सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 101–110

सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 101–110

पृष्ठ 101

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शिखाकी वैज्ञानिकता ७१ शिखा वाह्य चिह्न ( ३ ) शिखा हिन्दुजातिका उपयोगी बाह्यचिह्न है । यद्यपि ' न लिङ्ग ' धर्मकारणम् ' ( मनु ० ६।६६ ) चिह्न धर्मका कारण नहीं होता; तथापि यदि चिह्नमात्र भी न हो, तब लोकलज्जा आदिके न होने से पुरुष सर्वथा कर्तव्यहीन हो जावे । इस चिह्नके होनेसेही हिन्दुओं में आज भी सन्ध्यातर्पण आदि कर्म सुरक्षित हैं । इस कारण उक्तवचन पर कुल्लूकभट्टने कहा है- ' एतच्च धर्मप्राधान्य - बोधनाय उक्तम्, न तु लिङ्ग - परित्यागार्थम् ' अर्थात् धर्मको प्रधानता देनेके लिये उक्त वचन है; धार्मिक चिह्नको छोड़ देनेके लिए यह नहीं । आजकल हिन्दु लोग अपने चिह्न भी छोड़ रहे हैं, साथ ही धर्म भी छोड़ रहे हैं । कैसे जाना जाय कि ये हिन्दु हैं? मस्तकसे तिलक मिटा दिया गया है, यज्ञोपवीत हटा दिया जा रहा है, धोतीसे लांग हटाई जा रही है; अब शेष बचा हुआ शिखा ( चोटी ) का चिह्न भी हटाया जा रहा है । शोक!!! क्या दशा होगी हिन्दुजातिकी? यह हिन्दु है या मुसलमान - यह कैसे जाना जाय? ( ४ ) मुसलमान अपने चिह्नोंको नहीं छोड़ते; पर ये हिन्दु सुधारक तो अपने चिह्नोंको छोड़कर मुसलमान - जैसे बन बैठते हैं । तब तो हिन्दु - मुसलमान - भेद बतलाने के लिए अश्लीलताका अनुसरण क़रना पड़ेगा, जैसेकि एक ग्रामीण हिन्दुने किया था । ' एक ग्रामीण ( गाँवका ) हिन्दु हिन्दु - प्याऊमें जल पीनेके लिए पहुँचा । किसी हिन्दु - चिह्नके न होनेसे जल पिलानेवालेने ' पूछा कि तू कौन है? हिन्दु है वा मुसलमान? ( क्योंकि मुसलमान आदिको सीधा जल

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७२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) न देकर नली द्वारा दिया जाता था ) उसने उत्तर दिया कि — हिन्दु । तब जल पिलाने वाले ने कहा कि कैसे जाना जाय कि तुम हिन्दु हो? तुम्हारा हिन्दुत्व- चिह्न कोई भी तो नहीं दीख रहा! उस निर्लज्जने अपनी इन्द्रियको निकालकर दिखला दिया कि -देखो - यही हिन्दुत्वका चिह्न है । जल पिलाने वालेने जब उसकी ढिठाई पर बहुत डांटा; तब वह गाँवका हिन्दू कहने लगा कि-आजकल इन्द्रिय ही हिन्दुत्वका चिह्न है । हिन्दुओंने चोटी कटवा डाली, जनेऊ को सदा के लिए धोवीको दे दिया, तिलक मिटा दिया, लांगको खोल दिया, हिन्दु - वेषको विदा कर दिया । अब वे चिह्न तो गये । इस अंशमें तो हिन्दु - मुसलमान बराबर होगये । अब भेद रह गया है केवल इन्द्रिय में; ' सुन्नत ' से रहित इन्द्रिय वाला हिन्दु, और ' सुन्नत ' - सहित इन्द्रिय वाला मुसलमान - यह भेद है । आजकल नान - मुसलिम ही हिन्दु है । इसीलिए मैंने अपना हिन्दुत्व का चिह्न अपनी इन्द्रिय दिखलाई है । तुम गुस्सा क्यों करते हो? उस समय वहाँ दूसरे हिन्दु भी इकट्ठे होगये थे । उस गाँव वालेकी ढिठाई होनेपर भी सवने उसकी बात सच्ची मानी; और समझदारोंने आजकलकी हिन्दुजातिपर खेद प्रकट किया । इस प्रकार सन् १६४५ की होलीमें एक नगर में होली के अवसर पर एक पुरुषने रंग डालने वालोंको कहा कि - ' मैं मुसलमान हूँ, खबरदार! मुझ पर रंग न पड़े ' । उस पुरुषका चोटी जनेऊ नहीं था - यह उसने दिखला भी दिया । वह पुरुष पतलूनधारी था । पर होली में मस्त लोगोंने उसकी पतलून खोल ली । उसका मुसलमानी चिह्न

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शिखाकी वैज्ञानिकता ७३ ' सुन्नत ' न देखकर उन लोगोंने उसे रंगसे सराबोर कर दिया । उसके असत्य - भाषणके दण्डस्वरूप उन्होंने उसे पतलून नहीं दी । तब वह कोटसे अपनी लज्जा ढककर वहांसे भागा । वस्तुतः इन चिह्नोंको दूर करानेवाले पाश्चात्य - शिक्षा से दीक्षित, लार्ड मैकालेके शिष्य सुधारक लोग ही हैं; जिन्होंने पाश्चात्य शिक्षा पाकर हिन्दु-जाती चिह्नोंसे घृणा कर ली । परन्तु लार्ड मैकालेकी दूरदर्शिता उसके अपने विचार से भी बढ़ गई । अव तो यह हिन्दु जनश्रेणी अपने चिह्नोंको छोड़ती हुई रूप-रंगमें भी ' भारतीय ' नहीं दीखती । अंग्रेज- मुस्लिम रमणियोंको स्वीकार करती हुई रुधिरसे भी वैदेशिक हो रही हुई दीख रही है । अंग्रेजों के चले जाने पर भी अंग्रेजियत नहीं गई । खेद!!! इन्हीं लार्ड मैकालेके मानसिक शिष्योंको अपने शिखा आदि चिह्न छोड़ता हुआ देखकर अन्य लोगोंने भी उनका अनुसरण किया । आज भी पूरा - पूरा तो उनका प्रभाव नहीं हुआ; यतः चोटी सर्वथा तो नहीं हटी; आज भी बहुतसे शिखा सूत्रधारी हैं ही । थोड़े लोगोंने शिखा छोड़ी है; उससे उनकी कहीं - कहीं हानि भी दिखाई पड़ जाती है । बम्बई में हिन्दु - मुसलमानोंकी लड़ाई में अनेक हिन्दु हिन्दुओं के द्वारा ही मार दिये गये जो चोटी न होने से हिन्दुओंसे मुसलमान समझ लिये गये थे । ( ५ ) परन्तु कई लोग यह कहते हैं कि - ' शिखा के न होनेसे हम साम्प्रदायिक कलहोंमें मुसलमानों के समूह में निश्चिन्त होकर विचरेंगे; और उनसे हानि न प्राप्त करेंगे । ' पर इस प्रकारके

पृष्ठ 104

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७४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) पुरुष दूर से ही प्रणाम योग्य हैं । बहुत खेद की बात है कि इसी शिखाके बचावकेलिए महाराणा प्रतापने तथा महाराष्ट्र - राष्ट्रपति शिवाजीने, इस प्रकार दूसरे राजपूतोंने प्राणोंको दाँव पर लगा दिया था, गुरु गोविन्दसिंहके लड़कोंने और बालक हकीकतरायने अपने प्राणों की आहुति देने में भी देरी नहीं लगाई; उसी शिखाको यह लोग बिना ही किसी अत्याचारके स्वयं ही काट रहे हैं! ऐ अंग्रेजी राज्य! हम तेरी मुक्तकंठसे प्रशंसा करेंगे । यदि आज मुसलमान सम्राट् औरङ्गजेव होता, तो वह हिन्दुओंकी शिखाके काटने के लिए किये गये अपने अत्याचारोंकी स्वयं ही निन्दा करता और कहता कि- मैंने अत्याचार करने पर भी हिन्दुओं की शिखा कटवाने में सफलता प्राप्त नहीं की; और तू ( अंग्रेजी - राज्य ) ने बिना ही अत्याचार एवं बिना ही उसके रुकवानेके प्रचारके, हिन्दुओंसे चोटी छुड़वा दी, बल्कि भारत-वर्ष से तेरे निकल जानेपर भी हिन्दु तथा उनके नेता भी आज भी उस चोटीका सिरपर रखना हास्यास्पद एवं ' जंगलीपन ' समझते हैं । तभी तो ' टुडे स्मृति ' में अपटूडेट ' फैशनाचार्य'ने कहा है-‘ न शिखां धारयेत् प्राज्ञः टेनिसे हास्यकारिणीम् ' । आजकलके शिखाकी उपेक्षा करनेवाले जानते हैं कि - इसी शिखाके ही कारण हिन्दु जाति आज भी जीती है, धार्मिक परतन्त्रताको प्राप्त हुए भी सांस ले रही है । शिखा - विहीन जातियाँ क्रमसे नाम भी विलुप्त करवा बैठी, और करवा लेंगी । यदि आप अपनी शिखा कटवाते हैं; तो शिखा कटवाने वाली अन्य

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शिखाको वैज्ञानिकता ७५ जातियोंकी तरह आप भी कट जावेंगे । ' धर्म एव हतो हन्ति धर्मो ते रक्षति रक्षितः ' ( मनु ० ८।१५ ) । इस शिखाके महत्त्वको आप I कभी न भुलावें । जो लोग फैशनके दास बनकर या उन जैसोंसे ने ठगे जाकर शिखाको काट देते हैं, वे अवश्य भारी भूल करते हैं; पीछे उन्हें पछताना पड़ेगा । शिखाके ही एकछत्र राज्यकी छायामें समस्त हिन्दुजातिकी एकता हो सकती है । शिखा सर्वव्यापक | ( ६ ) वैसे तो शिखासे कोई किसी भी रूपमें छूटा हुआ नहीं ी है । मुसलमान लोग अपनी तुर्की टोपीपर काले धागे की बनाई चोटी को प्रकारान्तरसे रखते ही हैं । यूरोपियन फौजियोंके टोपी के ऊपर भी रुपहरी वा पीतलकी चमकदार शिखा हुआ ही करती है । इस प्रकार हैट पर भी शिखासदृशता दीखती है । राजाओं वा सेनानायकों के सिरों पर सुन्दर पक्षियोंके पंखकी बनाई I ' कलगी ' शिखाका ही तो दूसरा प्रकार है । थानेदार आदियोंके पटके पर रुपहरा वा सुनहरा गुच्छा शिखा ही तो हैं । किन्हीं के पटके ( साफे ) पर दीख रहा हुआ तुर्रा अथवा पटकेके बीच में पड़ा पठानी कुल्ला ऊँची शिखाका ही तो बोध कराते हैं । किन्हीं I की शिखा तो स्वराज्यान्दोलनसे आन्दोलित होकर साफेकी जेल में बन्द होना न सहती हुई - सी, माथेके अग्रिम केशोंके रूपमें 5 परिणत हो जाती है । परन्तु वैध शिखा न होनेसे वैसे लोग उससे होने वाले लाभको प्राप्त नहीं कर सकते । आजकल के . अ ंग्रेजी बाल भी जिसमें पिछले बाल कान तक काटे जाते हैं,

पृष्ठ 106

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७६ श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) शेष सब रखे जाते हैं— शिखाका ही तो प्रकार है । दाक्षिणात्य लोग इससे उल्टी शिखा रखते हैं, सिरके अग्रिम बालोंको काट देते हैं; शेष सब बालोंकी उनकी चोटी होती है । न केवल मनुष्यों में ही, अपितु पक्षियों में भी शिखा दीखती है । मोर ' शिखी ' नामसे और कुक्कुट ( मुर्गा ) ' ताम्रचूड ' नाम से प्रसिद्ध हैं ही । काष्टकूट पक्षीकी शिखा कैसी सुन्दर होती है । राज - सर्पोंके सिरपर भी प्रकृतिसे दी हुई शिखा सुनी जाती है । पशुओं के सिर पर उभरे हुए सींग उनकी शिखाका बोध कराते हैं । शिखाके कारण ही ये पशु - पक्षी सौन्दर्य एवं कई प्रकारके गुणोंको धारण करते हैं । अग्निदेवता भी शिखा धारण करने से ' शिखी ' कहलाते हैं, जिनका उपासक सारा संसार है । इस विषय में आगे स्पष्टता की जायगी । इस प्रकार वृक्षों में प्रत्येक फलके, प्रत्येक शाखा एवं पुष्पके सिर पर भी शिखा दीखती है । शिखरी ( पहाड़ ) का शिखर भी शिखा होने से ही होता है । ' शिखाया ह्रस्वश्च ' ( ५।२।१०७ ) इस पाणिनिसूत्र से शिखा शब्दको हस्व और ' र ' प्रत्यय करने पर ' शिखर ' बनता है, जिसका अर्थ है ' शिखा वाला ' । शिखा सबसे ऊँची होती है, यह उसकी श्रेष्ठताका प्रमाण है । ' चोटीके विद्वान् ' यह हिन्दीमें ' मुहावरा ' रूपसे प्रयुक्त वाक्य भी शिखाको मुख्य बता रहा है । इस तरह स्थावर जङ्गमात्मक जगत् में जहाँ - तहाँ शिखाका साम्राज्य जिस - किसी रूपसे दीखता ही है । परन्तु हिन्दु लोग नियमपूर्वक शिखाको रखते हैं और उसे धार्मिक चिह्न मानते हैं

पृष्ठ 107

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शिखाकी वैज्ञानिकता ७७ और उससे लाभ उठाते हैं । अन्य जातियाँ नियमपूर्वक शिखाको न नहीं रखतीं, या अनियमित स्थान पर रखती हैं, इसलिए विशिष्ट ट लाभको प्राप्त नहीं करतीं । परन्तु हिन्दु - जातिकी शिखा धार्मिक चिह्नके साथ ही साथ जातीय संघटन एवं एकता प्रदर्शित करती हुई विशेष लाभ भी पहुँचाती है । संस्कार- महिमा ( ७ ) संस्कारका लाभ जगत्प्रसिद्ध है । जब सुवर्ण खानसे निकलता है, तो मलिन होता है । खानसे निकले हुए सोनेका जब । तक संस्कार न किया जावे; तब तक सुवर्ण सु - वर्ण ( अच्छे रंगका ) 5 नहीं होता । तब वर्तमान संस्कृत अवस्थाके समान उसकी दीप्ति । आकृति एवं मूल्य नहीं होते । इसीलिए ही सुवर्णका संस्कार करके उसे सु - वर्ण किया जाता है । संस्कार के बिना कृत्रिम और अकृत्रिम सोनेका परीक्षण भी नहीं हो सकता । संस्कार - द्वारा ही सभी पदार्थ व्यवहारोपयोगी होते हैं I । किसी भी वस्तुमें दोषनिराकरणपूर्वक गुणोंका उत्पन्न करना ही उसका संस्कार कहा जाता है । जब तक किसी भी वस्तुका संस्कार नहीं होता; तब तक वह सदोष और गुणहीन रहती है । संस्कार होने पर ही उसके दोष दूर होकर गुणोंका आविर्भाव होजाता है । हीरेको जब तक शानमें नहीं खरादा जाता; तब तक हीरेका न तो मट्टीका आवरण दूर होता है न ही उसमें चमक आती है । इस प्रकार शारणसंस्कारके बिना तलवार की न धार तेज होती है, न ही उसमें काटनेकी शक्ति आती " है । जब ये वस्तुएँ शानपर चढ़ाई जाती हैं, और इनका संस्कार

पृष्ठ 108

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७८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) किया जाता है; तभी उनके उक्त दोष दूर होकर उक्त गुण प्रकट होते हैं । जड वस्तुकी तरह घोड़ा आदि चेतन पदार्थोंके भी दोष दूर करने और गुणों के उत्पन्न करनेकेलिए संस्कार अपेक्षित होता है । फलतः सांसारिक सब पदार्थोंको यदि उपयोगी करना इष्ट हो तो उस समय संस्कारकी अपेक्षा होती है । इस प्रकारकी कोई वस्तु जगत् में नहीं मिलती; जिसका कार्योपयोग के लिए संस्कार न किया जाता हो । इस प्रकार संस्कार से ही मनुष्यका भी दृष्ट- अदृष्ट मल धुलता है । संस्कार से ही मनुष्य के स्वरूपका यथार्थ प्रकाश होता है । संस्कारसे ही मनुष्यता आती है । संस्कारों से ही मनुष्य के पाप दूर होते हैं । ' मनुस्मृति ' में कहा है— ' गाभैं-मैर्जातकर्म - चौडमौलीनिबन्धनैः । वैजिक गार्मिक चैनो द्विजानाम-पमृज्यते ' ( २।२७ ) ' वैदिकैः कर्मभिः पुण्यैर्निषेकादिर्द्विजन्मनाम् । कार्यः शरीर - संस्कारः पावनः प्रेत्य चेह च ( २२६ ) यहां पर चूडा-कर्म आदि संस्कारोंसे बीज वा गर्भ - सम्बन्धी पापका दूर होना तथा शरीरका पवित्र होना कहा है । यह संस्कारकी महिमा है । शिखा में प्रमाण ( ८ ) शास्त्रों में संस्कार सोलह कहे गये हैं । इस विषय में ' षोडश - संस्काररहस्य ' आगे देखिये । उनमें आठवां संस्कार " चूडाकर्म " है । इस संस्कार में बालकका सिर भद्र कर अर्थात् उसके गर्भसे आये बालोंका मुण्डन करके चूडा ( शिखा ) रखनी पड़ती है । यह संस्कार भी महत्त्वपूर्ण माना जाता है । यह संस्कार

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शिखाकी वैज्ञानिकता ७६ हिन्दुत्वका प्रथम सोपान है । श्री मनुने कहा है- ' चूडाकर्म द्विजातीनां सर्वेषामेव धर्मतः । प्रथमेवदे तृतीये वा कर्त्तव्यं श्रुतिचोदनात् ' ( २-३५ ) यहां पर ' श्रुतिचोदना ' से चूडाकरण - शिखास्थापन कहा है । श्रुति मन्त्र - ब्राह्मणात्मक वेदको कहते हैं । इस विषयमें अन्य पुष्पमें कहा जायगा । कुछ चतुर्थ पुष्पमें देखिये । उसमें मन्त्रभागका लिङ्ग हैं — ' यत्र वाणाः सम्पतन्ति कुमारा विशिखा इव ' ( यजुर्वेद वा ० सं ० १७ | ४८ ) यहां ' विशिखाः ' का अर्थ है - ' विशिष्टा दीर्घा, गोखुर-I परिमारणा, शिखा चूडा येषां तादृशाः कुमारा इव ' । इस मन्त्रमें ' शिखा ' का मूल दीख रहा है । रों अब इस विषय में दूसरा मन्त्र भी द्रष्टव्य है- ' आत्मन्नुपस्थे - न वृकस्य लोम, मुखे श्मश्रूणि न व्याघ्रलोम । केशा न शीर्षन् म. यशसे, श्रियै शिखा सिशुहस्य लोम त्विषिरिन्द्रियारिण ' ( यजुः १६।६२ ) । यहां पर श्री प्राप्त्यर्थं शिखाका धारण कहा है, और शिखाके डा- वालोंको सिंहके लोमके स्थानापन्न कहा है । अब शिखाके था विषयमें ब्राह्मण - भागका प्रमाण देखिये- ' अथापि ब्राह्मणम्-रिक्को वा एषोन पिहितो यन्मुण्डः, तस्य एतद् अपिधानं यत् शिखा-इति ' ( आपस्तम्बधर्मसूत्र १1१०1८ ) यहां शिखारहितको रिक्त -श्री - हीन दिखाया गया है । तब शिखाका स्थापन आयु, बल, तेज कार तथा वृद्धिका सहायक सिद्ध हुआ । ति इस प्रकार अन्य शास्त्रोंने भी शिखाकी आवश्यकता तथा शिखा - छेदनमें प्रायश्चित्तार्हता कही है । जैसे कि — कात्यायन- ' स्मृति ' में कहा है — ' सदोपवीतिना भाव्यं सदा बद्धशिखेन च ।

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50 श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) विशिखो व्युपवीतश्च यत् करोति न तत् कृतम् ' ( ११४ ) यहाँ पर शिखाहीनके कृत्यको अकृत्य वतलाया है । ' लघुहारीतस्मृति ' में कहा है — ' शिखां छिन्दन्ति ये केचिद् वैराग्याद् वैरतोपि वा । पुनः संस्कारमर्हन्ति त्रयो वर्षा द्विजातयः ( १८ ) मोहाच्छिन्दन्ति ये केचिद् द्विजातीनां शिखां नराः । चरेयुस्ते दुरात्मानः प्राजापत्यं विशुद्धये, ( १६ ) इस प्रकार ' स्त्री - शूद्रौ तु शिखां छित्त्वा क्रोधाद् वैराग्यतोपि वा । प्राजापत्यं प्रकुर्यातां निष्कृतिर्नान्यथा भवेत् ' ( लघुहारीतस्मृति २० ) ' खल्वाटत्वादिदोषेण विशिखश्चेन्नरो भवेत् । कौशीं तदा धारयीत ब्रह्म - ग्रन्थियुतां शिखाम् ' ( संस्कार - भास्कर ) इन प्रमाणों से शिखाका रखना आवश्यक सिद्ध होता है । न होने पर कुशाकी शिखा रखना कहा गया है । अन्य शास्त्रों में भी शिखाका वर्णन आता है । इस प्रकार शिखा न केवल हिन्दुत्वका चिह्न है, बल्कि कर्मका अङ्ग भी है । शिखाके बिना मनुष्य वैदिक कर्म में अधिकार प्राप्त नहीं कर सकता । इसी कारण वैदिक यज्ञों में खल्वाट पुरुषको कर्माधिकारी नहीं माना जाता; अथवा वहां पर उस पुरुषकी विवशता विचारकर कुशकी शिखा बनानी पड़ती है । इस प्रकार शिखा केवल हिन्दुत्वका चिह्न नहीं; अन्यथा ज्ञानकाण्डके अधिकारी संन्यासी हिन्दुओंमें न गिने जाते; अतः शिखा हिन्दु-कर्मकाण्डका अङ्ग भी है । शिखा रहस्य ( १ ) यजुर्वेदीय ' तैत्तिरीय उपनिषद् की शिक्षावल्ली में कहा गया है— ' अन्तरेण तालुके य एष स्तन इव अवलम्बते, सा इन्द्रयोनिः,