सनातन धर्मालोक ४ — पृष्ठ 61–70

सनातन धर्मालोक ४ · पृष्ठ 61–70

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८४ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) प्र ० = समु ०, १४० पृ ० ), ' द्विज विद्वानोंका नाम श्रार्य और मूर्खो नाम शुद्ध और अनार्य नाम हुआ । ' ( स ० प्र ० पृ ० १३१ ) यदि उन्होंने कहीं शूद्र को ' आर्य ' लिखा भी है तो वहाँ शास्त्र - विरोध है । श्रीपाद दामोदर सातवलेकर आर्यसमाजी विद्वान्ने भी ' छूत और अछूत ' पुस्तक के पूर्वार्ध ( ५६ ० ) में लिखा है- ' उत शुद्ध उत आये, अथर्व ४।२० ) के सदृश प्रयोग वेदमें कई स्थानोंमें नजर आते है, इससे स्पष्ट होता हैं कि आर्य त्रैवर्णिक लोग हैं और अनार्य शूद्र हैं ' । इस विषय में श्रथर्ववेद भाष्य में श्रीराजाराम शास्त्री, ' अस्पृश्यनिर्णय ' में श्रार्यस्वराज्य-सभा मन्त्री श्रीरामगोपाल वैद्यभूषण, चतुर्वेदभाष्यकार श्रीजयदेवजी और श्रीनरदेव शास्त्री, श्रीदेवशर्मा, श्रीक्षेमकरण यादि श्रार्यसमाजी 1 विद्वान् भी सहमत हैं । श्रार्थसमाजके प्रसिद्ध स्वामी विश्व ेश्वरानन्द नित्यानन्दजीने भी अपनी वेदपद - सूची में उक्त मन्त्रमें ' श्रार्य ' यही पद स्वीकृत किया है । इससे ' अर्थ ' का छेद करनेवाले श्रीशिव-शहर का यतीर्थजी का मत छिन्न होगया । आर्य शब्द ३१ जब शूद्र ही ' आर्य ' नहीं रहा, तब चाण्डाल यादि की तो ' आर्य ' संज्ञा हो ही कैसे सकती है? उचित तो यह है कि भारतवर्षीय जातियों का समान नाम हो । ' गमिमेव तु श्रार्याः प्रयुञ्जते ' महाभाष्यादि में दिया यह आर्य शब्द ब्राह्मणवाचक है, ' प्रधानेन हि व्यपदेशा भवन्ति ' इस न्यायसे द्विजोंका उपलक्षक है, जैसे कि ' ब्राह्मणेन निष्का-रणो धर्मः षडङ्गो वेदोऽध्येयो ज्ञेयश्च ' यहाँ ब्राह्मण शब्द प्रधान होने से उपलक्षण है, अन्यथा क्षत्रिय - वैश्योंके लिए वेदाध्ययन निषिद्ध हो जाय । भाष्यकार की यह शैली है कि वे प्रायः ब्राह्मणोंके ही उदाहरण दिया करते हैं । इस विषय में, महाभाष्यका पारायण करना चाहिए । तब ' महाभाष्य ' में भी ' आर्य ' शब्द प्राप्तव्यत्वको अथवा लक्षणा से CC - 0. Ankur Joshi Collection हिन्दु शब्द का महाभाष्य I श्रेष्ठत्वको मानकर ब्राह्मणवाचक ही सिद्ध हुआ जातिशब्द नहीं । इसी-लिए ' साहित्यदर्पण ' के छठे परिच्छेद में ' नाव्योक्तियों ' में ' स्वेच्छया नामभिर्विप्रैर्विप्र श्रार्येति चेतरैः ' इस प्रकार ब्राह्मणको ' आर्य ' सम्बोधन देना कहा है । इस प्रकार ब्राह्मणको ' चार्य ' सम्बोधन देना कहा है । इस प्रकार ' मृत्युर्निमान् जिघांसति ' ( मनु ० ५।४ ) इत्यादिमें भी ' विप्र ' नाम ' प्रधानेन हि व्यपदेशा भवन्ति ' इस न्यायसे श्राया है । ' एतान् द्विजातयो देशान् ( ब्रह्मावर्त, कुरुक्षेत्र, मत्स्य, पाञ्चाच, शूरसेन, मध्यदेश, आर्यावर्तदेशान् ) संश्रयेरन् प्रयत्नतः । शूद्रस्तु यस्मिन् कस्मिन् वा ( म्लेच्छदेशेपि ) निवसेद् वृत्तिकशित: ' ( मनु ० २।२४ ) इस प्रकार द्विजात्युत्पन्नोंका ही भारतवर्ष में प्रधानतासे निवास बतलाया है, शुद्धका तो गौणतासे । इसलिए २/४/१० सूत्रके ' महाभाष्य ' में ' श्रार्यावर्ताद् श्रनिरवसितानाम् ' इस प्रघट्टकसे सब तरह के शूद्रोंका धार्या-वर्तमैं निवासका अधिकार नहीं माना है । तब ' आर्यावर्त ' यह नाम श्राय- ब्राह्मणोंके प्रधानतया निवासके कारण ही कहा है- ' प्रधानेन हि व्यपदेशा भवन्ति ' । जैसा कि जिस ग्राममें मुसलमान अधिक रहा करते हैं, वहाँ थोड़े हिन्दुओंके होते हुए भी वह ग्राम मुसलमानोंका ही कहा जाता है । काबुल कान्धारमें थोड़े हिन्दुओंके होते हुए भी वह देश ' अफगानिस्तान ' कहा जाता है । श्राजकल भारतवर्ष में थोड़े मुसलमानोंके होने पर भी उसे ' हिन्दुस्तान ' ही तो कहा जाता है । प्रधानता के कारण किसीके नामसे देशकां नाम होने पर भी अन्य अप्रधान प्रजाका अभाव सिद्ध नहीं हो जाता । इसके अनुसार, तब ब्राह्मणोंकी - प्रधानतासे हमारे देशविशेषका ' शार्यावर्त ' यह नाम ' प्रधानेन हि न्युपदेशा भवन्ति ' इस न्यायसे प्रसिद्ध है । वह लाज भी वैसे ही रूद्र है । इससे यह सिद्ध हो गया कि समस्त भारतीयोंका ' आर्य ' यह नाम नहीं है । तब शूद्ध अनार्य सिद्ध हुए, इसी प्रकार अवर्ण तथा Gujarat. An eGangotri Initiative

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२६ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) वर्णसङ्कर भी । इस प्रकार ' महाभाष्य ' के वचनमें ' आर्य ' शब्द ब्राह्मण-वाचक सिद्ध हुआ । यदि आर्यावर्त में निवासके ही कारण शूद्र और अवर्णोंका नाम ' आर्य ' हो जाय, तो यहाँ के मुसलमान तथा ईसाई भी ' आर्य ' हो जायंगे, गर्दभ श्रादि पशु भी तथा काक आदि पक्षी भी आर्य हो जायेंगे, परन्तु ऐसी बात नहीं है । इससे आर्यावर्त में निवासमात्रसे ही श्रार्यता नहीं हो जाती । स्वामी दयानन्दजी का मत ३२ जो कि स्वामी दयानन्दजी ने लिखा है- ' आर्यावर्त देश इस भूमिका नाम इसलिए है कि इसमें श्रादिसृष्टि से आर्यलोग निवास का करते हैं और जो आर्यावर्तमें सदा रहते हैं, उनको भी श्रार्य कहते हैं ' ' ( स्वमन्तव्यामन्तव्यप्रकाश ३० संख्या; यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि स्वामीजी ने श्रादिसृष्टिमें यार्यो का निवास ' तिब्बत ' में माना है, देखिए ' सत्यार्थ प्रकाश ' श्रष्टम समुल्लास १३६ पृष्ठ | इससे श्रार्यावर्त में उनका निवास सिद्ध न हुआ । परस्पर विरुद्ध होने से ही उनका यह वचन ठीक नहीं है । जो कि स्वामीजी ने कहा है कि ' आदिसृष्टि तिब्बत में हुई, उसमें आर्य - अनार्य दोनों का संग्राम हुआ । श्रार्यलोग तिब्बत छोड़कर यहां श्रा बसे ॥ यही स्थान प्रार्यों का निवास होने से ' आर्यावर्त ' इस नामले प्रसिद्ध हुया. धार्यों के थाने से पूर्व इस देशमें कोई नहीं रहता था ' ( स ० प्र ० १३६-१४० ) यह बात निर्मूल ही है । विब्र्वतमें श्रादिसृष्टि का निर्माण किसी वेदादिशास्त्रमें नहीं लिखा, यह इसमें पहिलो निमू लता है । त्रिविष्टपका अपभ्रंश भी तिब्बत नहीं । जहां ' त्रिविष्टप ' शब्द नाया है, वहां स्वर्गलोकवाचक श्राया है । जैसे — ' विष्टप - यौः, श्राविष्टा ज्योतिभिः ( ग्रहनक्षत्रादिभिः ), पुण्ष-कृद्भिश्च ' ( २/१४३१ ) | वेदाङ्ग पाणिनीय लिंगानुशासनमें ' त्रिविष्टप-CC - 0. Ankur Joshi Collection हिन्दु शब्द का महाभाष्य त्रिभुवने नपुंसके ' ( ४४ ) यहां ' देवासुरात्म - स्वर्गे ' से स्वर्गकी पर्यायतावश पुलिंगता प्राप्त होने पर होगया । इससे विष्टप् या त्रिविष्टप - स्वर्गका नाम ८८ ( लि ० ४३ ) इस ' मूल उक्त ४४ सूत्रसे कदाचि है, तिब्बतका न करते इसमें ‘ ऊर्ध्वं नाकस्याधिरोह विष्टपं स्वर्गोलोक इति यं वदन्ति ' ही ' . ११/११७ ) यह मन्त्र भी ज्ञापक है । इसमें तिब्बतका नाम नहीं । नुसार तिब्बतमें सृष्टि करने का यहां कोई वर्णन है । त्रिविष्टप केवल हुश्रा बहुल होनेसे अपूर्णता के कारण भी पूर्णतायुक्त सर्वादिम हिन्दु जाति ' सृष्टि - प्रदेश नहीं हो सकता । अतः उक्त मन्त्र में यजमानके स्वर्गलो इस दे जाने का ही वर्णन है, तिब्बतमें नहीं । स्वर्गलोक इस लोकसे ि अनार्य होता है, जैसे- ' दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः ' ( ऋ ० १११६१३ को त्रिविष्टपका अपभ्रंश तिब्बत है, यह भी निष्प्रमाण हैं | हुआ इसी भांति उसीसे अग्रिम ' द्यौ: स्त्रियाम् ' ( ४१ ) इस लिंगानुशा के सूत्र- प्रोक्त ' दिव् ' शब्द में भी स्वर्ग अर्थ होनेसे ४३ सूत्रमें पुलिंग २१२२ प्राप्त होने पर ४५ सूत्र से बाघ होगया । इसी तरह ' द्योदिवौ द्वे ि आदि क्लीवं त्रिविष्टपम् ' ( अमरकोष ११११६ ) में भी ' त्रिविष्टप ' स्व बचाने क पढ़ दि नाम में आया है । श्रमरकोपके यह नाम स्वर्गवर्ग में हैं, भूमिवर्ग में नहीं करा अतः पृथिवीलोकस्थ ' तिब्बत ' का ग्रहण नहीं हो सकता । ' तृती ' विष्टपं ( लोकः ) त्रिविष्टपम्? तब तीसरा लोक भू तथा अन्तरि • में स्मृति ' भिन्न स्वर्ग ही हैं । तिब्बत तो पहले भूलोक में अन्तर्गत है । ' विभिन्न का अर्थ स्वा ० द ० जी भी उणादिकोष ( ३।१४५ ) में भुवन मान में यह पह । ‘ त्रिविष्टप ' का अर्थ उन्होंने स्वर्गके स्थान पर ' सुखविशेषोपभोग सारे भ लिखा है । वे स्वर्गलोकको उठाना चाहते थे; अतः जहां ' स्वर्ग ' वार शब्द श्राजावे; वहां ' सुख ', ' द्रष्टव्यं सुख ' यह अर्थ कर िचन्द्रिक करते थे 1 ( ब्रह्माव जैसे वैदेशिक लोग हमारे भारतवर्षके प्रेमके विनाश के लिए ह च सुम वैदेशिक सिद्ध करते हैं, वैसे ही स्वामीजीने भी तिब्बत - स्थित पुरुषत Gujarat. An eGangotri Initiative

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८८ श्रीसनातनधर्मालोकः ४ ) ३ ) इस दू ' मूल हिन्दू ' सिद्ध करके भारतवर्ष उनका विदेश सिद्ध कर दिया है । सूत्रसे कदाचित् इसीलिए इस सम्प्रदायके व्यक्ति भारतीय धर्मसे ही विद्रोह तका नही करते हीं । द्वितीय निर्मूलता इसमें यह है कि यदि श्रायके निवाससे न्ति ' ही आर्यावर्त ' ' वह नाम हुथा, तो तिब्बतमें भी श्रारम्भसे ( स्वामिमता-म नहीं । सार ) का निवास रहा, तो उसका नाम ' आर्यावर्त ' क्यों नहीं केवल से हुआ? अथवा ' तिब्बत ' में श्रनायके निवाससे उसका नाम ' श्रनार्या-न्दु जाति वर्त ' क्यों नहीं हुआ? अथवा यदि अनार्य भी वहां से यहां श्राये, तो स्वर्गलोह इस देशका नाम ' आर्यानार्यावर्त ' क्यों नहीं हुआ? अथवा यहां पर कसे ि अनार्य शूद्र चाण्डालादि, भी श्राये या नहीं? ( क्योंकि स्वामीजी शूद्रादि को अनार्य मान चुके हैं ) यदि श्राये, तो ' चार्यानार्यावर्त ' नाम क्यों न हुआ? इसलिए यह व्याजमान ही है । वस्तुतः ' आर्यावर्त ' यह रूढ़ ही नाम है, उसका लक्षण ' मनुस्मृति ' लंगानुशा २२२ पद्यमें कहा है । रूढ़ न मानने पर इससे भिन्न कहे हुए ' ब्रह्मावर्त ' पुल आदि प्रदेश ' अनार्यावर्त ' हो जाएंगे । इसी श्रापत्ति से अपने आपको बिचाने के लिए स्वामीजीने ' ब्रह्मावर्त ' के स्थान में ' आर्यावर्त ' शब्द ही प ' स्वर्ण पढ़ दिया है । भिन्न - भिन्न २२ १७ मनु श्लोकोंका अर्थ भी उन्होंने इकट्ठा वर्ग में नहीं कर डाला है, यह बात ' सत्यार्थप्रकाश ' के अष्टम समुल्लास १४० पृष्ठ - । ' तृती में दृष्टव्य है । पर यह उनकी कृत्रिमता ही है, क्योंकि यह बात मनु-अन्तरिक्ष · स्मृति ' से विरुद्ध है । ' मनुस्मृति ' में ब्रह्मावर्त, श्रार्यावर्त श्रादि भिन्न-' लाये हैं । ' कैवर्तमिति यं प्राहुरार्यावर्तनिवासिनः'मनु ० ( १० | ३४ ) 1. मान यह पद्य बता रहा है कि आर्यावर्त सारे भारतका नाम नहीं; अन्यथा पोपभोग सारे भारतका नाम ' आर्यावर्त ' होने पर उक्त शब्द व्यर्थ थे । अतः वर्ग ' वा ब्रह्मावर्त, श्रार्यावर्त श्रादि भारतके भाग ही थे । इसलिए ' स्मृति-कर िचन्द्रिका ' के संस्कारकाण्ड में ' देशनिर्णय - प्रकरण ' में कहा है- ' अत्र तथा ( ब्रह्मावर्त - कुरुक्षेत्र - मध्यदेशार्यावर्तेषु ) पूर्व पूर्व उत्तरोत्तरात् प्रशस्तः । तथा = लिए च सुमन्तुः -- " ब्रह्मावर्तः परो देशः ऋषिदेशस्त्वनन्तरः । मध्यदेशस्ततों पुरुष CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. हिन्दु शब्द का महाभाष्य ८६ ' न्यून श्रार्यावर्तस्ततः परः ' इति । इससे प्रार्यावर्त को मध्यदेश, ब्रह्मगि-देश तथा ब्रह्मावर्तसे न्यून बतलाया गया है । यहाँ प्रकरणवश ' परः ' का अर्थ ' इतर ' एवं ' हीन ' हैं । ' ब्रह्मावर्त ' को सर्वोत्तम बतलाया गया है । इससे यह भी स्पष्ट है कि ' श्रार्यावर्त ' समस्त भारतका नाम नहीं है, किन्तु उसके एक भागका नाम है । स्वामी दयानन्दजीके मतमें अन्य त्रुटि यह है कि यदि यदिसृष्टिमें केवल एक ही मनुष्यजाति थी, पीछे ही ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्ध ये चार भेद हुए, तो वेदमें ' ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् ' ( शुक्लयजुः ३१, ११ ) इत्यादि में चार जातियोंका निर्देश कैसे हैं? क्या वेद इन चार जातियोंके बनानेके बाद बना? क्योंकि स्वामीजी इतिहासयुक्त उस ग्रंथ-को उस इतिहास के बाद बना मानते हैं । यदि भविष्यदृष्टिवश वेदमें वैसा वर्णन है, तो वेदमें भी भविष्यद् दृष्टिसे इतिहास सिन्द होगया । इससे स्पष्ट है कि ' आर्य ' शब्द गुणशब्द ही है, जातिशब्द नहीं । तब वह हमारी जातिका ' श्रार्या जातिः ' इस प्रकार विशेषण तो हो सकता है, संज्ञा नहीं हो सकता । इससे स्पष्ट है कि ' सिन्धु ' या ' हिन्दु ' ही हमारी प्राचीन संज्ञा है । उसनें चार वर्णं तथा श्रवर्णं श्रन्तभूत हो जाते हैं । यही व्यापक नाम है, जिससे इस देशकी सब ब्राह्मणादि चाण्डालान्त जातियोंका ग्रहण हो जाता है । ' आर्य ' यह तो एकदेशी नाम है । इससे केवल ब्राह्मण या ब्राह्मण - क्षत्रियोंका ही ग्रहण सम्भव है । न तो इससे शूद्ध लिए ना सकते हैं, न तो चाण्डालादि श्रवर्ण ही । ईश्वर - पुत्र ३३. कई वादिगण ' आर्याय ' का ' ईश्वरपुत्राय ' यह अर्थ ' निरुक्त ' ( ६।५१३ ) में देखकर ' आर्य ' शब्दका प्रयोग हमारी जातिके लिए. करना ठीक मानते हैं, उनसे पूछना चाहिए कि ' शुद्धका नाम अनार्य है '. An eGangotri Initiative

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६० श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) ( सत्यार्थप्र ० १४० पृष्ठ ) यह स्वामी दयानन्दजीकी उक्ति शुद्ध है या अशुद्ध? यदि अशुद्ध, तो श्रापके स्वामीजी अनाप्त हो गये । यदि उक्त उक्ति शुद्ध है, तो ब्राह्मणादिका नाम ' आर्य ' सिद्ध हुआ, शूद्रादि का नहीं, तब शुद्ध एवं चाण्डालादि तथा ईसाई या मुसलमान भी ईश्वरपुत्र हैं । या नहीं? यदि नहीं, तो इसमें क्या प्रमाण हैं? यदि हैं, तो आप इनको ' चार्य ' कहते या मानते हैं या नहीं? यदि मानते हैं, तो आपके प्रवर्तक स्वामी दयानन्दजीका वाक्य व्याकुपित होता है । तब ' कृण्वन्तो विश्वमार्यम् ' इस मन्त्रका भवत्सम्प्रदायाभिमत अर्थ कि ' सारे जगत को आर्य बनायो ' भी शुद्ध सिद्ध होता है । यदि चास्तवमें ' ईश्वरपुत्र ' हैं, तो उनको ' ईश्वरपुत्र ' बनाना क्या? यदि आप उनको ' आर्य ' नहीं मानते, तो सिद्ध हुआ कि ईश्वर के पुत्र ब्राह्मण- " चत्रियों में हो ' आर्यत्व ' का व्यवहार है, अन्य शूद्र, चाण्डाल आदिमें नहीं । तब यह नाम एकदेशी सिद्ध हुआ । अतएव यह समस्त जातियों के लिए प्रयोगाई नहीं । वास्तवमें ' निरुक्त ' में ' आर्य ' का जो ' ईश्वरपुत्र ' अर्थ लिखा है, उसका रहस्य अन्य है, वह यह है कि ' निरुक्त ' तथा उक्त मन्त्र में ' आर्य ' शब्द अण्प्रत्ययान्त ' श्रर्य ' शब्दका विवक्षित है । ' श्रय ' ' यह ' श्रर्यः स्वामिवैश्ययोः ' ( ३ | १ | १०३ ) इस पाणिनिके सूत्र में ' स्वामी ' का नाम है । तब ' चार्य ' शब्दका ' स्वामीका पुत्र ' यह अर्थ यहां विवक्षित है । चहां पर ' ईश्वर ' से स्वामी ही श्रमीष्ट है, परमात्मा नहीं ।. ' निरुक्त ' यदि प्राचीन साहित्य में परमात्म - वाचक ईश्वर शब्द श्राया ही नहीं । ' स्वामीश्वराधिपति ' ( २ | ३३६ ) इस सूत्र में ईश्वर शब्द स्वाम्यर्थक ही है । इसी प्रकार ' सं समिद् श्रर्थ: ' ऋ ( ० १०।१६१1१ ) इस मन्त्र में शब्द स्वामिवाचक ही है, जैसा कि सायणाचार्यने लिखा है- ' हे · अग्ने! धर्म: - ईश्वरस्त्वम्, ' श्रर्यः स्वामिवैश्ययोः " इति यत्प्रत्यय-यान्ती निपातितः । ' श्रर्यः स्वाम्याख्यायाम् ' ( फि ० सू ० १११८ ) इत्य-CC - 0. Ankur Joshi Collection हिन्दु शब्द का महाभाष्य ६२ न्तोदात्तत्वम् । ' यहाँ परमात्मार्थका कोई प्रकरण नहीं । तब निस्क मन्त्रवादियों की कोई इष्टसिद्धि नहीं, क्योंकि उन्हें ' श्रार्य ' मतमें ‘ अण् ’ प्रत्ययान्त इष्ट नहीं होता, किन्तु स्यत् प्रत्ययान्त ही इ दीजिये, हैं और है । तब जातिवाचक अर्थ में उसका प्रयोग ऐकदेशिक होने से के स्वामीज हो सकता । का कहा हिन्दुशब्दका चोर डाकू अर्थ स्वामिप्र ३४ जो कि स्वामी दयानन्दजीने ' आन्तिनिवारण ', ' वेदविरुद्ध किया थ ' खण्डन ' तथा १८७५ के ' सत्यार्थप्रकाश ' ( ३ समु ० पृ ० ६७ ) में हि शब्दका - शब्द के ' चोर, काफिर, गुलाम, दुष्ट, नीच, कपटी, छली ' इत्य अर्थ किये हैं, उनसे प्रष्टव्य हैं कि आपने ये अर्थ किस व्याकरण । उस - कोष से किये हैं? यदि निज कल्पित ही ये अर्थ किये हैं, तो प्रभार हमारे म - शून्य होने से उनका यह वचन श्रप्रमाण हो गया । जो कि स्वामी अवतारी अर्थ को ने लिखा हैं- ' ग्रार्य नाम श्रेष्ठ का है और जो हिन्दु नाम इनका स उच्चारण ' है, सो मुसलमानोंने ईर्ष्यासे रखा है, उसका अर्थ है दुष्ट, नीच, प भाषाओ -छली और गुलाम, इससे यह नाम भ्रष्ट हैं, किन्तु आर्यों का पर इसस ' हिन्दु ' कभी न रखना चाहिए ' ( प्रथम सत्यार्थप्रकाश ३ पृ ० ६७ मानी जा - यह बात भी निष्प्रमाण है कि मुसलमानों ने ' चार्य ' शब्द के स्थार में वह - ईप्यासे ' हिन्दु ' नाम रख दिया । स्वामीजी या उनके अनुयायिक स्पष्ट है आज तक ऐसा प्रमाण नहीं दिया कि मुसलमानोंने श्रमुक संवत् ।' हिन्दु ' • सन् में ' आर्य ' ' यह नाम हटाकर उसके स्थान में ' हिन्दु ' यह उच्चारण रखा हो । पूर्णत: ए ' यदि वे कहें कि ' ग्यासलुगात ' में ' हिन्दु ' शब्दके ' काफिर, ये उन्हें ' श्रा ' गुलाम ' इत्यादि अर्थ किये गये हैं, तो उनसे पूछना चाहिए कि ' म्यांसलु अश्व - गर्द वह संस्कृतकोप है, जो माननीय हो जाय.? उसी कारण से यदि ' हिन्दु शब्द को हटाते हैं, तो ' शरीर ' शब्द को भी छोड़ दीजिये । उर Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 65

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१२ श्रीसनातनधर्माल्लोकः ( 0 ) नि मतमें ' शरीर ' उपद्रवी को कहते हैं । तब तो ' देव ' शब्दको भी छोड़ यार्य ' दीजिये, क्योंकि ' ग्यासलुगात ' में ' देव ' शब्द का अर्थ ‘ राक्षस ' लिखा इष्ट हैं और स्वामी दयानन्दजीने इसका अर्थ ' विद्वान् ' लिखा है । श्रब होने से स्वामीजीके अनुयायी कहें कि ' देव ' शब्दका अर्थ श्राप ' ग्यासलुगात ' का कहा हुआ मानेंगे या अपने स्वामीजीका कहा हुआ? यदि आप स्वामिप्रोक्त ही अर्थ मानेंगे और ' ग्यासलुगात ' से कहे ' देव ' शब्दके अर्थको अशुद्ध मानेंगे, तो वैसे ही ' हिन्दु ' शब्दका भी ' ग्यासलुगात ' का दविस्म किया श्रर्य भी शुद्ध जानना चाहिये । तब उसका अनुयायी ' हिन्दु ' में कि शब्दका स्वामीजी से कहा हुआ पक्ष भी श्रशुद्ध सिद्ध हुआ । ' इयां करण उसी ' लुगात ' में ' राम ' शब्द ' गुलाम ' का वाचक है, जबकि वह.. प्रमाण हमारे मतमें ' रमन्ते योगिनोऽस्मिन् इति राम: ' इस प्रकार परमात्माके स्वामी श्रवतारविशेषका वाचक है । तब क्या आप लोग ' ग्यासलुगात ' प्रोक्त अर्थ को ही मानेंगे? वास्तवमें यहाँ यह याद रखना चाहिए कि-इनका उच्चारण सादृश्यके कारण समानतासे दीख रहे हुए शब्दोंका भिन्न - भिन्न ' च, क भाषाओं में भिन्न - भिन्न अर्थ होना असम्भव या थाश्चर्यजनक नहीं । का पर इससे समानता से दृश्यमान शब्द या वस्तुओं में मौलिक एकता नहीं ०६७ मानी जा सकती । वहां पर ' मार ' शब्द ' सर्प ' वाचक है, हमारी भाषा के स्था में ' वह ' कामदेव ' वाचक है इस प्रकार अन्य भी बहुतसे शब्द हैं । इससे नुयायिक स्पष्ट है कि फारसीभाषीय ' हिन्दु ' शब्दके साथ हमारे जातीय नाम, संवत् ।' हिन्दु ' शब्दका कोई मौलिक सम्बन्ध नहीं है । भले ही उनका यह उच्चारण - सादृश्य क्यों न हो, पर दोनों ही शब्द एक दूसरे से सर्वथा, पूर्णत: एव मूलत: भिन्न ही हैं । यदि वादिगण यह बात न मानें, तो फिर से उन्हें ' श्रार्य ' शब्दका प्रयोग भी छोड़ देना चाहिएं, क्योंकि उसी - कि ' म्यांसलुगात ' में ' श्रार्य ' शब्दका श्रर्थ ' ' घोड़े - गधेके पिछले भाग ' का या - यदि · अश्व - गर्दभादिकी शालाका नाम कहा है 1 तब तो उन्हें ' श्रार्य ' शब्द जिये । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. हिंदु शब्द का महाभाष्य भी निकृष्टार्थं होने से छोड़ देना चाहिए । यदि वे नहीं छोड़ते, तो वहां निन्दित अर्थवाला होने पर ' हिन्दु ' शब्द ही क्यों छोड़ा जाय? स्वामी दयानन्दजींने स्वयं ही स्वीकार किया है कि ' मुसलमानाने ईर्ष्यासे ही ये अर्थ किये हैं ', तव क्या वे माननीय हो जायेंगे? वे ही ' संस्कृतभाषा ' को ईर्ष्यासे ' जिन्नभाषा ' कहते हैं, जैसे कि प्रथम ' सत्यार्थप्रकाश ' २५० पृ ० में स्वामीजी लिख गये हैं । तब क्या संस्कृत भाषाको ही हमलोग छोड़ दें? हमें यह चिन्ता छोड़ देनी चाहिए कि कइयों ने इसका घृणित अर्थ किया है । घृणित श्रथं किया हो. किन्होंने इसका, पर इस नामकी उत्पत्ति घृणाके कारण नहीं हुई । इसकी उत्पत्ति सिन्धुदेशोत्पत्ति के कारण हुई हैं, यह कहा जा चुका है । उसके बाद हमारी वीरता से हानि प्राप्त करके प्रतीकार करने में असमर्थ हुए कई मुसलमानोंने ' अशक्तास्तत्पदं गन्तु ं ततो निन्दां प्रकुर्वते ' इस न्याय से उसका घृणित अर्थ कर दिया हो, तो इससे उस नाम की त्याज्यता नहीं हो जाती । इङ्गलैण्ड में ही एक ऐसा समय था कि जब ' इङ्गलिशमेन ' शब्दका श्रयं वहांके विजेता नार्मन जाति वालोंने घृणित कर डाला था । ' मैं तब ' इङ्गिलिशमेन ' कहाऊँ, जब मैं श्रमुक पाप इस प्रकार शपथरूपमें वे इसका प्रयोग करते थे । नार्मन जाति चालेको तभी ' इङ्गलिशमेन ' कहा जाता था, जबकि उसका अपमान करना होता था या वही किसी क्षम्य अपराधको करता था । इस प्रकार घृणा उत्पन्न करने पर भी इङ्गलैण्ड निवासियोंने अपना नाम ' इङ्गलिशमेन ' ही रखा, ' नार्मन ' नहीं । क्या नाम परिवर्तन से इङ्गलैण्ड का अपमान दूर हो जाता? क्या इङ्गलैण्ड का पराजय विजयरूप में परिणत हो जाता? कभी नहीं । ' इङ्गलिशमेन ' इस दूसरोंसे घृणास्पदीकृत भी नाम को न छोड़ने का फल यह हुआ कि श्राज वही ' इङ्गलिशमेन ' नाम इङ्गलैण्डकी कोर्तिका सूचक माना जाता है । श्राज ' नार्मन ' जाति An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) का अस्तित्व भी नहीं है । ' इङ्गलिशमेन ' नाम धारण करने वाले आज विश्व के साम्राज्य में सर्वोत्कृष्ट स्थान को प्राप्त किये हुए हैं । यह है अपने नाम को न छोड़ने का महत्त्व । पारस्परिक कलहोंमें राष्ट्रोंकी बुद्धि व्यवस्थित नहीं रहती । अपने शत्रुको कलङ्कित करनेके लिए वे सभी दुष्ट अदुष्ट उपायोंका अवलम्बन करते हैं । तब पर्शियन एवं मुसलमान आदिकोंके लिए भी स्वाभाविक था कि वे हिन्दु शब्दका घृणित अर्थं करते । क्या हमीं लोग ' जिन, मुसलमान, मुसण्डा ' आदि शब्दोंको उनसे ईर्ष्याके कारण घृणित श्रर्थोंमें प्रयुक्त नहीं करते? परन्तु क्या उन्होंने इससे अपना नाम बदल दिया? आज भी ' जिनोपासक’-अपने थापको ' जैन ' ही कहते हैं ।. वस्तुतः फारसी भाषामें भी ' हिन्दु ' शब्दका श्रर्थं तो निकृष्ट नहीं लिखा है, केवल लक्षणा से वे चोर श्रादि अर्थ में उसका प्रयोग करते हैं । ' श्रकोप ' में ' हिन्दु ' का अर्थ ' खालिस ' ' शुद्ध ' है । यहूदी लोग ' हिन्दु ' शब्दका अर्थ ' शक्तिशाली वीर पुरुष ' करते थे । प्राचीन अरव निवासी भी हमारे देश को ' हिन्द ' नामसे जानते थे, तभी उन्होंने हमारे देशसे निष्पन्न ' अङ्कगणित ' का नाम ' हिन्दसा ' रखा है । ' कुरान ' में तो ' हिन्दु ' शब्दका ही अभाव है । वहां ' काफिर ' शब्दले ' मुसल-मानधर्मविरुद्ध ' ही अभिप्रेत हैं । इस प्रकार तो उनके अनुसार श्रार्य-समाजी आदि भी काफिर हैं । क्या इससे वे अपना नाम या धर्म छोड़ देंगे? " बहारे श्राजम लुगात ' में ' हिन्दु ' शब्द हिन्दुस्थानवासियों में भी प्रयुक्त है । उससे भी प्राचीन लुगातकार ' खाने श्रारजू ' कहता है- ' हिन्दु एक विशिष्ट जाति है । ' ' फरहङ्ग लुगात ' में भी ' हिन्दु ' शब्द जातिबोधक स्वीकृत किया गया है ' गयासुल लुगात ' में भी ' हिन्दु ' शब्द ' हिन्दुस्तान - वासियों ' में स्वीकृत किया गया है । प्राचीन ' वेबिलां-‘ निया ' निवासियोंके साहित्य में ' हिन्दु ' शब्द ' हिन्दुराष्ट्रवासियों ' में प्रयुक्त हैं, अपमानसूचक अर्थ में नहीं । CC - 0. Ankur Joshi Collection हिंदु शब्द का महाभाष्य ६६ ३५ अथवा उनके कोषमें हमारे शब्दोंका यदि निन्दित श्र लिखा गया है, तो उसका त्याग बुद्धिमत्ता नहीं है । ' दस्त ' गर हमारी भाषा में ' दस्त ' ( विरेचन ) वाचक है, अतः घृणित है, पर उ ३६ भाषामें ' हाथ ' बाचक है । वे हमारी भाषामें ' दस्त ' शब्दका निम्ति कृण्वन्त मन्त्र से अर्ध होने पर भी उसका त्याग नहीं करते । उसी दृढताके फलस्वर चाहिए ' हिन्दुओं में भी ' दस्त ' शब्द ' दस्तखत ' शब्दरूप में प्रचलित हो गया । जातिपर ' पर आपलोग ' हिन्दु ' इस अपने शब्दको भी छोड़ रहे हैं, उसका अपने प भी वैसा हो रहा है । अब दूसरे लोग हमें या आपको ' हिन्दु ' श हुआ क अनुक्रम वा ' आर्य ' शब्दसे न कहकर ' नान मुहम्मंडन ', ' नान मुसलि ' मुसलिम ' शब्द से पुकारते हैं । श्रौरों को छोड़ दीजिये, हमसे ऋषिः का थ ' हिन्दु ' शब्द छूट रहा है । ' सिख ' ' हिन्दु ' नाम नहीं लिखाते, इ मण्डल प्रकार ' जैनी ' आदि भी । यही अपने शब्दको छोड़ देनेका एवं शिति होना च लता का परिणाम है, जो कैसे खेदका विषय है? यदि हिन्दु श में भी घृणापरक होता; तो पृथिवीराज, जयसिंह आदि श्रभिमानी वीर राव " श्रोषध संकेत इस नामको गौरवसे न लेते । देखिये - ' पृथिवीराजरासो ' श्रादिमें उस से ' ए प्रयोग । परन्तु वे गौरवसे उस नामको लेते थे, तब वादियोंकी अ' एते स उक्ति ठीक नहीं । श्रन्यथा हमने उनसे प्रयुक्त और घृणित ' काफि प्राप्तव्यं, शब्द ही क्यों नहीं स्वीकृत कर लिया, जिसे उन्होंने हमारे लिये प्रयु शब्द ज किया था? क्यों नहीं हमने उससे अपना गौरव माना? इससे पा सायणा है कि हिन्दु शब्द हमारा ही हैं । मुसलमानों की चाहे उसमें अप्तुरः कुर्वन्तः हो, परन्तु हमारे पूर्वज उस नामका राष्ट्रिय महत्व तथा उसकी श्रादि -. श्रागच्छ मना जानते थे, इसीलिए उसका प्रयोग करते थे । Gujarat. An eGangotri Initiative

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-श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) ३६ ' कृण्वन्तो विश्वमार्यम् ' ३६ जो अपने आपको ‘ श्रार्य ' मानने वाले ' इन्द्र ं ' वर्धन्तो अप्तुरः पर उन कृण्वन्तो विश्वमार्यम् । अपध्नन्तो अराव्णः ' ( ऋ ० ६ / ६३।५ ) इल नि मन्त्र से सारे जगत्‌को श्रार्य बनानेका स्वप्न देखते हैं, उन्हें यह जानना फलस्वर ' चाहिए कि यहां पर ' चार्य ' शब्द श्रेष्टका वाचक है, जातिपरक नहीं । जातिपरक अर्थ करने वाले व्यक्ति ' ऋग्वेद ' का कोई भी प्राचीन भाष्य गया अपने पक्ष के समर्थन में दिखलायें । वेदके अर्थ देवतावाद के अनुसार सका हुआ करते हैं. स्वेच्छानुसार नहीं । ' देवता ' यह वर्ण्य विषयका ही न्दु ' शः अनुक्रमणिका के अनुसार पारिभाषिक नाम होता है । जैसे कि मुसलिम ' वृहदेवता ' में लिखा है- ' संवादेप्वाह वाक्यं यः स तु तस्मिन् भवेद्... ऋषिः । यस्तेनोच्येत वाक्येन देवता तत्र सा भवेत् ( २० ) वेदमन्त्रों हमसे का अर्थ देवता के अनुसार हुआ करता है । इस मन्त्रका, प्रत्युत सारे खाते, मण्डलका पवमान सोम देवता है । तब यहां पर वर्णन भी उसीका एवं शिरि होना चाहिए । इस मण्डलमें ' सोम ' बहुवचनमें भी श्राया हैं, एकवचन हन्दु शब में भी । कहीं सोमशब्द सोमाभिमानी देवताका वाचक है, जिसका ' श्रोषधयः संवदन्ते सोमेन सह राज्ञा ' ( ऋ ० १०/१७/२२ ) इस मन्त्र में वीर राव

संकेत श्राया है, कहीं सोमरसका वाचक है । इस मन्त्रमें ऋ ० ६१ ६३॥४

दमें उस से ' एते सोमाः ' की अनुवृत्ति चल रही है । तब यह अर्थ हुआ कि बोंकी ' एते सोमाभिमानिदेवाः, विश्वं सर्वं सोमम् श्रार्य श्रेष्ठं श्रस्माभिर्द्विजैः ' काफि प्राप्तव्यं,. यज्ञोपयुक्त कुर्वन्तः श्रभ्यर्षन्ति प्राप्नुवन्ति । ' यहां पर ' आर्य ' ये प्रयु शब्द जातिवाचक नहीं, क्योंकि वैसा कोई प्रकरण नहीं । इसलिए इससे सा सायणाचार्यने उक्त सम्पूर्ण मन्त्रका यह अर्थ क्रिया है— ' इन्द्र ं वर्धयन्तः, अप्तुरः- उदकस्य प्रेरकाः, विश्वं सोमम् श्रस्मदीयकर्मार्थम् श्रार्य भट्ट सर कुर्वन्तः श्रव्णः श्रदातृन् श्रपघ्नन्तः विनाशयन्तः, अभ्यर्षन्ति की आगच्छन्ति । ' उक्त मन्त्र में ' विश्व ' शब्दका ' सोम ' से सम्बन्ध करनेमें CC - 0. Ankur Joshi Collection हिन्दु शब्द शब् का महाभाष्य ६७ कारण यह है कि वह सोम विश्वरूप है । ' विश्वचर्मेणिः ' ( ऋ ८ हारि ) यही उसे विद्वष्टा, ' वस्त्र · विश्वचणे ॥ ४६६१ ) यहां उसे सर्वव्यापी ' या होनेसे सर्वद्रष्टा, ' विश्वजित् सोम! ( | ( 1 ) ' विश्वायुः ' ६४१ ) यहाँ उसे ' विश्वजित् तया सर्वगन्ता ' विश्वदेवः ’ CURE, ३४ IIIII ) यहाँ सोम सर्वदेवामें उपगत वा व्यापक दीप्तियुक्त स्वीकृत किया गया है । इसीलिए उसे उक्त मन्त्रमें भी ' विश्व ' शब्दसे कहा गया है; अतः सायणकृत अर्थ ठीक ही है । तब देवतावाद से विरुद्ध अर्थ करते हुए वादी निरस्त हो गये । जमे व्यक्ति उक्त मन्त्रसे, सारे संसारको श्रार्य बनानेका स्वप्न देखते हैं; वे तो वैदिक ज्ञान - शून्य हैं । वे श्रनार्यो को श्रार्य कैसे बना सकते हैं? यदि उक्त मन्त्र से वैसा माना जाय, तो यह ठीक नहीं । उक्त मन्त्रका ठीक तथा प्राकरणिक अर्थ हमने दिखला ही दिया है, इधर हम पहले बता धाये हैं कि ' आर्य ' शब्द समस्त हिन्दुवाचक नहीं, किन्तु ब्राह्मण - क्षत्रियवाचक है । अधिकसे अधिक त्रैवर्णिक - वाचक है । चतुर्थ शूद्रवर्ण तथा पञ्चम प्रवर्ण ये वेदानुसार आर्य नहीं, किन्तु दास एवं दस्यु हैं । दास या दस्युको चार्य बनाना वेदसम्मत नहीं, किन्तु वेद-' बिरुद्धं है । तभी ' ऋग्वेद ' में कहा है- ' न यो ररे श्रायै नाम दस्यवे ' .. ( शा ० सं ० १० | ४६ | ३ ) ' दस्यवे श्रनार्याय, शूद्धनिषादादिकाय अहम्-इन्द्र श्रार्ये नाम, न ररे — न दत्तवान् । ' तब फिर ' कृण्वन्तो विश्वमार्यम् ' इसका ' सारे जगत् को थार्य बनाते हुए ' यह अर्थ करना वेदविरुद्ध है । ' यया दासानि श्रार्याणि वृत्राकरो: ' ( ऋ ० ६।२२।१० ) इस मन्त्रसे भी हमारे पक्षका विरोध नहीं है, जैसे कि कई इससे दासोंका श्रार्य वनांना सिद्ध करते हैं, यहां ' दासानि ', ' आर्याणि ये पद नपुंसक -लिङ्गान्त हैं, इसलिए यहां शूट्टजाति या श्रर्थजाति अर्थ नहीं है, किन्तु. यहाँ यौगिक ही अर्थ है । इसीलिए यहां सायणाचार्यने अर्थ लिखा Gujarat. An eGangotri Initiative

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-श्रीसनातन धर्मालोकः ( ४ ) रुप है- ' हे इन्द्र! स्वस्तिं देमलक्षणां सम्पदं नो— अस्मभ्यमाभर, तया स्वस्त्या, दासानि कर्महीनानि मनुष्यजातानि श्रार्याणि कर्मयुक्तानि अकरो., नाहुषाणि मनुष्यसम्बन्धीनि वृत्राणि शत्रून् शोभन हिंसोपेवानि करोः । ' नपुंसकलिङ्गवाला श्रार्य शब्द हमारी जातिका नाम नहीं है, यहां पर ‘ अमित्रान् दासा वृत्राणि आर्या च शूर! वधीः ' ( ऋ ० ६।३३।२ ) यह मन्त्र भी साक्षी है । यहां आर्योंका भी वध ( मारना ) कहा है । वस्तुतः एतदादि स्थलमें यौगिकरूपसे अर्थ है । इसीलिए सायणाचार्यने लिखा है — ' हे इन्द्र! तान् उभयविधान् शत्रून् श्रहिंसीः, दासान्-उपक्षयितृन् बलप्रभृतीन् श्रसुरान् श्रार्याणि कर्मानुष्ठातृत्वेन श्रेष्ठानि वृत्राणि - श्रावरकाणि विश्वरूपादीनि च हे शूर! त्वं हतवान् । ' इसी प्रकार ' आर्या विशोऽवतारीदसी: ' ( ऋ ० ६।२११२ ) यहां पर भी सायणने लिखा है- ' हे इन्द्र! श्राभिरस्मदीयाभि: स्तुतिभिः दासीः-कर्मणामुपक्षयित्रोः, विश्वाः सर्वा विशः प्रजाः, श्रार्याय - यज्ञादिकर्मकृते यजमानाय अवतारीः - विनाशय ' इससे स्पष्ट है कि कहीं दास, श्रादिशब्द यौगिक हैं, विश्वरूप श्रादि दैत्योंके लिए प्रयुक्त किये गये हैं, जिन्हें इन्द्रने मारा था! कहीं योगरूढ भी हैं । फलतः दस्यु – दास को श्रार्य बनाना वेदसे विरुद्ध है । यदि ' कृण्वन्तो विश्वमार्यम् ' का वादियोंके अनुसार यह अर्थ हो कि - ईसाई मुसलमानादि सबको ' श्रार्य ' बनाते हुए, तो यहाँ प्रश्न यह है कि वेदकालमें सभी श्रार्य थे वा श्रनार्य भी थे? यदि तब सभी धार्य थे, कोई भी अनार्य नहीं था; वो श्रायको आर्य बनाना पिष्टपेषण की तरह व्यर्थ कहा गया । यदि as अनार्य भी थे तो सृष्टिके श्रादिमें उन्हें परमात्माने ही पैदा किया, या वे पीछे हुए? यदि परमात्माने ही बनाये; तब उन्हें श्रार्य बनाना परमात्मासे बिल्ड है, अन्यथा वह उन्हें बनाता ही नहीं । यदि वे पीछे अनार्य होगये; तो वेदमें उनका वर्णन कैसे? क्या बाड़ी बेदमें भविष्यका इतिहास भी मानते हैं । हिंदु शब्द का महाभाष्य -इसी तरह ' विजानीहि श्रर्थान्, ये च दस्यवः ' ( ऋ ० ' हवी ' दस्यून प्र - श्रार्यं वर्णमावत् ' ( ० ३।३४।६ ), यहाँ ११५११५ / पर वनाओंको झार्योंसे पृथक् ही रखना चाहता है । इससे यह स्पष्ट । श्री श्रार्यता नहीं हो सकती, अन्यथा ' कृण्वन्तो विश्वमार्यम् । मन्त्र तथा उक्त मन्त्रोंका परस्पर विरोध हो जायगा । तव व्याधान जाने से वेदका ही अप्रामाण्य प्रसंक्त हो जायगा । ' हिन्दु ' शब्द अवेदिक ( १ ) ३७ कई आर्यसमाजी यादि कहते हैं कि ' यद्यपि भविष्यपुराण : कालिकादि पुराणों में ' हिन्दु ' शब्द दिखलायी देता है, पर चारों दिखायी नहीं देवा, इसलिए वह श्रप्रमाण तथा व्यवहार्थ है । पर यह जानना चाहिए कि वेदमें तो परमात्मा के ' सच्चिदानन्द, सं निराकार, सर्वव्यापक, अजन्मा, सर्वशक्तिमान्, न्यायकारी, दयाह सृष्टिकर्ता, सृष्टिर्ता, सृष्टिहर्ता, इत्यादि स्वामी दयानन्दजी के ' स्वमन व्यामन्तव्यप्रकाश ' ( प्रथम संख्या ) में कहे हुए तथा ' सत्यार्थप्रकाएं ( प्रथम समुल्लास ) में कहे हुए परमात्मा के नामोंमें भी कई ' परमेश . गणेश, श्रन्तर्यामी, भौम, शनैश्चर ' आदि नाम भी नहीं ' श्राते । यह इनका बहिष्कार क्यों नहीं किया जाता? उनके माने हुए वेदमें की समाज, गुरुकुल, संन्यास ( देखो श्रार्यमित्र ६६६/४६ | पृ ० ७ संन्यास चेदोंमें पता नहीं है ) दयानन्द, डी. ए. वी. कालेज आदि नाम " शा P क्या नहीं था, तब इनका बहिष्कार क्यों नहीं किया जाता? क्यों ' श्र समाजी अपना नाम संन्यासी रखते हैं? क्या यह स्वार्थं नहीं? कोई .CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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१०० श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) अर्वाचीन ' हरिजन ' शब्द ३८ जो लोग ' हिन्दु ' शब्दको अर्वाचीन वतलाकर ' हिन्दु ' शब्दक प्रयोगमै सङ्कुचित होते हैं, वे श्राजकल गांधीजी से प्रवर्तित ' हरिजन ' इस ब्रागढाल - स्थानापञ्च शब्द के प्रयोग में सचिव क्यों नहीं होते? क्या वेदमें उनके लिए ' हरिजन ' शब्द प्रयुक्त है? क्या यह अर्वाचीनतम ' नहीं? जब ' भङ्ग ' ' यादिकाकी ' चाण्डाल ' संज्ञा वैदिक है, स्वामी दयानन्दजी भी जब इसीको स्वीकार करते हैं, तब उसके लिखनेमें ही उन्हें क्या सङ्कोच है? वास्तवमें ये लोग स्वेच्छाधर्मी हैं । जो लोग कहते है कि ' निम्बाकवतनिर्णय " के १४ वे पृष्ठको पञ्चम पंक्तिमें लिखा - " कृष्णोत्सवसमायातान् दृष्ट्या हरिजनान् वचचित् । नैव कार्याशुचेः शृङ्का पुण्यास्ते भक्तिसंयुताः ' ( १५७ ), सर्वे विप्रसमा ज्ञेयाः खपचाया न संशयः । ये कुर्वन्ति दिने विष्णोर्जागर गीतकीर्तनम् ' ( १५८ ) यहाँ श्र्वपच ( चाण्डाल ) श्रादिक्रोंकी ' हरिजन ' संज्ञा कही है । यह बात ' देहलीके ‘ बिड़ला - मन्दिर ' के बाहर दीवार पर लिखी है ) । परन्तु यह ठीक नहीं है । यहां ' हरिजनाः ' यह शब्द हरिके भक्त — ब्राह्मणादि - के लिए आया है । जो कृष्णोत्सव में श्रा जाय उनमें कोई अस्नात होनेसे अशुद्ध हो या सूतकाशुद्धियुक्त हो, तो वहां इस बातका विचार न करना चाहिए । यहाँ अत्यजों का कोई वर्णन नहीं है । दूसरा पद्य स्वतन्त्र है । ' तत्र ये श्वपचाद्या: विष्णोः कीर्तनं कुर्वन्ति ते विप्रसमा ज्ञयाः ' hasi raata नामकीर्तन करने पर श्रर्थवाद से विप्रसम कहा है । नाम-कीर्तनमें सब समान अधिकारी हैं, यह इसका हृदय है । यहाँ उन ' श्वपचों ' की ' हरिजन ' यह विशिष्ट संज्ञा नहीं कही गयी । इसमें शास्त्रान्तरोंका व्याकोप भी है, लोर्काविरुद्धता भी, क्योंकि ' हरिजन ' क्या केवल चाण्डालोंका ही नाम हो सकता है? क्या विष्णुके जन ' श्रन्यज ' ही हो सकते हैं, शेष चार वर्ण नहीं? अन्त्यजोंके हरिजननमें कोई विनिगमक नहीं । इधर ' निम्बार्क निर्णय ' निम्बार्कमत वालोंका CC - 0. Ankur Joshi Collection हिन्दु शब्द का महामाध्य १०१ ऐकदेशिक ग्रन्य है । न तो वह लोकव्यवहार - व्यवस्थापक स्मृति है,. न ही सार्वदेशिक, सार्वकालिक, सर्वसम्प्रतिपन्न ग्रन्थ है । यदि ‘ हरिजन ' यह अन्त्यजोंका नाम सर्वशास्त्रमान्य होता, तो वेदों, स्मृतियों, पुराणोंमें उनके लिए वैसा प्रयोग होता, परन्तु नहीं है । तब ऐकदेशिक ग्रन्यविशेषके बलसे उनका यह शास्त्रीय नाम कदापि नहीं हो सकता । वैष्णवोंके ग्रन्थ भी प्रायः ऐकदेशिक ही हैं, उनमें भक्तिमार्ने को मस्तीमें कहीं शास्त्रीय मर्यादाएँ भी तोड़ दी गयी है । पर यह अनिष्ट है ' । ' और फिर ' हरिजन ' यह शब्द अन्त्यजाके लिए ही होतो, वो द्वितीय पद्यमें ' श्वपचाद्याः ' यह शब्द न होकर ' हरिजनाः " " होता । ऐसा न होना सिद्ध कर रहा है कि हरिजन उनका नाम नहीं, किन्तु हरिभक्तमात्रका नाम है । गांधीजी द्वारा अन्त्यजोंका उक्त नाम कह देनेसे अब द्विजलोग अपने श्रापको ' हरिजन ' कहते सकुचाते हैं, यह लौकिक हानि भी बहुत हुई है । कई आक्षेप ३१ ( क ) प्रसक्तांनुप्रसक्त यह बात कही गयी है । अब पाठक प्रकरण पर आयें | हम पहले सिद्ध कर चुके हैं कि वेदमें हमारी जाति का नाम ' सिन्धु ' बहुत स्थलोंमें थाता है, दसीका विपरिणाम ' हिन्दु ' है, वह दिंपरिणाम भी प्राचीन, वैदिक, सांस्कृतिक, प्राकृतिक एवं देश मी है । तब ‘ हिन्दु ' शब्दको वैदिकता भी सिद्ध हो गई । कई लोग इस पर यह आक्षेप करते हैं कि ' यदि ' सिन्धु ' शब्द अपभ्रंशसे ' हिन्दु ' शब्द निष्पन्न है, तो उसका सर्वव्यापी प्रयोग नहीं हो सकता, क्योंकि अपभ्रष्ट शब्द सार्वत्रिक नहीं होते । जैसे - गोशब्दको अपभ्रंश किसी. देशमें ' गावी ' प्रसिद्ध है, कहीं ' गोणी ' तथा कहीं ' ' गोपोतलिका ' । इनका प्रयोग सार्वत्रिक नहीं । परन्तु ' हिन्दु ' शब्द ऐसा नहीं । इसको सब इसी रूपमें बोलते हैं, अत: ' अपभ्रंश ' पक्ष ठीक नहीं । ' इस पर Gujarat. An eGangotri Initiative

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६०२ श्रीसनातनधर्मालोकः ४ ) हमारा उत्तर यह है कि यह द्यावश्यक नहीं कि अपभ्रष्ट शब्द सर्वत्र प्रचलित न हों ।. देखिये - प्राकृत भाषा भी तो संस्कृतसे अपभ्रष्ट हुई भाषा है । परन्तु उसका प्रयोग सर्वत्र समान रूपसे होता है । अथवा इसमें भी शौरसेनी, मागधी यादि भेद भले ही पढ़ जय, पर मुख्य शब्दोंका उच्चारण उनमें भी प्रायः समान होता है । अथवा संस्कृतसे अपभ्रष्ट हिन्दी भाषाको ही ले लीजिये । यदि इसका प्रचार उत्तरोत्तर बढ़ता जाय, तब ' गौ ' का प्रपत्र ' श ' गाय ' सर्वत्र प्रचलित हो जाय । इसका अन्य उदाहरण भी ले लीजिये - विरोचनके पिता हिरण्यकशिपु के पुत्रका ' प्रहाद ' इस प्रकार रेफघटित मूल नाम है । परन्तु अप-भ्रंशवश उसका विपरिणाम ' प्रहलाद ' इस प्रकार लकारघटित रूप में हो गया है, यहाँ तक कि लोग उसके रेफर्घाटत मूल नामको ही भूल गये! इस प्रकार वेनके लड़केका नाम वेदमें ' पृथी ' मिलता है, परन्तु उसका विपरिणाम पुराणोंमें ' पृथु ' मिलता है और वह सर्वत्र प्रचलित हो गया है । इस प्रकार ' सिन्धु ' के विपरिणाम ' हिन्दु ' शब्दके विषय में भी जान लेना चाहिए । इसका इस प्रकार प्रचार हो गया कि लोग इसके मूलभूत ‘ सिन्धु ' शब्दको भी भूल गये । ( ख ) कई लोग कहते हैं कि ' औणादिक प्रत्यय किया ' डिंया, ' डोलना, डुल्क । ' मा ' धातुसे साध लिया ' मिया, मोलना, मुल्क ' इस प्रकारकी उणादि व्युत्पत्तियां श्राहत नहीं की जातीं । इस पर जानना चाहिए कि इससे उणादि प्रत्ययों का बाहुल्य ही सूचित होता है, उपहास . वा अनादर नहीं । उपहास वा श्रनादर भी निर्मूल शब्दोंका सूचित होता है, समूलोंका नहीं । अन्यथा ' श्रमरकोप ' यादिमें उणादिसे व्युत्पादित शब्द श्रनादरणीय सिद्ध हो जांय । पर यह अनिष्ट है । ( ग ) कई यह श्राक्षेप करते हैं कि ' पहले तो आपने ' सिंधु ' का विपरि-णाम ' हिंदु ' दिखलाया है और फिर ' हिं कृएवती ' इस मन्त्र के पूर्वार्ध और CC - 0. Ankur Joshi Collection हिन्दु शब्द का महाभाष्य १० १०५ ' दु हाम् ' इसे उत्तरार्धके श्रादिम वर्णोंसे ' हिंदु ' शब्द सिद्ध किया है जन तो परस्पर विरुद्धता हो गयी ' । इस पर यह जानना चाहिए, यहा ही शब्दकीं भिन्न - भिन्न प्रकारसे भी सिद्धियों हुया करती हैं । यहाँ स ' अमरकोष ' के भिन्न - भिन्न टीकाकारोंकी समान शब्दोंकी तो भिन्न -ि सिद्धिप्रक्रिया देखनी चाहिए, अथवा एक ही टीकाकारसे की हुई एक ' प्रयोगकी ‘ यद्वा ' कहकर भिन्न - भिन्न शैलीसे की हुई सिद्धयों देख लेने ' चाहिएं । ' सुधा ' नामक ' अमरकोष ' की टीकामें ऐसा प्रकार सुलभ है । " हिंन तब जो लोग ' हिन्दु ' शब्दको मुसलमान वा फारसियोंसे दिया प्रका ' जानकर उसका अपने साथ सम्बन्ध अपने अपमानका कारण जानते है, बाह उन्हें उक्त प्रमाणोपपत्तियों को परिशीलित कर अपना आग्रह छोड़ देना चाहिए । इस नामसे कोल, भिल्ल, मङ्गोल, सिख, जैन, बौद्ध आदि लम्ब ' जातियाँ तथा चाण्डाल यादि अवर्ण जातियाँ इस महाजातिके अन्तर्गत जाती हो जाती हैं । अन्यथा जनगणना ( मदुमशुमारी ) के समय कोई अपने आपको ‘ हिन्दु ' लिखाये, कोई ' आर्य ', कोई ' सिख ', कोई ' जैन ' । इस है । प्रकार पृथक पृथक लिखवानेसे हिन्दुओंोंकी संख्याकी न्यूनता सुनका भाषा ' विधर्मी लोग उपहास करें और उनका हिन्दु जाति पर आक्रमणके संस्क लिए उत्साह बढ़ जाय — इस प्रकार ' हिन्दु ' नाम छोड़ने पर विषम भाषा दुष्फल मिल सकता है । में भी उपसंहार ४० इस प्रकार जब शूद्र, वर्ण होकर भी आर्य सिद्ध न हो सके, यह र तब श्रवर्ण य़ा वर्णसङ्कर ' यार्य ' कैसे हो सकते हैं? इस प्रकार ' आर्य ' का प्र शब्द एकदेशी सिद्ध हुआ, इसलिए वह हमारी समष्टि जातिका नाम भीं उ भी नहीं हो सकता । पर ' हिन्दु ' शब्द तो भारतीय सब जातियाँका प्रतिपादक है, श्रतएव व्यापक सिद्ध हुया । इधर वह प्राचीन या वैदिक है यह भी बतलाया जा चुका है । श्रतएव उसका ही प्रचार श्रेष्ठ है । Gujarat. An eGangotri Initiative