ होता है; क्योंकि- ' ब्रह्म हि ब्राह्मणः ' ( शतपथ ० २।१।१।११ ) । कहीं यदि किसी राजांसे चारों वर्णोंकी प्रवृत्ति कही गई है, वहाँ यह तात्पर्य नहीं है कि — उस राजर्सि पहले चार वर्ण नहीं थे; ऐसा नहीं हो सकता । जब वेदमें ही चारों वर्णोंका निरूपण है, तो उस राजाके समय चारों वर्ण क्यों न होंगे? " वहाँ यह तात्पर्य होता है कि-मध्यमें ज चार वर्णोंमें विशृङ्खलता आगई थी; उसको उक्त राजाने सुधार किया, या उसकी विशेष व्यवस्था की, जिससे वयं अपने - अपने कर्ममें दृढं होंगये, यही चारों वर्णोंके प्रवर्तनका तात्पर्य है । Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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३२२ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) इसके अतिरिक्त ' साहित्य - संगीतकला - विहीनः साक्षात् पशुः पुच्छ-विषाणहोनः ' ( नीति - शतक १२ ) यहाँ जब ' साक्षात् पशु ' शब्द भी पशुसदृश अर्थ में पर्यवसित हो जाता है, ' नरपशु ' शब्दनें भी नरका पशुसदृश बताना ही इष्ट होता है, साक्षात् पशु होनेमे तात्पर्य नहीं. रहवा, जैसे- ' विद्याविहीनः पशुः ' ( नीति - शतक २० ) ' येषां न विद्या न तपो न दानं... ते मनुष्यरूपेण भृगाश्वरन्ति ' ( नीति ० १३ ' इत्या-दियोंमें भी ' पशु ' शब्दका पशुसदृश गुणवाले होनेमें तात्पर्य होता है, पशुजाति बताने में नहीं, वैसे ही ब्राह्मणादिके लिए कहीं कहा हुआ-क्षत्रिय, वैश्य शब्द उसके क्षत्रियादि गुणोंको बताने वाला होता है, क्षत्रिय आदि जातिको नहीं । इधर जहाँ - कहीं ब्राह्मण - क्षत्रिय श्रादियोंके समान गोत्र मिलें, वहां यह कारण जानना चाहिये कि - ' वंशो द्विधा-विद्यया जन्मना च ' ( ' संख्या वंश्येन ' २ | १ | १६ सिद्धान्त कौमुदी, अव्ययीभाव समासमें ) तब वंशके विद्या - गुरुके अनुसारी भी होनेसे जिन - जिन क्षत्रिय यादियोंने जिस - जिस ऋषिसे विद्या सीखी, तब गोत्र भी उसीका स्वीकार कर लिया । इसके अतिरिक्त जो ब्राह्मण जिस गोत्र. वाले थे, उसके यजमानोंने भी अपने पुरोहितोंके गोत्र स्वीकार कर लिये, यह भी समानग़ोत्रतामें कारण हुआ करता है । यह पहले संकेत दिया जा चुका है कि - ऋषि - मुनियोंमें मानसिक सन्तानके पैदा करनेकी शक्ति भी यो- जिसका उपयोग वे क्षत्रियाणियों के साथ नियोगकें समय करते थे । तब जैसे परमात्माने स्वयं दणं - रहित होते हुए भी चार वर्ण मुखादि द्वारा उत्पन्न किये थे; वैसे ही ऋषियोंने भी चार वर्ण वाली मानसिक सृष्टि उत्पन्न की । जैसे कि ऋचीक ऋषि ने क्षत्रिया गाधिकी स्त्रीमें चरु द्वारा विश्वामित्रको ब्राह्मण वर्ष में उत्पन्न किया | सृष्टि श्रादिमें मन, वचन तथा दृष्टिमें बड़ी शक्ति थी; इसलिए तब संकल्पमात्रसे उत्पत्ति होती थी । कालक्रमसे जब वह शक्ति क्षीण CC - 0. Ankur Joshi Collection कुछ " " अपरिहार ३१४ ३ ९ ३ परक ' है, हो गई, तब मैथुनी सृष्टि प्रारम्भ हुई । तब मैथुनी सृष्टिमें सालिए हिंसी पुराव सृष्टिके समान नियम नहीं हो सकते; उन्हें शास्त्रीय नियम अनुसरण करने पड़ते हैं । शास्त्रों में वर्ण व्यवस्था जन्मसे मानी गई है- यह हम है कि वह गत निबन्धों में सिद्ध कर चुके हैं 1 । अच्छे - बुरे. गुणकर्मसे तो उस - उस ब विद्याका की केवल प्रशंसा वा निन्दा ही हुआ करती है । नहीं होता जहाँ ‘ क्षत्रोपेता द्विजातयः ' कहा गया हो, वहाँ यह तात्पर्य होता फलतः है कि – वे ब्राह्मण द्रोणाचार्य वा परशुरामकी भान्ति बलवान् वा प्रशंसामात्रप धनुर्विद्यानिष्णात थे । जहाँ क्षत्रियादियों के लिए ' ब्रह्मण्याः ' शब्द भाषा से अन्य पुर ' हो, वहीँ ' ब्रह्मसु ब्राह्मणेषु साधुः ' इस व्युत्पत्तिसे ब्राह्मणभक्त वा कलेनी चा ' ब्रह्मणि - वैदिककार्ये साधुः ' वा वैदिककार्यरत, वा जनकादि क्षत्रियोंकी हम नहीं कर तरह ब्रह्मपर. ब्रह्मलग्नु, वा ब्रह्मविद्यानिष्णात यह अर्थ होता है - उसका व्यापि पाठक ‘ ब्राह्मण वर्णके होगये ' ऐसा अर्थ कभी सम्भव नहीं । कहीं क्षत्रियादिके ( ज्यांस - स्मृि लिए ' ब्रह्मर्षि ' शब्द आया हो; वहाँ ' ब्रह्मणः वेदस्य ऋषिः ऐसा श्रयं स्मृतिकी ही भी प्रकरणवश हुआ करता है । जहां ' ब्रहाभूयं गतः क्षितौ ' ऐसा शब्द है कि ' पुरा थाया हो. वहाँ अर्थ है कि - ' भूमौ एव ब्रह्मभावं गतः ' अर्थात् जनकादि तोक व्यवहार क्षत्रियकी तरह जीवन्मुक्त होगया । जहाँ ' कर्मणा ब्रहमतां गतः ' यह धर्मशास्त्रका पाठ मिले, वहाँ कर्मसे ब्रह्मत्वको प्राप्त हुआ - बापदको प्राप्त हुथा,. अपने विषयम मुक्त बना, यह अर्थ है । जैसे कि-- मनुस्मृतिमें कहा है- ' महायज्ञैव स्य, लोक - च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः ' ( २८ ) यहां कर्मविशेषसे ब्रह्मपदकी, व्यवस्थाप्यते-मुक्तिकी प्राप्ति कही है.। पुराण में भी यही श्राशय है । भगवद्गीता में भी. खान, इ धर्मशास्त्र - चिर यही सूचित किया है- ' कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः - नहीं हो जातें ( ३ | २०, ‘ संसिद्धि ' का भाव ब्रह्मपदकी प्राप्ति, ' जीवन्मुक्तिको प्राप्त हुआ-द्वितीयकारिकामें श्री- यः साहसं च ऐसा सभी कहते हैं । तभी सांख्यतत्त्वकौमुदीकी ही बात वाचस्पति मिश्रने यह श्रुति उद्धृत की है-- ' परे ऋषयो मनीषिणः परं कर्मभ्योऽमृतत्वमानशुः ' उक्त सभी स्थलों में ' कर्म ' शब्द ' निष्काम कर्म- " Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) ३१४ ३४ परक ' है, निष्काम कर्म कर्माभाव होनेसे मुक्ति प्रदायक होता है । किसी पुराण - वचनमें यदि किसी क्षत्रियादिको ' ब्राह्मण " कहा गया हो वहां ' ब्रह्म जानाति इति ब्राह्मणः ' ऐसा लाक्षणिक वा पारिभाषिक; अनुसरण है कि- वह अजातशत्रु आदि उपनिषत् में कहे । हुए क्षत्रियोंकी तरह शब्द ब्रह्म-यह उस हम विद्याका ज्ञाता बना, वह ' ब्राह्मण ' शब्द वहां पर ' जांति - शब्द वर्ष नहीं होता । 3 र्य होता. फलतः काव्यतीर्थजीसे दिये हुए पुराणोंके उक्त प्रमाण कर्म-प्रशंसामात्रपर्यवसायी हैं, गुणकर्मणा वर्ण व्यवस्थापक नहीं । इस रीति से श्रन्य पुराणांक प्रमाणोंकी व्यवस्था भी उनके पूर्वापर प्रकरण देखकर नक वा कर लेनी चाहिये । यहाँ पर विस्तार भयसे सब श्रक्षेपोंका समाधान हम नहीं कर सके शेष आक्षेपांका उत्तर अन्य भागमें दिया जायगा । - उसका तयापि पाठकोंको यह याद रखना चाहिये कि –‘द्वयोर्द्वैधे स्मृतिर्व । ' । चियादिके ( ग्यांस स्मृति १1४ ) अर्थात् — स्मृति और पुराणका विरोध हो तो. मृतिकी ही बातसे व्यवस्था होती है । इसीलिए न्यायदर्शनमें भी कहा. श कि- ' पुराणका मुख्यविषय लोकवृत्त प्रतिपादन है, न कि मुख्यतया नकादि हो - यवहारकी व्यवस्था करना । लोक व्यवहारकी व्यवस्थापना तो यह शास्त्रका काम है, पुराण और धर्मशास्त्र इन्द्रियोंकी तरह थपने-हुआ,, | अपने विषय अधिक मान्य हुआ करते हैं ' ' लोकवृत्तमितिहास - पुरा- ' हाय सत्य, लोक - व्यवहार - व्यवस्थापनं धर्मशास्त्रस्य विषयः । तत्रैकेन न सर्व हा पदकी, व्यवस्थाप्यते इति यथाविषयम् [ स्वस्वविषये ] एतानि [ अधिक- 1 -तामें मी. माणानि इन्द्रियादिवत् ' ( न्या ० २ / १,६२ ) । पुराणं इतिहासमें ती नकादयः शास्त्र विरुद्ध भी प्राचरण कभी देखे जाते हैं; परं के अनुकरणीय हुआ | श्रीं हो जातें । इसीलिए ' गौतमधर्मसूत्र ' में कहा है- ' दृष्टो धर्मन्यति-श्री. छः साहसं च महताम्; न तु दृष्टार्थो वरो, दौर्बल्यात् ' ( १।१-२ ' ) । पि दो बात श्रापस्तम्बधर्मसूत्र में भी कही हैं— ' दृष्टी धर्मव्यतिक्रमः साहसं मकर्म-CC - 0. Ankur Joshi कुछ भ्रमांका परिहार ३२४ पूर्वेषाम् ' २।१३३७ ) ' तैयां तेजोविशेषेण प्रत्यवाय न विद्यते ( ८ ) तद् अन्वीक्ष्य प्रयुञ्जानः सीदत्यवरः ( ६ ) । इतिहासमें स्वा ० द जीकर ० हुक्का पीना, भांग दोना आदि लिखा होने पर भी वह उनके अनुया-विक्रोंसे श्राचरणीय नहीं हो जाता । यदि गुणकर्मकृत वर्ण - व्यवस्था चलाई जावे, उसमें एक तो शास्त्र-का ज्याकोप होगा; दूसरा उसमें श्राजकल लाखोंमें केवल एक वा दो ही ब्राह्मण बन सकेँ । तब इस असम्भावित और शास्त्र अननुशिष्ट विषयमें पाद- प्रवेश न करके जन्मसे ही वर्ण - व्यवस्थाका सिद्धान्त मान लेना चाहिये । हाँ, उस - उस वर्ण में उत्पन्न हुए को दस वर्षके कर्म अवश्य करने चाहियें – ऐसा प्रचार किया जाय । श्रन्वयक कर्म कर रहे हुए तथा श्रवैध - कर्मत्यागी पुरुषोंकी निन्दा करनी चाहिये । ऐसा करने पर सभीकी अपने - अपने कर्म करनेमें रुचि बढ़ेगी । एक Collection Gujarat. ( ४ ) पूर्वपत्र - जन्मसे वर्ण व्यवस्था होने पर स्वतः ब्राह्मण पदवी प्राप्त होनेसे उस पदवीकी प्राप्त्यर्थ कोई परिश्रम नहीं करेगा । सभी वर्ण उन्नतिसे रहित हो जाएंगे ( श्रीधर्मदेव शास्त्री ' सूर्योदय ' में ) 1 उत्तरपत्र – इससे शास्त्र - सिद्ध जन्मना वर्ण - व्यवस्थाका नाश कर डालना ठीक नहीं । उसके लिए अन्य उपाय बहुत हैं । शास्त्रोंमें मूर्ख ब्राह्मणोंको दान देने का निषेध किया गया है । जैसे कि - ' नश्यन्ति हव्यकव्याति नराणामविजानताम् । भस्मीभूतेषु विप्रेषु मोहाद् दत्तानि ड्रातृभिः ' ( मनु ० ३।६७ ) ' विद्यातपः- समृद्धेषु हुतं विप्रमुखाग्निषु ।. निस्तारयति दुर्गाच्च महतश्चैव किल्विषाद् ' ( ३६८ ) । श्रथर्ववेद गोषव-An eGangotri Initiative

पृष्ठ 184

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३२६ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) ब्राह्मणमें भी कहा है- ' एवमेव छायं ब्राह्मणोऽनग्निकः, तस्य ब्राह्मणस्य अनग्निकस्य नैव दैव दद्याद, न पिट्ट्यं, न चास्य स्वाध्यायाशिषो न यज्ञे आशिषः स्वर्गङ्गमा, भवन्ति ', । ११२ । १३ ) यहाँ पर अग्निहोत्रादि - रहितको ब्राह्मण तो कहा है; पर उसे दान देनेका निषेध किया है । इसे यांच-रणमें लानेसे गुणकर्महीन ब्राह्मणों को बहुत भय उत्पन्न होगा । शूद्भुता • कर देनेसे उनका क्या होगा? यही कि- शूद्रोंकी संख्या बढ़ेगी, और • ब्राह्मकी, घटेगी । फिर वे ही शूद्र बने हुए,; ब्राह्मण बने हुर्भोसे द्वेष प्रारम्भ करेंगे, जिससे महायुद्धों की सृष्टि होकर भारतकी भारी हर्मन · होगी । यदि कोई क्षत्रियादि ब्राह्मण भी हो गया, तो ब्राह्मण • वर्ण में मिल जाने पर उसकी कुछ भी विशेषता नहीं रहेगी । विशेषता अपने वर्ण में रहने पर अच्छे गुणकर्मोंसे होती है । गुण, हीनं वर्णका भी सम्मान ' ब्राह्मणसे भी बढ़कर ' करा देते हैं- ' गुणा: पूजा स्थानं गुर्णिषु लिङ्गचयः " विशेष प्रकार को लोहेकी तारका भी मूल्य समय पर सोनेके मूल्यसे भी बढ़ जाता है । लोग ब्राह्मणोंसे हीनवर्ण भी गान्धिजीका ब्राह्मणोंसे भी अधिक सम्मान करते ही थे । हिन्दुधर्मसे भिन्न धर्मवाले भी ए. सी. वुल्नर आदि जर्मन वा अँग्रेजोंको सभापति " बनाकर उनको सम्मानित करते ही थे । इस कारण वर्ण- परिवर्तनकी यावश्यकता नहीं । एक भवन है जोकि उद्धार नभ्होनेसेः पतनकी दशा में .: है । उसका आप्र. थोडेसे परिश्रम से उद्धार कर सकते हैं, उसके उद्धार में घर सुन्दर हो सकता है । परन्तु आप उसे गिराकर नया घर बनाना ' चाहते हैं जिसके बनने में ही सन्देह है, जिसके लिए ईंटें आदि. सामग्रीकी प्राप्ति भी कठिन हैं । एक मर्यादाहीन अपने पुत्रका आप उद्धार न करके, उसे मारकर वा छोड़करे वा दूसरे शूद्रादिको देकर उसके ' स्थान में दूसरे शुद्धादिके सुन्दर पुत्रको लेना चाहते हैं; क्या यह ठीक ' रहेगा? अपना धन्धा भी पति श्रेष्ठ होता है; उसे छोड़कर दूसरे अच्छे • CC - Q. Ankur Joshi: Collection कुछ भ्रमों का परिहार ३२७ ३२८ भी पत्तिको लेना ठीक नहीं । अपना विगुण भी धर्म ठीक है, दूसरेका सांसाि अच्छा दीख रहा हुआ भी धर्म ग्राह्म नहीं होता । 1 धौर भ त हमें त्रुटित कार्य में सुधार करना चाहिये, पर सुधारके बहाने संहार सर्वारम्भ" करना ठीक नहीं । सय क्षन्नियादिको उचित है कि पर्ने पुरोहित माझीका धनं जमा करके उसे बाल्यावस्था से ही उनके पढ़ाने श्रादिके कायोंमें व्य कर्मय करें । इस प्रकार उनको शीघ्र उन्नति होगी, शूद्रादि करने से नहीं | स्वा ०३० धर्मो भ को मृत्यु हुए ७० साल हो गये हैं, उसमें कितने, क्षत्रिय, शुद्ध साङ्ग - वेदको ( १८४० पढ़कर ब्राह्मण हुए? डा ० अम्बेदकर न्यायमन्त्री बनकर भी जैसे ही स अन्त्यज हैं । मौलाना आज़ाद शिक्षामन्त्री भी अब भी मुसलमान ही तथा ' घर हैं । यदि आर्यसमाज में भी गुणकर्म कृत वर्ण व्यवस्था होती. तो उसमें ' श्रात्मीय कोई भी वैदानभिज्ञ ' वा मूर्ख ब्राह्मण न मिलता; परन्तु उसमें भी विपरीतता दीखती है, इससे स्पष्ट है कि गुणकर्मणा ' वर्ण - व्यवस्था सुरूप - पर सिद्धान्तत करने पर भी कोई लाभ नहीं होना है । तब जन्मना वयं- जिस व व्यवस्था सिद्धान्तको हटानेका प्रयत्न व्यर्थ ही है । वेदुके पूर्ण परित नियत कर फिर भी द्विजोंमें जन्म ब्राह्मणोंमें ही मिलेंगे । वास्तवमें जैसे मनुष्य वक कैस भिन्न वस्तु हैं और विद्वत्ता - मूर्खता श्रादि भिन्न वस्तु है. अर्थात् यह कोई सुविध ' निर्यम नहीं कि सभी मनुष्य सुकर्मा यो विद्वान हो, वैसे ही ब्राह्मणल भिन्न वस्तु है और ' विद्वत्ता और मूर्खता आदि भिन्नं वस्तु है । बो मनुष्य ब्राह्मण हो- वह सुकर्मा वा विद्वान् हो यह अधिकतया तो सम्भव है करेगा | व पर इसमें अनिवार्यता नहीं- ( इस विषय में न्यायदर्शनके १।३।१३ सुत्र- ' कर्मले व का वात्स्यायन - भाष्य देखा जा सकता है । ) विद्वत्ता और सुकर्मठा श्रश्रिम सम्बन्ध ब्राह्मणोंमें क्या, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्ध और चैरिटीलादि प आदिका सबमें सम्भव है । वादियोंकी नौतिसे तो सभा बनना चाह i इस. तब क्षत्रिय वैश्य चाण्डालादि तो कर्मोंसे कमें सभी घृणा करने लग जन्मसे होत ,, शूद्र, Gojarat. An egh, b है- वे ब्राह्मणेसि भी घृणा करने लग जायेंगे म

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३२८ श्रीसनातनधर्मालोकः: ( ४ ) ३२७ - सांसारिक व्यवस्था कहांसे चलेगी? इस प्रकार तो बड़ी हानि होगी सरेका और भारतवर्ष अवनत हो जायगा । तब उचित यह है कि- ' सहजं कर्म कौन्तेय! सदोषमपि न त्यजेत् । सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ' ( गीता १८:४८ ) ‘ स्वे - स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ' ( १८४५ ) स्वधर्मे निधनं श्रेयः पर--धर्मो भयावहः ( ३।३५ ) श्रेयान् स्वधर्मो विगुणोऽपरधर्मात् स्वनुष्ठितात् ' - वेदको ( १८४७ ) ' श्रुतिस्मृती ममैवाज्ञे यस्ते उल्लंघ्यं वर्तते । श्राज्ञाभङ्गान्मम ही द्वेषीस मे भक्तोपि न प्रिय: ' ( शं ० दि ० वि ० ) इन भगवद् - वचनोंको नान ही तथा ‘ घरं स्वधर्मो विगुणो न पारक्यः स्वनुष्ठितः ' ( मनु ० १०।१७ ) । ' उसमें ‘ आत्मीये संस्थितो धर्मो शूद्रोपि स्वर्गमश्नुते । परधर्मो भवेत् त्याज्यः नमें भी वस्थाके सुरूप- परदारवत् ' " अत्रि ० १८ ) इत्यादि स्मार्तं वचनोंको स्मरण करके बिस वर्णवाले पिताके घरमें जिसका जन्म हुआ है, वह उस वर्णके. नियत कर्मोंको करता हुआ व्यवहार करे । नहीं तो अपनी अपेक्षा उच्च-नुष्यत्व वर्णकें कर्मोंको अपनी उन्नतिको इच्छासे करता हुआ, अथवा श्रालस्य नह काई वा सुविधासे अपनी अपेक्षा श्रधम वर्णके कर्मेकोचाचाण करता हुआ जो मनुष्य संस्कार विरुद्ध होकर ' इती भ्रष्टस्तती नष्ट: ' ' इस न्यायको सार्थक भव है करेगा । तब उसकी जो दुरवस्था होगी - उसके चित्रका चरित्रणहमने सुकर्मता ' कर्मसे वर्ण - व्यवस्थामें हानि ' इस निबन्धमें किया है; उसे ' आलोक ' के डालादि श्रप्रिम पुष्पोंमें दिया जायगा । १. लग इस प्रकार हमने शास्त्रानुसार सिद्ध कर दिया कि- वणव्यवस्था करने जन्मसे होती है, कम से नहीं, पर न तो हमारा, न शास्त्रकाही यह CC - 0. Ankur Joshi कुछ भ्रमका परिहार ३०६ सिद्धान्त है कि — वह वह वर्णं अपने - अपने वर्ग कर्म को छोड़ दे । नहीं-नहीं, ऐसा नहीं । स्वस्ववर्ण - कम ही वर्णके स्वरूपकी रक्षा करते हैं-उसीले ब्यवस्था रहती रहती है है ' ॥ ' दूसरे वर्णके कर्मों की अपनाना अपने वर्णका ' स्वरूप नष्ट करके भारतवर्ष में अव्यवस्था उत्पन्न करना है । ब्राह्मणोंको ' पढ़ने - पढ़ाने आदि कर्मे, क्षत्रियों को राजकीय सम्बन्धी कर्मों तथा वैश्यों को वणिग्वृत्ति और शूद्रादिको सेवा - शिल्पादि - सम्बद्ध कर्मोंको अपनाना “ चाहिये । अन्य यह भी श्रावश्यक है कि आदिम तीन वर्ण अपनी -संस्कृत - भाषाको अवश्य पढ़ें, अपनी भाषाको भुलाकर अन्य विदेशी-भाषाओं में लगे रहना अपने वर्णाश्रमधर्म तथा तदाश्रित भारतवर्षको वैदेशिकोंके पदाक्रान्त होनेका निमन्त्रण देना है । इस यथार्थ बात पर - सब भारतीयोंको ध्यान देना चाहिये । ++++ Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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.. ( ११ ) मृतकश्राद्ध और ब्राह्मणभोजन हिन्दुधर्म - सम्मत वर्ण - व्यवस्थाका निरूपण करके अब उसके एक विषय - मृतकप्राद्ध का भी संक्षिप्त निरूपण किया जाता है । अर्वाचीन विचारधारा रखनेवाले व्यक्ति ' श्राद्ध ' जीवितोंका मानते हैं, मृतकका नहीं । वे जीवित पिता आदिको खिला देना ही श्राद्ध मानते है, उनके. स्थानापञ्च ब्राह्मणको खिलाना वे निरुपपत्तिक मानते हैं । इस विषयमें हम विस्तीर्ण - विचार अन्य पुष्पमें रखेंगे, आज इस विषय में कई श्रावश्यक बातें संक्षेपसे बतायी जाती हैं । ' विज्ञ ' श्रालोक ' पाठक इंघर अवधान दें । पितृश्राद्ध प्रतिमास हुआ करता है, यह बात शास्त्रीय संसारमें प्रसिद्ध हैं । इस विषयमें कुछ उद्धरण दिये जाते हैं । पहले वेदवचन देखिये –'तस्मात् पितृभ्यो मासि उपमास्यं ददाति ' ( अथर्व ० शौ ० सं०-८१२३५ ), ' परायात पितरः! अधा मासि पुनरायात नो गृहान् हत्रि-रतम् ' ( अथर्व ० १८ | ४ | ६३ ) । ' आश्वलायनगृह्यसूत्र ' में भी कहा है-' मासि मासि चैव पितृभ्योऽयुड प्रतिष्ठापयेत् ' ( २ | १ | १० ) । इस प्रकारः अन्य भी बहुतसे ग्रन्थोंमें कहा गया है । यह बात मृतक श्राद्ध में तो घटती है, जोवितश्राद्ध में नहीं, क्योंकि ' मासेन स्याद् अहोरात्रः पैत्रः ' ( १।४.२१ ) इस ' अमर - कोप ' के वचनसे और ' पित्र्ये रात्र्यहनी मास: " ( १।६६ ) इस ' मनुस्मृति ' के वचनानुसार मनुष्यों का मास ( महीना ) पितरोंका एक दिन - रात होता है । इस प्रकार प्रतिमास श्राद्ध करने पर पितरोंको वह भोजन प्रतिदिनकी तरह मिलता है । ' पर ( कृष्ण ) प श्राद्धं कुर्वीत ' इस कातीय श्रादसूत्र के अनुसार कृष्ण पक्ष में बाद इसलिए . मृतकवाद और ब्राह्मणभोजन । ३३२ किया जाता है कि ‘ पित्र्ये रात्र्यहनी मासः प्रविभागस्तु पक्षयोः । - यह चेष्टास्वहः कृष्णः शुक्लः स्वप्नाय शर्वरी ' ( मनु ० श ६६ ) इ पितृलोक कृष्णपक्ष पितरोंका दिन होता है और शुक्लपक्ष उनकी अपना प्र करती है । है, यह इसमें कारण यह है कि ' विधूर्ध्वभागे पितरो वसन्तः स्वाऽधः पूर्णिमा सुधादीधितिमामनन्ति । पश्यन्ति वेडकं निजमस्तको दशैं यतोऽस्माद् होता है द्य दलं तदैषाम् ' ( सिद्धान्तशिरोमणि गोलाध्याय चिप्रश्नवासना १३ श्लोक ) इससे पितृलोक चन्द्रलोकके ऊपर सिद्ध होता है । स्वामी दयानन्द अपने ' सत्यार्थप्रकाश ' के आठवें समुल्लास १४४ पृष्ठमें कह गये हैं— का एक सब [ सूर्य, चन्द्रं, तारे ' ] भूगोल लोक, इनमें मनुष्यादि प्रजा भी उतना ही रहती है । कुछ - कुछ श्राकृतिमें भेद होनेका सम्भव है । इस प्रकार गणना से यदि यहाँ से मरे हुए चन्द्रलोकमें जन्म लें, वे हमारे दिये अन्बादिको मध्यम म अपनी श्राकर्षण शक्तिसे खींच लें, तो क्यो यह असम्भव है? इस यही समय प्रकार यहाँ मृतर्कश्राद्ध की सिद्धि तथा सनातनधर्मकी विजय है । अस्तु । अन्तर है - जब चन्द्रमा शुकपक्षमें इस लोकमें अपना प्रकाश कर रहा होता उसी सूर्य हैं, तब वह सूर्यसे दूसरे कोनेमें होता है । तब पितृलोक में पन्द्रह दिन । इसी कार " तक निरन्तर एक रात्रि होती हैं । जब कृष्णपक्ष होता है, तब इस लोक हमारा सप में रातको शुक्लपक्षकी तरह प्रकाश नहीं होता, उस समय चन्द्रलोक सूर्यके मिनिटउन निकट होता है । तब पितृलौककी प्रजा पन्द्रह दिन तक निरन्तर ( कृष्ण लिया होग अष्टमी शुक्ल अष्टमी तक ) सूर्यको देखती है- इस प्रकार निरन्तर - • उनका एक दिन प्रातः के ६ से सायंके ६ तक ) होता है । अमावस्या को, जब सूर्य र चन्द्रमा एक राशिमें होते हैं, तब हमारे अपराह्न * स में सूर्यके चन्द्रलोकके शिर पर वर्तमान होनेसे, चन्द्रलोकके ऊर्ध्वस्य करती ह Collection Gujarat. An e भोजनकाल मध्याह्न होता है ।

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३३२ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) यहाँ पर पितृलोकका समयक्रम ' इस प्रकार जानना चाहिये— | को हमारा पितृलोक चन्द्रलोकसे ऊपर होता है — यह कहा जा चुका है । चन्द्रमामें अपना प्रकाश नहीं है, वह सूर्यकी एक सुषुम्णारश्मिसे प्रकाशित होता है, यह ‘ निरुक्त ' ( २।६ क्ष ३ ) के विद्वानोंसे तिरोहित नहीं है । हमारी जब पूर्णिमा होती है, तब सूर्य - चन्द्र लोकसे छः राशिके श्रन्तरमें बहुत दू स्वाऽपः ऽस्माद् होता है | तब चन्द्रलोकके ऊपर ठहरे हुए पितृलोकमें पूर्ण रात्रि होती = श्लोक ) अर्थात् तब पितरोंकी घड़ीमें रातके बारह बजते हैं । हमारा ३० दिन व्यानन्द का एक मास होता है, परन्तु चन्द्रके ऊपर रहते हुए उन पितरोंका, जा भी उतना ही समय सामान्यतया * २४ घण्टेका दिन - रात होता है । इस प्रकार गणना हमारी जो एक तिथि अर्थात् एक दिन है, वह पितरोंका बादिको मध्यम मानसे ४८ मिनट का समय होता है । हमारा एक घण्टा और इस वही समय पितरोंका दो मिनट होता है । इस अन्तरका कारण सूर्यका अस्तु । अन्तर है । जिस सूर्यको - हम तीस बार रात्रिके व्यवधानमें देखते हैं, होता उसी सूर्यको पितृगण रात्रिके व्यवधानमें निरन्तर एक बार देखते हैं । वह दिन । इसी कारण हमारा सम्पूर्ण दिन उनका प्रायः पौन घण्टा होता है, लोक हमारा सपाद दिन ( ३० घण्टे ) उनका एक घण्टा होता है, हमारे तीस सूर्यके मिनिट उनका एक मिनिटात्मक समय होता है । यह पाठकोंने समझ ( कृष्णा निरन्तर लिया होगा । नावस्या ह्निकाल ' सामान्यतया ' कहनेका तात्पर्य यह है कि तिथियोंमें क्षय वृद्धि हुआ कस्य हो करती हैं । तदनुसार उनका समय भी कुछ न्यून - अधिक हो जायगा । CC - 0. Ankur Joshi मृतकश्राद्ध, धौर ब्राह्मणभोजन ३३३ इस क्रमसे निश्चित हुआ कि श्रमावास्या पितरोंका मध्याह्नकाल है । इसलिए हम लोग श्रमावास्या अपराह्न में यहाँ पर प्रतिमास श्राद्ध करते हैं | पर हमारे शुक्लपक्ष में ( शुक्लाष्टमी से कृष्णाष्टमी तर्क, क्योंकि इस समग्रमें हम चाँदनी प्राप्त कर रहे होते हैं ) पितृलोकका सूर्यलोकसे दूरान्तर होनेसे उसमें रात्रि रहती है, हमारे कृष्णपक्ष में ( कृष्णपक्षकी श्रष्टमी शुक्लपक्ष की अष्टमी तक, क्योंकि इस समय हम चान्दनी ठीक-ठीक प्राप्त नहीं करते ) पितृलोक सूर्यसे क्रमशः निकट होता जाताहै, इसी कारण उसमें पूर्ण दिन रहता है । मासिक श्रमावास्यामें पूर्व कहे प्रकारसे मध्याह्न होनेसे उसमें पितृश्राद्ध होने पर पितरोंकी प्रतिदिन भोजनक्रिया हो जाती है । जीवितश्राद्ध स्वीकार करने पर तो प्रतिमास वैसा करने पर वे जीवित पितर क्या शेष २६ दिनोंमें भूखे रह सकेंगे? इस पक्षको माननेवालोंके मतमें मासिक श्राद्ध विधानकी शास्त्रीय वा वैज्ञानिक क्या उपपत्ति रहेगी! इससे उनका जीवितश्राद्ध भी निराधार ही है । केवल उनकी कपोल कल्पनाप्रसूत ही यह बात हो सकती " है । श्रस्तु । मासिक श्राद्धका वर्णन तो हो चुका, श्रश्विनमें जो वार्षिक हुआ करता है, उसका भी संक्षिप्त रहस्य बतलाते हुए हम पहले उनका समय - क्रम लिखते है कि शुक्लपक्षकी किस - किस तिथिमें पितरोंकी घड़ीमें कितना बना होता है और कृष्णपक्ष की किस तिथिमें पितरोंका क्या समय होता है. ' चालीक'- पाठक श्रवधानसे देखें-Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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३३४ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) शुक्लपक्षतिथि, पितरोंके , मध्याह्न घंटा २ " ३ 39 ४ I अपराह्न ६ " ७ ८ सायं ६ " १० रात्रि ११ " १२ " १३ " १४ ११ मध्यरात्रि पितरोंका समय - विभाग घं ० - मि ० कृष्णपततिथि, पितरोंके घं ० - मि ० १२।४८ मि ० 9 मध्यरात्रि घंटा १२।४८ मि ० ११३६ २ " १३६ २/२४ ३ " २१२४ ३/१२ -४ ३।१२ ४/० उषा [ ४१४६ २ ६, ४४८ २१३६ ७ 25 III: ६।२४ ८ प्रातः ६।२४ ७ १२ ७।१२ १० दिन ८४८ 77 ८ | ४८ ६/३६ १२, I ६/३६ १०२४ १३ " | १० | २४ ११।१२ १४ 35 ११/१२ १२/० ३० मध्याह्न १२/० इस समय विभाग से ' पित्र्ये रात्र्यहनी मासः प्रविभागस्तु पक्षयोः । ' कर्मचेष्टा स्वहः कृष्णः शुक्लः स्वप्नाय शर्वरी ' ( मनु ० ११६६, मनुष्यों का एक मास पितरोंका रात - दिन होता है । कृष्णपक्ष उनके कार्यके लिए होता हैं, शुक्लपक्ष सोनेके लिए ) यह सनातनधर्मका सिद्धान्त वैज्ञानिक ' होनेसे सत्य सिद्ध हुआ । यहां से मर कर गये हुए हमारे पितरोंकी स्थिति पितृलोकमें हुया करती है । तब हमें उनके मध्याह्नकाल में उन्हें भोजन पहुँचाना है । उसमें दो प्रकार हैं - एक तो यह कि हमें उनके CC - 0. Ankur Joshi Collection मृतकवाड और ब्राह्मणभोजन ३३५ ३३६ नामसे ग्निमें हविका हवन करना चाहिए । तभी अथववेद पितरों को खिलाने के लिए श्राह्नानार्थ श्रग्निसे प्रार्थनांकी " में मून कुछ न कि ' ये निखाता ये परोता ये दग्धा ये चोदिताः । गयी है । जै अग्नि श्रवह पितृन् हविषे अत्तवे ' ( शौ ० सं ० १८ २१३४ सर्वोस्तान् अग्ने! पाहावेवोपप बि , | ' महाभारत ' सद्विजो श्रादिपर्व में भी श्रग्निकी उक्ति है- ' वेदोक्तेन विधानेन ि है हविः । देवताः पितरश्चैव तेन तृप्ता भवन्ति ते ' ( ७/७ देवतानां यहू कहा च मुखमेवद् श्रहं स्मृतम् ' ( ७।१० ) अमावास्यां हि पितरः ) पौर्णमासा पितृ यां नहीं, ' गोप हि देवताः । मन्मुखेनैव हवनं भुक्षाते च हुतं हविः ' ( ७।११ ) । हवाइम विवेश ' ( अ दूसरा प्रकार यह है कि प्रग्निके सहोदरभूत ब्राह्मणकी जाठराग्निमें इस प्रकार ब्राह्मणके मुखके द्वारा उन पितरोंके नामसे कव्य दिया जाय । ' विद्यातप: - | १ | १ | ७ ) । समृद्धेषु हुतं विप्रमुखाग्निषु ' ( मनु ० ३६८ ) अंग्नि और ब्राह्मणी ने निरेव भी सात कहा सहोदरवार्मे प्रमाण यह है कि ब्राह्मण तथा श्रग्निकी विराट् पुरुषके मुख ऐतिहासिक से उत्पत्ति कही है, जैसे कि ' ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत् ' ( यजुः वा ० सं ० ३१।११ ', ‘ मुखादग्निरजायत ' यजुः वा ० सं ० २१।१२ ) । इसीलिए होने श्राचारवाले लग ग शास्त्रोंमें ब्राह्मणोंको आग्नेय वा अग्नि कहा गया है । तभी ' मीमांसा-दर्शन ' के १।४।२४ सुत्रके शावर भाष्य में ' श्राग्नेयो वै ब्राह्मण: ' पर ब्राह्मणो ( २४ देव ) प्रकाश डालने के लिए इस प्रकार प्रश्नोत्तर प्रक्रिया की गयी है ( प्रश्न ) कहती है-' श्राग्नेयेषु ( ब्राह्मणेषु ) श्राग्नेयादिशब्दाः केन प्रकारेण? ' ( उ ० ) गुण- मिमानिको चादेन । ( प्र ० ) को गुणवादः? ( उ ० श्रग्नि - सम्बन्धः । ( प्र ० ) कथम्! ( उ ० ) एकजातीयत्वाद् ( श्रग्निब्राह्मणयोः ) । ( प्र ० ) किमेकजातीयलं इस प्र [ तयो: ]? ( उ ० ) ' प्रजापतिरकामयत - प्रजाः सृजेयमिति स मुखतस्त्रि- प्रकारसे ब्राह वृतं निरमिमोव । तमग्निर्देवता अन्वसृज्यत ब्राह्मणो मनुष्याणाम् । । पहुंचाता है तस्मात् वे मुख्याः, मुखतोऽन्वसृज्यन्त ' । यहाँ पर अग्नि और ब्राह्म सूक्ष्म एकजातीयता स्पष्ट शब्दोंसे कहीं है । सूक्ष्मभूत भी Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालांक: ( ४ ) ३३६ प्रमाण भी देख लेने चाहिए । ' मनुस्मृति ' में लिखा हैं. कुछ अन्य हो तो ब्राह्मणको ही कव्य दे दे - ' श्रग्न्यभावे तु विप्रस्य कि अग्नि न ' यह कहकर वहाँ हेतु दिया गया है - ' यो ह्यग्निः विवोपपादयेत् अग्ने! ॥ द्विजो विप्रैर्मन्त्रदर्शिभिरुच्यते ' ( ३।२१२ ) । इसीलिए पिण्डोंके लिए महाभारत कहा है- ' गां विप्रमजमग्निषा प्राशयेदप्सु वा क्षिपेत् ' ( मनु ० ३।२६० ), यद् हू यहाँ अग्नि वा ब्राह्मणको खिलाना लिखा है । केवल ' मनुस्मृति ' में ही पितृ नहीं, ' गोपथब्राह्मण ' ( अथर्ववेद पै ० सं ० ) में भी कहा है — ' ब्राह्मणो र्णमास्यां ह वा इममग्नि वैश्वानरं बभार ' ( १२।१० ) । ' अग्निः “ ब्राह्मणाना-विवेश ' ( अथर्ब ० १६।५६२ ), ' कठोपनिषद् ' में भी ब्राह्मणका अग्नित्व इस प्रकार कहा है— ' वैश्वानरः प्रविशति श्रतिथिर्ब्राह्मणो गृहान् ' ठराग्निमें ( १ | १ | ७ ) । यहाँ पर श्रीस्वामी शङ्कराचार्यने भी कहा है – ' वैश्वानरोऽ— विद्यातप: - निरेव साक्ष तु प्रविशति अतिथिः सन् ब्राह्मणो गृहान् ' | ' भविष्यपुराण ' भी कहा हूँ - ' ब्राह्मणा ह्यग्निदेवास्तु ' ( ब्राह्मपर्व १३/३६ ) । इसका के मुन ऐतिहासिक प्रमाण ' महाभारत ' में देखना चाहिए । वहाँ पर निषादके व ० सं ० श्राचारवाले भी ब्राह्मणको निगलनेके समय गरुडके कण्ठमें अग्निदाह इसीलिए होने लग गया था, देखिये - आदिपर्व २६ अध्याय । ' साऽस्य देवता ' नीमांसा. ( १२।२४ ) इस सूत्र के व्याख्यानमें ' सिद्धान्तकौमुदी ' में ' श्राग्नेयो बैं ' पर ब्राह्मणो देवतया ' यहं श्रुति उद्धृतकी गयी है । इस पर बालमनोरमा ( प्रश्न ) कहती है- ' अग्निर्नाम यो देवताजातिविशेषो लोकवेदप्रसिद्धः, तद-- ) गुण मिमानिको ब्राह्मणः " " । कथम्! तीयत्वं इस प्रकार हो जाने पर पूर्व प्रकारसे साक्षात् अग्नि और दूसरे तस्त्रि • प्रकार से ब्राह्मणस्य वैश्वानर श्रग्नि उस कव्यको सूक्ष्म करके पितरोंको खाम् ॥ पहुंचाता है । वे पितर उस सूक्ष्म कव्यसे तृप्त हो जाते हैं, ‘ क्योंकि वे हाकी स्वयं सूक्ष्म शरीरात्मक होते हैं । इसी कारण उनके लिए स्थूलसे सूक्ष्मभूत भोजनकी श्रावश्यकता होती है । उसीसे उनकी तृप्ति होती है । CC - 0. Ankur Joshi मृतका और ब्राह्मणभोजन ३३७ इसको इस प्रकार समझना चाहिये - हम अपने मुख द्वारा स्थूल भोजनको अपने पेटमें भेजते हैं, परन्तु हमारा श्रात्मा सूक्ष्म है । उसके लिए सूक्ष्म भोजन अपेक्षित है । उस समय उस स्थूल भोजनको हमारी जाठराग्नि सूक्ष्म करके हमारे सूक्ष्म अन्तरात्माको सौंप देती है । उस सूक्ष्म तत्वसे हमारा सूक्ष्म श्रात्मा तृप्त हो जाता है । वहाँ पर वही अग्नि स्वयं ही वह कार्य कर रही होती है, हमें वहाँ कोई चिन्तात्मक व्यापार नहीं करना पड़ता । इस प्रकार सूक्ष्म पितर भी हमारे दिये स्थूल भोजन के अग्नि वा ब्राह्मणाग्नि द्वारा किये हुए सूक्ष्म तत्त्वको प्राप्त करके तृप्त हो जाया करते हैं । वहाँ पर ब्राह्मणाग्नि महाग्निके साथ मिलकर स्वयं ही उस कामको कर रही होती है, वहाँ पर उसके लिए ब्राह्मणोंको कोई व्यापार नहीं करना पड़ता । यहाँ पर इस प्रकार जानना चाहिये - इस विषय पर श्राप करने वाले आर्यसमाजी भी मानते हैं कि यज्ञसे प्रसन्न हुए देवता वृष्टि करते हैं । वहाँ उपपत्ति यह है कि जब हम अग्निमें हथ्य ढालते हैं, तब स्थूल अग्नि उस हविको जलाकर सूक्ष्म कर देती है और शान्त होकर स्वयं भी सूक्ष्म हो जाती है । तब वह सूक्ष्म श्रग्नि महाग्निके साथ मिलकर उस सूक्ष्म हविको लेकर अपने मित्र वायु श्रादिकी सहायता से श्राकाशाभिमुख जाती । श्राकाशमें ठहरे उन - उन देवताओंको बह हवि पहुँचा देती है । वे देवता उस हविसे तृप्त होकर प्रजाके हितके लिए और धान्य श्रादिकी उत्पत्तिके लिए दृष्टि कर देते हैं । जैसे कि ' मनुस्मृति ' में कहा हैं - ' श्रग्नौ प्रास्ताहुतिः सन्यनादित्यमुपतिष्ठते । आदित्याज्जायते वृष्टिः ' ( ३७६ ) जैसे कि इसका संकेत ' हविष्यान्त-मजरं स्वर्विदि दिविस्पृशि श्राहुं जुष्टमन ( ऋ ० १०८८१ ) इस मन्त्रमें मिलता हूँ । यहाँ दुर्गाचार्यने लिखा है- हविः पान्तं - देवानां च पुरोडाशादि निर्दग्धस्थूलभावमग्निना क्रियते स्वः श्रादित्यः तं चेति Collection, Gujarat. An eGangotri Initiative

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३३८ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) था s सौ वेदितव्यः- इति स्वविद् अग्निः । दिविस्पृशि - द्यामसौ स्पृशति हविरुपनयन् श्रादित्यम् ' । निरुक्त ७/२/१ ) । इसी प्रकार श्राद्धमें भी जब कव्यको अग्निका सहोदर ब्राह्मण वा अग्नि प्राप्त करता है, तब वह ब्राह्मणकी अग्नि उस हव्यको सूक्ष्म करके स्वयं भी सूक्ष्म होकर महाग्नि के साथ मिलकर श्राकाशाभिमुख चन्द्रलोकस्थ पितरोंको सौंप देती है । उससे वे पितर तृप्त होकर अपने माहात्म्यसे श्राद्ध करनेवालेके धान्य, सन्तान श्रादिको कर देते हैं । जैसे देवताओंको ' सोमाय स्वाहा, वरुणाय स्वाहा ' " इत्यादि मन्त्रोंसे दी हुई हविको वादियांक मतानुसार सूर्य खींचता है, वैसे ही पितरोंके उद्देश्य से दी हुई हविको चन्द्रमा खींचता है, अथवा सूर्य खींचकर अपनी सुषुम्णा रश्मिसे प्रकाशित चन्द्रलोक में ' भेज देता है, वह चन्द्र अपने में स्थित पितरोंको उक्त हवि पहुँचाता है । उस श्राद्धभोक्ता ब्राह्मणकी अग्नि मन्द न पड़ जाय जिससे महाग्निसे उसका मेल न हो सके - इसलिए धर्मशास्त्रोंने उस दिन कई विभषि-काएँ देकर उसे उस रात्रि मैथुनका विशेष करके शूद्धाले -मैथुनका निषेध किया है । 1 यही उसमें रहस्य है । वह अग्नि भी वेदादि शास्त्रोंके विद्वान्,. नदाचारी ब्राह्मणोंमें रहती है । शेष ब्राह्मणोंको ' भस्मीभूत ' ( मनु ० ३।६७ ) कहा गया है | इसलिए पितृश्राद्ध में मनुस्मृति आदिमें दोष-हीन, विशिष्ट ब्राह्मएको बुलाना कहा है । एक यह भी प्रश्न हो सकता है कि हम श्राद्ध रातकी तो करते नहीं, तत्र उसे श्राद्धको चन्द्रमा कैसे खींच सकता है? इस पर यह जानना चाहिये कि चन्द्रमां सूर्यकी सुषुम्णा नामक किरणसे ही प्रकाशित होता है । दिनमें जो श्राद्ध किया जाता है, उसे अग्नि खींचकर सूर्य-किरणोंमें ले जाता है । उसे चन्द्रमा खींच लेता है । जैसे चन्द्रमा सूर्य IC - 0. Ankur Joshi Collection मृतकश्राद्ध और ब्राह्मणभोजन ३४० की किरणको खींच लेता हैं, वैसे ही सूर्यकी किरणोंमें स्थित: ३३६ को भी खींचकर वह उस उस पितरको सौंप देता है । इसमें सूक्ष्म परमात्मा का स्मृति ' के निम्न पद्य भी सहायक हैं- ' यो द्रव्य देवतात्यागसम्भूतर ' याज्ञवल्क्य- उसकी व्या उत्तमः । देवान् संतर्प्य स रसो यजमानं फलेन च ' ( प्रायश्चित्ताध्याय कामें श्री यतिधर्मप्रकरणे ४, १२१ ) ' संयोज्य वायुना सोमं नीयते रश्मिभिस्ततः रे, अधिष्ठातृ ऋग्यजुःसामविहितं सौरं धामोपनीयते । १२२ । खमण्डलादसी । इत्यागमप्र सृजत्यमृतमुत्तमम् । यज्जन्म_सर्वभूतानामशनानशनात्मनाम् सूर्यः जिस प्रकार · इसमें कारण है सङ्कल्पकी महिमा, क्योंकि हम ' ( १२३ ) ) प्राप्त कराव के उद्देश्यसे सङ्कल्पित करके उस हविको तत्तत्- पितर पितरको श्र दिया करते हैं । देवता लोग हमारे मानसिक सङ्कल्पको जान लिया करते हैं । वेद भी इसका अनुमोदन जैसे हजारो देखिये –'मनो देवा मनुष्यस्य करता है, वैसे ही पु श्राजानन्ति मनसा सङ्कल्पयाति, तत् प्राणमभिपद्यते, प्राणो वातं, वातो देवेभ्य श्राचष्टे यथा पुरुषस्य मनः ' यही ( शतपथ ब्रा ० ३।४ । २ । ६ ) । इसी प्रकार ' अथर्ववेद ' में भी कहा है- विप्रतिपन्न ' मनसा सङ्कल्पयति, तद् देवान् अभिगच्छति ' ( शौ ० सं ० १२ | ४ | ३१ ) | लोकस्य पि सूर्य श्रादि देवता सब लोगोंका वृत्त जानते हैं, इसमें ' मनुस्मृति ' की भी देखिय साक्षी भी देखिये –'तस्तु देवाः प्रपश्यन्ति स्वस्यैवान्तरपूरुषः ' ( ८८२ ) यन्ते । त्वं ' द्यौभूमिरापो हृदयं चन्द्राऽर्काग्नियमानिलाः । रात्रिः सन्ध्ये च धर्मश्च ( अथर्व वृत्तज्ञाः सर्वदेहिनाम् ' ( ८८६ ) यहां पर सूर्य चन्द्रका भी लोगोंका वृत्त जानना कहा है । इधर चन्द्रमा तो मनका ही देवता माना जाता है । पितृशब्द श्राद्ध सङ्कल्प तो प्रसिद्ध ही है । लोकमपि सम्भवन्तु कई लोग देवताओंको जड़ मानते हैं, तब सूर्य - चन्द्र श्रादिकी सिद्ध हो किरणोंके भी जड़ होनेसे वे उस उस पितरको दिया हुआ कन्य कैसे पहुँचा सकते हैं? यह प्रश्न उनका हुआ करता है । उनसे पूछना चाहिये यह कि हम लोगोंके कर्म भी जढ ' हुआ करते हैं । वे भी अग्रिम जन्ममें तो विशिष्ट कर्ताको कैसे प्राप्त कर सकते हैं? यदि कहा जाय कि कर्मोंका अधिष्ठाता श्रमावास्या Gujarat. An eGangotri Initiative