सनातन धर्मालोक ४ — पृष्ठ 191–200

सनातन धर्मालोक ४ · पृष्ठ 191–200

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) ३४० ३३८ जड नहीं है, किन्तु सर्वव्यापक और चेतन है, तब तो देव-म श्रय परमात्मा अधिष्ठाता भी वही है । देवताथी तथा उनकी किरणों में भी वल्क्य- ताका व्यापकता स्वयं ही माननी पड़ेगी इसलिए उक्त मनुपद्यकी उसकी खोरस टीकामें श्रीकुल्लूकभट्टने भी लिखा है - दिवादीनां ( सूर्यादिदेवानां ) सा च शरीरिणी एकत्र श्रवस्थापिता तरसवै जानाति धिष्ठातृदेवतास्ति स्वतः । वेदान्तदर्शनं तद् श्रङ्गीकृत्येदमुक्तम् ' ( ६ ) । सूर्यः जिस इत्यागमप्रामाण्याद् प्रकार वह सर्वाधिष्ठाता देव उन - उन कर्मोंका फल उन - उनको २३ ) । प्राप्त कराता है, वैसे ही उन - उन देवताओं के अधिष्ठातृत्व में उस उस - पितर पितरको श्राद्धका फल प्राप्त कराता है, यह जान लेना चाहिये । ' श्रथवा नसिक जैसे हजारों गौओं में बछड़ा अपनी माताको प्राप्त कर लिया करता है, ता है, वैसे ही पुत्रकृत श्राद्ध भी पितरोंके पास उपस्थित हो जाया करता है । · , तत् यही मृतकश्राद्धका रहस्य है, जिसको न जानकर बादी इसमें -मनः ' विप्रतिपन्न होकर अपनी अल्पश्रुतताका परिचय देते हैं । अग्नि पितृ-1 ) 1 लोकस्य पितरोंको सुक्ष्म कव्य अर्पित करता है इसमें वेदमन्त्रोंकी साक्षी ' की भी देखिये –'ये श्रग्निदग्धा ये अनग्निदग्धा मध्ये दिवः स्वधया माद-यन्ते । त्वं तान् वेत्थ बति ते जातवेदः! स्वधया यज्ञं स्वधितिं जुषन्ताम् ' 5 ) ( श्रथर्व ० शौ ० सं ० १८।२ । ३५ ) । ' व सृज पुनरग्ने! पितृभ्यो यस्ते. श्व वृत्त श्रहुत रति स्वधावान् ' ( श्रथर्व ० १८/२/२० ) । वेदमें श्राद्धमें आया पितृशद मृतपितृवाचक है, इसीलिए चेदमें कहा है - ' पितृणां लोकमपि गच्छन्तु ये मृताः ' ( अथर्व ० १२ २ | ४५ ), ' अधा मृताः पितृपु सम्भवन्तु ' ( श्रथर्व ० १८।४४८ ) । इस प्रकार मृतकश्राद्धको वैदिकता दिकी सिद्ध हो गई । यह रहस्य है मृतकके मासिक श्राद्धका । शारदिक वार्षिक श्राद्ध वो विशिष्ट होता है । तब भाद्रपद पूर्णिमासे प्रारम्भ करके आश्विन की ता श्रमावास्या तक सब तिथियों में भिन्न - भिन्न पितर भोजन करते हैं । जैसे CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. मृतकश्राद्ध, और ब्राह्मणभोजन ३४१ हम कभी विवाहादि विशिष्ट अवसरों पर रात्रिके १२-१-२ श्रादि बजने के समय भी भोजन प्राप्त करते है, जन्माष्टमी श्रादिके अवसर पर भक्तगण श्राधी रातके समय उपवासका पारण करते हैं, इस प्रकार अपवाद होने से पितरोंके विषयमें शुक्लपक्षीय चयादि तिथिमं भी जानना चाहिए । वे पितर उस तिथिमें उस मार्ग में होते हैं । तिथियोंका सम्बन्ध चन्द्रमा से प्रत्यक्ष ही है । तिथियोंके तय वृद्धि चन्द्रानुसार ही होते हैं । शारदिक श्राद्ध भी पार्वण होनेसे विशेष पितरोंका विशेष पर्व ही समझना चाहिये । तब पितर रातके बारह - एक बजे भी भोजन प्राप्त करते हैं । स्वा ० दयानन्दजी और मृतकश्राद्ध श्रार्यसमाजके प्रवर्तक स्वामी दयानन्दजीके अनुसार भी मृतकश्राद सिद्ध है | देखिये - स्वामीजीने अपनी ' संस्कारविधि ' के गृहाश्रम -प्रकरणमें पितृयज्ञको बलिवैश्वदेवविधिमें पूर्व दिशामें इन्द्वके नामसे ग्रास रखाया है, दक्षिणमें यमके नामसे, पश्चिममें वरुणके नामसे, उत्तरमें सोमके नामसे ग्रास रखाया है । इस प्रकार अन्यान्य दिशाओं में अन्य देवताओंके नाम ग्रांस स्थापित किया है । दक्षिणमें स्वामी दयानन्दजीने ' ॐ पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नम: ' इस मन्त्रसे २१३ पृष्ठ ' संस्कार-' विधि ' में पितरोंके लिये ग्रास रखवाया है । श्रागे स्वामीजीने लिखा है-' यदि भांग धरनेके समय कोई अतिथि श्रा जाय, तो उसीको दे दे, नहीं तो अग्नि में घर देना ' । यहाँ पर प्रष्टव्य है कि उस ब्राह्मण श्रतिथिसे खाये हुए वे ग्रास इन्द्र, यम, वरुण, सोम, पितर श्रादिके पास प्राप्त होंगे या नहीं? यदि प्राप्त होंगे, तो सनातनधर्मका मृतक श्राद्ध भी उसी प्रकारसे सिद्ध हो गया | यहां भी ब्राह्मण खाता है, वह खाया हुआ भी पितरोंके पास पहुंचेगा । ब्राह्मणके न मिलने पर उसे अग्नि में डाल देना सनातनधर्मी भी मानते हैं । यदि स्वामीजी यह नहीं मानते, तो उनसे. An का eGangotri उक्त विधान Initiative भी अवैदिक सिद्ध हो गया । यदि वैदिक है, तो.

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३५२ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) मृतकश्राद्ध भी वैदिक सिद्ध हो गया, क्योंकि वहां भी पितृनिमित्तक भोजन ब्राह्मणको खिलाया जाता है, अथवा अग्निमें घर दिया जाता है । इस प्रकार हमारे पक्षकी स्पष्ट सिद्धि हो गयी । यहां पर स्वामी दयानन्दजीको भी मृतक पितर श्रभीष्ट हैं, जिनका भोजन अतिथिको दिया जाता है । श्रन्यथा यदि स्वामीजीको जीवित पितर यहां इष्ट होते, तो उनके नामसे दिये ग्रासको वे उन्हींको दिलाते, न अतिथिको खिलाते, न अतिथिके अभाव में उस ग्रासको अग्निमें धरने को कहते । जैसे इसके साथ ही स्वामीजीने लिखा है- ' कुत्ता, पतित, चाण्डाल, पापरोगी, काक और कृमि इन छः नामोंसे छः भाग पृथिवी में घरे और यह छ: भाग जिस - जिसके नाम हैं, उस - उसको देना चाहिए ' ( पृष्ट २१३ ) यहां पर कुत्ता आदि जीवित थे, इसलिए उनके नामसे रखा ग्रास स्वामीजीने उन - उनको दिलवाया है । इस प्रकार पितर भी यदि स्वामीजीको जीवित इष्ट होते, तो उनके नामसे रखा यांस उनको दिया जाता, न अतिथिको, न ही अग्निको दिया जाता । इस प्रकार स्वामी दयानन्दजीके मतमें भी श्राद्ध मृतकका सिद्ध हो गया । इधर स्वामीजी ' सत्यार्थप्रकाश ' ४ समुल्लास, पृष्ठ ६२ में कृमि श्रादिको धन इसलिए दिलाते हैं कि ' जो अज्ञात श्रदृष्ट जीवोंकी हत्या होती है, उसका प्रत्युपकार कर देना ' । तब क्या जीवित कृमियोंको अर्पण कर देनेसे वह अन्नादि मृतक कृमियोंको मिल जाता है या नहीं? यदि नहीं मिलता, तो श्रदृष्टजीवहत्याका प्रत्युपकार तो न हुया । यदि उनको अनादिका फल प्राप्त हो जाता है, तो स्वामी दयानन्दजीके मतमें भी मृतकश्राद्ध सिद्ध हों ही गया । CC - 0. Ankur Joshi Collection मृतकश्राद्ध और ब्राह्मणभोजन ३५४ ३४३ यदि इस पर कहा जाय कि स्वामीजीको जब मृतकश्राद्ध इति तब ' स्वधायिभ्यः ' इस मन्त्रमें कहे गये पितर जिनको वे इष्ट नहीं देशे बाह , दक्षिणम ग्र दिलवाते हैं-- मृतक कैसे हो सकते हैं? तो इस पर उड़कपूर्व यह जानना ' वैखानस चाहिए कि स्वामीजीने जो यह क्रिया लिखी है, वहाँ उन्होंने ' मनुस्मृति ' ' ( ३/८७६१ ) का नाम दिया है । पर ' मनुस्मृति ' पितृयज्ञमें जीवितश्राद् श्रन्यतमे । समवदा कहीं नहीं मानती, किन्तु मृतक पितृश्राद्ध हो ' मनुस्मृति ' को इष्ट हूँ ' । तब यहाँ जीवित पितरोंका अर्थ हो ही कैसे सकता है? सुतरां, यहाँ पर ( मनुस्म स्वामी दयानन्दजीके मतमें भी मृतकश्राद्ध सिद्ध हो ही गया । प्रथम पितरस्तृ ' सत्यार्थप्रकाश ' में तो वे मृतकश्राद्ध सोपपत्तिक दिखला ही चुके हैं । ( वैखान श्राद्धमें ब्राह्मण - भोजनके विषयमें पहले कुछ कहा ही जा चुका है, ( अथर्ववेद लोका अब उस विषयमें कुछ प्रमाण भी दिये जाते हैं - ' [ श्राद्धे ] भोजयेद्ग पर त्राह्मणान् ब्रह्मविदो योनिंगोत्रमन्त्रान्तेवास्यसम्बन्धान् ' ( श्रापस्तम्बधर्म-' ब्राह्मण । सूत्र २/१७१४ ) । ' बोधायनीय पितृमेधसुत्र ' में भी कहा हैं— ' पृथिवी ते भोक्तव्या पात्रं द्यौरपिधानं ब्राह्मणस्य त्वा विद्यावतः प्राणापानयोर्जुहोमि मा प्रेतस्यं क्षेष्टा श्रमुत्रामुष्मिन् लोके ' ( तै ० मं ० २।२० ) ( २।११।७ ) । इसी वैज्ञानिक प्रकार ‘ बोधायनीय गृह्यसूत्रं ' ( २।१० ३६ ) में भी कहा है । ' हिरण्य-पुष्प केशीय गृह्यसूत्र ' में भी कहा है – ' अमावास्यायामपराहूणे मासिकम् अपरपक्षस्य पितृभ्योऽन्नं संस्कृत्य... ब्राह्मणान् शुचीन् मन्त्रवत श्रामन्त्र-यते, ' पृथिवी ते पात्रं द्यौरपिधानं ब्रह्मणस्त्वा मुखे जुहोमि ब्राह्मणानाम् '. ( २० ४ । १०-११ ) । ' मानबगृह्यसूत्र ' में भी कहा है – ' श्राद्धमपरपत्रे Gujarat. An e पितृभ्यो दद्यात् श्रनुगुप्तमन्नं ब्राह्मणान् भोजयेत्, नाऽबेदविद् भुञ्जीत

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३५४ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) ३४२ · इति श्रुतिः ' ( २।१११-१० ) । ' गोभिलगृह्यसूत्र ' में भी कहा है –‘शुचौ इष्ट नहीं, देशे ब्राह्मणान् अनिन्द्यान् श्रयुग्मान् उदङ्मुखानुपवेश्य दर्भान् प्रदाय, ग्राम उदकपूर्वं तिलोदकं ददाति पितुर्नाम गृहीत्वा ' ( ४/२/२१, ४/३/१० ) । जानना ' वैखानसगृह्यसूत्र ' में भी कहा है- ' अथ श्राद्धं मासि मासि श्रपरपक्षे नुस्मृति ' श्रन्यतमेऽहनि ब्राह्मणनिमन्त्रणादि सर्वमष्टकावत् श्रन्नं पिण्ढायें पात्रे चेतश्राद् समवदाय ब्राह्मणान् भोजयित्वा ' ( ४७ ) । ' तं श्राद्ध ' भोजयेद् द्विजम् ’ इष्ट है ( मनुस्मृति ३।१३८ ) । ‘ ब्राह्मणान् यथातृप्ति भोजयेत् तेषु तृप्तेषु यहाँ पर पितरस्तृप्ता भवन्ति, वाग्यतान् भुञ्जानान् ऋचः पैतृकाः श्रावयेत् | प्रथम ( वैखानसगृ ० ४।४ ) । ' यां ते धेनु ं निपृणामि यमु ते क्षीरे श्रोदनम् ' हैं । ( अथर्ववेद शौ ० सं ० १८ / २३० ) यहाँ पर मृतकके निमित्त गोदान तथा चुका है, वीरका विधान है । ' इममोदनं निदधे ब्राह्मणेषु ' ( अथर्व ० ४.३४ / ८ ) भोजयद् यहाँ पर ब्राह्मणोंको ओदन देना कहा है । ' महाभारत ' में कहा है-स्वधर्म-' ब्राह्मण । एद सम्पूज्याः पुण्यस्वर्गमभीप्सता । श्राद्धकाले तु यत्नेन थिवी ठे भोक्तव्या श्रृजुगुप्सिताः ' ( वनपर्व ० २००१६-१७ ) इस प्रकार मृतक -श्राद्ध और ब्राह्मणभोजन जहाँ वेदशास्त्रसम्मत सिद्ध हुआ, वहाँ पर । इसी वैज्ञानिक एवं सोपपत्तिक भी सिद्ध हुआ । इस विषय में विस्तारसे भिन्न हिरण्य • पुष्पमें बड़ा निबन्ध दिया जावेगा । सिकम् नामन्त्र शानाम् ' परपत्रे -: -: -भुञ्जीत CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. ( १२ ) ' परलोक - विद्या ' सनातनधर्म अनादिकालसे आज तक मृतकों का श्राद्धतर्पण करता हुना परलोक - विद्याको जीवित रक्खे हुए है, पर अपने ही कई भारतीयों-ने इसे ढकोसला बताकर इस विद्यासे मुंह फेर रखा है । वैदेशिक वैज्ञानिकोंका हिन्दुनोंके इस झुकाव पर ध्यान पढ़ा । उन्होंने इसकी जांच प्रारम्भ कर दी । परीक्षणसे उन्हें मालूम पड़ा कि मरा हुआ पुरुष प्रभावको प्राप्त नहीं हो जाता, किन्तु मरनेके बाद उसकी स्थिति पर -, लोकमें हो जाती है. उत्तम माध्यमके द्वारा हम उससे सम्बन्ध करके उसका लाभ प्राप्त कर सकते हैं । हमारे देशी पुरुषों का भी इधर ध्यान पड़ा और उन्होंने इसमें पर्याप्त सफलता प्राप्त कर ली । वैदेशिक लोग सब परीक्षणों में अपना ही दृष्टिकोण रखते हैं । उनको ऐसा प्रतीत हुआ कि मृतकका जीव सदा परलोकमें ही रहता हैं, उसका इस लोकमें पुनर्जन्म नहीं होता । पर पुनः पुनः श्रवगाहनसे कई वैदेशिक लोग श्रब परलोकगतका इस लोक में पुनर्जन्म भी मानने लग पड़े है । अस्तु । सबकी शैलियां भिन्न - भिन्न होती हैं, वैदेशिकाने मृतकोंके श्राक-णार्थं अपने ढंगके उपाय जारी किये । हमारे पूर्वजोंने कुश, मधु, तिल, गङ्गाजल, तुलसीपत्र श्रादिका मृतकोंके आकर्षणार्थ उपयोग कर रखा है । अब इनका भी यन्त्र बनाकर निरीक्षण अवश्य करना चाहिये । हमारे पूर्वजोंकी सभी बातें परीक्षण - निरीक्षण करने पर सत्य सिद्ध हुई हैं । अस्तु । इस परलोक - विद्याका अपलाप नहीं किया जा सकता, अब यह प्रत्यत हो रही है! अभिज्ञजन इसमें उद्यत हो रहे हैं । इस विद्यासे An eGangotri Initiative

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३४६ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) कई लाभ होनेकी सम्भावना । वह यह कि हम स्थूल शरीर - युक्त होने से सीमित शक्ति वाले हैं, पर मृतक पुरुष स्थूल शरीर छूट जानेसे पारलौकिक दिव्य सूक्ष्म - शरीर मिलनेसे अलौकिक शक्तिशाली होते हैं । उनसे हम सम्बन्ध करके उस लोकोत्तर - शक्तिका लाभ उठा सकते हैं । घड़ेमें ढके ' दीपककी प्रकाशन - शक्ति सीमित होती हैं, घड़ेसे बाहर ठहरे दीपककी प्रकाशन - शक्ति अधिक रहा करती है । हम भी स्थूल शरीराच्छन्न होनेसे उस घटस्थित दीपककी तरह है, और परलोक - प्राप्त पुरुष उसके अप-वाद हैं । आत्मा के न्यायादिशास्त्र सम्मत विभुत्व का वही उपयोग ले -सकते हैं । मान लीजिये एक व्यक्ति बहुत बीमार है, हम उसका उपचार करके भी उसे स्वस्थ नहीं कर सके । उस समय यदि हम परलोकस्थ श्रात्मासे -सम्बन्ध करके उसकी दवाइयां पूछें, तो अधिक ज्ञानशाली होनेसे. उनसे बताई गई दवाइयां उस बीमारको हितकारक सिद्ध होंगी । इस प्रकारकी परलोकस्थं श्रात्माओंसे बताई गई चिकित्साए प्रायः सफल हो चुकी हैं । जब उसके हस्ताक्षर मिल जाते देखे गये हैं, उनकी बताई गुप्त धन गड़नेकी बातें मिल गई हैं उनके छायाचित्र गृहीत हो जाते हैं तो इस विद्यामें उन्नति करके हम कई लाभ प्राप्त कर सकते हैं । इन बातोंके खण्डनसे तो कुछ मिलेगा नहीं, उस विषयमें श्रद्धा करनेसे सत्यताका -ज्ञान होगा । वेदमें लिखा है- ' श्रद्धया सत्यमाप्यते ' ( यजुः १६ । ३० ) ' भगवद्गीता ' में लिखा है- ' श्रद्धावान् लभते ज्ञानम् ' ( ४३६ ) । श्रतः श्रास्था रखकर इस विषयमें उन्नति करनी चाहिए । हमारे प्राचीन लोग भी इस विषयको कि मृतक व्यक्ति परलोकमें निवास करते हैं, और उनको हम यहां भी बुला सकते हैं, मान गये हैं । जनक-नन्दिनी सीताकी जब लङ्का - विजयके बाद श्रग्नि - शुद्धि की जा रही थी, • उस समय परलोकसे श्राये हुए राजा दशरथने भी सीताकी शुद्धि में साक्षी दी थी । श्रतः स्पष्ट है कि यह विषय निर्मूल नहीं । CC - 0. Ankur Joshi Collection परलोक - विद्या | ३४ = ३५७ इस विषय में एक यह बड़ा लाभ होगा कि फिर लोकम जायगा । अन्य लाभ यह होगा कि हमारा सम्बन्धी जिसके मृत्यु - भय ( ३२२ मानते हैं कि यह हमसे सदा के लिए बिछुड़ गया, फिर लिए हम पहले इसे हम उसे कभी य मिल नहीं सकेंगे; ग्रह बात गलत हो जायगी । उसे हम फिर अपने विषय निकट पायेंगे | फिर श्राद्ध - तर्पण यह हमारा सनातनधर्मका सिद्धान इस ' जो श्राप्तवचन होनेसे अब माना जाता है, वह प्रत्यक्षानुगृहीत · से– ' प्रत्यक्षे किं प्रमाणान्तरेण ' इस न्यायसे हमें उसे विपक्षियोंके हो सामने जाने सुझाव दिन सिद्ध करने के लिए बहुत प्रयत्नकी आवश्यकता न पड़ेगी । श्रतः परलोक- कृपा करेंग विद्याके ज्ञानकी अवश्य ही श्रावश्यकता है, इसके उन्नत हो जाने पर शास्त्र फिर हम स्वर्गीय देवताओंसे भी बातचीत कर सकेंगे । ऐसा सिद्ध हो कहा ' म -जाने पर फिर सनातनधर्मके सभी एतद्विषयक सिद्धान्त प्रत्यक्ष सत्य ( १२/३१ सिद्ध हो जायेंगे । के भूमण्डल ठहरे चन्द्रल कई सनातनधर्म - प्रोक्त बातें वर्तमानमें प्रचलित न होनेसे अवश्य ही " श्राकर्षण का - कठिन वा बुद्ध्यग्राह्य मालूम होती हैं, पर हमारे सनातन ऋषि - मुनि ( यजु: १- बहुज्ञ थे, अतः उनकी बातें जो पहिलें, लोगोंको अनुभूत नहीं थी- श्रव यज्ञे स्वधय ' अनुभव - गोचर हो रही हैं । जो अभी अनुभवमें नहीं थाई, वें भविष्यत् वा संवाद मैं अनुभव - गोचर हो जायेंगी - इसमें सन्देहका कोई अवसर नहीं । पितरः ' इस ' देर है अन्धेर नहीं ' । ओषधि श्रार्यसमाजी हमारी अपेक्षा पितरोंमें अधिक शक्ति रहती है । उनकी अपेक्षा सम्पत्ति के देवताओंमें अधिक शक्ति रहती है । देवताविषय बहुत जटिल है - पई ठीक है । आरम्भ में पितृविषय भी बहुत जटिल था । सनातनधर्मियांके ' प्रश्न य अतिरिक्त कोई भी इस विषयको कि- ' पितरोंका श्राह्नान तथा आकर्षण वॉचनेका ' एवं उनका यहाँ आगमन और संवाद और उनसे हमारा संरक्षण होता और चन्द्रक " है— नहीं मानता था । इतिहास - पुराण में मृतक दशरथ आदिका Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) ३४ = ३५७ लोक का वर्णन आया है - पितृन् श्रतीतान् श्रक्रस्मात् पश्यति ' -भय ( ३१२२ ) ' योगदर्शन'के इस व्यासभाष्य में भी यह संकेत आया है— लिए हम पहले इसे कोई भी नहीं मानता था । जब अनुसन्धाता लोगोंकी गवेष-उसे कभी वासे यह विषय समूल सिद्ध हो रहा है, बहुत कुछ सफलता भी कर अपने इस विपयमें प्राप्त हो चुकी है, तब श्रागे अनुसन्धाताओं का देवतावाद सिद्धान की ओर ध्यान भी बढ़ेगा । जैसे पितरोंने अपने जाननेके लिए हमें हो जाने सुझाव दिये, सुविधाएं दीं, प्र ेरणाएं कीं, वैसेही देवता लोग भी सामने कृपा करेंगे । परलोक-जाने पर शास्त्रानुसार पितृगण चन्द्रलोकके पृष्ठ पर रहते हैं । चन्द्रग्रहकी सिद्ध हो वा ' मन्दाऽमरेज्यभूपुत्रसूर्य शुक्रेन्दुजेन्दवः । परिश्रमन्त्यधोधःस्थाः, सत्य ( १२/३१ ) इस ' सूर्य सिद्धान्त ' के वचनानुसार सब ग्रहोंसे निम्न और भूमण्डलके सर्वथा निकट है । तभी भूमण्डलके निवासी उसके साथ-ठहरे चन्द्रलोकके पृष्ठ पर रहने वाले पितरोंका यथाशक्ति श्राह्नान वा वही श्राप करने में शीघ्र सफल हो गये हैं । वेदमें भी ' श्रयन्तु नः पितरः ' पि - मुनि ( यजु: १६५८ ) इत्यादि मन्त्रोंसे पितरोंका श्राह्वान तथा ' अस्मिन् श्री- अव बज्ञ स्वधया मदन्तः ' से तृप्ति, ' अधिब्रुवन्तु ते ' से पितरोंका हमें उपदेश नविष्यत् वा संवाद ' ते अवन्तु अस्मान् ' से हमारी पितरों द्वारा ' पान्वि रक्षन्ति इति नहीं । पितरः इस व्युत्पत्तिसे ( हमारे किसी बीमार आदिके स्वास्थ्यार्थ उत्तमः घोषधि श्रादि बताकर ) रक्षा करना प्रसिद्ध है । पितरोंके श्राकर्षण पर श्रार्यसमाजी विद्वान् श्रीरघुनन्दनशर्माने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ' वैदिक अपेक्षा सम्पत्ति के ३७१ पृष्ठ पर प्रकाश डाला है । वे लिखते हैं-ड- यह मियां ाकर्षण ' प्रश्न यह है कि चन्द्रलोकसे जीवोंको किस प्रकार खींचा जाय । जीवोंके -होता सींचनेका वही तरीका है, जो सूर्यकान्त मणिके द्वारा सूर्यतापके खींचने में । और चन्द्रकांत मणिके द्वारा चान्द्रजल के खींचने में प्रयुक्त किया जाता है । का इस CC - 0. Ankur Joshi परलोक - विद्या I जिस प्रकार चन्द्रकान्तके प्रयोगसे चान्द्रजलकी प्राप्ति होती है, उसी प्रकार चान्द्र पदार्थोंको एकत्रित करनेसे चान्द्रवीर्य भी प्राकर्षित होता है । चान्द्रवीर्य में ही जीव रहते हैं. इसलिए उन पदार्थों में खिंच श्राते हैं, जो चन्द्राकर्षण के लिए, विधिसे एकत्रित किये जाते हैं । वे पदार्थ दूध, घृत, चावल, मधु, तिल, रजतपात्र कुश, [ तुलसीपत्र ] और जल हैं । यह प्रक्रिया शरत् - पूर्णिमाकै दिन लोग करते हैं । परन्तु विधिपूर्वक क्रिया तो पितृ श्राद्ध के समय होती है । पितृ श्राद्ध अपराह्णके समय होता है । उसमें दूध, घृत, मधु, कुश आदि सभी पदार्थ रखे जाते हैं, " पितरोंका प्रतिनिधि पुत्र अथवा पौत्र भी उन पदार्थों को छूता हुआ वहीं पर बैठता है । इसलिए यह सब हवि श्रादि सामग्री उसी प्रकारका यंत्र बन जाती हैं, जिस प्रकार चन्द्रमणि । इसी में पितर खिंचकर श्राते हैं । " परायात पितरः! सोम्यासो ' ( अथर्व १८ । ४ । ६३ ) ' । आर्यसमाज के प्रमुख श्रीगङ्गाप्रसाद एम. ए. ( कार्यनवृत्त मुख्य-न्यायाधीश जयपुर ) भी मृतकका परलोकमें निवास तथा उसका बुलाने पर उपस्थित होना आदि मानते हैं । उनका इस विषयका ' मृत्युके पश्चात् जीवकी गति श्रर्थात् पुनर्जन्मेका पूर्वरूप ' लेख श्रार्यसमाजकी प्रधान - संस्थाके ' सार्वदेशिक ' पत्र ( सितम्बर - अक्टूबर १६४६ के श्रङ्क ) -मैं देखने योग्य है । उसमें उन्होंने श्रार्यसमाजियोंसे जीवके तुरन्त पुन-' जन्ममें दिये जाते तृणजलौका न्यायका भी अच्छा उत्तर दिया है । भूमण्डलके निकट होनेसे ही वैज्ञानिक लोग भी विमानोंसे चन्द्र--लोककी यात्रा करनेकी सोचा करते हैं, पर देवता द्युलोक न्य विभागों में रहा करते हैं । इसमें सन्देह नहीं कि वे हमसे पितरोंकी अपेक्षा बहुत दूर हैं । हमारा एक मास पितरोंका दिन - रात होता है, हमारा एक वर्ष देवताओंका दिन - रात होता है, परन्तु यदि हमारा विज्ञान Collector, Gujarat. An eGangotri Initiative

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३५० श्रीसनातनधर्मालोकः ४ ) बढ़ता गया, तो हम पितरोंकी तरह देवताओंके भी निकट हो जाएंगे । कुन्तीको दुर्वासा दिये हुए मन्त्रोंसे सूर्य, यम, वायु, इन्द्र, अश्विद्वय ये देवता आये थे - यह प्रसिद्ध ही है । स्वामी श्रीशङ्कराचार्यने ' वेदान्तदर्शन ' के १/३/३३ सूत्रके भाष्यमें लिखा है कि व्यास आदि, देवताओंसे प्रत्यक्ष व्यवहार करते थे ' भवति हि श्रस्माकमप्रत्यक्षमपि चिरन्तनानां प्रत्यक्षम् । तथा च व्यासादयो देवादिभिः प्रत्यक्षं व्यवहरन्तीति स्मर्यते । यस्तु ब्रूयाद् - इदानीन्तनानामिव नास्ति चिरन्तनानां देवादिभिर्व्यवहतु सामर्थ्यम् इति स जगद् - चैचित्र्यं प्रतिषेधेत् ' । इसी कारण ही पुराण- इतिहास में भी जो देवताओंका भूलोक में आना बताया गया है, वह इसी बातको सिद्ध करता है कि-हमारे पूर्वज महानुभावोंको देवताओंके बुलानेकी विद्या भी ज्ञात थी ।, इस प्रकार यह विज्ञान बढ़ता गया, तो देवतावादकी जटिलता भी अवश्य हट जायगी । हमारे दशरथ आदि राजा अपने रथों - द्वारा देव-लोकों में जाया करते थे; आजकलके नहीं जा सकते । देवताओंकी अलौकिक शक्ति से सभी वेदादिशास्त्र पूर्ण हैं । जैसे सनातनधर्मी पिके भक्त हैं, वैसे देवताओं के भी; क्योंकि देवता भी उन्होंके पूर्वज हैं । अब यदि प्रयत्नसे पितृवाद कुछ सुलझ गया है, तब समय पर देवतावाद भी सुलझ जायगा । देवता लोग स्वलोकोत्तर-शक्तिवशात् मनुष्यके मनका अभिप्राय जान जाते हैं, ऐसा शास्त्रों में वर्णन आया है । जैसे कि - ' मनो देवा मनुष्यस्य श्राजानन्ति, मनसा संकल्पयति, तत् प्राणमभिपद्यते प्राणो चातम्, व्रातो देवेभ्य श्राचष्टे, यथा पुरुषस्य मनः ( शतपथ ३,४ / २ / ६ ) मनसा संकल्पयति, तद् देवान् श्रपि गच्छति ( अथर्ववेद सं. १२/४/२१ ) तभी पूर्वकालमें मानसिक शक्तिकी प्रबलतासे यज्ञोंमें देवताओंका श्राह्वान किया जाता था । वे साक्षात् श्राते थे । ' महाभाष्य ' ने भी इसका संकेत दिया है— इन्द्र एकानेकस्मिन् क्रतुशते श्राहृतो युगपत् सर्वत्र भवत ' ( १२।६४ ) CC - 0. Ankur Joshi Collection परलोक - विद्या ३०२ देवता विद्वान् मनुष्याका नाम भी नहीं हो सकता । प्रमाणोंसे निराकरण किया जा सकता है, जिन्हें श्रागे निबन्धरूपमें इसका बहुत दाहिने लिखा जायगा । जब यह विद्या उन्नत हो जायगी तो इसका भी शक्तिसे तथा शास्त्रीय अन्य साधनोंसे पितरोंकी, मानसिक रहता है, उ तरह देवताओंको भी बुलाया जा सकेगा जैसा कि तपस्याओंसे पुराकालमें और उत्तरप जाता था । देवता तथा पितर यद्यपि दोनों इस परलोकस्थ पदार्थ हैं, तब दोनोंका एक गोबलीवर्द - न्यायसे दोनोंका नाम - भेद कारिका’के ‘ अष्टविकल्पो दैवः " ( २३ ) सर्ग भी दैवसर्गके ही अन्तर्गत माना उन्हें बुलाया सूर्य द नत रहती लोककी वस्तु नहीं हैं, दोनों पृथिवी ही नाम होना चाहिये, तथापि उसी उसी हुआ करता है । ' साङ्ख्य- और देवत्व इस वचन के अनुसार तो पितृ- किरणें पूर्वो जाता है । ' गोवलीवर्द ' न्याय वस्तु पूर्वोत का भाव यह है कि - ' गावोपि समागताः, बलीवर्दोपि समागतः । ( बाएं क ' गो ' बैलका नाम है, वलीवर्द भी बैलका ही नाम है, श्रन्तर यह है कि पितृलोकसे बलीवर्द सोडको कह दिया जाता है और ' गो ' ' साधारण बैलको । इस जब सूर्यक दलके अन्तरसे नामका भी भेद हुआ करता है, इसी प्रकार देव और शक्तियों को पितरोंमें भी भेद समझना चाहिये । कर्मानुसार जो दक्षिण मार्ग जा एक दिशा हैं, वे पितर कहाते हैं, जो उत्तर मार्गसे परलोकमें जाते हैं, वे देवता विशुद्ध प कहाते हैं | दक्षिण शीतका घर है, अतः दक्षिणस्थ पितर भी कुछ कम तक विक बल वाले होते हैं । उत्तर उष्णताका घर है, अतः उत्तरमार्गस्थ देवा ( दाहिने ) भी: उनसे अधिक बल वाले होते हैं । हम उनके मध्य वाले हैं, श्रुतः जैसे उन दोनोंसे थोड़े वल वाले हैं इसलिए हमें इन्हीं दोनों पितरों एवं स्थान देवताका या अपेक्षित होता है । होनेकी श्र के साथ ह देवताओंका कृत्य पूर्वाह्न में यज्ञोपवीतको बाए कन्धे पर रखकर है । जैसे पूर्वोत्तराभिमुख किया जाता है, और पितरोंका कृत्य यज्ञोपवीत - सूत्रको • ही कोई Gujarat An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) ३५१ ३०२ का ताहिने कन्धे पर रखकर दक्षिणाभिमुख पराहू में किया जाता है । बहुत अन्धरूपम है | प्रातःकालसे मध्यान्ह तक सूर्य पूर्वोत्तर दिशा में मानसिक इसका भी रहस्य किरणें दक्षिण - पश्चिमाभिमुख नत ( झुकी! रहती है, रहता है, उसकी उन्नत । मध्यान्हके बाद यह क्रम बदल जाता है । 1 धौर उत्तरपूर्वाभिमुख दिशामें प्राप्त हो जाता है, उसकी किरणें उत्तराभिमुख बुलाया तब सूर्य दक्षिण नत रहती हैं दक्षिण में उन्नत । पृथिवीसे किरणों द्वारा खींचा हुआ द्रव द्रव्य ( भोजनादिका रस ) हैं, दोनों दिशाम जाता है । यही कारण है कि- उत्तर मार्ग प्राप्त - तथापि । उसी और उसी देवत्वको प्राप्त हुनक यज्ञ पूर्वाह्न में किये जाते हैं जब कि सूर्यकी साइएय- किरणें पूर्वोत्तराभिमुख उन्नत हों, जिससे उसकी श्राकर्षण शक्तिसे खिंची तो पितृ- वस्तु पूर्वोत्तर दिशामें जा सके । उस समय यज्ञोपवीतको भी उत्तर स्कन्ध ' न्याय ( बाएं कन्धे ) में करना पड़ता है । इस प्रकार दक्षिण दिशा में स्थित. नागतः पितृलोकसे । सम्बद्ध श्राद्ध श्रादि कृत्य भी मध्याह्नके बाद हुया करते हैं, को जब सूर्यकी किरणें दक्षिणाभिमुख उन्नत होवें । शारीरिक - मानसिक । इस शक्तियाँको दक्षिणमें उन्मुख करनेके लिए उन्हें सूर्य की किरणोंके साथ देवर से जाते एक दिशा में करने के लिए वैदिक विधि के अनुसार श्रविगुण कर्मके द्वारा विशुद्ध पूर्व उत्पादनार्थं उसे दक्षिण दिशां स्थित पितृलोकके पितरों कुछ कम तक अविकल पहुंचानेकेलिए पितृकर्मके समय यज्ञोपवीतको दक्षिण थ देवा ( दाहिने ) कन्धे पर करना श्रावश्यक होता है । जैसे ' येतारका तार ' भेजनेके समय एक स्थानकी विद्युद् - धाराको न्तरों एवं दूसरे स्थानमें ठीक प्राप्त करानेके लिए बिजली के खम्भोंके एक सीध में होनेकी श्रपेक्षा होती है, वैसे ही देव- पितृलोकके कार्योंमें भी सूर्य किरणों के साथ ही शारीरिक एवं मानसिक शक्तिका एकमुख होना भी आवश्यक रखकर है । जैसे ' बेतार का तार ' भेजने में बिजली न वो प्रत्यक्ष दीखती हैं, न सूत्रको ही कोई विकार होता है, फिर भी उसका प्रभाव उसी स्थानमें होता है, CC - 0. Ankur Joshi जिस स्तम्भके द्वारा उच्चारित कव्यकि सूक्ष्म को पहुँचा'ही उस कर्मका परलोक - विद्या ३५३ साथ उसका एक मुखत्व है, इसी प्रकार विशुद्ध, स्वरवर्ण वेदमन्त्रसे उत्पन्न शक्ति, अप्रत्यक्ष होने पर भी हव्यों-जलीय श्रंशकी सूर्य किरण द्वारा अभीष्ट देवता वा पितरों देती है । यज्ञोपवीतको दक्षिण वा उत्तरके समक्ष सहायक श्रङ्ग हैं । पितृकार्य अमावस्या करना श्रादिमें करना पड़ता है, अतएव यज्ञोपवीतको दक्षिण कन्धे में भी तभी करना पड़ता हूँ, पर साधारण दशा में हमें देवी सम्पत्तिका सय ही " हूँ, अतः यज्ञोपवीतको भी सदा उत्तर अपेक्षित होता ( बाएँ ) कन्धे पर ही रखना पड़ना है । Collection Gujarat. ' श्रायन्तु नः पितरः सोम्यासोऽग्निष्वात्ताः पथिभिर्देवयानैः । श्रस्मिन् यज्ञे स्वधया मदन्तोऽवित्र वन्तु तेऽवन्तु श्रस्मान् ( यजुर्वेद वा ० सं ० १६१८ ) इस मन्त्रसे प्रतीत होता है कि - पितरोंको स्वधासे तृप्त करनेका विचार करनेसे ही वे हमारे श्राह्नान पर हमारे यहां आते हैं; और वे हमसे संवाद ( ग्रधित्र वन्तु ) करते हैं, और हमें उत्तम उपायों को बताकर पितृ नामको ( पाति- रक्षति इति ) सार्थक करते हुए हमारी रक्षा भी करते हैं । इस अवसर पर माध्यम भी उत्तम होना चाहिये । धाड भी पूर्व समयमें उन्हीं माध्यमांचे प्रयोगकर्ता वैज्ञानिक ब्राह्मणोंको खिलाया जाता था । श्राद्ध विधिके अनुसार सुचरित्र, वेदादिशास्त्रांका विद्वान्, बहुभाषा - प्रबोण, पितृ - कर्मनिष्णात ब्राह्मण श्रथवा उसी वर्ण का उसका दौहित्र ही माध्यम रखा जावे; चरित्रभ्रष्ट, निम्नवर्ण श्रश्रद्धालु, अविद्वान्, ब्राह्मण माध्यम नं रखा जावे । इस कर्म में मृतक के पुत्र, पौत्र वा प्रपौत्रका सम्पर्क अवश्य होना चाहिये, उन्हें श्रद्धालु भी होना चाहिये । पितरोंके श्राह्नान के समय श्रमावास्या आदि तिथिका नियम कृष्ण-का नियम, अपराह्नकालका नियम, यज्ञोपवीतके दक्षिण स्कन्ध में An eGangotri Initiative

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३५४ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) करनेका नियम, तिल, घृत, मधु, तुलसीपत्र, गङ्गाजल - युक्त श्रोदनका तथा रजतपत्रका उपयोग भी शास्त्रानुकूल अनुसृत किया जाना चाहिये | हाँ श्राश्विनके दिनोंमें मृतककी मृत - तिथिके अनुसार भी पितरों का आह्वान हो सकता हैं, अथवा क्षयाह वाले दिन भी मृतकका श्राह्नान हो सकता है । उसका कारण यह है कि- पितृलोक चन्द्रलोक पर है, जैसे कि पूर्व कहा जा चुका है । श्राश्विनके दिनोंमें चन्द्रमा अन्य मासों-की अपेक्षा पृथिवीके अधिक निकट होता है, इसलिए उसकी आकर्षण-शक्तिका प्रभाव पृथिवी तथा उसमें अधिष्ठित देहधारियों पर विशेष. रूपसे पड़ता है । तब चन्द्रलोकस्य पितरोंका भी हमसे सम्बन्ध होकर परस्पर आदान - प्रदान हो जाता है । क्षयाहकी तिथिमें वे पितर सीधे उसी मार्ग होते है, क्योंकि - तिथि चन्द्रगतिके अनुसार हुआ करती हैं और उस तिथि में वे पितर चन्द्रलोकके उसी मार्ग में हुआ करते हैं जिस तिथिमें वे मृत्यु प्राप्त कर उस स्थानमें प्राप्त हुए थे । नियत तिथिमें पितरोंके बुलाने वा श्राद्ध का रहस्य- हमने बता दिया, उसमें कृष्णपक्षका रहस्य भी गतनिबन्धमें बता दिया गया है । जब faint निद्रा समय हो - उस समय उनका श्राह्वान नहीं करना चाहिये । क्योंकि उस समय वे बिना श्राश्विन मासके अन्य मासमें संवाद नहीं करना चाहते । उस समय कई अन्य निकृष्ट भूतादि ही हमारे साथ संवाद कर रहे हों यह सम्भव है । तीन पीढ़ीसे अधिक-के पितरोंको संवादके लिये नहीं बुलाना चाहिये, क्योंकि वे उस समय चन्द्रलोकमें नहीं होते, अन्य लोकोंमें चले जाते हैं । पितृकोटि में न रह कर देवकोटिमें चले जाते हैं । उनको बुलानेके लिए शास्त्रीय, अन्य उपाय अवलम्बित करने पड़ेंगे । कई मृतक तो श्रारम्भ में ही पितृकोटि परलोक - विद्या में न जाकर परलोकके निम्नस्तर नरकादिमें जाते हैं । वहाँ उनको बहुत अशान्ति रहती हमारे पूर्वज जिस बातको प्राध्यात्मिक करते थे, पाश्चात्य वैज्ञानिक उसी बातको ३५५ वा भूत - प्रेतादियोनि में हमें है । ' उदारच प्रकारले जनाका तथा मन्त्रशकि अधिभौतिक श्राद प्रकारले यन्त्र - शक्तिसे करते हैं । पूर्वीय प्रकारका अवलम्बन करने तथा हमें " उप पर शास्त्रों पर दृढ निष्ठा रहती है, श्रद्धा - विश्वास बना रहता है, प्रास्तिकता बनी रहती है, निःस्वार्थता बनी रहती है; उसमें स्वराज्य स्वतन्त्रता, तथा अपना देशिकेती होती है, परं पाश्चात्य यन्त्र - शक्तिका उपयोग करने पर अनास्था, शास्त्रों लाभप्रद पर अविश्वास, तपः - शक्ति पर अप्रत्यय, स्वार्थ भाव, विदेशी पर निर्भरता, करनेमें । तथा परतन्त्रतादि दोष रहते हैं । F I श्यक दि हम जो नई गवेषणा करते हैं, वा दूसरोंको चमत्कृत करने वाली बातें कहते हैं, देवता वा पितर ही हमें वह ज्ञान देकर हमसे वैसा कहलवाते वा लिखवाते हैं । ' महाभारत ' में कहा है - ' न देवा दण्ड-मादाय रक्षन्ति पशुपालवत् । यं ते रक्षितुमिच्छन्ति बुद्ध्या संविभजन्ति तम् ' ( उद्योगपर्व ३४८० ) देवता पशुपालकी तरह डण्डा लेकर मनुष्यकी रक्षा नहीं करते । जिसकी वे रक्षा करना चाहते हैं, उसको बुद्धिसे संयुक्त कर देते हैं ' । इसीलिए कहा है- ' विनाशकाले विपरीत-बुद्धि: ' । पितर भी देवताओं में अन्तभूत हैं - यह पूर्व कहा ही जा चुका है । यदि हम उन देव - पितरोंकी वैध पूजा करें, तो वे हम पर श्रवश्य ही प्रसन्न होकर हमें नये - नये उपदेश वा वरदान दें, जिनका CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातन धर्मालीके ( ४ ) ३५५ अपने लेखों वा वक्तव्योंमें उपयोग कर अपने सम्बन्धियों में चले हमेंउदारचरितानां ' तु वसुधैव कुटुम्बकम् " इस न्यायर्स ' पृथिवीस्थ अन्य जोंका उपकार कर सकें । फलतः पितरोंके सम्मान से जहाँ मृतक पितृ-शक्तिस श्राद्ध समूल तथा " प्रत्यक्ष - विषय सिद्ध होगा, वहाँ तृप्त पितरों द्वारा तया हमें उपदेश भी प्राप्त होगा, बुद्धि प्राप्तिसे हमारी रक्षा भी होगी । त्रों पर इस प्रकार परलोक - विद्या उन्नत हो जाने पर फिर हम देवताओंसे रहती अपना - सम्बन्ध जोड़कर जब - तब उनसे पूर्वापेक्षया स्थायी तथा अधिक शकती लाभप्रद उपदेश आदि प्राप्त करके सब जगत् को दिव्य शक्ति युक्त नेमें सक्षम हो सकेंगे | श्राशा है ' आलोक ' के पाठकगण इस आव एक विषय पर ध्यान देंगे । वाली जन्ति लेकर रीत-जा पर नका CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat ., ( १३ ) मृतक श्राद्धविषयक कुछ शङ्काय श्राद्ध विषय पर हम स्थान न होनेसे विस्तीर्ण निबन्ध न दे सकें, पुनः सुध्रुवसर मिलने पर विस्तीर्ण निबन्ध उपस्थित किया जाया । श्राढकि कुछ शात्रोंका उत्तर देकर यह विषय समन्त किया जायग 2.1 -: ( १ ) प्रश्न- ' श्रद्धया यत् क्रियते, तत् श्राद्धम् ' यह श्राद शब्दकी व्युत्पत्ति है. इससे मृतक श्राद्धको सिद्धि नहीं । ( उ ० कई नाम व्युत्पत्तिमूलक होते हैं और कई प्रवृत्तिनिमित्तछ । इनमें पहले यौगिक माने जाते हैं; अन्तिम रूढ वा योगरू! जब यौगिकत्वमै श्रव्याप्ति, श्रुतिष्याप्ति आदि दोष श्राते हैं, तब व्युत्पत्स्वर्य को हटाकर रूढिसे लोक वा शास्त्रको प्रवृत्ति - निमित्तता की जाती है । नहीं तो इस प्रकार विवाह तथा उपनयन आदि शब्द मी व्युत्पत्तिमूलक हो जावेंगे, तब यष्टिका - वहन ( छड़ी उठाना, वा वेश्या - चहन मी ' विवाह ' हो जावेगा । गर्दनके पास पतलून बान्धनेवाले चर्मपट्टको वे जाना भी ‘ उपन्यन ' संस्कार हो जायगा; पर ऐसा वादियोंको मी इष्ट नहीं } जैसे इननें परिभाषा ली जाती है, वैसे ‘ श्राद्ध ’ से भी । व्युत्पत्तिमात्र मानने पर ' गौः ' की ' ' ' गच्छति ' यह व्युत्पत्ति होनेसे पुरुष } घौड़ा, भैंस, बकरी आदि सभी ' गौ ' हो जाएँगे । इसी प्रकार ‘ श्राद्ध ' की ' भी उक्त व्युत्पत्ति मानने पर सभी कार्य ' श्राद्ध ' हो जायेंगे, श्रद्धा किस कार्य में नहीं होती? परन्तु यहां प्रतिव्याप्ति दोष हटानेके लिए लोक एवं शास्त्रकी रूढिसे श्रद्धसि किया जाने वाला मृतक पितरों . An eGangotri Initiative

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३५८ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) के उद्देश्य से ब्राह्मएको अन्नादि दान ही श्राद्ध होता है, जीवित - पितृ-विषयक नहीं । जैसे- ' अकालमृत्यु ' शब्दको व्युत्पत्तिमूलक माना जावे, तो ‘ नाऽक्काले नियते जन्तुर्विद्धः शरशतैरपि इस उक्तिसे विरोध पड़ता है, परन्तु रूढिसे चोर, रेलगाड़ी श्रादिसे मारा जाना ही ' अकाल-मृत्यु ' कहा जाता है, वैसे ' श्राद्ध ' शब्द मृतक - पितृ - विषय होने पर तो उपपन्न हो सकता है, नहीं तो उसमें प्रतिव्याप्ति श्रादि दोष आते हैं । वस्तुतः पितृश्राद्ध में यहांसे मर कर पितृलोकमें पहुँचे हुओंका ही श्रद्धा आह्वान, उनके साथ संवाद और उनसे रक्षा के लिए प्रार्थना श्रादि उनमें हमले विशिष्ट शक्ति होनेसे ही उपपन्न हो सकता है । तभी वेदमं कहा है - - ‘ श्रयन्तु नः पितरः! सोम्यासोऽग्निष्वात्ताः पथिभिर्देवयानैः । अस्मिन् यज्ञे स्वधया मदन्तोऽधित्र वन्तु तेऽवन्त्वस्मान् ' ( यजुः वा ० सं ० ' हा १८ ) ' अत्ता हवी ंषि प्रयतानि बर्हिषि आ रयि सर्ववीरं दधातन ' ( iii ) इत्यादि मन्त्रोंमें उनके बुलाने, उनसे संवाद, रक्षाकी प्रार्थना, तथा उनकी प्रतिमानुषशक्तिके बीज मिलते हैं । इसीलिए ही आजकल परलोक - विद्या प्रवृत्त हुई है । यदि उस विद्याका वेद - शास्त्र - पुराणादिके कहे प्रकारसे प्रचार किया जावे, तो उसके दोष दूर हो जायें । ( २ ) कई आर्यसमाजी श्राद्ध पर शङ्का करते हैं कि- ' यदि भुक्त-मिहान्येन देहमन्यस्य गच्छति । दद्यात् प्रवसतः श्राद्धं न स पथ्योदनं वहेत् ' । ' मृतानामिह जन्तूनां श्राद्धं चेत् तृप्तिकारणम् । प्रस्थितानां हि जन्तूनां वृथा पाथेयकल्पनम्र ' । यदि यहां पर श्राद्ध खिलानेसे जन्मान्तर में दूसरेके देहमें पहुँच जाता है, तो परदेस में गये हुए का भी श्राद्ध कर दिया जावे, उसे भी मिल जावे । वह व्यर्थ अपने साथ पाथेय ( मुसा-फिरीका खाना ) लेकर क्यों जाता है? ' स्वर्ग स्थिता यदा तृप्ति गच्छे-युस्तत्र दानतः | प्रासादस्योपरिस्थानामत्र कस्मान्न दीयते ' दान दिनेसे CC - 0. Ankur Joshi Collection श्राद्धविषयक शङ्खाएँ यदि स्वर्ग - स्थिती तृप्ति हो जाती है; तय क्योंकि भ पर ठहरे हुए को निचली मंज़िलमें दिया हुआ क्यों अन्तिम ि यह युक्ति यहाँ का दिया नहीं मिलता, वैसे श्राद्ध का न मिले? ॐ वेद । शौ ० नहीं मिलता । फल परलोकम भी लोक में र वचनको भी उत्तर- इस युक्ति देने वालाको याद रखना चाहिये कि देहादेष चि युक्ति उनकी नई नहीं है । यह तो नास्तिक वा चार्वाकी युक्ति ए इस देहसे जिसे उन्होंने अपनी पुस्तक में लिखा है । इस पर प्रश्नकर्ता अर है- घरमें क्यों ' सत्यार्थप्रकाश ' के १२ वें समुल्लासके आरम्भको देखें । इस प्रकार बनने | मानगे? ना श्रीरामको जावालिमुनिने भी जब वनसे लौटानेके लिए ' यदि मुरि रिश्ते श्रात्म हान्येन ' ( २ । १०८।१५ ) ' मृतो हि किमशिष्यति ' । १४ ) यह श्लोक सुनावे शरीरको ही तब श्रीरामने भी इन्हें नास्तिक- वचन कहा ( देखिये वाल्मीकि रामावर २।१०६१३०-३३-३४ ) । जाबालिने भी यही माना- ' यथा मा नास्तिव ' नास्तिकचागुदीरिता ' ( ३६-३८ ) श्रीवाल्मीकिने भी उक्त वचन भस्मगुण्ठन धर्माऽपेत - धर्मविरुद्ध ( २।१०८ / १ ) माना । तब क्या वैदिकम्मन्य प्रभः हवन श्रादि कर्ता नास्तिक -युक्तिको अपनी युक्ति मानते हैं । जैसे कि- स्वामं प्रग्निहोत्र तर दयानन्दजीने भी उक्त युक्तिका समर्थन करके नास्तिकों के श्रागे अपयतें हैं-सिर झुका दिया! यह ठीक नहीं । नास्तिकों और श्रार्यसमाजी व सादि पण्डि सनातनधर्मियों में भारी भेद है । हम दोनों श्रास्तिक हैं- पर चाक माननेवाले भ नास्तिक! वे केवल प्रत्यक्षको मानते हैं- हम दोनों श्राप्त - वचनको भी ग्रहों को भी मानते हैं । वे परलोक वा पुनर्जन्म नहीं मानते, तब उनके बचनको रापबंगों का उपस्थित करने वाले वादी भी परलोक वा पुनर्जन्म वा श्राप्तवचको हाषिका. ' तो मार मुक्ति, नहीं मानते, यह मानना पड़ेगा । त्राणामीश नास्तिक कहते हैं - ' यावज्जीवेत् सुखं जीवेद् ऋणं कृत्वा एव किससे लोग: पिबेत् | भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः १ ' ऋण लेकर खाते - पीत और मौज उड़ाते रहो, फिर तुम्हें परलोकमें ऋण नहीं देना पड़ेगा-Gujarat. An eGangotri Initiative