सनातन धर्मालोक ४ — पृष्ठ 41–50

सनातन धर्मालोक ४ · पृष्ठ 41–50

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४४ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) यह ब्राह्मकल्प है, ब्रह्माक्रा एक दिन है । ब्रह्माकी श्रायु २१ वर्ष के बार इस प्रथम दिनमें श्राज २०१० विक्रम संवत् १०५४ कलिवत्सर, १८७२. को, शक, १ ९५३-५४ ईसवी सन् में १,६७,२६,४६,०५४ वर्ष यीत चुके हैं जा अर्थात् ब्रह्मा के ११ वें वर्षके प्रथम दिनकी १३ घड़ियां, ४२ पल, ३ घिपल हिने श्री ४३ प्रतिविपल बीत चुके हैं, अर्थात् संवा पांच घण्टेके लगभग ब्रह्मा का कम एक दिन बीत चुका है । शेष २,३४,७०,२०,६४६ वर्ष रहते हैं । अर्थात् १७ घढ़ियों से कुछ कम, पौने सात घण्टे के लगभग ब्रह्माके २१ वर्ष वस्था । के प्रथम दिनके पूरे होने में हैं । है, उन् एक दिश अब तक १ स्वायम्भुव, २ स्वारोचिष ३ उत्तम, ४ तामस, १ मन्वन्द्र रक्त, ६ चाचुष नामक छः मनु अपनी सात सन्धियों के साथ बीत चुके हैं । सातवें वैवस्वत मन्वन्तर के ७१ चतुर्युगों में ८ सत्ययुग, २८ त्रेतायुग होते हैं २८ द्वापरयुग, तथा २७ कलियुग बीत चुके हैं । अव २८ वां कलियुग वर्तमान है, जिसका आज प्रथम चरण ( चतुर्थांश ) जारी है । उसमें ३४,००० श्राज २००० विक्रम संवत् में १०५४ वर्ष १२,६ आरम्भमें ३६००० वर्षों की एक सन्ध्या होती ०० जारी है, उसके ३०,६४६ वर्ष शेष हैं । १२,० चतुयु होते हैं ।. जब ब्रह्माका एक कल्प पूर्ण होगा; तब की रात्रि होती है । ब्रह्माका दिन भी हमारे बीत चुके हैं । कलियुगके. है । वह सन्ध्या अभी प्रलय होगा । वह ब्रह्मा ४,३२,००,००,००० वर्षों २६, ४० का होता है, रात्रि भी इतनी ही होती है । इस प्रकार ८,६४,००,०० इ, होतीं हैं । ००० वर्षों का ब्रह्माका एक दिन रात होता है । इन अह्नोंके ३० से गुणन करने पर २,५६,२०,००,००,००० इन वर्षों का ब्रह्माका एक चतुर्यु महीना होता है । इन्हीं श्रोंको १२ से गुणा करने पर ३१,१०,४०,००-50,000 वर्षों का ब्रह्माका एक वर्ष बनता हैं । इन अह्नों को १०० से ०० वर्ष गुणा करने पर ३१,१०,४०,००,००,००,००० वर्षोंकी ब्रह्माकी १०० पूर्ण सनातन धर्म के सिद्धांतों का संक्षेप ४२ वर्षकी श्रायु होती है । इसमें महाप्रलय होता है । इनमें श्राजतक ब्रह्मा की श्रायु १५,२५,२१,३७,२२४६ ०५४ वर्ष बीत चुके हैं । यह ब्रह्माका श्वेतवाराहकल्प है । पता नहीं कि अब तक कितने ब्रह्मा तथा उनके कितने कल्प बीत चुके हैं । सौ ब्रह्माओं के नय हो जाने पर विष्णुका एकदिन बीतता है । विष्णुके सौ वर्ष बीतने पर विष्णु का क्षय होजाता है । २४ विष्णुओंके क्षय इतने परिमाणको रुद्रकी एक त्रुटि होती है । अपने मानसे रुद्रके भी १०० वर्ष बीतनेपर रुद्र अपने श्रात्मामें लीन होजाता है । रुद्रकी श्रायुमें अनेक विष्णु होते और अन्तर्हित होते हैं । इस प्रकार उसी अनादिकाल से प्रवृत्त हुआ-हुआ यह सनातनधर्म अनन्त है । इसीके एकदेशको श्राधार करके जारी हुए दूसरे सम्प्रदाय आदिमान् तथा विनाशशील हैं । उनमें इतना कालका परिमाण कहीं भी वर्णित नहीं । ( २४ ) हिन्दुत्व की प्रतिष्ठा और हिन्दुस्थान की रक्षा : - जो जाति वर्णाश्रमधर्मको मानती है, और यथाधिकार उसका अनुसरण करती है, जिसका अपने सभी व्यवहारोंमें धर्मका ही लक्ष्य रहता है, जिसकी त्रियोंमें उच्च पातिव्रत्यधर्मं स्थित है. वहीं हिन्दु जाति है । हिन्दु जातिका सनातनधर्म ही हिन्दुधर्म है । हिन्दुधर्म के ' सिद्धान्त, आचार - विचार तथा भोजनादिकी शुद्धिका अनुष्ठान ही हिन्दुत्वकी प्रतिष्ठा है । हिन्दुधका अपने धर्मरक्षणकी तरह अपने देश की रक्षा करना भी कर्तव्य है । भारतवर्ष ही हिन्दुका श्रादिदेश है, ' इन कारण उसे ' हिन्दुस्थान ' कहा जाता है । इसीने हमें उत्पन्न किया है और पाला है, इसलिए इसके उद्धारार्थं चेष्टा, और भारतधर्मकी रक्षा तथा भारतका संरक्षण यह हिन्दुयोंका कर्तव्य होजाता है । जो ऐसा नहीं करता, किन्तु जयचन्द बनकर देशद्रोह करता है. वैदेशिकों का वैदेशिक विचार वालोंको इसका अधिपति बनाकर भारतधर्मके नाश-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) ४६ में सहायता करता है, वह हिन्दुस्थानका शत्रु है, हिन्दुस्थानके नाशार्थ उसका यत्न है । यहां तो इस प्रकारकी भारतधर्मको ear करनी चाहिये, जिससे शत्रुदेश उससे डरें, और इस देश के हिन्दुयोंमें भेद चा अनैक्य न करा सकें । वा धर्मोको हम विदेशोंसे नहीं आये कि विदेशियोंके आचार स्वीकार करें । हमारा यही आदि देश है । इसीक सनातनसे थाये धर्मका अनुष्ठान हमारा कर्तव्य हो जाता है । इस देशका धर्म इस हुए देश के पूर्व वर्णित साहित्यके अक्षर - अक्षर में व्याप्त है । इसे हमने इस निबन्धमें सक्षेप से दिखला ही दिया है । इसका महाभाष्य ' श्री-सनातनधर्मालोक ' के अन्य निबन्धोंमें किया जायगा । उसके धर्म में दृढता ही देशी, विदेशियोंकी दृष्टिमें इसकी हदता दिखलाना है और इसका गौरव बढ़ाना है । शिथिल धर्म वाले दूसरोंकी दृष्टिमें निकृष्ट माने जाते हैं । उनका प्रभाव भी दूसरों पर नहीं पढ़ता; और उनका कथन भी कोई दूसरा नहीं मानता । इसी भारत देशमें आदि - सृष्टि हुई । हमारे अवतार भी यहीं हुए. हूँ हमारे तीर्थ भी यहीं हैं । भारतकी भारती संस्कृतभाषा ही है । इस कारण उसका पढ़ना - पढ़ाना भी हमारे लिए श्रावश्यक कर्तव्य हो जाता है । इसी भाषासे हमारे हिन्दुत्वकी तथा हमारे देश की रक्षा होगी । स्वदेशी भाषाको भुलाने तथा विदेशकी भाषा स्वीकार करनेसे वैदेशिक का भी स्वदेश में श्राधिपत्य हो जाता है । वेष भी स्वदेशी ही पहरना चाहिये । स्वदेशी वस्त्र तथा स्वदेशी वस्तुओं में ही प्रेम रखना चाहिये, तभी देशका धन देश में रहता है. और देशभक्ति भी बढ़ती है । मी देशकी रक्षा के लिए प्राणोंकी भी बाजी लगा देनी चाहिये । ( २५ ) राजभक्ति - राजभक्ति भी हमारा कर्त्तव्य है । ' नराणां नराधिपम् ( गीता १०/२७ ) यहां श्रीकृष्णभगवान्ने राजाको. अपनी विभूति माना है. परन्तु भारत राजका भी कर्त्तव्य है कि वह सनातन धर्म के सिद्धांतों का संक्षेप ४८ भारतधर्म की रक्षा करे, भारतीय साहित्य तथा भारतीय भाषा को १ करे । जो भारतका राजा भी भारत से गुप्त विद्वेष करता है, उसके धर्म यह प्रती हटवाना चाहता है, विदेशोंके ही धर्मको प्रचलित करता है, अपने धाि चेतनसत्ता नियमों को कानून बनाकर हटवाता है; अपने देशवालांकी तथा दृश्य परिण पण्डितोंकी नहीं सुनता, उसका भयङ्कर विरोध करना चाहिये । उ जगत् नाम राजा वेनंकी भांति दानववृत्ति रहती है - यह जानकर उसे राज्यसे प्रतीति भी देना चाहिये । भारतीयताके भक्त राजाका ही अभिषेक करना चाहिये । ज्ञान द्वारा ब्रह्म ही ( २६ ) विविध वाद – - वेदान्तदर्शन पुराणसम्पादक श्रीवेदव्या भेद नहीं । जीसे बनाया गया है पुराणोंमें वेदसे जो दर्शनशास्त्र आया है, पुरार यह प्रवक्ताने उसेहो ब्रह्मसूत्रोंके सूत्रोंमें व्यवस्थापित किया है । उसी ऋमा व्यावहारिक का नाम उत्तरमीमांसा कहा जाता है । यही अन्तिम दर्शन है । इसे हारमें उपा भिन्न - भिन्न आचार्योंने अपने दृष्टिकोणले भाष्य किया है । तत्तत् सशुद्धि तथा दाय वा बादोंकी प्रतिष्ठा उन्हीं भाष्यों के आधारपर है । बौद्ध थे— न्यायप्रस्थान ), प्रसिद्ध उपनिषद् ( श्रुतिप्रस्थान ), भगवद्गीश्रास्तिकताक ( स्मृतिप्रस्थान ) यह तीन ग्रन्थ प्रस्थानत्रयी नामसे प्रसिद्ध हैं । इन सम्प्रदाय में प्यासे ही अद्वैतवाद, विशिष्टाद्वैतवाद, द्वैतवाद, द्वैताद्वैतवाद शु २ वि द्वैतवाद, अचिन्त्यभेदाभेदवाद - यह सम्प्रदाय अथवा वाद जारी वामीसेव हैं । अद्वैतवाद से अतिरिक्त शेष बाद वैष्णव सम्प्रदाय उपासना- सिद्धय हम है । हैं । इस कारण उनमें जगत्की सत्यता तथा ब्रहमके सविशेषरूप कृति हुई ह प्रतिपादन है | इस कारण वे सम्प्रदाय उपासनाकाण्डकी सिद्धिविकाही हैं, श्रद्वैतवाद अन्तिम सम्प्रदाय ज्ञानकाण्ड की पुष्टि के लिए है ॥ वे समस अब इन बादोंका ' कल्याण ' की रीतिसे निरूपण करके ' संज्ञिनकी प्रपत्ति सनातनधर्म ' विषयका उपसंहार किया जाता है । शेष विषय ' श्रीसनाता है, ज्ञा धर्मालोक ' ग्रन्थमालामै यथासमय निकलते रहेंगे । इस प्रकाशन जनताका सहयोग अपेक्षित है । नासे श्रज्ञा CC - 0. Ankur Joshi Collection Gua An eGangotri Initiative

पृष्ठ 43

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४८ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) को १ द्वैतवाद- - यह दीख रहा हुआ जगत् केवल प्रतीतिमात्र हैं, ध यह प्रतीति भी श्रज्ञानले है । एकही निगुण, निराकार, निर्विकार, ने धार्मि चेतनसत्ता वास्तविक है, यह दृश्य जगत् ' उससे भिन्न नहीं है । समस्त था घरे दृश्य परिणामी और अनित्य है । नाम और रूप मनकी वृत्तियाँ है ॥। उप जगत् नाम एवं रूपसे अतिरिक्त कुछ भी नहीं । उस नाम श्रौर रूपकी यसे प्रतीति भी मायासे है । माया अनिर्वचनीय और अनादि है । तथापि चाहिये । ज्ञान द्वारा उसका भी थन्न होनेसे उसकी भी सत्ता नहीं । एकमात्र ब्रह्म ही सत्य है । उसमें विजातीय, सजातीय एवं स्वगत कोई भी नीवेदव्या भेद नहीं है । पुरा यह वाद भगवान् श्रीशङ्कराचार्यस्वामीसे उपज्ञात है । उन्होंने ब्रहमम् ब्यावहारिकता और पारमार्थिकतामें भेद माना है । श्राचार्य चरणोंने व्यव--! इस हारमें उपासना, भक्ति तथा श्राचारको महत्व दिया है । इनसे चित्तकी तत् सशुद्धि तथा ज्ञानपात्रता प्रतिपादित की है । श्रीशङ्कराचार्य प्रच्छन ब्रहमबौद्ध थे — यह साहसिक उक्ति ही है । इस मतमें श्रुति, शास्त्र, तथा गवद्गीआस्तिकताको प्रतिष्ठा के साथ ज्ञानको भी महत्त्व दिया गया है, बौद्ध । इन सम्प्रदाय में ऐसा नहीं है । चः शुद २ विशिष्टाद्वैतवाद – यह वाद महाप्रभु श्रीरामानुजाचार्य-जारी ( वामी प्रवर्तित किया गया है । इसमें चिदचिद्विशिष्ट समग्र वरव ही -सिद्घ हम है । ब्रह्मक्रे चेतन अंशसे चित् जीव है, और अचित् श्रंशसे जड़ शेषरूपकृति हुई है । ब्रह्म जगत्का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण है । जीव द्विमिकाही अंश है । भगवान् नारायण ही इस समस्त जड़ - चेतनके स्वामी है । वे समस्त गुणगणोंके एक धाम हैं, और नित्य वैकुण्ठविहारी ' हैं । ' संज्ञिनकी प्रपत्ति ( शरणागति ) ही जीवकी मुक्तिका साधन है । जीत्र ग्रीन है, ज्ञान जीवका धर्म है । जीव और ईश्वर निस्य भिन्न हैं । • म सगुण तथा सविशेष है । जगत् ब्रह्म का परिणाम है । उपा-नासे ज्ञानकी निवृत्तिही जीवका प्रयोजन है । श्रम श्रीनारायण CC - 0. Ankur " सनातन धर्म के सिद्धांतों का संक्षेप ४६ अपनी योगमाया शक्तिसे युक्त होकर कर्मफलदाता ईश्वर रूपसे जगत् की उत्पत्ति, स्थिति एवं संहारका कारण है । अन्तर्यामी अर्चा यदि ' विग्रहों में जीव हो उसकी प्राप्ति होती है । जीव चेतन तथा अनुरूप एवं का शरीर है । जीव और ब्रह्ममें स्वगत भेद है । जीव और ब्रझ दोनों चेतन तथा स्वप्रकाश हैं, ज्ञानके श्राश्रय हैं, . नित्य हैं. और देहादिसे भिन्न हैं । जीव कर्ता, भोक्ता तथा ब्रह्मका । जीव ब्रह्मसे श्रभिन्न कभी भी नहीं होता । श्राकृत चिन्मय दास वैकुण्ठ धामनें निवास की प्राप्ति ही जीव को मुक्ति होती हैं, वह शरीरसे ब्रह्मकी शरणागति द्वारा प्राप्त होती है । शास्त्रसे विपरीत सब कर्म त्याज्य हैं । ३ - द्वैतवाद — इसे श्रीमध्वाचार्यस्वामीने प्रवृत्त किया है ' इस सम्प्रदायमें जीव और ब्रह्म दोनों नित्य एवं पृथक् सत्ताएं हैं । जीब श्रखु ' है दास है, और ब्रह्म सगुण, संविशेष एवं स्वतन्त्र है । जीवका सालोक्य शादियों में एक मुक्तिको पालना ही परमपुरुषार्थ है । जीव और ब्रह्मका साम्यबोध भ्रम एवं अपराध है । दृश्य जगत् सत्य है, विकारी और परि-वर्तनशील भी वह मिथ्या नहीं है । ब्रह्म केवल शास्त्रसे ही गम्य है, और वाणीका श्रगोचर है । परमत्तस्य ब्रह्म भगवान् विष्णु हैं । भांत, स्याग और ध्यान जीवकी मुक्तिके लिए साधन हैं । श्रार्यसमाजका द्वैव-चाद इस द्वैतवाद से स्वतन्त्र है और स्वेच्छाकल्पित है । F ४ द्वैताद्वैतत्राद - ग्रह बाद द्वैत एवम् अद्वैतका सामञ्जस्यकर्ता हैं, श्रीनिम्बार्काचार्यसे प्रारब्ध किया गया है । इसमें जगत् ब्रह्मका परिणाम हैं । ब्रहम परिणाम होने पर भी विकार नहीं होता जोव और जगत् बहूमके ही परिणाम हैं । दोनों, ब्रह्मसे पृयक भी हैं, मिलित भी हैं । ब्रहमेका सगुणभाव मुख्य है, जगदतीतरूपमें ब्रह्म निर्गुण है । ब जगत्का श्रमिन - निमित्तोपादान कारण हैं । जीव ब्रहमका प्रश है, उससे. भिन्न भी है, अभिन्नं भी । जीव अणु है । मुक्तकं जीव श्रात्मातथा Joshi Colleton Gujarat. An eGangotri Initiative

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१० श्रीसनातनघर्मालोकः ( ४ ):: जगत् से भिन्नता और ब्रह्मले अभिन्नताका अनुभव करता है । मुक्तिका साधन उपासना है । ५ शुद्धाद्वैतवाद – इसे श्रीमान् वल्लभाचार्य गोस्वामीने प्रसारित किया है जगत्के मिध्यात्वको हटाकर इसमें उपासनाको प्रतिष्ठापित किया -गया है । श्रीकृष्ण ही इसमें ब्रहम हैं । वे निर्गुण, निर्विशेष, कर्ता, भोक्ता निर्विकार, गुणांतीत, विरुद्धधर्माश्रय, संसारधर्म से रहित, तथा जगत्का उपादान हैं । जगत् सत्य है और कार्य है । उसका परिणाम ब्रह्मले अभिन है । जगत् में पदार्थों के श्राविर्भाव - तिरोभावं होते रहते हैं । जीव शुद्ध चीर रूप है । जीवके लिए ब्रह्म की प्रीति ही सुमार्ग है । इसका परिणाम श्रीकृष्ण में पतिभावकी प्राप्ति हैं । वह पुष्टिमार्ग, ( भगवदनुग्रह से प्राप्त होती है । ६ अचिन्त्यभेदाभेदवाद - यह चैतन्यदेव प्रभुसे प्रसारित किया गया है । इसमें श्रीकृष्ण सत्य हैं — यही ज्ञान जीवके लिए पर्याप्त है । इसमें श्रीमद्भागवतको हो ' भगवद्गीता, ब्रह्मसूत्र तथा उपनिषदोंका भाय स्वीकृत किया जाता है । इसमें ईश्वर, जीव, प्रकृति, काल चौर कर्म यह पांच तत्व हैं । शास्त्र वाचक हैं धौर ईश्वर वाच्य है । ब्रझका तएव सगुण, सविशेष श्रीकृष्ण ही हैं । वे स्वतन्त्र, सर्वज्ञतादि गुणोंसे युक्त, जीवको मुक्ति और मुक्ति देने वालें हैं । प्राकृतगुणोंके श्रभावमें वे निर्गुण है । उनकी संविद, सन्धिनी, ह्लादिनी यह तीन शक्तियाँ हैं । जगत् ब्रह्मका परिणाम है. वह सत् है, और अनित्य है । ईश्वर, जीव, • काल, प्रकृति यह चार नित्य तत्व हैं । प्रकृति ब्रह्मकी शक्ति है, त्रिगु-णात्मक है, नित्य है । कर्म जड हैं । जीव ऋणु है, वह ब्रह्मसे मोग्य है । प्रेमद्वारा श्रीकृष्ण की समीपता प्राप्त होना ही जीवको मुक्ति है । निष्कर्ष- - अद्वैतवाद ज्ञानयोगकी और शेष बाद उपासनाको . पुव्यर्थ हैं । यह सभी बाद उक्त प्रस्थानत्रयी के भाष्यरूप हैं । माया-CC - 0. Ankur Joshi Collection सनातन धर्म के सिद्धांतोंका संक्षेप I I शक्ति श्रचिन्त्यरूप है, परमतत्व वाङ्मनसगोचर नहीं - यह सर्वसम है । इसकी उपलब्धि र अनुभूतिमार्ग यथाधिकार होते हैं । इसी " अधिकारभेदसे बने हुए पुराणों में परतत्व कहीं विष्णुरूप में, कहीं कर रूपमें, कहीं शक्ति श्रादि रूपमें प्रतिपादित है, वैसे ही उक्त आधार हैं, ह का सिद्धान्तभेद भी विभिन्न अधिकारियोंके लिए है | अद्वैतवाद अपने मार्थवाद है और तम कोटिका हैं, उसका व्यवहार में थाना हैं, शेष वाद व्यावहारिक हैं । भक्तिके प्रसारार्थ हैं । जहाँ ( २६ ) उपसंहार - इस वर्णित प्रकार से सनातनधर्म सर्वोपका प्राचीन हरता है । यही वेदका ग त सुनाता है, भगवद्गीतारूप मा सत्कर्म खिलाता है, शरणांगतोंको अभयदान देता है । धनी इससे लाख से हिन्दु ' को खर्च करके जो फल प्राप्त करते हैं, दरिद्र उसीको कौड़ी से प्राप्त साहित सकता है । यह धर्म अग्निको जलवा कर जल बरसाता है, मरने हम घर श्रमरत्व दिलाता है, पत्थरसे प्रभुको प्रकट करता है - इसके विज्ञ यनकर प्रकार हैं । यह त्याग बढ़वाता है, लोभको नहीं । यह नहीं, किन्तु प्रेमका पाठ पढ़ाता है । यह क्रान्तिको नहीं, शान्तिको बढ़ाता हैं । असत्को नहीं, किन्तु सत्को पुष्ट करता है । कि " धर्म में परमात्माकां दूत यहां आता है, किसी में परमात्माका पुत्र, पर लोक ' धर्मकी रक्षा के लिए तो भगवान् स्वयं ही अवतीर्ण ( प्रकट ) होते रही है * कोई - कोई धर्म तो अभी तर्कभी परीक्षार्थ कसौटी पर कसा जारही है, करेंगा, केवल मुखमें है, पर यह सनातनधर्म तो शिखामणि है । इसे इसका अपना सिर देकर अपनाया है, सतियांने जलकर इसे अपनी छाती से करना क किया है, धीरोंने धैर्य से इसका धारण किया है । खण्डनके ' व्या अब ' हि इसके खण्डनमें सफल नहीं हो सके यती इस धर्मको संयमसे श्री करते हैं, पुत्र पिताकी सेवः से, पत्नी पतिव्रतसे इसे अनायास पा । इस प्रकार के सनातनधर्मसे घृणा करनेवाला अपने आत्मासे छ करता है - यह निश्चय है । Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 45

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श्री सनातनधर्मालोकः ( ४ ) सर्वसम ' हमें जानना चाहिये तथा प्रतिज्ञा करनी चाहिये कि हम अपने इसी सनातनधर्मकी सेवा करेंगे । इसकी रक्षार्थ मृत्युको भी स्वीकार कर अपने यशकी फैलावेंगे । मरनेके समय तन, धन जन यहीं रह जाते हैं, हमारे साथ नहीं जाते, केवल यही धर्म ही हमारे साथ जाएगा । हम बाद अपने देशके इसी धर्मके लिए जीवगे, इसीके हितार्थ मरेंगे । यदि हमारी मृत्युसे देशका यह धर्म बचता है, तो हम सामने मरकर तर जायेंगे । नर्वोपका जहाँ भी हम रहेंगे, वहीं अपने इस धर्मका तथा इसके प्राचीन एवम् अर्वाचीन साहित्यका प्रचार करेंगे । रूपमा ज्ञान, भक्ति, सत्कर्म, नीति तथा सृत्यके मार्ग से कदापि नहीं फिसलेंगे । भारत हो लाख से हिन्दुस्थान है, हम हिन्दुओं का अ दिदेश है यह जानकर भारतीय.., प्राप्त साहित्यसे प्रोक्त इस धर्मको पालगे । श्रालस्य छोड़कर, उद्यम अपनाकर हम धमो द्वारक तथा देशोद्धारक एवं जगदुद्धारक होगे । दीनोंके माथ अनकर सनातनधर्मका आलोक फैला देंगे । कल यह है ' सत्चिन्त सनातनधर्म ' जिसे हमने सनातनधर्म सम्बन्धी नहीं, प्राचैन अर्वाचीन पुस्तकोंसे दुहा है । उसके भिन्न भिन्न पुष्पासे रससच्य है करने में हम भ्रमर बने हैं । इसीका महाभाष्य हमारा ' श्रीसनातनधर्मा-त्र, पर लोक ' महाग्रन्थ है जिसकी यह ग्रन्थमाला आप लोगोंके श्राश्रयसे निकल हो रही है । यह ग्रंथ सभा शाक्रान्त जन की शङ्काय आतङ्कको दूर ही है, करेगा, और अपने स्वरूपको भी स्पष्ट करेगा । भारितधर्मके उपासकों का इ इसका प्रचार और प्रसार करना तथा इसके प्रकाशनमें पूर्ण सहायता ती करना कर्तव्यमें आ पड़ता है । ' हिन्दुधर्मके मूल सूत्र बतला दिए गये । के ' व्या अब ' हिन्दु शब्द ' की प्राचीनता के विषय में आगे कहा जाता है 1 मंसे श्री पा मासे CC - 0. Ankur Joshi हिन्दु शब्द की वैदिकता · अथवा हिन्दु शब्द का महाभाष्य ' हिन्दुधर्म ' का निरूपण हो चुका है, अब हिन्दु - शब्दको वैदि-कता वा प्राचीनता पर प्रकाश डाला जाता है । भारतका नाम वेदमें ‘ सप्तसिन्धु वा सक्षिप्त नाम सिन्धु ' श्राया है, श्रार्यावर्त वा भारतवर्षं नहीं । इसी ' सिंधु ' का दूसरा रूप ' हिंदु ' है । यहां पर ' स ' को ' द्द’वैदेशिक वा असंस्कृत न समझना चाहिए । ' स ' को ' ह ' पढ़ना श्रस्मद्देशीय भी है, हिन्दीभाषिक तथा संस्कृत - भाषिक भी है । प्रत्युत वेदकालीन भी है । ' श्रीमनातनधर्माल्लोक ' के. पाठकगण इस पर निम्न पंक्तियां देखें-१ - मुलत की भाषा में ' सर्वे ' का अपभ्रंश ' सब्बे ' भी है ' हन्त्रे ' भो । ‘ आषाढ़ ' का उच्चारण वहाँ पहले ' श्रासाद ' हुआ फिर ' हाड ' हुआ! ' पौष ' का अपभ्रंश वहाँ पूर्व ' पोल ' हुआ, फिर ' पोह ' | ' माष ' पहला उच्चारण वहाँ ' मास ' होकर फिर ' मोह ' हुना । श्वसुर का मुलतानी, भाषा में ' सोहरा ' कहा जाता है, यहाँ पर ' स ' का ही विपरिणाम ' ह ', है । ' पाश ' को ' फाही ' कहते हैं, ' श ' को ' स " फिर ह ' हुधा । मुलतानी भाषा संस्कृत भाषा से हिन्दी म बाकी अपेक्षा अधिक मिलती है-- यह कभी फिर लिखा जायगा । दश ' का मुलतानी उच्चारण ' दस ' होकर फिर ' दह ' हुआ । ' विंशति ' का उच्चारण वहाँ ' बीस ' होकर फिर श्रीह हुआ । वहीं ‘ स्नुषा ’ को ‘ नू ंह ' कहा जाता हैं, यहाँ पर ' न ' तो पूर्व गया, और ' स ' अक्षर ' ह ' होकर पीछे चला गया । इससे सिद्ध होता है ' स ' का ' ह ' उच्चारण ' देशी ' भी है । २ – कई विद्वान् वेदों का श्राविर्भाव ' सिन्धु ' तट पर मानते हैं, उसके देश ‘ सिन्ध ' की भाषा के भी कई शब्द देखिए- ' श्वसुर ' को सिन्ध Collection Gujarat: An EGangotri Initiative:

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१४ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) देश में ' सहुरो ' कहते हैं, ' विश्वास ' को ' बेसाहु ' तथा ' प्रविश ' को ' पहु ' कहते हैं । ' उ ' को पीछे जोड़ना सिन्धी शैली है; इन सिन्धी शब्दों में ' स ' को ' ह ' बोला जाता है । इससे स्पष्ट है कि वहाँ पर भी ' स ' का ' ह ' उच्चारण वेदके प्रभावसे हुआ । १३- पंजाबी भाषा लाहौर श्रादिमें ' पैसा ' को ' पैहा ' इस रूप में कहा जाता है । इस प्रकार ' एषः ' का वहाँ पर ' एसो ' होकर ' एहो ' इस रूप में विपरिणाम होगया । इस प्रकार ' पंजाबी ' के अन्य शब्द भी सम्भव हैं । करनाल, रोहतक श्रादिके प्रामों में है ' को ' से ' कहा जाता है । राजपूताना में ' सागर ' को ' हागर ' कहा जाता है । जोधपुर ( मारवाड़ ) में ' सुनो ' के स्थान में ' हुणो ' कहा जाता है । इसी तरह वहीं ' सारां ' सांग,.. सीरा, सालगराम, सर्दी, सीता, श्रादि को हारा, हाग, हीरा, श्राटि रूप मैं पढ़ा जाता है । इनका उच्चारण यहाँ श्राधा हकार तथा अस्पष्ट सकार किया जाता है । ' एन इन्ट्रोडेक्शन टू कम्पेरेटिव फिलोलाजी ' इस पी ० डी ० गुंखे से बनाई हुई अंग्रेजी पुस्तक ( १६१८ के ३३ पृष्ठ में लिखा है - ' सप्त ' यह संस्कृत में है, ' सात ' यह मराठी भाषा मे हैं, ' हात ' यह गुजराती भाषा में है । ' सार्धं ' ' यह संस्कृत भाषामें हैं । ' साढे ' यह मराठी भाषा में है, ' हाडा ' यह गुजराती भाषा में है । महाराष्ट्र शब्दके. पत्र में ' महा ' का रह गया ' म ' राष्ट्र का होगया ' रहटा ' । मरहटी में यह ' ह ' ' प ' के ' स ' का है इस प्रकार सकारका हकार उच्चारण देशी सिद्ध हुआ । ४ -- अब प्राचीन हिन्दीभाषाको देखिए -- ' तुलसी रामायण ' ( राम-चरितमानस ) में लिखा है- ' केहरि कन्धर वाहु विशाला ' ( बालकाण्ड, -छठा विश्राम, १ व चोपाई ) यहाँ पर ' केसरी ' का हो दूसरा रूप ' केदरी ' है ।..सूरदास आदि ' पाषाण ' को ' पाहन ' लिखते हैं । वहां पर ' ई ' का ' स ' होकर ' स ' को ' ह ' हुआ । इसी प्रकार एक स्थानमें ' अनुसारि ' के स्थान में ' अनुहारी ' लिखा है । इसी प्र CC - 0. Ankur Joshi Collection हिन्दु शब्द को वैदिकता तो एके आहि ' यहाँ पर ' आहि ' यह ' यासीत् ' वा अस्ति का अपन प्रणीत है, जिसका अर्थ ' है ' अथवा ' या ' है । ' इसी प्रकार पद्मावतने ' सृष्टि पथमें के स्थान ‘ सिहिटि ' का प्रयोग किया है । ' स'का सो होकर चिपरीता यह ' थोह ' बना पुरानी हिन्दी में । ऐतदादिक स्थलोंमें ' स ' वा ' ष ' व ' ह ' उच ' स ' होकर फिर ' ह ' उच्चारण हुआ है । ' ब्रह्मार 1 ५ श्राज कलकी हिन्दी देखिए- इसमें ' स्नान ' ' कानहान हो गया है । यहां पर ' स ' ' ह ' रूपमें परिणत होकर ' न ' के पीछे हो गया शाकुन्त इसी हिन्दी भाषा में ' ' मास ' को ' माह ' अथवा ' महीना ' कहा जाता है । प्राकृत ' प ' के स एकादेश, द्वादश, त्रयोदश, चतुर्दश, पंचदश, पोडश, सप्तदश, अष्टादार हैं । स्व इन शब्दों में ' श ' का ' स'और फिर ' ह ' होकर ग्यारह, बारह, तेरह, चौद है । पन्द्रह, सोलह, सत्रह, अठारह ' यह विपरिणाम हो गया है, इससे ' स ' के में ' स्ना उच्चारण में देशिकता स्पष्ट प्रतीनं हो रही है । ' अस्ति सकारमाति के स्था इस महाभाष्यके सिद्धान्त के अनुसार ' अस्ति ' ' स ' रूप है । उसी उदक ज्ञ रूप ' अस् ' के स्थान में ' है ' पढ़ा जाता है । ' ' पुष्प ' के स्थान में हिन्दी । 19-कहीं ' पुरुष ' शब्द दीखता है । यहाँ ' ष ' का ' स ' होकर ' स ' फिर ह ' है स ' और ' गया | ‘ अस्मान् ’ का विकृत ' हमें ' है; यह ' ह ' ' स ' का है । ' सः ' का ' वह शाभ्यन्त ‘ सन्ति ’ ं का‘‘हैं ' II ' ‘ संग्राम ' का ' हंगामा ' ' यहा सब ' स ' ' का ' ह ' हो, प, I सिद्ध कर रहे हैं । छापने वाले भी ' स ' के स्थान ' हं ' ' छाप दिया करो व्याकरण है । ये सब ' स ' के ' ह ' रूपमें विपरिणाम हैं । 1 देखा गय ६- प्रकृत भाषाकी थोर थाइए । उसमें भी कहीं - कहीं ' ह गया है । को ' ह ' देखा जाता है । ‘ चतुर्दश ' शब्द में ' श ' का ' स ' उच्चारण प्रति गया है । ही है । युक्तप्रान्त तो इस उच्चारण केलिए प्रसिद्ध ही है । उसी हिन्दी में प्राकृत में ' चउद्दह ' इस प्रकार ' स ' के स्थान में ' ह ' ' उच्चारण ' मिलत नाटक के । इस ' प्रकार ' अस्मि ' ' के स्थान पर प्राकृत में ' ह्मि ' प्रयुक्त होता है, य ' स ' के स् ‘ हृ ' × स्पष्ट ही ' स ' का विपरिणाम ' है । ध्वनिकार थानन्दवर्धनाचा × इसी तरह ‘ प्रश्नः ’ का ‘ पण ’ का विष्णुका विण्हु ' बिस्म रोखता है का ‘ विग्हन ' ‘ असो ' का ' ग्रह ' अस्मान का ' श्रह्मे, ' दिवस ' का दिये हो Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) अपना प्रणीत ' देवीशतक ' में संस्कृत प्राकृत उभय भाषाश्लेष के उदाहरणात्मक नें ' सर्वि पद्य में ' मह देसु रसं घम्मे ' यहां पर ' मम देहि रसं घर्मे ' यह संस्कृत पाठ रीता है । यहां पर ' देसु ' का ‘ देहि ' यह " दिखलाई देता है यहां भी ' स ' का ' प ' ' ६ ' उच्चारण स्पष्ट ही है । इसी प्रकार अस्मादशानाम् ' ' की प्राकृत ' अह्मारिसाणं ' तथा ' युष्मः कम् ' की ' तुझाणं ' एव ' अस्माकम् ' की प्राकृत ' नहान ‘ श्रह्माणम् ' है । मृच्छकटिकमें ' स्नातोहम्, की प्राकृत ' ह्लादेहम्, ( ६१ | है | होगया शाकुन्तलमें ७ म अंक में तापसी ' विस्मितास्मि के स्थान ' विह्निद'ा, यह जाता है । प्राकृत ' बोलती है! ' उष्णं ' की प्राकृत उद्ध ( २१ ) नागानन्दमें है । यहां ' प'केस, काही ' ह, है ' ग्रीष्मेकी प्राकृत शाकुन्तल के ३८ ' कसें ' गिा ' प्र. ई. है । स्वमवासवदत्तमें चक में चेटी ' स्मः ' के स्थान ' ह्म: कहती वो है । श्क में ' स्नायति ' के स्थान में ' हूणाअदि ' कहती है । ४ शुद्ध " स ' में ' स्नात ' की प्राकृत ' ह्लाद ' घाई है । द्वितीयाङ्क में वासवदत्ता, तूष्णीका माति ' के स्थान ' तुह्रीया ' कहती है । ५ ' श्रङ्क में ' उदक स्नान ' के स्थान में सी ' उदक ह्राण कहा है । यहां सर्वत्र ' स ' को ' ह ' दीखता ' 1 हिन्दी ७ -- अथ ' आलोक ' के पाठकगण संस्कृतके व्याकरण की घोर थाएँ । रह ' ' स ' और ' ह ' ये दो अक्षर बाह्य प्रयत्नों में ' महा - प्राण ' समान हैं! -का आभ्यन्तर प्रयत्न भी दोनोंका ' ईषद्विवृत ' समान ही है । वर्णमाला में - होजा श, प, स, ह, यहां पर ' स ' और ' ह का ' साहचर्य तो प्रत्यक्ष ही है । दया करो | व्याकरण में ' सेह्य'पिच्च ' ( पा ० ३ | ४ ८७ ) इस सूत्र में भी ' सि ' को ' हि ' देखा गया हैं । ‘ ह एति ' ( पा ० ७ । ४ । १२ ) सूत्र में भी ' स ' को ' ह ' देखा कहीं ' ढ ' गया है । अस्मद् शब्द के सु में ' वाहौ सौ ' ' से ' अस्म ' को ‘ अह ' हो प्रसिद्ध गया है । यहां ' स ' को ' ह ' करना स्पष्ट हैं, जिसका ‘ अहम् ' बना थौर उसी हिन्दी में ' च ' हट कर ' हम ' रह गया । इसीलिए ‘ अभिज्ञान शाकुन्तल ’ 1 III नाटक के ' त्वमर्हतां प्राग्रसरः ' ( ५ ( १६ ) इस पद्य में ' प्राप्तहर्ः ' इस प्रकार है, ' स ' के स्थान में -ह ' का पाठभेद मिलता है ।.. चनाचा म - श्रव वेदकी. थोर आना चाहिए । वेदमें भी कहीं ' स ' को ' ह ' विसार दोखता है । ' निघण्टु ' ( १११३ ) में ' सरिता ' यह नाम नदीका है; वैसे दिव CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. हिंदु शब्द का महाभाष्य २७ हो ' हरित ' भी नदी का नाम माना गया है । वेद में भी उसका प्रयोग मिलता है— ' हरिवो न रंह्याः ' ( अथर्व ८ २०/३०१४ ) ' यं वहन्ति हरित: -सप्त ' ( अथर्न ० १३ | २ | २५ ) । इस प्रकार ' हरित: ' सरितः, में अर्थ मेद नहीं । इसी प्रकार ' निघण्टु ' ( १।१३ ) में ' सरस्वत्यः ' भी नदियोंके नामों में आया है ' हरस्वत्यः ' भी । | अब ' हरस्वती ' शब्द को देखिये- ' तं-ममनु ' दुच्छुना हरस्वती ' ० २।२३।६ । इसी प्रकार वेदमें ' सिरा ' का का ' घमनी ' ( नस - नाडी ) प्रथ हैं । इसी प्रथमें ' हिरा ' यह पाठ भी दीखता है । जैसे कि ' इमा यास्ते शतं हिरा: ' अथर्ग ० ७ । ३१२ ) हिराः - नाडियाँ । ' शवस्य धमनीनां ' सहस्रस्य ' हिराणाम् ' ( अथर्व०-१ | १७ | ३ ) । ' अमूर्या यन्ति योषितो हिरा लोहितवाससः ' ( अथर्न -१७। यहां पर ' निरुक्त ' ( पं ० शिवदत्त सम्पादित ) के १८० पृष्ठ की टिप्पणी में ' हिरा: - सिराः, यह पाठ भी लिखा है । इससे स्पष्ट है कि-' सिन्धु ' में ' स ' के स्थान में हकारघटित ' हिन्दु ' यह पाठ भी वैदिक कालसे चला हुआ है, मुसलमानी कालसे नहीं । ' श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यौ ३१.२० ) यह मन्त्र शुक्लयजुर्वेद में है । ' श ' का उच्चारण ' स ' और ' श्री ' का उच्चारण ' स्त्री ' इस रूप में उत्तर प्रदेश तथा देहली प्रान्त धादिमें सुप्रसिद्ध ही है । उस ' स ' का अन्य वेद में ' ह ' भी पाठ दिखलाई देता है । उक्त मन्त्र ' कृष्णयजु-वैद ' के ' तैत्तिरीयारण्यक ' में ' हीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यौ ' । ( ३.१३ ) इस रूप ' में घाया हैं । तब स ' को ' ह ' पढ़ने में जहां देशिकता, हिन्दी-भाषिकता, प्राकृतिकता, सांस्कृतिकता सिद्ध है; वहां पर वैदिकता भी सिद्ध हुई । हां, इतना अवश्य है कि ' स ' को ह ' पढ़ना भी क्वाचित्क है, सार्वत्रिक नहीं । कहीं उसकी व्यवस्था है, कहीं नहीं । इसी कारण ' सत्यं ' के स्थानपर ' हेत्य ' आदि नहीं पढ़ा जाता । वेद की सभी ११३१ सहिताओं में ६-१० संहिताओं के अतिरिक्त अन्य संहिताएं प्राप्त नहीं होतीं, अन्यथा वहां ' सिन्धु ' के स्थान में कहीं ' हिन्धु ' पाठ को मिल An eGangotri Initiative

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I I श्री सनातनधर्मालीकः ( ४ ) जाता, क्योंकि - ' नह्यमूला जनश्रुतिः, । फिर ' हिन्धु ' के स्थान में ' हिन्दु ' यह पाठ तो लोक - प्रसिद्धि है, ' घुणातरन्याय ' से वहभी संस्कृत होगई । जैसे कि ' प्रहलाद ' की प्रसिद्धि ' प्रल्हाद ' इस प्रकार लकार घटित होगई, जब कि - रेफ - घटित ही उसका नाम प्राचीन पुस्तकों में आता है । + इधर वादियों के अनुसार भी जब सृष्टिके श्रादिमें हिन्दु जातिके अतिरिक्त कोई जाति नहीं थी. यह फारस, अरब आदि के मुसलमान भी पहले हिन्दुही थे; फिर मतभेदके कारण, वा धर्मभ्रष्टतासे अथवा श्रपमा-चणं रूप म्लेच्छता से वे मुसलमान होगये; तब उन्होंने भी जो ' सिन्धु ' " -में ' स ' को ' ह ' कहा, उसमें हिन्दुप्रभाव ही मूल समझना चाहिये । उनका स्वतन्त्र प्रभाव इसमें नहीं माना जा सकना । जब वे अपनी पृथक सत्ता नहीं रखते थे तो ' स ' के स्थान ' ह ' भी नूतन रूपसे कहौंसे ला सकते श्रतः स्पष्ट है कि ' हिन्दु ' शब्द वैदेशिकोंकी स्वतन्त्र कृति नहीं । १० -- जो कि, यह कहा जाता है कि- भारतीय तो अब भी ' सिन्धु ' को ' सिन्ध ' और ' सिन्ध ' देश के निवासियांको ' सिन्धी ' कहते हैं । यदि यह हमारा ही अपभ्रंश होता, तो इन्हें ' हिन्दी ' तो कहते; श्रतः यह वैदेशिक है ' यह वादियोंकी युक्ति वादियोंके पक्षको स्वयं काट रही हैं । यदि वे + जैसे कि- ' अथर्ववेद ' में ' विरोचनः प्राहादि: ' ( ८/१०/४/२ ) * श्रीमद्भागवत में ' प्रहलादो भून्ना हाँस्तेषाम् ( ७।४।३० ) परन्तु लोकसें ' प्रहलाद, इस प्रकार लकार - घटित प्रसिद्धि हो गई । वह भी घुणात्तरन्याय से संस्कृत होने से परिवर्तित नहीं की जाती । इसी प्रकार वेदके मन्त्रभाग में ‘ वेन ' के पुत्र का नाम ‘ पृथी ' । श्रथर्व ० ८ १०+ अ ११ ) मिलता है, परन्तु चेदके ब्राह्मण भाग में ' पृथु'- ( शतपथ २३०५२४ ) तथा पुराणोंमें भी ' पृथु ' ( श्रीमद्भागवत ४।१३ २० ) मिलता है । इस प्रकार ' हिन्दु ' यह नाम भारतवर्ष का है । इसे हस्व लिखना चाहिये- ' हिन्दु ' दीर्घ हिन्दू ' नहीं! मूलशब्द ' सिन्धु ' है " । CC - 0. Ankur Joshi Collection ६० हिंदु शब्द का महाभय समुद्रसे ‘ ' सिन्धु ' का स्थानी ‘ हिन्दु ' वैदेशिक मानते है; तो वैदेशिक लोगोंने यह नदी ' सिन्ध ' अहाता ' तथा, सिन्धी ' को ' हिन्द श्रहाता ' तथा ' हिन्दी ' क्यों नहीं कर रख कहा? ‘ स्थाने ' को आपके अनुसार ' नान ' न कहकर ' स्तान ' क्यों की बीमा इससे स्पष्ट है कि - ' ' स ' को ' ह ' इस शब्द में वैदेशिक नहीं । यदि दर्शन प को “ ह’कहना वैदेशिकोंकी स्वाभाविक प्रवृत्ति है, तो उन्होंने ' ईसामसीह के को चान्द्र ' ईंहामद्दीह ' क्यों नहीं कहा? ‘ मूसा पैगम्बर को ' मूहा ' क्यों नहीं कहा । ( सिन्धु ) वे ‘ संस्कारविधि ' को हंस्कारविधि, क्यों नहीं कहते? " सिन्ध दरिया ' के ' भारत ' " हिंन्द दरिया ' क्यों नहीं कहते? अतः स्पष्ट है कि यह युक्ति इस विषा नदीका न में सङ्गत नहीं । इसी प्रकार ' माल्कसन ' से बनाई ' अकथंर ' ' पुस्तकके ३ व यूनानियों पृष्ठर्मे ‘ ऐ बायर? तुझे सिन्ध और हिन्द राज्य दिये हैं " और ' तारी रखा । फिरोज शाही ' ग्रन्थमें हिन्द और सिन्धके सारे मुल्क ' यह पाठ क माया? अतः वादियों की उक्त युक्ति व्यर्थ है । बनना स्व अन्य प्रकार | ११ – थथवा इस विषयमें यह भी कहा जा सकता है ि ‘ सिन् ' शब्द से बना है ‘ सिन् ' का अर्थ ' इन्दु ' अर्थात् चन्द्रमा उस ' इन्ड इसलिए ' सादृष्टेन्दु सिनीवाली, ( अमरकोष १ | ४ | ε इ अमावास्याकानाम ' सिनीवाली ' है; जिसका वेदके ' सिनीवाल हैं । ' देवो दृष्टचन्द्रा पृथुष्टके ' ( ऋ ० २।३२।६ ) ' तस्मै हविः सिनीवाल्यै जुहोतन ' ( २।३२० २ ) महादेवकी म ' या सिनीवाली या राका ' ( ऋ ० २३२२८ ) इन मन्त्रों में निरूपण शिवलिंग सिनीवाली ' यह सायण ( २३२।६ ) में लिखता जाती है ) दृष्टचन्द्राऽमावास्या ' सिनीवाली ' की व्युत्पत्ति करते हुए ' श्रमर कोष ' की व्याख्यासुधामें का -रात्रि है- ' एन - विष्णुना सह वर्तते सा सा लक्ष्मीतद्योगात् सनी - चन्द्रकला ' । इ उसके नाम प्रकार मुकुट ने भी ' सिनी ' का अर्थ ' चन्द्रकला ' लिखा है । निरुक्तकार श्री यास्क भी ' सिनोवाली ' का ‘ वाज्ञेनेव अस्यामणत्वात् चन्द्रमाः सेवितम वेदानुस भवतीति वा ' ( ११ ३१।२ ) यह कहकर ' सिन् ' का अर्थ ' इन्दु, ” “ बताते हैं । ^ सिन्धु नाम भी समुद्र का चन्द्रमा धारण करने से सम है " सिन ' धुः । श्रमृतमंथन के समय उस ( चन्द्रमा ) की उत्पत Gujarat. An eGangotri Initiatives

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६० श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४. ) समुद्रसे प्रसिद्ध है. समुद्र चन्द्रमा को देखकर उचलता भी है । ' सिन्धु ' गाने में यह नदीविशेष का नाम भी समुद्र जैसी विशालता - क्यों नहीं कर रखा हो यह भी सम्भव है । इस देश वा दुरन्तता, देख क्यों कहती के लोग सिन ( इन्ड ), के भी थे, चान्द्रायण व्रत हमारे देश में बहुत प्रसिद्ध रहा है ब यदि ' से दर्शन पर चन्द्रमा को हिन्दु नमस्कार भी करते हैं । इसी ' सिन् ' ( इन्दु ) मसीह को चान्द्रायण आदि द्वारा धारण करने से इस देश को ' सिन्धु ' ह्रीं कहा । ( सिन्धु ) अथवा ( इन्दु ) भी कहा जाता रहा । चीनी ह्वेनसांग हरिया ' के ' भारत ' का पुराना नाम ' इन्दु ' माना है । ' वाल्मीकिरामायण ने भी इस दिपा नदीका नाम भी ' इन्दुमती ' लिखा है । ' में सिक्यु कके ३८ इसी इन्दु को बिगाड़ कर: यूनानियों ने ' सिन्धु ' का नाम ' इण्डस् ' और हमारा नाम ' इण्डियन रत रखा । पाठ के १२ - इस प्रकार ' सिन्धु ' वा ' इन्दु ' से भी इस देशका ' हिन्दु ' यनना स्वाभाविक है । देश के नामसे ही जातिका नाम होने से हमारी के ' सिन जातिका नाम भी ' हिन्दु ' हुआ । इसी जातिकै उपास्य देव महादेव न्द्रमा है उस ' इन्दु ' को माथे पर रखते हैं । ' सिन्धु ' शब्द नदीका पर्यायवाचक प्रमा भी हुआ करता है । वे रहादेव ' सिन्धु ' ( गंगा ) को भी सिर में रखते नीवाल हैं । ' देवो भूत्वा देवान् एति ' ( शतपथ १४.६ १०.४ ) इस सिद्धान्तसे ( २३२२० महादेवकी उपासक जातिने ( मुहंजोदाड़ो और हडप्पाकी खुदाई में रूपण शिवलिंग बहुत मिले, यह सभ्यता वैदिककालसे भी प्राचीन मानी लिखता जाती । है ) अपने उपास्यदेवके सिर- माथे में ठहरे ' सिन्धु इन्दु ' का सुधामें यश्चित्तों के लिए गंगानदीके जलका उपयोग करके तथा कला ' । इ. -रात्रि आदि में नमस्कार श्रादिसे जहां श्रादर करना जारी रखा, वहीं उक्तकार नाम ' इन्दु ' ' वा ' सिन्धु ' को अपने सिर - माये रखा । : सेवितम सी ' इन्दु ' वा ' सिंधु ' का दूसरा • रूप ' हिंदु ' * हुआ । अथवा वेदानुसार ' इन्दु, सोमका नाम है । हिन्दु जहां चन्द्र - प्रेमी " चन्द्र वहां याज्ञिक तथा सोमरस के प्रेमी भी थे । सोमयज्ञ प्रमी नेसे समा होने की उत्प CC - D. Ankur Joshi Collection Gujarat. हिंदु शब्द की वैदिकता ६१ से भी उनका नाम ' इन्दु, तथा फिर हिन्दुहो गया । ‘ इन्दु ' में पहला अक्षर ' इ, हैं । ' इ, में ' ' तर भी व्याप्त है । माक्योपनिषद ( ह में ' श्रम्, की व्याख्या करते हुए ' श्र, को सब में प्राप्त व्याप्त तथा संकी आदि माना है । ऐतरेयाररयकमें भी कहा है- अकारो वै सर्वा वाक्, ( २/३ ६ ) तब ' इन्दु में अ, इन्दु, समझना चाहिये । इस लिए महाराष्ट्र आदि में इ, की थि, इस प्रकार लिखते हैं । ' अकुहविसर्जनी-यानां कण्ठः, से, ' अ, और ' ह में कण्ठ स्थानका साम्य हैं तो ' इन्दु का ' चिन्दु होकर ' हिन्दु, हुआ । वैदिक कालमें भी ' सिन् ' के ' हिंदू ' वा ' हिं ' उच्चारण का मूल ' शतपथ ब्राह्मण ' में भी मिलता है । वहां लिखा है -- ' हिं कृत्वा श्रन्वाह, न असामा यज्ञोस्ति इति वै श्राहुः । न वा श्रहिंकृत्य साम गीयते.. प्राणो वै हिंकार: ' ( १ । ४ । ३ । १-२ ) । यहां, ' हिं, को यज्ञका प्राण जीवनाधायक माना गया है । इस प्रकार याज्ञिक इस हिंदु जातिने भी इस ' हिं ' को जीवनाधायक होनेसे अपनाया । पदाय के सिद्ध प्राणप्रद धर्मका नाम ही ' काव्यप्रकाश ' आदि में ' जाति ' कहा है । ' हिं ' का उच्चारण बिना किए वे सामवेद का उच्चारण नहीं करते थे, और बिना सामवेदके गाये यज्ञ नहीं होता था, तब याज्ञिक जातिका नाम भी ' सिन् ' या ' हिं ' धारण करने में ' सिंधु ' वा ' हिंधु ' वा हिंदु ' हुत्रा | ' दा ' धातु का भी ' धारण ' अर्थ होता है, जैसे कि ' निरुक्त ' में लिखा है— दण्डो ददतेर्धारयतिकर्मणः । “ श्रकूरो ददते मणिम् इत्यभिभाषन्ते ( २/२/११ ) ' चतुरश्चिद् ददमानात् ' ( निरुक्त ० ३।१६।१ ) यहां पर भी ' दद ' का ' धारण ' अर्थ किया गया है । “ हिं ' को ' दु ’ " धारण करने वाली जाति ' हिन्दु ' कहलाई । अन्य प्रकार '१३ – इधर उस ' हिं ' को गाय भी कहती है । यह हिंदु जाति वैदिक गायकी भक्त चली श्रारंही है । गायका ' हिं ' करने को बतलाने वाला एक मन्त्र वेद में इस प्रकार आाया है-An eGangotri Initiative

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श्री सनातनधर्मालोकः ( ४ ) ' ती वसुपत्नी वसूनां वत्समिचन्ती मनसाभ्यागात् ।. दुहाम श्चभ्यां पयो अघ्न्या इयं सा वर्धता महते सौभगाय ॥ ( ऋ ० ' ।६४।२७, अथर्व ० ६।१०।१ ) इस गोवर्णनपरक मन्त्र में पूर्वार्ध का श्रादिम व ' हिं ' है, यही यज्ञका जीवनाधायक है, यह पूर्ण कहा जा चुका है, गाय भी यज्ञका धन है, अतः उसने भी ' हिं ' को धारण किया । इस मन्त्रके उत्तरार्ध का आदि वर्ण ' दु ' है । ये ही दो वर्ण ' हिं - दु ' यज्ञभक्त एवं गोभक्त इस जातिने प्रतीकरूपमें स्वीकृत किये । जैसे यज्ञ साम के बिना नहीं : किया जाता और साम ' हिं ' के बिना नहीं गाया जाता, ऋतुः इस याशिक जातिने ' ' हिं ' को धारण किया, वैसे ही इसे जातिका काम भी गाय के बिना नहीं चलता । श्रतः इस जातिने यज्ञ तथा गाय " दोनोंका चिह्न होने से ' हिं ' शब्दको धारण कियां, प्रत्युत यह जाति उस ' हिं ' के सस्कारको अपने छोटे बच्चोंके कान में भी जन्म से ' डालती है । जैसे कि- ' प्रजापतेष्ट्वा हिंकारेण श्रवजिघोमि, गत्वा हिं कारेण, सहस्रायुषा जीव, शरदः शतम् ( पारस्करगृह्यसूत्र १।१८३२४ ) इस जातिका गोप्रेम देखिये- जब यह जाति भोजन करने बैठती है; ती गोग्रास सबसे पूर्व रखती है । मरनेके समय वैतरणीपासर्थ गोदान वा गोपूजन प्रसिद्ध है । पहला श्राद्ध भी गांयको हा खिलाया जाता है । इस जाति ' गोस्वामियोंकी ' उच्चता तथा भगवान् कृष्णाकी उपासना भी गौधोंके कारणसे है । ' गोलोक ' हिन्दुओं के लिए एष्टव्य लोक है । . शुद्धि प्रायश्चित्त यादिमें ' गाय ' के ' पंचगव्य, का ही उपयोग होता है ' दूसरे पशुथोंको हन्तव्य न कह कर गायको ही ध्या ' कहा जाता है । इसी लिए ही हिन्दुत्रोंके मुसलमानोंसे झगड़े होते हैं । गोशब्द दिवाली सब्जियाँ भी प्रायः, नहीं खाई जातीं । धन्यची हिन्दु ॐ ज्ञातिको गायके विपयमें बहुत ही श्रद्धा है, जैसे कि, दूसरेका का खेत खा रही गायका दूसरेको वृत्र न कहना आदि । इन बातोंको छोड़िये, CC - 0. Ankur Joshi Collection हिन्दु शब्द की वैदिकता ६४ हिन्दुओं की स्थिरताकी मुख्य वस्तु वर्ण या जाति है, जिसका विचा से सिद्ध कारणं कर विवाह या उपनयन आदि हुआ करते हैं; उस जाति वा वर्ण ' संतसूचक शब्द ' गोन्त्र, भी इस प्रकार गायके नामसे रखा गया है । करने से तत्र उसी गायके मन्त्र के पूर्वार्ध - उत्तरार्धके प्रारम्भिक व प्रामाए प्रतीक्ररूपसे स्वीकार कर गोभक्त तथा वेदभक्त ' हिन्दु, जातिने वेदरे जहां पर एक एक अक्षरके स्वीकार कर लेने में भी अपनी श्रद्धा दिखला दी है । निकारः ठीक भी है- ' सर्वेषां स तु नामानि कर्माणि च पृथक पृथक शब्द ब्य वेद- शब्देभ्य एवादौ पृथक संथाश्च निर्ममे, ( मनु १/२४ ) इस पद्य इति भा प्रतीत होता है कि परमात्माने वेदके शब्दोंसे ही सब जातियोंके नाम इति ग कर्म तथा श्राकृतियाँ बनाई; क्योंकि वेदका एक - एक अक्षर भी अव्या गत्वाद् है । जैसे तीन वेदोंसे एक - एक अक्षर लेकर परमात्माने ' ओम्, (, उ, म जाता है, बनाया; एक- एक शब्द लेकर तीन व्याहृतियों एक - एक पाद लेन त्पत्ति'म गायत्री बनाई । इसके लिए देखिए ' मनुस्मृति २ । ७६ ' ऐतरेय ब्राह्मण त्युक्तम्, ३२ ' गोपथ ब्राहाणे ६ १/६ ) इस प्रकार ' त्रय्यां वाच विद्यायां सर्वाणि बा ० २२ भूतानि शतपथ ० १०/४/२ २२ ) के अनुसार, हिन्दु शब्द की निष्पति है; उसी भी वैदिक जाननी चाहिये | से निष्पन १४ – इन दोनों वर्णों ( हि - दु ) में उक्त मंत्रके श्रवशिष्ट वर चाहिए । का व्यवधान भी · नहीं जानना चाहिए । ' न्यायदर्शन ' में 5. कहा है-' यस्य येनार्थसम्बन्धो दूरस्थस्यापि तस्य सः । श्रर्थतो ह्यसमर्थानामान शिख सहसा खर म्तर्यमकारणम् । ( 11-18 ) जिससे जिनका अर्थसम्बन्ध होता है भी ऐसी वह दूरस्थित ( व्यवहित ) का भी हो जाता है । जिनका श्रापस ई.आई. सम्बन्ध नहीं, उनकी निकटता भी सम्बन्ध करनेवाली नहीं होती भी पाकिस जैसे कि ' मीमांसादर्शन ' के. शावर भाष्य में भी कहा है- ' असत्य को मिलाक श्राकांक्षायां सत्रिधानमकारणं भवति, यथा-- भार्या राज्ञः पुरुषो देवदत्तस है । जिस ( ६ | ४ | ३३ ) यहां पर ‘ राज्ञः पुरुषः ' की निकटता होते हुए, मध्यम ( गृहद अर्थ सम्बन्ध न होने से समास नहीं होता । इस प्रकार इस अर्थापित Gujarat. An eGangotri Initiative