सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 121–130
सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 121–130
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शिखाकी वज्ञानिकता तो क ? त ना I: चा को क में * क में तथा ऋषिप्रवर - सङ्ख्यया । ' अथैनमेकशिखस्त्रिशिखः पञ्चशिखो वा यथा वा एषां कुलधर्मः स्यात् यथपिं शिखां निदधाति ' ( वोधा ० गृ ० २ | ४ | १७-१८ ) ‘ संस्कारभास्कर ' में भी कहा है – ' दक्षिणतः चूडा वसिष्ठानाम् ' ( ४०।२ ) ' उभयतोऽत्रिकश्यपानाम् ' ( ३ ) ' पञ्चचूडा अङ्गिरसः ' ( ५ ) । स्वा ० दयानन्दजीने भी अपनी ' संस्कारविधि ' में लिखा है— [ चूडाकर्मसें ] पाँचों ओर थोड़ा - थोड़ा केश रखावे ' ( ७६ पृष्ठ ) । अपने यजुर्वेदभाष्यमें भी स्वामीजी ने लिखा है - ‘ यथा विगत-शिखा विविध शिखा वा, विना चोटीके वा बहुत चोटियोंवाले बालकोंके समान वाण आदि शस्त्र - अस्त्रोंके समूह अच्छे प्रकार गिरते हैं ' । इस प्रकार ' विशिखाः ' का ' विविधशिखाः ' भी अर्थ हुआ । चूडाकर्म संस्कारमें मध्यवाली शिखाको छोड़कर शेष शिखाओं का मुण्डन करा दिया जाता है । इसीलिए ' यज्ञोपवीतविधि में आता है — ' तासां मध्यशिखावर्जम् उपनयने वपनं कार्यम् ' । ‘ नैमिनिगृह्य-सूत्र ' में भी कहा है – ' सर्वाणि लोमनखानि वापयेत् शिखावर्जम् ' ( ११ ) फलत: उन्हीं विविध शिखाओंको सूचित करनेवाला उक्त मन्त्र है । यदि यहाँ ' विशिखाः ' का ' शिखाहीनाः ' अर्थं किया जाय तो उपमानोपमेयभाव घटित नहीं होता । ' विशिखा वाणाः सम्प-तन्ति ' यह उपमेय वाक्य है, ' विशिखाः कुमाराः सम्पतन्ति ' यह उपमान वाक्य है, बाण शिखाहीन नहीं होते, किन्तु शिखासहित ही होते हैं । ' शिखा ' होती है उनके पंख, तभी तो बारणोंकी गति तेज़ होजाती है । इसी कारण आरो क्रिया है- ' सम्पतन्ति ' सम्यक् पतन्ति ( खूब उड़ते हैं ) शिखा- ( पंख ) हीन बाणोंकी सम्पातक्रिया
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) ( उड़ना क्रिया ) नहीं होती । इससे उक्त मन्त्र से शिखाहीनता सिद्ध नहीं होती । एक प्रश्न होता है कि तब तो ' सशिखा इव ' पाठ होता, ' विशिखा इव ' क्यों? इस पर उत्तर है कि ' विशिष्टा - गोखुरपरिमारणा शिखा येषाम् ' यहाँ ' वि'का कार्थ ' विशिष्ट ' अर्थात् गोखुरपरिमाण वाली शिखा है, अथवा ' वि'का अर्थ ' विविधाः शिखाः येषाम् ' यह भी हो सकता है जैसेकि - ' प्रयोगरत्न ' आदिके अनुसार पहले दिखाया जा चुका है । अथवा ' शिखाहीनता ' का भी अर्थ हो तो वहाँ मध्यकी शिखा से भिन्न शिखाओंका राहित्य ही इष्ट है । कौमार्य में उनका मुण्डन हुआ करता है - यह पहले ही कहा जा चुका है । इससे भी उक्त पक्ष ( गर्मदेश में शिखा काटने ) की सिद्धि नहीं होती । मीमांसा आदिमें तो इसी ( कुमारा विशिखा इव ) मन्त्रको शिखा -स्थापन में ' मूल कहा है । जैसेकि - ' मीमांसादर्शन ' ( १ | ३ | १ ) सूत्रके भाष्य में शवरस्वामीने स्पष्ट लिखा है - ' गोत्रचिह्न ' शिखाकर्म; दर्शनं च —— यत्र वाणाः सम्पतन्ति कुमारा विशिखा इव ' इति । ' चूडाकर्म द्विजातीनां सर्वेषामेव धर्मतः । कर्तव्यं श्रुतिचोदनात् ' ( २/३५ ) इस मनु - पद्यकी टीकामें कुल्लूकभट्टने लिखा है- ' श्रुतिचोदनात्— ' यत्र बाणा: सम्पतन्ति कुमारा विशिखा इव ' इति मन्त्रलिङ्गात् ' । यहाँ पर श्रीकुल्लूकभट्टने भी उक्त मन्त्रको शिखास्थापक ही माना है । उक्त पद्यमें नारायण नामक टीकाकारने भी लिखा है – ' श्रुतेः मन्त्ररूपायाचोदनाया लिङ्गतया प्रवर्तकत्वात् । मन्त्रश्च ‘ यत्र बाणाः सम्पतन्ति कुमाराः विशिखा इव ' । यहाँ भी वही बात हुई । यही राघवानन्दने भी लिखा है- ' श्रुतिचोदनात् यत्र बाणाः सम्पतन्ति
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शिखाकी वैज्ञानिकता कुमारा विशिखा इव ' इति श्रुतेः ' । इस प्रकार ' काठकगृह्यसूत्र ' के ४०।१६ सूत्रके व्याख्यानमें देवपालने भी कहा है- ' श्रुतिमूलक-मेतत् कर्म - इति प्रदर्शितम्- ' यत्र बारणा निष्पतन्ति कुमारा विशिखा इव ' इत्यादिना ' | ( १५ ) व एक प्रश्न बच जाता है- ' यदि शिखाराहित्य अवैदिक है; तथा ' कुमारा विशिखा इव में ' विशिष्टशिखाः ' वा ' विविध शिखा: ' यह अर्थ है; तो यजुर्वेद वाजसनेयी संहिताके भाष्यकार उवट - महीधर आदिने इसका ' विगत- शिखाः ' वा ' शिखा-हीनाः ' यह अर्थ क्यों लिखा है? इससे तो शिखाछेदन ही सिद्ध होगा- इस पर यह जानना चाहिये कि — उवट -सहीधरके उक्त व्याख्यान से भी उक्त अभिप्रायकी सिद्धि नहीं हो सकती । उनके श्राशय पर भी विचारना चाहिये । वह आशय यह है कि-जैसे शिखाहीन वाण गिर ही जाया करते हैं, लक्ष्यवेध रूप उन्नति नहीं कर सकते; वैसे ही शिखाहीन कुमार भी पतन को प्राप्त करते हैं, उन्नति प्राप्त नहीं कर सकते । तभी तो कषायरसवाले सोमके पानमें प्रवृत्त होते हुए कुमारोंको लोभ भी यही दिया जाता था कि— इसके पीनेसे तुम्हारी शिखा बढ़ जायगी ' शिखा ते वर्धते वत्स! गुडूचीं श्रद्धया पिब ' । इस प्रकार यहाँ ' संपतन्ति ' का ' सम्यक् पतन्ति च्यवनतिं प्राप्नुवन्ति ' ' अवनति प्राप्त करते हैं ' अर्थ होनेसे ' विशिखाः ' का ' शिखाहीनाः ' अर्थ से समन्वय हो जाता है । बात वही हमारी कर निकली कि - शिखाहीन अवनतिको प्राप्त करते हैं । प्रतिपक्षियोंकी इससे इष्ट - सिद्धि न हुई ।
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६४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) इस प्रकार शिखाका धारण उन्नति क्रियाका साधक सिद्ध हुआ । इसीलिए ' काठकगृहासूत्र ' ( ४० । ७ ) में देवपालने व्याख्या की है — ' निःशिखत्वं तु अमङ्गलधर्मोऽरिष्टहेतुः । तथा च पठन्ति -' अमेध्यमेतत् शिरोऽशिखम्, यत्र वाणाः सम्पतन्ति कुमारा विशिखा इव ' इति निन्दावादः । ' इससे हमारा अभिप्राय ही पुष्ट हुआ । ' नमः कपर्दिने च व्युप्तकेशाय च ' ( यजुः १६ २६ ) इस मंत्र को शिखाछेदन में उदाहृत करना भी युक्त नहीं हो सकता । क्योंकि— यहाँ पर शिखाहीनता नहीं कही गई; सामान्य केश वहाँ पर इष्ट हैं । ' केशा न शीर्षन् यशसे, श्रियै शिखा ' ( यजुः १६६२ ) इस मन्त्र में शिखा तथा केश भिन्न - भिन्न शब्द आये हैं । तब केशोंसे ' शिखा'-का ग्रहण नहीं हो सकता । इधर ' श्रियै शिखा ' इस मन्त्र से विरोध भी पड़ेगा । शिखा श्रीप्राप्तिकेलिए कही गई है, फिर उसे क्यों काटा जाय? अथवा रुद्राध्यायके इस मन्त्रमें रुद्रके दो आश्रम बताये गये हैं । कपर्दी - जटाजूटधारी को कहते हैं; सो यह शब्द वानप्रस्थावस्थाका द्योतक है; क्योंकि— वानप्रस्थी को ऐसे ही जटिल रहना पड़ता है और ' व्युप्तकेश ' से संन्यासाश्रम इष्ट है; जैसे कि — महीधराचार्यने भी अपने भाष्य में सकेत दिया है— ' यत्यादिरूपेण मुण्डितत्वम् । ' ( १४ ) संन्यासियोंके लिए शिखाका त्याग तो अपवाद है, प्रति-पक्षियोंसे प्रोक्त कारण नहीं । इस कारण उनके लिए ' ताण्ड्य-महात्राह्मणं ' में कहा है-- ' शिखा अनुप्रवपन्ते, पाप्मानमेव तदपन्नते ।
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शिखाकी वैज्ञानिकता. ६५ लघीयाथ्र्सः स्वर्गलोकमयामेति ' ( ४।१०।२५ ) । स्वा ० दयानन्दजीने भी ' प्राजापत्येष्टि ( कि - जिसमें यज्ञोपवीत और शिखाका त्याग किया जाता है ) कर ' इस प्रकार मनु ० ( ६३८ ) के प्रमाणसे ( संस्कार - विधि २६२ पृष्ठ ) ' सर्ववेदसम - गृहाश्रमस्थ पदार्थ मोह, यज्ञोपवीत और शिखा आदिको धारण करता है, उनको छोड़, यह अथर्ववेदके प्रमाणसे ( संस्कार विधि पृ ० २७२ ) ' सर्ववेदसम्— शिखा सूत्र यज्ञोपवीत आदि पूर्वाश्रम - चिह्नोंका त्याग करना है, यह सबसे बड़ा यज्ञ है ' इस तैत्तिरीयके प्रमाणसे ( संस्कारविधि पृ ० २७६ ) में संन्यासियोंके लिए शिखा - त्याग स्वीकार किया है । ७५ वर्षके बाद सामान्यतया संन्यासका विधान है; तब आयुकी वृद्धि हो जाने से शरीरकी पूर्णता हो जानेके कारण ' अधिप ' मर्मस्थलकी त्वचा कठोर हो जाती है, और शिखाजन्य लाभ भी ७५ वर्ष तक प्राप्त होकर सारे शरीरमें व्याप्त हो जाते हैं; तब उस समय शिखा - त्यागमें भी कोई हानि नहीं होती । इसके अतिरिक्त तब कर्मकाण्ड तथा उपासनाकाण्डके समाप्त हो जानेसे तत्सम्बद्ध शिखा- सूत्रका त्याग ठीक भी है । ' विशिखो व्युपवीतश्च यत्करोति न तत् कृतम् ' ( १ | ४ ) यह ' कात्यायनस्मृति ' का वचन कर्म - उपासना-काण्डपरक है, ज्ञानकाण्डपरक नहीं । जो लोग शिखाजन्य सब लाभको प्राप्त करके सिद्धिको प्राप्त हो चुके हों; जिनकी सब वासनाएँ नष्ट हो चुकी हों; संन्यासके अधिकारी भी वही हैं; शिखा-. त्याग में भी उन्हींका अधिकार है, क्योंकि अब उनका किसी भी कर्मफल के साथ कोई भी सम्बन्ध नहीं रहता । शिखा रखी जाती.
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६६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) है कर्मकरणार्थ और प्राणोंके रक्षणार्थ 1 । वे ही ज्ञानशाली योग प्राप्त कर कर्माको छोड़कर अपने प्राणोंको ब्रह्मरन्ध्रमें स्थापित कर उन प्राणोंके निकालने में अन्तरायस्वरूप शिखाको हटाकर उस रिक्त स्थानके द्वारा उन ग्राणोंको निकाल देते हैं; जिससे उनकी ऊर्ध्वगति होती है । उक्त वेद - मन्त्र में, तथा संन्यास - विधानमें गर्म ऋतु वा देशके कारण शिखात्याग नहीं कहा गया । इससे प्रतिपक्षियोंका पक्ष कभी भी सिद्ध नहीं होता । शिखा रखने में अन्य उपपत्ति ( १५ ) तीन आश्रमों तक शिखा रखने फिर संन्यास में उसका त्याग करनेमें यद्यपि पहले उपपत्तियाँ दी जा चुकी हैं, तथापि अन्य उपपत्तियाँ भी दी जाती हैं । पाठक अवधान से देखें । सारी सृष्टिका मूल अग्नि ही है । अग्निका स्वरूप उसकी शिखासे ही व्यक्त होता है । अग्निको संस्कृत में ' शिखी ' कहा जाता है । अग्नि जब शिखारहित हो तो उसमें हवन निषिद्ध माना गया है । जव अग्नि ' शिखी ' हो; तो किसीकी शक्ति नहीं कि - उसका स्पर्श कर सके । उसके उस स्वरूप ( शिखित्व ) के नष्ट होने पर भस्म भी उसे आच्छन्न कर दिया करती है । आज हम भी जो पददलित हो रहे हैं, उसमें भी कारण यह है कि हमने अपना अग्निसे प्राप्त स्वरूप शिखित्व हटा दिया है । हम सब अग्निसे उत्पन्न हैं, अग्निके उपासक हैं । अग्निसे हो हम ' तन्वं मे पाहि, आयुर्मे देहि, वर्चो मे देहि, अग्ने! यन्मे तन्वा ऊनं तन्म आपृरण ' ( पारस्क ० २२४७ ) ' मयि मेधां मयि प्रजां मयि अग्निस्तेजो दधातु '
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शिखाकी वैज्ञानिकता ३७ ( आश्व ० गृ ० ११२१४ ) ' यां मेधां देवगणाः पितरश्चोपासते । तया -। J मामद्य मेधयाग्ने! मेधाविनं कुरु स्वाहा ' ( यजुर्वेद वाज ० सं ० ३२।१४ ) इत्यादि प्रार्थना करते हैं । हमारे गोत्र- पुरुष भी हमारा अग्निके साथ प्राचीन सम्बन्ध बताते हैं । जमदग्निगोत्र ' जमद् ( ज्वलद् ) अग्नि ' ( निरुक्त ७/२४/८ ) को बताता है, अङ्गिरस् गोत्र अग्निके अंगार ( निरु ० ३।१७११ ) को बताता है । इस प्रकार भृगु, अत्रि, भारद्वाज आदिकी भी वहीं अग्निमूलक उत्पत्तिकी निरुक्ति कही गई है । ब्राह्मणों में तो अग्निका विशिष्ट निवास माना गया है, जैसे कि - ' वैश्वानरः प्रविशति अतिथिर्ब्राह्मणो गृहान् ' ( कठोपनि ० १।१।७ ) ब्राह्मणो ' ह वा इममग्नि वैश्वानरं बभार ' ( गोपथब्रा ० ११२/२० ), ' अग्निः " " यो ब्राह्मणाँ आविवेश ' ( अथर्व ० १६ ५६।२ ) । तभी निषादोंके खानेके समय विनताने गरुड़को ब्राह्मण खानेकेलिए निषेध कर दिया कि— ब्राह्मणके खानेसे तेरे गलेमें दाह होगा । देखो ' महाभारत ' आदिपर्व २६ अध्याय । अस्तु । जो जिसकी उपासना करता है, अन्तमें वह उसके स्वरूपको प्राप्त हो जाता है । उपासक भी यही चाहता है; तभी वह अपने उपास्यके स्वरूपकी प्राप्त्यर्थ उपास्यके ही लिङ्गोंको धारण करता है । जैसे — गणेशभक्त सिन्दूर आदि, शैव भस्म, रुद्राक्षादि - मालाको, वैष्णव लोग गोपीचन्दन - तुलसीमाला आदिको धारण करते हैं । इसीलिए शुक्लयजुर्वेदके ' शतपथब्राह्मण ' में कहा है- ' देवो भूत्वा दे॒वान् एति ' ( १४।६।१०।४ ) । ७ स ० ६०
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) इस प्रकार हम लोग भी अग्निके उपासक होनेसे उसके लिङ्ग ' शिखा'को धारण करते हैं, और उस चिह्नको धारण करना भी चाहिये । ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ आदि तीन आश्रमों में अग्निकी उपासना कही गई है । अनग्नि ( अग्निरहित ) होकर हम प्रत्यवाय-भाक् माने जाते हैं । संन्यास आश्रम में जब कि अग्निका त्याग कहा है; तब अग्निके चिह्न शिखाका भी त्याग कहा गया है । अग्नि-सेवन ( यज्ञ ) के अधिकारपट्ट ( यज्ञोपवीत - सूत्र ) का भी त्याग कहा गया है । ऐसी स्थिति में पुरुषका अग्निमय संसार से भी कोई सम्बन्ध नहीं रहता । तभी तो मृत्यु के समय भी संन्यासीको अग्निसे नहीं जलाया जाता । इससे स्पष्ट है कि - हमें तीन आश्रम तक शिखाका त्याग ठीक नहीं । अग्निके उपासक शिखाके श्रद्धालु हमारे प्राचीन ऋषि - मुनि जलवायु आदिका सेवन करते हुए भी परम तेजस्वी थे! तेजस्वी होने से ही वर - शाप आदि देने में भी समर्थ हुए । इसीलिए ही शिखा में अधिक बल भी ब्राह्मणादियों में था । आज वे ही शिखाकी उपेक्षासे तेजोहीन होगये हैं । शिखात्याग सर्वथा नहीं करना चाहिये । ऐसा करनेपर यही शिखा आपको तेजस्वी बनायेगी । शिखा त्यागका ही परिणाम देशनिर्वासन वा पाकिस्तान हुआ है | अन्य उपपत्ति ( १६ ) पुरुष शक्तिके यौवनका विकाश मुख छाती आदि स्थानों में केशनिर्गमके द्वारा होता है, किन्तु स्त्रीके यौवनका विकास इस केशनिर्गम द्वारा न होकर मासिक ऋतुधर्म, स्तनोंमें दूध तथा
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शिखाकी वैज्ञानिकता 88 जरायुकी वृद्धि द्वारा होता है । जब यौवन - विकासके साथ केश-निर्गमका सम्बन्ध है तो जिस प्रकार वृक्षकी शाखा काटने से उसमें नवीन शाखा निकलनेका वेग बढ़ता है, उसी प्रकार प्रतिदिन केश काटते रहने से या दाढ़ी - मूंछ मुण्डवाते रहने से यौवनका वेग भीतरी कामशक्ति रूपमें स्नायुओं में अधिक प्रकट होता है और वह शुक्रके बाहर करवाने में सहायक होकर क्रम - क्रम से क्षीणताको प्राप्त करता जाता है । यही कारण है कि — ब्रह्मचारी, एवं वानप्रस्थ के लिए विशेषकर केशधारणकी विधि शास्त्रों में आई है । केश धारण करनेसे काम - सम्बन्धी नसोंका वेग स्वभावतः दबा रहता है और शुक्र के बाहर होनेकी उत्तेजना प्राप्त नहीं होती । संन्यासी तो उस यौवनावस्थाका पार करके ही होता है; पहले भी संन्यासी हो जावे; तो ‘ सोऽहम् ' भावमें अभेदबुद्धिवश कामकी चिन्ता ही नहीं रहती; अतः यतिगरण मुण्डन कराते हैं । गृहस्था-वस्थामें यौवनका कुछ उपयोग अपेक्षित होता ही है; अतः गोखुर-इतने केश सिरके मध्य में रखकर शेष केश समय - समय पर कटाये जाते हैं । गोखुर में सिरके मध्यका अंश, और कुछ पीछे का अंश ढक जाता है; वही शिखाके रूपमें सिरके ऊपर रहता है । योग-शास्त्रके सिद्धान्तानुसार सिरके मध्यके उस अंशके नीचे ब्रह्मरन्ध्र और ब्रह्मरन्ध्रके ठीक ऊपर सहस्रदल कमल में परमात्माका केन्द्र-स्थान है । विज्ञानके अनुसार मस्तिष्क - भागमें कामका केन्द्र स्थान है । इन दोनों अंशोंमें शिखास्थान में केशराशि रखनेसे आत्मिक शक्ति बनी रहती है और काम - चिन्तनशक्ति दबी रहती है । इसी
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१५०० श्री सनातनधर्मालोक ( ५ ) कारण हिन्दुजातिमें शिखाके रखनेके कारण ही बल, आयु, तेज, आत्मचिन्तन, कामका संयम भी दीखता रहा है; अन्य जातियों में वैसा न रहने से उच्छृङ्खलता, नास्तिकता, कामुकता, विलासिता, कायरपन आदि स्वाभाविक होते हैं । अव हिन्दुओं में भी शिखाकी स्थापनामें आस्था घटती जानेसे पूर्वोक्त गुण भी घटते चले जा रहे हैं और अन्य दुर्गा बढ़ते चले जा रहे हैं । जो गुण जिसके होनेपर होता है, जिसके नष्ट होने पर नहीं होता; वह उसीका धर्म माना जाता है । ध्यानके समय प्रोजः - शक्ति प्रकट होती है । यदि परमात्माका ध्यान किया जाय; तो मस्तकके ऊपर शिखाके रास्ते से योजः शक्ति प्रकट होती है; परमात्माकी शक्ति उसी पथसे अपने भीतर आया करती है । इससे तेज श्रायु आदि की वृद्धि होती है । परमहंस यति लोग सदा ही ब्रह्मसे मिले रहते हैं; इसलिए उन्हें पृथक् -रूपसे शिखा द्वारा शक्ति खींचनेकी आवश्यकता नहीं होती है । ब्रह्मचारी और वानप्रस्थी शिखा और जटा द्वारा, गृहस्थी लोग गोखुर - शिखा द्वारा इस शक्तिका ग्रहण करके अपनी आध्यात्मिक तथा आधिदैविक उन्नति प्राप्त करते हैं । शिखाधारण, शिखास्पर्श, शिखाबन्धन आदि प्रक्रिया- द्वारा सहस्रदलकमलकी ओर झुकाव ' रहने से आत्मदृष्टि मनुष्य में बढ़ा करती है - यही शिखाका रहस्य है । बार - बार बाल छंटवाते रहने से, शिखा न रखनेसे, दाढ़ी - मूंछ बार - बार मुण्डाते रहने से कामसम्बन्धी नसों में उत्तेजना फैलती ' है; अतः ऐसे मनुष्य प्रायः विषयी एवं विलासी हुआ करते हैं ।