सनातन धर्मालोक ४ — पृष्ठ 211–220

सनातन धर्मालोक ४ · पृष्ठ 211–220

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) ३८२ श्रीशङ्कराचार्यका ' परा पूजा ' स्तोत्र कह रहा है । पर इस चज्ञाना पद | स्वामी भी प्रसङ्ग तब श्रा उपस्थित होता है, जब हम इस अक्षर-मूर्तिकी परापूजाका उपासना करके परिपक्क हो चुके हा । यह भिन्न बात है कि नधर्मालो कोई ' माई का लाल ' बिना सीढ़ियोंके भी ऊँचे महल पर एकदम चढ़ । डावे, पर यह सर्वसाधारणका विषय नहीं । ? कना कर हमारे मूर्ति उपासना मूर्तिपूजा पर भी ठीक घट जाती है । उस श्रवर ' श्रीसनातनधर्मालोक ' की अभी एक मूर्ति है नागरी । इसकी श्रन्य गुरु-म विद्वान् | मुखीकी मूर्ति बन सकती है, अंग्रेजी - उर्दू की मूर्ति बन सकती है । यह क्यों राठी, बंगाली, गुजराती, कनाडी श्रादिकी; जर्मनी, फ्रांसीसी, रूसी, नन्दनश | जापानी आदि मूर्तियां भी बन सकती हैं, जबकि यह सर्वत्र प्रसिद्ध हो । जायें । तो जिसका उसकी जिस मूर्ति में अभ्यास वा आस्था वा भक्ति होगी, वह उसी रूप -- उसी मूर्ति में ' श्रीसनातनधर्नालोक ' की पूजा के लिए है, मेरेगा । यही है मूर्तिपूजाका रहस्य, जिसे गृहमन्त्री महोदयने अपनी इस पर शैलीसे उपस्थित किया था, जिनकी युक्तियों को भावुकता कह कर उपे-= सभी मूर्ख कित किया जाता है और कहा जाता है कि उन्होंने इस पर कोई वेदादि-= पुस्तकों ] | के प्रमाण नहीं दिये । उन्होंने तो मूर्तिपूजाको मानबक्री भावनाका की मूर्तिको विषय बताना था कि वह मानवमें स्वाभाविक है, उसीसे उसको र्थतः ऐसा पन्तोष होता है । फिर वहां प्रमाणोंको क्यों उपस्थित करते? वेदादि-• पुस्तक वा शास्त्र तो मूर्तिपूजा से श्रीत - प्रोत हैं, प्रत्युत यही कहना ठीक है तब समयं मूर्तिपूजा हैं, तब वहां प्रमाणकी श्रावश्यकता ही क्या? हैं, तो वही कि- इसे देखिये - वेदोंको परमात्माका ज्ञान बताया जाता है, तब निराकार. हो; श्रव में ( उनकी भी कोई मूर्ति होती है? निराकार ज्ञानकी कोई सीमा गया हूँ । हो सकती है? यदि हो सकती है वा होगई, ऋषि - मुनियोंने वा इयत्ता भी भी बात के ज्ञान की प्राकृतिको भी दुह लिया तो उस निरा-है. जिसको इसीसे मूर्तिपूजा सिद्ध हो CC - 0. Ankur Joshi मूर्तिपूजारहस्य और परापूजा ३८३ ही गयी | जब परमात्माके ज्ञानकी मूर्ति बन गई, उसी ज्ञानके चार मन्दिर भी बन गये, तब उसके अधिकारियों द्वारा उसकी उपासना अनिवार्य हो जाती है. स्वाभाविक हो उठती है । वहीं चार वेद अपने साक्षात् श्राचरणले स्वयं मूर्तिपूजाके, प्रवर्तक सिद्ध हो गये । जब पर-मात्माके निराकार - ज्ञानकी मूर्ति बन गई, मन्दिर बन गया, तो उस निराकार, वेदमय परमात्मा की मूर्ति तथा उस मूर्तिका मन्दिर न वने-यह कैसे सम्भव हो सकता है? ' न तस्य प्रतिमा अस्ति ' कहा जाता है कि वेद तो ' न तस्य त्रविमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः ' ( यजुर्वेदसं ० ३२१३ ) कहकर मूर्तिपूजाका निषेध करता हैं । इस पर यह जानना चाहिये कि इस मन्त्रमें ' प्रतिमा ' का श्र ' मूर्ति ' नहीं किन्तु ‘ तुल्यता ' है, सब भाष्यकारोंने यही धर्य किया है । अर्थात् इस संसारमें उस परमात्माकी बराबरीका कोई नहीं । यह श्रयं जहां सर्व - भाष्यकार - सम्मत है, वहां सोपपत्तिक भी है । इस मन्त्रमें उस परमात्माकी ' प्रतिमा ' न होनेमें हेतु दिया गया है - ' यस्य नाम महद्यशः ' जिसका नाम बड़े यश वाला है 1 Collection Gujarat. अब विद्वान् पाठक ही विचारों कि इस मन्त्रका क्या आशय है? जिसका नाम बड़े यश वाला हैं, उसकी कोई ' प्रतिमा ' नहीं है; यहां ' प्रतिमा ' का अर्थ क्या युक्त हैं? मूर्ति? वा तुल्यता? मानना पड़ेगा कि ‘ तुल्यता ’ श्रर्थ है, मूर्ति नहीं । क्योंकि बड़े यशवालेकी मूर्ति तो टल्टे अवश्य हुआ करती है । हां, उसकी ' तुल्यता ' नहीं हुआ करती । श्रात्र-कल कौन महायशस्वी नाम वाले हैं? कहना पड़ेगा कि श्रीयुत गांधीजी, स्वा ० दयानन्दजी, स्वामी श्रीकरपात्रीजी श्रादि । तब क्या इनकी इस An eGangotri Initiative

पृष्ठ 212

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३८४ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) संसार में ' ' प्रतिमा ' अर्थात् ' मूर्ति ' नहीं? कौन - सा अर्थ इन दो में उचि जंचता है? मानना पड़ेगा कि ' तुल्यता ' अर्थ ही उचित है, क्योंकि इस संसारमें श्रीगांधीजीकी मूर्तियां तो मिल जायंगी, पर उनकी तुल्यता -का, उनकी बराबरीका कोई भी पुरुष न मिलेगा । ' नैषधचरित ' में राजा नलके मुखके लिए यह शब्द श्राये हैं- ' न तन्मुखस्य प्रतिमा चराचरे ( १।२३ ) संसारमें नलके मुखकी ' प्रतिमा ' नहीं है । इससे नलके मुखकी ' मूर्ति ' का अभाव सिद्ध नहीं होता, किंतु ' उसके मुखकी सहराताका कोई मुख नहीं ' यही अर्थं उचित दीखता है । तब उक्त बेदमन्त्रसे मूर्तिपूजाका निषेध नहीं निकलता - किन्तु उस परमात्माकी ' अनम्य - सदृशता ' का ही बोध होता है । स्वा ० दयानन्दजी के अनुयायी तो वेदके इस मन्त्रमें ' प्रतिमा ' का मूर्ति श्रर्थ कर ही नहीं सकते । ऋग्वेदादिभाष्य - भूमिकामें स्वा ० द ० जीनें लिखा हैं ( प्र ० ) ' वेदेषु ' प्रतिमा ' शब्दोऽस्ति नवा ( उ ० ) अस्ति । ( ० ) पुनः किमर्थो निषेधः ( उ ० ) नैव प्रतिमार्थेन ( वेदे ) मूर्तयो गृह्यन्ते; किं तर्हि? परिमाणार्थो गृह्यते इति ( ३२० पृष्ठ ) तब स्वामीजीके अनुसार इस मन्त्रमें भी ' प्रतिमा ' शब्द उपमा - चाचक सिद्धे हुआ, ‘ मूर्ति ’ वाचक नहीं, तब इस मन्त्रमें परमात्माकी अनुपमेयता सिद्ध हुई; मूर्ति - निषेध नहीं; तभी २।३।७ ब्रह्मसूत्रके भाष्य में स्वा ० शंकराचार्यजीने भी कहा है — ' न तस्य प्रतिमा अस्ति ' इति च ब्रह्मणोऽनुपमानत्वं दर्शयति ' । श्रव शेष है स्वा ० शंकराचार्यका ' परा - पूजा, स्तोत्र । इसके एकही दो श्लोकोंकों उद्धृत- भर कर देंनेसे मूर्तिपूजाका निषेध सिद्ध नहीं हो जाता, किन्तु उसे पूर्वापरसे देखनेसे ही उसका श्राशय मालूम हो / सकता है । ' स्तोत्ररत्नावली ' में वह पूर्ण उद्धृत किया गया है । उसमें CC - 0. Ankur Joshi Collection मूर्ति - पूजा रहस्य और परा पूजा दस श्लोक हैं । प्रथम श्लोक यह है- ' अखण्डे सच्चिदानन्दे - कल्पैकरूपिणि । स्थिते ऽद्वितीयभावेस्मिन् कथं पूजा विधीयते,? निर्वि जबकि परमात्मा अखण्ड है, वह सविकल्पक ज्ञान - ग्राह्य नहीं, जबकि अर्थात् स श्रद्वैतभावसे सर्वत्र विद्यमान है, हम भी नहीं है; तब उसकी पूजा वह य किस प्रकार हो सकती है? इसोकी स्पष्टता श्रागेके श्लोकों में की गई है । उसमें सातवां पद्य यह है ' प्रदक्षिणा ह्यनन्तस्य ह्यद्वयस्य कुतो नतिः I वेदवाक्यैरवेद्यस्ये कुतः स्तोत्रं विधीयते? अर्थात् जबकि । मेरा श्र परमात्मा ' अनन्त है, उसकी परिक्रमा कैसे हो सकती है? जब वह हमसे अहि- मेरा श तीय है, अर्थात् हम और वह भिन्न नहीं, तब हम उसे नमस्कार ही तेरी सम -कैसे कर सकते हैं? अपने आपको नमस्कार नहीं हुआ करती । प्रश्न स्तुति ह बिल्कुल ठीक है | जब वह निर्विकल्पक है, प्रकारताज्ञानसे शून्य है; " स्व ' अखण्ड है, तब न वह वचन- गोचर हो सकता है. न ही विचार - गोचर । स्तोत्र म तब उसका न तो मनमें ध्यान किया जा सकता है, न वेद - मन्त्र , उसकी स्तुति हो सकती है । पर क्या वादी लोगोंने वेदमन्त्रोंकी संध्यासे मकता, उस परंमात्माकी स्तुति, तथा मनसे उसका ध्यान तथा उसकी मान- पद्मको सिक - परिक्रमा तथा उसे नमस्कार करना बन्द कर रखा है? यदि नहीं, हैं, त तब वे इस स्तोत्र से अपने पक्षका मण्डन तथा हमारे पक्षका: खण्डन कोनमर - करनेके किस प्रकार अधिकारी हैं? पर इन इस सबका उत्तर नवम् पद्यमें: दिया - गया है- ' एवमेव परा - पूजा कि पर सर्वावस्थासु सर्वदा । एकबुद्ध या तु. देवेशे विधेया ब्रह्मवित्तमैः, श्रर्थात् परमात्म जो ‘ ब्रह्मवित्तम ' हैं ' ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या ' इस सिद्धान्तको हृद ' अपर - प मानने वाले हैं, उनको एकत्व - बुद्धिसे इस प्रकार की पूजा करनी चाहिये । यजुर्वेदः वह पूजा अन्तिम दशम श्लोक में इस प्रकार कही गयी है- कोपनिष है, वैसे श्रात्मा त्वं; गिरिजा - मतिः, सहचरा ( गणा: ) प्राणाः, शरीरं गृहं, हे पा पूजा ते - विषयोपभोगरचना, निद्रा — समाधिस्थितिः | पड़ता है; Gujarat. An eGangotri Initiative वह परम

पृष्ठ 213

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३८५ १८६ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) निर्वि संचारः पदयोः - प्रदक्षिणविधिः, स्तोत्राणि सर्वा गिरो कि वह यद् यत् कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो! तवाराधनम् जाकिस । ' उसमें अर्थात् - हे महादेव! मैं जो - जो कर्म करता हूँ, वही तेरी पूजा है । नविः । मेरा धात्मा तू है । मेरी बुद्धि तेरी पार्वती है । मेरे प्राण तेरे. गण हैं । रमामा " मेरा शरीर तेरा मंदिर है । मेरा विषय - भोग तेरी पूजा है । मेरी नींद अद्दि-तेरी समाधि है । मेरा घूमना - फिरना तेरी परिक्रमा है, मेरा बोलना तेरी रही स्तुति हैं ॥ प्रश्न न्य है; स्वामी शंकराचार्य अद्वैतवादी संन्यासी थे, अतः उन्होंने इस गोचर । स्तोन में बताया है कि – अद्वैतवादमें इसी प्रकारकी पूजा हो सकती. मन्त्रीस है— दूसरी नहीं । इन श्लोकोंसे मूर्ति पूजाका निषेध नहीं किया. जा संध्यासे मकता, किन्तु इनसे उपासनामात्रका ही निषेध सिद्ध होता है, इन मान- पग्रको उद्धृत करने वा माननेके अधिकारी श्रद्धतवादी ही हो सकते नहीं, तत्रादी नहीं । द्वैतवादी उपासनाको नहीं छोड़ सकता, परमात्मा.. खण्डन को नमस्कार तथा वेदमन्त्रोंसे उसकी स्तुतिको वह नहीं छोड़ सकता, पर इन अद्वैतवाद के श्लोकोंमें यह सब छोड़ना लिखा है । तब स्पष्ट है रा - पूजा कि — परमात्माकी हमसे मूर्ति द्वारा की गई, तथा दूसरोंसे बिना मूर्ति श्रर्थात् परमात्माकी की हुई उपासना यह ' परा - पूजा ' ' नहीं, यह तो उसक हृदयसे ' अपरा - पूजा ' है ' द्वे विद्यो वेदितव्ये, परा वैव अपरा च । तंत्र अपरा ऋग्वेदो चाहिये । यजुर्वेदः सामवेदो अथर्ववेदः । अथ परा यया तद् अक्षरमधिगम्यते ' ( ' मुण्ड-कोपनिषद् १।१।४ – २ ) इस प्रमाणसे वैदिक विद्या जैसे अपरा विद्या है, वैसे वैदिक उपासना मूर्ति - पूजा आदिभी परमात्मांकी ' अपरा पूजा ” नई नाई है । है ' परा - पूजा'नहीं । जैसे ' परा - विद्या ' में ऋग्वेदादिको यज्ञोपवीतको छोड़ना पड़ता है; वैसेही ‘ परा - पूजा ' में वैदिक उपासनाको भी छोड़ना पड़ता है । वह परमहंस अवस्था हुया करती है, उसमें तो शिखा यज्ञोपवीत jasthi मूर्ति - पूजा रहस्य और परा - पूजा ३८७ तथा उपासनाको भी छोड़ना पड़ता है । इससे स्पष्ट है कि - व्यवहार-बाद में मूर्तिपूजारूप उपासनाका कोई भी, कहीं भी निषेध नहीं । स्वामी शंकराचार्यजी व्यवहारवाद में मूर्ति पूजाका कहीं निषेध नहीं कर गये; प्रत्युत वे कई देवमन्दिर भी बनवा गये । । जैसेकि - ' शंकर ' दिग्विजय ' में लिखा है कि- - ' ' सुरधामं स तत्र कारयित्वा ' ( १२५ ) पंच देवोंकी पूजा भी वे बता गये हैं, यहभी ' शंकरदिग्विजय ' में स्पष्ट है । शालग्राम मूर्तिमें विष्णु - पूजनकी चर्चा स्वा ० शंकराचार्यने अपनेः ‘ वेदान्तदर्शन ' के भाष्य तथा ' छान्दोग्योपनिषद् ' में अनेक वार की है, जैसेकि वेदान्त ०.४ | १।५, १२१४, १, ३ ४ १४ इत्यादि । यह ठक भी है । परमात्मा है अंगी, देवता वा पृथ्वी आदि हैं उसका थंग, बिना अंग अंगीकी पूजा कभी संभव नहीं । तब मूर्तिपूजाका उल्लेख जोकि भूतपूर्व गृहमन्त्री श्री राजगोपालाचार्यजी अपनी पुस्तकमें कर गये हैं, वह जहां प्रमाणानुगृहीत है, वहां युक्ति - युक्त भी है । तब उस-का खण्डन · किसी भी प्रकारसे नहीं किया जा सकता । तब फिर श्री-. धर्मदेवजी का इस विषयका परिश्रम कोई फल नहीं रखता । collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 214

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( १५ ) वेदमें प्रतिमोपासना । श्रार्यसमाज आदि अर्वाचीन सम्प्रदाय वालका विचार है कि-' वेदमें प्रतिमोपासना अर्थात् मूर्तिपूजाका गन्ध भी नहीं है - इसे पुराणनेही प्रचलित किया है; अथवा जैनियोंने इसे जारी किया है । ' पर ऐसा कहना वेदसे अपनी अनभिज्ञता प्रकट करना है । वैसे तो वेदमें मूर्ति-पूजा ठसाठस भरी पड़ी है; पर हम एक वेद - मन्त्र उपस्थित करते हैं; जिससे प्रतिमोपासनाको वैदिकता सिद्ध होगी । फिर कोई यह कहनेका साहस न कर सकेगा कि— वेदमें मूर्तिपूजाका गन्ध नहीं है । अथर्ववेदसंहितामें एक मन्त्र आया है— ' संवत्सरस्य प्रतिमां यां त्वां रात्रि! उपास्महे । सा न श्रायुष्मतीं प्रजां रायस्पोषेण संसृज ' ( ३ | १० | ३ ) इसमें प्रतिमोपासना तथा प्रतिमासे प्रार्थना वैदिक सिद्ध होरही है । इस मन्त्रका अन्वय इस प्रकार है- ' हे रात्रि! संवसरस्य प्रतिमां यां स्वाम् उपास्महे, सा त्वं न श्रायुष्मतीं प्रजां रायस्पोषेण संसृज ' । इसका अयं यह है - ' हे रात्रि! संवत्सरको प्रतिमा ( मूर्ति ) जिस तेरी हम उपासना करते हैं; वह तु प्रतिमा ( मूर्ति ) हमारी प्रजा ( सन्तान ) को धन - पुष्टि आदिले संयुक्त कर ' । यहांपर रात्रिको संवत्सर की प्रतिमा-रूपमें उपासनीय माना है । प्रतिमा मूर्तिको और उपासना पूजाको कहते हैं और फिर उस प्रतिमासे अपनी सन्तानकी समृद्धि प्रार्थित की गई है । इससे मूर्तिपूजा तथा उससे प्रार्थना वैदिककालसे चली श्रा - रही है — यह सिद्ध होगया | यदि वेद मूर्तिपूजा न मानता; तो रात्रिको संवत्सरकी प्रतिमा न बनाता तथा उसकी उपासना तथा प्रार्थना न कराता करात Collection ‘ Gujarat. An eGang ३६० चेदमें प्रतिमोपासना बेद्रोक्त ह tet ' प्रतिमाम् उपास्महे ' यह शब्द प्रतिमोपासनाको वैदिक शब्द हैं । रहे हैं । सिद्ध कर कहते मतवालो इसके अतिरिक्त यहांपर ' संवत्सर ' का अर्थ प्रजापति ( विशेष प्र है । जैसेकि - शतपथ ब्राह्मणमें- ' स [ प्रजापतिः ] ऐक्षत- परमाया ) दयानन्द [ संवत्सरं ] श्रात्मन: प्रतिमाम् असृति यत् संवत्सरमिति तस्माद् इमं बताया प्रजापतिः संवत्सर इति श्रात्मनो ह्य तं प्रतिमामसृजत्, यद्व ग्राहु: - सामने ि व चतुरपट संवत्सरः, चतुरक्षरः प्रजापतिः; तेन उ ह एव अस्यैष प्रति इस स्वाम ( ११।१।६ / १३ ) । वेदमें वादियोंके मंतमें रूढ शब्द नहीं होते; क मूर्ति रात्रि शब्दमौ यहां यौगिक है । स्वा ० दयानन्दजीने अपने ' उणादिको चाहे वह में ' रात्रि ' का अर्थ इस प्रकार किया है- ' राति - सुखं ददाति इति रात्रि देखिये-( ४/६७ ) । ( 2 ) .: तब भक्त अपने सामने विद्यमान भगवान्‌की मूर्तिको लक्ष्य को कालेजके कहता है कि - ' हे ( रात्रि! ) भक्तोंको आनन्द देने वाली! ( संवत्सरस्य ) जाते थे, प्रजापति परमात्माकी ( प्रतिमां ) मूर्ति ( यां खां ) जिस: तेरी ( उपा. क्योंकि यह स्महे ) हम उपासना करते हैं; ( सा ) वह तू ( नः ) इमारी हमें उनके ( · प्रजाम् ) सन्तानकी ( श्रायुष्मतीम् ) चिरायु करके ( रायस्पोषेव लाजपतरा संसृज ) धनवस्त्रादिसे संयुक्त कर ' । इस मन्त्रसे सिद्ध हुआ कि मूर्ति देशकेलिए पूजा तथा उस मूर्ति से अपने किसी मनोरथ की प्रार्थना करनी सबंध यह क्यो लय नही वेद - सम्मत है । तब ' वेदकों मूर्ति पूजा सम्मत नहीं ' ऐसा कहना अपना श्रज्ञान प्रकाशित करना है । श्रार्यसमाज जो अपने श्रापको मूर्ति होते हैं, 5 पूजक नहीं मानता — यह भी ठीक नहीं, वह भी मूर्तिपूजक है हमारी निर 1 बा ] ० लाजप देखिये | पूजा सिन्द आर्यसमाजकी मूर्तिपूजा श्रार्यसमाजके प्रवर्तक स्वा ० द ० जीने ' सत्यार्थप्रकाश ' की भूमिकार्म लिखा है इन समुल्लासोंमें जोकि सत्यमत प्रकाशित किया है वह

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३६० श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) बेट्रोत होनेसे मुझको सर्वथा मन्तव्य है ' ( १० ३ ) यहां पर ' सत्यमत ' शब्दसे स्वामीजीको अपना मत इष्ट है, क्योंकि वे अपने मतको बेदोक्त सिद्ध कहते हैं । स्वामीजीने स ० प्र ० के ११ समु ० २३० पृष्ठमें श्रीनानक के छ । मतवालोंके लिए लिखा है — ' यह मूर्तिपूजा तो नहीं करते; किन्तुं उससे विशेष ग्रन्थकी पूजा करते हैं । क्या यह मूर्तिपूजा नहीं है? ' स्वा ० परमामा --इस दयानन्दजीने यहांपर ग्रन्थकी पूजा अर्थात् सम्मानको भी मूर्तिपूजा ग बताया है । फिर वे इसकी स्पष्टता करते हैं- ' किसी जड़ पदार्थके द् श्राहु: - सामने शिर झुकाना वा उसकी पूजा करना सब मूर्तिपूजा हैं ' । अब यहां व चतुरपा प्रतिमा इस स्वामीजीके वेदोक्त वाक्यकी परीक्षा करनी चाहिये कि - श्रार्यसमाज होते; शंक भी मूर्ति पूजक है वा नहीं? ' पूजा ' का अर्थ ' सम्मान ' हुआ ' करता है, उणादिकोष चाहे वह प्राचीन ढंगले किया जाय वा श्राज़कल के ढंगसे । व इति राति देखिये-( १ ) ला लाजपतरायकी मूर्तिपर १७ नवम्बरको डी ० ए ० वी ० लक्ष्य को कालेज के स्टाफ तथा गुरुकुलवालोंकी प्रोरसे लाहौर में फूल चढ़ा ( संबसरस ) जाते थे, अबे भी कहीं चढ़ायें जाते हैं । यह भी स्पष्ट ही मूर्तिपूजा है परी ( उपा क्योंकि यह उनका सम्मानप्रदर्शनभ्यो । यदि यह कह कहा जावे कि तः ) इमारी हमें उनके बुत्तकी पूजा लक्ष्य नहीं, किन्तु उस हस्ती: ( सत्ता ) ला ० रायस्पोष लाजपतराय के व्यक्तित्वका सम्मान करना लक्ष्य है - जिसने कि- मूर्ति | देशकेलिए अपना उत्सर्ग करदिया तो मूर्तिपूतांके विषय में भी करनी सर्व ग्रह क्यों नहीं सोचा जाता? वहां भी तो पत्थर सम्मानका कहना वेदले बच्चा नहीं होता; किन्तु शिव, विष्णु यादि ही पूजाके लक्ष्य को मूर्ति | होते हैं, साकार मूर्तिपर साकार फूल चढ़े, इससे ' निराकार सत्तापर र्तपूजक है । हमारी निराकार श्रद्धा चढ़ी लक्ष्य सम्मान सिद्ध हुआ । फलतः 1 | बा ० लाजपतराय की जड़ मूर्तिका सम्मान भी स्वामीजीके अनुसार मूर्ति -पूजा सिद्ध हुई । की भूमिका क्या है वह CC - 0. Ankur Joshi वेद प्रतिमोपासना ३६१ ( २ ) आर्यसमाजी लोग सन्ध्या समाप्त करके परमात्माको फिर उठते हुए नमस्कार करते हैं; क्योंकि उनकी सन्ध्याका अन्तिम मन्त्र ' नमः शम्भवाय ' है । उस समय सामने या कोई दीवार होती है-पृथ्वी वा श्राकाश | इन जड़ोंके सामने उनका सिर झुका - यह भी स्वामीजीके उक्त वेदोक्त वाक्यके अनुसार V मूर्तिपूजा हुई ' कि- वहां नमस्कारके । यदि कहा जावे लक्ष्य पृथिवी आकाश नहीं थे; किन्तु परमेश्वरही था — तो यही बात मूर्तिपूजामें भी समझी जा सकती है । वहां यह नहीं कहा जाता कि ऐ पत्थर! तुझे नमस्कार करता हूँ किन्तु कहा जाता है- ' श्रीविष्णवे नमः ' । ( १ ) झण्डाभिवादन श्रार्यसमाज़में भी होता है— कांग्रेसमेंभी ग्रार्य-समाजियोंद्वारा सम्पन्न होता है । मण्डेपर पुष्पमालाभी चढ़ाई जाती है, खड़े होकर उसकी सलामी की जाती है । जड़के सामने उसका सम्मान पर्व प्रकारसे मूर्तिपूजा ही सिद्ध हुईं । यदि कहा जावे कि वह प्रतीक ॐ का है वा भारतमाताका है - श्रतः उसीका सम्मान होता है, न कि— लाल बा भगवे वस्त्रका; तो यही. बात मूर्तिपूजामें भी जानी जा सकती है । ( ४ ) श्रार्यसमाज परमात्माकी पूजा तो मानता ही है । तब वह · जिसभी प्रकारसे उसकी पूजा करे, वह मूर्तिपूजाही होगी । सर्वव्यापककी कभी किसी व्याप्य वस्तुके बिना पूजा की ही नहीं जा सकती; क्योंकि ; पूजक उसके समान निरवच्छिन्न व्यापक नहीं । पूजक परमात्माकी पूजा किसी एक सीमित स्थानपर ही करेगा, सीमित दिशाकी ओर मुंह करेगा, Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 216

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३६२ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) सीमितही रूपसे उसे नमस्कार करेगा; सीमित ही वेदमन्त्र पढ़ेगा तो यह सब मूर्तिपूजाका ही प्रकार हो जाता है । फलतः जबतक पूजक स्वयं सीमित है; उस असीमितकी असीमित रूपसे पूजा कभी कर ही नहीं सकता । तब उस असीमितकी सीमित पूजककेद्वारा पूजा - यह मूर्तिपूजा ही होती है चाहे पुजारी इसे यह नाम न देकर ' ईश्वरोपासना- प्रार्थना'नाम दे । सीमित पूजकका मनभी उस असीमितकी थाह नहीं पा सकता । सीमितका सीमित मुखभी असीमितका गुणानुवाद नहीं कर सकता । पर जब करता है; तो स्पष्ट मूर्तिपूजाके ढंगसे, क्योंकि वह पूजक स्वयम् एक - देश में होता है इसलिए उसकी एक - देशी ही पूजा करता है । एकदेशी पूजा मूर्तिपूजा ही होती है | जब वह ' प्राची दिगग्निः ' मन्त्रसे पूर्व दिशामें उस परमात्माकी स्तुति प्रार्थना कर रहा होता है उस समय वह अन्य दिशाओंमेंभी व्यापक उसकी स्तुति प्रार्थना न कर सकनेसे उसे मूर्तिकी " तरह सीमित कर रहा होता है । जब यह ' दक्षिणां दिगिन्द्रो ' बोलकर दक्षिण में परमात्माकी स्तुति - प्रार्थना कर रहा होता है— उस समय शेष दिशाओंमें उसका ध्यान न कर सकनेसे पूजक ईश्वरकी मूर्तिकी तरह सीमित पूजा कर रहा होता है । जब पूजक परमात्माका उपस्थान करता है अर्थात् उसको अपने निकट होनेकी बुद्धि रखता है यह भी मूर्तिपूजा हो हो जाती है । फलतः परमात्माका पुजारी प्रत्येक दशा में मूर्तिपूजाकी ही शैलीको अपनाये बिना नहीं रह सकता । हाँ, कोई नास्तिक हो -उसका पुजारी न हो - तो यह भिन्न बात है । ( ५ ) सन् १६१५ में गुरुकुल काङ्गड़ीके वार्षिकोत्सवपर वेदपुस्तकोंको, CC.Ankur Joshi Collection वेदमें प्रतिमोपासना ३८३ सम्मान देने के लिए उन्हें सभापति बनाया गया था -- स्वामीजी के पूर्वोक वाक्यके अनुसार यह मूर्तिपूजा है । इस मूर्तिपूजाको स्वा ० श्रद्धानन्दवी परम ( उस समय के ला ० मुन्शीराम ) ने सम्पन्न किया था । जनवश ( ६ ) वेद - पुस्तकों तथा स्वामीजीकी प्रतिमाको सम्मानार्थ कहा जाता विशिष्ट स्थानपर रखना तथा पत्रोंके मुखपृष्ठपर रखना —यह एक वे एकमेंक परस्पर - वि मूर्तिपूजा है । लौकिक, फलतः प्रतिसोपासना जहां वैदिक है वहां सभी सम्प्रदायोंमें | होना तो स ब्याप्त भीं है । घंटा घंडियाल वा शंख बजाना ही केवल पूजा नहीं होती । नहीं, अंपि पूजाके भी कई प्रकार होते हैं।कोई सिरसे हैंट उतार लेनेसें ही पूजा का एवं है । लोकोच साहित्य है, कोई फूलमाला ही चढ़ा देनेसे पूजा " करता है, कोई ' स्तुति प्रार्थना विरुद्ध - धर्म कर देनेसे ही पूजा करता है । कोई विशेष दिशांकी ओर मुख करके रसका ईश्वरकी स्तुति करता है — कोई किसी एक स्थानपर बैठकर प्रभुको जाता है, उ प्रार्थना करता है यह सब मूर्तिपूजाके ही प्रकार हैं । फलतः मूर्तिपूजा जाता हैं । सर्वव्यापक है । इससे कोई ईश्वरपूजक सम्प्रदाय नहीं छूट सकता । ' निर्विकल्पक नहीं । फिर मूर्तिपूजाका खण्डन अपना खण्डन है । माना भी ज भी नहीं मा I • एकबार ' प्रकाश ' पत्रके ऋष्यङ्कके मुख पृष्ठपर स्वा ० देवजी की मूर्ति माना जाता थी । दूसरी ओर उनके मुखके साथ ' भल्ले ' के बूटका चित्र था; इससे आर्यसमाजी विगड़ उठे थे कि - यह स्वामीजीका अपमान किया गया है । इसपर सम्पाटक, महाशय - कृष्णने फिर वैसा न करनेकी प्रतिज्ञा की थी । स्वामी ८० जी की मूर्ति पर पांव रखनेसे हैदराबाद दक्षिण में • श्रार्यसमाजी - गण श्री बुद्धदेवजीपर चिंगड़ उठे थे कि तुमने महर्षिका अपमान किया है - यह सब Gujarat. An eGa वामी जी के अनुसार मूर्तिपूजा है ।

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३८३ ... ( १६ ) अवतारवाद - रहस्य के पूर्वोक दानन्दजी परमात्मा यद्यपि निरोकारें और सर्वव्यापक होता है, तथापि प्रयों-जनवश अपनी सर्वशक्तिमन्त्रा से साकार भी हो जाता है । ' यहाँ यह कहा जाता है कि ' निराकारत्व और साकारत्व परस्पर विरुद्ध धर्म है, नाय रु वे एकमें कैसे रह सकते हैं? " इसपर यह जानना चाहिए कि एक वस्तुमें परस्पर विरुद्धता न होना यह लोकका विषय है, लोकोत्तरका नहीं । प्रलौकिक, लोकोत्तर अथवा सर्वशक्तिमानमें परस्परविरुद्ध - धर्मवाला दायम होना तो स्वाभाविक हुआ करता है । प्रत्युत ऐसा होना उसका दूषण हीं होती । नहीं, अपितु भूषण होता है । परमात्मा भी अलौकिकः सर्वशक्तिमान् एवं लोकोत्तरधर्मा है अतः उसमें परस्परविरुद्ध धर्मवत्ता भी स्वतःसिद्ध जा का है । साहित्य में ' रस ' अलौकिक माना गया है, इसी कारण उसमें परस्पर ति - प्रार्थना विरुद्ध - धर्म भी माने जाते हैं | । पाठकगण देखें-ख करके रसका ' कार्य P ' होना खण्डित करके फिर उसे ' कार्य ' सिद्ध किया प्रमुख जाता है, उसका ' ज्ञाप्यत्व ' निराकृत करके फिर उसे ' ज्ञाप्य सिद्ध किया मूर्तिपूजा जाता है । रसको ' परोक्ष ' भी नहीं माना जाता, अपरोक्षभी नहीं । उसे - सकता । ' निर्विकल्पक ज्ञानग्राह्य ' भी नहीं माना जाता, ' संविकल्पक ज्ञानग्राह्य ' भी नहीं । फिर उसे वैसा ( सविकल्पकंज्ञानुग्राह्य तथा निर्विकुल्पकज्ञानग्राह्य ) माना भी जाता है । उसे ' भविष्यत् ' भी नहीं माना जाता, ' वर्तमान ' की मूर्ति मी नहीं माना जाता । फिर उभग्राभाव - स्वरूप; उसको उभयात्मक भी इस माना जाता है । 1; है । इसपर वादीका प्रश्न होता है कि वह ( रस ) परस्पर विरुद्ध क्यों स्वामी होता हैं? और वह स्वयं है क्या वस्तु? उसपरे साहित्यकार गए श्री देते हैं - ' तस्माद् अलौकिकः सत्यं वेद्यः सहृदयैरयम् ' ( ' साहित्यदर्पण ' यह सब CC - 0. Ankur Joshi अवतारवाद - रहस्य ३६५ तृतीय परिच्छेद ) अर्थात् - रस अलौकिक लोकोत्तर है । इसे सहृदग्रही जान सकते हैं । फिर वादीका प्रश्न होता है कि वस्तुकी परस्पर विरुद्धता तो दूषण हुआ करती है, इस ( रस ) में वह कैसे हैं? इसी श्रभिप्रायसे ' काव्य-' प्रकाश ' में शङ्का की गई है कि- ' कारकज्ञापकाभ्यामन्यत् क्व दृष्टम्? ' अर्थात् - इस संसारमें वस्तु या तो कारक होती है या ज्ञापक, पर यह रस कारक वा ज्ञापक दोनोंसे भिन्न कैसे हैं? इसपर वहां सिद्धान्तो द्वारा उत्तर दिया गया है कि- ' न ' क्वचिद् दृष्टम् ' इति लौकिकत्व-सिंद्धेभूषणमेतद् न दूषणम्! उभयाभावस्वरूपस्य च उभयात्मकत्वमपि पूर्ववल्लोकोत्तरतां · गमयति, न तु विरोधम् । चतुर्थ उल्लास, रसनिरूपण ) तात्पर्य यह है कि इस संसारमें कारक. ' और ज्ञापकसे भिन्न वस्तु 1 कोईभी नहीं देखी गई । पर यह रस उनसे भिन्न देखा गया है अतः यह स्पष्ट है कि रस संसारी लौकिक वस्तु नहीं, किन्तु अलौकिक - लोको-तर वस्तु है । लोकोत्तरतामें परस्पर विरुद्धता स्वाभाविक हुआ करती है । उभयाभावस्वरूप होकर भी उभयात्मक होना --- यह श्रलौकिकताका भूषण है, दूषण नहीं । यही परस्पर विरुद्धताही वस्तुकी लोकोत्तरता की परिचायिका है । इस प्रकार सिद्ध हुआ कि परस्पर विरुद्धधर्मवत्ता वस्तुकी श्रलौ-' किकता बताती हैं । रस अलौकिक है, अतः उसमें परस्पर विरुद्धधर्म होना भी स्वाभाविक है । इसी प्रकार परमात्माको ' रसो वै स. ' ' तैत्ति-योपनिषत्, ब्रह्मानन्द वल्ली २ सप्तम अनुवाक, धथवा तैत्तिरीयार-२७ ) इस प्रकार रस - स्वरूप माना जाता है । परमात्माको अलौकिक तथा सर्वशक्तिमान् सभी मानते हैं । इसीलिए उस परमात्मा में ' निराकार - साकार ' रूपमें परस्पर विरुद्धधर्मवत्ता उसकी अलौकिकताकी Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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३६६ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) सिद्धि में अमोघ अस्त्रही है । इस प्रकार परमात्मा अलौकिक तथा सर्व-शक्तिमान् होनेसे निराकारभी होता है और साकारभी । वह अपनी सर्वशक्तिमत्तासे प्रयोज्या - शक्तिको आविष्कृत करता है, अप्रयोज्या - शक्ति को नहीं । वस्तुतः परमात्माको जो कि निराकार कहा जाता है - वहां उसके आकारका निषेध इष्ट नहीं होता । आकारका परमात्मामें सर्वथा निषेध इष्ट होनेपर तो उसमें शून्यतापत्ति प्रसक्त होगी । श्रतः वहाँपर ' निरा .कार ' शब्दका ' अनिवर्चनीय आकार वाला ' इस अर्थ में तात्पर्य हुआ * करता है । जैसे कि किसीने पूछा कि वहांपर कितने पुरुष थे? दूसरेने उत्तर दिया कि असंख्य । यहांपर ' असंख्य ' कहनेसे उक्त पुरुषोंका संख्याराहित्य अभिप्रेत नहीं होता, क्योंकि उनकी कोई न कोई संख्या तो हुआ ही करती है, किन्तु जैसे वहां पर श्रभावार्थक भी ' नज् ' संख्याकी श्रनिर्वचनीयताको बताया करता है, वैसे ही ' निराकार ' शब्दमें भी ‘ निर् ’ शब्द श्राकारको अनिर्वचनीयता - दिव्यताको बताता है । जैसे कि ईश्वरके विषयमें वेदोंमें ' नेति - नेति ' ( बृहदारण्यक ४ ( ६ ) ४।२२ ) सुना जाता है । यहांपर परमात्माके निषेधर्मे तात्पर्य नहीं रहा करता किन्तु उसकी अनिर्वचनीयतामें तात्पर्य हुआ करता है, वैसे ' निराकार ' का ' निर् ' शब्द भी आकारके निषेधमें तात्पर्यवान् नहीं, किन्तु उसके श्राकारकी अनिर्वचनीयतामें तात्पर्य रखता है । उस निराकारत्वमें न तो परमात्माकी उपासना हो सकती है, न स्तुति, न कीर्तन । न उसका निराकारत्वमें ध्यान हो सकता है, न उसे हम जान सकते हैं । श्रगम्य एवं अचिंत्य होनेसे न हमारे जीवनपर उसका कुछ प्रभाव पड़ता है, न हम अपनी त्रुटियां पूरी करने और अपनेको उच्च अवस्थामें लानेके लिए उससे कुछ प्रार्थना कर सकते हैं, क्योंकि किसी मानुषी गुण प्र ेम, दयालुता श्रादिका हम उस निराकारके साथ सम्बन्ध नहीं कर सकते, न किसी प्रकारसे उसकी सुकापूजा पूजा कर सकते क ction अवतारवाद - रहस्य ३६७ हैं, यह हम गत १४ वें निबन्ध में बता चुके हैं । वह हमारे ज्ञानका परम लक्ष्य तो हो सकता है इस रूपमें ३६८ , पर उपास्य नहीं । उपास्य वह अपने विशिष्ट रूपोंमें ही साकार ही हुआ करता है । रूपमें परमा अलौ पहले कहा जा चुका है कि परमात्मा लोकोत्तर होता है, श्रत: प्रकार उसमें विरुद्ध - धर्मं होना स्वाभाविक है । अब उस ( परमात्मा ) में होनेसे वेदादिशास्त्रानुसार परस्पर विरुद्ध धर्म देखें- ध्रुवता ‘ अजायमानो बहुधा विजायते ' ( यजुर्वेद वा ० सं ० ३१।१६ ) यहाँ - पर परमात्माको ' अजायमान ' कहा है, इधर ' विजायते ' से उसका विशेष वायु, विशिष्ट जन्म कहा है, यह परस्पर विरुद्धता है ' स एव मृत्युः सोऽमृतम् ' ( श्रथवं-शौ ० सं ० १३।४-३।२१ ) यहांपर गया है । ' तदेजति - तन्न जति, तद्दूरे -तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः ' ( यजुर्वेद वा ० -शील तथा चलनक्रियारहित, दूर -बताया है । ये भी परस्पर विरुद्ध - धर्म ( ऋ ० शा ० सं ० १०।११६ । १ यहांपर -कहा है । ' अणोरणीयानू, महतो होने की उसे मृत्यु तथा अमृत कहा ए तद् अन्तिके । तदुन्तरस्य सर्वस्य नहीं हो सं ० ४०१२, यहां उसे चलनक्रियां-और समीप, भीतर और बाहर जाता हैं । ' नासदासीद्, नो सदासीत् परमात्म निराकार उसे सत् अथवा असत् से मिन्न छोटे - छी महीयानू ' ( श्वेताश्वतरउपनिषत् अवतार ३।२० ) ' सर्वेन्द्रिगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ( श्वेता ० ३ / १७, गीवा सबस १३/१४ ) नमो ज्येष्ठाय च कनिष्ठाय च नमः पूर्वजाय च श्रपरजाय च ' स्थूल है, ( यजुः वा ० सं ० १६।३२ ) यहां परमात्मा को छोटेसे छोटा और ब जाता है बढ़ा इन्द्रियसहित और इन्द्रियरहित कहा है । जिन उपनिषदोंमें उसे श्रादि छ ' अपाणिपादो जवनो ग्रहीता ' ( श्वेताश्व ३ | १६ इस प्रकार निराकार नामसे कहा है, वहीं उसे ' सर्वतः पाणिपादं तत् सर्वतोक्षिशिरोमुखम् ( श्वेता ० आदि ३।१६ ) ' विश्वतश्चतुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात् ' सूक्ष्म पर Gujarat, An eCan & या १७।१६ ) इस प्रकार साकारभी कहा है । तथ ( ४६ ) नि श्रवकाश

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३६७ ३६८ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) उपास्य रूपमें परमात्मामें विरुद्धधर्मता सिद्ध होनेसे उसमें अलौकिकता सिद्ध हुई अलौकिकता होनेसे उसमें निराकारती साकारताभी सिद्ध हुई । इस प्रकार उसे निर्गुण तथा सगुण, न्यायकारी तथा दयालु भी लोकोत्तर है, अत: होनेसे कहा - जाता है । जब परमात्मा साकारभी सिद्ध होगया; तब उसके मा ) में श्रवतार होनेमें कोई भी बाधा न रही । जबकि वह ब्रह्माण्डके श्रणु - श्रृणु. और उसकी शक्ति श्रग्नि, - ) यहाँ वायु, आकाश, पृथिवी श्रादिमें श्रोत - प्रोत हो रही हैं, तब वह किसी. विशेष विशिष्ट केन्द्र में भी प्रकट हो जाता है । इसी विशेष केन्द्रमें प्रकट ( श्रयवं- होनेको परिभाषा को ही " " अवतार कहा जाता है । कहा एक स्थल में उसकी प्रकटता हो जानेपर उसकी श्रन्यत्र सत्ता नष्ट सर्व नहीं हो जाती, श्रथवा वह इससे एकदेशी नहीं हो जाता । जोकि कहा नक्रियां-जाता है कि — ‘ अखण्ड, सच्चिदानन्द, निर्विकार, परिपूर्ण, सर्वशक्तिमान् र बाहर परमात्माका अवतार नहीं हो सकता, क्योंकि वह सबसे बड़ा और दासीत् निराकार है, तब वह मनुष्य प्रादिके, छोटे - छोटे शरीरों और बहुत ने मित्र छोटे - छांटे गर्भाशयोंमें कैसे प्रवेश " कर सकता है? इस कारण उसका पनिषत् श्रवतारभी नहीं हो सकता ' - इसपर यह जानना चाहिये कि श्राकाश गीता सधैं ससारी पदार्थोंसे बड़ा है और निराकार है । परमात्माकी अपेक्षा महा-वायच ' स्थूल है, क्योंकि परमात्मा के लिए ' सूक्ष्माच्च तत् सूक्ष्मतरं विभाति ' कहा बड़ेसे जाता है । इस प्रकार उस परमात्माकी अपेक्षा स्थूल भी श्राकाश घड़ा में उसे आदि छोटी - छोटी वस्तुओंमें अपनी पूर्णतासे प्रवेश करके घड़े में घटाकाश निराकार नामसे और महदादिमें मद्दाकाश श्रादि नामसे प्रसिद्ध हो जाता है, ' घट आदिके नाशमेँ भी उसका नाश नहीं होसकता, तो श्राकाशसे भी महा-स्पात् ' सूक्ष्म परमात्मा यदि माताके गर्भाशय में ' जन्मकर्म च मे दिव्यम् ' ( गीतां । राय ( ४६ ) दिव्यरूपसे श्रवतीर्ण हो जाता है, तो इस विषय में आश्चर्यका अवकाश क्या? CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रवतारवाद - रहस्य ३६६ • जब भगवान् न होता हुआ भी निराकार जीव, देहके सम्बन्धसे विकारको प्राप्त नहीं होता, तब भगवान् सर्वशक्तिमान्, स्वतन्त्र, मायाका वशकर्ता परमात्मा अवतार लेनेमें भी विकारयुक्त नहीं होता । श्रग्नि र बिजुली निराकार रूपमें सर्वव्यापक होते हैं, परन्तु घर्षणादि णवश ये कहीं - कहीं प्रकट भी हो जाते हैं । एक स्थलमें प्रकट होकर कार-अन्य स्थानमें उनकी सत्ता नष्ट नहीं होती, और न कहीं उन्हें बन्धनही भी होता है । बादलों में प्रत्यक्ष दोखती हुई भी विद्युत् वहांसे नीचे गिर करभी अन्य स्थल में नष्ट नहीं हो जाती, उसकी सर्वव्यापकता पृथिवीपर फिर भी श्रनुष्ण रह जाती है । एक स्थानमें प्रकट होकर तथा बुझकर भी श्रग्नि अन्यत्र अभाववान् नहीं हो जाती, और न ही वह मूलभूत महाग्निसे. भिन्नही होती है, वा भिन्न रहती है- ' पूर्णस्य पर्णमादाय पूर्णमेवा-वैशिष्यतेः ( बृहदारण्यक शृ १।१ ) । --- ५.१ निराकार रूपमें भी यद्यपि श्रग्नि सर्वव्यापक रहती है, तथापि वह साधा-रण पुरुषोंके उपयोग नहीं सकती । कहीं प्रज्वलित होने परभी उसकी G सर्वव्यापकतामें बाधा नहीं श्राती । प्रज्वलित श्रप्रज्वलित अग्निमें कोई वास्तविक भेद नहीं हुआ करता, परन्तु प्रज्वलित होकर ही वह लौकिक पुरुषोंके उपयोगमें श्रातो, है । इस कारण उस समय वह उपास्य भी होती है । यही बात परमात्मा के अवतार विषयमें भी समझनी चाहिये । उस समय परसात्माका श्र ेष्ठोंके साथ स्नेह तथा अधर्मो के प्रति क्रोधमी स्वाभाविक होता है । उस समय औपचारिकतासे उसका जाति - विशेषसे सम्बन्ध तथा वर्णाश्रमधर्मसे सम्बन्धभी जनशिक्षार्थं हो जाता है । जैसे एक अग्निका एक देशके भी भिन्न - भिन्न स्थलोंमें एक साथ ही प्राकट्य होजाता है; वैसेही दो अवतार भी राम - परशुरामकी भांति एक देश तथा एक समय में भी प्रकट हो जाते हैं । उसप्रज्वलित अवताराग्नि के पृथिवी से तिरोभूत हो जानेपरभी उसकी शक्ति दिव्य होनेसे यहां भी अक्षुण्ण रह Gujarat. Anari रासायनिष्ठोपे वजन केयर करने SIDLIADA

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४०० श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) जा सकता है । वही दुही हुई प्रज्वलित शक्ति भक्तोंकी कामनाओंको पर्ख करती है, अतः वह उसके अधिकारी पुरुषोंसे उपास्य भी हुआ. करती है । यही म ूर्तिपूजाका भी रहस्य है, श्रवतारवाद ही मर्तिपूजाका प्राण हुआ करता है । जिस समय कोई दो लकड़ियोंको घिसता है, उनके संघर्ष से, अथवा पत्थर - लोहेको रगड़से अथवा दियासलाईले वा श्रातिशी शीशेसे अग्निका प्राकट्यही अग्निका अवतार है; वैसेही जय श्रासुरी सम्पत्ति देवी सम्पत्तिले संघर्ष करती है उस समय निराकार परमात्मा साकार होकर प्रकट हो जाया करता है, इसीको परिभाषिक रूपमें ' अवतार ' कहा जाता है । जैसे ' धनुदरा कन्या'का यह अर्थ नहीं कि ' पेंटसे रहित लड़की " क्योंकि पेटके बिना लड़की हो ही कैसे सकती है? तब ' ' अनु- ' दरा कन्या ' का अर्थ किया जाता है बहुत सूक्ष्म, छोटे पेट वाली * लड़की । जैसे कि – ' अनलङ कृती पुनः क्वापिं ' में श्रालङ्कारिक लोग नका अभाव अर्थ ' अलङ्काररहित शब्दार्थ ' न कहकर ' कहीं - कहीं अस्फुट अलङ्कार वाले शब्द और अर्थ ' यह अर्थ किया करते हैं । चित्रकाव्यमें ‘ श्रव्यङ्ग्य’का ‘ व्यङ्ग्न्यसे रहित शब्दचित्र, अर्थचित्र करके जैसे ‘ अस्फुट व्यङ्ग्य ' यह अर्थ किया जाता है; वैसेही ' निराकार ' शब्दमें स्थित ' निर् ' परमात्माके आकारका सर्वथा निषेधक नहीं । वेद में परमात्मा के लिए श्रायां ' हुधा ' नेति नेति ' ( बृहदार ० ४ ( ६ ) ४।२२ ) शब्द परमात्मा के प्रभावको नहीं बताता; किन्तु उसके श्राकारकी ‘ अनिर्वचनीयता ' ही ' निर् ’ शब्दसे योतित होती है, अन्यथा ‘ निराकार ’ में ' निर् ' शब्द सर्वथा अभाव अर्थ वाला माना ' जावे; तो परमात्मामें शून्यताकी प्रसक्ति हो जावेगी । परं यह इष्ट नहीं, अतः ' निराकार ' का अर्थ ' अनिर्वचनीय ' वा ' सर्वजनदुर्वेद्य श्राकार ' वाला ' यही अर्थ है, ' साकार ' का ' सर्ववेद्य ' ' अपना ' वचनीय आकार विशेष वाला ' यह अर्थ है । तब इसमें उस परमात्माकी लोकोत्तरताकै कारण कोई दोष वा CC - 0. Ankur Joshi Collection अवतारवाद - रहस्य ४०१ ४ विरोध नहीं पड़ता । निराकारभी जीवात्मा जब अल्पशक्तिवाला होता ज हुआ भी प्रकारको धारण कर लेता है; तब सर्व - शक्तिमान् होकर भी परमात्मा मायिक - शरीर धारण करके साकार क्यों न बन सके? थ जो यह कहा जाता है कि ' जीव तो कर्मबन्धनमें बद्ध होकरही क शरीर - वारण करता है; तो क्या परमात्मा भी बन्धन - बद्ध है, शरीरधारणरूप - अवतार ग्रहण करता है? ' इसपर यह जानना चाहिये म स कि कैदी तो किसी कर्मके कारण - चाहे चोरी आदि दुक या वा देश वा धर्मविशेषका हित- विशेषरूप सुकर्म हो, जो राजाको प्रिय ने हो— जेलखाने में थाता है और उसमें बन्धा रहता है, उस कर्मक दण्डको अवधि समाप्त होनेपर राजाके द्वारा जेलखानेसे छूटता है; पर ' राजा उसी जेलखाने में अपराधियोंपर दया करनेके लिए स्वयं स्वतन्त्रता का से श्राता है । इस प्रकार परमात्मा भी, क्योंकि ' जन्म कर्म च मे दिव्यं गा ( गीता ४६ ) न मां कर्माणि लिम्पन्ति ' ( गीतां ४ । १४ ) ग । श्रवतार होने में प्रमाणभूत ' प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तरजायमानो उस बहुधा विजायते । ' ( वा ० यजुर्वेद सं ० ३१।१६ ) । इत्यादि बहुत से था वेदमन्त्र हैं । ' विजायते ' का अर्थ स्वामी दयानन्दजीने भी ' विशेषकर तभ ' प्रकट होता है ' यहीं किया है । ' विशेषकर प्रकट होना ' ही तो ' अवतार ' पुरा केच ' होता है; वैसे वह अप्रकट रूपमें तो सर्वत्र व्यापक रहता ही है । अस्तु, - इसी मन्त्रका अविकल तथा स्फुट अनुवाद - गय ' जोपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोपि सन् । प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य सम्भवाम्यात्ममायया ॥ ( ४।६ ) म ' यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत! कृत श्रभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् | ' ( ३/७ ) इत्यादि ' ' भगवद्गीता ' के पद्य हैं । ' महाभाष्य ' में कहा है –‘एक इन्द्रोऽनेकस्मिन् क्रतुशते श्र युगपत् सर्वत्र भवति । ( १२/६४ ) एक इन्द्र सैकड़ों यज्ञोंमें बुलाया Gujarat. An eGangotri Initiative