सनातन धर्मालोक ४ — पृष्ठ 81–90

सनातन धर्मालोक ४ · पृष्ठ 81–90

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१२४ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) र किया ऋगादि क्रम क्यों नहीं? ना चाहि' सं ( ३ ) फिर प्रश्न यह है कि यहाँ पर ऋगादि क्रमसे मन्त्र ' क्यों नहीं याह दिये गये? इस पर कई विद्वान् भिन्न - भिन्न उत्तर देते हैं । हमारा रने दि विचार यह है कि वक्ता जिस भी वेदका उदाहरण पहले देना चाहे-माना है । यह उसकी अपनी इच्छा पर है । इसलिए वेदसंहिताओंमें भी कहीं पहले नाकका, फिर सामका, पीछे यजुःका, कहीं सामका यजुःसे पीछे, ‘ छन्द ’ 7 का अर्थ ' थ ' माना जाने, तो वह कहीं यजुः से भी पहले श्राया है, दोंकार कहीं सामके बाद । ' अथर्वाङ्गिरसो मुखम् ' ( अथर्न ० शौनक सं ० १० | ७ | २० ) इस कथनसे तो अथर्ववेद की किसी भी संहिताका उदाहरण पहले भी दिया जा सकता है 1 । क शब्द फलतः चारों वेदोंके चार उदाहरणोंको क्रम विशेषसे देने में अपनी इच्छा ही नियामक है, उस पर किसीका कोई नियन्त्रण नहीं । अपनी इच्छाके भी विविध कारण हुआ करते हैं । एक कारण यह भी होता क्योंकि है कि जिसके मतमें ११३१ संहिताएँ ही चार वेद हों, वह उन सबको सौदिक इतो उदाहत नहीं कर सकता, तब वह अपनी चार कुल शाखाएँ या नीर अपने सम्प्रदाय या अपनी गुरुपरम्परासे आई हुई चार संहिताएँ लोकविस लेता है । चारों वेदोंमें भी किसी कुलका विशेष वेद भी होता है, न तो जैसे कि कई कुल सामवेदी वा कई यजुर्वेदी हुया करते हैं.। तत्तत्कु-हीं । इलोत्पन पहले उसी बेदको लेता है । हैं,..वेद कहीं स्वतंत्रतासे तो मिलते नहीं, उसकी सब संहिताएँ ही चिदोंका मिलकर वह वह वेद होता है । सब संहिताओं को लिया नहीं जा । उसका प्रकता; श्यतः उसमें अपने कुलकी एक संहिता ही ले ली जाती है । कर दे जैसे कि - श्रीसायणाचार्यने भी अपने ' ऋग्वेदसंहिताभाषयोपोद्घातमें एक वेदाध्ययनस्य नित्यता ' में कहा है- ' एकवेदपत्रे पितृपितामहादि-CC - 0. Ankur श्रीपतन्जलि एवं ' शनोदेवीरभिष्टये ' १०५. परम्पराप्राप्त एंव वेदोध्येतव्यः - इत्यभिप्रेत्य ' स्वाध्यायोध्येतव्यः ' इति ' स्व ' शब्द श्राम्नातः ' । इस पर कुछ स्पष्टता आगे भी की जावेगी ।.. . Joshi Collection Gujarat. महाभाष्यकार अथर्ववेदी ( ४ यहाँ पर भी यहीं बात है । श्रीपतञ्जलि प्रथर्ववेदी ब्राह्मण ये - यह उनकी प्रवृत्तिसे सूचित होता है । उस अथर्वकी ' पैप्पलाद संहिता ' अपनी कुलशाखा होनेसे उन्होंने पहले उसीका प्रथम मंत्र उष्टेत किया है । अन्तिम तीन मन्त्र यजुर्वेद ( वाज ० तैत्ति ० ) संहिता, ऋग्वेद ( शाक ० ) संहिता तथा सामवेद ( कौथुम ) संहिताके प्रथम मन्त्र इसमें तो किसीका विवाद नहीं । शेष ' शं नो देवी ० ' स्वयम् वेद संहिताका सिद्ध हो गया । अन्तिम तीन मन्त्र जबकि उक्त तीनों संहिताओं के प्रथममंत्रप्रतीक हैं ( यह धागे सिद्ध किया जायगा ); · तब उसी क्रमसे ' शं नो देवी ' भी ' अथर्णवेदसंहिता ' का प्रथममन्त्र-प्रतीक ही होना चाहिये; क्योंकि - वैयाकरण लोग साहचर्य - नियमका बड़ा - ध्यान रखते हैं । इसे ' अथर्ववेद शौनक संहिता ' का तो नहीं कहा जा सकता; क्योंकि यह वहाँ सर्वप्रथम मन्त्र नहीं । सर्वप्रथम मन्त्र तो यह अथ-' वेद ' पैप्पलाद - संहिताका है, जिसमें गुणविष्णु आदि बहुतोंकी - साक्षियाँ हैं । ' नवधा श्राथर्णणो वेदः ' यह महाभाष्यकार मानते हैं । श्रथनवेद - स्वतन्त्र तो कहीं मिलता ही नहीं उसकी सभी संहिताएँ मिलकर ही ' ग्रंथ वेद ' होता है । उसमें ' पैप्पलाद ' तथा ' शौनक ' दोनों संहिता मी अन्तर्गत है । जहाँ - जहाँ पर अथर्नकी संहिताओं के नाम श्राये हैं; वह वहाँ पूर्व पद प्रायः ' पैप्पलाद संहिताको दिया गया है । अतः An eGangotri Initiative

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१२६ श्रीसनातनधर्मालांक: ( ४, अथवेदी भाष्यकारने अपनी कुल शाखा होनेसे श्रथवा पूर्णपदमें प्रतिष्ठित होनेसे ‘ पैप्पलादसंहिता ' ही ली । उसका यही प्रमाण है कि महाभाष्यकार ‘ शं नो देवी ' मन्त्रको तथा अथर्ववेद पैप्पलाद संहिताको बहुत याद करते हैं । शेष मन्त्र किन वेदसंहिताओंके हैं? ( ५ ) यहाँ पर ' इषे त्वा, श्रग्निमीले, अग्न श्रायाहि ' ये तीन मन्त्र-प्रतीक- किस वेदको किस संहिताके हैं यह पूर्ण विचारणीय है । पहले ' अग्निमीले पुरोहितं ' इस तृतीय मन्त्रप्रतीकको ही लीजिये । यह तो स्पष्ट ही ऋग्वेद शाकल संहिताका मन्त्र है और सर्वप्रथम मन्त्र है । यह वैदिक ' ल ' ऋग्वेदको संहिता के अतिरिक्त अन्य यजुः साम ' संहिताओंमें नहीं हुआ करता । यद्यपि उक्त श्रग्निमी ० ) मन्त्र सामवेद--कौथुम ंहिता ( पूर्वाचिक आरण्यकपर्न ६ | ३ | ४ ) में भी है, पर वह यहाँ महाभाष्यों ) इष्ट नहीं, क्योंकि वैसा होने पर भाष्य में ' श्रग्निमीडे ' इस प्रकार ' ड ' रूपमें होता, परन्तु ' ल ' रूपमें है, और उक्त साम-संहितामें ' ड ' रूपमें हैं, श्रतः स्पष्ट है कि ' महाभाष्य ' में ' अग्निमीले " यह मन्त्र सामवेद ( कौ ० ) संहिताका नहीं, ऋग्वेद ( शा ० ). संहिताका है । यह मन्त्र ' अग्निमीले ' इतना ही दिया जाता, तो ऋ ० शा ० सं ० ( १०/२०११, २/१४/२ ) का भी गृहीत हो जाता; पर ' पुरोहितं ' साथ देनेसे स्पष्ट है कि यह ' अग्निमीले भुजां ' ( ऋ ० सं ० १०/२०११ ) ' अग्निमीलेन्यं ' ( ५ | १४ | ५ ) मन्त्र नहीं, किन्तु ऋ ० शा ० सं ० का श्रादिम मन्त्र है । श्रुतः इसे ऋ ० शा ० सं ० का प्रथममंत्रप्रतीक रूपमें देना ही भाष्यकारको इष्ट है यह दृढ निर्णय हो गया । CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीपतन्जलि एवं ' शन्नोदेवीरभिष्टये ' .१२८ अब ' इषे स्वोर्जे स्वा ' यह दूसरा मन्त्रप्रतीक लीजिये 1 । ० सं ० ) ऋ यजुर्वेद संहिताका ही प्रथम मन्त्रप्रतीक है । अन्य ऋगादिसं प्रतीक भी तो है ही नहीं । श्रतः भाष्यकारको यह भी प्रथम मन्त्रप्रतीक ही प्रतीक हो हुआ । यह मन्त्र शुक्लसंहिताका भी श्रादि है, कृप्यसंहिताका या; पर भाष्यकारको इनमें कौन सा इष्ट है, यह जिज्ञासा होती है ॥ श्रायाहि विचार में उन्हें दोनों ही इष्ट हैं, क्योंकि भाष्यकार ' एकशतम उसीका प्र शाखाः ' यजुर्वेदको १०१ संहिता मानते हैं, इनमें ८६ कृष्ण श्री तथा यजुव शुक्ल हैं । - सामवेद क केवल शुक्ल वाजसनेयी संहिता भाष्यकारको इष्ट होती, तैत्तिरीय संहिता इष्ट न होती, तो वे ' इषेत्वोर्जे त्या वायवस्थ इतना प्रतीक देते, जिसले ‘ उपायवः स्थ ' वाली ' तैत्तिरीय संहिता ' ( ६ ) हो जाती । अथवा उन्हें शुक्ल संहिताकी व्यावृत्ति इष्ट होती, तो ' सो वह भ . स्थ ' वाला पाठ देते, पर व्यावृत्तिकारक पद न रखने से उन्हें दो दिया श्र इष्ट हैं, यह कहा जा सकता है । तभी उन्होंने कृष्णसंहिताके भी है? यह म नामसे ही उद्धरण दिये हैं । यह सम्भवतः श्रागे कहा जायगा । प्रथमसूक्तक यहाँ पर भाष्यकारको ' इषे त्वा सुभूताय ' यह यजुर्वेद - मंत्र तीन अवधि संहिताका पाठ भी दिखलाना चाहिये थ ॥ पर या तो यह व माध्यकार: कुलशाखा नहीं थीं, इसलिये अथवा कृष्ण और शुक्ल यजुः की उदाहरण . संहिता ( तैत्तिरीय एवं वाजसनेयी ) के उदाहृत हो जानेसे मैश उदाहृत क वाज सं ० ... आदिका पृथक उदाहरण देना उन्होंने व्यर्थ समझा ' प्रधानेन हि सं ० ( ४/१० ' देशा भवन्ति ' । फलतः सिद्ध हुआ कि उक्त दोनों प्रतीक भाषा अथर्ववेदस ऋग्वेद शा ० संहिता तथा यजुः वा ० तै ० संहिता के प्रथममन्त्रके हा श्रीपतन्जल अथ ‘ अग्न आयाहि ' इस चतुर्थ मन्त्रप्रतीक पर विचार अपनी इष्ट चाहिए । यह मन्त्रद्यपि ' ऋग्वेद ' ( शा ० ) संहिता ( ६ ) १६॥१० ॥ श्रुत: उन्हो

आया है, पर यह भाष्यकारको उसका इष्ट नहीं; क्योंकि वे Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातन धर्मालोकः ( ४ ) १२८ ये । ० सं ० ) का प्रथम प्रतीक दे. ही चुके हैं और फिर यह प्रथम मन्त्र-दिसंहित ऋ प्रतीक भी किसी अन्य संहितामें नहीं । ' अग्न श्रायाहि ' केवल इतना तीक ही प्रतीक होता; तो अथर्व शौ ० सं ० ( २०११०३।२ ) का भी बन सकता पर इसके ' वीतये ' पढ़ने उसका निरास कर दिया । यह ' अग्न हिताका था श्रायाहि ; वीतये ' मन्त्र सामवेद ( कौथुम ) संहितामें ही मिलता है, है ॥ उसीका प्रथम मन्त्रप्रतीक भी है । पहले भी भाष्यकार ऋग्वेद संहिता एकशतमर पण तथा यजुर्वेद संहिताका प्रथम मन्त्रप्रतीक ही दे चुके हैं, तो यह भी -सामवेद कौ ० संहिताका ही प्रथममन्त्रप्रतीक सिद्ध हुआ । होती ' शं नो देवी ' अथर्ववेदका प्रथममन्त्रप्रतीक । स्थ संहिता ' ( ६ ) श्रय शेष रहा ' अथर्ववेद संहिता ' का प्रथममन्त्रप्रतीक देना, - वो ' सो वह भाष्यकारने ' शं नो देवीरभिष्टये ' दिया, और सबसे पूर्व उन्हें दोर दिया ( श्रय ' देखना चाहिये कि वह प्रथममन्त्रप्रतीक किस संहिता में ताके भी है? यह मन्त्र अथर्ववेदकी संहिताका ही होना चाहिए और उसका नायगां । प्रथमसूक्त का प्रथममन्त्रप्रतीक ही होना अपेक्षित है, क्योंकि- श्रागे के जुर्वेद मे तीन अवशिष्ट संहिताओंके मन्त्रप्रतोकोंकी शैली ही ऐसी है । यदि महा-माध्यकार प्रथम सूक्त का प्रथममन्त्रप्रतीक आवश्यक न समझते, और चार. यह जुः की उदाहरण देना श्रावश्यक न समझते, तो ' शं नो देवीं, केवल इसे. ही नेसे मैत्र उदाहृत कर सकते थे । यह मन्त्र ऋग्वेदशा ० संहिता ( १०।६।४ ) यजुर्वेद चानेन हि वाज सं ० ( ३६।१२ ) ' यजुर्वेदकाएव सं ० ' ( ३६।१२ ) मैत्रायणी यजुर्वेद -भाषा सं ० ( ४/१०/४ ) कौथुमी सामवेद सं ० ( श्राग्नेयपर्व १।३।१३ ) शौनकी क मन्त्र के हा अथर्ववेद सं ० ( १।६।१ ) एतदादिक संहिताओं में आता है; तब भी श्रीपतञ्जलिको इष्ट - सिद्धि हो जाती; पर वे चारों वेदोंकी अपनी-विचार पनी इष्ट संहिताश्चोंके प्रथम सूक्तके प्रथममन्त्र प्रतीक देना चाहते थे; उन्होंने भिन्न - भिन्न चार उदाहरण दिये! क्योंकि वे CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. श्रीपतन्जलि एवं शश्नोदेवीरभिष्टये ' १२६ शेष तीन सहितार्थीके जब भाष्यकारने प्रथममन्त्रप्रतीक दिये यह सम्यक सिद्ध हो चुका है कि उक्त मन्त्रकम श्रानुषङ्गिक नहीं, तब थथसंहिताका भी उन्हें प्रथममन्त्रप्रतीक ही देना दृष्ट या यह स्पष्ट है, अन्यथा यदि भाष्यकार अपने प्रारम्भिक मन्त्र में इस बातका विचार न करते, अथसंहिताका कहीं का भी मन्त्र रख देते, तो आगे भी ऐसा ही करते । पर अन्तिम तीन मन्त्रों में जबकि उन्होंने प्रथम सूक्तके प्रथम- " मन्त्रप्रतीक देंनेका विशिष्ट ध्यान रखा है, तो स्पष्ट है कि प्रारम्भिक मन्त्रमें भी भाष्यकारने इस बातका विशेष ही ध्यान रखा है । अन्तिम तीन जब यजुर्वेद, ऋग्वेद, सामवेद की संहिताओंके प्रथम मन्त्र हैं, यह सम्यकतया सिद्ध हो चुका है, तब पूर्वका मन्त्र अथवेद संहिताका ही प्रथम मन्त्र अपेक्षित है । सो अथर्वसंहिताको शौनक-संहिताका प्रथम मन्त्र तो ' ये त्रिषप्ताः ' है, पर उसे भाव्यकारने लिखा नहीं; सम्भवतः कहीं उसे स्मरण भी नहीं किया । पैप्पलादी अथर्ववेद-संहिताका तो भाष्यकारने बहुत स्थानों पर स्मरण किया है, शौनक-संहिताको तो कहीं स्वतंत्रतासे स्मरण भी नहीं किया जैसेकि भाष्यकार ने शाकल्यसंहिताको ( १।४।४८४ में ). कौथुम को ( १३ में ) याद किया है । ' शं नो देवीरभिष्टये ' को तो लिखा है, पर वह ' शौनक-संहिता ' के प्रथम सुक्तका प्रथम मन्त्रप्रतीक नहीं, किन्तु उसके षष्टसूक्त का आदिम मन्त्र है । प्रथम सूक्तका प्रथम मन्त्र तो यह ' पैप्पलादी श्रथर्ववेदसंहिताका है, स्पष्ट है कि भाष्यकारके मत में यह अथर्व-' वेद - संहिताका उदाहरण है । ( ७ ) इसका यह श्राशय नहीं कि ' ये त्रिषप्ताः ' मन्त्र वाली श्रथर्व-वेद शौ ० ) संहिताको भाष्यकार अथर्ववेद नहीं मानते । हम यह नहीं कहते । ' नवधा प्राथर्णणो वेदः ' कहने वाले भाष्यकार उसकी सभी संहिताओंको प्रथर्ववेद ही मानते हैं, पर पैप्पलाद संहिताको पहले An eGangotri Initiative

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१३० श्रीसनातनधर्मालीकः ( ४ ) उपस्थित करनेसे दो बातें सूचित होती हैं । एक तो यह कि महाभाष्य-कार अथर्ववेदी ये और दूसरी बात यह कि उनकी कुल शाखा पैप्पलाद थी । तभी उन्होंने उसीके प्रथम सुक्तका प्रथम - मन्त्र - प्रतीक रखा है । श्रथवा वह उस समय लोक प्रतिष्ठित थी । केवल यहीं भाष्यकारनं ' शंनोदेवी ' को प्रथम - मन्त्र- प्रतीक रूप में लिया हो, ऐसी बात नहीं, किन्तु अन्यत्र भी उन्होंने इस मन्त्रको इसी रूपमें स्मरण किया है और कई बार इसका स्मरण किया है, अतः स्पष्ट है कि वे अपनी कुल परम्परा के अनुसार अथर्ववेदमें इसी ( पैप्पलाद संहिता ) को मुख्यतया लेते थे । पस्पशाह्निक में श्रानुषङ्गिक प्रयोजनोंके बाद भाष्यकारने लिखा है- ' ओ ३ म् ' इत्युक्त्वा वृत्तन्तिश: ' शम् ' इत्येवमादीन् शब्दान् पठन्ति ' यहाँ पर शंनोदेवी ' मन्त्रको प्रथम--मन्त्रप्रतीक रूप से स्मरण किया गया है । उसका ज्ञापक ' ओ ३ म् ' शब्द है— ' ब्रह्मणः प्रणनं कुर्याद् श्रादावन्ते च सर्वदा ' ( २०७४ ) यह मनु-वचन है । ' न मामनीरयित्वा ब्राह्मणा ब्रह्म वदेयुः यदि व नत् स्यादिति ' ( अ ० वे ० गोपथ ब्रा ० १११ / - ३ ) ( ' माम् - श्रोङ्कारम् ' ) इससे वेदके श्रारम्भमें ‘ श्रो ३ म् का प्रयोग अनुशिष्ट किया गया है । श्री स्वामी दयानन्दजी भी सन्धिविषयमें ' श्रोमभ्यादाने ' ( सूत्र उदाहरण ' श्रो ३ म् इषे त्वोर्जे त्वा, श्रो ३ म् श्रग्निमीलें पुरोहितम् ( १०४ ) इत्यादि उदाहरण देकर वेदारम्भमें प्लुतवाला ' श्रश्म् ' लगाना सूचित करते हैं । तब ' शन्नोदेवी ' यह प्रारम्भिक मन्त्र प्रथर्ववेद पैप्पलाद-संहितामें ही है । उसे ही यहाँ भी ' वैदिकाः शब्दा उपदिश्यन्ते ' इससे भाष्यकारने स्मरण किया है । अन्य प्रमाण भी देखिये - इषेत्वकमधीष्व, शनीदेवी यकमधीष्व, ( १।३।१ / २ ) ' इपेखा शब्दो यस्मिन्ननुवाकेस्ति ' ( कैयट ). यहाँ पर तो भाष्यकारने यजुर्वेद ( वाज ०, तैत्ति ० ) संहिताका ' इषेवा ' यह श्रारम्भिक ही मन्त्र दिया है, इसमें कोई भी ' किन्तु, परन्तु ' नहीं कर सकता; CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीपतन्जलि एवं ' शन्नोदेवीरभिष्टये ' १३२ उसीके साहचर्यसे भाष्यकारने यहाँ ' शंनोदेवी ' भी वेदसंहिताका घर म्भिक ही मंत्र दिया है यह अत्यंत ही स्पष्ट है । ' नो ' इत्युक मन्त्रत्वकी दो इस प्रकारको साक्षियों अभी दी हो जा के ' भाष्य तीसरी साक्षीसे तो सर्वथा ही सिद्ध हुआ कि ' शंनोदेवी ' चुकी हैं । कथन को. ' अथर्ववेद पैप्पलाद संहिता ' का ही मन्त्र इष्ट है क्योंकि यह भाष्य प्रथम सूक्तका प्रथम - मन्त्रप्रतीक है । इस प्रकार सिद्ध, ह उसने ' शंनो भाष्यकार सभी संहिताओंको चार वेद समझते हैं, और अथर्ववेदी हो भाष्य उन्होंने अथर्ववेदको प्रथम उदाहृत किया है — यह बात बनाया लिखत हो जाती है । ' शौन उसकी सभी॰संहिताओंको भाष्यकार चार वेद मानते हैं या नहीं इससे ' अभि कोई सन्देहका अवसर ही नहीं है, जबकि वे ' चत्वारो वेदाः... एक का मध्वर्यु'शाखाः... ‘ नवधाथर्णणो वेदः, इत्यादि अपने वाक्यसे सभी ११ ॥ पैप्प संहिताओंको ही चार वेद मानते हैं । तब यदि भाष्यकार अथर्ववेद है । उदाहरण देते हुए उसकी प्रतिष्टित शाखा अथर्ववेद पैप्पलाद संहिताय रूपसे प्रथम मन्त्र देते हैं, तो उनके किसी भी एतद्विषयक वचनमें कोई परराष नहीं-विरोध नहीं पड़ता, क्योंकि संहिताओं से अतिरिक्त चार वेद हो यह व स्वतन्त्रतासे मिलते ही नहीं । कोई चार वेद - पोथियाँ मानते * भाष्यकारने अपनी कुल शाखा आदिमेंउद्धृत किया है । महाभाष्यकार अथवेदी साक्षी अन्य भी दी जाती है । न ही भाष्यकार संहिताओंसे स्वतन संहिता ही हैं, अतः स्पष्ट है कि अथर्ववेदी होने अथ पैप्पलाद संहिताका ही प्रथम मन्त्र वेदव लिया हैं यह केवल हम ही नहीं कहते, क अपने ' वैदिकाः खल्वपि ' शंनोदेवी ' इस पा भी ह ' छाया ' नामकी महाभाष्यकी टीकामें श्री वैद्यनाथने कहा है ' न चैवर्मा हानि प्रसिद्ध— ऋगादिक्रमेण तत्त्वोक्तिरुचिता – इति वाच्यम् ' तथैव तद् उपादे फेर श यम्— इत्यन्त्रं मानाभावाद् ', भाष्यकारस्य श्राथर्वणत्वाञ्चः । श्लो Gujarat. An eGangotri Initiative

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१३२ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) ताका घर इत्युक्त्वा शम् ‘ ' इत्येवमादीन् शब्दान् ' में भी उक्त टीकामें कहां 1 है, ' के ' भाष्यकारस्य आथर्वणत्वेन प्राधान्याद् अथर्व वेदस्य कथनम् । इस हैं । कथनसे भी हमारे पक्षकी पुष्टि होती है । कि भाष्यस ( ८ ) अन्य एक बात यह भी विचारणीय है कि भाष्यकारने नसे उसने ' शंनोदेवीरभिष्टये ' यह प्रतीक दिया है । यदि यह शौनक स हवाका महा rearest f भप्रेत होता, तो या तो वे ' शनोदेवीरभिष्टय थापो ' वेदी होने लिखते, ग्रा. ' शंनोदेवीरभिष्टय ' लिखते । ' श्रभिष्टये ' लिखकर उन्होंने ' शौनक संहिता ' के मन्त्र में लुप्त ' ए ' की मात्रा फिर क्यों रख दी? उसकी पूर्वी में क्यों हेरफेर किया? ' सामने ' श्रापः ' न लिखनेसे -हीं- ' श्रभिष्टये ' ही लिखा ' ' यह व्याज भी व्यर्थ है, फिर संहिता की धानुपूर्वी.. इस का याद उन्होंने क्या किया? वस्तुत: रहस्य यही है कि यह उन्होंने ... एकरार मी ११३ ' पैप्पलादी अथर्ववेद संहिता ' के प्रथम मन्त्रका ही प्रथम पाद दिया है । उसका मन्त्र शंनो देवीरभिष्टये, शंनो भवन्तु पीतये ' इत्यादि वेदव रूपसे है । उसमें सामतें ' अच् ' न होनेसे ' ए ' के लोपकी प्राप्ति ही संहिताक कोई पर नहीं है । अतः भाष्यकारने ' शंनो देवीरभिष्टये ' पाठ दिया । इससे यह बात सर्वथा ही पुष्ट हो गई कि उन्होंने यह पैप्पलादी ग्रथनं -. हो श्री संहिताका ही प्रथन मन्त्र - प्रतीक दिया है । स्वतन दी होने वा यदि यह कहा जाये कि ऐसी मात्रा हेरफेरसे इस मन्त्रके यम मन्त्र वेदत्वमें क्षति नहीं आती. ऋतः इसे ' शौनक संहिताका ही मन्त्र मान लिया जाय ' इस पर निवेदन यह है कि केवल यही युक्ति तो हमने व्हते, एक अपने पंत्तके सिद्ध करनेकी रखी नहीं । ग्रन्य बहुत सी उपपत्तियों से इंस पर भी हमने अपने पक्ष की सिद्धि कर दी है, पर इस बातसे वादीकी ही हानि होगी । फिर तो वादीके अनुसार मन्त्रों में जहाँ थोड़ा बहुत हैर-फेर शाखाओं में किया गया है, वाढीकी उसे भी ' एकदेशविकृतमनन्य-उपादे वद् ' इस ' न्यायसे चेदं मानना पड़ेगा, फिर भी वो वही हमारा पक्ष हो CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. श्रीपतञ्जलि एवं ' शश्नोदेवीरभिष्टये ' १३३ श्राकर उपस्थित होगा कि - शाखाएँ भी वेद हैं । यदि कहा जावे कि वेद - मन्त्री विद्यमानतामें शाखाका उसका हेर - फेर किया हुआ मन्त्र व्यर्थ है, तो फिर ऋग्वेद सं ० के जो मन्त्र ४०० संख्यांके ऋग्वेद-संहितामें वृछ हेर - फेरसे श्राये हुये हैं उन्हें भी व्यर्थ समझकर निकाल देना पड़ेगा । १३७५ मन्त्रों में से ६८७ मन्त्र ऋग्वेद संहिता के निकाल-करमन्त्रोंकी यजुर्वेद संहिता बना देनी पड़ेगी । सामवेद सं ० में जिसकी मन्त्र सख्या १८२४ है. ऋग्वेद स ० के विकृत अथवा श्रविकृत मन्त्र निकालकर शेष ७५ मन्त्र बच्चा देने होंगे । अथवंद संहिता के जिसके ५६७७ मन्त्र हैं, उनमें ऋग्वेदादि संहिताओंके मन्त्र निकालकर शेष ७०० मन्त्र कर देने पड़ेंगे । यदि उक्त मन्त्र ऋग्वेद संहिताके नहीं, किन्तु अपनी - अपनी संहिताओंके हैं, वे ऋग्वेद संहिता के मन्त्रों - जैसे होते हुए भी व्यर्थ नहीं, वैसे ही सभी शाखाओं में स्थित इन चार शाखाओं जैसे मन्त्र भी व्यथं नहीं, किन्तु उनके अपने ही हैं और अपने अपने यज्ञमें बोलनेके लिए हैं - यह जानना चाहिये । इनमें अपनी बुल- परम्पराके अनुसार अथवा ' स्वस्य च प्रियमात्मनः ' ( मनु ० २।१२ ) के अनुसार कोई भी संहिता ली जा सकती है, वह भी वर्तमान प्रसिद्ध चार संहिताओंकी भान्ति वेद ही हैं । काठक पैप्पलाद श्रादि वेद संहिताएँ महाभाष्यकारके समय प्रचलित थीं ' ग्रामे ग्रामे काठकं कालापं च प्रोच्यते ' ( ४३।१।१०१ ) । भाष्यकारकी पैप्पलादी श्रथर्ववेदसंहिता कुल शाखा थी यह सिद्ध किया जा चुका है अतः उन्होंने उसीका प्रथम - मन्त्र - प्रतीक दिया । स्वामी दयानन्द जीका मत ( १ ) जो लोग भाष्यकारकी श्रथर्नवेदी नहीं मानते, वे कम से कम ' शंनोदेवी ' को अथर्ववेदका प्रथममंत्र - प्रतीक तो श्रंवश्य मानते हैं, और. उसे प्रथमपदमें देनेके भिन्न - भिन्न कारण भी बताते हैं, तब भी हमारे An eGangotri Initiative

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१३४ श्रीसनातनधर्मालांक: ( ४ ) ही पक्षको सिद्धि है । श्री स्वामी दयानन्दजीने भी ' ऋग्वेदादिभाष्य. भूमिका ' के ८६ पृष्ठमें यही माना है । उनके यह शब्द हैं, ' वैदिकाः खल्वपि शं नो देवीरभिष्टये, इषेत्वा, श्रग्निमीले, श्रग्न श्रायाहि ' इति महाभाष्यकारेण मन्त्रभागस्यैव वेदसंज्ञां मत्वा प्रथममंत्र - प्रतीकानि वैदिकशब्देषु उदाहृतानि ' । जिज्ञासुजी स्वामी दयानन्दजीके कथनमें कोई भी भूल नहीं मानते – सो ' शं नो देवीरभिष्टये ' यह प्रथममन्त्र-प्रतीक ' पैप्पलादी अथर्ववेद संहिता ' का ही है । यद्यपि आजकल उसमें यह नहीं मिलता, उसका कारण यह है कि ' पैप्पलाद संहिता ' के प्रथम दो पत्र नष्ट हो चुके हैं । स्वामी दयानन्दजी भी सभी शाखाओंको वेद माना करते थे । अतएव स्वामीजीने अपने ' वामिक, आख्यातिक, सामासिक, कारकी * कई महाशयों का यह विचार है कि- ' वैाङ्गप्रकाशके सभी भाग स्वामीजीसे बनाये नहीं, किन्तु पं ० भीमसेनबी आदिके बनाये हैं, पर हम इससे सहमत नहीं । यदि ये स्वामीजीके न होते, तो वे उन पर व्याख्यातृत्व अपना नाम न रखवाते, इनका प्रचार न करवाते, इनके प्रकाशन में देरी करनेमें प्रेसके प्रबन्धकको न डांटते 1 । संशोधन में भी उन्हीं का हाथ था । लिखने तथा प्रशोधनांदिका कार्य अवश्य पं ० भीमसेनजी आदि करते थे । स्वामीजी तो भिन्न देशोंमें रहते हुए प्रचारार्थ अपने प्रोससे इन वेदाङ्ग-प्रकाशको आग्रहपूर्वक मंगवाते थे । पं ० भीमसेनजीको अपनी सन्निधिमें रखकर अपनी देख - रेख में उनसे संशोधन भी करवा लेते थें । यदि यह उनकी पुस्तकें नहीं हैं, तो उक्त पुस्तक प्रकाशकों को उनका नाम वहांसे हटा देना चाहिए । चत्र तक उन पर उनका नाम है. तत्र तक उन पर उत्तरदायित्व भी उन्हीं का है । हां, उनके कई सिद्धान्त समय - समय पर बदलते रहते थे । यदि उक्त बात न मानी जावे, तो स्वामीजीकी सभी सत्यार्थप्रकाश आदि पुस्तकें पं ० भीमसेनजी आदि कृत माननी पड़ेगी । श्रीपतन्जलि एवं ' शन्नोदेवीरभिष्टये ' १३६ आदि ग्रन्थोंमें वैदिक उदाहरण इन चार संहितार्थासे भिन्न यह भी दिये हैं । तभी ' छन्दो ब्राह्मणानि च तद्विषयाणि ( ४/२/६१ सहा युधि स्वामीजीने अपने ' स्त्रैणताद्वित ' के ६२ पृष्ट में ' छन्द ' के ) ३ लिख ' पैप्पलादाः, वाजसनेयिनः ' यह उदाहरण दिये हैं । ' बन्द ' उदाक्षा ' ग्राम स्वामी दयानन्दजीकी ' वेद ' इष्ट हैं; तभी ' सत्यार्थ प्रकाश ' पैप्पल स्वासके अन्तमें उन्होंने यही सूत्र देकर ब्राह्मणभागको छन्द सप्तम ( वेद f भिन्न सिद्ध किया है । ' छन्दो - वेद- निगम - मन्त्र- श्रुतीनां पेर्यायवाचकत्वात् ', ' छन्दांसि मन्त्राश्व इति पर्यायी ' ( ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका पृष्ट ७६ ) यहाँ । स्वामीजीने ' छन्दु ' का अर्थ ' वेद ' माना है । ' आङनुनासिक ( ३ स उसकी ( १४८ ) ' नामिक ' के इस सूत्र में ' छन्दसि ' का अर्थ स्वामीजीने के जैसे ग यह किया है । इस प्रकार ' छन्दसि वात्रा ' ( २०२ ) आदिके लिए ि स्वामीजी के प्रमाण दिये जा सकते हैं । ऊपरके सूत्र में स्वामी दयान यह य जीने ' छन्द ' का उदाहरण ' वाजसनेयिनः ' यह दिया है, यह तो स कृत्वा मानी हुई ' यजुर्वेदसंहिता ' के लिए है । दूसरा उदाहरण ' वैष्पतः गोपथन दिया सो ' पैप्पलाद संहिता ' को छन्दके उदाहरणमें देकर स्वार्फ यह अथ ने स्पष्ट कर दिया हैं कि -- वाजसनेयी तथा पैप्पलाद संहिता दो समान वेद हैं । केवल यही नहीं, अपितु ' स्त्रैणवादित ' के ८० पृष्ठमें स्वामी ही हुआ ३१३ वार्तिककी व्याख्या करते हुए ' पिप्पलाद संहिता ' को ' श्राम जत्र पह माना है ' – ' चरणाद धर्माम्नाययोः, पैप्पलादकम् ' । इसी प्रकार प्रतीक भाष्य ' में भी ( ४ | ३ | ३ | १२० में ) ' पैप्पलाद ' को ' श्राम्नाय ' माना ' समर्थित इसी प्रकार स्वामीजीने ‘ स्त्रैणवादित ' के ४३६ वार्तिकमें ' दुर्बलता " अथर्ववे शव्दको चरण - दावी मानकर ' श्राथर्वणिकस्य धर्म आम्नायो वा आय CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 87

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१३६ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) यह उदाहरण दिया है । आम्नाय वेदके सम्प्रदायको कहते हैं । श्री-संहि युधिष्ठिरजी मीमांसकने श्रपने ' व्याकरण शास्त्र के इतिहास ' ( ४०२ पृष्ठमें ग ६१ ) लिखा है, ' चरणाद् धर्माम्नाययोः ' की व्याख्यामें टीकाकार ) के उदाहा " आम्नाय का अर्थ ' वेद, करते हैं । " ' शंनो देवी ० ' समस्त उसी श्रथर्ववेद इन्द पैप्पलाद संहिताका प्रथम मन्त्र - प्रतीक है । सुतरां सभी वेद संहिताएं सप्तम वेद सिद्ध हुई । न्द ( गोपथका मत । चन्दांसि दे ( १० ) स्वामी दयानन्दजीने ' अथर्ववेद ' का. ब्राह्मण ' सत्यार्थ ० ’ = ) यहाँ । ( ३ समु ० ४२ पृष्ठ ) में ' गोपथ ' को माना है । अब इस विषय में किन उसकी भी साक्षी देखनी चाहिए कि वह श्रथर्ववेद किसे मानता है । जीने दे जैसे गोपय ' अग्निमीले ' इत्येवमादिं कृत्वा ' ऋग्वेदमधीयते ' यह ऋग्वेदके यादिके बहू लिए लिखता है, जैसे ' इषे त्वा ' इत्येवमादिं कृत्वा ' यजुर्वेदमधीयते ' मी दया यह यजुर्वेद के लिए लिखता है; जैसे गोपथ ' श्रग्न श्रायाहि ' इत्येवमादिं यह तो रू कृत्वा ' सामवेदमधीयते ' यह सामवेदके लिये लिखता है; वैसे ही ' वैप्पलः ' गोपथने ' शं नो देवी ' इत्येवमादिं कृत्वा ' अथर्ववेदमधीयते ' ( १।१।२६ ) कर स्वार्फ यह अथर्ववेदके लिए लिखा है । संहिता दो ' आादिं कृत्या ' का पहले तीन वाक्योंमें जो श्रर्य होगा; ही चतुर्थ वाक्यका भी होगा, क्योंकि उद्दिष्ट प्रतिनिर्दिष्ट शब्दोंका अर्थ समान स्वामी ही हुआ करता है; श्रन्यथा भग्नप्रक्रम दोष उपस्थित हो जाता है । सो - ' श्राव जत्र पहले के दिये प्रमाणोंसे ' शं नो देवी ' अथर्ववेद - संहितांका प्रथम - मन्त्र-प्रकार प्रतीक सिद्ध हो चुका है, तो यहां की साक्षी से भी वही बात सिद्ध तथा = य ' माना । ' समर्थित हुई । वादियों द्वारा भिन्न अर्थ करना खींचातानी तथा श्रपने पक्ष की में ' अर्क दुर्बलता प्रकट करना है । इस प्रकार स्वामी दयानन्दजीके माने हुए— वा श्राव ' अथर्ववेद ' के ब्राह्मणने ' पैप्पलाद संहिता ' को अपना वेद बताकर, CC - 0. Ankur Joshi श्रीपतन्जलि एवं ' शश्नोदेवीरभिष्टये ' १३७ उसीको ' अथर्ववेद संहिता ' सिद्ध करके हमारा पक्ष और भी स्पष्ट करं दिया है । वहाँ ( गोपथ में ) ' श्रापः स्थानम् तस्मात् सर्वमापोमय ' बताकर ' शं नो देवी ' इस अप् ( जल ) वाचक मन्त्र को अपना आदिम मन्त्र मानकर पैप्पलाद संहिताको श्रथर्ववेद सिद्ध कर दिया है । वैसे तो ' शं नो देवी ' मन्त्र चारों वेद संहिता में श्राया है, यह पूर्व बताया ही जा चुका है, पर श्रादिम वह ' अथर्ववेद- पैप्पलाद संहिता का ही है । यही ' श्रादि कृत्वा ' का निष्कर्ष है । यही महाभाष्यकारका इष्ट है । शौनकसंहिताके छठे सूक्तके श्रादिम - मन्त्र ' श नो ' को उसी ( शौ ० सं ० ) के प्रथम सूक्तकी श्रादिमें पढ़ना यह उस संहिताकी धनु-पूर्वीमें हेर - फेर करके उसे थवेद ( वेद - भिन्न ) बनाना है । अपनी संहिता-की श्रानुपूर्वी से तत्तन्मन्त्र को पढ़ना यही ' स्वाध्याय ' करना है । ' स्वाध्याय ' में ' स्व ' शब्द अपनी वेदसंहिताका ही मुख्यतया पढ़ना वा प्रयोग करना सिद्धान्तत कर रहा है । Collection Gujarat. ' निरुक्त ' के निपात प्रकरण में वेदसंहितावाचक ' श्रध्याय ' शब्द आया है, पर ' स्व + अध्याय ' शब्द ' अपनी वेदसहिता ' बता रहा है.। ‘ स्वाध्यायोध्येतव्यः ' ( तै ॰ था ० २।१५ ) में यही विवचित है । श्रन्यथा ' स्वाध्यायः कर्तव्यः ' को छोड़कर ' स्वाध्यायोध्येतव्यः ' यह पुनरुक्ति क्यों की गई? इससे स्पष्ट है कि- ' स्वाध्याय ' शब्द थपनी ' वेदसंहिता ' को बता रहा है । श्रीसायणाचार्यने भी अपनी ' कारवसंहिता ' की ' माष्योपक्रमणिका ' में लिखा है — ' यद्यपि एनयो: ( तैत्तिरीयकाण्व ) शाख्योराध्वर्यवे एव प्रयोगः प्रतिपाद्यते; तथापि मन्त्र पाठविशेषैः प्रयोगविशेषैर्महान् भेदः । स च अनुष्ठातृभेदेन व्यवस्थितविषयत्वाच चिकल्प्यते । श्रतएव ' स्वाध्यायोध्येतव्यः ' ( तै ० प्रा ० २।११ ) इति ‘ स्वकीय शाखाध्ययनमनुष्ठान विशेषाय विहितम् ( चौखम्भा संस्करण An eGangotri Initiative

पृष्ठ 88

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१३८ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) पृष्ठ १०२ ) । श्रीसायणके ऋग्वेदभाष्योपोद्घातका उद्धरण पहले दिया ही जा चुका है । तभी तो ' गृह्या संग्रह ' में भी कहा है -- ' य: स्वशाखो-तमुत्सृज्य परशाखोक्तमाचरेत् । श्रप्रमाणमृषिं कृत्वा सोन्धे तमसि -मज्जति ' ( सह ३ ) । भाष्यकारके मतमें चार वेद ( ११ ) अब — ' महाभाष्यकार चार वेद किसको मानते है ' – यह विचारणीय है । यह बात अवश्य श्रवधेय है कि ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद कहीं स्वतन्त्र नहीं मिलते । उन - उनकी संहिताएँ ही मिलकर वही वही वेद हुआ करता है । यही बात भाष्यकार कहते हैं, ' चत्वारो वेदा बहुधा भिन्नाः ' एकशतम् ( १०१ ) अध्वर्यु ( गजुर्वेद ) -शाखाः, सहस्रवर्त्मा ( शाखः ) सामवेदः, एकविंशतिधा बाह्र ध्यम् ( ऋग्वेदः ), नवधा श्राधर्मणो वेदः, ( सर्वे देशान्तरे ' वार्तिक पस्पशाह्निक-में ) यहाँ पर महाभाष्यकारने अथर्णवेदको अन्तमें रखकर अपना उसमें ममत्व बताकर अपने आपको ' अथर्ववेदी ' सिद्ध किया है । क्योंकि-स्वेष्ट पदार्थको उत्तम दिखलाते हुए वक्ता या तो उसे सबसे पूर्ण रखता है, या सर्वान्तमें । यह समय समयका दृष्टिकोण है, जैसे ऋ ० सं ० १०।७११ में यजुर्वेदको सर्वान्तमें रखकर उसकी प्रधानता बताई गई हैं 1 । इसलिए भाष्यकार अपनी संहिता ' पैप्पलाद ' को अन्य संहिताओं के अन्त में उसकी उत्तर - पक्षता रखते हुए अन्यों की पूर्ण पक्षता बठाते हैं । उक्त भक्तिका अर्थ स्वामी दयानन्दजीने ' नामिक ' ( पृष्ठ ४ में ) इस प्रकार किया है- ' एक सौ एक व्याख्यानयुक्त यजुः, हजार व्याख्यानयुक्त साम, इक्कीश ( स ) व्याख्यानयुक्त ऋक्, नव व्याख्यानयुक्त ' अथर्ववेद ' । इस अर्थके अनुसार ११३१ संहिता चारों वेदोंकी सिद्ध श्रीपतञ्जलि एवं ' शत्रोदेवीरभिष्टये ' ६४० होती हैं, अर्थात् उक्त भाष्यकारके प्रमाणसे ग्यारह यजुर्वेद संहिताएँ ही चारों वेद हैं । यदि ११३१ संहिताओं से सौ: स्वतन्त्र अनुसा कहीं मिल जाते; तब तो कदाचित् वेद और संहिताएँ उनके पृथक् पृथक् होतीं । पर कहीं भी चले जाएँ, वहाँ ऋग्वेद दे इ सामवेद, अथर्ववेद कभी न मिलेंगे, किन्तु ऋग्वेदसंहिता, पढ़े संहिता, सामवेदसंहिता और अथर्ववेदसंहिता ही मिलेंगी । सभी सनेयी ' इसका तात्पर्य यह है कि- ' इयम् ऋग्वेदस्य संहिता अस्ति । वेदस्य संहिता अस्ति ' । ' ऋग्वेद संहिता ' आदिमें ऋग्वेदस्य रहस्य ह षष्ठीतत्पुरुष है । फिर प्रश्न होगा कि यह अथर्ववेदको कौनसी से छुपाया है, वो उत्तर मिलेगा कि पैप्पलादी अथवा शौनकी श्रादि । जैसे वेद मान श्रीपाणिनि जब यजुर्वेदमात्र ( यजुः की सब संहिताओं ) अर सनेयीस ( विशेष रूप से ) लिखना चाहते हैं, तो ' यजुषि ' लिखते हैं । हैं, चाहे यजुर्वेदकी किसी विशिष्ट संहिताका नाम लिखना चाहते हैं, तो लिखा क हैं - ' देवसुम्नयोर्यजुषि काठके ' ( ७४३८ ) इससे श्रीपाणिमिने यह सूचित किया है कि वेदसहिताओंका सनेय यजुर्वेद संहिता, काण्वयजुर्वेद पैप्पलाद अथर्ववेद सहिता, शौनक लिखना चाहिये । ज़र्व विशेष संहिताका नाम न संहिताओंके समुदाय ) का नाम लेना नाम ' यजुर्वेद काठक संहता, व की एक-संहिता, यजुर्वेद मैत्रायणी में यह श्राव अथर्ववेद संहिता ' आदि ठ चाठ का अध्याय लिखकर संहितामात्र ( सर्व के मण्डल हो, तब यजुः श्रथवा यह ही क्यों श्रथर्ववेद इत्यादि कहना चाहिये । यदि केवलमात्र ' वाजसनेयी हि नियन्त्रण ही ' यजुर्वेद ' होती, अन्य यजुर्वेद की संहिताएँ ' यजुर्वेद ' न है यदि वो नेद्रज्ञ श्रीपाणिनि ' यजुषि काठके ' न लिखते । इससे श्रीपति फिर तो प्र इष्ट यह है कि प्रत्येक वेद - संहिताको ' काठकयजुर्वेद संहिता, कपिल छोटा क्यो CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 89

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१४२ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) सोम फजुर्वेद सहिता ' इत्यादि रूपसे लिखा जावे । इससे श्रीपाणिनिके तन्त्र अनुसार भी सभी संहिताएँ वेद सिद्ध हुई । च उनके इस प्रकार ' अथ वेद संहिता तो सभी होंगी, पर यह जानना वेद, पड़ेगा कि यह ' शौनक ' संहिता है वा ' पैप्पलाद ' । ' यजुर्वेद संहिता ' तो व्हता, य सभी मिलेंगी पर यह जानना पड़ेगा कि यह ' तैत्तिरीय ' है वा ' बाज-71 सनेयी ' वा ' काएव ' वा ' मैत्रायणी ' चा ' काटक ' वा ' कपिष्ठलेकठ ' । यही अस्ति ' ऋग्वेद ' आदि नाम न होकर ' ऋग्वेद सहिता ' आदि नाम होनेका वेदस्य । रहस्य है । हाँ, किसी ने अज्ञानवश वा किसीने पक्षपातवश, जैसा न कौनसी छुपाया हो तो यह अन्य बात है । श्रथवा कई सभी संहिताओंको स्वतन्त्र न्द । जैसे वेद मानकर सभी स ंहिताओं को ही वेद लिखा करते हैं, चाहे वह वाज • 7 ) अर सनेयी संहिता हो, चाहे कारव सं ० उसे ' यजुर्वेद ' ही लिखा करते बते है ॥ हैं, चाहे वह शौनक सं ० हो, चाहे पैप्पलाद सं ०, उसे ' अथर्णवेद ' ही लिखा करते हैं । -हैं, वो पाणिनि । यह तो प्रश्न ही व्यर्थ है कि किसी वेदकी नौ संहिता; तो किसी संहता की एक सौ एक क्यों? किसी की हजार तो किसी की इक्कीस क्यों? यह श्रावश्यक नहीं कि ऋग्वेद शाकलसंहिताके दस मण्डल है, श्र आदि Pe थाठ टक हैं; तो अथर्ववेद शौनक वा पैप्पलादसंहिताके दस वा आठ काण्ड क्यों नहीं? यजुर्वेद वाजसनेयी वा काण्वसंहिताके ४० अध्याय हैं; तो यजुर्वेद तैत्तिरीयसंहिता के सात काण्ड ही क्यों? किसी ( सब के मण्डल है; तो दूसरे के अध्याय, श्रन्यके श्राचि हवा वा काण्ड थवा बही क्यों हों? यह तो श्राविष्कर्ता की अपनी इच्छा है, इस पर किसीका यीनी नियन्त्रण नहीं हो सकता । बंद'न यदि यह बात न मानी जावे. तब तो प्रश्नोंका अन्त ही न होगा । श्रीपति फिर तो प्रश्न होगा कि - श्रजी! श्रमुक वेद बड़ा क्यों छोटा क्यों है? चारों वेदों की मन्त्रसंख्या है? अमुक समान क्यों नहीं? वस्तुतः ये CC - 0. Ankur Joshi श्रीपतञ्जलि एवं ' शन्नोदेवीरभिष्टये ' १४ ९ सब निस्सार प्रश्न हैं । इनका एक ही उत्तर है- ' प्रभुः स्वातन्त्र्य-मापनी यदिच्छति करोति तत् । पाणिनेर्न नदी गङ्गा यमुना चं, स्थली नदी ' । यह प्रभुकी इच्छा है. जैसा वह चाहता है, करता है । पाणिनि, व्याकरणकै प्रभु थे; उन्होंने गङ्गा - यमुनाको ' यू स्पाख्यौ नदी ' सूत्रा-नुसार ' नदी ' नहीं माना, ' स्थली ' जिसमें पानी की एक बून्द भी नहीं, ' उसे ' नदी ' माना है । क्यों? केवल स्वेच्छा । फलतः श्रीपतञ्जलि ११३१ सभी संहिताओंको ही चार वेद मानते हैं । समुदायरूपसे तो मानते ही हैं. ' समुदायेषु हि शब्दाः प्रवृत्ताः श्रवयवैष्वपि वर्तन्ते ' इस स्वसम्मत न्यायसे पृथक् पृथक् भी सब संहिताओं को वेद मानते ही हैं । इस न्यांयसे यदि शाकलसंहिताको कोई ऋग्वेद, वाजसनेयसंहिताको कोई यजुर्वेद लिखता है, उसे कावं, तैत्तिरीय श्रादिको भी यजुर्वेद, पैप्पलाद यादि को भी अय-- वेद आदि लिखना चाहिये । शाखाओं के वेदत्व में भाष्यकारकी अन्तरङ्ग सम्मति Collection Gujarat. ( १२ ) इस पर मह भाष्यकारकी अन्तरङ्ग सम्मति भी द्रष्टव्य है । इस पर विद्वानोंको सूक्ष्म दृष्टि कर्तव्य हैं । प्रत्याहाराह्निक में ' एग्रोह ' सूत्र में अर्ध एकार प्रोकारको सिद्ध करते हुए पूर्वपतीने कहा है-च भोः! छन्दोगानां सात्यमुप्रिराणायनीया अर्धमेकारमर्धमोकार च ' धीयते: सुजाते एश्वसूनृते ' इति । श्रर्थात् - सामवेदकी सात्यमुग्रि, --राणायनीय संहितामें अर्ध एकार पढ़ा गया है । इस पर भाष्यकारने समाधान दिया है ' पारिषदकृतिरेषा तत्र भवताम् । नैव हि लोके, नान्यस्मिन् वेदे श्रर्ध एकारोस्ति ' अर्थात् - यह राणॉयनीय संहिताकी अपनी शैली है, न अर्ध एकार लोकमें है, न दूसरे वेदमें । An eGangotri Initiative

पृष्ठ 90

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१४२ श्रीसनातनधर्मालोक: ' ४ ) महाभाष्यकार ' दीर्घप्लुतौ पुननैव लोके, नैव च वेदे ' संवृतौ स्तः ' इस प्रकारके वाक्योंमें ‘ नैव लोके, नैव च वेदे ' ऐसा बहुत कहा करते हैं; पर ऊपर के वाक्य में कुछ विशेषता है । वहां ' नापि च वेदे ' – न कह कर ' नान्यस्मिन् वेदे ' यह कहा है । पहले वाक्यका अर्थ है - ' न लोकमें, न ही वेदमें; पर दूसरे वाक्यका अर्थ होता है - " न लोकम़ और न अन्य वेदमें ” । इस वाक्य पर विद्वान् सूक्ष्म दृष्टि डालें । इसका आशय यह है कि 1 अर्ध एकार सामवेद राणायनीय संहितामें तो है, पर अन्य वेदमें नहीं ' । ' अन्य वेदमें नहीं ' कहनेसे सिद्ध हुधा कि- ' इल वेदमें तो अर्ध एंकार है ' । ' किस नेदमें? ' उत्तर है कि— ' सामवेद सात्यमुग्रिराणायनीय संहिता ' में यह श्र एका कौथुम सामवेद संहितामें भी नहीं है । इससे स्पष्ट है कि भाष्यकार ' राणायन संहिता ' को सामवेद मानते हैं । यदि वे न मानते, तो उत्तरका सीधा प्रकार था कि- ' नैव हि लोके, नैव च वेदे अर्ध एकारोस्ति, किन्तु केवलम् ऐकदेशिकेस्मिन् पुस्तकेस्ति ' इति । पर ऐसा न कह कर ' नान्यस्मिन् वेदेस्ति ' ऐसा वे कहते हैं; इससे स्पष्ट है कि- वेदविद्वान् श्रीपतञ्जलि सभी -११३१ संहिताओंको ' चार वेद ' मानते हैं । ( १३ ) इसका अन्य प्रमाण भी प्रयोग दिखलाते हुए महाभाष्यकार कहते श्रभिमताः शब्दाः, एतेषामपि प्रयोगो उत्तर देते हुए कहा गया है- ' वेदे । तद् ' यद्वो रेवती रेवत्यां तमूष ' । जो लोग शौनक इन संहिताओंको क्रमसे चार वेद देखिये – ' अप्रयुक्त ' शब्दोंका हैं- ' ये चाप्येते भवतोऽप्रयुक्ता दृश्यते । क्व? ' इस प्रश्नका यथा- ' सप्तास्ये रेवतीरे वदूष ' शाकल, वाजसनेय, कौथुम, मानते हैं. वे यह भी मानते हैं कि - " यह, पूर्ण वेद हैं । न तो इनमें प्रक्षेप ( अधिकता ) है, और न ही न्यूनता है । अब महाभाष्यप्रोक्त इन दो उदाहरणोंको उन श्रीपतञ्जलि ए ' शन्नोदेवीरभिष्टये ' १४४ वेदसंहिता में हूँढना चाहिये । उसमें पहला ' सप्तास्ये रेवती ' ' श्राख्य ऋ ० शा ० सं ० ४।२१ / ४ में मिल गया है । श्रय ' यही रेवती लिखा रेक तमूष ' भाष्यकारसे प्रोक्त ' वेद ' के इस दूसरे मन्त्रको हू ढना. चाहिये पर यह इन चारों संहिताओंमें ही नहीं मिलता । श्रुतः स्पष्ट है । सूत्रके यह किसी लुप्त वेदसंहिताका है । अंशतः यह ' यजुर्वेद काठक सहिद पति-( ३१७, में मिलता है । ( 01911 इसी प्रकार ' वेदशब्दा अपि एवमभिवदन्ति ' कह कर ' योि मन्त्रभ ष्टोमेन ' यजते, य उ चैनमेवं वेद ' यह महाभाष्यका दिया वेदमन्त्र भाष्यम वर्तमान चार वेदसंहिताश्रमें नहीं है, किन्तु अन्य संहिता वा प्राह्म नहीं ( ६२.६ इस प्रकार भाष्यकारके अन्य भी बहुतसे वैदिक उदाहरण दिये श्रादि म सकते हैं, जो वर्तमान चार वेदसंहिताओंमें नहीं मिलते । इससे सदमेद ह है कि - महाभाष्यानुसार सभी ११३१ संहिता चार वेद हैं, के यजुर्वेद शाकल, वाजसनेय, कौथुम, शौनक संहिताएँ ही ' चार वेद ' नहीं । भाष्यक ( १४ ) एतद् -विषयक महाभाष्य के प्रमाणोंकी न्यूनता तो नहीं । संहिताप पर स्थान तथा समय न्यून है, अतः महाभाष्यका एक अन्य उदाहर तथा प्राप्त शतपथ एवं निरुक्तादिकी कुछ साक्षियाँ देकर यह निबन उपसंहृत किया जायगा । भाष्यकारने यजुर्वेदकी १०१ संहिताएँ म हैं - यह कहा ही जा चुका है । इनमें ८६ कृष्णयजुर्वेद संहिताएँ । कर से तिरी तथा १५ शुक्ल । इन दोनोंका जोड़ १०१ है । इन दोनोंको भी भार' शतपथ कार समानरूपसे वेद ही मानते हैं । वेद विषय से परिचय रखने को' दध्यङ् पाठकोंको मालूम होगा कि - ' ऋषि ' भी ' वेद ' ' को कहते हैं । किं – ‘ सम्बुद्धौ शाकल्यस्येतावनार्षे ' ( प ० 111१६ ) । सन्धि लिए भागात्म पृ ० ६ में स्वामीजीने भी ' आप ' का अर्थ ' वैदिक ' कह कर ' ऋषि ' कहा ह अर्थ, बेद ' किया है । ' कर्तरि चर्षिदेवतयोः ( ३२॥१८६ ) इत्यादिम CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative