सनातन धर्मालोक ४ — पृष्ठ 51–60
सनातन धर्मालोक ४ · पृष्ठ 51–60
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I ६४ श्रीसनातन धर्मालोकः ( ४ ) से सिद्ध हुआ कि - ' सत्यां हि श्राकांक्षायाम् श्रसन्निधानमपि सम्बन्ध-वि कारणं भवति ' । वर्ण इस प्रकार ' हिं -- दु ' इन दो अक्षरोंके ' अ, उ, म् ' के इकट्ठा गया है । करनेसे बने हुए ' ओम् ' की तरह, इकट्ठे बने हुए ' हिंदु ' शब्द का वर्णो प्रामाण्य भी सिद्ध हुआ । वैदिक साहित्यमैं ऐसे शब्दोंकी कमी नहीं । नवे जहां पर इताद् ' क्त.त्, नीतःत् ( एतेरकारः, श्रनक्तोर्गकारः, नीलो-दी है । निकारः ' ( निरुक्त ७।१४।६ ) इन तीन धातुओं के एक एक अक्षरसे ' अग्नि ’ पृथक शब्द व्युत्पादित किया जाना है, जिस वैदिक साहित्य में ‘ भर्ग ' का ' भ ’ मान् लोकान्, ' र ' इति रंजयति इमानि भूतानि, ' ग ' के नाम इति गच्छत्य मिसन आगच्छन्ति अस्माद् इमाः प्रजाः, तस्माद् म - र-श्रब्य गत्वाद् भर्गः A मंत्रायणी - आरण्यक ६/७ ) इस प्रकार अक्षरार्थ किया - उम् जाता है, जिस वैदिक साहित्यमें मख ' शब्दका अक्षरथं या व्यु-= लेन त्यत्ति ' मख इत्येतद् यज्ञनामधेयम्, छिद्रप्रतिषेध सामर्थ्यात् छिन खमि-ह्या त्युक्तम्, तस्य मा इति प्रतिषेधः, सा यज्ञे छिद्र ं करिष्यति ' ( गोपक्ष सर्वाणि ब्रा ० २१२ ( २ ) इस प्रकार दीखती है और समुदित करके सिद्धि होती निष्पति है; उसी प्रकार वेदके एक मन्त्रके पूर्वार्ध - उत्तरार्ध के आदिम एक - एक से निष्पन्न उक्तमन्त्र के प्रतीक ' हिन्दु ' शब्दके विषय में भी जान लेना ष्ट वर चाहिए । ऐसी बात कोलिदास के विषय में भी प्रसिद्ध हैं । उसने ' अ ' प्र, - नामाक शि, ख'का अनेन तव पुत्रस्य, प्रसुप्तस्य वनान्तरे । शिखामादाय सहसा खड्गेनोपहतं शिरः इस प्रकार अर्थ निकाला था । श्राजकल होता है भी ऐसी परिपाटी मिलती है । जैसे एन. डबलु. भार, ई. पी. आर, यस ई. आई. आर, टी. टी, डी. टी. एस. डी. सी, आदि । मुसलमानोंने होती भी ' पाकिस्तान ' यह शब्द भिन्न - भिन्न अक्षरों ( पंजाब, कश्मीर आदि )... को मिलाकर रखा था । यू. पी. सी, पी, आदि शब्द भी इसी वृद है । जिस प्रकार ' उपनिषद् ' में भी ' द, द, द ' के ' दाम्यत तरह के हुए, यम् ( बृहदारण्यक ' ७ [ स् ] २।१- ३ ) एक - एक अक्षरके भिन्न, दत्त, दयं-अर्था - भिन्न शब्दले CC - 0. Ankur Joshi Collect - Gujarat. हिन्दु शब्द की वैदिकता ६१ बनाये गये । ' हृदय ' शब्द ' हरन्ति ददति, याति ' के आद्यचरोंसे बना; देखो शतपथ १४ | ८ | ४ | १ बृहदा ० ७ || ३ | १ जैमिनीय उपनिषद् ब्राह्मणमें ' उद्गीथ ' इन तीन अक्षरोंका ' सामान्येव उद् ऋच एव गी, यजूप्येव श्रम् ' ( २१।१७।७–८ । इत्यादि श्रर्थ बताये गये हैं । ' माण्डूक्योपनिषद् ' के अनुसार ' श्रोम् " शब्द श्राप्तेरादिमत्वाद् ( अ ) उत्कर्षत्वाद् उभयत्वाद् वा ( उ ), मिते: ( म् ) ( ३/१०/१४ ) इन समुदायोंके श्राद्यक्षरोंसे बनाया गया, जिस प्रकार लौकिक साहित्य में ' होरा ' शब्द ' अहोरात्र ' के प्राथन्तिम वर्णको छोड़कर बीचके दो अक्षरोंसे बनाया गया । जिस प्रकार अंग्रेजीका News ( न्यूज़ ) शब्द North ( उत्तर ) East ( पूर्व ) West ( पश्चिम ) South ( दक्षिण ) इन चारों दिशाओं के अक्षरोंसे ' चारों दिशाओंका वृत्तान्त ' इस अर्थ में बना; जैसेकि सारे व्यञ्जन ' हल् ' तथा सारे स्वर ' अच् ' नाममें संक्षिप्त हैं, इसी प्रकार ' हिन्दु ' शब्द के विषय में भी जान लेना चाहिये । यह भी उक्त मन्त्रके पूर्वार्ध - तउरार्द्ध का प्रतीक, संक्षिप्त नाम है । ऐसा प्रकार प्राचीन श्रा शैली है । प्रत्युत यही गोपरक उक्त मन्त्र ' हिन्दुजाति ' के अर्थ में समन्वित भी हो सकता है, यह सूक्ष्म विचारसे स्फुट हो सकता है; क्योंकि स्व-स्वामीका भी अभेद - सम्बन्ध हो जाता हुआ देखा गया है । १५ जैसे तीन वेदोंके एक - एक अक्षरत्रयसे निष्पन्न भी ' ओम् ' की ' श्रवतीति श्रोम् ' यह व्युत्पत्ति तथा ' श्रवतेष्टिलोपश्च ' ( उणादि १/१३६ ) " इस प्रकार सिद्धि भी वैयाकरणों द्वारा की जाती है, वैसे ही पूर्व कहे प्रकार से सिद्ध हुए ' हिन्दु ' शब्दकी प्रकारान्तरसे भी सिद्धि होती है जैसे कि - ' हिनस्तीति हिन् ( हिंसे: क्विप्, ' संयोगान्तस्य लोपः ' ) हिंसं द्यति - खण्डयति - इति हिन्दुः । ' उणादयो बहुलम् ' ( ३ । ३ । ( ) इस सूत्र से बाहुलकसे ' दु ' प्रत्यय तथा टि का लोप हो जाता है । स्वा ० दयानन्दजीने ' श्राख्यातिक ' में उक्त सूत्र पर ३६२ पृष्ठमें टिप्पणी दो है - ' बहुवचनसे यह समझना चाहिये कि जो उणादिगण में प्रत्यय नहीं An कहे Sangoth गये हैं, वे भी होते हैं " ।
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६६ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) अन्य प्रकार १६ अथवा ' हिमालय ' पर्वतके ' हि ' को तथा ' इन्दु ' सरोवर ' कुमारी अन्तरीप ) के ' न्दु ' को लेकर पूर्व प्रकार से ' हिन्दु ' बना है । इस प्रकारकी शैलियाँ भी प्राचीन हैं । जैसे कि — ' गम् ' यह गणपतिका बीज - मन्त्र प्रसिद्ध है । यह बीजमन्त्र ' गणानां स्वा... सीदसादनम् ' ( ऋ ० २।२३।१ ) अथवा ' गणानां त्वा... गर्भधम् ' ( शुक्लयजुः वा ० सं ० २३/१६ ) इस मन्त्रके आदिम तथा अन्तिम अक्षरको लेकर बना है, इस प्रकार ' हिन्दु ' शब्दको भी बीजमन्त्रकी तरह यक्षरात्मक जानना चाहिये । वीजमन्त्रोंमें बड़ी शक्ति वा बड़ा रहस्य सन्निहित होता है । इस प्रकार उक्त गोमन्त्र के संकेतित दो अक्षरोंसे इस जातिका गायके संरक्षण - वर्धनादिसे सौभाग्य बढ़ सकता है ' श्रथवा हिमालयसे लेकर इन्दु सरोवर तक हमारे ' हिन्दुस्थान ' की सोमा है ' यह रहस्य निकलता है - यह ' हिन्दु ' को ध्यान रखना चाहिये । विशेष रहस्य १७ अथवा ' सिन्धु'इस ( पश्चिमी पंजाबकी ) नदी - विशेष के नाम से भी हमारा नाम ' सिन्धु ' या हिन्दु हुधा, यह नदी हमारी स्वाभाविक सीमा थी, इसी प्रकार ' सिन्धु ' समुद्र भी हमारी स्वाभाविक सीमा था । इसीसे जाकर हम लोगोंके पूर्वज विदेशों पर श्राधिपत्य करके हमारे देशको वा अपनी जातिको कोर्तिको उज्ज्वल करते थे; और इन्हीं सीमाओंसे वैदेशिकों का भी हमारे देश पर श्राक्रमण करनेका मार्ग था, अत: हमारी जाति इस बातको भलीभांति याद रखे कि इन्हीं सीमाओं को काबू करके अपने थाप पर आक्रमण न होने दे, अब पश्चिमी सिन्धु ( करांचीका समुद्र ) तथा फिर उसके साथकी सिन्धु नदी पर आधिपत्य कर लिया जावे, तो पाकिस्तान शीघ्र मर सकता है । CC - 0. Ankur Joshi Collection हिंदु शब्द की वैदिकता ६५ इसी बात पर ध्यान रखनेके लिए हमारी जातिका नाम ' सिन्धु ' स गया | इसीलिए ' सिन्धु ' को ही हमारे सम्पूर्ण देश वा जाहि राष्ट्रि प्रतिनिधि मानकर उससे अपना वा अपने देशका नाम रखा गया । ज्ञता इस प्रकार सिद्ध है कि ब्राह्मणसे लेकर अन्त्यजान्त जातियोंका: ( पृ ० ' हिन्दु ' है । यदि श्रन्य पुस्तकोंमें ' हिंदु ' शब्द नहीं मिलता, तो ' श्रार ( पृ ० शब्द भी उन सभी ( अन्यजांत ) जातियोंका नाम कहीं नहीं मिलता काल वैदेशिक जातियां अपने आपको ' श्रार्य ' कहती हैं— हैं - यह बात भी ' सप्त नहीं । वे अपने आपको ‘ अर्यंन ' कहती हैं, ' अर्यन ' का भाव ' थे ' । से श्राया हुआ मानती हैं, जो हमें कभी द्दष्ट नहीं होसकता । हिन्दुस्था श्राया ही हमारा यादि देश है - ईरान आदि नहीं । संस्क लगे कई साक्षियां पास १८ ( क ) ' आर्यावर्त ' शब्द वेदादिमें कहीं नहीं आता । श्रीसत्यन सामश्रमीने श्रार्यावर्त के विषयमें यह लिखा हैं- ' अथैतद् आर्यावर्ताि नामक धानं न क्वचिदपि संहितायां ब्राह्मणे वा श्रुतमस्ति ' ( ऐतरेयालोचन १ सबसे २० ) उक्त पुस्तकके ३० पृष्ठमें श्रीसामश्रमीजीने लिखा है -- ' तत्त्वतर भारत एतत् त्रिसप्तनदीपरिवृतः ' सिन्धु - मध्य ' एव आसीत् पूर्वकालिक आ कहते वर्तः ' । अर्थात् -- श्रार्यावर्त नाम किसी भी संहिता वा ब्राह्मणमें नहीं हुआ २१ नदियों से घिरा हुआ ' सिन्धु ' का मध्य ही वेदकालीन आर्यावर्त था । एक म श्राचाय ( ख ) ' अन्तर्ज्याला ' पुस्तकमें ' अखण्ड भारत ' निवन्धमें श्री चन्द्र गुप्त विद्यालङ्कार महाशयने लिखा है कि- ' वैदिक काल से ' सिन्धु शब्द ' हिन्दुस्तान ' की स्वाभाविक सीमाओं ' सिन्धु ' नदीसे सिन श्रादिद ( समुद्र ) पर्यन्त के लिये व्यवहृत होता श्राया है । ' सप्तसिन्धु ' नाम इस गायी देशकी सात नदियोंके कारण रखा गया था और इसी नाम से वेदकालीन नदियों भारतको स्मरण किया जाता है ' । ( पृष्ठ १७ ) निश्चित Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्माल्लोकः ( ४ ) सन्धु ' ( ग ) ' हिन्दुत्व ' पुस्तक में वीर सावरकरने लिखा है- ' जहां उनकी जानि राष्ट्रियता और संस्कृतिंने सर्वप्रथम विकास पाया था; उनके प्रति कृत-या । ज्ञताभावसे उन्हें इस देशका नाम ' सप्तसिन्धु ' रखनेको प्रेरित किया. योंका ( पृ ० ७ ) ' श्रार्य लोग उसी ( वेदके ) समय से ' सिन्धु ' कहलाने लगे ’ ' ( पृ ० ८ ) । ' हमारे पूर्व पुरुषोंने ही ' हिन्दु ' नाम तो आदि ( वैदिक ) मिलता काल से ही अपना लिया था, और संसारके अन्य राष्ट्र भी हमारे देशको भी ठी ' सप्तसिन्धु ' या ' हप्तहिन्दु ' और हमें ' सिन्धु ' या ' हिन्दु ' नामसे जानते ' ' थे ' ( पृ ० ६-१० ) । ‘ यह सच हो तो मानना पड़ेगा कि — ' हिन्दु ' नाम हिन्दुस्था श्रार्योंसे भी पूर्वका है । श्रादिनिवासी भी अपने को ' हिन्दु ' कहते थे | संस्कृतमें ' ह ' को ' स ' होजानेके कारण श्रार्यलोग इसे ' सिन्धु ' कहने लगे । मूलनाम ' हिन्दु ' ही है । ' हिन्दु ' शब्दको अर्वाचीन माननेवालों के पास इस युक्तिका कोई उत्तर नहीं है । ' ( हिन्दुत्व पृ ० ११ ) श्री सत्यद ( घ ) ' प्रोफेसर मैकडोनल्ड ' ने भी ' हिस्ट्री ग्राफ संस्कृत लिट् चर '् यावर्तादि नामक अपनी पुस्तक में लिखा है कि- ' उधरसे थानेमें इनके सम्मुख जोचन सबसे पहले ' सिन्धु ' ही पड़ती थी । इसलिये उपलक्षणसे यही नाम ' तत्त्वतर भारतवर्षका रखा, ग्रीक लोग सिन्धुनंदसे उपलक्षत प्रदेशको ' इन्डोस ' कहते थे, धांगे चलकर भारतवर्षका नाम ' इण्डिया ' होनेमें यही कारण न नहीं हुआ ।... ' ऋग्वेद ' में ' सप्तसिन्धु ' का कई स्थानोंपर निर्देश हैं । उसमेंसे विर्ता एक मन्त्र में तो वह श्रार्यावासका वाचक है । ' ( श्री पं ० नरदेव शास्त्री श्राचार्य गुरुकुल ज्वालापुरसे श्री चन्द्र १५६ पृष्ठमें ) । ' सिन्धु ( ङ ) भूतपूर्व शिक्षामन्त्री से सिन् श्रादिदेश ' पुस्तक में लिखा है-नाम गायी है । यह देश सिन्धुनदीसे प्रणीत ' ऋग्वेदालोचन ' पुस्तकके १५८-श्रीसम्पूर्णानन्दजीसे प्रणीत! या ' वेदों में तो ' सप्तसिन्धव ' देशकी महिमा लेकर सरस्वती तक था । इन दोनों दकालीन नदियोंके बीचमें काश्मीर और पञ्जाब आगये ' ( पृ ० ३२ ) ] ' इससे यह निश्चित है कि- वेदोंके आधार पर श्रार्योका अर्थात् आर्य / संस्कृति hi वैदिकता ३६ , Collection Gujarat. प्रादिमस्थान ' सप्तसिन्धव ' ही था ' ( नवम श्रध्याय ८० पृष्ट ) । सप्तसिन्धव ' देशकै अतिरिक्त और किसी देशका स्पष्ट उल्लेख नहीं है । ' ( पृष्ठ ८० ) ( च ) श्री अविनाशचन्द्रदास एम्. ए. पी. एल. लैक्चरार कलकत्ता विश्वविद्यालय ने भी ऋग्वेदिक इण्डिया ' पुस्तकमें लिखा है- ' चार्य सप्तसिन्धु प्रदेश ' के निवासी थे । ' श्राजकलके वेदमें रिसर्च करनेवाले विद्वानोंकी गवेषणासे भी यही सिद्ध होता है कि हमारे देशकी ' सिन्धु ' यह संज्ञा वेदकालसे ही है । तब उस देशकी जातिकी भी संज्ञा वैदिक-कालसे ' सिन्धु ' ही सिद्ध हुई । उसमें ' स ' को ' ह ' को देशिकता वा वैदिकता हम सिद्ध कर ही चुके हैं । अखण्ड हिन्दुस्थान १६- वे सातों नदियाँ प्रखण्ड हिन्दुस्थानको परिचायित करती है— ' गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि! सरस्वति! नर्मदे! सिन्धुकावेरि! जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु ' ये भारतकी सात नदियाँ ( सिन्धवः ) हैं । गङ्गा - यमुना, सरस्वती ये तीन पूर्वीय भारतकी नदियाँ हैं । ' गोदावरी ' पश्चिम भारतकी नदी है । ' नर्मदा ' मध्यभारतकी नदी है । ' सिन्धु ' पश्चिमोत्तर भारतकी नदी है । ' कावेरी ' दक्षिण भारतकी नदी है । इन सात नदियोंका वैदिक नाम ' सप्तसिन्धु ' है, संक्षिप्त नाम ' सिन्धु ' है । उसीके श्राश्रयसे हमारी जातिका नाम भी ' सिन्धु ' है । २० - ' यह ' हिन्दुनाम ' मुसलमानोंने रखा, या दासमनोवृत्तिका सूचक है वा मुसलमान यादिने घृणासे रखा, मुसलमानोंके अत्याचारसे हमने: ' हिन्दु ' नाम स्वीकृत किया । ' यह किन्हींका कथन निस्सार है । ' मुहम्मदी ' धर्मं १३०. सालोंसे पहले नहीं था, ( स ० प्र ० १४ समु ० ३४६ पृष्ट ) परन्तु ' हिन्दु ' शब्द उससे भी पूर्व मिलता है । ' जिन्दा-वस्ता ' पुस्तकमें जिसे श्राजकलके भाषातत्त्वाभिज्ञ ' ऋग्वेद ' के कुछ An eGangotri Initiative
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II श्रीसनातनधर्मालोकः ' ४ ) समयके बाद बनाया हुआ मानते हैं... ' हिन्दु ' शब्द मिलता है । उसी ' शातीर ' या ' जिन्दावस्ता ' पुस्तकमें हमारे देशका नाम ' हिंद ' कहा है । जैसे कि - ' कमन बिरहमने व्यासनाम अज हिन्द आमद बस दाना कि अकलचुना नस्त । यहाँ पर व्यासजीका हिंद ( भारतवर्ष ) से श्राना कहा है । यदि मुसलमानोंसे हमें यह नाम मिलता, तो उनसे कई हजार वर्ष पूर्व की पुस्तकमें ' हिंद ' यह नाम न मिलता । इससे स्पष्ट है कि - मुसलमानोंकी उत्पत्तिसे कई सहस्र वर्ष पूर्व भी ' हिंद ' आदि शब्द प्रचलित थे । श्रीसत्यवत सामश्रमी महाशयने ' निरुक्तालोचन ' में लिखा है- ' यथा इह भारते महमदीय -राज्यस्थापनात् प्रागपि अपरदेशे ' हिंदु ' रिति व्यवहार श्रासीदेव श्रधार्मिकेषु । तत उत्तरं सैव ( हिंदुरिति ), समाख्या तदाक्रोशकृतापचरितैव श्रस्मासु च । ततो वयमपि ' हीनं च दूषयत्यस्माद् हिंदुः ' इति ' मेरुतन्त्र व्युत्पादनमभिमत्य ' हिंदु ' नाम-कथनेपि गौरवमेव मन्यामहे । ' ( पृष्ठ ७० ७० ) २१ – ‘ मुसलमानोंके श्रत्याचारसे हमने ' हिंदु ' नाम स्वीकृत किया ' ऐसा आरोप भी ठीक नहीं । भारतमें मुसलमानी राज्यका मूलारोपक शहाबुद्दीन महमूद गोरी था; परन्तु इन लोगोंके अत्याचार तो दूर रहे, जब उनके पैर भी भारतमें नहीं पड़े थे और ' गोरी ' पृथिवीराजके व्यवहारोंसे तङ्ग हो रहा था, तभी पृथिवीराजके सभाकवि श्रादिकवि चन्दबरदाईने अपने कविता ग्रंथमें इस देशको ' हिंदव ' इस नामसे तथा इस जातिको सर्वत्र ' हिंदु ' नामसे कहा है । ' हम हिंदु लजवान ' ' गति हिंदू पर साहि सज्ज ' इत्यादि ' पृथिवीराजरासो ' नामक उसके ग्रन्थके उद्धरण हैं । ' भारतवर्षका बृहद् इतिहास ' प्रथम भाग ३० पृष्ठमें श्रीभगवद्दत्तजीने लिखा है- ' उस कालमें पृथिवीराज चौहान ( सं ० १२३० ) के सखा और सामन्त चन्दबरदाईने अपना ग्रन्थ ' पृथिवीराजरासो ' • लिखा " । CC - 0. Ankur Joshi Collection हिंदु शब्द की वैदिकता ७२ २२ -- ‘ दासमनोवृत्तिसे हमने मुसलमानोंसे दिये ' हिन्दु ' नामको स्वी सजूः कया— ' ऐसी सम्भावना भी निर्मूल है । यह बात श्रद्धेय नहीं कि मेहन अपने देश तथा अपनी जातिकें नाम पर मर मिटने वाली राजपूत स सीमा चीर जातिके आश्रित कविगण तथा इस देशकी विशाल जनता दा नदिय मनोवृत्ति वाली थी; तथा उसने मुसलमानों द्वारा जिनके साथ उन ' प'च बड़ी शत्रुता बढ़ चुकी थी, जिनका इस देश में अभी बहुत प्रभाव में प्रान्तक नहीं पड़ा था - घृणावश दिये हुए ' हिन्दु ' नामको अनायास स्वीकार क देशोंक लिया । शिवाजी मुसलमानोंके कट्टर शत्रु रहे; परन्तु उनके श्राधि स्थान कवि भूषणने भी अपनी कविता में ' हिन्दु ' शब्दका बड़े गौरव किया है - इससे स्पष्ट है कि - ' हिन्दु ' शब्द हमें मुसलमानोंसे नहीं सम्पूर्ण मिला, किन्तु यह हमारा ही शब्द है । यह देशके नामके. कारण जाति पा का नाम है । यदि ' हिन्दु ' को मुसलमानी अपभ्रंश भी माना जाये उनके तो भी मूल शब्द तो मुसलमानी नहीं; तब यह वैदेशिक कैसे हुआ! नदी ' ऐतरेयालोचन ' में श्रीसत्यव्रतसामश्रमीने भी लिखा है- ' तद् इत्थमार्या यमुना चर्तस्य श्रयं सिन्धुर्मेरुदण्ड इवासीत् ' । ' सिन्धु ' यह हमारे देश वा नदी- को वे का नाम फारसवाले या मुसलमानोंने नहीं रखा, किन्तु वह वेदकाल भूगोल ही प्रसिद्ध रहा । पीछे चार वर्णोंसे अपना परिचय देनेकी शैली प्रच यही स्व लित होगई; अतः इस ' सिन्धु ' वा ' हिन्दु ' शब्दका प्रचार ढील्ल पड़ गया । सिन्धुद २३ – ' इससे स्पष्ट है कि - हमारे देशका वेदके अनुसार भी नाम देश ब ' सिन्धु ' है । उसीके ब्रह्मावर्त, श्रार्यावर्त यादि भिन्न - भिन्न भाग हैं । ४१३८ ‘ ऋग्वेद ' के १० वें मण्डलके ७५ वें सूक्तका ऋषि ' सिंधुक्षित् प्रयमेष जातिक माना गया है; उसका यही अर्थ है कि - सिन्धु देशका शासक वा का ना ' सिन्धुदेश ' में रहनेवाला | उस सूक्तके ' इमं मे गङ्ग े! यमुने! सरस्वति! इङ्गलि शुतुद्रि! स्तोमं सचता परुष्णया । असिक्न्या मरुधे! वितस्तयाज बामसे कीये! शृणुहि श्रा सुषोमया ' ( ऋ ० १०।७१।२ ) तृष्टामया प्रथमं यातवे Gujarat. An eGangotri Initiative
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७२ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) सजूः सुसर्त्वा रसया श्वेत्या त्या । कां सिन्धो! कुभया गोमतीं क्रुमु ं मेहत्वा सरथं याभिरीयसे ( ऋ ० १०/७५/६ ) इन मन्त्रोंसे सिन्धु देशकी ' सीमा पर प्रकाश पड़ता है । यह याद रखना नदियोंके नामोंसे देशोंको सूचित किया गया है, ' प'चनद ' का अर्थ ' पञ्जाब - पांच नदियां ' हैं; प्रान्तका नाम है । इसी प्रकार वेद में ' सप्त सिन्धु ' देशों को सूचित किया है । ऋग्वेद के अनुसार स्थानमें निम्नलिखित देश थे-( १ ) सिन्धुदेश, तिब्बतसे लेकर करांची तक सम्पूर्ण देश । ( २ ). हिन्दुकुश पर्वतमाला, ( ३ चाहिये कि - ऋग्वेदमें यही प्राचीन प्रथा है । जब कि यह बड़े भारी से नदियोंके नामोंसे-सिन्धु देशमें या सिन्धु सिन्धु नदीके किनारेके ) हिन्दुकुश के उत्तरीय... पार्श्वसे उत्तर में रहनेवाली रसा तथा श्वेत्या नामक दोनों नदियाँ तथा " उनके चारों ओरके देश । ( ४ ) कुभा - काबुलदेशकी नदी, गोमती ( गोमल ) नदी तथा क्रुभु ( कुर्रम ) नदीके चारों श्रोरके सम्पूर्ण देश । ( ५ ) गङ्गा, यमुनाका द्वीप तथा साराका सारा पञ्जाब तथा सिन्ध प्रदेश, उक्त देशों-को वेद ' सिन्धु ' शब्दसे लेता है । वेदमें तरीकेसे ' हिन्दुस्थान ' का यह भूगोल वर्णित कर दिया है; तब इस देशकी जातिका नाम भी ' सिन्धु ' यही स्वाभाविक है । २४ - ' सिन्धौ श्रधिक्षियतः ०१ / १२६ । १ ) इस मन्त्रमें भी ' सिन्धौ-सिन्धुदेशे श्रधिक्षियतः - निवसतः ' । क्षि- निवासगत्योः ) इस प्रकार ' सिन्धु ' देश बतलाया गया है । श्रीपाणिनिने भी वेदाङ्ग व्याकरण में ( अष्टाध्यायी ४३६३ ) ' सिन्धु ' देश माना है । तब सदासे ' सिन्धु ' देशमें रहनेवाली जातिका नाम भी ' सिन्धु ' हो सकता है; क्योंकि उस उस देशकी जाति का नाम भी उस - उस देशके नामसे ही हुआ करता है, जैसेकि - जर्मन, इङ्गलिश फ्र ेन्च, अरब, पौण्ड्रक, द्रविड, चीन आदि जातियाँ देशके बामसे ही प्रसिद्ध हैं । ठीक भी यही होता है । देशके नामसे जातिका CC - 0. Ankur Joshi Collection हिन्दु शब्द की वैदिकता ७३ १ नाम रहनेसे उस जातिके हृदयमें अपने उस देशका प्रेम और उसका श्रभिमान रहता है । उस देशके नाम वाली जाति उस देशकी रक्षाके लिये सदा अपने प्राणोंकी श्राहुति देनेको सन्नद्ध रहती हैं । देशसे भिन्न जातिका नाम रखनेसे उस जातिका देश पर मोह वा प्रेम नहीं रह सकता । • जब ऐसा है, हमारे देशका वैदिक नाम ' सिन्धु ' है, ' सिन्धु ' का हो दूसरा देशी रूप ' हिन्दु ' है, उसकी जातिका नाम भी ' हिन्दु ' है; तब " हिन्दुस्थान हिन्दुओंका, हिन्दु हिन्दुस्थानके " यह नारा सिद्ध हो गया । जबसे अंग्रेजीभावापन्न लोगोंने इस देशके ' हिन्दुस्थान ' नामका विरोध किया; वा विदेशोंको वे हमारा आदि देश मानने लगे; तबसे मुसलमान भी तथा अंग्रेज भी इसे केवल हिन्दुओंका स्थान न मानकर अपना श्राधिपत्य भी इस पर मानने लगे । हमें भी अपनी तरह हिन्दुस्थानमें विदेशी सिद्ध करने लगे । इसी ' हिन्दु ' तथा ' हिन्दुस्थान ' नामसे घृणा कराने वाले विदेशी-भावापन्न जनोंने ही ' पाकिस्तान ' को जन्म दिलाया । जो इस देशका नाम ' हिन्दुस्थान ' नहीं मानते, और अपने श्रापको ' हिन्दु ' नहीं मानते, उन्हें यहां रहने का कोई अधिकार नहीं, उन्हें विदेशोंमें चला जाना चाहिये । २५ ' हिंदु ' शब्दकी वैदिकताका निरूपण हो चुका । यह वैदिक होता हुश्रा भी वैदिककाल में हिंदुजातिले अतिरिक्त और कोई भिन्न जाति न होने से बहुत प्रचलित नहीं हुआ; क्योंकि दूसरी जातिसे भिन्नतार्थ ही वह नाम प्रचलित होता है । श्रतः पीछेकी जातियोंने तो हमारे इस नामको अपनी भेदकतार्थ अपने साहित्यमें अपनाया; पर हमारे अपने साहित्य में यह कम ही रहा । उस समय अपनी भेदकताके लिए चार वर्णों तथा श्रवर्णोंकी जातियोंका नाम ही प्रसिद्ध रहा । तथापि ' हिंदु " नामका सङ्क ेत संस्कृत साहित्य में क्वचित् क्वचित् प्राया भी जाता है ॥ Gujarat. An eGangotri Initiative
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७४ श्रीसनातनधर्मालांक: ( 0 ) ' भविष्यपुराण ' के प्रतिसर्ग पर्वके प्रथमखण्ड के ' जानुस्थाने जैनु शब्दः, ' सप्तसिन्धुस्तथैव च । सप्तहिन्दुर्यावनी च ' ( २१३६ ) में ' हिन्दु ' शब्द प्रत्यक्ष है । आर्यसमाजी श्रीमनसारामने भी ' भविष्यपुराण की समालोचना ' की भूमिकामें इस प्रमाणको उद्धृत किया है । यह बात और है कि इस वचनको प्रक्षिप्त मानते हैं । अपनेसे विरुद्ध वचनोंको चे लोग जहां - तहां अपने मानकी रक्षार्थ प्रक्षिप्त मानते हैं, पुराणोंमें तो कहना ही क्या? यह तो उनकी प्रकृति ही है । २ ' हिंदवो विन्ध्यमाविशन् ' -इस कालिका पुराणके बचनमें भी ' हिन्दु ' शब्द की सुनवाई है । ३ इसी प्रकार. ' हिन्दुधर्म प्रलोसारो जायन्ते चक्रवर्तिनः । हीनं च दूषयत्येव स हिंदु रुच्यते प्रिये! ( २३ प्रकाश ) ' मेरुतन्त्र ' के इस स्थलमें भी ' हिन्दु ' शब्द मिलता है । हीन- अर्थात् हिन्दुधर्मादिहीन- निकृष्टको दूषित ( दुःखित ) " ‘ करनेवाला ' हिन्दु ' होता है । तब इसका ' दुर्बल पीडक ' अर्थ करते हुए श्रीवेदानन्दतीर्थ निरस्त होगये । जो कहते हैं कि- मेरुतन्त्र में ' खान, ' मीर ' आदि शब्द उपलब्ध हैं, अतः उक्त ग्रन्थ आधुनिक है; जैसे कि ' पश्चिमाम्नायमन्त्रास्तु प्रोक्ताश्वारव्य भाषया । पञ्च खानाः सप्त मीरा “ नव साहा महाबलाः । हिन्दुधर्मप्रलोसारो जायन्ते चक्रवर्तिनः । फिरङ्ग-भाषया मन्त्रास्तेषां संसाधनात् कलौ । इङ्गरेजा नवषट् पञ्च लण्डजा-श्वापि भाविनः ' इत्यादि, पर यह ठीक नहीं, क्योंकि यहां पर ' भाविनः ' शब्दसे उनका भविष्यत् में होना ही बतलाया है, वर्तमान होना नहीं । पुराणों में तो कलियुगके अन्तमें होनेवाले कल्की अवतारका भी वर्णन है; तो क्या वादी पुराणोंको भी कलिके अन्तमें बना हुआ मानेंगे? ऐसा नहीं । इसी भांति ' भूयो देश गुरुण्डास्तु ' ( १२।१।२८ ) श्रीमद्भागवतके इस पद्यमें भी तुरुष्क, गुरुण्ड, यवन आदि - राजाओंका भावी वृत्तान्त चणित किया गया है । भावी होनेसे वर्तमानताका खएढन होरहा है । ४. हिंदवो ' विन्ध्यमाविशन् ' यह शाङ्गधरपद्धति में पद्य है । * ' हिनस्ति तपसा पापान् दैहिकान् दुष्टमानसान् । हेतिभिः शत्रुवर्गं च CC - 0. Ankur Joshi Collection ७६ " हिन्दु शब्द की वैदिकता दु स हिन्दुरभिधीयते ' यह ‘ पारिजातहरण ' नाटकमें है । इसमें ' हिन्दु यहाँ भ शब्द कई बार आया है | ६ हिन्दुहिंन्दूरच प्रसिद्धो दुष्टानां च विधर्षते हैं और ' रूपशालिनि दैत्यारौ इत्यादि श्रद्भुत कोषमें आया है । ७ ' हीनंदा स्वति! यति ' इति ' हिन्दु ' पृषोदरादित्वात् साधुः जातिविशेषः ' यह श स्वर भी कल्पद्रुम कोषमें थाया इसी प्रकार ' वाचस्पत्य ' कोप श्री हो जाय • में भी । यह पृि वैदिक साहित्य में हमारे देशका नाम लिए प्र २६ बेदमें हमारे देशका नाम ' भारतवर्ष ' वा ' आर्यावर्त ' न करता ह ' मिलता, किन्तु ' सिन्धु ' मिलता हैं यह हम प्रारम्भमें कह चुके ' सिन्धु " ' वेदमें भारतवाचक ' सिन्धु ' से व्यतिरिक्त कोई भी शब्द नहीं है ॥ यह नाम क्या यह माना जाय कि वेदमें हमारे देशका नाम ही नहीं है? ऐस यह हम बात नहीं । जो वेद हमारे भारतवर्षकी धर्मपुस्तक हैं, सर्वज्ञ परमात्मा जातियोंक - रचना है, जिनमें भारतीय नदियों - पर्वतों के नाम मिलते हैं, उनमें य शब्दसे न - सम्भव नहीं कि हमारे देशका नाम सर्वथा न हो । भूगोल या इतिहा आया है, - में देश आदिके नाम हों और हमारी धर्मपुस्तक में प्रसक्तानुप्रसक्तः इसस - हमारे देशका नाम न हो, यह नहीं हो सकता । स्वामी दयानन्दजी लिए श्राय ' सत्यार्थप्रकाश ' में तथा मनु आदि की स्मृतियों में हमारे देशका न बनाये ऐ " आर्यावर्त ' मिलता है, इससे उक्त पुस्तकें भूगोल या इतिहास नहीं त्रिसप्तनदी ' जार्ती । श्रतः स्वामी वेदानन्दतीर्थका ' इमारा नाम श्रार्य है हिन्दू न उन्हीं साम - इस अपनी पुस्तकके १४ वें पृष्ठमें ' वेद इतिहास या भूगोलकीपो में कहा है-- नहीं, जो उसमें ' श्रार्यावर्त ' या ' भारतवर्ष ' नाम मिलवा ' यह कह वा श्रुतमन उचित नहीं है | वेदमें हमारे देशका नाम हैं और वह है ' सिन्धु ' । कई लोग ' भा २७इ * तीले ' ( ऋ ० १ | १८८ | ८ ) इस मन्त्रांशसे ' भारतस्य इयम् इति भारती " हिन्दुशव -भारती चासौ इला ( पृथिवी ) च तत्सम्बुद्धौ - हे भारतीले ' इस प्रा Gujarat. An eGangotri Initiative
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७६ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) वेदमें भारतभूमिका नाम सिद्ध करते हैं । किन्तु यह ठीक नहीं है । ' हिन्दु यहाँ ' भारति! ' और ' इले ' ये पद भिन्न - भिन्न हैं, दोनों ही सम्बोधनांत बिघर्ष हैं और भिन्न - भिन्न देवियोंके सम्बोधन हैं, इसमें ' भारति! ' इलें! सर-' हीनं दो स्वति! या वः सर्वा उप वे ' ( ऋ ० ११८८८ ) यह बहुवचन Panga ज्ञापक है । यह शर स्वर भी सम्बोधन का है । यहाँ ' इला ' भी नहीं है कि पृथिवोका नाम कोप हो जाय, किन्तु ' इडा ' शब्द है, ' ड ' को वैदिक ' ल ' हुआ है, इसलिए. यह पृथिवी चाचक भी नहीं है । इधर वेदमें ' भारत ' शब्द भी श्रग्निके लिए प्रयुक्त किया जाता है, क्योंकि वह दूसरे देवोंका हव्य - भरण ( धारण ) नर्त ' न करता है । यह बात ' शतपथब्राह्मण ' ( १ । ४ । ४ । २ ) में स्पष्टं है । तब चुके है ' सिन्धु ' देशका ' भारत ' यह नाम भी अर्वाचीन है । ' सिन्धु ' जांति-हीं है । यह नाम उस सिन्धु देशकी जातिका पूर्वकालसे चल रहा है, “ भारत ' है? यह हमारी जातिका नाम प्रसिद्ध नहीं । भारतकी रहनेवाली बाह्य परमात्मा जातियोंको भी ' भारतीय ' शब्द से कहा जाता है, ' सिन्धु ' ' हिन्दु ' उनमें शब्दसे नहीं, इसलिए उक्त मन्त्रमें हमारे देशका नाम ' भारती इला? " इतिहा श्राया है, यह किन्हींकी कल्पना श्रसङ्गत ही है । C सक्क इससे स्पष्ट है कि वेदमें भारतवर्षका नाम ' सिन्धु ' ही है । इस नन्दजी लिए श्रार्यसमाजिक विचारवाले भी पं ० सत्यवत सामश्रमीज़ीने अपने: - शंकाक बनाये ' ऐतरेयालोचन ' ( ३० पृष्ठ ) में भी कहा है- ' तत्त्वतस्तु एतत्-नहीं त्रिसप्तनदी परिवृतः ' सिन्धु ' मध्य एवासीत् पूर्वकालिक श्रार्यावर्तं इति ' । हिन्दू उन्हीं सामश्रमीजीने वेदमें ' आर्यावर्त वा भारत ' नामके न होनेके विषय-लकी में कहा है- ' अथैतद् आर्यावर्ताभिधानं न क्वचिदपि संहितायां, ब्राह्मणेः यह कह वा श्रुतमस्ति ' ( ऐत ० पृ ० २० ) । हिन्दु कौन? लोग ' भ २७ इससे ' सिन्धु ' देशमें स्थित मुसलमान, अगरेज, अमेरिकन भारत ' हिन्दु ' शब्द से सम्बोधित नहीं किये जा सकते, क्योंकि यद्यपि वे इस इस CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. हिन्दु शब्द को वैदिकता ७७ देशमें तो हैं, परन्तु ia इस देशकी जाति वाले नहीं । जांति तो उस देश में ग्रादिजन्मवालांकि वंश में उत्पत्ति होने पर तथा उन्हींके साथ समान - रक्त-· सम्बन्धादि होने पर होती है, यह नहीं भूलना चाहिए । वैसी उत्पत्ति वर्णाश्रमियोंकी तथा श्रुति - स्मृति - पुराणप्रोक्त धर्मका अनुसरण करनेवालों की होती है । इसलिए मुख्य हिन्दु या हिन्दु जातिवाले भी वही हैं । -वर्णसङ्कर निन्दित तो श्रवश्य हैं, तथापि उनका भी इन्हींमें अन्तर्भाव है । श्रतएव वे भी ' हिन्दु ' कहे जा सकते हैं । कई सुधारक लोग ' हिन्दु ' शब्दको इसीलिए ग्रहण करना नहीं चाहते कि कदाचित् वे भी वर्णाश्रमी सनातनधर्मियोंमें न गिन लिये जांय । वास्तवमें हमारे पूर्वजोंने ' जन्ममूलक वर्णाश्रम व्यवस्थासे हमारे हिन्दुराष्ट्रको श्राजतक सुरक्षित -रखा, जिसे श्राजकलके अर्वाचीन सुधारकभास पारसी, मुसलमान, “ श्रृङ्गरेज, अन्त्यज श्रादिके साथ रक्त सम्बन्ध करके दूषित करना चाहते है । वस्तुत: वे ऐसा करके श्रन्य जातियोंको सबल तथा हमारी जातिको ' निर्बल करना चाहते हैं । इस विषय में हिटलरकी ' मेरा सङ्घर्ष ' नामक ' पुस्तकमें रक्त - सम्बन्धविषयक़ उसके विचार पढ़नेयोग्य हैं । श्रस्तु । आर्य शब्द पर विचार २८ जो लोग हमारी जातिकी संज्ञा ' आर्य ' मानते हैं, उन्हें यह जानना चाहिए कि यह ' आर्य ' शब्द ' गुणशब्द ' है, ' जातिशब्द ' नहीं । चादिगण वेदमें रूढ़ तथा योगरूढ़ शब्द नहीं मानते । तव चेदमें ' आर्य ' शब्दका रूढ - योगरूढ़ अर्थ भी नहीं ले सकते । तब यह शब्द ' सिन्धु ' जातिमें जो श्रेष्ठ थे, उन्हींके लिए प्रयुक्त हुआ, सर्वसाधारणके लिए. नहीं । स्वामी दयानन्दजीने भी यह स्वीकृत किया है । देखिये-' आर्य ' नास उत्तम पुरुषोंका और श्रार्योंसे भिन्न मनुष्योंका नाम ' दस्यु ' है ( ' सत्यार्थ एकादशसमुल्लासारम्भ ' पृ ० १०२ । ' आर्य नाम धार्मिक An विद्वान प्रगत शरुष्टों और इनसे विपरीत जनोंका नाम ' दस्युः ' अर्थात्
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७८ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) डाकू, दुष्ट अधार्मिक और अविद्वान् है ” ( सत्यार्थप्रकाश ८ समु ० १४० पृष्ठ ), " आदिसृष्टिमें एक मनुष्यजाति थी पश्चात्... श्रेष्ठोंका नाम आर्य और दुष्टांके दस्यु दो नाम हुए " ( स ० प्र ० पृ ० १३६ ), " आर्य श्रेष्ठ और दस्यु दुष्ट मनुष्यको कहते हैं ” ( स्वमन्तंन्यामन्तव्यप्रकाश २६ संख्या ) । इस प्रकार स्वामी दयानन्दजीने भी ' श्रार्य ' शब्दको गुणवा-चक दिखलाया है । जो साधारण गवेषक लोग नाटकोंमें ' आर्यपुत्र तथा ‘ भगवद्गीता ' में ‘ अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यम् ' ( २/२ मँ ' यस्योदकं मधुपर्के च गां च न मन्त्रवित् ... तस्यानर्थं जीवितमाहुरार्याः ” ( उद्योगपर्व ३८/३ ) ' श्रार्य ' शब्द देखकर आनन्द के आंसू बहाते हुए चरम सीमा मानते हैं, वे दयनीय हैं । वहां ' आर्य ' ' आदि शब्द देखकर ) एवं ' महाभारत ' प्रतिगृह्णाति गेहे । एतदादि स्थलोंमें अपनी गवेषणांकी शब्द श्रेष्ठतावाचक है, जातिवाचक नहीं । “ यदार्यमस्यामभिलाषि मे मनः ” ( १।२३ ) इसे ' अभिज्ञानशाकुन्तल ' नाटकके श्लोकमें मन को भी ' आर्य ' श्रेष्ठ बतलाया गया है, मन की धार्यजाति कैसे हो सकती है? पत्नी पतिको ' श्रार्यपुत्र ' कहती है 1 ' श्रार्य ' को हिन्दुजातिस्थानापन्न माननेपर ' हे हिन्दुपुत्र ' इस सम्बोधनसे क्या लाभ है? जहाँ अन्य स्थलोंमें भी ' आर्य ' यह सम्बोधन दिया गया हैं, वहाँ भी ' हिन्दुजाति ' यह इष्ट नहीं होता, नहीं तो ऐसा सम्बोधन श्रसाभिप्राय होनेसे व्यर्थ हो जाय । वैसा सम्बोधन तो हमें भिन्न धर्मवाला या भिन्न जातिवाला देता है, समान धर्मवाला तथा समान जातिवाला वैसा सम्बोधन नहीं. देता, क्योंकि इसमें कोई व्यभिचार ( दोष ) नहीं आता, जिससे वैसा विशेषण देना सार्थक हो जाय । इसीलिए तो हमारे साहित्य में ' हिन्दु ' शब्द कम मिलता है, क्योंकि हमारे ही व्यक्ति हमें वैसा सम्बोधन कैसे दें? अन्य विधर्मियोंके साहित्यमें इसीलिए ' हिन्दु शब्द अधिक मिलता है, क्योंकि यह स्वाभाविक है । CC - 0. Ankur Joshi Collection हिन्दु शब्द की चैदिकता ७ । ८० यदि हमारे संस्कृतसाहित्यमें ' हिन्दु ' शब्द के अल्पतम प्रयोगसे । वैदेशिक माना जाय, तो सिख, गुजरात, सिया आदि शब्द भी सं ( ऋ ० ४ इत्यादि । साहित्यमें नहीं मिलते, इनके शुद्ध शब्द शिष्य, गुर्जर, सीता श्र संस्कृतसाहित्य में सुलभ हैं, तब क्या सिख यादि शब्दोंको इससे वैदेशि मान लिया जाया करेगा? इस प्रकार ' हिन्दु ' शब्दका मूलभूत ' सिन शब्द भी वैदिक संस्कृतमें सुलभ है । हमारे साहित्य में हिन्दु श २६ अल्पमात्रामें प्राप्तिका एक कारण भी है । वह यह है कि पहले देखकर ए समष्टिनामसे उच्चारणकी शैली प्रायः नहीं थी । पहले तो चतुर्वर्ण तर - रहने वाल श्रवर्णं जातियोंके नामसे पृथक - पृथक आह्वानकी शैली थी । हुमा शब्द अन इस प्रकार ' अमरकोष ' आदिमें यदि ' हिन्दु ' शब्द नहीं मिलता, चाहिये । वहां ' आर्य ' शब्द हमारी जातिका वाचक नहीं मिलता, कि ' अर्यन ' श्रेष्ठमात्र का । तब इस प्रकारके गवेषक अधिक परिश्रम करें । यी पहले कह वे इस विषयमें पुराणोंके प्रमाण दें, तो उन्हें पुराण भी प्रमाण मार्क इसलिए पढ़ेंगे, तब तो उसमें स्थित ' हिन्दु ' शब्द भी प्रमाण मानना पड़ेगा । किन्तु अ वस्तुतः उनमें भी ' आर्य ' पद श्रेष्ठतावाचक है, जातिशब्द नहीं । थाकर रह भारतवर्ष बेदमें जहाँ ' आर्य ' शब्द आता है, वहाँ सायण आदि प्राचीर से ही यह भाष्यकारोंने उस शब्से श्रेष्ठ होनेसे ' ब्राह्मण ' ही गृहीत किया है । किन्तु पर ' प्रधानेन हि व्यपदेशा भवन्ति ' इस न्यायसे उसके उपलक्षणसे क्षत्रिमुसलमान गृहीत किये गये हैं । इसीलिए " श्रर्यः स्वामिवैश्ययीः ” ( ३ । १ । १०३ ) चाहते हैं इस सूत्र के प्रत्युदाहरणमें ' काशिका - कौमुदी ' श्रादिमें ' श्रार्यो ब्राह्मणः ' नामधारी यह दीखता है । वर्णः ” ( ४ | ३ | ६ “ यदि वैश्यो न क्षत्रियो वा " । Grat. An eGangotri Initiative ' लाट्यायन श्रौतसूत्र ' से “ अर्याऽभावे यः कश्च श्रायें ही स्नेह ) इस सूत्रका अग्निस्वामीका भाष्य इस प्रकार है-लभ्यते; यः कश्च श्रार्यो वर्णः स्याद्, ब्राह्मणी व वास्त ( भारतवर्ष इसी प्रकार वेदमें भी है... " अहं भूमिमदद मार्या " वल्पनामा
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श्री सनातनधर्मालोकः ( ४ ) योगसे ( ऋ ० ४ । २६।२ ), “ हत्वी दस्यून् श्रायें वर्णं प्रावत् ” ( ऋ ० ३।३४।१ ) संस्कृ इत्यादि स्थलों में भी जानना चाहिए । ताश्ररि वैदेशि न शब्द ' २६ जो लोग अंग्रेज श्रादिसे हमारे लिए ' अन् ' यह नाम प्रयुक्त शब्दा देखकर प्रसन्न हो जाते हैं, उन्हें जानना चाहिए कि वे हमें आर्यावर्त में बहले रहने वाला होनेसे ' अन् ' नहीं कहते, किन्तु ' ईरान ' प्रदेश से थाया व हर्यन ' कहते हैं । श्रतएव उनसे प्रयुक्त ' अर्यन ' शब्द अन्य ही हैं । इससे ' श्रार्य ' नामके प्रेमियोंको प्रसन्न नहीं होना मिलता, चाहिये । ' र्यावर्त ' में रहने वाले होनेसे तो वे हमें ' इण्डियन ' कहते हैं, ता, ' अन ' नही । उस ' इण्डियन ' का मूल शब्द ' सिन्धु ' वा ' इन्दु ' ही है, यह रें । यी पहले कहा जा चुका है । ' अर्यन ' कहकर वे हमें ईरानसं आया हुआ मार्क इसलिए सिद्ध करते हैं कि ये लोग भी भारतवर्षको स्वदेश न मानें, पड़ेगा । किन्तु अपने आपको प्रवासी मानें । जैसे अरबसे मुसलमान भारतमें 71 श्राकर रहते हैं, जैसे अंग्रेज इङ्गलैण्ड से यहां श्राकर रहते हैं, उनका भारतवर्ष अपना देश नहीं, किन्तु विदेश है, वैसे यह आर्य भी ईरान • प्राचीर से ही यहाँ प्राये हैं । इसलिए भारतवर्ष भी इनका अपना देश नहीं कया है । किन्तु परदेश ही है । वहाँ उनकी यहीं गुप्त नींति है कि जैसे प्रवासी ि मुसलमान इस देशको अपना देश ' न मानकर उसके खण्ड कराना १ | १०१ ) चाहते हैं या करा चुके हैं, उनका इस देशसे प्रेम नहीं, वैसे ये ' अर्यन् ' ब्राह्मणः नामधारी भी ईरानके रहने वाले होनेसे उसीको अपना देश मानें, उससे रच श्रार्थ ही स्नेह करें, भारतवर्षकी रक्षा के लिए ये लोग अपना रक्त न बहायें । वास्तव में वेदशास्त्र के देखनेसे हमारी जन्मभूमि या स्वदेश सिन्धु झण ( भारतवर्ष ) ही सिद्ध होता है । इन अंग्रेज श्रादिके अनुमान तो कपोल-मार्वाय " व. ल्पनामात्र विश्रान्त होनेसे प्रायः निराधार हैं । इस प्रकार हो लोग हमें .. oshi Collectioeujarat. हिन्दु शब्द का महाभाष्य ८१ मध्यएशियासे या‘उत्तरमेह ' से श्राया हुआ मानते हैं, यह सब भ्रममात्र है । वेद सृष्टिके आदि समयसे बनाये हुए माने जाते हैं । मैक्समूलर श्रादि ' पश्चिमी विद्वान् भी ' ऋग्वेद ' को पृथिवीका सर्वप्रथम ग्रन्थ मानते हैं । परन्तु उन वेदोंका आविर्भाव भारतसे अन्य देशमें कोई ठीक - ठीक सिन्द नहीं कर सका है । यदि ऐसा है, तब ' ऋग्वेद ' से अन्यत्र जानेकी श्रावश्यकता नहीं कि हमारा देश कौनसा हैं । प्रत्येक प्राचीन जातिका ' परिचयचिह्न ' होती हैं उसकी ' भाषा ' । परन्तु जो हमें बाहरसे श्राया हुआ मानते हैं, वे क्या वहाँकी तथा हमारी भाषाको समान सिद्ध कर सकते हैं? संसार की जिस उन्नत जातिने उच्च सोपानपर श्रारोहण किया, चाहे वे जातियाँ भिन्न - भिन्न दिग्दिगन्तों में फैल भी जायें, तथापि उनका श्रादिनिवास-स्थान नियत ही हुआ करता है । जो जातियां अपनी संख्यावृद्धिसे भिन्न-भिन्न देशोंमें अपने उपनिवेश बनाया करती हैं अथवा उस - उस देशमें प्रतिष्ठित हो जाती हैं, उन जातियोंके अपने देश में अपने चिह्न तथा भाषा नियत होती है । अंग्रेजोंको ही देख लीजिये । वे बहुत फैले, ईसाकी १६ वीं शताब्दी से वे भिन्न - भिन्न प्रांतों में फैलते दिखलायी पड़ते हैं । श्रमे-रिका, आस्ट्रेलिया, अफ्रीका, एशिया यादिमें सर्वत्र वे रहते हैं, परन्तु क्या उन्होंने स्वदेशको सर्वथा भुला दिया? क्या अपने देशमें अपनी भाषा या अपने चिह्न प्रतिष्ठित नहीं किये? प्रत्युत उन्होंने तो इससे अपने देशकी ही प्रतिष्ठा बढ़ायी हैं । इस प्रकार अन्य जातियों पर भी दृष्टि डालिये । सभी जातियोंने विदेशों में उन्नति करके अपने देशके ही मुखको उज्ज्वल किया है । सभी जातियोंने अपने देशकी श्रीवृद्धिमें तथा उसके संरक्षण एवं उस देशको भाषाके प्रचार में ही सदा अपना गौरव समझा है । तब सबसे सभ्य हिन्दुजाति ही इस मोटी भूलको क्योंकर कर सकती है कि अपने आदिदेशको भुलाकर यहाँ श्रागयी और अपने श्रादिदेश में कोई भी अपना चिह्न स्थापित नहीं क्रिया? क्या ' मध्य एशिया ' श्रादि An eGangotri Initiative
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८२ श्रीसनातनधर्मालांकः ( ४ ) हिन्दुजातिके तथाकथित देशोंमें संस्कृतभाषा दिखलायी देती है? क्या वहीं ब्राह्मण आदि चार वर्ण या अन्य वेदादि के प्रचार - चिह्न पाये जाते हैं? वस्तुतः यह भारतवर्ष ही हमारा आदिदेश है । इसीलिए आदि-नृष्ट्युत्पन्न मनु ने लिखा है- ' एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः । स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवा: ' ( १1१० ) । इस प्रकार भारतवर्ष ही हमारी आदि जन्मभूमि है । भारतसे ही अन्य दिशा-विदिशाओं में गये हुए हमारे बन्धुधोंने वहाँ - वहाँ अपने उपनिवेश बनाये जिनके चिह्न कभी - कभी भूगर्भ खोदने पर मिलते हैं । यहाँ के अग्रजन्मा ब्राह्मण ही जगद्गुरु होकर फैले 1 वेदादिमें छहों ऋतुका वर्णन मिलता है, भारतसे भिन्न ग्रन्य किसी भी देश में छहों ऋतु नहीं मिलते. इससे भारतवर्ष ही हमारी जन्मभूमि सिद्ध होती है । ' धन्यास्तु ये भारतभूमिभागे ' । विष्णुपुराण २।३.२४ ) यह कहकर देवगण भी हमारी जन्मभूमि भारतवर्ष में ही चाने के लिए लालायित रहते थे । यहाँ के ही अजुनने दिग्विजय करके भारतका नाम विदेशों में प्रसिद्ध कर दिया था, इसी तरह अन्य क्षत्रियोंने भी । फलतः हमारा आदि निवासस्थान सिन्धुदेश ही है, जो कालान्तर में भारतवर्ष नामसे प्रसिद्ध हुआ । यहीं के स्वायम्भुव मनुके पुत्र सम्राट् प्रियवतने पृथिवीको सात द्वीपोंमें बांटा और अपने राज्यको जहाँ - तहाँ फैलाया । इससे ही हमारे पूर्वज दूर - दूर देशोंके वृत्त जानते थे । इसीलिए ही जहाँ - तहाँ उन उन देशोंका वर्णन दिखलायी पड़ता है, वहाँ पर श्रादिनिवासके कारण नहीं । अंग्रेजों भूगोलमें यदि कहीं ' काम्सकाट ' ' नामक क्षुद्र ग्रामकी पुरानी कहानी लिखी हो, तो इससे अंग्रेज उस गांव के रहनेवाले कदापि सिद्ध नहीं हो सकते । वेदादिमें जो शीतका वर्णन वा दीर्घ उपाका वर्णन दिखलायी देता है, वह हमारी अभिज्ञानतावश मिलता है, हमारे वहाँ CC - 0. Ankur Joshi Collection हिन्दु शब्द का महाभाष्य ८४ श्रादिनिवासके कारण नहीं । हमारे वेदादिशास्त्रोंमें तो आकाश, स्था प्र ० लोकों का वर्णन भी मिलता है, तो क्या हमारा मूलनिवास वहाँ नाम मान सकता है? वेद सर्वान्तर्यामी की कृति है, उसमें घुणातरन्याय यदि कहीं भारतसे दूरके देशोंका वर्णन या उनकी प्रकृति का दिखलायी पढ़े, तो इसका कारण सर्वज्ञता है, इससे हमारा स आदिनिवास कभी सिद्ध नहीं हो सकता । इसलिए इस विषय में पार ४२ त्यों वा तदनुयायी पौरस्त्यों कल्पनासे बढ़कर नहीं है । ३० इससे स्पष्ट हुआ क्या रहस्य है | यह ' अर्यन ' होत के व्यभिचारी श्रनुमानों का मूल्यम प्रथ सभ शूद्र विद्य कि अँग्रेजों द्वारा हमें ' अर्यन ' कहे जाने नित्य ' आर्य ' का अपभ्रंश ' नहीं है, अथवा यही हो भी, तो वहाँ ' आर्य ' से भी उन्हें ' ईरान से आये हुए ' यह शक अभीष्ट है, ' सर्वश्रेष्ठ ' अर्थ नहीं । श्रथवा वादितोषन्याय से मान ' लिया जाय कि ' आर्य ' हमारी जातिका नाम है, पर ऐसा होने पर इ व्यापक सिन्द्ध नहीं होता, क्योंकि ' उत शुद्ध उत श्रायें ' ( अथर्व १६६२ १ ), ‘ उत शूद्ध ं उत श्रार्यम् ' ( अथर्व ० ४ / २०१८ ), ' शूद्राय च श्रार्याय " आ ( अथर्व ० १३ | ३२८ ), ' यो नो दास श्रार्यो वा ' ऋ ० १० | ३८ | ३ ), ' या जाति शूद्र उत थार्य: ' ( अथर्व ० ४ २०१४ ), श्रार्याय वा पर्यवदध्याद में अन्तर्धिने वा शूद्राय ' ( ग्रापस्तम्बधर्मसूत्र || ३ | ४० ~~ ४१ ), ' आर्यादि भव ष्टिता वा शूद्राः संस्कर्तारः ( स्थानशुद्धिकर्तारः श्रन्नसंशोधका वा ) सु रणो ( आपस्तम्ब धर्म ० २२ २४ ) इत्यादि वेदादिके प्रमाणोंमें श्रार्य एवं शू सेउ के पृथक - पृथक ग्रहणसे सिद्ध होता हैं कि शुद्ध श्रार्य नहीं हैं । जाय दिया स्वामी दयानन्दजीने भी यह स्वीकृत किया है, देखिये –'ब्राहार तब. क्षत्रिय, वैश्य द्विजोंका नाम श्रीर्य और शूद्धका नाम अनार्य है ' ( सत्याप Gujarat. An eGangotri Initiative