सनातन धर्मालोक ४ — पृष्ठ 201–210
सनातन धर्मालोक ४ · पृष्ठ 201–210
पृष्ठ 201
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीसनातनधर्मालीकः ( ४ ) ३६० क्योंकि भस्म हुआ शरीर फिर नहीं लौटेगा ' । क्या प्रश्नकर्ता उनको यह युक्ति मानकर स्वकर्मीका भी त्याग कर देंगे? तब जो कि श्रयर्व-मलेवेद्र श ० सं ० ) ( ६/११/२ ) में कहा है कि - ' ऋण न देने पर यम-लोक लोक में रस्सी से बंधना पड़ता है ' ' – क्या वैदिकम्मन्य वादी. इस वेद-उनको भी ' गप्प ' मानेंगे? नास्तिक कहते हैं - ' यदि गच्छेत् परं लोकं देहादेष विनिर्गतः । कस्माद् भूयो न चायाति बन्धुस्नेहसमाकुल: ' ( यदि इस देहसे निकल कर जीव परलोकमें जाता है, बन्धुस्नेहसे फिर उम्र नकर्ता युक्ति है- घर क्यों नहीं लौटाता ) यह वचन मानकर वादी परलोकको नहीं ! श्र मानेंगे? नास्तिक कहते हैं — ' तच्चैतन्यविशिष्टदेह एव श्रात्मा, देहाति -कार बनने दिश्राम प्रमाणाभावात् ' तो क्या वादी उनके इस अनुमानसे लोक सुनाव शरीरको ही श्रात्मा मानेंगे? के रामायण यथा म नास्तिकोंका आचार्य कहता है- ' अग्निहोत्रं त्रयो वेदास्त्रि ers वचन मत्मगुण्ठनम् । बुद्धि पौरुषहीनानां जीविकेति बृहस्पतिः ' अर्थात् – वेद, सन्यः न श्रादि बुद्धिहीनोंकी जीविका है । यह मानकर वादी अपने अभिमतं — वा श्रग्निहोत्र तथा वेदादिको अपनी जीविकाका उपाय मानेंगे? नास्तिकं अपय कहते हैं — ' त्रयो वेदस्य कर्तारो भण्डधूर्तनिशाचराः । जर्भरी तुर्करीः माजी व यादि पण्डितानां वचः स्मृतम् ' तब क्या प्रश्नकर्ता अपने आपको वैदिक - पर चार्वाक माननेवाले भी वेदोंको भाण्ड आदिसे बनाया हुआ और वैदिक चनको भी को भी मनुष्य कल्पित मानेंगे? नास्तिक कहते ' हैं- ' न ' स्वर्गो वचन गपबंगों वा नैवात्मा पारलौकिकः । नैव वर्णाश्रमादीनां क्रियाश्च फल-प्तवचनको | हायिका. ' तो क्या वादी भी सत्यार्थप्रकाशमें उद्धृत इस वचनके अनु-पार मुक्ति, जीव, वर्णाश्रम श्रादि क्रियायोंको नहीं मानेंगे । नास्तिक कृत्यानं ( जिससे र्वाणामी कल्पना ' परमात्माको मूर्खोकी कल्पना / मानते हैं कि-खाते - पीछे लोग ढरते रहें- क्या वादी भी ऐसा मानते हैं?:: 7 पढ़ेगा-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. श्राद्धविषयक शङ्काएँ ३६१ यदि शङ्काकर्ता नास्तिक्रांकी इन उक्तियांको नहीं मानते, वो द विषय में वे यदि नास्तिकोंकी उक्ति मानते हैं, तो क्या वे नास्तिकोंके अनुयायी हैं? नास्तिक इस जन्मके किये हुए अपने दानादिकर्मका फल भी परलोकमें नहीं मानते, जैसे कि - ' परनेह कृतं कर्म चेद्र नवे-त्फलदायकम् । गच्छतामिह जन्तूनां व्यर्थ पाथेयधारणम् ' परन्तु प्राप लोग तो हमारी तरह ऐहिक कर्मोंका फल परलोकमें मानते ही हैं । जैसे कि सत्यार्थप्रकाश में— ( प्रश्न ) — दानके फल यहां होते हैं या परलोकमे? ( उ ० ) सर्वत्र [ इस लोक तथा परलोकमें ] होते हैं ( ११ समु ० पृष्ठ २२० ) तब तो आपकी और हमारी समानता: हो गई । जैसे हमारे मृतकश्राद्ध में नास्तिकोंका प्रश्न है कि यदि यहाँ मरे हुए मनुष्यों का श्राद्ध करनेसे परलीक में फल मिलता है, तो परदेस में गये हुए भी श्राद्ध करने से उसे फल प्राप्त हो जाए, वैसे ही आप लोगो में भी यह प्रश्न उपस्थित होता है कि - श्राप लोग भी ब्राह्मणको अपने लिए दान देनेसे परलोकमें अपनेको फल मिलना मानते हैं, तो आप भी परदेसम जाते हुए किसी स्वाभीष्ट ब्राह्मणको दान दे दें, तो क्या आपको परदेश-में भी ' हुण्डी ' की तरह उसका फल मिल जायगा? ऐसा होने पर पर-देशमें पाथेय ( मुसाफिरीका खाना ) के भार उठानेकी श्रावश्यकता भी नहीं पड़ेगी । यदि आप पुनर्जन्मवादी होनेसे नास्तिकोंकी इस उक्तिको श्रश्रद्धेय मानते हैं: तब हम भी ' मृतानामिह जन्तूनां श्राद्धं चेत् ' इस उनकी उक्तिको श्रप्रमाण मानते । आप जैसा उत्तर उन्हें देंगे, हमारा भी वैसा ही उत्तर होगा । तथ क्यों श्राप ( प्रश्नकर्ता ) नास्तिकोंके कुतर्कों को अपना - कर हमारे सामने उपस्थित करते हैं? क्या ' प्रच्छन्ञ्चनास्तिक ’ पढ़वी पानेके लिए? यदि आप अपने उद्देश्य से ब्राह्मणको यहाँ खिलायें, और फिर कलकत्ता जाते हुए, रास्ते में आप अपनी वृप्ति होती हुई न देखें; तो क्या दूसरे जन्ममें थाप कर्म फल मिलना भी नहीं मानेगे? An eGangotri Initiative
पृष्ठ 202
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३६२ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) वास्तव में नास्तिकोंका उक्त दृष्टान्त ही विषम है, क्योंकि-जीवित और मृतकोंके सभी व्यवहारोंमें समता नहीं हो सकती, क्योंकि-दोनोंमें शक्तिभेद है । मरने पर परलोकंमें सूक्ष्म - शरीर मिलनेसे आत्मा-का विभुत्व प्रकट हो जानेसे उसमें बहुत शक्ति प्रकट हो जाती है, पर वह शक्ति स्थूल शरीराच्छन्न जीवमें नहीं होती । दीपक जब घंडेमें ढका हुआ हो; तो उसका प्रकाश सीमित हो जाता है, बाहर रखने पर उसकी शक्ति बढ़ जाती है । आप लोग भी दूसरेको अपने उद्देश्यसे दान देते हैं; श्राप उसका फल मर कर प्राप्त कर सकते हैं, जीवित रहने ' पर नहीं । पहले ही हम कह चुके हैं कि - मरने पर सीमित शक्तिवाले स्थूलशरीरके नाशसे अधिक शक्तिवाले सूक्ष्मशरीरके मिलने पर विशेष. शक्ति प्रादुभूत हो जाती है । उसमें श्राकर्षणशक्ति बहुत हो जाती है, सूक्ष्म होनेसे उस फलका श्राकर्षण भी अनायास हो जाता है । परन्तु स्थूल शरीर वालेमें वैसी शक्ति नहीं होती । पार्थिव शरीर उसमें प्रति-संन्धक होता है, परन्तु तैजसवायव्य आदि देव- पितरोंके शरीराम तो उसको सुलभता हुआ करती है । जैसे लोहेके टुकड़े को लेकर उसके बजाने पर भी उसका समाचार अन्य देशमें नहीं पहुँचता, परन्तु विद्युत्से मिले ' तारघार ' में उस लोहखण्ढके शब्दित करने पर उसका समाचार अन्य देश में भी पहुँच जाता है, इस भान्ति यहाँ भी घटा लेना चाहिये । सब व्यवहार सर्वत्र समानतासे नहीं हुआ करते —यह बात अवश्य स्मरणीय है । जीविता-वस्थामें दूसरेको खिलानेसे अपनेको फल नहीं मिलता, पर मरने पर उसका फल हमें मिल जाता है । स्थूलावस्था हटना और सूक्ष्म अवस्था प्राप्त होनेका नाम ही मरण हुआ करता है । जैसे धार्यसमाजियोंके मतमें स्थूल चरु उनका कोई लाभ नहीं करता, उसीको विधि अनुसार अग्निमें हवन करने पर वह सूक्ष्म होकर जहाँ - तहाँ फैलकर उनके मतमें CC - 0. Ankur Joshi Collection श्राद्ध विधेयक शङ्काएँ. १६४ बहुतका उपकारक सिद्ध होता है, उसमें ' कारण क्या? इस कि अग्नि द्वारा वह सूक्ष्म हो जाता है 1 । वैसे यहीं कारण यही है की मान्तिक लेना चाहिये | हमने किसी ब्राह्मणंकी थेपने उद्देश्यसे भोजन पर भी समय का पर परदेशम गये हुए भी हम उस फलको उससे नहीं खींच करारा श्रीजुनदेव सकते वहाँ हमारा स्थूलशरीर ही प्रतिबन्धक होता है, कर्म - व्यवस्थासे डेकना शुरू ' उसका फल ऐहिक जन्ममें नहीं मिल सकता, क्योंकि वह ऐहिक यह क्या कर ' श्रग्रिम, जन्मके लिए संचित हो जाया करता है, इस जन्म में वह नामसे डाल -नहीं दे सकता । पर जब पुरुष मृत्युको प्राप्त हो जाता है, स्थूल अवस्था | | इससे उसे ज को छोड़कर सूक्ष्म अवस्थाको प्राप्त कर लिया करता है, तब वह अपन जानते हुए अतिशयित आकर्षण नादिकी शक्तिकी महिमासे. उसः कर्मके उब तके न उससे खींच सकता है । श्रथवा यदि वह नहीं मरता, वह उखा सच सकता, भोजनादि खाने वाला ब्राह्मण. ही मृत्यु को अर्थात् स्थूलावस्थाये परलोकमठ छोड़कर सूक्ष्मावस्थाको प्राप्त हो जाता है, तो वही अपनी प्रतिनि होकर चुप ग विकर्षणशक्तिकी महिमासे उसी फलको उस जीवितके पास छिपी निमित्तसे भेज देता है । यह तो है अपने उद्देश्य से दिये हुए दाना कहाँ मालूम पर हम फल; इस ' प्रकौर ' जब पितर - यादि दूसरे के उद्देश्यसे श्रद्धादि किया | उनको धारा जाता है, तब हमारे मानसिक तथा शाब्दिक सङ्कल्पसे पितृः निर्मित विन भी दूर त्राह्मणंको दिये हुए ' अन्नादि दानको वह मृतक सूक्ष्मावस्था में शान व जानना होनेसे मनकी प्रबलता तथा श्राकर्षणशक्तिकी प्रबलता से उसी प्रकारले स्थूल शरीरम् खींच लिया करता है, यह बात शङ्काकर्ताको सूक्ष्म विचार का म पितृश्र प्रतिभासित हो सकती है । इस प्रकार यहाँ पर जहाँ शास्त्रीयता है, हो सकता है । इ " पर विज्ञान - सिद्धता भी सिद्ध है । यह शक्ति पितृलोकमें प्राप्त दुगों वह यन्त्र होत स्वाभाविकतासे हुआ करती है, जब वे पितृलोककी स्थिति समाप्त करके ( सी समय ह इस लोकंमें स्थूलरूपसे ना जाते हैं, तब उन्हें नित्य पितर बसु के यन्त्र नही श्रादित्य उस फलको प्राप्त करा देते हैं 1 । विदूरके भी Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 203
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) १६४ इस प्रकार कई सिक्ख भी नास्तिकोंकी भान्ति वा यी की भान्ति कहते सुने जाते हैं कि - " कोई ब्राह्मण नदी के किनारे मृतक G भी पिता तपया कर रहा था, तब हमारे किसी गुरु- सम्भवतः खीचना कराची नदवने पश्चिम्रकी श्रोर मुख करके प्रचुर मात्राम हाथ जल शुरू कर दिया 1 । वपेगा समाप्त कर चुके हुए ब्राह्मणने पूछा-व्यवस्था में | वह क्या कर रहे हों? गुरुने उत्तर दिया-- यह जल- अपने खेतके. ऐहिक में वह नामसे डाल रहा हूँ, वह पश्चिममें है, नदी वहाँ निकट नहीं है । छ । इससे उसे जल पहुँचेगा । भोले ब्राह्मणने इसे मृतक वर्षसमें उपहास न्यूल अवसा वह अपनी जानते हुए उसमें असम्भवकी श्राशङ्का प्रकट की । तब गुरुने कहा— के फलो उम्र तके नामसे डाला हुआ जल कुछ दूर ठहरे मेरे खेतको नहीं वह उसका सोच सकता, तब मृतकके नामसे दिया जल इस लोकमें नहीं, किन्तु पालोकम ठहरे हुए जीवको कैसे मिलेगा? तब लज्जित चूलावस्था श्रतिशक्ति होकर चुप गया " । पास किपी मालूम नहीं - यह वृत्त सिक्खोंके किसी मान्य ग्रन्थ है - बा हुए दानका रही; पर हमने एक सिक्खके मुखसे सुना है । इस प्रकार, अन्य साधारण याद किया | उस मी श्राशङ्का करते हैं कि मृतक प्राणी श्राद्धको कैसे पावेगा, जबकि-तुः निर्मित जैविक भी दूसरेसे खाये हुएको नहीं पा सकता, इस पर सुभी. को थामें शठद्ध जानना चाहिये कि - वर्पणके जल वा श्राद्ध के अन्नको जीवित, पुरुष सी प्रकार स्थूल शरीरमूलक अशक्तिके कारण नहीं खींच सकता, पर मृतक तो. चार | पितृशरीरको प्राप्त करके आकाश में सूक्ष्मवासे ठहरे हुए उसको खींच जता है, है । इसके उदाहरण में ' रेडियो ' को ले लीजिये । जिसके पास यन्त्र होता है, वह इङ्गलैण्ड, जर्मनी, रूस, अमेरिका आदि देशोंके समाप्त अ ( सी समय हो रहे हुए शब्दोंको खींच सकता है! परन्तु जिसके र बहुत यन्त्र नहीं है; वह लण्डन आदि में तो क्या; भारतमें पास दिर के भी शब्दों को खींच नहीं सकता । इस प्रकार जीवितंकि भी होरहे हुए पास दूसरे CC - 0. Ankur Joshi श्राद्धविषयक श ३६५ सैं ' दिये हुए श्राद्ध - तर्पणके ' श्राकाशस्थ रसको खींचनेको शक्ति नहीं होती; परन्तु मृतकोंके पितृलोकमें जानेसे उनके पास वह शक्ति सूक्ष्म-· तावश अनायास उपस्थित हो जाती है । स्थूल शरीर में तो वह शक्ति नहीं रहती, परन्तु सूक्ष्म शरीरमें वह रहती है, इसीलिए युधिष्ठिर स्थूल -शरीरक साथ स्वर्गलोकमें, बिलम्ब से प्राप्त हुए परन्तु भीम- श्रर्जुनादि मर जानेके कारण स्थूल शरीरत्यागवश युधिष्ठिरसे पूर्व ही प्राप्त हो गये - यह महाभारतमें स्पष्ट हैं । स्थूल बीजमं वृक्षोत्पादन - शक्ति नहीं होती; जब वह पृथ्वीमें बोया जाकर मर जाता है, तब उसमें सूक्ष्मता ` श्रा जानेसे वह शक्ति प्राप्त हो जाती है । यह स्थूल सूक्ष्म शक्ति में ‘ अन्तर है ' । वैज्ञानिक भी कहते हैं कि-- चन्द्र आदि लोकांमें सम्भवतः हमारे लोकके शब्दोंको ग्रहण करनेकी शक्ति है, परन्तु हमारे ' रेडियो ' यन्त्रोंमें वह शक्ति नहीं है । उनका अभिप्राय यह है कि – जय रेडियो यन्त्रका कार्यक्रम नहीं होता, तब भी कई शब्द- विशेष सुनाई देते हैं, वे सम्भवतः हमारे समीपके चन्द्र - मंगल यादि लोकोंके हैं, लेकिन हमारे यन्त्र उनको ठीक - टोक न खींच सकते हैं, न जान सकते हैं वान जवखा सकते हैं । Collection Gujarat. इस प्रकार स्थूज - शरीरके नाश होने पर प्राप्त हुए देव - पितृ श्रादिकं शरीर में तो वह शक्ति हुआ करती है । जैसे हम होम करें, उसके— अग्निंसे चाकाश में पहुँचाये सूक्ष्म अंशको— सूर्य आदि देव खींच सकते हैं; वैसे ही हमसे किये श्राद्धादिके ब्राह्मणकी श्रग्नि और महाग्नि द्वारा श्राकाश में प्राप्त हुए सूक्ष्म अंशको चन्द्रलोकस्थित पितर यन्त्रस्थानीय अपनी शक्तिके श्राश्रयसे खींच सकते हैं । इसलिए श्राद्धके आकर्षणार्थ मृत्युको ऐहिक शरीरके छूटनेकी - धावश्यकता होती है । तब मरनेके बाद सूक्ष्म देहकी प्राप्तिले उसमें शक्ति विशेषकी प्राप्ति से वह सूक्ष्म-देहसे हमसे दिये श्राद्धका आकर्षण कर लेता है । यही मृतक श्राद्धका An eGangotri Initiative
पृष्ठ 204
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३६ = श्रीसनातनधर्मालीकः ( ४ ) इस प्रकार बहुतसे उदाहरण मिलते हैं; परन्तु पुत्र पितासे कोई मिल नहीं होता, ' भार्या, पुत्रः स्वकां तन्ः ' ( मनु ० ४ | १८४ ) ' श्रात्मा ' वै पुत्रनामासि ' ( गोभिलागृ ० २२८ २१ ) ' पतिर्जायां प्रविशति गर्भो भूत्वा ह मातरम् । तस्यां पुनर्नवो भूत्वा दशमे मासि जायते ' ( ऐतरेय-ब्राह्मण ७।१४ ) स य एवंविद् श्रस्माल्लोकात् प्रैति अथ एभिरेव प्राणैः सह पुत्रमाविशति ' ( बृहदारण्यकोपनिषद् १ । १ । १७ । ' पिता पुत्रं प्रविवेश ' ( अथर्व सं ० १४४।२० ) इन प्रमाणोंसे पुत्र पिताका ही रूप हैं, तो उसके किये कर्मका फल पिताको परलोकमें क्यों न मिले? ( ४ ) प्रश्न- पिता, पितामह, प्रपितामह तीनका श्राद्ध होता है, तो क्या वृद्ध प्रपितामह श्रादिक लिए श्राद्धकी श्रावश्यकता नहीं? यदि नहीं; तब इन तीनोंक लिए आवश्यकता भी नहीं । उत्तर - पारस्करगृह्यसूत्रमें कहा है- निवर्तेत चतुर्थः ' ( ३ | १० | ४७ ) ' पिण्डस्त्रिषु इति श्रुते: ' इस श्रुतिले चौथा पिण्ड नहीं होता, क्योंकि— ' पुत्रेण लोकाञ्जयति पौत्रेणानन्त्यमश्नुते । श्रथ पुत्रस्य पौत्रेण ब्रध्नस्था-मो'त विष्टपम् ' ( मनु ० ६ १३७. ' त्रयाणामुदकं कार्यं त्रिषु पिंटः प्रवर्तते । चतुर्थः सम्प्रदातैषां पञ्चमो नोपपद्यते ' ( ६।१६६ ) इससे यह आशय निकलता है कि - प्रपौत्रके होने पर उससे किये श्राद्ध से प्रपितामह पितृलोकसे हटकर मुक्तिमें चला जाता है, वहाँ हमारा श्राद्धकर्म नहीं पहुँच सकताः छतः वृद्ध - प्रपितामहादिका श्राद्ध नहीं किया जाता । ५ ) प्रश्न - श्रात्माके इस देहके त्याग से पूर्व ही उसके लिए दूसरा देह तैयार रहता है । जैसे किं - ' तद् यथा तृणजलायुका तृणस्यान्तं गत्वा धन्यमाक्रममाक्रम्य श्रात्मानमुपसंहरति; एवमेव श्रयमात्मा इदं शरीरं निहत्य श्रविद्यां गमयित्वा धन्यमाक्रममाक्रम्य श्रात्मानमुपसंहरति ' ( बृहदारण्यक ४ | ४ | ३ ) तय श्राढका फल क्या! तब तो मृतकको पर-लोकमें रहने का अवसर ही नहीं रहता ।. CC - 0. Ankur Joshi Collection श्राद्धेविषयक शङ्काएँ ३७० ' उत्तर- इस वचनको पुनर्जन्ममें तात्पर्य नहीं । मृत्युके श्रनन्तर कर्म के फ तत्क्षण देह तैयार रहता है, वह पारलौकिक सूक्ष्म देह ही है । जो एक कम बाद जीवका पुनर्जन्म एकदम नहीं हो जाता | स्वा ० द ० जी भी ' मृत्युक सेविता उत्तर में दे प्रथमेन् ' ( यजु. ३६/६ ) इत्यादिसे कम से कम १२ दिनोंके बाद का पुनर्जन्म मानते हैं, उसमें ' तृणजलायुका ' न्याय नहीं घटता 1 । मस्ले तो यह ज के बाद पारलौकिक सूक्ष्म शरीर तो तत्काल मिल जाता है, अतः उपनिषद् वचन वहीं सार्थक है । उक्त उपनिषद्के ४ थे और रक्त जीवितोंक ले | अध्यायमें मरनेके बाद परलोकमें गमन माना है - तो यहाँ भी उसी ( 30 वर्णन है । पितर न पित्तर ( ६ ) प्रश्न- आपने मृत पितृके उद्देश्य से ब्राह्मणको खीर दी, यदि तब क्या वह अन्य जन्ममें कीड़ा बन जावे, तब खीर मिलने पर तो वह उसमें वस्तुतः प जायगा । दोष श्राते जावेगा, उत्तर-- यही बात जीवितश्राद्ध मानने वालों पर भी श्राती है । वे समावर्तन अपने कर्मका फल तो जन्मान्तरमें मानते ही हैं । यदि उन्होंने गुल त जड ल को बहुतसे चान्दीके रुपये दिये, या अनाथको गर्म - गर्म खीर दी. माले जड़ाको भ पर वह कीड़े बन गये, तो वे रुपये कीड़ेके किस काम आयेंगे? श्रपितु वह उनके भारसे दब जायगा, गर्म खीरसे मर जायेगा । इस पर जी वेद में प्रतिवादियोंका उत्तर होगा- वही हमारा । वास्तवमें दान - श्राद्ध आदि पितर मान करने पर परलोक वा जन्मान्तर में उस - उसे योनिके उपयुक्त ग्रन्न १०।६।३२) आदि प्राप्त होता है, सुख भी उस योनि के अनुकूल प्राप्त होता है । मनुष्याः अ यहाँ ' देवो यदि पिता जातः शुभकर्मानुयोगतः । तस्यान्नममृतं भूला । पितरों को देवस्येप्यनुगच्छति । गान्धर्वे भोगरूपैण पशुत्वे च तृणं भवेत् । मनुष्य- मनुष्येः स्वेऽन्नपानादि नानासौख्यकरं भवेत् ' इत्यादि देवल तथा हेमादि पितरोंका वचन प्रमाण हैं । जो प्रश्न श्राद्ध में हो सकते हैं, वे ही अपने किये हुए Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 205
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीसनातनधर्मालांक: ( ४, ३७० ३६६ कर्मके फल प्राप्त होने में भी हो सकते हैं । शेष प्रश्न बच रहता है कि नन्तर जो एकके कर्मका फल दूसरेको कैसे मिलता है, इसका उत्तर हम तृतीयप्रश्नकै । मृत्युक उत्तर में दे चुके हैं । ' सेविता याद न ( ७ ) प्रश्न – ' पान्ति इति पितरः ' रक्षा करने वालेको पितर कहते है मले तो यह जीवितों में घट सकता है, मरे हुओंमें नहीं । अतः पितृयज्ञ भी तः रक्त जीवितोंका होता है, मृतकोंका नहीं । र ( उ ० ) इस प्रकार तो रक्षा करनेमें असमर्थ बूंदे पिता - माता आदिको पितर न कहा जा सकेगा । तब क्या वे पुत्र हो जाएँगे? उनके रक्षक पुत्र पितर हो जाएँगे? यदि कोई मूर्ख ब्राह्मण शङ्काकर्ताकी रक्षो कर दे, न्दी, यदि तब क्या वह उसका पितर हो जायगा, क्या वह उसे श्राद्ध खिलावेगा? उसमें वस्तुतः पितृशब्द की यौगिकता में श्रव्याप्ति - श्रतिव्याप्ति आदि शतशः दोष श्राते हैं । तब तो रक्षक होने से कुत्ता भी शङ्काकर्ताका पिता हो जावेगा, छड़ी भी; जूता भी -- जिससे स्वा ० द ० जीने संस्कारविधि है समावर्तन पृष्ठ १२० में रक्षाकी प्रार्थना कराई है - पितृ हो जायगा । गुरु जड लाठी और जूताको भी वादी पितृश्राद्ध में भोजन कराएंगे? यदि दी. माने जड़ाको भोजन दिया जाता है, तो मृतकों में श्राद्धकी क्या आपत्ति? ? इस पर बेदमें तो श्राद्ध - प्रकरणमें मर कर पितृलोक में प्राप्त हुओंका नाम ही द पितर माना है । ' यं देवाः, पितरो, मनुष्या उपजीवन्ति सर्वदा ' ( अथर्व ० बुक ग्रन्न • होता है । १०/६/३२ ) ' देवानां, पितृ णां, मर्त्यानाम् ' ( अथ ० ११ १ ५ ) ‘ देवा, तं भूला मनुष्याः असुराः, पितरः ' ( अ ० १०/१०/२६ ) इत्यादि बहुत मन्त्रोंमें । मनुष्य पितरोंको जीवित मनुष्योंसे पृथक बताया है । ' तिर इव प मनुष्येभ्वः ' ( शत ० २।४।२।२१ ) यहाँ पर विभक्तिभेदसे तथा शक्तिभेद-माहिसे पितरोंका जीवित मनुष्योंसे भेद बताया गया हैं । जीवित पितर किये हुए CC - 0. Ankur Joshi i श्राद्धविषयक शकाएँ ३७१ किसीसे अदृश्य नहीं होते, मृतक ही पितृलोकमें जाकर दिव्यशक्तिमान् सूक्ष्म होनेसे मनुष्योंसे तिरोहित होते हैं । वही रक्षक होनेसे पितर कहला सकते हैं । घड़े में बन्द दीपककी तरह अथवा बीजमें बन्द वृचकी तरह स्थूल मनुष्य - शरीरसे धाच्छन्न श्रात्माका भी शक्तिप्रकाश स्थगित और सीमित रहता है । ' घुडेसे बाहर हुए दीपककी तरह अथवा क्तावस्थामें आये हुए बीजसे प्रकट हुए वृक्षकी तरह स्थूल मनुष्यशरीरले श्रव्य-छूटे हुए सूक्ष्मशरीरोपेत श्रात्माका भी विभुत्व प्रकट हो जानेसे उसमें विशेष -शक्ति प्रकट होती है तभी तो उन मृतक पितरोंसे वेदमें ( अथर्व ० १८ | ३ | १०-४४ इत्यादि स्थलोंमें ) रक्षाकी प्रार्थना थाई है- जीवितोंसे नहीं । हम परलोक - विद्यां L रात निबन्धमें स्पष्ट कर चुके हैं कि वे हमारी किस तरह रक्षा कर सकते हैं - हमें कैसे उपदेश दे सकते हैं । पृथिवीकी तथा स्थूल अन्न - जलोदिकी अपेक्षा सूक्ष्म वायु रक्षा करनेमें अधिक समर्थ होता ही है । सूक्ष्म परमाणुओं की शक्ति परमाणु बमसे • विध्वस्त हुए दो जापानी नगरोंसे पूछो । वे ही परमाणु दूसरे रूपमें हमारा संरक्षण भी खूब कर सकते हैं जिसके लिए वैज्ञानिक सोच रहे हैं । श्राकाशादि सबसे सूक्ष्म परमात्मा हमारा कितना रक्षक है? इस प्रकार सूक्ष्मावस्थाको प्राप्त हमारे मृतक पितर वस्तुतः पितर हैं, उन्हीं में: शास्त्रानुसार वायुकी भान्ति सुक्ष्मता और मनकी भांति वेगवत्ता और संरक्षणशक्ति मानी जा सकती है, जीवितोंमें नहीं । तब जो लोग ' जनकश्चोपनेता च यश्च विद्यां प्रयच्छति । अन्नदाता भयत्राता पञ्चैते पित्तरः स्मृता: ' इस पद्यसे जीवित पितर मानते हैं. उनका पक्ष भी खण्डित हो गया । एक तो यह पद्य पुराणका है - वादियोंको मान्य नहीं हो सकता । दूसरा यह श्राद्धप्रकरणका नहीं; और न इन पितरोंका कोई उत्तराधिकारी बनता है । ' अग्निष्वात्ताः पितर! एह गच्छत. अत्ता हवींषि ' । ऋ ० १०।१२।११ ) यहाँ पर मृतकोंको ही पितर और हविके भक्षणार्थं बुलाकर मृतक्रश्राद्धको ही वैदिक सिद्ध किया गया है । ' या = Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 206
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३७२ श्रीसनातनधर्मालोकः, ( ४ ) अ॒ग्निरेव दहन् स्वदयत, ते पितरोऽग्निष्वात्ताः ' ( शतपथ ०२६१७ जीवित पितर अग्निदग्ध नहीं होते । ' ( = ) प्रश्न - ब्राह्मणों को श्राद्ध खिलानेसे मृत पितरोंको कैसे मिलेगा? मृतक तो नष्ट हो गया । क्या ब्राह्मणोंका पेट लैटर बक्स है? ब्राह्मणों को हो क्यों नहीं खिलाया जाता? पितरोंकी रसीद तो श्राती नहीं । ( उ ० ) मरनेसे उसका अभाव नहीं हो जाता, किन्तु वह सूक्ष्म हो कर पितृलोकमें चला जाता है — यह हम पहले बता चुके हैं । इस विषयमें मनीआर्डरके दृष्टान्तसे सब समझमें चा सकता है । हमने किसी को मनीधार्डर भेजना है, उसको लेनेका अधिकारी वही डाकबाबू होता है— जिसे सर्कारने इस विभागका अध्यक्ष बना रखा है । उस जैसी योग्यता वाला भी जो सर्कारसे नियत नहीं किया गया — वह नहीं हो सकतां । वह अध्यक्ष उन रुपयोंको हमसे ले लेता है । उसके भेजनेका कमीशन भी लेकर टन रुपयोंको यहीं रख लेता है, और उस मनीआर्डर के पत्रको उद्दिष्ट स्थानमें भेज देता है । फिर उद्दिष्ट स्थानका अधिकारी उस नियत पुरुषको चान्दीके रुपयेके रूपसे, वा ' नोट ' वा ' पाउण्ड ' वा पैसे - याने वा शिलिङ्गादि रूपसे उतना द्रव्य दे देता है । यदि वह पुरुष वहां नहीं होता, दूसरे स्थान चला जाता है; तब वह अधिकारी उसका पता बदलकर दूसरे स्थान भेज देता है । यदि वह वहां भी नहीं होता, तो फिर वे ही रुपये भेजने वालेको लौटा ' देता है । इस प्रकार हमने किसी सम्बन्धीको ' वार ' द्वारा सूचना देनी है - तो हमारा दिया हुआ तार - फार्म तो यहीं रह जाता है, किन्तु उसका शब्द दूसरे तारघर में पहुँच जाता है; उधरका अधिकारी वैसा तारपत्र बनाकर नियत पुरुषको चपड़ासी द्वारा भिजवा दिया करता है । वैसे ही किसीने मृत पितृके पास अन यदि भेजना है । उसका अधिकारी विद्वान् ब्राह्मण ही है; जिसे परमात्माने जन्मसे नियत किया है, वैसी योग्यता वाला भी CC - 0. Ankur Joshi Collection श्राद्धविषयक शङ्काएँ ३७४ त्रियादि जन्मले ब्राह्मण न होनेसे परमात्मासे नियमित वा ० स न होनेके कारण उसका श्रधिकारी नहीं होता । यदि छलसे दूसरा उस स्थान पर श्री जाय; तो उसे दण्ड मिलता है । ' ब्राह्मणस्यैव कर्मेतद् लिया उपदिए मनीषिभिः । राजन्यवैश्ययोस्त्वेवं नैतत्कर्म विधीयते । ही व्य ( मनुस्मृति २।१३० ) । 1 PI हैं । अ जीवित वह श्रन्नादि वहाँ ब्राह्मणके उपयोगमें ही आता है, जैसे- मनी चाहेर नहीं; के रुपये यहाँ रह जाते हैं । ब्राह्मण दक्षिणारूप परन्तु उसके अध्यक्ष परमात्मा की आज्ञासे वही अमृत- रूपमें, मनुष्य बनने पर अन्न रूपमें, पशु रूपमें, राक्षस होने पर रुधिर रूपमें इस प्रकार अन्नके रूपमें निर्दिष्ट व्यक्तिको व्यक्तिको प्राप्त प्राप्त हो हो जाता जाता है है कमीशन ले लेता है । ही यह अन्न देता बनने पर और स बनने पर तृण श्रादि- श्रन्यथा तत्तद्योनिके उपभोज्य FB श्र ॥ जैसे वह पता आदि पूजा श्रध्यक्ष अपने पोस्टमैनके द्वारा नियत पुरुषको पहुँचाना है, वैसे ही परमात्मा वसु, रुद्र, श्रादित्य आदि दिव्य नित्य - पितरोंके द्वारा नियत पितृको श्राद्धका फल भिजवा देता है । यदि वह पुरुष पितृलोकमें नहीं । होता, मनुष्यलोक में पहुँच गया होता है; तो उस फलको परमात्मा परिवर्तन 51 करके दिव्य - पितरोंके द्वारा वहीं पहुंचा देता है । यदि वह वहां भी नहीं होता; किन्तु मुक्त हो गया होता है; तो वह अन्नादि फल, प्रेषकको ही फिर न वा सुखादि - रूपसे प्राप्त हो जाता है । यहाँ प्राप्तिपत्र ( रसीद ) तो वेद - शास्त्र श्रादिके ' स्वमग्ने! ईडितः कव्यवाहमोऽवाड् हन्यानि सुरमणि कृत्वा प्रादाः पितृभ्यः स्वधया तेऽक्षन् ' ( अभक्षयन् ) ' ( यजुः 3 Gurat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 207
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३७४ श्रीसनातनधर्मालीकः ( ४ ) II बा ० सं ० १६/६६ ) इत्यादि वचनोंका विश्वासरूप ही मिलता है; यही विशेषता है । उक्त मन्त्रमें लिखा हुआ है कि पितरने उस अहको पा या पर लिया और खा लिया — यह रसीद ही तो है । वस्तुतः रसीदका प्रश्न पदिए ही व्यर्थ है । विश्वास ही पर्याप्त है । कभी बनावटी रसीदें भी श्रा जाती नुस्मृति I | श्राप किसी विश्वस्त मित्रके द्वारा कोई वस्तु दूरदेश - स्थित अपने जीवित पिता के पास भेजते हैं; तो क्या वहां रसीद मांगते हैं? यदि नीर नहीं; तो यहां पर भी रसीदका प्रश्न व्यर्थ है । वेदके वचन पर विश्वास ता है । ही यहां ' रसीद ' मिलती है । श्राद्धभोक्ता जन्मेसें ब्राह्मण वेद - विद्वान् पर और सदाचारी होना चाहिये; तब कोई धोखेकी आशङ्का नहीं होगी । - यांदि श्रन्यथा तो कुछ - न - कुछ अविश्वासकी श्राशङ्का बनी रहेगी । उपभोज्य श्रव विस्तार भयवश यह विषय समाप्त करके हिन्दुधर्मके मूर्ति-पूजा आदि विषयों पर कुछ प्रकाश डाला जायगा । नियत कमें नहीं G परिवर्तन भी नहीं को ही ( रसीद ) हन्यानि = ) h: ( १४ ) मूर्तिपूजारहस्य और परापूजास्तोत्र ( १ ) सनातन हिन्दुधर्म में मूर्तिपूजा भी एक अङ्ग है । मूर्तिपूजा इसमें बहुत सोच - समझकर रखी गई हैं । उसके रखनेका कारण यह है कि जब तक मनुष्य स्वयं साकार है, तब तक वह मूर्तिपूजासे छूट नहीं सकता । हां, यह हम मानते हैं कि इसका उपयोग सारी श्रायुके लिए नहीं है । मूर्तिपूजा कर्मकाण्ड है, इसका उपयोग हमारे यज्ञोपवीत पहिरे रहने तक है । परमहंसावस्थामें ज्ञानकाण्डके समय जबकि यज्ञो-पवीतका त्याग किया जाता है, यज्ञोंका त्योग किया जाता है, तब मूर्ति-पूजाका भी । मूर्तिपूजा भी यज्ञका ही एक प्रकार है । इसे यौँ समझना चाहिये । —देवपूजा दो प्रकारकी होती है, हवन तथा मूर्तिपूजा । संस्कृत अग्निमूर्तिके द्वारा ' इन्द्राय स्वाहा, वरुणाय स्वाहा ' इत्यादि रूपसे तत्तद् - देवताको हवि देना हवन - द्वारा देवपूजा है, मन्त्र - संस्कृत प्रस्तर श्रादि मूर्तिके द्वारा तत्तद्देवताको बलि देना मूर्ति-द्वारा देवपूजा है । इसीलिए श्रीशङ्कराचार्य स्वामीने लिखा है- ' प्रती-कोपासनानि तु जडवस्तुनि मन्त्रादिसंस्कारेण मूर्तिरूपेण तत्तद्देवता-बुद्धि जनकानि तत्तद् - भोग्यवस्तु फलप्राप्तिजनकानि ' । • इन दोनों ( हवन तथा मूर्तिपूजा ) को ' यज्ञ ' कहा जाता है, क्योंकि देवपूजार्थक यज् धातुका श्रर्थं दोनों स्थानोंमें देखा गया है । ' शाङ्खा यनब्राह्मणमें ' कहा है ' स एवास्मै यज्ञं ददाति; तद् यद् एता देवता CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 208
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३७६ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) यजति ' ( ४२ ) अर्थात् - देवताओंकी पूजा ही यज्ञ होता है । इसीलिए ' श्रीमद्भागवत पुराण ' में भी कहा गया है । I ' यदा स्वनिगमेनोक्त ं द्विजत्वं प्राप्य पूरुषः । यथा यजेत मां भक्त्या श्रद्धया तन्निबोध मे । श्रर्चायां ( मूर्ती ) स्थण्डिलेऽग्नौ वा सूर्ये वा हृदि द्विजे ' ११ / २७ / ८-६ ) अर्थात् – द्विज ( यज्ञोपवीती ) मूर्ति वा अग्नि देवका पूजन करे । ' स्नानालङ्करणं प्रेष्ठमर्चायामेव दद्धव!...... वन्हौ श्राज्यप्लुतं हविः ' ( ११।२७।१६ ) यहां मूर्तिमें स्नानादि तथा अग्निमें घृताक्त हवि डालना कहा है । ' द्रव्यैः प्रसिद्धैर्मद् - यागः प्रतिमा-दिध्वमायिनः ' ( ११।२७।१५ ) यहाँ प्रतिमापूजनको भी हवनकी भांति याग ( यज्ञ ) ही कहा है । जिस प्रकार लोकमें प्रस्तरकी मूर्ति जड़ मानी जाती है, वैसे ही. श्रग्नि भी । परन्तु ' अभिमानिव्यपदेश: ' ( वेदान्तदर्शन २११५ ) ' सर्वस्य वा चेतनावत्रात् ' ( महाभाष्य - वार्तिक ३ | १/७ ) इस शास्त्रीय कथनसे दोनों ही मूर्तियां चैतन्य धारण करती हैं । श्रग्नि उस हविके स्थूल भागको भस्म करके उसका सूक्ष्म भाग देवताओंको देती है; और मूर्ति मधुमक्षिकासे पीये हुए पुष्पकी भांति उसका सूक्ष्मांश तत्तद्देवको समर्पण करती है । जैसे श्रग्नि वेदमन्त्रोंसे संस्कृत की जाती है; वैसे ही मूर्ति भी वेदमन्त्रोंसे संस्कृत की जाती है । जैसे अग्निहोत्रमें द्विज तथा कर्म-काण्डीका अधिकार है, वैसे ही मूर्तिपूजामें भी । इस कारण संस्कृत मूर्तिपूजन में शूद्र - अंत्यज श्रादिका अधिकार नहीं रहता, परमहंसोंका भी नहीं । परमहंसोंका शूहों की भांति यज्ञमें अनधिकारी होनेसे संस्कृत CC - 0. Ankur Joshi Collection मूर्तिपूजारहस्य और परापूजा ३७८ मूर्तिपूजनमें निषेध नहीं होता; किन्तु यज्ञोपवीती से उच्चाधिकारी उसमें उसका निषेध होता हैं । होनेसे भारत मूर्तिपूजाका दूसरा नाम प्रतिमोपासना भी है । यह प्रतिमा उप - उपासना कृष्ण जहाँ अन्य शाखाको सम्मत है; वहाँ वेदको भी । यह आगे कहा जायगा बताया । जब तक हम साकार हैं, अथवा व्यावहारिकतामें हैं; तब तक हमें मूर्ति- नहीं होग पूजा करनी ही पड़ेगी । गुरुजीकी पूजा करनी है; कैसे करें? हम उन्हें खण्डनक है? इत्याद नमस्कार करते हैं । उनके गलेमें पुष्पमाला डालते हैं! यह क्यों? नहीं हुई गुरु श्रात्माको माना जाता है या शरीरको? यदि श्रात्माको; तो उसी लङ्कारने ग पर फूल डालने चाहियें, नमस्कार भी उनकी आमाको ही कीजिये । • विश्वास है । उनके अस्थि मज्जा रुधिरके बने गलेमें माला क्यों डाली जाती है! उनके विश्व उनके किसी श्रृङ्गकी वन्दना क्यों की जाती है? कहना पड़ेगा किन ( यजुर्वेद स निराकार आत्मा पर फूल पहिनाना बन सकता है, " न उसे नमस्कार हो शङ्कराचार्य 157 मूर्तिपूजाक सकती है । अङ्गी आत्माकी पूजा प्रत्येक दशामें उसके किसी अनके द्वारा ही होगी । साकार गुरुके गले में हम स्वयं साकार साकार - मांलाको ' पूर्णस डालते हैं, वही माला हमारी निराकार श्रद्धाका प्रतीक होती है । शुद्धस्या 1 नित्यतृप्तस् साकार अङ्ग, पर सांकार पुष्प चढ़ा, और उससे निराकार गुरुकी आमा कृतो नीराज पर हमारी निराकार श्रद्धा चढ़ी । " उद्देश्य भी हमारा यहीं था; ' अस्थि, माला, रुधिर रूप अङ्ग पर फूल चढ़ाना हमारा उद्देश्य होता सी नहीं । परन्तु यही बात मूर्तिपूजामें भी समझती पड़ेगी । लक्ष्य: हमारी मूर्ति ने युक्तियुत नहीं होती; ' किन्तु मूर्ति - स्थित वही शक्ति ( परमात्मा होती है | सभी मूर्त ही मनुष्य मूर्ति उसी ' घणु - श्रणुमें व्यापक शक्ति अङ्गीका एक अङ्ग है । उस अ विश्वास द्वारा हम अङ्गीकी पूजा करते हैं । यही ' मूर्तिपूजाका रहस्य है ह Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 209
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) ३७७ ३७८ ( २ ) री होनेसे भारत के भूतपूर्व गृहमन्त्री श्री राजगोपालाच र्य महोदयकी ' राम--उपासना कृष्ण उपनिषद् '. के. १ ६ वें अध्यायमें ' मूर्तिपूजा ' विषय श्राया था, उसमें बताया गया था. कि- ' जो परमात्मा सर्वव्यापी है, वह क्या उस मूर्तिमें जायगा । नहीं होगा? जिन्हें मूर्तिपूजा पसन्द नहीं, वे न करें; किन्तु मूर्तिपूजाका में मूर्ति- खण्डन करना मूर्खता है । शङ्कर आदि सन्त मूर्तिपूजासे शान्ति पा चुके हम उन्हें है इत्यादि । किन्तु कई महाशयोंको उनकी यह बात रुचिकर प्रतीत क्यों! नहीं हुई । ' सार्वदेशिक ' के भूतपूर्व सम्पादक श्रीधर्मदेवजी सिद्धान्ता-तो उसी लङ्कारने गृहमन्त्रीके उक्त वक्तव्यका विरोध किया । श्री धर्मदेवजीका कीजिये । ' विश्वास है किं वेद तथा स्वा ० शङ्कराचार्य मूर्तिपूजा नहीं मानते । वेदमें ती है? उनके विश्वासके मतानुसार ' न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः ' ( यजुर्वेद सं ० ३२।३ ) इस मन्त्र में मूर्तिपूजाका निषेध है और स्वा ० शङ्कराचार्यने अपने ' परापूजा स्तोत्र ' में भी उनके विश्वासके अनुसार स्कार मूर्तिपूजाका निषेध किया है । वे पद्य निम्न हैं-द्वारा मालाको ' पूर्णस्याऽऽवाहनं कुत्र, सर्वाधारस्य चासनम् । स्वच्छस्य पाद्यमर्च्य ती है? शुद्धस्याचमनं कुतः? निर्मलस्य कुतः स्नानं वस्त्रं विश्वोदरस्य च । नित्यतृप्तस्य नैवेद्य, ताम्बूलं च कुतो विभोः? स्वयं प्रकाशमानस्य अस्थि, कुतो नीराजनं विभोः । श्रन्तर्बहिश्च पूर्णस्य कथमुहासनं भवेत् '? नहीं । 1 परन्तुं विचारनेसे यह मालूम होता है कि श्रीराजगोपालाचार्यजी री मूर्ति ने युक्तियुक्त लिखा था और वेद एवं श्रीशङ्कराचार्य स्वामी आदि ही है । सभी भूर्तिपूजाको व्यावहारिक मानते हैं । मूर्तिपूजा है भी स्वाभाविक स ही मनुष्य जब वधान में श्राता है और उसे परमात्माको सत्ताका | विश्वास हो जाता है तो उसके कार्योंको देखकर मनुष्यका मस्तक उसके CC - 0. Ankur Joshi मूर्तिपूजारहस्य और परापूजा ३७६ आगे क पड़ता है । जब मनुष्य देखता है कि वह सर्वव्यापक है और मैं, एकदेशी, हूं, मैं उसकी सर्वव्यापक पूजा कर ही कैसे सकता हूँ? उस समय उसके धागे दो पत्त वा दो दृष्टिकोण उपस्थित होते हैं । उसमें एक तो उसकी उपासनाके असम्भव होनेसे उसका सर्वथा त्याग, दूसरा उसकी एकदेशी उपासनाका अवलम्वन । इसी दूसरे पक्ष से मूर्तिपूजाका अध्याय प्रारम्भ हो जाता है । अत्यन्त ज्ञान हो जाने पर एक तीसरा पक्ष भी उपस्थित होता है-वह है अद्वैतवाद । श्रर्थात् यह सम्पूर्ण जगत् परमात्माका विकास है, उससे भिन्न कुछ नहीं है | इस पक्ष में श्रात्मा - परमात्माके श्रभेद हो जाने से उपाय - उपापकका भेद नहीं रह जाता । श्रुतः उपासनाकी श्रावश्य-कता ही नहीं रह जाती । पर यह पक्ष पारमार्थिक होता हुआ भी. ब्यावहारिक नहीं होता । व्यवहारमें मनुष्य एक उच्चकी भक्ति करना चाहता है । उपासना में सदा उस श्रमिन्नको भी भिन्न रखना चाहता है । सर्वत्र श्रोत - प्रतको भी वह एकदेशी कर देता है, क्योंकि वह स्वयं एकदेशी होता है । . इसको यो समझना चाहिये । उपास्य परमात्मा तो श्रणु - गु सर्वत्र व्यापक है.. पर उपासक एकदेशी है, पृथिवी पर बैठा है, वह उपास्यका ध्यान करना चाहेगा, तो एक दिशाकी और अपना मुख करेगा । एक ही देशमें स्वयं बैठेगा । अपने उपास्यको भी एक ही देशमें बैठावेशा । ध्यानकी समाप्तिके समय उसको अन्तिम नमस्कार भी एक ही अपने सामनेकी दिशाकी ही ओर करेगा । नमस्कार करनेके समय या तो सामने कोई दीवार होगी, या पृथिवी या सूर्यका तेज या आकाश; पर वे उसके नमस्कारके लक्ष्य न होंगे । नमस्कारका लक्ष्य होगा वही एक - उन सबमें व्यापक परमात्मा । बस, यह मूर्तिपूजाका श्रादि - स्रोत हैं । Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 210
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) उपासक जानता है कि मेरा उपास्य सर्वव्यापक है, पर मैं हूँ एक-देशी । ध्यानके समय भी वह ( उपास्य ) सर्वतोमुख है, पर मैं हूं एक-तोमुख | मेरा ध्यानका विषय सीमित है, पर वह असीमित है । वह अखण्ड है, पर हम सब उसके उपासक खण्ड - खण्ड हैं । अत: मैं उपासक भी उसकी व्यापक - पूजा नहीं कर सकता, यदि मैं चर्खीकी भांति घूमता हुआ भी उसे नमस्कार करता जाऊं, तथापि मेरा मुख एक ही घर रहेगा - युगपत् सब दिशाओं में मैं परमात्माको प्रणाम नहीं कर सकता । अगत्या मुझे उसकी एकदेशी ही पूजा करनी पड़ेगी । बस, यहीं से मूर्तिपूजा शुरू होती है । क्योंकि उसकी उपासना करनेका भाव उसे एकदेश रखनेका होता है । उपगम्य - आसना ( समीप स्थिति ) का नाम ' उपासना ' सार्थक भी तभी है, अन्यथा हम उसके ' उप ' अर्थात् पास पहुंच ही कैसे सकते हैं? उस सर्वव्यापक के पास हम एक-देशी पहुंच ही कैसे सकते हैं? वहां ' मूर्तिपूजा ' प्रकारसे अतिरिक्त हम उसकी उपासना धन्य ढङ्गसे कर हो नहीं सकते । यदि इस पर कहा जाय कि हम मन से उस उपास्यको पा लेंगे, हम उसे ज्ञान से जान लेंगे, हम उसे स्तोत्रों वेदमन्त्रोंसे प्राप्त करें लेंगे, पर ऐसा होना दुराशामात्र है । श्रुति इस पर कहती है - ' न तंत्र चतु-गंच्छति, न वाग् गच्छति, न मनः, नो विद्मों न विज्ञानीमः ' ।कैनी– पनिषद् १।३ ) उसं ' ' अनिर्वचनीयको हम परिंमित वाणी से कैसे कह लेंगे? उस श्रदृश्यको कैसे देख लेंगे? उस असीमितकी हम अपने मन-से भी कैसे सीमा ' बना सकेंगे? कैसे उसकी " मनसा परिक्रमा कर सकेंगे? स्पष्ट हैं कि हम उसकी कुछ मूर्ति अपने सीमित ' मनमें स्थिर कर लेंगे । तत्र चाहें हम शरीरसे, परिक्रमा करें, चाहे मनसे, यह संगत - हो सकता है, अन्यथा नहीं तभी उस निरीकार अक्षरमयको भी केवल CC - 0. Ankur Joshi Collection मूर्तिपूजारहस्य और परापूजा ३८२ समझने के लिए, उसकी उपासनार्थ, हमें उसे साकार श्री जाता है । निर्विकल्पकको भी सविकल्पक करना भी बनाना पड़ स्वामी पड़ जाता है । परा - पूजाका इसे लौकिक अक्षरोंमें भी घटा लीजिए ' मूर्तिकी उप । श्रीसनातनधर्मालो कोई ' माई जिन क्षरोंमें निकल रहा है, क्या यही ' अक्षरका स्वरूप | जावे, पर य पड़ेगा कि अक्षर तो निराकार है, पर अक्षरको भी ६ कइस ऋषि - मुनियोंने उसकी मति बना डाली है जिससे समझ कर हमारे -- यही , अब हम उस अदा की उपासना करनेमें समर्थ हो गये हैं । उसीके फलस्वरूप हम विद्वान् । श्रीसनातन तथा ज्ञानी बन रहे होते हैं । इन अक्षरोंकी आकृति ऋषियोंने यह क । मुखी की मूर्त -रखी है, पाठक यदि यह रहस्य जानना चाहें, तो उन्हें श्रीरघुनन्दनम साठी, बंगा द्वारा प्रणीत ' अक्षर - विज्ञान ' पुस्तक पढ़नी चाहिए । जापानी | जावे । तो ज कहा जा सकता है कि अक्षर की मूर्तिकी उपासना होगी, वह उ मूर्खो के लिए है, लेगा । यही विद्वानोंके लिए नहीं, क्योंकि अक्षर तो निराकार होता है. इस पर इंडोसे उपरि जानना चाहिए कि जब तक हम व्यवहार पक्ष में हैं, तब तक सभी हैं । क्या विद्वान् कहे जाने वाले मुस । शित किया ज भी साकार अक्षरोंके मन्दिर, पुस्तकोको | के प्रमाण नह देहलीको नहीं लांघते? उस तर मन्दिरमें पहुँच कर उसकी मूर्तिको विषय बतान उपासना नहीं करते? हो, जब वह अक्षरोपासनांसे परमार्थतः ऐसा मन्टोप होता ' विद्वान् हो जाता है कि श्रर्व उसे पढ़ने - पढ़ानके लिए भी किसी पुस्तक वा शस्त्र तो मूि पत्रकी कोई आवश्यकता नहीं रह जाती. ' न ' कुछ लिखनेकी, तब सम्म स्वयं मूर्ति पूज -लेना पड़ता है कि अब इसे निराकार अक्षरको प्राप्ति हो गयी है, तो वहीं उसीकी मूर्तिको उपासनार्थं दूसरे थप विद्वान् को दे देता है कि इसे देखिये – अब तुम लो | मुझे अब इसकी कोई श्रावश्यकता नहीं रही; अब मैं इनकी भी को लौकिक व्यवहारमें नहीं हूँ, ' अब मैं परमार्थ- पथका पुजारी हो गया हूँ । हो सकती है श्रब मुझे अक्षरमूर्तिकी उपासना तो क्या, अक्षर - उपासनाकी भी श्राव सके ज्ञानकी श्यकता नहीं है । यहीं वह पक्ष श्राकर उपस्थित होता है. जिसको Gujarat. An eGangotri Initiative