सनातन धर्मालोक ४ — पृष्ठ 71–80

सनातन धर्मालोक ४ · पृष्ठ 71–80

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श्रीसनातनधर्मालाकः जनगणना ( मदुमशुमारी ) के समय सभी इस जाति वालोंको ' हिन्दु ' यहाँ नाम लिखाना चाहिए | श्रार्यसमाजी तो ' हिन्दु ' शब्दको सनातन-धर्मियोंमें रूढ़ मानकर उस भयसे ही कि ' हमने भी यदि ऐसा किया, तो हमें भी हिन्दुओंके सिद्धान्त स्वीकार करने पड़ जायेंगे ' इस ' हिन्दु ' शब्दका बहिष्कार करते हैं और आर्यसमाजको उन्नति दिखलाने के लिए ' आर्य ' शब्दको प्रसारित करनेमें, उत्सुक रहते हैं । यही वास्तविक रहस्य है कि वे बहुत तरहकी युक्तियोंसे ' हिन्दु ' शब्दको हटाना चाहते हैं । वे उक्त रहस्यको स्पष्ट रूपसे तो प्रकाशित नहीं करते, किन्तु श्रपने हृदय के भीतर छिपाकर रखते हैं । बाहरसे तो ' हिन्दु ' शब्दको वैदेशिक सिद्ध करनेमें बहुत बल लगाते हैं । वास्तवमें उनको उक्त भय छोड़ देना चाहिए और उदारता श्रव्-लम्बन करनी चाहिए, सङ्कीर्णताको हटा देना ही उचित है । थ जातीय ' हिन्दु ' नामके लिए स्वार्थका त्याग कर देना चाहिए ।. फलतः हमारे देशका नाम ' हिन्दु ' है, उसीका अपभ्रंश ' हिन्द ’ है । हमारी जातिका नाम भी देशके अनुसार ' हिन्दु ', है । हमारी भाषाका नाम हिन्दी भाषा है । स्वामी दयानन्दजीने वो ' प्रथम-संस्कारविधि ' ( सं ० १३३२-३३ ) में इस हिन्दी भाषाका नाम ' प्राकृत भाषा ' रखा था, ' आर्यभाषा ' नहीं । इस प्रकार ' ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका ' में भी । फलतः सब पुरुषोंको स्वस्वार्थ त्यागकर अपना जातीय नाम ' हिन्दु ' यह रखनी चाहिए । सब हिन्दु पुरुषोंको जनगणना · समय में इसी नाम का प्रयोग लिखानेके लिए प्रेरणा करनी चाहिए, जिससे ' हिन्दुस्थान ' भीं उसीको सम्पत्ति सिद्ध हो । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. ( ४ ) वेद - विषयमें भारी भूल ' हिन्दुशब्द ' तथा हिन्दु धर्मका विवेचन करके अव हिन्दु धर्मके मुख्य ग्रन्थ वेदके स्वरूपके विषय में कुछ विवेचना दी जाती है । श्राज वैदके विषयमें लोगों की बड़ी श्रद्धा है । वेदके नामका बड़ा प्रचार है । श्राज पढ़ा - लिखा साधारण भी पुरुष दूसरेके सिद्धान्तकी प्रामाणिकताके लिए पहले यहीं पूछता है कि इस सिद्धान्तको वेदसे दिखायो । थपनें सिद्धान्तको प्रामाणिकतामें वह यही हेतु बताता है कि यह वेदमें है, चाहे उसने वेद अपनी आंखोंसे न भी देखे हों । पर आज वेद विषय में भारी भूल की जा रही है । ' ऋग्वेद संहिता, यजुर्वेद संहिता, साम-वेद संहिता, अथर्ववेद संहिता ' इस नामसे मिलने वाली चार पुस्तकोंको ' ही केवल आज ' चार वेद ' बताया जा रहा है, तथा ं समझा जा रहा है । बहुतसे विद्वानोंमें भी यह भारी श्रम विद्यमान है । जबकि वैद् को अपना श्राधारभूत मानने वाले विद्वानोंकी यह दशा है, तब तटस्यों को यह भ्रम न रहे — यह अस्वाभाविक बात है । आज उसी भ्रमको दूर करनेके लिए हम निम्न पंक्तियां लिखते हैं । वेद - श्रद्धालु लोग पाणिनि, कात्यायन, पतञ्जलि, यास्क श्रादियोंको को प्रसिद्ध वेदज्ञ तथा अत्यन्त प्रामाणिक स्वीकार करते हैं । तव वेद-विषय में इनकी सम्मति सुतरां ग्राह्य सिद्ध होगी । उक्त व्यक्ति सनातन-धर्मी तथा श्रार्यसमाजी सभी सज्जनोंको समान रूपसे प्रामाणिक इष्ट हैं । उसमें श्रार्यसमाज अपने श्राचार्य स्वा ० दयानन्दजीको भी प्रामा-कि कोटि मानता है । आज हम इनके अनुसार वेदस्वरूप - निरूपण पाठकोंके समक्ष प्रस्तुत करते हैं । इनमें श्रार्यसमाज उक्त चार ग्रन्थोंको चार वेद मानता है, शेष ११२७ संहितात्रोंको इन्होंकी व्याख्यारूप An eGangotri Initiative

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१०६ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) • शाखा मानता है, वेद नहीं । ब्राह्राणभागको उससे भिन्न मानता है, उपनिषद् और आरण्यकोंको इनसे भी भिन्न । ऐसा बहुत विद्वानोंका भी विश्वास है । परन्तु यह मत पाणिनि श्रादिसे विरुद्ध है । वेद चार हैं - इसमें तो किसीका मतभेद नहीं । ' तीन वेद हैं ' यह प्रसिद्धि तो तीन प्रकारके ( पद्य, गद्य, गान ) मन्त्रोंके कारण है । वे तीनों प्रकारके मन्त्र चारों वेदों में हैं । उनमें पद्य ऋक है, गद्य यज्जु है, गान साम हैं । ऋग्वेद नाम ऋचाओं की प्रधानतासे, यजुर्वेद यजुकी और सामवेद सामोंकी प्रधानतासे है । अथर्ववेदमें तीनोंका साम्य है । तब एककी प्रधानता न होनेसे, मन्त्र के नामसे न होकर उसके द्रष्टा के नामसे उसका नाम ' श्रथर्वाङ्गिरोवेद वा अथर्ववेद प्रसिद्ध हैं । हम इस निबन्धमें यह सिद्ध करेंगे कि श्राजकल मिलने वाले ऋग्वेद संहिता, यजुर्वेद संहिता, सामवेद संहिता, अथर्ववेद संहिता ' यही केवल चार वेद नहीं है, किन्तु ये चारों वेदोंकी एक - एक संहिता हैं, चारों वेद तो ११३१ संहिताओं, इतने ही ब्राह्मण ग्रन्थों तथा इतने हो उपनिषद् एवम् आरण्यकीमें जाकर परिनिष्टि होते हैं । पर श्रार्य-समाजी विद्वान् तथा अन्य भी यह मानते हैं कि आजकल मिलने चाले ' ऋग्वेद संहिता आदि चार ग्रन्थ चार वेद हैं । ये पूर्ण हैं । न इनमें कुछ न्यूनता है, न प्रक्षिप्तता है । अस्तु, इस मतको सत्यता वा असत्यता अन्तिम अनुसन्धानसे स्वयं सिद्ध हो जाएगी । वेद- विषय में वास्तविकता यह है कि-- ११३१ संहिताएं तथा ब्राह्मण मिलकर ही पूर्ण चार वेद हैं । जिस प्रकार ' वेद ' ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवम् श्रथर्ववेदसें पृथक् कोई स्वतन्त्र पुस्तक नहीं . मिलती, क्योंकि - इन चारोंका समुदाय ही वेद है, वैसे ही चार बंद भी ११३१ संहिताधों वा ब्राह्मणोंसे पृथक् स्वतन्त्र चार पुस्तकोंके रूपमें नहीं मिलते, अर्थात् सभी ११३१ संहिताद्योंको मिलाकर ही चार वेद CC - 0. Ankur Joshi Collection वेद - विषयमें भारी भूल श्रदिसे होते हैं । श्राजकल जो चार वेद माने जाते हैं, वे चारों वेदाकी ध्वनि एक संहिता है । जिसे आज ‘ ऋग्वेद संहिता ' कहा जाता है, यह अलग की ' शाकल - संहिता ' है । श्राजको ' यजुर्वेद संहिता ' शुकुयजु श्रादिसे ‘ वाजसनेयी - संहिता ' है । श्राजकी ' सामवेद संहिता ' सामवेदी कसी अ संहिता ' है । श्राजकी ' अथर्ववेद संहिता ' अथर्ववेदको ' शौनक संपताल है । यजुर्वेदके विषय में इतना और याद रखना चाहिए कि यह · शुक्ल यजुर्वेद तथा कृष्ण यजुर्वेद ये दो भेद हैं । पर इससे वेद । के भी ह नहीं हो जाते; एकके दो भाग कल्पित करने पर वह एक वास्तवमें दिये होत नहीं हो जाता; किन्तु दो भागों वाला हो वह पूर्ण एक बन जाता हुआ । पस्पशाहि वेदी १:३१ सहिताएँ हैं, इस प्रसग में महाभाष्यकार श्री का यह प्रसिद्ध वचन ' महाभाष्य ' के पस्पशाह्निक में मिलता है- संहिता सकता ह - शतम् ( १०१ ) श्रध्वर्यु ' ( यजुर्वेद ) शाखाः, सहस्रवर्मा साम ( १००० ), एकविंशतिधा ( २१ ) बाह्वृच्यम् ( ऋग्वेदः ) । नवधा इस प्रमाण उ प्राथर्वणोवेदः, । यहाँ पर चारों वेदोंकी १०१ + १००० + २१ + मैं निरूपि ११३१ शाखाएँ स्वीकृत की गई हैं । इनमें यजुर्वेदको ६ सभी सन · संहिताएँ तथा १५ शुक्ल संहिताएँ मिलाकर ही १०१ संख्या हुए सभी गई है — यह बात नहीं भूलनी चाहिए । स्वा ० दयानन्दजीने ' श्रार्यसमा - लाङ्कचन्द्र ' (.१६३८ वि ० ) संवत् में अपने बनाए ' नामिक ' पुल देते हैं । चतुर्थ पृष्ठमें उक्त भाध्यवचनका अर्थ इस प्रकार किया है— एवं अर्थक " एक व्याख्यानयुक्त यजुः, हजार व्याख्यानयुक्त साम, इक्कीस व्यास युक्त ऋक्, नव व्याख्यानयुक्त अथर्ववेद ' । इस अर्थ में भी के वेदक - संहिताएँ ११३१ सिद्ध होती है । इनमें चार वर्तमान संहिताएं ' वार्तिक ' ' काशिका अन्तर्भूत हो जाती हैं । पृथक् सिद्ध नहीं होतीं । समा श्रलङ्कार शास्त्रमें ध्वनिके सामान्यतया ५१ भेद होते हैं, पर ' ध्वनि ' यह भेद अविवक्षितवाच्य इत्यादि भेद अर्थान्तर - संक्रमित Gujarat. An eGangotri Initiative

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१०८ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) आदिसे पृथक गणनीय नहीं होते, किन्तु अपने सभी भेदोंको समष्टि हीँ ध्वनि होती है; परन्तु श्राजकल जो कि आर्यसमाज चार वेदोक यह अलग और ११२७ शाखावेदोंको पृथक मानता है, यह मत श्रीपत क्षति कुप श्रादिसे विरुद्ध ही है । न तो श्रीपतञ्जलिने ऐसा कहीं कहा है; न ही दवी किसी अन्य प्राचीनने । उसका प्रमाण यही है कि पाणिनि, कात्यायन, निक र पतञ्जलि, यास्क श्रादि वेदका नाम लेकर जिन प्रमाणोंकी उद्धृत करते कि यजुवे, वे केवल इन वर्तमान चार ग्रन्थोंके नहीं होते, किन्तु अन्य संहितार्थी से वेद । के भी होते हैं, ब्राह्मण भाग वा तदन्तर्गत उपनिषद् - श्रारण्यकसे भी स्तवमें दिये होते हैं I । तब इनके मत में यह सारा समुदाय ' वेद ' पद वाच्य जाता हुआ । हां, ' समुदायेषु हि शब्दाः प्रवृत्ता श्रवयवेष्वपि ' वर्तन्ते ' इस पस्पशाह्निक स्थित महाभाष्यके वचनसे सब संहिताओं में किसी भी एक श्रीपत संहिता का प्रमाण ' वेद ' नामसे वा ' ऋग्वेदादिके नामसे दिया न सकता है । साम नवधा इस निबन्धको विस्तीर्ण न करते हुए हम उक्त मुनियोंके कई प्रमाणे उपस्थित करते हैं । विस्तीर्ण रूपसे इस विषयको अग्रिम भागों - २१-1 मैं निरूपित करेंगे । पाणिनि, काव्यायन, पतन्जलि, यास्क यादियोंको संख्या सभी सनातनधर्मी तथा स्वा ० दयानन्दजीसे लेकर आज तक उत्पन्न हुए सभी श्रार्यसमाजी समतासे प्रमाण मानते हैं । स्वा ० दयानन्दजीको जीने कार्यसमाजी प्रमाण मानते ही हैं । हम उनके भी इस विषप्रमें प्रमाण क ' पुल देते हैं । इससे यह सिद्ध हुआ कि - वेद ११३१ संहिताओं तथा शब्द है - एक एवं का नित्यसम्बन्ध होनेसे उतने ही ' ब्राह्मणों ' में पूर्ण होता है । स व्याख भी के वेदके प्रयोग श्रीपाणिनिने अपनी ' अष्टाध्यायी ' में, श्री कात्यायनने = संहिताएं ' वार्तिक ' में, श्रीपतञ्जलिने महाभाष्य में, श्रीजयादित्यने अपनी ‘ काशिका ' में तथा श्रीभट्टोजिदीक्षितने अपनी, ' सिद्धान्तकौमुदी ' में एवं श्रीर्यसमाज के श्राचार्य स्वादयानन्दजीने नामिक, श्राख्यातिक, सामासिक-है, पर संक्रमित CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat: वेद- विषयमें भारी भूल " 51 अध्ययार्थ भाग आदि अपनी पुस्तकोंमें उद्धृत किए हैं । इस प्रकार श्रीआइ को वेद मन्त्रों के प्रमाण अपने, ' निरुक्त ' में दिखलाए है । वेद प्रयोग यदि वर्तमान में प्रसिद्ध. चार वेदप्रन्या में न मिलें, तो सिद्ध हो जाएगा कि ये वेदके वर्तमान चार 74 ग्रन्थ ही वेदको चरमसीमा नहीं हैं, किन्तु वेद इनसे अधिक है । । यदि प्रयोग वर्तमान चार संहिताओं से भिन्न संहिताओं में तथा ब्राह्मण, श्रारण्यक, उपनिषदों में प्राप्त हो जाएँ, तो सिद्ध हो जाएगा कि वेदकी सीमा ११३१ संहिताएँ तथा उतने ही ब्राह्मणग्रन्थ जिसके उपनिषत् एवं आरण्यक भी अन्तर्गत हैं, है अर्थात् वेदकी पूर्णता इनमें होजाती है । अब ' विद्वान लोग निम्ने अनुसन्धानों पर ध्यान दें-( १ ) ‘ * माल्यादयश्च ' ( ७।१।४६ ) यह पाणिनिसूत्र है । इसमें " क्त्वापि छन्दसि ' ( ७ | १ | ३८ ) सूत्रसे ' छन्दसि ' की अनुवृत्ति चारही है, उक्त ' सूत्रका उदाहरण ' स्थिन्नः स्नात्वी मलादिव ' ग्रह दिया गया है । यह मन्त्र शुक्ल यजुर्वेदी कारवसंहिता ' ( २२५ ) में ' स्विनः स्नातो • मलादिव ' इस रूप में मिलता है । श्राजकल ' यजुवेद संहिता नामसे प्रख्यांत ' वाजसनेय संहिता ' ( २०/२० ) में भी उक्त मन्त्र जैसा ही है । - अथ वेदको शौनक संहिता में ' स्विन्नः स्नात्वा मलादिव ' ( ६।११२ / ३ ) रूपमें मिला है । ' स्नाची ' इस रूपमें नहीं मिला । परन्तु कृष्ण यजुर्वेदीय ' काठकसंहिता ' ( ३८५२६३ ) में ' स्विनः स्नात्वी मलादिव ' -इस पाणिनिप्रोक्त स्वरूप में मिला है । इसी प्रकार कृष्ण यजुर्वेदीय ' मैत्रायणी संहिता ' में ( ३।११।१११ ) १० ) इसी रूप में मिला है । -'तैत्तिरीय ब्राह्मण ' में ( २४४६ ) भी ' स्नाची ' मिला है । आजकल की मानी गई चार वेद पुस्तकोंनें ' स्नावी ' शब्द है ही नहीं । तब कृष्ण-यजुर्वेद्रके भी छन्द ( वेद ) सिद्ध हो जाने से आजकलका वेद - विषयक -मत भी भ्रान्त सिद्ध हुया । हमारे कहे अनुसार वेदकी सीमा ११३१ - संहिताओं तथा ब्राह्मण में परिनिष्ठित सिद्ध हुई । An eGangotri Initiative

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११० श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) पाणिनिसे प्रोक्त ' छन्द ' शब्द वेदका ही पर्यायवाचक प्रसिद्ध है । स्वा ० दयानन्दजीको भी यही अभिमत है, जैसे- ' तथा ब्याकरणेपि-' घ ' ' छन्दसि ' ' वा षपूर्णस्य निगमे ' अत्रापि छंदो - मन्त्र-निगमाः पर्यायवाचिनः सन्ति, एवं छन्दधादीना ह्य् ते, तद्वचनमप्रमाणमेवास्तीति ' ( ऋ ० भा ० भू ० छन्दो - मन्त्रयोर्भेदोस्ति; तदपि असंगतम् । कुतः श्रुतीनां पर्यायवाचकत्वात् ' ( पृ ० ७६-८० ) तब जो समाजी पण्डित छन्दको वेदसे भिन्न बताने की चेष्टा दयानन्दजी के अनुसार उनका वचन श्रप्रमाण ही है । ( २ ) ' छन्दसि निष्टर्क्स ' ( ३ | १ | १२३ ) इस ' निष्ट चिन्वीत पशुकामः ' यह वैदिक उदाहरण पर्यायसिद्धेर्यो भेदं पृ ० ८० ) ' यचोक्तं ? छंदोवेद - निगम-आजकलके आर्य-करते हैं; स्वा पाणिनिके सूत्रमें इष्ट है । स्वामी " दयानन्दजीने भी ' श्राख्यातिक ' में यही उदाहरण दिया है । परन्तु यह श्राजकलके कहे जानेवाले चारों वेदग्रन्थोंगें नहीं मिलता । बल्कि. ' निष्ट ' ' शब्द ही आजकी चारों वेद संहिताओं में नहीं मिलता । जबकि थाजके मतके अनुसार चार वेद पूर्ण हैं, न्यूनता, अधिकता, प्रक्षेप यादि से रहित हैं, तो उनमें पाणिनिके अनुसार ' निष्ट ' वैदिक-प्रयोग अवश्य मिलना चाहिए । पर जब उन पुस्तकोंमें नहीं मिलता, तब स्पष्ट है कि वेदको सीमा इन चार ग्रन्थोंसे अधिक है । उक्त शब्द कृष्णयजुर्वेदीय ' तैत्तिरीय संहिता ' ( ६।११७१२ ) में तथा ' ऐतरेयारण्यक ' ( १३ ) में मिलता है; तब श्राजकलका वेद - विषयक मत भ्रान्त सिद्ध हुआ । ( ३ ) ' बहुलं छन्दस्यमाङ् ' ( ६४।७५ ) इस पाणिनिसूत्रका कौमुदीमें ' मा वः क्षेत्रे परे वीजान्यवाप्सुः ' यह उदाहरण दिया है । ' आपस्तम्ब-धर्मसूत्र ' ( २।६।१३।६ ) बोधायनधर्मसूत्र. २ | ३ | ३६ ) में इसे उद्धृत किया गया है, पर वहां ' वाप्सुः ' पाठ है ' श्रवाप्सुः ' नहीं । यह मन्त्र वर्तमान वेद - विषयमें भारी भूल ११२ . की चार संहिताओं में नहीं मिला । किसी अन्य संहिता होगा । छन्द वेदका ही नाम है ऐसा हम पूर्व बता चुके वा ' मन्त्रभागकी सभी संहिताएं तथा ब्राह्मण वेद सिद्ध हुए । ' देवी ' भाष्यभ ( ४ ) ' षष्ठ्यर्थे चतुर्थीति वाच्यम् ' ( १३/६२ ) यह कात्यायन विषयक वार्तिक है । भाव्यकारने इसका वैदिक उदाहरण उदाह पिवति तस्यै खर्गः ' यह दिया है । स्वामी दयानन्दजीने माना उदाहरण दिया है । परन्तु यह श्राजके चारों वेदोंमें नहीं, किन्न • विषयक यजुर्वेदीय ‘ तैत्तिरीयसंहिता ' ( २२११११७ ) के ब्राह्मण भाग में है का वेद - विषयक मत नितान्त ' भ्रान्त सिद्ध हुआ । समी ब्राह्मणं वेद सिद्ध हुए । यास्कने उद्धत ( ५ · महाभाष्यकार श्रीपतञ्जलिने ३ | १ | ७ पाणिनिसूत्रके: " मीमांस ' ऋषिः ( वेदः ) पठति ते - - ' ' शृणोत ग्रावाणः ' यह वेद - मन्त्रांश उद्धृ यजुर्वेद है । पाणिनिको भी ' तप् तनम् - तनयनाश्च ' ( ७।१॥४५ ) इस मैन ( वैदिक ) सूत्रमें यही वेदमन्त्र श्रभिप्रेत हैं, पर यह शुक्ल नहीं है नहीं मिलता । उसकी ' वाजसनेयी संहिता ' में ' श्रोतर ग्रावाणः ' ( दशा है रूप में मिलता है; इसी प्रकार ' काण्वसंहिता ' ( ६३८ ) में || मां के ‘ शृणोत ’ तथा ‘ श्रोता ’ में श्रर्थभेद नहीं, तथापि शब्दभेद तो है । शह शब्द - प्रधान ही सर्व सम्मत है । ' तत्सवितुर्वरेण्यं यह गाय " तैत्तिरी इस शाब्दिक रूपमें तो वेद है - इस अर्थ में नहीं । इसीलिए क ' एनं ' च उसी का होता है, उसके अर्थका नहीं । नहीं तो विवाहादि । बेदमन्त्रोंके अनुवादसं भी कराये जाते । पर नहीं कराये जाते ॥ अनुह . कृष्णयजुर्वेदीय ' तैत्तिरीय संहिता ' ( १ | ३ | १३ । १ ) में ' शृणोत ग्रह " मैत्रायर मिला है, ‘ काठकसंहिता ' ( ३।३३ ) ' मैत्रायणीसंहिता ' ( १३४ ) i कुछ भेदसे मिला है | तब श्राजकल का बेद - विषयक मत नितान्त ( 1 ) सिद्ध हुआ । यह मन्त्र CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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SSPP ११२ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) 12 ( ६ ) ‘ महाभाष्य ' के प्रारम्भमें ' अथर्ववेद ' का आदिममन्त्र ' शं नो देवीः ' लिखा गया । स्वामी दयानन्दजीने भी अपनी ' ऋग्वेदादि-भाष्यभूमिका ' के ८६ पृष्ठमैं ' प्रथममन्त्र - प्रतीकानि वैदिकेषु कात्यायन उदाहृतानि ' इन अपने शब्दों में इसे अथर्ववेदका ' प्रथम मंत्र प्रतीक ' माना है, पर वह श्राजके ' अथर्ववेद ' का प्रथम मन्त्र नहीं; किन्तु दजीने श्रथर्ववेदीय ' पैप्पलादसंहिता ' का प्रथम मन्त्र है; तब श्राका वैद-7, किन्तु विषयक मत भ्रान्त हुआ ॥ सभी संहिताएँ वेद सिद्ध हुई ।. . ( ७ ) ‘ ओषधे! त्रायस्त्रेनं स्वधिते! मैनहि ँ सो ' इस मन्त्रको सभी यास्कने वेदके मन्त्र - भाग के सार्थक्य प्रकरण में ' निरुक्त ' ( १।१ शु ६ ) में उद्धृत किया है । इस प्रकार ‘ अचेतनं श्रर्थबन्धनात् ' ( १।२ ३२ ) इस ~ सूत्रके ‘ मीमांसादर्शन ' के सूत्रभाष्यमें भी यही उद्धृत किया गया है । शुक्ल-यजुर्वेदीय ' काण्वसंहिता ' ( ४।२ ) श्रादिमें ' श्रोषधे । त्रायस्व स्वंधिते! मैनहि " सौः " इतना मिला है । यहाँ ' त्रायस्व ' के साथ ' ' एनं ’ क्ल यह नहीं है । शुक्लयजुर्वेदीय ' वाजसनेयी संहिता ' ( ४।१ ) श्रादिमें भी यही चाणः ' ( { दशा है । पर ' निरुक्त ' में ' त्रायस्व ' के साथ भी ' एन ' " है, ' स्वधिते! = ) में । ' ' मा ' के साथ भी ' एनम् ' है । कृष्णयजुर्वेदीय ' मैत्रायणी संहिता ' ( २२, द तो है । शह ०, ११२ ११०, ३।६।३ ) तथा ' काठकसंहिता ' ( श २ | हे? तथा गायत्री ' तैत्तिरीयसंहिता ' ( १।२1१1१, १३/१४ ) श्रादिमें निस्क्तानुसार दो लिए क ' एन ' वाला पाठ है । तब यास्क के मतमें सभी शाखाएँ वेद सिद्ध हुई । हादि ( ८ ) यास्कने ' निरुक्त ' पूर्व प्रकरण में ही ' अग्नये समिध्यमानाय जाते । अनुहि ( १।१८ ) यह मन्त्रभाग उद्धृत किया है । वह कृष्णयजुर्वेदीय ग्र ‘ मैत्रायणीसंहिता ' ( १।४।४५ ) में मिला है, तब सभी संहिता वेद हुई । ( ३४ ) नितान्त ( ६ ) इसी प्रकार पूर्ण प्रकरण में ही ' एक एव रुद्रोऽवतस्थे न द्वितीयः ' यह मन्त्र ' निरुक्त ' ( १।१५।७ ) में उद्धृत किया गया है, CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. कोद - विषयमें भारी भूल ११३ चार वेद - मन्थोंमें नहीं मिला, तब इससे स्पष्ट है कि- प्रचलित चार वेदग्रन्थ हो वेदकी सीमा नहीं, किन्तु ११३१ संहिताएँ तथा ब्राह्मण ' मिलकर हो वेद हैं । यह मन्त्र किसी, लुप्त शास्त्रामें मिल सकेगा । ' थाजकल ऋग्वेद की एक शाकल्यसंहिता, शुक्लयजुर्वेदको वाजसनेयी तथा काण्व, कृष्णयजुर्वेदको तैत्तिरीय - काठक- मैत्रायणी -कपिल यांदि - संहिताएँ, सामवेदकी कौथुमी, राणायनीय, जैमिनीयसंहिता, श्रथर्ववेद ' को शौनकसंहिता – पैप्पलादसंहिता मिली हैं, शेषकी गवेषणा जारी है । " तैत्तिरीयसंहिता ' में ' एक एव रुद्रो न द्वितीयाय तस्थे ' ( १२८ | ६ | १ ) इस रूपमें यह मन्त्र मिला है । तब श्राजकलका वेदविषयक मत नितान्त श्रान्त सिद्ध हुआ । सभी संहिताएँ वेद सिद्ध हुई । ( १० ) ' नेज्जिह्मायन्तो नरकं पताम ' यह उदाहरण ' निरुक्त ' के निपात - प्रकरण ( १।११।१ ) में उद्धृत किया गया है । पाणिनिके ३।४८ चैदिकसूत्रमें भी / वही उदाहरण दिया गया है । स्वा ० दयानन्दजीने भी यही उदाहरण दिया है । परन्तु वर्तमान संहिताओं में यह नहीं मिलता । ' ' ऋक्परिशिष्ट ' ( ८ श्रष्ट ० ६ ० २ ब ० ) में मिलता है । पटकपरिशिष्ट भी वेद सिद्ध हुआ । ( ११ ) ' निरुक्त ' ( ६ || १ ) में ' भद्र ं वद दक्षिणतः ' यह ऋचा उद्धृत की गई है, परन्तु वर्तमान ' ऋग्वेद ' में यह नहीं मिलती; ' ऋक्परि-' शिष्ट ' ( २ | १३ | १ ) में यह मिलती है । तब ॠपरिशिष्ट भी ऋग्वेद सिद्ध हुआ । यह भी सिद्ध होता है कि खिलों ( परिशिष्टों ) का मिन कर्ता नहीं होता; प्रत्युत उसो ग्रन्थकारके द्वारा किया हुआ अनियमित संग्रह ही परिशिष्ट कहा जाता है । इसीलिए ' तैत्तिरीयारण्यक ' की व्याख्या करते हुए सायणने ' नारायणोपनिषत् ' ने ' खिल ' की परिभाष दी है - ' कर्मोपासनाकाण्डेषु त्रिष्वपि यद् वक्तव्यमवशिष्टम्, तस्य सर्व-त्याभिधानेन प्रकीर्णरूपत्वं खलत्वम् ' | ' हरिवंशपुराण ' की अवतरणिका An eGangotri Initiative

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११४ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) में श्रीनीलकण्ठने भी कहा है- ' यच्च शाखान्तरस्थं शाखान्तरे प्रयोजन-वशात् पटते, यथा बाहृ चे श्रीसूक्तमेधा सूक्तादि; तत् खिलमुच्यते ' । खिल्लोंके प्रमाण होने से ही ( ' स्वाध्यायं श्रावयेत् पित्र्ये... पुराणानि खिलानि च ' मनु ० ३।२३२ ) उनका पित्र्यकर्म में पाठ स्वीकृत किया गया है । ( १२, निरुक्तकार ' इत्यपि निगमो भवति ' यह कहकर वेद - प्रमाण . दिया करते हैं - यह विज्ञ - समाजमें प्रसिद्ध है । स्वा ० द ० भी यह मानते ही है । श्रार्यसमाजी पण्डित श्रीराजारामजी शास्त्रीने भी निरुक्त " की भूमिका पृ ० ५ में लिखा है - ' निरुक्तमें जो ' निगम ' दिखलाए हैं, वह मन्त्रभाग ही हैं । निरुक्तकारने लिखा: है – ' श्रमेनांश्चिज्जनिवत्-रचकर्थं ' ‘ ग्नास्त्वाऽकृन्तन्नप सोऽतन्वत ' इत्यपि निगमौ भवतः, ( ३।२१।२ ) ' इनमें ' अमेनान् ' मन्त्र ऋग्वेद ( शा ० स ० ) का है; परन्तु ' ' नावा ' यह सामवेदीय ' ताण्ड्य महाब्राह्मण ' ( ११८६ ) का है । ' मैत्रायणीसहिता ' ( १।६ ४ ) तथा ' काठकसहिता ' ( ६६ ) में भी है । तब सभी संहिताएँ तथा ब्राह्मण भाग भी वेद सिद्ध हुए । ( १३ ) ' पीर्यात स्वो ' ' नेमे देवाः ' इत्यपि निगमौ भवतः निरुक्त ( ३/२०१४ ) इनमें पूर्व मन्त्र ' ऋग्वेद ' ( शा ० सं ० ) १।१४७१२ में है | ' नेमे देवाः ' यह यजु ० ' काठकसंहिता ' ( १४३ ) में है । तब वेद संहितामात्र चेद्र हुआ । ( ख ) निरुक्तमें ( शश २ ) ' नोपरस्याविष्कुर्याद् ' इत्यपि निगसौ. भवतः यह निगममन्त्र ब्राह्मणभाग का है । ( ग ) तं मरुतः ' ( ५१ ) यह निगम प्रमाण भी ब्राह्मणभाग का है । इससे ब्राह्मणभाग भी वेद सिन्ह होता है । ( १४ ) ' निरुक्त ' ( २ | ३ | १ ) में ' यरमात् परं नापरमस्तिं किञ्चित् " CC - 0. Ankur Joshi Collection वेद - विषयमें भारी भूल ११ इत्यपि निगमो भवति ' यह लिखा है । यह कृष्णयजुर्वेदीय ' श्वेताश्च रोपनिषत् ' ( ३ । ६ ) का है । तब उपनिषद् भी वेद हुए । श्र तुम ( १५ ) जैसे ' व्यवहिताश्च ' ( ११४८२ ) यह पाणिनिका वैदिक ' श्रा मन्द्र ैरिन्द्र! हरिभिर्याहि ' ( ऋ ० ३ । ४ । १ ) इस वेदमन्त्रमें लगा है । वैसे ही ' समिध सोम्य! श्राहर, उप त्वा नेष्ये ' ( छान्दोग्य ० नान | ४ | ४ १ इस उपनिषत्कण्डिकामें भी लगा है । तब उपनिषदें भी वेद का हुईं । इसीलिए मनुस्मृति ( २।१४० ) की टीकामें कुल्लूकभट्टने कहा है. ' वेदत्वेपि उपनिषदां प्राधान्यविवत्तया पृथङ निर्देश: ' । दि - ( १६ ) ‘ सुपां सुलुक— ' ( ७।१।३१ ) इस पाणिनिके सूत्रमें ' क्वाि परं छन्दसिं ’ ( ७।२।३८ ) सूत्रसे ‘ छन्दसि ' की अनुवृत्ति आ रही है । ग सि इस सूत्रसे जैसे ‘ सविता प्रथमेऽहन् ' ( ३६।६ ) इस यजुर्वेद ( वा ० ) यह के मन्त्रमें ' ङि ' का लुक् हो जाता है, और ' नङि - सम्बुद्ध्यो: ' ( रु. २१ ) हट से ौदिक न - लोपका अभाव होता जाता है; जैसे ही ' यश्चाभ्य देखिये अक्षन् पुरुषः ' ( १४ | ६ | ८३ ) इस शुक्ल यजुर्वेदीय ' शतपथ ब्राह्मण ' दे नि वाक्यमें तथा छान्दोग्यं वृहदारण्यक आदि उपनिषदोंमें भी दीखता है । तब उपनिषदें तथा ब्राह्मणभाग भी वेद सिद्ध हुआ । तब केवल ने चार पोथियोंको चार वेद मानना - यह मत नितान्त भ्रान्त सिद्ध हुआ ॥ ( १७ ) ' भगवः! इति ह शुश्राव ( ४/२/१ ) यह ' छान्दोग्योपनिषद् ' में पाठ है । इस प्रकार अन्य उपनिषदोंमें भी । यहाँ पर ' भगवः!! ‘ यह शब्द ‘ भगवत् ' शब्दके सम्बोधनमें ' मतुवसो रु सम्बुद्धौ छन्दसि ( ८ । ३ । १ ) इस वैदिक रुत्व होने पर बनता है । यह लौकिक ग्रन्थों नर नहीं श्राता । तब उपनिषदें भी छेद हुई । कि ( १८ ) जिस प्रकार ' व्यत्ययो बहुलम् ' ( ३ १२८२ ) यह पाणिनिका वैदिक सूत्र मन्त्रभाग में प्रवृत्त होता है, वैसे ब्राह्मणभागान्तर्गत कप Gujarat. An eGangotri Initiative

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११६ श्रीसनातनधर्मालीकः ( ४ ) श्रारण्यकमें भी । जैसे कि- ' आपः पुनन्तु पृथिवी पृथिवीं पूता पुना-तु माम् । पुनन्तुं ब्रह्मणस्पतित्र ' झ, ब्रह्म पूता पुनातुं माम् ' - ( ' तैत्तिरीया -रएयक ' १०।२३ ) यहाँ पर ' ब्रह्मणस्पतिः ' में अम् के स्थान में ' सु ' हुआ है । ' ब्रह्म पूता ' में लिङ्ग- व्यत्यय हुआ । इस प्रकार ' सत्यमेव जयते नानृतम् ' ( मुण्डक ० ३।१ ६ ) इस उपनिषद् वाक्य में भी उपग्रह ( पद ) का व्यत्यय होगया है । तब आरण्यक तथा उपनिषद् भी गेद सिद्ध हुए । ' ' ( ११ ) अब स्वा ० दयानन्दजीके कई प्रमाण भी इस विषय में दिखलाए जाते हैं, जिन्हें उन्होंने वेदका उदाहरण स्वीकृत किया पर वे उनके माने हुए वेद में नहीं मिलते, किन्तु अन्य लुप्त वा श्रलुप्त • संहिताओं में मिलते हैं । छंद शब्दसे वे मन्त्रभागरूप वेदको लेते हैं यह पहले कहा जा चुका है, इससे भी वेदको सीमा इन चार प्रन्थोंसे हटकर वही ११३१ संहिता, तथा ब्राह्मण, उपनिषद्, श्रारण्यक तक जा पड़ती है । स्वामीजीके कुछ थोड़े उद्धरण दिये जाते हैं, शेष अन्य निबन्धों में दिये जाएंगे । ऋग्वेदादिभाष्यभूमिकाके, 1 ३८० पृष्ट में ‘ उपसंवादाशङ्कयोश्च ' ( ३।४१८ ) इस सूत्रका दैदिक उदाहरण स्वामीजी ने ' नेजिह्यायन्तो नरकं पताम ' यह दिया है, वह उनके माने हुए वेदनें नहीं; किन्तु ' ऋक्परिशिष्ट ' में है यह पहले कहा जा चुका है, तब ऋ परिशिष्ट भी ' ऋग्वेद ' सिद्ध हुआ । ( २० ) वेदाङ्गप्रकाश ' आख्यातिक ' ३२८ पृष्ठमें स्वा ० दयानन्दजी " बहुलं छन्दसि ' ( ३२ ) इस वैदिक सूत्रको ' मातृहा सप्तमं नरकं विशेत् ' यह वेदोदाहरण दिया है, यह तत्सम्मत वेदमें नहीं, किन्तु ब्राह्मणभाग है, तब वह भी वेद सिद्ध हुआ । ( २१ ) इस प्रकार ' सामसिक ' में स्वा ० दयानन्दजीने ' श्रग्नियमष्टा-कपालं निर्वपेत् ' ' ष्टी हिरण्या दक्षिणी ' यह उदाहरण ' इन्दसि च CC - 0. Ankur Joshi Collection वेद्र- विषयमें भारी मूल २१७ ( ६३३/१२६ ) सूत्रका दिया है, यह उनके इष्ट वेदमें नहीं, किन्तु ब्राह्मण-भागमें है, तब ब्राह्मणभाग भी इन्द्र ( वेद ) सिद्ध हुआ । / २२ ) इस प्रकार स्वामीजीने ' अव्ययार्थभाग ' के २१ पृष्ठमें ' तवै-तुमर्थे छन्दसि ' यह लिखकर वहां ' ब्राह्मणेन न म्लेच्छितत्रै ' यह उदाहरण दिया है, यह भी उनके दृष्ट वेदमें नहीं, किन्तु ब्राह्मणभाग में है, तब ब्राह्मणभाग भी वेद सिद्ध हुआ । १२३ स्वा ० दयानन्दजीने ' श्राख्यातिक ' के ३६३ पृष्ठमें ' भाव-लक्षणे... तोसुन् ' ( ३।४।१६ ) इस वैदिक सूत्रका उदाहरण ' काममावि-जनितोः सम्भवाम ' यह दिया है; यह उनके माने हुए चार वेदोंमें नहीं; किन्तु ' तैत्तिरीयसंहिता ' ( २२२११५ ) में है; तब ११३१ संहिताएँ वेद सिद्ध हुई । ( २४ ) ' स्त्रैणताद्धित ' के ६५ पृष्ठमें ' छन्दोत्राह्मणानि च ' ३२३ ( ०.१२ / ६५ ) इस पाणिनिसूत्रके विवरण में स्वा दयानन्दजीने छन्द ( द ) के उदाहरण में ' कठाः, मौदा, पैप्पलादाः, वाजसनेयिनः ' ये उदाहरण देकर शाखाथों को भी वेद मान लिया है । ( २५ ) पाणिनि, महाभाष्यकार निघण्टु और निरुक्तकारने जो वेदके शब्द दिखलाए हैं, वे वेदमें अवश्य मिलने चाहियें । जो वर्तमान वेद-संहिताओं में न मिलें, तब स्पष्ट होगा कि वेदकी सीमा वर्तमान वेदग्रन्य से अधिक है । पाणिनिसूत्र ( ७।१।४५ ) के अनुसार ' शृणोत ग्रावाणः ' यह वाक्य वेदका है, श्रीपतञ्जलिने भी ३१११७ सूत्रके भाष्यमें ' शृणोत ग्रावाणः ' यह वेदमन्त्र माना है- -यह पूर्व कहा जा चुका है, परन्तु यह वाक्य वर्तमान प्रसिद्ध चार वेद संहिताओंमें प्राप्त नहीं होता, तब स्पष्ट है कि यह चार संहिताएँ ही वेद नहीं है, किन्तु इससे अधिक ११३१ संहिताएँ - जो · कि - महाभाष्यकार श्रादिने स्वीकृत की हैं, तथा Gujarat. An eGangotri Initiative

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११८ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) ब्राह्मणभाग- यह मिलकर ही वेद होता है । यह ' शृणोत प्रावाणः ’ वाक्य कृष्णयजुर्वेद ( तै ० सं ० ) में है, तब तैत्तिरीयसंहिता श्रादि वेद सिद्ध हुए । ( ख ) ' स्नात्वी ' शब्द भी वेदका है यह पाणिनिका अभिप्राय है ( अष्टा ० ७ । १ । ४६ ) । इस प्रकार ' निष्टर्क्स ' ' शब्द भी पाणिनिसूत्र ( श १ रा १२३ ) के अनुसार वेदका है, पर ' स्नात्वी ' शब्द और ' निष्ट ' शब्द वर्तमान चारों वेदोंमें नहीं, किन्तु अन्य संहिताओंमें है, यह बत-लाया जा चुका है । तब वे वेद सिद्ध हुईं । ( २६ ) ' महाभाष्य ' के पस्पशाह्निक में अप्रयुक्त शब्द निरूपण प्रकरण में ' ये चाप्येते भवतोऽप्रयुक्ता श्रभिमताः शब्दाः; तेषामपि प्रयोगो दृश्यते । क्व? वेदे ' यह कहकर ' यद्वो रेवत्यां तमूष ' यह वेदका प्रमाण दिया है; पर यह आजकलके चार वेदोंमें नहीं मिलता; तब चार वेदोंकी सीमा इनसे अधिक सिद्ध हुई । अंशतः यह ' काठक संहिता ' ( ३१।७ ) में मिला है । ( ख ) ' जायमानो के ब्राह्मणस्त्रिभिॠणवान् जायते— एवमृण-संयोगं वेदो दर्शयति ' यह वचन बोधायनधर्मसूत्र ( २।६।१६।७ ) तथा न्यायदर्शनके भाष्य ( ४ | ११६०-६१ ) में वेदके नामसे उद्धृत किया गया है, पर यह कृष्णयजुर्वेद ( तै ० सं ० ६।३।११ ) का है, तब कृष्णयजुर्वेदकी संहिता भी वेद सिद्ध हुई । ( २७ ) ' थालोक ' के विज्ञ पाठकगणने इस निबन्धको मनोयोग से पंढ़ा होगा । अब हम उनका श्रधिक समय नहीं लेना चाहते । एक अन्तिम, पर श्रावश्यक बात कहकर यह निबन्ध समाप्त करेंगे । CC - 0. Ankur Joshi Collection वेद - विषयमें भारी भूल १२० श्रीस्कने ' निघण्टु " ' को वेदके शब्दों का संग्रह बताया है; देखिए-यदि ‘ छन्दोभ्यः समाहृत्य समाहृत्य समाम्नाताः ' ( १ । १ । ४ ) । यही बात सन श्रभ तमधर्मी तथा श्रार्यसमाजी दोनों मानते हैं । परन्तु बहुतसे ' निघण्टु ' । एयव शब्द वर्तमान, वेदकी चार संहिताओं में नहीं मिलते । इससे स्पष्ट पिट हो जाएगा कि — वेदको यह सीमा नहीं हैं, जो श्राजकल समझी जाती है । चाहि श किन्तु ११३१ संहिताएँ, उतने ही ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषत् वेद हैं । वा अब देखिए--यास ( क ) ‘ काञ्चनम् जातरूपम् ' ये हिरण्यके नाम ' निघण्टु ' ( १।२ ) ई सभी कहे हैं; परन्तु वे श्राजके चारों वेदोंमें नहीं मिलते । ( ख ) ' निघ प्रवण ( १।३ ) में ' वियद्, श्राकाशम् ' ये अन्तरिक्ष के नाम कहे हैं; पर ये था! हैं, चारों वेदों में नहीं मिलते । ( ग ) निघण्टु ( १६ ) में कहा ' घाष्ठा ' यह पूरे ' दिशा ' का नाम, ( घ ) ' शोकी ' ( १।७ ) यह ' रात्रि ' का नाम ( ङ ) ध्यान ' चलिशानः, बलाहकः ' ( १ | १० ) ये ' मेघ ' के नाम, ( च ) ' वेकुरा ' 1 | 11 | मन्त्र ये ' वाक् ' का नाम, ( छ ) सकम्, स्वृतीकम् ' ( १११२ ) ये जलके नाम श्राज श्राजके चारों वेदोंपें नहीं मिलते । यह श्रभी दिक्प्रदर्शनमात्र है; नई सिद्ध तो ऐसी संख्या बहुत अधिक है । इससे स्पष्ट है कि — वेद की ये चार संहिता पोथियाँ ही वेदी ' अन्तिम अवधि नहीं हैं; किन्तु ११३१ मन्त्रसंहिताएँ; उतने ही ब्राह्मण श्रारण्यक, उपनिषद् मिलकर पूर्ण वेद बन जाता है । ऊपर कहे गए । वैदिक कई शब्द चार वर्तमान संहिताओंसे भिन्न संहिताश्चों में मिलते हैं । कई ब्राह्मणभाग तथा तदन्तर्गत उपनिषद् तथा श्रारण्यकों में मिलते हैं । Gujarat. An eGangotri Initiative

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१ १२० श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) देखिए- यदि उनमें भी न मिलें, तब भी हमारे पक्षकी हानि नहीं; क्योंकि— बात सना अभी बहुत - सी की संहिताएँ तथा ब्राह्मण तथा उपनिषदें तथा चार-निघण्टु एयक लुप्त हैं । उनमें उक्त वैदिक शब्दोंकी सत्ताका अनुमान कर लेना स्पष्ट सि चाहिए । पर वादियों का पक्ष तो सर्वया खण्डित हो जाता है । क्योंकि जाती है अपनी वर्तमान चार संहिताओं को पूर्ण वेद मानते हैं; उनमें । न्यूनता वेद हैं । वा अधिकता भी नहीं मानते । इधर ने पाणिनि, कात्यायन, पतञ्जलि, याक श्रादिको वेदका पूर्ण विद्वान् मानते हैं । सब सनातनधर्मी तथा ( २ ) ई सभी आर्यसमाजियों को तथा वेद - विषयके अनुरागी तथा अनुसन्धान-' निघण प्रवण व्यक्तियों को उचित है कि इस पर सम्यक विचार करें, श्राप द्विज " ये! हैं, तो दकी रक्षा श्रापका कर्तव्य बन जाती है । जहाँ संसारी व्यवहार यष्ठा ' पूरे करें, वहाँ कुछ समय निकालकर इस परमार्थ की थोर भी अवश्य-नाम ( ड ) ध्यान दें । फलतः वर्तमान ४ पोथियाँमात्र गेद नहीं, किन्तु ११३१ मन्त्रभागकी संहिताएँ; तथा सारा ब्राह्मणभाग वेद है, तब इससे विरुद्ध ब्लके नाम श्राजकलका मत ' खण्डित होगया । और उनका यह भारी भ्रम है; नहीं सिद्ध हुआ । वेदव ब्राह्मए कहे गए मिलते है । मलते हैं । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. श्रीपतञ्जलि एवं ' शन्नोदेवीरभिष्टये ' मन्त्र - ( वेद स्वरूपनिरूपण ) -वेद विद्वान् श्रीपतञ्जलि ( 1 ) महाभाष्यकार श्रीपतञ्जलिको वादी - प्रतिवादी वेदके विषय में भी प्रामाणिक विद्वान् मानते हैं, अतः उनकी बातको कसौटी बनाकर सभी अपने पक्षकी पुष्ट्यर्थं उनके वाक्य उद्धृत करते रहते हैं । महा-भाष्यकारने ' वैदिक शब्दोंका ' निरूपण करते हुए ' शं नोदेवीरभिष्टये ' ‘ इषे त्वोर्जे त्वा ' ‘ अग्निमीले पुरोहितं ' ' अग्नयायाहि वीतये ' यह चार उद्धरण दिये हैं । इससे एक पक्ष यह सिद्ध करता है कि - महाभाष्य-कार सभी ११३१ ) संहितार्थीको वेद मानते हैं, दूसरा पक्ष वर्तमान-प्रचलित शाकल - संहिता, वाजसनेयी संहिता, कौथुमी संहिता और शौनक संहिताको हो क्रमले चार वेद मानकर, महाभाष्यकारको भी उस पक्षका मानता है I । उक्त मन्त्रों में अन्तिम तीन मन्त्रोंके विषयमें तो उभयपक्ष में बहुत विप्रतिपत्ति नहीं कि - कहांके हैं? हाँ, पूर्वके दिये मन्त्रमें दोनों पक्षों में मतभेद है । एक पक्ष उसे ' अथर्ववेद पैप्पलाद संहिता ' का आदिम मन्त्र बता-कर इससे भाष्यकारके मतमें सभी वेद संहिताओंको वेद सिद्ध करता हैं, दूसरा पक्ष इसे ' अथर्ववेद शौनक संहिता ' का बताकर भाष्यकारको अपने ही पक्षका सिद्ध करता है । दोनों ही पक्ष अपनी - अपनी उपप-त्तियाँ उपस्थित करते हैं, कोई निर्णय नहीं हो पाता । श्रार्यसमाजके माने हुए विद्वान् श्रीब्रह्मदत्तजी / जिज्ञासु महोदयने ' यजुर्वेदभाष्य ' विवरणकी भूमिका में ' यह शङ्का ' पर्याप्त बलवती ' मानी है, परन्तु ' थोड़ा विचार करनेसे उसका स्वयं दूर हो जाना ' माना है । An eGangotri Initiative

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१२२ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) श्री जिज्ञासुजीने एतदर्थ भाष्यकारके कुछ उद्धरण भी दिये हैं । उन्होंने ' शंनो देवी ० ' का श्रीपतञ्जलि द्वारा उद्धरण देनेमें ' वेदोंकी आरम्भिक प्रतीक दर्शाना ' उनका मुख्य अभिप्रेत न मानकर लौकिक शब्दोंसे मेदकत्वार्थ ' नैदिक शब्दोंका उदाहरणमात्र देना उनका मुख्य अभिप्रेत माना है । इन्हें वेदको आरम्भिक प्रतीक माननेमें उन्होंने ' पंतजलि भगवान्के स्ववचनोंमें परस्पर विरोध थाना ' माना है । इस विषय पर हम अपनी शैलीसे भाष्यकारका अभिप्राय देते हैं विद्वान उस पर निष्पक्ष दृष्टि दें । भाष्यकार सभी वेदसंहिताओंको. ' चार वेद ' मानते हैं, या केवल, वर्तमान प्रसिद्ध चार शाकल, वाजसनेय, कौथुम, शौनक संहिताओंको ही ' चार वेद ' मानते हैं, इस बातको जाननेके लिए मेरे विचारमें उनके उन उद्धरणोंको हूँढना होगा, जिन्हें " " उन्होंने वेदके नामसे दिया । यदि वे उनके उद्धरण उक्त चार संहिताओंसे भिन्न भी संहिताओंके सिद्ध हो जाएँ, तो मानना पड़ेगा कि वे सभी वेदसंहिताओंको वेद मानते हैं । हम आजकलके अनुं-सन्धाताचोंको प्रेरणा करते हैं कि वे श्रीपतञ्जलिके वेदके नामसे दिये गये सभी उद्धरणोंका संग्रह करें और उनका वेदसंहितायोंमें अन्वेषण करें । इससे दृढ - निर्णयकी कसौटी प्राप्त हो जायगी । यदि इन चार संहिताओंसे भिन्न भी संहिताओंके दिये प्रमाण इस ( महाभाष्य ) में वेदके नामसे प्राप्त हो जाएँ, तो मानना पढ़ेगा कि... भाष्यकार सभी ११३१ संहिताओंको ' वेद ' मानते हैं तब वेदविषयक सिद्धान्त में उनका परस्पर विरोध नहीं रहेगा । वेद - स्वरूप विषय में श्रीपतञ्जलिका अभिप्राय ( २ ) सम्पूर्ण महाभाष्यको मन्थन करने पर हमें तो श्रीपतञ्जलिका यही अभिमत प्राप्त हुआ है कि वे सभी ११३१ संहिता तथा सम्पूर्ण ब्राह्मणभागको ' वेद ' मानते हैं । ब्राह्मणभागको हम भिन्न समयके लिए CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीपतन्जलि एवं ' शन्नो देवीरभिष्टये ' ६२४ छोड़ते हैं । आज मुख्यतया संहिताओं के विषय पर विचार किया है । पहले ' शं नो देवीरभिष्टये ' मन्त्र पर ही विचार करना चाहि हमारा विचार है कि- ' वैदिकाः खल्वपि ' कहकर ' शं ( ३ ) रमिष्टये, इषे स्वोर्जे त्वा, श्रग्निमीले पुरोहितं, अग्न आयाहि । दिये गये यह चार चारों वेदोंके प्रथम - मन्त्र - प्रतीक ही भाष्यकारने दि विचार यह यद्यपि भाष्यकार ने ११३१ संहिताओं को ही ' चार वेद ' माना है, यह उसकी - श्रागे कहा जायगा ) तथापि ' समुद्रायेषु हि शब्दाः प्रवृत्ता श्र का 1 = वर्तन्ते ' इस पस्पशाह्निकस्थ भाष्यवचनके अनुसार किन्हीं का अर्थ " चार संहिताओं का प्रथम मन्त्र - प्रतीक दे देना भी चारों वेदोंका उ कहीं साम देना है । १०/७/२० पहले भी वैदिक शब्दों को उदाहृत करनेके दो प्रकार हैं । ' - ब्राह्मणासः, सभेयः, मना ' इत्यादि लोकविलक्षण वैदिक शब्द फलत यह एक प्रकार है 1 । वेदसंहिताओंके मन्त्र उपस्थित कर देना या इच्छा ही प्रकार है । जैसी योजना ही उस वेदसंहिता को बता सको इच्छा के भी ` भाष्यकारने इनमें दूसरा प्रकार अवलम्बित किया है, क्योंकि है कि जिस ' आदि लोक - वेदसाधारण पृथक - पृथक शब्द देखकर वैदिक तो उदाहृत ' भेद - ज्ञान नहीं हो सकता. संहितायोजनाकी अपेक्षा बनी रहा अपने सम्प्र यदि केवल लौकिक शब्दोंसे विलक्षणता प्रदर्शनार्थ कई लोकविल लेता है । न्वाले एक - दो भी मन्त्रोंके कहींके भी प्रतीक दे दिये जाते तो जैसे कि कई हो जाती, पर प्रस्तुत मन्त्रोंमें लोकविलक्षण कोई पद नहीं । इलोत्पन्न पह भाष्यकारने एक - दो मन्त्र न देकर चार मन्त्र उद्धृत किये हैं, वेद " है कि यह उनका क्रम निर्निमित्त नहीं । चारों वेदका मिलकर ( वह मन्त्र उपस्थित करना चाहते हैं यह सर्वजननेद्य है । उसकता; त " है अपनी, इष्ट संहिताका प्रथम - मन्त्र - प्रतीक उपस्थित कर देना जैसे क्रि-तो चार उदाहरणोंका देना कोई अर्थ नहीं रखता । एक रवेदाध्ययनस काम चल जाता । Gujarat. An eGangotri Initiative