सनातन धर्मालोक ४ — पृष्ठ 31–40
सनातन धर्मालोक ४ · पृष्ठ 31–40
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२४ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ )... सनातन धर्मके सिद्धांतोंका संप २१ श्रात्महत्या कर ली है, उसकी यदि प्रोत कृत्य श्रादिसे सद्गति न कराई जाए, तो अन्य जन्ममें उसे प्रतकी योनि मिलती है । जिस बस्तुमें श्रासक्त होकर उसने देह छोड़ी, प्रतत्व में वह उसी में रहा करता है । प्रतलोक हमारे लोकके साथ है । प्रतोंके साथ संवाद भी हो सकता है । ( ख ) — योनियाँ अनन्त होती हैं, जीव मनुष्य योनिमें थानेसे पूर्ण ८४ लाख योनिमें घूमा करता है । वृक्ष आदि भी योनि हैं, इसमें २० लाख बार जन्म होता है । फिर ११ लाख बार स्वेदज कीट पतङ्ग यादियोंकी योनियाँ मिलती हैं । फिर १६ लाख बार अण्डज मछली पक्षी आदि योनियों में घूमना पड़ता है । फिर ३४ लाख बार जीवको पशु योनि मिलती है । इस प्रकार ८४ लाख योनियोंमें चक्कर लगाकर जीव उसके बाद मनुष्य योनिमें श्राता है । इस मनुष्य योनिमें सुकर्म वा कुकर्म करके उनके अनुसार उच्चयोनियों वा निम्न योनियोंमें जाता है । बड़े कुकमों को करके यदि मनुष्य योनिसे गिरता है, तो फिर ८४ लाख की पूर्वोक्त योनियोंके चक्करको प्राप्त करता है । साधारण कमों को करता हुआ अन्त्यजशूद्र आदि की योनिको प्राप्तहोता है । उत्तरो-तर सुन्दर श्रीचरण करता हुथा क्रमशः श्रन्य जन्मोंमें अन्त्यज से शूद्र, शूद्र से वैश्य वैश्यसे क्षत्रिय और क्षत्रिय से ब्राह्मण जातिको प्राप्त करता हैं । उसमें भी अच्छे कर्म करता हुआ विद्वाम् ब्राह्मण, फिर उससे भी आगे इन्द्र, वरुण, सूर्य आदि देवयोनिको, गन्धर्व किन्नर-यह आदि देवयोनि विशेषको वा ऋषि योनि वा पितृयोनिको प्राप्त करता है । वैसे ही मन्दकमों को करता हुआ असुर, राक्षस, भूत प्रेत पिशाच आदि योनिको प्राप्त होता है । यह सब योनियां कर्मा-नुसार होती हैं । हां, पशुयोनिमें हुए सुकर्म - कुकर्म कोई लाभ - हानि नहीं देते । वे भोगयोनि होने से स्वयं ही प्रकृतिके नियमसे क्रमश: अपने से उन्नत शुद्ध योनिको प्राप्त होते जाते हैं । इसलिए अन्त्य शूद्रयोनिमें पशुत्व का अंश भी रह जाने से उसमें अपवित्रता एवं धर्म- न्यूनता होती है । इसी प्रकार देवयोनिमें भी हुए सुकर्म कुकर्म -विशेष लाभ - हानि देने वाले नहीं होते । उसमें भी प्रकृतिके क्रमसे स्वयं ही देव योनियां मिलती रहती हैं । पशुयोनिके चक्कर समाप्त होते ही फिर जीव स्वयं ही मनुष्य योनि में ग्रन्त्यजादित्वको प्राप्त करता है । देवयोनि क्रम समाप्त होते ही जीव स्वयं ही मनुष्ययोनि में ब्राह्मणादि जाति में श्राता है । इसलिए ब्राह्मण जातिमें देवत्व का अंश होनेसे उसे भूदेव कहा जाता है । मनुष्य योनि ही कर्मयोनि है, देवयोनि और पशुपक्षियोनि तो भोगयोनियाँ हैं । कर्म का फल तदनुसार उन्नति अवनति मनुष्ययोनि में ही मिलती है । इस कारण अच्छे जन्मको चाहने वाले पुरुषको सदा शास्त्रोक्त सुकर्म ही करने चाहियें । ( ७ ) तीर्थयात्रा — ' तीर्थैस्तरन्ति ' ( नपर्न ० १८४७ ) ' सर्ग-तीर्थानि पुण्यानि पापघ्नानि सदा नृणाम् | ' ( शङ खस्मृति ८।१३ ) | भारतदेश धर्मभूमि है, उस धर्मके केन्द्रस्थान ही तीर्थ हैं । ' तीर्थते ऽनेन इति तीर्थम् ' यह इसका विग्रह है । जैसे इधर - उधर बिखरी हुई सूर्य की किरणें सूर्यकान्तमणिमें इकट्ठी हो कर जला भी सकती वैसे ही भगवान्की शक्ति विशिष्ट केन्द्रों - प्रतिमा, तीर्थ आदि में इकट्ठी होकर लोगों के पाप भी जला सकती हैं । इससे उनका पुण्य बढ़ता है, शरीर, मन तथा बुद्धिकी उन्नति हो जाती है । गङ्गा, यमुना, सर-स्वती, सरयु, नर्मदा आदि नदियां, काशी, कान्ची. अयोध्या, मथुरा, वृन्दावन, द्वारका, सेतुबन्ध रामेश्वर, जगन्नाथ, बदरीनारायण, कुरुक्षेत्र श्रादि स्थल तीर्थ हैं । बदरीनारायण उत्तर दिशामें भारतके परले तट पर है, उसमें श्रीनारायणकी मूर्ति विराजमान है । द्वारका पश्चिम दिशामें भारतके परले तट पर है । उसमें श्रीकृष्णजीका मन्दिर CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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२६ श्रीसनातनधर्मालीकः ( * ) है । सेतुबन्ध रामेश्वर दक्षिण दिशामें भारतकें परले तट पर विराज-मान है । श्रीरामने उसमें सेतु बन्धनके समय शिवलिङ्गकी पूजा की थी । श्रीवाल्मीकि रामायण में उस तीर्थको ' पवित्रं महापातक नाश-नम् ' ( युद्ध ० १२५।२१ ) कहा है । श्रीजगन्नाथ पूर्ण दिशा में भारतके अन्तिम कोनेमें विराजमान हैं । हरद्वार में गङ्गा आदि जलावतार तीर्थ हैं । वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड ३५ वै सर्गमें गङ्गाको ' सर्वलोकनमस्कृता ', और ' स्वर्ग-दायिनी ' माना है । श्रीसीताने उससे वर भी मांगा था ( ( अयोध्या ० ५२ सर्ग ) । ' लौकिक दृष्टिसे भी गङ्गामें अन्य नदियोंसे विशेषता है । गङ्गाजल वर्षो तक रखा हुआ भी विकृत नहीं होता । उसमें हैजा, प्लेग, मलेरिया प्रादिके कीटाणु कभी भी उत्पन्न नहीं होते । बल्कि उक्त कीटाणु गङ्गाजल में डाले हुए नष्ट हो जाते हैं । इसलिए गङ्गा स्नान तथा गङ्गाजलपान बहुत फल देने वाला होता है । उससे कठिन रोग भी शान्त हो जाते हैं । गङ्गाकी वायु सेवन करनेसे तो शरीर स्वस्थ रहता है । गङ्गाकी मट्टी मलनेसे शरीरमें कोई भी चर्म रोग नहीं होता । इन्हीं शक्तियोंसे गङ्गा देवी है । प्रयागराज और पुष्करराज आदि तीर्थराज हैं । प्रयागराज प्रयाग ( इलाहाबाद ) में हैं; उसमें गङ्गा, यमुना, सरस्वतीका सङ्गम होनेसे त्रिवेणी - स्नान होता है । पुष्करराज अजमेर के पास है, उसमें श्रीब्रह्मा जीने यज्ञ किया था । काशी भी महान् तीर्थ है, उसमें श्रीविश्वनाथ का दर्शन है । तीर्थयात्रा करनेसे; तीर्थजलके स्पर्शसे पाप नष्ट होते हैं, तीर्थ स्थित तपस्वी तथा विद्वानोंका दर्शन कल्याण कारक होता है । ' कुरुक्षेत्र ' को श्रीमद्भगवद्गीता में ' धर्म क्षेत्र ' ( १, १ ) कहा गया है । ( ८ ) पञ्च महायज्ञ -१ ब्रह्म ( ऋषि ) यज्ञ, २ देवयज्ञ ३ पितृयज्ञ, ४ भूतयज्ञ, २ अतिथि ( नृ ) यज्ञ - यह ५ महायज्ञ हैं । घर २८ सनातन धर्म सिद्धांतोंका संक्षेप २७ सन्ध्या और तम में चूल्हा ( रसोई ), २ चक्को, ३ झाडू, ४ ऊखल - मूसल, ५ जल का घड़ा — यह पांच अनिवार्य हिंसास्थान होते हैं । इनसे उपन्न होने उष्णका शुद्धि वाले पापोंकी निरृत्यर्थं उक्त पांच यज्ञ किये जाते हैं । १ वेद, शास्त्र, पुराणादियों का यथाधिकार पढ़ना - पढ़ाना, अथवा स्वाधिकृत सन्ध्या यह अधि में जप करना, वा स्वाधिकृत ग्रन्थका पाठ करना — यह ब्रह्मयज्ञ वा श्राचमन ऋषियज्ञ है । २ पके हुए हविष्यानकी अग्नि में आहुति देनी देवयज्ञ मन्त्रपाठ है । ३ यज्ञोपवीतको बाएं करके दक्षिणाभिमुख पितृतीर्थसे मृत और पितरोंके नामसे जल देना या ग्रास रखना पितृयज्ञ है T । ४ पूर्ण आदि करती है दिशाओं में पशु - पक्षी श्रादि प्राणियों के नामसे वलि रखना भूतयज्ञ जाया कर है । अपने भोजन से पहले ब्राह्मण श्रादि श्रतिथियोंको भोजन प्रदान भगवान्क करना अतिथियज्ञ होता है । ऋषियोंने हमें वेद पुराण आदि शास्त्रों उठ का ज्ञान दिया है— जिससे हम पाप पुण्य और कर्तव्य कर्तव्य जानते पिता कर एव हैं, देवता हमारी रक्षा करते हैं, हमें शक्ति, अन्न, सुख - सम्पत्ति देवे शौ हैं, असुरों से हमारी रक्षा करके हमें सुमति देते हैं, हमें भगवान् श्र जाकर सेहाथों ओर प्रवृत्त करते हैं । पितृगण हमें स्वास्थ्य, बल, वीर्थ, सुमति देते हैं, जिससे हमारा सांसारिक जीवन सुखमय होता है । सब कीटादि प्राणी करना चा अपने प्राणोंको देकर हमें पालते हैं, कई सांप, ततैया आदि विपाक सन्ध्या कर वायुको पीकर वायु - शुद्धि करते हैं, विविध शुद्धता किया करते हैं । तर्पणादि वृक्ष, फल आदि तथा अन्न यादि देकर, धर्मोपदेश देकर हमारा उपकार ( १० करते हैं, इन पांच शक्तियों के ऋणसे विमुक्तिके लिए पञ्चमहायज्ञ इस कारण .. का अनुष्ठान हमारा कर्तव्य है । इससे वे शक्तियाँ प्रसन्न हो जाती है का दूध भी इससे पूर्वोक्त सूना ( हिंसास्थान ) दोष हट जाया करते हैं । यदि पवित्र हो रोग - कीटा अनवकाशवश हम अन्य कुछ न कर सकें, तो पांच ग्रास भोजनसे है किजितन पूर्ण रख देने चाहियें । हैं, उनसे ( ६ ) त्रिकालसन्ध्या यदि नित्यकर्म — सन्ध्या तीर प्रकार की होती है, १ · प्रातः सन्ध्या, २ मध्यान्ह सन्ध्या, ३ सायं-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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२८ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) २७ सन्ध्या । मुख्य सन्ध्याएं दो हैं पूर्वा और पश्चिमा । इन्हीं दोमें और तमकी सन्धि होती है । मध्यान्ह में भी तम और प्रकाशरूप प्रकाश 4 जल उकाली सन्धि हो जाती है । सन्ध्यामें मार्जन शीत-होने, संकल्प, श्रासन-शास्त्र, शुद्धि, शिखाबन्धन, आचमन, प्राणायाम, सुर्योपस्थान, जप, परिक्रमा सन्ध्या यह अधिकारियोंके लिए समन्त्रक क्रियाएं होती हैं । सन्ध्या - मन्त्रों का विनियोग - ज्ञान भी घावश्यक है । सन्ध्यामें मार्जनसे बाह्य शुद्धि, ज्ञवा श्राचमनसे श्रनृत - शुद्धि प्राणायामसे शरीर - शुद्धि और देवयज्ञ मन्त्रपाठसे मनकी तथा वाणीकी शुद्धि, जपसे आयुवृद्धि, मृत और अन्तःकरणकी शरीरकी शुद्धि यदि शुद्धि इसी प्रकार यह आत्मशुद्धि हो जाया करती है । त्रिकालसन्ध्या करनेसे पूर्णकालके किये हुए पापकर्म भूतयज्ञ जाया करते हैं, और पुण्यका लाभ हो जाया करता नष्ट हो प्रदान भगवान् श्रभिमुख है, और चित्तवृत्ति शास्त्रा प्रवृत्त होती है । प्रातः ब्राह्म मुहूर्त में " चार बजे ) जानते उठ कर ईश्वरके नामको स्मरण करके शय्याको छोड़कर, माता-त्ति देवे पिता एवं गुरुत्रोंको नमस्कार करके, सम्भव हो तो शहरसे बाहर वान् की जाकर शौचादि करके, गुदादि प्रक्षालन करके, विधि अनुसार जल - मट्टी देते हैं, से हाथोंकी शुद्धि करके, पात्रको धोकर, दन्तधावन करके स्ना प्राणो करना चाहिये, फिर सन्ध्योपासन करे । द्विज एवम् उपनीत यथाविधि विपाक सन्ध्या करे; श्रनुपनीत एवं शूद्र हरिनाम - कीर्तनात्मक सन्ध्या करे । फिर रते हैं । तर्पणादि करे । इसके बाद पूर्वोक्त पञ्चयज्ञ करे । उपकार ( १० ) गोपूजन - गाय के रोम - रोममें अनेक देवता रहते है, महायज्ञ इस कारण गोपूजा से देवताओं सहित भगवान् प्रसन्न होते हैं । गाय जाती है । का दूध भी बहुत सात्त्विक होता है, उसको पीनेसे शरीर और मन यदि पवित्र हो जाते हैं । गोमूत्र और गोमय में भी बड़ी शक्ति है, उससे भोजनसे रोग - कीटाणु नष्ट हो जाते हैं । बड़े - बड़े वैद्य डाक्टरोंने सिद्ध कर है कि जितने रोग वा कीटाणुओंके नाशक दिया हैं, उनसे गोबरका चौका लगाना ता वायुसंशोधक पदार्थ तीर अधिक उपयोगी होता है । जिनके सायं CC - 0. Ankur सनातन धर्मके सिद्धांतों संक्षेप २६ मूत्र वा गोबर में भी इतनी शक्ति है, उसके अन्य अङ्गका क्या कहना इस कारण दूध न होने पर भी गाय का पालन भाररूप नहीं होता? गायके पालन- पूजनसे घर में रोग हट जाते हैं । ( ११ ) मृतकपितृश्राद्ध - - श्रद्धाकै साथ मन्त्रका उच्चारण करके इस लोक्से मृतक हुए नित्य पितृ, नैमित्तिक पितृ, प्रेत आदि की योनि प्राप्त पिता, पितामह आदि कुटुम्बीकी तृप्त्यर्थ शास्त्रविधि के अनुसार जो क्रियाकी जाती है, उसका नाम मृतक पितृश्राद्ध है । हिन्दुजाति इस लोकके साथ ही साथ परलोकपर भी दृष्टि रखती है, इसलिए ही इसमें पिता, पितामह, और प्रपितामहकी सद्गत्यर्थं तथा तृप्त्यर्थं श्राद्धक्रिया नियत की हुई है । जीवित पितरोंकी तो ' सेवा ' ही हुआ करती है, उनमें हमारी श्रद्धा भी होती है, पर ' श्राद ' शब्द तो पारिभाषिक होता है । इसमें श्रद्धाका मधुरभाव निहित होता है अपने जिन पिता श्रादिसे हमें देह प्राप्त हुआ, हमारा लालन - पालन हुआ, यदि उनके नामसे हम एक विशेष पात्रका सत्कार न करें, तो यह हमारी कृतघ्नता होगी । उनके नामसे दान करने पर परलोकगत उनका श्रात्मा तृप्त हो जाता है, शान्ति प्राप्त करता है, और उन्नति पाता है । श्राढा-नुष्ठान के यथावत् होने पर प्रेतयोनि प्राप्तका भी हट जाया करता है, उसे पिण्डदानसे मुक्ति हो जाया करती है । जैसे हज़ारों - कोर्सका शब्द रेडियो द्वारा तत्क्षण सर्वत्र प्राप्त हो जाता है, उस द्वारा उसे दुहा जा सकता है, वैसे ही मनः संकल्पद्वारा विधिले यन्त्र-से की हुई श्राद्ध श्रादि क्रियाएँ भी चन्द्रलोकस्थित एवं श्रद्धा-दिया करती हैं, ऐसा वेदका आदेश पितरोंको प्रसन्न कर यह हमारी है । चन्द्र मनका अधिष्ठाता है, मनके सङ्कल्पसे की हुई क्रियाको वसु, रुद्र, आदित्य इन निश्य पितरोंके द्वारा सूक्ष्मताले अपने लोकमें खीचकर हमारे तृप्त कर दिया करता है । मनद्वारा दिये हुए अन्न वा पितरोंको रूपसे आकृष्ट करता है । श्राद्ध पिता, पितामह जलको वह सूक्ष्म , प्रपितामह इन तीन Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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३० श्रीसनातनधर्मालोकः ( 8 ) पुरुषोंका होता है । हमारां चतुर्थ पुरुष पितृ - कोटिस: अग्रिम कोटिको प्राप्त हो जाता है, तदर्थं श्राद्धकी सहायता श्रावश्यक नहीं होती । आदिम तीन पितृ - श्रेणियोंमें ही मृतक हमारी सहायता चाहता 1 श्राद्ध में सदाचारी, तपस्वी, विद्वान्, स्वाध्यायशील सद्ब्राह्मणको ही भोजन कराना मनुस्मृति आदिमें प्रसिद्ध है, क्योंकि उस ब्राह्मणकी प्रसन्नता से प्रेतयोनिप्राप्त जीवकी सद्गति होती है । ( १२ ) सोलह संस्कार - संस्कार १६ हैं, १ गर्भाधान, २ पुस-वन, ३ सीमन्तोन्नयन, ४ जातकर्म, ५ नामकरण, ६ निष्क्रमण, ७ अन्न-प्राशन, = चूड़ाकर्म, ह कर्णवेध, १० उपनयन, एवं वेदारम्भ, ११ केशा-न्त, १२ समावर्तन, १३ विवाह एव विवाहाग्निपरिग्रह ( गृहाश्रम ) । १४ वानप्रस्थाश्रम, १५ परिव्रज्या ( संन्यासाश्रम ) । १६ अन्य कर्म ( पितृ-मेघ ) । संस्कारोंसे शरीर तथा अन्तःकरणकी शुद्धि होनेसे आत्माको शुद्धि होती है । १ गर्भाधान — विवाह संस्कारसे तीन दिनके बाद चतुर्थीकर्म करके स्त्रीके ऋतुकाल के समय गर्भकी योग्यतामें करना चाहिये, इसमें कामभाव न रहें, धर्मभाव रहे, जिससे सन्तान शुद्ध विचारों वाल हो - एतदर्थं इसे विधिसे करना चाहिये । २ पुंसवन – गर्भाधान कें दूसरे वा तीसरे मासमें पुत्रोत्पत्तिके लिए किया जाता है । ३ सीमन्तो-नयनम् - गर्भ से छठे वा आठवें मासमें करना पड़ता है । ४ जातकर्म-जन्मसमय नालच्छेदनसे पूर्व करना चाहिये, इसमें सुवर्ण - शलाकासे बच्चे को मधु - घृत चटाया जाता है । ५ नामकरण - पहला जन्मनाम जातकम समय तात्कालिक नक्षत्रके पादानुसार, दूसरा • व्यावहारिक नाम ब्राह्मणका ११ वें दिन, क्षत्रियका १३ वें दिन, वैश्यका १६ वें दिन करना चाहिये । ६ निष्क्रमण - जन्मले चौथे महीने शिशुको सूर्य-दर्शन कराना पड़ता है ७ अत्रप्राशन - छठे मासमें बालकके भोजन-स्वातन्त्र्यार्थ इसे करना पड़ता है । ८ चूड़ाकरण- पहले वा तीसरे वर्ष ३ सनातन धर्मके सिद्धांतों का संक्षेप ३१ श्र में शिशुका मुण्डन हो । ह कर्णवेध -- जन्म से पांच वर्ष बाद में सहै छिद्र करके उनमें सुवर्णं - कुण्डल पहरावे । १: ० उपनयन- ब्राह्मणं क्षत्रिय, वैश्यों को ८।११।१२ वर्षो में ब्रह्मसूत्र पहना पड़ता है, तभी, आचार्यकुल में गायत्री मन्त्र के प्रदान द्वारा वेदारम्भ होता है । उससे बुद्धि की वृद्धि से वेदाङ्गोंको पहले पढ़कर फिर वेद पढ़ना पड़ता है । यही -इस ब्रह्मचर्याश्रम संस्कार होता है । इसमें श्राचार्यकी सेवा तथा उनकी नहीं थग्नि में समिदाधान करना पड़ता है । ११ केशान्त - ब्राह्मणादि तीनों वर्णों का १६-२२-२४, वर्ष में द्वितीय मुण्डन होता है । इसे गोदान भी से कहा जाता है । १२ समावर्तन — इसे वेदविद्याको समाप्ति में प्रायः २४ वर्षकी श्रायु में करना पड़ता है - इसमें ब्रह्मचर्याश्रम समाप्त हो जाता है । १३ विवाह - शिक्षाकी समाप्ति के बाद प्रायः २५ वर्षकी आयु लिए . कमसे कम १८ वर्षकी श्रायुमें, और कन्याका ऋतुकालको निकटतामें.तथा उ करना पड़ता है । इसी में विवाहाग्निपरिग्रह और श्रोताग्याधान करना हो, भ पड़ता है । यहां गृहाश्रम है, इसकी अवधि ५० वर्ष तक है । इसमें और माता - पिता की सेवा, ऋतुकाल में स्त्रीगमन, सन्तान उत्पन्न करना और शिल्प-उसे पालना पड़ता है । १४ वानप्रस्थाश्रम - इसे ५१ वें वर्ष में ७५ a णों क तक करना पड़ता है । इसमें शीत - उष्णादि द्वन्द्वोंको सहकर मुनिवृत्ति एवं क्षत्रिय, तपस्या करनी पड़ती है । इसमें भिक्षावृत्तिले निर्वाह करना पड़ता है । -तीन वर इसमें अपनी भावनाके अनुसार ग्रन्थ- निर्माण भी करना चाहिये । ११ होता है संन्यासाश्रम - इसमें सर्व कमों का वा कर्मफलका स्याग करके ईश्वर में हैं, अ श्रद्वैतभाव, प्राणियोंको सन्मार्ग में प्रवृत्त करने के लिए उपदेश करना पड़ता है । समदृष्टि रखनी पड़ती है । ७६ वर्षसे १०० वर्ष ममृत्यु तक वाणी - शर श्राविष्कार इसका सेवन करना पड़ता है । श्राजकल मरनेके समय जो भूशय्या नौ गुण करानी पड़ती है— यह संन्यासाश्रमका हो अभिनय है । ब्रह्मचर्य, गृह ज्ञान देना स्थ, वानप्रस्थ, संन्यास – यह चार श्राश्रम हुआ करते हैं । चार वर्ण और चार श्राश्रमोंके धर्मका ही नाम वर्णाश्रमधर्म होता है । वर्णा-CC - 0. Ankur Joshi Collection jarat, An eGangotri Initiative
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३२ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) ३१ श्रमधर्म ही सनातन धर्म है । १६ अन्त्यकर्म – देहान्त संस्कार होता है । संस्कृत विवाहाग्नि हो जाने पर यह कानमें है । फिर उसकी दशगात्र से मृतकका दाइ करना पड़ता यादि क्रियाएं तथा सपिण्डन एकोद्दिष्ट श्राद्ध ह्मणं, आदि करना पड़ता है । तभी सारे संस्कार विजके होते हैं, स्त्रियोंका विवाह ही उससे -इस कारण उपनयन सम्बन्धी केशान्त उपनयन है, , समावर्तन, संन्यास यादि - उनके यही • नहीं होते । गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्त, विवाह आदि स्त्रियोंके उनकी हैं, वैधव्य ही उनका संन्यास है । शूद्रांका बिना संस्कार तीनों यहीं दो संस्कार हैं । वैध संस्कार मन्त्र के विवाह तथा उनका कोई भी नहीं । संस्कार-न भी से द्विजोंकी दृढ़ता, हीनांग पूर्ति, " और अतिशयाधान होता है । २४ ( १३ ) जन्मसे वर्णव्यवस्था —जैसे हमें अपनी रक्षा के जाता लिए घरका निर्माण वा अपना सेवक, अपने पोषणार्थ धनोपार्जन युमें तथा उसकी रक्षार्थ पहरेदार वा बल, चित्तकी कुत्सित कर्ममें, तामें प्रवृत्ति न करना हो, भगवान् ही सक्ति हो, एतदर्थ कलाकौशल, सेवा, धन, बल इसमें ' और ज्ञानकी आवश्यकता पड़ती है, वैसे ही समाज की रक्षा के लिए भी और शिल्प - सेवा, धन, बल तथा ज्ञानविभाग के अध्यक्ष निषाद सहित चार वर्ष वर्णों की अत्यन्त आवश्यकता पड़ती है । उनमें चार वर्ण होते हैं ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और पांचवां वर्ण होता है । इनमें भी श्रादिम एवं तीन वर्ण द्विज, उपनयन तथा वेदके अधिकारी है । होते हैं । शूद्ध एकज होता है । इसमें ब्राह्मणका वेदाध्ययन, दान, यजन यह तीन कर्म होते १५ हैं, श्रध्यापन, याजन, प्रतिग्रह तीन जीविकाकर्म होते हैं, शान्ति, वरमें इन्द्रियमनोनिग्रह, कष्टसहन, बाह्य श्राभ्यन्तरिक शुद्धि, सहनशक्ति, मन-करना वाणी- शरीरकी सरलता, वेदादिका ज्ञान, परलोकादि विशिष्ट विद्याका तक आविष्कार तथा देव, पितरोंका श्राह्नानरूप विज्ञान, प्रास्तिक्य या नौ गुण अवलम्वनीय होते हैं । प्रजाको कुत्सितकर्मले श्रादि गृह ज्ञान देना, सत्कर्मों में प्रवृत्त होनेके लिए बचाना उन्हें वर्ण उपदेश देना, सुख शान्ति -सनातन धर्म के सिद्धांतों का प ३३ की ओर प्रवृत्त करना. पर्व तिथि आदिका बगलाना यह उनका कर्तव्य । क्षत्रियका यजन, अध्ययन और दान- यह तीन कर्म हैं । राज्य, पु प्रजाका भीतरी तथा बाहरी शत्रुओंसे रक्षा, यह वृत्तिकम हैं । विषयों में प्रसक्ति, शूरवीरता, तेज धैर्य, चतुरता. युद्ध में भागना नहीं, स्वा-मित्व - यह सात गुण अनुसर्तव्य होते हैं । शत्रुओंके थाक्रमणसे देश तथा धर्मकी रक्षा करना उनका कर्तव्य हो जाता है । वैश्यका दान, अध्ययन, यज्ञ करना - यह तीन कर्तव्य है । गौ श्रादि पशुओंका सर-क्षण करना, वाणिज्य, कुसीद, खेती - इन चार जीविका कमों से समाजको धनी बनाना उनके कर्तव्यमें श्राता है । सत्य व्यवहार श्रादि उनके गुण होते हैं । शूद्रका चार वर्ण वालकी सेवा करना यह एकही कर्म है । इन वर्णों की सकता अव अन्त्यज - निषाद आदि जातियाँ उत्पन्न होती हैं, जिनके बहुतसे मेद तथा भिन्न - भिन्न कर्म कला - कौशल, कपड़ा बुनना, गृहनिर्माण, मलशोधन आदि नियत हैं । वर्षा - व्यवस्था जन्म से होती है और कर्मसे सम्मान होता है. अपने गुण - कर्मके अत्रलम्बनसे उत्तमता, और अपने गुणक्रम को अंशतः श्रव. लम्बन करने से मध्यमता, दूसरेके गुण - कर्म अवलम्बनसे अधमता अपने कर्मों के त्यागसे पतितता होती है, वर्ण - परिवर्तन नहीं । जैसे, मानव शरीरको सुव्यवस्था के लिए जन्मसे हो उत्पन्न न कि कृत्रिम ) मुख, हाथ, कमर और चयांकी आवश्यकता होती है । कृत्रिम श्रोंसे उतनी स्वाभाविकतासे उतना काम नहीं होता, वैसे चार वर्ण भी जन्म-से ही समाज- शरीर के मुख - बाहु - ऊरु चरणस्थानीय हैं । उन - उनके कर्मों का उत्तरदायि भी जन्मजात ही वर्णों में हो सकता है. जब - तब जहाँ-नहोंने आये हुओंमें नहीं । मुखका कार्य, हाथ, कमर, पैर, हाथका काम मुख, क्रमर पैर, कमरका काम, मुख, हाथ, पैर, और पैरका कार्य मुख, हाथ ' कमर नहीं कर सकते । इस प्रकार कराने पर अव्यवस्था होती है । अपने-CC - 0. Ankur Joshi Collect Gujarat. An eGangotri Initiative
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३६ ३४ श्रीसनातनधर्म लोकः ( ४ ) धर्म न करने और परधर्मका अवलम्बन करने पर अव्यव स्या या उच्छृंड खलता पांव रख देती हैं, इससे युद्ध वा परस्पर- विनाश जारी हो जाते हैं । इस कारण पञ्चजनका खान - पान और विवाह पादि अपनी अपनी जाति में ही रहे, इनमें जाति - सङ्करता तथा श्राश्रम - संकरता हो सके तदर्थ अपना कर्म अवश्य कर्तव्य है, नहीं तो वर्णसङ्करता हो जाने पर उसका नाश ही हो जाता है । जैसे घोड़ा और गधी के रसे उत्पन्न खच्चर स्वजातिका नाश ही कर देता है, वैसे ही वर्ण-मकरता होने पर जातिका विनाश और कर्मकी सकरता होने पर फिर वक्रर्ममें प्रवृत्ति ही नहीं होती । जन्मसिद्ध वर्णव्यवस्थारूप दुर्गसे और अपने वर्ण - धर्मका श्रव जन्न करनेसे आज तक हिन्दुजाति जीवित रही. थथ उसमें उच्छृङ्खलताके प्रारम्भसे उसमें भी अव्यवस्था हो रही है । पूर्ण जन्म के कर्मसे इस जन्ममें उस रू वर्ण वाले पिताके घरमें जन्म होता है, इस कारण उस के कर्मसे उसमें शीघ्र ही उन्नति तथा साफल्य लाभ एवं सन्तोष लाभ हो जाता है । इसी उद्देश्यसे विवाह भी सवर्णा स्त्रीके माथ किया जाता है कि - सन्तान भी सवर्ण हो, क्योंकि ' सवर्णेभ्यः सव-सु जायन्ते हि सज्जातय: ( याज्ञवल्य १ | ४ | १० ) ऐसा नियम है । वर्ण सरता में तो ' इतो भ्रष्टस्ततो नष्ट: ' इस प्रकार दोनों वर्णों के धर्म-सङ्करता बाली संतान जच्यभ्रष्ट हुई हुई ' इच्छति शती सहस्रौं, सहस्त्री लक्षमीहते ' इस प्रकार उत्कर्णकी प्राप्तिकी दौड़ में लगी हुई, असन्तोष को धारण करती हुई विवाद और कलहोंको अपना लेती है । इस ख-खास समाजकी दशा छिन्न - भिन्न होकर संसार में विप्लव हो जाता है । सदा अशान्ति ही रहती है । इस प्रकारके देशमें दूसरोंका अधिकार हो जाया करता है । ( १४ ) वर्णधर्म तथा श्राश्रमधर्म - वर्णधर्म पहले बतज्ञाये ग्राम चुका है । CC - 0. Ankur Joshi Collection सनातन धर्म के सिद्धांतों का संक्षेप * वर्णधर्मकी तरह श्रश्रमधर्म भी आवश्यक है । ब्रह्मचर्याश्रम में ब्रह्म- पुर चयं रूप तपस्या करके शरीर और मनको उन्नत किया जाता है । श्राचार्य-सेवासे विद्या पढ़कर श्रात्माको उन्नत किया जाता है । गृहस्थाश्रम में शरं धार्मिक कर्मोंसे संसार - व्यवहार करके अवैध विषय - वासनाको दूर जी के मनको भगवान्के प्रति लगाया जाता है । वानप्रस्थाश्रम में वन, वा जिस वन के प्रतिनिधिभूत तीर्थ वा ऐकान्तिक शुद्ध स्थान में रहकर व्रत एवं श्र तपस्याद्वारा शरीर, वाणी एवं बुद्धिको निर्मल किया जाता है 1 । इनकी दान निर्मलता में ही मन विशुद्ध हो जाता है । तब भगवान्की पूजा में मन जा खूब लगता है । अन्तिम संन्यास आश्रम में जिसमें ब्राह्मणका ही अधि- अधि कार है— सब कुछ छोड़कर, परमात्मामें मनको लीन करके, सारे संसार भी को परमात्मारूप मानकर, उसकी सेवामें चित्तको जोड़ा जाता है । परि- पति व्रज्या ( परिभ्रमण ) करके संसारको पापसे दूर हटवाकर उसकी धार्मिक वह प्रवृत्ति बढ़ाई जाती है । इससे जीवका संसारी बन्धन टूट जाता है । किस ( १५ ) शिष्टाचार -- अपनेसे उत्तम वा यहाँको प्रणाम, समा- पति नासे कुशल- समाचार - प्रश्न, अपने छोटों वा छोटो श्रेणी वालोंको उस जात श्राशीः, यह शिष्टाचार कहा जाता है । परमात्मा वा उसके अवतार होन रामकृष्ण आदिको, देवताओं को भी प्रणाम यावश्यक है । लोकव्यवहार में नाथ माता, पिता तथा गुरु भी प्रणामयोग्य हैं । वृद्धोंको अभिवादन करने तंत्र बालोंको आयु, विद्या, यश तथा बलकी प्राप्ति मानी गई है । भगवान् तन्त्र की विभूतिरूप गङ्गा, यमुना आदि नदियों, समुद्र, विशेष पर्वत, तथा स्त्री अग्नि, सूर्य, चन्द्रादि देवता भी प्रणामयोग्य हैं । अपनेसे छोटेको अन शर्वाद ही देना चाहिये । इस प्रकार यथायोग्य व्यवहार करना ही शिष्टाचार है छोटे - बड़े सबको ' नमस्ते ' कहना ठीक नहीं - इसे भिन्न उत्प निबन्ध में बताया जायगा । सबके साथ समान व्यवहार शिष्टाचार करक नहीं हुआ करता । छोटेको प्रणाम वा उसका चरण स्पर्श नहीं किया जाता । arat. An eGangotri Initiative
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३६ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) ( १६ ) पातिव्रत्य_पतिसेवा ही पातिव्रत्य है । पतिले भन् पुरुष कुदृष्टि न डाले । पतिको मृत्यु में जो स्त्री ब्रह्मचर्य करती हुई, शृङ्गार, हासविलासादिको छोड़ती हुई, व्रत तपस्या श्रादिसे अपने शरीरको क्षीण कर दे, वही पतिव्रता है । पतिव्रता स्त्री पतिके जोते जीवा विधवा होनेपर पुनर्विवाह नहीं चाहती । कन्यादान होनेपर वह जिसे दी गई है, उसीकी रहती है; दूसरेकी नहीं होना चाहती । पिता श्रादि द्वारा कन्या का पुरुषको दान करना ही विवाह होता है । उसका दान करके फिर दाताका भी उसमें पुनर्दान करनेका अधिकार नहीं रह जाता । तब उसका पुनर्विवाह भी कैसे हो? यद्यपि पतिका उसपर अधिकार होता है, परन्तु उसका भी उसे दूसरेको देनेका अधिकार कहीं भी नहीं कहा गया । पिता द्वारा कन्याका दान ही कन्याविवाह होता है, पति द्वारा पत्नी को देना कहीं भी ' विवाह ' शब्दसे नहीं कहा गया । वह स्वयं भी स्वतन्त्र नहीं होती, अतः वह भी स्वयं अपनेको पुनः किसीको नहीं दे सकती । पतिकी मृत्यु में भी पत्नी परतन्त्र ही रहती है । पति अपनी सन्तानार्य उसके घरमें थाकर उससे विवाह करता है, उसे वहाँ ले जाता है स्त्री अपनी सन्तानकेलिए पुरुषके घर नहीं जाती, या उसे उसके घरसे अपने घर नहीं लाती । तब सन्तान न होनेपर पुरुष दूसरी कन्यासे विवाह कर सकता हैं । स्त्री अपनी सन्ता-नाव अन्य पुरुषसे विवाह नहीं करती । क्योंकि - स्वतन्त्रता और पर-तंत्रताका आपस में विरोध है । पुरुष स्वतन्त्र हैं, स्त्री परतन्त्र । पति.. तन्त्रता ही पातिव्रत्य होता है, पुरुषको स्त्रीव्रत नहीं होता । पतिव्रता स्त्री पतिकी मृत्यु में उसका अनुसरण करती है, पुरुष स्त्रीकी मृत्यु में अनुमरण नहीं करता । प्रकृति भी इस विषय में पुरुषका पक्षपात करती है । एक पुरुष एक वर्ष में अनेक स्त्रियोंसे संयोग करके अनेक सन्तान उत्पन्न कर सकता है, पर एक स्त्री एक वर्षमें अनेक पुरुषोंसे संयोग करके एकही संतानको पैदा कर सकती है । इस कारण स्त्रीका एक ही सनातन धर्म क सिद्धातो का सक्षप ३७ विवाह और पुरुष सन्तानके प्रयोजनकेलिए अनेक विवाह भी हो सकते हैं । हाँ, कामभोगार्थ पुरुषका भी पुनर्विवाह निन्दित ही है । ( १७ ) विधवाधर्म — द्विज विधवाथका पुनर्विवाह वैध नहीं है । ' ह्म तदन्वारोहणं वा ' ( वृहद्विष्णुस्मृति २१/१४ ) यहां पर विधाका ग्रह्मचर्यं प्रथम श्रेणीका सतीधर्म माना गया है । मृतपति के साथ अनुमरण द्वितीय श्रेणीका सतीधर्म कहा गया है । वैधव्य स्त्रियोंका एक प्रकारका संन्यास है, तब वह सर्व - पूजनीय हो जाती है । सर्वपूजनीया भला फिर किसकी श्रद्धशायिनी बने? जो किसी अन्यकी श्रङ्कशायिनी बनती है, वह सर्वपूजनीय भी नहीं होती । स्त्रि-योंका वैधव्य एक बड़ी तपस्या है, तपस्या यह संन्यासीका धर्म है । पूर्व समय में किसी भी विधवाने पुनर्विवाह नहीं किया । सावित्रीने तो पतिवरण - समय ( सगाई ) में पति की अल्पायु सुनकर भी अन्य पतिका विचार नहीं किया । सुलोचनाका भी मेघनादुके पीछे मरना प्रसिद्ध है । श्रभिमन्युकी १३-१४ वर्षकी भी विधवा उत्तराने वैधव्य का सहन ही किया । इस प्रकार महाभारतयुद्ध में हुई विधवाओंका भी विवाह कहीं भी नहीं सुना गया । वैधव्य वा सधवात्वमें पर - पुरुष का नाम भी ग्राह्य नहीं होता । वैधव्य में धर्मपालनसे इस लोकमें देश का मुख उज्ज्वल और अपना भारी यश, तथा परलोकमें सद्गति होती है । ( १८ ) लोक - लोकान्तर — जहाँ हम अब हैं, वह इहलोक है, उससे भिन्न परलोक होता है । परलोकमें लोक, पाताललोक श्रादि · लोक आजाते हैं । द्युलोक में स्वर्गलोक, यमलोक, ब्रह्मलोक, विष्णुलोक और रुद्रलोक आदि प्रसिद्ध हैं । इससे भिन्न लोक नरक आदि प्रसिद्ध हैं । पुण्याहमा साविक जन स्वर्गलोक में जाते है । स्वर्गलोक में श्रमृत. भक्षक देवताओं तथा उनके अधिपति इन्द्रका निवास है । ३३ कोटि देवता इन्द्रके अनुचर है, ४६ मरुद्गण उसके सहायक होते हैं । पापी, CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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३८ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) विश्वासघाती धौर व्यभिचारी यमलाकमें जाते हैं, उसमें धर्मराज यम पापिपुरुष और धर्मात्मायोंका न्याय करते हैं । धर्मात्माको स्वर्ग में भेजते हैं. पापियोंको नरकमें । दोनों प्रकारके पुरुषोंको कुछ समय तक परलोक-में रखकर सूक्ष्म पाप - पुण्याँका फल देकर अवशिष्टसे उसे मनुष्यलोकमें भेजते हैं; वह तब तक वहां रहता है, जब तक कि उसके प्रारब्धकर्म बचे हुए । उनके समाप्त हो जाने पर पुरुष एक कला भी नहीं जीता । विष्णु धादिके लोक में उस उस देवकी प्रधानता रहा करती है । बैकुण्ठ लोक में पाप - पुण्यरहित पुरुषोंका गमन होता है । ब्रह्माण्ड में मुख्यतया १४ लोक हैं. भूः भुवः स्वः, महः, जन, तप, सत्य, यह सात लोक ऊर्ध्वलोक है, तल, अतल, वितल, सुतल, तलातल, रसातल, पावाल – यह सात अधोलोक हैं । भूलोकमें रजोगुण अधिक है, उससे ऊर्ध्वलोक में उत्तरोत्तर सत्वगुण अधिक है । निम्न लोकों में तमोगुण अधिक है । ऊर्ध्वलोकोंमें देवता रहते हैं । ग्रह, देवता, असुर, गन्धर्व, प्रेत, पितर भूलोकसे ऊर्ध्व लोकों में रहते हैं, भूलोकमें मनुष्य और पशुपक्षी कीट नादि रहते हैं । निम्नलोकोंमें दैत्य रहते हैं । भूलोकके सहचारी प्रोत-लोकमें प्रतयोनि वाले निवाल करते हैं, नरकलोकमें दण्डनीय पापी रहते हैं । पितृलोक्रमें हमारे मृत पितर रहते हैं । इस प्रकार अनन्त योनियोंके जीव इस सारे ब्रह्माण्डमें रहते हैं । आकाश लोकमें ऊपर ग्रह तारे घादि जो दीख रहे हैं, यह भाग द्युलोक ( स्वर्ग ) है, मनुष्य लोक स्वर्ग - नरक नहीं हो सकता । ' हमारी जन्मभूमि कश्मीर है ', कह देने से कश्मीर हमारी जन्मभूमिसे अलग हो जाता है, ' यह पृथिवीलोक ही स्वर्ग - नरक है— इस वाक्यसे भी स्वर्ग - नरकलोककी भिन्नता हो जाती है । ( १६ ) कर्मों के भेद -- १ सन्चित, २ प्रारब्ध, ३ क्रियमाण भेदसे कर्म तीन प्रकारके होते है । थनन्त जन्मोंसे लेकर आज तक सनातन धर्म के सिद्धांतों का संक्षेप इकट्ठे हुए - हुए कर्म सञ्चित कहाते हैं । मनुष्य मन, वाणी एवं से जो कुछ भी करता है; जब तक वह क्रियारूपमें है, तब तक माण होता है । क्रिया समाप्त हो जाने पर वह स्थार्थिकोप में हो जाता है | मनुष्यके इस श्रनन्त स्थायिकोपरूप सन्तिकोष और पापकी महान् राशिसे कुछ - कुछ अंश लेकर उससे जो शरीर के मि शरी दार ( 3 सचि शा सत्य बनाया रण जाता हैं. उसे प्रारब्ध कर्म कहा जाता है । जब तक सचित कर्म व. समा शिष्ट हैं, तब तक प्रारब्धकर्म बता ही रहता है । सेवा अनेक जन्मार्जित कर्मसम्ययका सर्वथा नाश न हो जाये तब तक जीर राग, की मुक्ति नहीं होती । आप सञ्चित कर्मों से वर्तमानमें स्फुरणा, और स्फुरणासे क्रियमा स्नेह क्रियमाणसे फिर सन्चित और सञ्चित के अंश से प्रारब्धकर्म बनता है । मांस इस प्रकार जीव कर्म - प्रवाह में निरन्तर बहता ही रहता है । प्रारधर्म इन्द्रि के अनुसार ही बुद्धि होती है, प्रारब्धकर्मवश ही तदनुकूल कर्मकेलिए दया. हृदयमें प्रेरणा होती है । सात्त्विक, राजसिक, तामसिक समस्त रणाओं वा कर्मप्रेरणाओंका कारण वही होता है । वह केवल स्फुरण देश, करता है, कर्म करनेमें प्रधान कारण पुरुषार्थ कहा जाने वाजा क्रियमार जैसे कर्मही है । ज्ञान उत्पन्न होने पर और भगवद् - दर्शन होने पर संञ्चि केज कर्म तथा क्रियमाण कर्म सभी नष्ट हो जाते हैं, केवल प्रारब्ध कर्म धर्म, बिना भोग नहीं जाता । उसके भोग हो जाने तथा नवीन कर्म उत्पत्ति न होने पर मुक्ति हो जाती है । साहस कर्म में यदि वासना क्षय है, तो वह कर्म भी अकर्म हो जाता के धर्म त्तब कर्मकी बन्धकता नष्ट हो जाती है । शास्त्रानुसारी कर्म सुकर्म होता है । उससे विरुद्ध कर्म कुकर्म हो जाता है । प्यपथेन ( २० ) धर्मों के भेद | धर्म तीन प्रकार के होते हैं- करवान १ साधारण धर्म, २ विशिष्ट धर्म और ३ आपद्धर्म । इनमें साधार धर्म, मनुष्यमात्रका हितकारक होता है । इसकी सहायता से सार CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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के व्यक्ति अपनी उन्नति कर सकते हैं । ' अहिंसा, सत्यमस्तेयं मिन्द्रियनिग्रहः । [ श्राद्धकर्मातिथेयञ्च दानमस्तेयमार्जवम्, शौच-दारेषु तथा चैवानुसूयता । प्रजनं स्वेषु ] एत सामासिकं धर्मे चातुर्वण्येऽब्रवीन्मनुः, ( १० | ६३ ) | अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः शान्तिः सर्वेषां धर्मसाधनम् । दानं दया दमः सत्य व्यवहार, ( याज्ञवल्क्यस्मृति ॥१२२ ) सत्य भाषण, , किसी भी प्राणीको क्लेश न देना, अपने धर्मका श्राच-रण करना, अपने धर्मग्रन्थ पढ़ना, न्याय्य व्यवहार समानों में प्रेम, छोटोंमें स्नेह, माता - पिता, बढ़ों में श्रद्धा, सेवा, निश्छल व्यवहार तथा गुरुकी सेवा, अतिथि , दम्भ न करना, पति - पत्नी में एक दूसरेसे अनु-राग, व्यभिचार न करना, चोरी वा चोरबाजारी न करना, भाइयोंका आपस में प्रेम, वहिनोंका श्रापसमें प्रेम, भाई - बहिनों का परस्पर स्नेह, सरलता, जुना न खेलना, दूसरोंकी स्त्रियों में कुदृष्टि न करना, मांस न खाना, मद्य न पीना, दूसरेके धनमें गर्धा न करना इन्द्रियों का संयम, मनका दमन, क्रोधं न करना, कृतज्ञता, दया, शान्ति, क्षमा, धैर्य, पवित्रता रखना, यह साधारण , सुपात्रको दान देना, धर्म हैं । विशिष्ट धर्मः -- विशेष अधिकारियोंके उपयोगी, पृथक् - पृथक् देश, काल, पात्रोंकी उन्नति करने वाले नियम विशिष्टधर्म कहलाते जैसे ब्राह्मण. क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र यादियोंके वर्ण - धर्म, अन्त्यज श्रादियों हैं के जाति - धर्म, ब्रह्मचारी, गृहस्थी, वानप्रस्थी, संन्यासी इनके धर्म, स्त्री - धर्म, पुरुष - धर्म इनके प्रयक् - पृथक् धर्म विशिष्टधर्म कहाते श्राश्रम-इनमें एक धर्म को दूसरा कर ले, तो यह उसकी अनधिकार चेष्टा हैं । वा साहस है । कर्म - संकरता भी अच्छा काम नहीं । इनमें व्यक्तिविशेषों के धर्म व्यक्ति - धर्म कहलाते हैं । आपद्धर्म: -- ' घनाम्बुना राजपथे हि पिच्छिले क्वचिद् बुधैर-प्यपथेन गम्यते ' ( नैषध चरित्र हा ३६ ) इस प्रकार कहा हुआ, प्रापत्ति में छारवादरूप से अभ्यनुज्ञात धर्म श्रापद् - धर्म होता है । उसे श्रापत्ति में सनातन धर्म के सिद्धांतों का संप 21 ही करना चाहिए, जब - तब नहीं | श्री मनुजीने कहा है- ' श्रापत्कल्पे-न यो धर्म कुरुतेऽनापदि द्विजः । स नाप्नोति फलं तस्य परत्रेति विचा रितम् ( ११।२८ ) विश्वैश्च देवैः साध्यैश्च ग्राह्मणैश्च महर्षिभिः । आपत्सु मरणाद् भीतैर्विधेः प्रतिनिधिः कृतः । ( ११।२६ ) प्रभुः प्रथम-कल्पस्य योनुकल्पेन वर्तते । न साम्परायिकं तस्य दुर्मतेविद्यते फलम् | ( ११1३० ) | 2 उस श्रापद्धर्मका मनुजीने इस प्रकार वर्णन किया है-' जीवंस्तु यथोक्तेन ब्राह्मणः स्वेन कर्मणा । जीवेत् क्षत्रिय धर्मेण स ह्यस्य प्रत्यनन्तरः ॥ ( १०।८१ ) उभाभ्यामप्यजीवस्तु कथं स्यादिति चेद् भवेत् । कृषिगोरक्षमास्थाय जीवेद् वैश्यस्य जीविकाम् ' ( १०/८२ ) इत्यादि । यहां पर ब्राह्मणको श्रापत्तिकालमें क्षत्रिय वैश्यकी जीविका करनेके लिए अभ्यनुज्ञा दी गई है । इस प्रकार श्रीमद्भागवत में -' सीदन् विप्रो वणिग्वृत्त्या पण्यैरेवापरं तरेत् । ग्रड्गेन वाऽऽपदाक्रान्तो न श्ववृत्त्या कदाचन । वैश्यवृत्त्या तु राजन्यो जीवन्मृगययाऽऽपदि । चरेद् या विप्ररूपेण न श्ववृत्त्या कन्चन । श्रभिजे वैश्यः शूद्रः कास्कट क्रियाम् । कृच्छ्रान्मुक्तो न गोंग वृत्ति लिप्सेत कर्मणा ' ( ११ | १७ | ४७-४६ ) इत्यादि । पहले कहे हुए सत्य आदि धर्म भी कभी हानि - जनक हो जाते हैं । हिंसकको आगे भागी जा रही गायका वृत्त कहना श्रधर्म है, वहां असत्य भी सत्य हो जाता है— इत्यादि भी यहां जान लेना चाहिए, इस विषय में ' गोकुले कन्दशालायां तैलचक्रेतुयन्त्रयोः । श्रमीमांस्या-नि शौचानि स्त्रीणां च व्याधितस्य च । ( १८३ ) गोदोहने चर्मपुटे च तोयं यन्त्राकरे कारुकशिल्पिहस्ते । स्त्रीबालवृद्वाचरितानि यान्यप्रत्यक्ष-दृष्टानि शुचीनि तानि, ( २२८ ) प्राकाररोधे भवनस्य दादे, सेनानिवेशे विषमप्रदेशे । आवास्ययज्ञेषु महोत्सवेषु तेष्वेव दोषा न विकल्पनीयाः " ( २३० ) चर्मभाण्ढैस्तु दाराभिस्तथा यन्त्रोद्धतं जलम् । श्रकरोद्गत-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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४२ श्रीसनातन धर्मालोकः ( ४ ) वस्तूनि नाशुचीनि कदाचन. ( २३६ । इत्यादि अत्रिस्मृतिके तथा ' देव-यात्राविवाहेषु यज्ञप्रकरणेषु च । उत्सवेषु च सर्वेषुस्पृष्टास्पृष्टं न विद्यते ' ( वृहत् पराशर ० ६ २६७ ) इत्यादि वचनोंका मारवाड़ श्रादि विशेष देशों, तथा कुएँ श्रादिको सुविधाके प्रभाव - स्थलोंमें यथा-योग्य उपयोग किया जा सकता है । ( २१ ) ऋतु - उपवासः - शरीर, इन्द्रिय तथा मन के वशीकर-णार्थ एवं शोधन व्रत - उपवास रामवाण औषधि है । वेदादि शास्त्रोंमं की है. ' ब्रश प्रमादिन्य! म तव ' ( ऋ ० सं ० १।२४.१५ ) यहां सूर्य या वरुणका व्रत कहा गया है । ' विषया विनिवर्तन्ते निराहार-स्य देहिनः । ( गीत २५६ ) यहां पर निराहार होने ले विषयनिवृत्ति सूचित की गई है । यथाविधि व्रतके अनुष्टानले लौकिक एवं शास्त्रीय लाभ हुधा करता है । व्रत आत्मशुद्धिका सर्वश्रेष्ठ उपाय है । बाल-वृद्ध. श्रीनार, सगर्भा स्त्रीके लिए व्रत आदिकी शक्ति न होने पर बाध्यता नहीं है । ( २२ ) सृष्टि, स्थिति, प्रलयका विषय: -- सृष्टिकी रचना रजोगुणावलम्बी ब्रह्मा करते हैं, सत्त्व, रज, तम इन गुणोंकी साम्याव-स्थारूप प्रकृति से, पृथिवी प, तेज, वायु, श्राकाश इन पांच भूतों से पूर्वकर्मानुकूल सृष्टिका सर्जन होता है । सत्वगुणधारी विष्णु सृष्टिकी स्थिति ( पालन ) करते हैं । तमोगुणधारी रुद्र प्रलय करके सृष्टिका संहार कहते हैं । ४, ३२,००,००,००० वर्षोंके लिए ब्रह्मा, विष्णु, सृष्टिकी रचना और स्थिति करते हैं । इतना समय ब्रह्मांका एक दिन है । ब्रह्मा की रात्रि में द्र सृष्टि का संहार करते है । ब्रह्माकी रात्रि भी ४,३२, -००,००,००० वर्ष की होती है । यह प्रलयका समय है । ब्रह्माके दिन में चार युग एक सहस्र बार आवृत्ति करते हैं । ब्रह्माकी रात्रि में सृष्टि अपने कर्मोके अनुसार ब्रह्माके मुख, बाहु ऊरु और पैरोंमें लीन ४४ सनातन धर्म के सिद्धांतों का सक्षेप यह हो जाती है । फिर ब्रह्माका दिन शुरू होनेपर ब्रह्मा मुखसे बाहर इस प्रथम वर्णको, बाहुले क्षत्रिय वर्णको, कमर वा ऊरुले वैश्य वर्णं को, शक, १६ ' पांव से शूद्र वर्ण को, अपान आदि संकर अगले अवर्ण श्रन्त्यज जा श्रर्थात् ह को, दाहिने रंग से पुरुष को तथा बाएं श्रगसे स्त्रीको, दाहिने ४३ प्रतिि बाएं के संकरसे नपुंसकको उत्पन्न करते हैं । और उनके कम एक दिन जन्म से ही नियमित करते हैं । १७ बढ़िय ( २३ ) सृष्टि, स्थिति, प्रलय, युग कालकी व्यवस्था । के प्रथम ब्रह्माजीकी यु अपने परिमाणले एक सौ साल की होती है, उन एक दिनकल्प में ४,३२,००,००,००० वर्ष होते में चार युगांकी एक हजार वार श्रावृत्ति होती है हुआ करते हैं । सत्य, त्रेता, द्वापर, कलि नामके इनमें कलियुग के दिव्य वर्ष १२०४ तथा मनुष्य अत्र हैं । ब्रह्माके एक दिए रेंवत. । इसमें १४ जन्वन हैं । सातव चार युग होते हैं ।२८ द्वापर वर्ष ४,३२,००० हैं वर्तमान ह के कसे दुगने दिव्य वर्ष २४०० तथा मनुष्य वर्ष ८,६४,००० श्राज २० हैं । त्रेता के कलिसे तिगुने दिव्य वर्ष ३६०० तथा मनुष्य वर्ष १२६ श्रारम्भ में ००० हँ । सत्ययुगकै कलियुगसे चौगने दिव्य वर्ष ४२०० ६ जारी है, मनुष्य वर्षं १७,२८,००० हैं । एक चतुर्युग के सब मिल कर १२,०० दिव्य वर्ष तथा १३,२०,००० मानुष वर्ष हैं । इनमें ७३ चतुयु का एक मन्वन्तर होता है । मन्वन्तरके वर्ष ३०,६७,२०.००० होते हैं ।. जय की रात्रि ह ह्मा एक दिन में १४ मन्वन्तर होते हैं उनके वर्ष ४,२६, ४०का होता ८०,००० होते हैं । १४ मन्वन्तरों में ६६४ चतुयुग होते हैं । इ००० वषों १७,२८,००० वर्षकी प्रत्येक सन्धिके अनुसार १५ संन्धियां होतीं हैं ।गुणन कर १५ सन्धियोंके २,११,२०,००० वर्ष होते हैं । यह संख्या छः चतुर्युः महीना हो की है । तब १४ मन्वन्तरोंके १६४ चतुर्युगोंके ४,२६,४०,८०,०००००,०००, वर्षोंमें १५ सन्धियों श्रर्थात् छः चतुयुग २,१६,२०,००० व गुणा करन मिलानेले एक हजार चतुयुगकै वर्ष ४,३२,००,००,००० पूर्ण जाते हैं ।. CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative