सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 131–140

सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 131–140

पृष्ठ 131

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शिखाकी वैज्ञानिकतां स्थूल शरीरके सुन्दर बनाने में लगे रहने से उन्हें शिखा उसमें असुन्दरताका कारण प्रतीत होनेसे उसे वे कटा डालते हैं । ऐसे पुरुष वा जातियाँ आत्मोन्नतिको खोकर विषय - विलासी बने रहते हैं । इसी कारण हमारे शास्त्रों में शेष बाल भी जब चाहे न कटवा-कर किसी तिथि - विशेष वा नक्षत्र - विशेष वा वार- विशेषों में मुण्डित करनेका आदेश दिया है । ऐसा करनेसे उस आदेशके वशंवद होनेसे हममें सुन्दरताका भाव तथा तन्मूलक कामोत्तेजना नहीं रह पाती । इसके अतिरिक्त उस तिथिके देवता वा नक्षत्र के देवता, वा वारके देवतासे संयमशक्ति में सहायता प्राप्त हो जाती है; और उस दिन नखकेशादिमें जीवन नहीं रहता अर्थात् मनुष्य - शरीरके साथ उनका चेतनता - सम्बन्ध नहीं रहता । अतः ऐसे समय में केश-कर्तन मुण्डनादि द्वारा हमारी नसों में उच्छृङ्खल कामोत्तेजना भी नहीं होती । हमारे सूक्ष्मदर्शी प्राचीन महानुभाव सूर्य नक्षत्रादि देवताओं का हमारे शरीर पर भिन्न - भिन्न दिन भिन्न - भिन्न प्रभाव जानते थे-जिसका आभास कभी - कभी श्राजके वैज्ञानिकोंको भी होजाता है । अतः कई तिथि - विशेषोंमें स्त्री गमनादिका भी हमारे पूर्ण वैज्ञानिक महानुभाव निषेध कर गये हैं । तिथि - विशेष में काटे गये हमारे • केशादि यदि किसी जादूगरके हाथमें पड़ भी जायँ; तब भी वह हमारा अनिष्ट करनेमें सक्षम नहीं हो सकता । बिना वार, तिथि, नक्षत्रका विचार किये केवल सुन्दरताका लक्ष्य करके केश आदि · कटवाते रहनेसे, चुर वा रेज़रोंका जब - तब प्रयोग करते रहने से, हमारी कामोत्तेजनाकी वृद्धि, पुस्त्वनाश, यौवनका शीघ्र ही जीर्ण-

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१०२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) शीर्णताको प्राप्त होजाना- इत्यादि बातें हुआ करती हैं । उसका दुष्परिणाम - प्राचीन मर्यादाओं को तोड़ रहे हुए हम लोग - प्राप्त करते हुए दिनोंदिन ह्रासको प्राप्त होने जा रहे हैं । ( १७ ) स्त्रियोंके लिए केश काटना नहीं है; क्योंकि उनका स्त्री-शक्तिविकाश ऋतुधर्म, जरायु आदि द्वारा होता है; अतः स्त्रियाँ अपने प्राकृतिक धर्मको छोड़कर यदि पुरुषों की तरह बाल कटवाना प्रारम्भ करेंगी; तो उनमें स्त्रीसुलभ शक्ति घट जायगी; उनके प्राकृतिक विकाशमें बाधा पहुँचेगी; जिससे उनके ऋतुधर्म, स्तनोंसें दूध आदिमें बाधा आकर वे ' मां ' बननेसे रह जायंगी; उनमें प्रोजकी न्यूनता तथा मातृभावका नाश होकर पुरुषभाव आने लग जायगा, और जरायु, प्रसव, मासिकधर्म श्रादिके विषयमें अनेक रोग उत्पन्न होकर उनके शरीरोंको भीतर से खोखला कर डालेंगे । प्रायश्चित्तमें भी उनका केवल चार अंगुल केश काटनेकी विधि है, पूरा शिरोमुण्डन नहीं किया जाता । केश रखनेसे ही उनके उत्पन्न होनेवाले बच्चोंके मस्तिष्कको भी लाभ पहुँचता है । हाँ, निवृत्तिके श्राश्रममें उन्हें ( स्त्रियोंको ) भी मुण्डन आदिष्ट है । वैधव्य स्त्रियोंका संन्यास है; उसमें निवृत्तिवश उत्तेजनाकी आवश्यकता नहीं रहती; अतः वैधव्यमें स्त्रीका केश पूरा काट देनेका विधान वेद - शास्त्रानु-शिष्ट है । शिखा ब्रह्मरन्ध्रकी पताका ( १८ ) फलतः द्विजोंकी शिखा बल, वीर्य,. स्वास्थ्य तथा " आध्यात्मिक उन्नतिके साधन होनेके साथ ही साथ उत्तम जातीय - चिह्न

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शिखाकी वैज्ञानिकता १०३ भी है । यह शिखा ब्रह्मरन्ध्र - स्थलकी पताका है । इस शरीररूप किलेके पाँच तट, सात गर्भगृह, साढ़े तीन लाख छोटी कोठियाँ तथा सात महल हैं । सातवें महल में सम्राट्रूप ज्योतिः- स्वरूप परब्रह्मका निवास है 1 । जैसे दुर्गके राजनिवासस्थल में विशेषता के लिए पताका-ध्वजा - झण्डा आरोपित किया जाता है; वैसे ही इस शरीर रूप दुर्गमें ब्रह्मरन्ध्र - स्थल में जहाँ ब्रह्म गुप्त रहता है; वहीं शिखारूप पताका भी रखी गई है । यह शिखा उस ब्रह्मरन्ध्रको सूचित करती है; इसीलिए सनातनधर्मके आचार्योंने वहाँ शिखा रखवाकर गायत्री-मन्त्र से सन्ध्याके समय शिखाबन्धनकी प्रणाली प्रचलित की है । शिखाबन्धनसे केवल बिखरे हुए बालोंके समेटने में तात्पर्य नहीं; जैसेकि अर्वाचीन सम्प्रदायके व्यक्ति कहते हैं; किन्तु अपनी चित्तवृत्तिको सन्ध्या - समय में ब्रह्मरन्धके पास ब्रह्मध्यानके बन्धनमें बद्ध करनेमें तात्पर्य है । उक्त किलेके पाँच तट हैं पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश । सात गर्भगृह हैं रोम, चर्म, रुधिर, मांस, अस्थि, मज्जा, शुक्र । साढ़े तीन लाख नाडियाँ ही छोटी कोठियाँ हैं । सात महल सात पद्म हैं । पहला चतुर्दल- पद्म आधारचक्र है । दूसरा षड्दल - पद्म मणिपूरनामंक चक्र है । तीसरा दशदल- पद्म स्वाधिष्ठान चक्र है । चौथा द्वादशदल - पद्म अनाहत चक्र है । पांचवां षोडशदल - पद्म विशुद्ध नामक चक्र है । छठा द्विदल पद्म आज्ञाचक्र है, इस सन्धि-स्थानमें ही अर्थात् त्रिकुटी महलमें इतर नामक लिङ्ग है, जिसके द्वारा सहस्रदल - पद्म दिखलाई देता है । जिसकी कर्णिका को

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१०४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) सूर्यके समान प्रभा वाला ब्रह्म रहता है । सातवाँ सहस्रदल पद्म है । इस प्रकार वह ब्रह्मरन्ध्र - जिसके ऊपर शिखा है, उनमें सम्राट्-रूप ब्रह्मके निवास होनेसे उसपर पताकारूप शिखाका स्थापन भी आवश्यक सिद्ध हुआ । शिखाका मुख्य स्थापन धर्मरूप एवं कर्माङ्ग-रूपसे स्थापन द्विजोंकेलिए है, गौणता तथा चिह्नादिरूपसे स्थापन हिन्दु-जातिमात्रकेलिए है । शिखा बांधकर कर्म करने से उसके निम्नस्थान में स्थित ब्रह्मके साथ सम्बन्ध होनेसे उस कर्ममें मनकी स्थिरता होजाती है; उस स्थानकी रक्षा भी होजाती है । ग्रन्थिसे बाह्य आघात से रक्षा अवश्य होती है । स्वा ० दयानन्दजीने भी अपनी ' पञ्चमहायज्ञविधि ' ( ५ पृ ० ११ पं ० ) में ' इसके अनन्तर गायत्री मन्त्रसे शिखाको बाँधके रक्षा करे ' इससे शिखाबन्धन से रक्षा मानी है । बालोंके इधर - उधर न फैलनेकेलिए ही शिखा बन्धन मानना तो शुष्कतर्कमात्र है; इस भयसे तो लोग शिखाको ही कटवा देंगे — ' न रही बाँस, न बजी बाँसुरी ' । तब इस प्रकारके तर्क अश्रद्धा के बढ़ानेवाले होते हैं । शिखासे दृष्ट अष्टमें लाभ ( १ ९ ) इस प्रकार शिखाका अदृष्टमें जहाँ लाभ है; वहाँ वह हिन्दुत्वका चिह्न भी है; ३३ करोड़की हिन्दु धर्मशाला में प्रविष्ट होचुके हुएका चिह्न है । उससे शारीरिक लाभ भी है, क्योंकि शरीरके सब मर्मस्थानोंका सम्राट् शिखास्थानमें ही विराजमान है । वहाँ पर शीतोष्ण अत्यन्त शीघ्र प्राप्त होजाता है । अधिकता से प्राप्त शीतोष्ण भीतरी स्नायु, मांस, रुधिर आदिमें अपना प्रभाव पहुँचाकर हानि

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शिखाकी वैज्ञानिकता १०१ पहुँचा देते हैं । वहाँ पर पड़ा हुआ साधारण आघात भी हानि पहुँचाता है | वहाँका शिखारूप केशसंघात उस हानिसे रक्षा करता है । इसके अतिरिक्त ' ऊर्ध्वमूल, अधःशाख ' यह शरीर वृक्षरूप है । इसका मूल सिर है, शिखाके केश मूलशिफा ( जड़ें ) हैं । कन्वेके भागसे कमर तकका भाग शाखाएँ हैं, हाथ - पाँव आदि कर्मेन्द्रियाँ, नेत्र, श्रोत्र आदि ज्ञानेन्द्रियाँ प्रशाखा हैं । भांति - भांति के विषय इसके पत्ते हैं, सुकर्म - कुकर्म इसके फूल हैं, सुख - दुःख आदि इसके फल हैं । किसी वृक्षकी मूलशिफा ( जड़ें ) कभी काटी नहीं जातीं, क्योंकि उनके काटने से वृक्ष आरूढमूल नहीं होता । इसी कारण ही वृक्षारोपण के लिए एक स्थान से अन्य स्थानमें ले जानेके समय जब पौघेको ले जाया जाता है; तब मूलशिफाओंके संरक्षणार्थ विशेष ध्यान दिया जाता है । फलतः वृक्षके अंकुरित, पल्लवित, पुष्पित, फलित होनेकेलिए जैसे उसकी मूलशिफाओंका काटना ठीक नहीं होता; वैसे ही शरीर वृक्षकी रूढमूलता के लिए भी मूल-शिफाभूत शिखाका रखना आवश्यक ही है, जिसके कारण हिन्दु-जाति अनन्त शताब्दी - सहस्राब्दियोंसे लेकर आजतक भी जीवित है; शिखाके काटने - कटवानेवाली जातियाँ उत्पन्न होकर नष्ट होगईं । शिखाकी गाँठ ( २० ) शिखा में गायत्री मन्त्र द्वारा प्रन्थि दी जाती है । इसे सब जानते हैं कि- शिखा मस्तिष्कके केन्द्र - बिन्दुपर स्थापित है । जैसे— रेडिय़ोके ध्वनि - विस्तारक केन्द्रों में ऊंचे खम्भे लगे होते हैं;

पृष्ठ 136

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१०६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) वैसे ही हमारे मस्तिष्कका विद्युत्- भाण्डार शिखास्थान पर है । इस केन्द्रमें हमारे विचार, संकल्प और शक्ति- परमाणु प्रतिक्षण बाहर निकल - निकलकर आकाशमें दौड़ते रहते हैं । इस प्रवाहसे शक्तिका अनावश्यक व्यय होता है, और अपना मानसिक कोष घटता है । इसका प्रतिरोध करनेकेलिए शिखा में ग्रन्थि लगाई जाती है । सदा ग्रन्थि लगाये रहने से अपनी मानसिक शक्तियों का बहुत सा अपव्यय बच जाता है । इस ग्रन्थिको सन्ध्याके समय से बांधा जाता है । उस समय अनेक सूक्ष्म तत्त्व आकर्षित होकर अपने अन्दर स्थित होते हैं । वे सब मस्तिष्क- केन्द्र से निकलकर बाहर न उठ जाएँ कि कहीं अपनी साधना के लाभ से वंचित रहना पड़ जाय, इससे शिखामें गाँठ लगाई जाती है । फुटबालके भीतरके ब्लेडर में एक हवा भरनेकी नली होती है, उसमें गाँठ लगा देनेसे भीतर भरी हुई वायु बाहर नहीं निकलने पाती । साइकलके पहियों में भरी हुई वायुको रोकने केलिए एक छोटी वालट्य ूब नामक रबड़की नली लगी होती है, जिसमें होकर हवा भीतर तो जा सकती है, पर बाहर नहीं आसकती । गाँठ लगी हुई शिखासे भी यही प्रयोजन पूर्ण होता है । वह बाहर के विचार और शक्तिसमूहको ग्रहण तो करती है, पर भीतरके तत्त्वोंका अनावश्यक व्यय नहीं होने देती । आचमनसे पूर्व शिखाबन्धन इसलिए नहीं होता, क्योंकि उस समय त्रिविध शक्तिका आकर्षण किया जाता है, फिर उसे बांध दिया जाता है । यही शिखाग्रन्थिका रहस्य है ।

पृष्ठ 137

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शिखाकी वैज्ञानिकता १०७ स एक तर्क ( २१ ) एक तर्क यह किया जाता है कि - मुसलमान, ईसाई आदि न शिखा नहीं रखते, उन्हें हानि क्यों नहीं होती? इस पर यह जानना चाहिये कि सूक्ष्मरूपसे हानि होती अवश्य है, परन्तु उसके अनुभव न होने से उन्हें उसका पता नहीं लगता । इससे उसकी अनाव-त श्यकता तथा अयुक्तता सिद्ध नहीं होजाती । आयुर्वेदने जो नियम शरीरके स्वास्थ्यके कहे हैं; उनका उल्लङ्घन करने से आपाततः तो हानि प्राप्त होती हुई नहीं दीखती; परन्तु सूक्ष्मरूपसे वह होती अवश्य है । अनुभव न होने से उन नियमों को बतानेवाला आयुर्वेद तथा वे नियम युक्त नहीं हो जाते । वह हानि उत्तरोत्तर नियमों के उल्लङ्घन करते रहने से भीतर सञ्चित होती हुई शारीरिक शक्तिकी दुर्बलता में ज्वरादिरूपमें प्रकट होजाती है; परन्तु हम उसका कारण नहीं जान पाते । वैसे शिखाके भावाभावमें भी जान 5 लेना चाहिये । हिन्दुओंकी ईसाई - मुसलमानोंसे कुछ विशेषता र अवश्य है; और वह सर्वसम्मत है । उनमें हिन्दुओं जैसा संयम, 7 तथा मर्यादितता आदिका अभाव है; इसमें हमारी शिखाकी ही कारणता मानी जावेगी । क्योंकि — जो बात जिसके होनेपर होती है, जिसके न होनेपर नहीं होती, वह उसीकी मानी जाती है । नैषधचरितके चतुर्थसर्ग में लिखा है- ' तदुदितः स हि यो यद-नन्तरः ' । स्वा ० शङ्कराचार्यने ब्रह्मसूत्र ( ३ | ३ | ५३ सूत्र ) के भाष्यमें कहा है- ' यो हि यस्मिन् सति भवति, असति च न भवति, स तद्धर्मत्वेन अध्यवसीयते ' । "

पृष्ठ 138

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) हमारे प्राचीन महानुभाव जहां लाभ देखते थे; उसको अवश्य नियत करते थे; बल्कि उसमें अर्थवादों का प्रयोग करने में भी संकुचित न होते थे । पहले समय यज्ञों में गुडूची ( सतगिलोय ) या सोमरस ) का उपयोग हुआ करता था; परन्तु उसके कसैले होने से बटु उससे मुह फेर लेते थे । तव प्राच्य लोग कहते थे-' शिखा ते वर्धते वत्स! गुडूचीं श्रद्धया पिब ' । जैसे आजकल के शिक्षित जनोंको पता लग जावे कि अमुक ओषधि सेवनसे दाढ़ी - मूंछ तथा चोटीके बाल उत्पन्न नहीं होते; तब उस ओषधिके कड़वी होनेपर भी वे उसका सेवन बड़े संरम्भसे करेंगे; वैसे ही प्राचीनकालमें गुडूचीको शिखा बढ़ानेवाला समझकर बटु उसका पानकर जाते थे; इससे स्पष्ट है कि वे बढ़ी हुई शिखाको लाभ-जनक मानते थे । सनातन - हिन्दुधर्ममें जिन वस्तुओंकी पूजा प्रचलित है; जैसे कि- तुलसीपूजा, गोपूजा, व्रतानुष्ठान, शिखा आदि; जिनकेलिए वहां अर्थवाद भी उपन्यस्त किये जाते हैं; आपातदर्शी लोग उनमें उपहास करते हैं; पर वैज्ञानिकोंने उनमें उनकी श्रद्धाधिकता पर विचार किया; तब उन्होंने तुलसी, गाय, व्रत आदियोंमें अनुसन्धान करके बड़े लाभ देखे । तब उन्होंने उन लाभका प्रचार किया । अब वर्तमान शिक्षितोंका भी उधर ध्यान पढ़ने लंगा है । खेदकी बात है कि- आजके शिक्षित लोग हमारे पूर्वजोंकी · आज्ञासे तो उनका आदर नहीं करते; पर जब आजके पाश्चात्य वैज्ञानिक उनपर अपनी स्वीकृतिकी मुहर लगाते हैं; तभी उनका

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श्य भी य ले से का भ शिखाकी वैज्ञानिकता १०३ उधर ध्यान पड़ता है । वस्तुतः यह ' परप्रत्ययनेयबुद्धिता ' है, जो ठीक नहीं । शिखा के अन्य लाभ ( २२ ) गोखुर -परिमित शिखाके रखने से वीर्य की गति ऊपरको होती है; वह वीर्य परिपाकको प्राप्त हुआ हुआ तेज - रूप होकर शिखा के नीचे रहता है । इसी तेजको हिन्दु लोग मस्तिष्क मानते हैं । मनुष्य में यह तेज जितना गाढ होता है, मनुष्य उतना ही मस्तिष्कशाली तथा चिरायु होता है I । इसी तेजको आज भी कहते हैं; शिखा उसके संरक्षणका मुख्य साधन है; वैसा होने पर बहुत पुत्र होते हैं; शिखा त्यागियोंकी तो बहुत कन्याएं उत्पन्न होती हैं अतः शिखास्थापन लाभप्रद ही है । इसके अतिरिक्त बाल स्वाङ्ग ( अपना अङ्ग ) माने जाते हैं, शिखाके बाल तो विशेष अङ्ग हैं । जैसे श्रङ्गहीन मनुष्य अशुभ ए माना जाता है, वैसे शिखाके केशरूप स्वाङ्गसे रहितको भी ग समझना चाहिये । वह ऐहिक, पारलौकिक शुभकर्म कलापका ता अधिकारी नहीं रहता । जो लोग शिखासे अपने सिरकी शोभाकी में हीनता मानते हैं, सीमन्त ( मांग निकालने ) आदि से अपनी शोभा में का लगे हुए स्त्रीत्वको बढ़ा रहे हैं; इसके परिणामस्वरूप उनकी कन्या-सन्तानें बढ़ रही हैं, अथवा सन्तानहीनता हो रही है । की सन्ध्या आदिके समय आकाश द्वारा शिखाग्रन्थिको द्वारीभूत न्य करके व्यापक दिव्य - शक्तिका आकर्षण होता है और ब्रह्मरन्ध्रमें का प्रवेश होता है । इस विषय में पाश्चात्य विद्वान् विक्टर ई क्रोमरका

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११० श्री सनातनधर्मालोक ( ५ ) मत पहले दिखलाया जा चुका है । एतदर्थ ध्यानके समय नंगे सिर रहनेका तथा शिखाग्रन्थिबन्धनका नियम है । ' स्नाने दाने जपे होमे सन्ध्यायां देवतार्चने । शिखाग्रन्थिं विना कर्म न कुर्याद् वै कदाचन ' । जैसे वस्त्रमें बन्धी गांठ तरह - तरह के कार्य में लगे पुरुषको विशेष कार्य याद करा दिया करती है, वैसे ही शिखाकी गांठ भी सांसारिक कार्य में लगेहुए पुरुषको अपने कर्तव्य वैदिक कर्म - कलापको याद करा देती है शिखाबन्धन मन, वाणी, शरीरकी चंचलता नष्ट कर अपने कर्त्तव्य कर्म में स्थिरता कर दिया करता है । मन, वाक्, शरीरकी स्थिरतापूर्वक किया हुआ ही कर्म शुभफलप्रद हुआ करता है । इस कारण शास्त्रकारोंने शुभ कर्मके प्रारम्भ में शिखाबन्धनका आदेश दिया है । इसीलिये ' आह्निक - तत्त्व ' में भी लिखा है-' गायत्र्या तु शिखां बद्ध्वा नैऋत्यां ब्रह्मरन्ध्रतः । जूटिकां च ततो बद्ध्वा ततः कर्म समारभेत् । निबद्धशिख श्रासीनो द्विज आचमनं चरेत् । कृत्वोपवीतं सर्व्वेसे वाङ्मनःकायसंयतेः ' । बद्ध शिखा कब छोड़नी चाहिये - इस विषय में भी कहा है- ' शौचेऽथ शयने सङ्ग भोजने दन्तधावने । शिखामुक्तिं सदा कुर्यादित्येतन्मनुरब्रवीत् ' । शौच - शयन आदिके समय उसे खोल देना चाहिये । जबकि सब सम्प्रदायों में कई साम्प्रदायिक चिन्ह नियत दिखाई देते हैं; उनका विशेष प्रयोजन न होने पर भी उन्हें वे छोड़ते नहीं; तब शिखाको ही क्यों छोड़ दिया जावे? यह शिखा तो प्रयोजनवती भी है, हिन्दुजातीय विशेष चिन्ह भी है । तब उसका त्याग कैसे