श्रीगणेशाय नमः।

सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 111–120

सनातन धर्मालोक ५ · पृष्ठ 111–120

पृष्ठ 111

सनातन धर्मालोक ५, पृष्ठ 111 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शिखाकी वैज्ञानिकता ८१ I " i I Π , यत्र असौ केशान्तो विवर्तते व्यपोह्य शीर्षकपाले ' ( ११६१ ) तालुके मध्य में स्तनकी तरह जो केशराजि दीखती है— इसमें केशोंका मूल है | वहां सिरके दोनों कपालोंका भेदन करके इन्द्र-योनि है, इन्द्र अर्थात् परमात्माकी प्राप्तिका भाग सुषुम्णा नाड़ी है । आशय यह है कि — जैसे घट दो कपालोंके संयोग से बनता है, वैसे सिर भी दो कपालोंसे वना है । दोनों कपालोंके मूलको भेदकर सुषुम्णा नाम नाड़ी रहती है । दोनों कपालोंका मूलस्थान सुषुम्णा नाडीका घर है । योगी लोग इडा एवं पिङ्गला नाड़ीकी गतिको पार करके सुषुम्णा को जगाया करते हैं, उसीसे आत्माका साक्षात्कार करते हैं । यह नाडी अपने मूल स्थानसे होती हुई मस्तकके मध्यमें विचरती है । योगी लोग जिस स्थानको सुषुम्णा-का मूल - स्थान मानते हैं; वैद्य लोग उसी स्थानको ‘ मस्तुलिङ्ग ’ नामसे बुलाते हैं | मस्तुलिङ्गके निम्न भागको योगी लोग ' ब्रह्मरन्ध्र ' कहते हैं, और वैद्यगण उसके साथके भागको ' मस्तिष्क ' कहते हैं । वैद्य लोगोंका यह अभिप्राय है कि — सम्पूर्ण शरीरमें प्रधान अङ्ग है सिर, अथवा यह कहना चाहिये कि - व्यष्टि ब्रह्माण्डरूप शरीरकी शक्तियोंका भाण्डार सिर है । सब शरीरमें व्याप्त नस-नाड़ियोंका सिरसे सम्बन्ध है । मनुष्य जीवनका केन्द्र वा आधार भी सिर ही है । सिरमें दो शक्तियाँ रहती हैं; एक ज्ञान - शक्ति, दूसरी कर्म - शक्ति । इन दोनों शक्तियोंकी परम्परा नाड़ी - द्वारा शरीर में व्याप्त हो जाती है; और कार्यरूपमें परिणत हो जाया करती है । इसी कारण शरीरमें ज्ञान और कर्म दो विभाग हैं । इन दोनों ६ स ० ध ०

पृष्ठ 112

सनातन धर्मालोक ५, पृष्ठ 112 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

८२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) विभागोंका मूलस्थान वही सुषुम्णाका मूलस्थान और ब्रह्मरन्ध्र है अर्थात् मस्तु लिङ्ग तथा मस्तिष्क है । मस्तुलिङ्ग कर्मशक्तिका भण्डार है और मस्तिष्क ज्ञानशक्तिका । मस्तिष्क के साथ आंख, कान, नासिका, रसना, त्वचा इन ज्ञानेन्द्रियोंका सम्बन्ध है, और मस्तुलिङ्गके साथ वाणी, हाथ, पैर, गुढ़, उपस्थ इन कर्मेन्द्रियोंका सम्बन्ध है । मस्तिष्क एवं मस्तु लिङ्गका सामर्थ्य वा स्वास्थ्य जितनी अधिकता से होगा, ज्ञानेन्द्रिय तथा कर्मेन्द्रियोंमें भी उतनी प्रबलता सम्पन्न होगी । उन दोनों स्थलोंके अस्वास्थ्य से इन इन्द्रियों में भी विकृति होती है । इसमें उदाहरणों की कमी नहीं है । प्रकृतिकी विलक्षण महिमासे इन दोनों स्थलोंकी प्रकृति भी भिन्न-भिन्न हुआ करती है । मस्तिष्क शैत्यको चाहता है, मस्तुलिङ्ग उष्णताको । मस्तिष्ककी ठंडक के लिए तालु- प्रदेश में क्षौर ( हजामत ) करवानी पड़ती है । उसमें शैत्यार्थ छुरेसे वहांके केश, पानके आकारसे कटवाये जाते हैं; उस पर तेल, साबुन, दही, मलाई आदिका, उपयोग किया जाता है, तालुको जलवायु आदिसे ठण्डा रखना पड़ता है । सिरदर्द होने पर तालुके बाल कटवाने वा मुडवानेसे वेदना शान्त होजाती है । फलतः तालु- प्रदेशस्थ मस्तिष्क तो ठण्डक चाहता है; उससे भिन्न धर्मवाला मस्तुलिङ्ग गर्मी चाहता है । अब प्रश्न यह है कि — मस्तुलिङ्गमें कितनी वा कैसी ऊष्मा ( गर्मी ) अपेक्षित है । ऊष्माकी न्यूनाधिकता से नाडियोंमें प्रकोप हो सकता है, और उससे कई हानियाँ हो सकती हैं; इस कारण उसमें मध्यम ऊष्मा चाहिये । ऊष्मासे ही यह हमारा शरीर है, ऊष्मा गई

पृष्ठ 113

सनातन धर्मालोक ५, पृष्ठ 113 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शिखाकी वैज्ञानिकता ८३ तो शरीर भी शान्त हुआ । मर जाने पर कहते हैं कि ठण्डा हो गया । एक अमेरिकन वैज्ञानिक विद्वानने वक्तव्य दिया है कि यदि हमारी ऊष्मा सुरक्षित रहे; तो हमारी ४०० वर्षकी आयु भी हो सकती है । सो उस ऊष्मा के संरक्षण में शिखा भी एक उपाय है । वह ऊष्मा कपड़े आदिसे नहीं हो सकती; क्योंकि कपड़े आदिके गुण अनेक प्रकारके होते हैं । अतः उनसे पूर्ण लाभकी सम्भावना नहीं हो सकती । यह भी निश्चित बात है कि जो वस्तु जिससे उत्पन्न होती है, वही उसकी वास्तविक सहायक हुआ करती है । जैसे- घड़ा मिट्टी से बनता है, उसके प्रत्येक अवयवकी पूर्ति भी मिट्टी से ही होती है, जल अग्नि आदिसे नहीं । मस्तुलिङ्ग सिरका एक भाग है, उसकी रक्षा भी सिरसे उत्पन्न पदार्थ द्वारा ही हो सकती है, टोपी - हैट आदि से नहीं । शिरसे उत्पन्न पदार्थ बाल हैं; अतः वहाँ घनीभूत गोखुरपरिमाणके बाल ही मध्यम परिमाणकी गर्मी कर सकते हैं; अन्य वस्तु नहीं । गंजापन जितने अंशमें होता है; उतना ही अश चोटीका होता है । इस स्थानपर लम्बे बाल रखना ही गंजेपनका इलाज है । यह पहले कहा जा चुका है कि मस्तिष्कमें ठण्डक अपेक्षित है और मस्तु लिङ्ग में गर्मी । इसलिए मस्तिष्ककी ठण्डकके लिए वहां तालु-प्रदेशमें केश थोड़े अपेक्षित होते हैं; अतः लोग वहां पर अपने बाल . कम करा देते हैं; वा वहां छुरेसे क्षौर करवा लेते हैं, पर स्त्रियों में सौभाग्यके कारण न तो उनका क्षौर होता है; न वहांके बाल कटा

पृष्ठ 114

सनातन धर्मालोक ५, पृष्ठ 114 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

८४ श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) जाते हैं; तब उनके मस्तिष्कको वायु कैसे लगे; इसके लिए हमारे पूर्वजोंने उनके लिए माँग ( सीमंत ) रखना नियत किया है । दो भागों में वाल होजाने से मध्य में माँगकी रेखा होती है; वह मस्तिष्कका स्थान होने से उस रेखाके द्वारा उनके तालुको वायु लगती रहने से मस्तिष्क में ठण्डक रहती है; पर मस्तुलिङ्गकी गर्मी के लिए उस पर घनीभूत केशों की आवश्यकता होती है । मुनियोंने वहाँ उपयुक्त गर्मी के लिए गोखुरके परिमाणके केश माने हैं । इसलिए मस्तु लिङ्ग में गहरे केश सदा रहें; वे अन्य वालोंसे अधिक रहें, भिन्न रहें, ऊंचे रहें, इसलिए उनका नाम भी विशेष रखा गया है ' शिखा ” और उसका सम्बन्ध कर्म - प्रवर्त्तक धर्मके साथ स्वीकृत किया गया है । इसके अतिरिक्त सन्ध्या आदिके अवसर पर परमात्माकी कृपा भी शिखा के ही द्वारा भीतर प्राप्त होती है; इसी कारण ' तैत्तिरीयोपनिषत् ' ने उस स्थानका नाम ' इन्द्रयोनि ' कहा है यह पहले कहा ही जा चुका है । ' ब्रह्मरन्ध्र ' भी इसे इसीलिए कहते हैं । जैसे ब्राडकास्ट किया हुआ शब्द सारे श्राकाश में व्याप्त होजाता है - पर उसका आकर्षण करता है रेडियो यन्त्र | और रेडियोका तरीका यह है कि मकानकी चोटी पर एक बाँस तारके साथ खड़ी की जाती है; वही चोटीकी तार शब्दको खेंच लेती है; जिसे हमारा रेडियो यन्त्र खैंचकर हमारे आगे उपस्थित कर देता है, इसी प्रकार चोटीके बाल भी परमात्माकी व्यापक कृपाको अपने में आकृष्ट कर लेते हैं । यह विषय कृत्रिम भी नहीं है, किन्तु वास्तविक और प्राकृतिक है । आप मस्तु लिङ्ग परके केशोंको कटवानेवाले पुरुषोंको देखें-

पृष्ठ 115

सनातन धर्मालोक ५, पृष्ठ 115 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शिखाकी वैज्ञानिकां 5 I 1 5 : वहां पर गोलाकार मण्डल दीख रहा होता है । एक भाग में वालोंकी ऐसी रचना दीखती है, जिससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि यह कपाल की ग्रन्थि है । ग्रन्थिस्थलको मर्मस्थल भी कहा जाता है । प्रत्येक मर्मस्थलकी रक्षा भी आवश्यक हुआ करती है । अन्य मर्मस्थलोंकी अपेक्षा यह सर्मस्थल सम्राट् स्थानीय है, क्योंकि यही सव नस-नाड़ियों का केन्द्र है । इसकी रक्षा अधिकता से हो; अतः यहाँ शिखा अवश्य रखनी चाहिये | इसी घनीभूत शिखासे ही सनस्ट्रोक आदिको आशङ्का भी नहीं रह जाती । विज्ञान और आयुर्वेद ( १० ) वर्तमान वैज्ञानिकोंने अन्वेषणके बाद अब यह जाना है कि सिरके पिछले भागमें उन नस - नाड़ियोंका केन्द्र है, जो आंखोंमें प्राप्त होती हैं । उनकी रक्षा यहां ठहरे हुए पर्याप्त - परिमाण के केशोंसे होती है । वर्तमान वैज्ञानिकोंने अभी यह बात जानी है; परन्तु हमारे ऋषि महर्षियोंने प्राचीन काल से ही शिखा रखनेका नियम बना रखा है । शल्यविधाके सभी अग्रेजी पुस्तकों डाक्टरों ने सिरके उस स्थल में जहां शिखा रक्खी जाती है-एक मर्मस्थल माना है, जिसे अंग्रेजी में Pineal Gland ( पिनियल ग्लेण्ड ) नामसे कहा जाता है । इसके अतिरिक्त जिस स्थलपर शिखा रखी जाती है; उसी स्थलके नीचे एक ग्रन्थि है. जिसे ' पिचुइटी ' नामसे कहा जाता है; जो शरीरकी पुष्टि तथा वृद्धिमें बहुत सहायता करती है । प्रकृतिने सिरमें जो बाल उत्पन्न किये हैं; उनका तात्पर्य शरीरकी भीतरी कोमल वस्तुओंका संरक्षण है ।

पृष्ठ 116

सनातन धर्मालोक ५, पृष्ठ 116 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

६६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) कपालशास्त्र के अनुसार भी उक्त स्थल में आत्मोन्नतिका केन्द्र है । एक कपालशास्त्रीने यह सिद्ध किया है कि उस केन्द्र में केशराजि की स्थापना से आत्मोन्नतिकी रक्षा होती है । आयुर्वेद के अनुसार मांस, शिरा, स्नायु, अस्थि पांच भेदोंके साधारण मर्म होते हैं; १६ विशेष इस प्रकार १०७ मर्म कहे गये हैं । इनमें ११ मांसके, ( नसों ) के, २७ स्नायुओं के, अस्थियों ( हड्डियों ) के के मर्म होते हैं इस प्रकार १०७ मर्म ' सुश्रुत संहिता ' ६।४ ) में कहे गये हैं । १६ संख्या के विशेष मर्मोमें ' अधिप ' होता है, जहां केशोंका आवर्त होता है । नाड़ियोंकी संधि होती है । थोड़े आघात से भी , सन्धि इन मर्म होते हैं; ४१ शिराओं २० सन्धियों ( शारीर - स्थान एकका नाम उसके नीचे यहांके मर्म -स्थलोंमें हानिकी सम्भावना रहती है; वल्कि कभी तो मृत्यु की सम्भावना भी रहती है । इसी कारण ' सुश्रुत संहिता'के शारीर स्थानमें कहा है – ' मस्तकाभ्यन्तरत उपरिष्टात् शिरासन्धिसन्निपातो रोमावर्तोऽधिपतिः तत्रापि सद्य एव [ मरणम् ] ( ६।२० ) ' आन्तरो मस्तकस्योर्ध्वं शिरासन्धिसमागमः । रोमावतधिपो नाम मर्म सद्यो हरत्यसून् ' ( अष्टाङ्गहृदय, शारीरस्थान ) । इस पर श्री अरुणदत्त ने लिखा है -- ' मस्तकस्य अभ्यन्तरतो यः स्थितः, तथा ऊर्ध्वं प्रकृतत्वान्मस्तकस्यैव उपरि शिरासन्धिसमागमः शिरा - सन्धीनां सन्निपातो रोमावर्तलक्षणः; सोधिपो नाम मर्मविशेषः, मर्मणामधिपो यथार्थनामा । तदायत्तानि हि सर्वाणि मर्माणीत्यर्थः । सोऽधिपो विद्धो नरस्य सद्योऽसून हरति, पुरुषं मारयतीत्यर्थः । आशय

पृष्ठ 117

सनातन धर्मालोक ५, पृष्ठ 117 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

है । जि इन बों यों न म र I 9 य शिखाकी वैज्ञानिकता यह है कि जैसे स्वामीके दुःखमें सब नौकर दुःखी होते हैं; जैसे सेनानायक के क्षत - विक्षत होकर गिरने पर सब सेनाके पांव उखड़ जाते हैं; इसी प्रकार इस ' अधिपति ' नामक मर्म - सम्राट्में थोड़ा भी आघात होनेपर सारे मर्मस्थानों में शिथिलता होजाती है । उस समय उपचार न करनेपर मृत्यु तक भी हो सकती है । जैसे राजा सैनिकोंकी अपेक्षा सेनानायक के संरक्षणार्थ अधिक अवधान देता है; वैसे ही मनुष्यमात्रको सब मर्मोकी अपेक्षा ' अधिप ' मर्मकी रक्षा तो बहुत सावधानी से करनी चाहिये । उसकी रक्षा होवे इस पर उपाय अपेक्षित है । प्राचीन महर्षियों से उद्भावित वह उपाय ही ' शिखा ' है । शिखाके अतिरिक्त कोई भी सरल शास्त्रीय उपाय नहीं है, जिससे दिन - रात एवं प्रतिक्षण अधिप - मर्म की रक्षा हो सके । इस उपायके आश्रयणसे चाहे गरीब हो वा साहूकार-सभी समान लाभ प्राप्त कर सकते हैं । हमारे पूर्वजोंने जो सुगम एवम् अपूर्व युक्ति बनाई है; वैसी युक्ति कोई भी नहीं बन सकती । इस तात्पर्यको न जानकर आजकी सभ्य ( १ ) मंडली अपनी शिखाको कटवाकर शिखाधारिणी मण्डलीका उपहास करती है, यह उसकी विद्या दयनीय है । जो इस विषयके अन्य उपाय किये जाते हैं, वे खर्चीले एवं अवैध हैं, पर हमारे प्राचीनोंसे उद्भावित उपायोंमें खर्च न होना, परतन्त्रता न होनी - यह एक भारी विशेषता होती थी । फिर साथ वह जातीय चिह्न भी बन जाता था । इस प्रकार ' एका क्रिया द्वयर्थकरी ' नहीं - नहीं ' त्र्यर्थकरी प्रसिद्धा ' हो जाती है । प्राचीन काल में ब्रह्मचर्याश्रममें कुमार यहां पर केशजूटक रख

पृष्ठ 118

सनातन धर्मालोक ५, पृष्ठ 118 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) कर सिर पर अधिक विद्युत्को उत्पन्न करते थे । शिखा रखने से आयुकी वृद्धि होती है; सैनिकों को धूप वा सनस्ट्रोकसे बचानेके लिए टोप दिये जाते हैं । यदि वे पूर्ण केशयुक्त शिखा रखें, तो उन्हें टोपियोंकी आवश्यकता ही न रहे । इस शिखाका परिमाण गोखुर - इतना होता है, जिससे शीतकाल में शीतसे, भयानक गर्मी में गर्मी से और वर्षा ऋतुमें जलवर्षण के श्राघात से साधारणतः रक्षा होती है । एक विचार ( ११ ) कहा जाता है कि- जो शीत - प्रधान देश हो तो कामचार है चाहे जितने केश रखे और जो अतिउष्ण देश हो तो सब शिखासहित छेदन करा देना चाहिये, क्योंकि शिरमें बाल रहने से उष्णता अधिक होती है और उससे बुद्धि कम होजाती है ' ( स ० प्र ० १० समु ० १६२ पृष्ठ ) यह विचार उक्त अनुसन्धानसे अपूर्ण सिद्ध होता है; क्योंकि - शिखामुण्डनसे ही उस मर्मप्रदेशमें धूप जल्दी प्रभाव कर देती है । गोखुरपरिमाण बालों के वहां रखने पर तो जैसे बाहरी शीतसे रक्षा होती है; वैसे ही बाहरी तापसे भी रक्षा होती है । इसका अनुभव स्वयं भी किया जा सकता है । जो लोग गर्मी में सभी बालोंको कटवाते हैं; दो - तीन दिन उन्हें गर्मी अधिक अनुभूत होती है । जो बाल नहीं कटवाते; उनको वैसी ऊष्मा प्रतीत नहीं होती, बल्कि बाहरी गर्मी से रक्षा ही होती है । नहीं तो फिर उनके अनुयायियोंको गर्मी में बुद्धिमन्दताके डर से अपनी स्त्रियों या पढ़ रही हुई लड़कियोंके बाल भी कटवाने पड़ेंगे ।

पृष्ठ 119

सनातन धर्मालोक ५, पृष्ठ 119 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शिखाकी वैज्ञानिकता ८६ से के में " ने अथवा गर्मी में वा गर्म देशमें बालोंका कटवाना मान भी लिया जाय तो वह मस्तिष्कके तालु - प्रदेशमें तो कुछ लाभकारी होसकता है, पर शिखाके स्थानमें नहीं । इसमें प्राचीन एवं अर्वाचीन विद्वान् प्रमारण हैं । इस बातका आविष्कार करनेवाले तो वैद्यकके विद्वान् थे; उन्होंने ' सालम - मिश्री ' आदिकी ओषधियाँ भी जान रखी थीं तो यहाँ भी उन्हें कोई श्रोषधि लिख देनी चाहिये थी; जिससे गर्मी हट जाती; पर उन्होंने शिखा पर ही आक्रमण कर दिया; खेद!!! प्राचीन ऋषि, मुनि, तपस्वी जो जटाधारी थे; क्या उनकी बुद्धि न्यून थी? उन्होंने बड़े - बड़े ग्रन्थ कैसे बनाए? ' दीक्षितो दीर्घ-श्मश्रुः ' ( अथर्ब ० ११।५।६ ) इससे वेदने ब्रह्मचारी के लिए दीर्घकेश की स्थापना कही है; इससे वेदको उससे ब्रह्मचारीकी बुद्धिकी मन्दता इष्ट नहीं । उक्त स्थलमें शिखा छेदन मनुजी के ' केशान्तः षोडशे वर्षे ब्राह्मणस्य विधीयते । राजन्यबन्धोर्द्वाविंशे वैश्यस्य द्वयधिके ततः ' ( २।६५ ) इस पद्य अनुवादके अवसर पर ही ' स ० प्र ० में कहा है; परन्तु मनुजीको वहाँ ऐसा अभिप्राय विवक्षित नहीं । न वहाँ ग्रीष्मका नाम है, न ही केशान्त संस्कार में शिखाके छेदनका गन्ध ही है । यदि यहाँ गर्मीका कारण है तो ब्राह्मणका १६ वें वर्ष में ही मुण्डन कैसे कहा है? क्या पहले वा पीछे उसे गर्मीका अनुभव नहीं होता? इस प्रकार क्षत्रियको बाईस वर्षसे पहले वा पीछे क्या गर्मी, तंग नहीं करती? वैश्यको चौबीसवें वर्ष से पहले वा पीछे क्या गर्मी

पृष्ठ 120

सनातन धर्मालोक ५, पृष्ठ 120 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) नहीं लगती 1? शूद्रकेलिए तो वैसा करने की आज्ञा ही नहीं है; तो क्या उसे सारी आयु गर्मी ही नहीं लगती? इससे यह बात ठीक नहीं । न मालूम मनुजीके उक्त पद्यसे यह बात कैसे निकाली गई? स्वयं उन्होंने स ० प्र ० के ११ वें समु ० २४४ पृष्ठमें लिखा है- ' यज्ञोपवीत और शिखाको छोड़कर मुसलमान - ईसाइयोंके सदृश वन बैठना व्यर्थ है ' । शिखा काटनेमें वेदका प्रमाण ( १ ) ( १२ ) कई व्यक्ति ऊपर कहे पक्षकी सिद्ध्यर्थ ‘ यत्र बाणाः सम्पतन्ति कुमारा विशिखा इव ' ( यजुः १७१४८ ) यहां ' विशिखा इव ' का ' विगतशिखाः- शिखाहीनाः ' अर्थ करके अपने इष्ट पक्षको सिद्ध करना चाहते हैं, यह ठीक नहीं । इस मन्त्र में ग्रीष्ममूलक उष्णता के कारण शिखा कटवाना अथवा शीत होनेसे शिखा रखवाना नहीं कहा गया । यहाँ विशेषण ' कुमार ' है, तो क्या बड़ों को गर्मी नहीं लगती? ' तब उनका यह प्रमाण- प्रदर्शन व्यर्थ है । क्योंकि इससे उस पक्ष की सिद्धि नहीं । वस्तुतः उक्त मंत्रमें ' विशिखाः ' का विशेष्य ' कुमाराः ' है, ‘ ग्रीष्मखिन्ना नराः ' नहीं । उसका एक अर्थ है ' विविध शिखावन्तः ' । कुमारावस्थामें कई अपने प्रवरानुसार पाँच शिखा वा तीन शिखा रखते हैं, जैसेकि ' प्रयोग - रत्न ' में कहा है- ' मध्ये शिरसि चूड़ा स्याद् वासिष्ठानां तु दक्षिणे । उभयोः पार्श्वयोरत्रिकश्यपानां शिखा मता ' । ' माधवीय ' में भी ऐसा ही कहा है । आपस्तम्बने भी इसी प्रकार कहा है-' तूष्णीं केशान् विनीय यथर्षि शिखाः निधाति ' ( आपः गृ. १६-१५ )