सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 201–210
सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 201–210
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गायत्री मन्त्रकी महत्ता १७१ खोदने पर दफीना ( माणिक्य ) तो मिला नहीं, किन्तु एक देवमन्दिर मिला । उसमें सूर्यकी एक मूर्ति है, जो चमकदार पत्थरोंसे बनाई हुई है । सूर्यके सामने एक हिन्दु डण्डे की तरह झुककर प्रणाम कर रहा है । सामने ही अग्निमें धुवाँ उठ रहा है, जिससे मालूम होता है कि- अग्निमें कुछ सुगन्धित द्रव्य डाला गया है । इधर-उधर फूल पड़े हैं । यह सव दृश्य पत्थरों से बनाया गया है । इस विचित्र सूर्य - मन्दिर मिलने से मालूम हुआ कि- किसी युग में हिन्दुओंका चक्रवर्ती राज्य अमेरिका तक फैला था । इसके अति-रिक्त यह भी मालूम हुआ कि हिन्दुओं का विश्वास था कि - सूर्य प्रसन्न तथा क्रुद्ध भी होसकता है । यदि ऐसा विचार न होता; तो एक हिन्दु उस ( सूर्य ) की पूजा क्यों करता? क्यों उसे नमस्कार करता? इस विषयको लेकर वैज्ञानिक संसारमें क्रान्ति उत्पन्न होगई । मिस्टर जार्जनामक किसी विज्ञानके प्रोफेसरने यह परीक्षा की कि- " सूर्यमें कृपाशक्ति है या नहीं? हम सूर्यमें समस्त तत्त्वों की सत्ता तो मानते रहे; पर यह कल्पना भी नहीं कर सके कि सूर्य में प्रसन्नता-अप्रसन्नताका तत्त्व भी विद्यमान है! हिन्दुओं की सूर्य - पूजाका वृत्त भारतीय प्राचीन इतिहाससे हमें पहले ही पता था । अमेरिकामें मिले सूर्य - मन्दिरसे हमें हिन्दुओं की सूर्य - पूजा में अन्य भी निश्चय होगया । मि ० जार्जने सोचा कि - हिन्दुओं की सूर्योपासना क्या मूर्खतापूर्ण थी वा वास्तविकतापूर्ण? इसकी रोचक परीक्षा हुई । मईका महीना था । पूरे दोपहर के समय केवल पाजामा पहनकर मि ० जार्ज नंगे शरीर धूपमें ठहरे ।
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१७२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) पाँच मिनट सूर्यके सामने ठहरकर वे कमरे में गये । थर्मामीटरसे उन्होंने अपना तापमान देखा । तीन डिग्री तक बुखार चढ़ा था । दूसरे दिन उक्त महाशयने फूल - फलोंका उपहार तैयार किया । अग्निमें धूप जलाया । तब वह पूरे दोपहर में नंगे शरीर धूपमें गया । उसने सूर्यके सामने श्रद्धासे फूल चढ़ाये, फल भी । हाथ जोड़कर प्रणाम किया । जब वह अपने कमरे में गया; तो घड़ी में उसने देखा कि आज वह ग्यारह मिनट तक सूर्य के सामने रहा । थर्मामीटरसे मालूम हुआ कि आज उसका तापमान नार्मल रहा । उसका पारा ठण्डककी ओर रहा । इससे उसने यह परिणाम निकाला कि वैज्ञानिकोंका “ सूर्य केवल अग्निका गोला और जड़ है " यह सिद्धान्त गलत है, वस्तुतः उसमें अप्रसन्नता और प्रसन्नताका तत्त्व भी विद्यमान है । " ' आलोक ' के पाठकोंने वैज्ञानिकोंकी यह गवेषणा सुन ली । उन लोगोंको अभी ये बातें धीरे - धीरे मालूम होरही हैं; परन्तु अपने यहाँ तो यह सिद्धान्त वैदिककालसे चला रहा है कि सूर्यमें बुद्धि-शक्ति है । इसीलिए वेदमें सूर्यकेलिए कहा है- ' इनो विश्वस्य, भुवनस्य गोपाः, स मा धीरः ' ( ऋ ० १।१६४।२१ ) यहाँ पर सूर्यको धीर - बुद्धियुक्त ' निरुक्त ' के शब्दों में ' धीरः धीमान् ' ( ३ | १२ | १ ) कहा है । तभी बुद्धियुक्त सूर्य ( सविता ) से ' तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ' ( यजुः वा ० सं ० ३।३५ ) इस प्रकार बुद्धिकी प्रार्थना धार्मिकगरण किया करते हैं ।
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गायत्री मन्त्रकी महत्ता सविता पर विवेचन ' सविता ' सूर्यको कहते हैं - यह कहा जा चुका है । ' सुतिन्प्रेरयति कर्मणि लोकम् इति सविता ' यह सविताकी व्युत्पत्ति है । इससे सूर्यका बोध होता है क्योंकि वही हमें कर्मोंमें प्रेरित करता है । सूर्योदय हो रहे होने पर वा होजाने पर हम आलस्यको छोड़कर अपने आवश्यक कर्मोंमें जुट जाते हैं । कई महाशय ' सविता ' शब्दको ‘ षुञ् प्रसवैश्वर्ययोः ' इस धातुसे निष्पादित करते हैं । कई विद्वान् ‘ यः चराचरं जगत् सुनोति, सूते वा उत्पादयति, स सविता ' ( स ० प्र ० ) इस प्रकार व्युत्पादित करके ' अभिषवः- प्राणिगर्भविमो-चनं च उत्पादनम् ' यह कहकर ' पुत्र अभिषवे, षूङ् प्राणिगर्भ-विमोचने ' ( स ० प्र ० १ समु ० ) इन धातुओं से निष्पादित करते हैं; पर यह वेद तथा वेदाङ्ग व्याकरणसे विरुद्ध है । इस विषयमें ‘ षुञ् प्रसवैश्वर्ययो: ' इस धातुका उपन्यास तो ठीक नहीं, क्योंकि पुत्र धातु ' अभिषव ' अर्थ में आता है; प्रसव आदिमें नहीं । ' सविता ' में अभिषव अर्थ नहीं । अभिषव स्नपन, पीडन तथा सुरासन्धान ( सोमवल्लीका रस निकालना ) अर्थ में आता है । वेदाङ्गप्रकाश ' आख्यातिक ' में स्वा ० दयानन्दजीने भी ' पुत्र ' धातुका ' यन्त्रसे रस खींचना, वा राज्याधिकार देना ' यह अर्थ माना है, उत्पादन अर्थ नहीं माना । इसके अतिरिक्त ' षुञ. ' धातु अनिट् होती है; पर ' सविता ' में तो इट् प्रत्यक्ष ही है । जो ' प्रसवैश्वर्य ' में धातु होती है; वह ' षु ' धातु होती है ' पुष्प ' नहीं । वह भी सेटू नहीं होती, किन्तु अनि
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१७४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) होती है । वहाँ पर ' प्रसव का अभ्यनुज्ञान अर्थ विवक्षित है, गर्भ-मोचन अर्थ नहीं | प्रसव अर्थ में तो ' पूङ् प्राणिगर्भविमोचने ' ( अ ० वे ० आ ० ) यह अढ़ादिकी, अथवा ' पूङ् प्राणिप्रसवे ' ( दि ० वे ० आ ० ) यह दिवादिकी धातु प्रयुक्त करनी चाहिये । परन्तु यह पक्ष भी ठीक नहीं; क्योंकि ये धातुएँ भी बेटू होती हैं; पर सविता देवतावाले मन्त्रों में सर्वत्र ' सविता ' इस प्रकार नित्य इट् ही देखा गया है; कहीं ' सोता ' इस प्रकार हटू - रहित प्रयोग ' सूतवे ' ( अथर्व ० ५ । २५ । १० ) की तरह नहीं देखा गया । अन्यथा वेट् ( वैकल्पिक इट् ) होने का लाभ ही क्या है और सविता देवतावाले मन्त्रोंमें प्राणिप्रसव आदि अर्थ देखा भी नहीं गया है । ' अनुसू सवितवे ' ( अथर्व ० ६।१७११ ) इत्यादि मन्त्रों में उक्त धातुओंकी वेट्कता देखी भी गई है, अर्थ भी वही देखा गया है । पर सावित्र ( सविता देवतावाले ) मन्त्रों में कहीं भी ' सविता, सोता, इस प्रकार वेट्कता नहीं देखी गई है I । व्यत्ययसे भी उक्त सिद्धि नहीं हो सकती; क्योंकि - सावित्र मन्त्रोंसे विरोध आता है । कई महाशय ‘ सविता में उक्त दो धातुओं को सिद्ध करने के लिए उनके वैकल्पिक रूपके प्रदर्शनार्थ ' वि हि सोतोर सृक्षत ' ( ऋ. १० / ८६।१ ) इस मन्त्रको उपस्थित करते हैं; पर यह भी ठीक नहीं; क्योंकि यहां पर भी ' सोतो: ' का ' सविता ' पढ़के समान अर्थ इष्ट नहीं, किन्तु ' सोमाभिषवं कर्तुम् ' यही अर्थ इष्ट है । तब यह वैकल्पिक इट्वाली ' षूङ् ' धातुका वैकल्पिक प्रयोग नहीं है, किन्तु अनिट् पु ( सुनोति ) धातुका ही रूप है, जिसका ' सविता ' से कोई सम्बन्ध
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गायत्री मन्त्रकी महत्ता १७२ नहीं । इसके अतिरिक्त ' सोतो; ' यहां पर ' सविता ' की तरह ' तृच् ' नहीं किन्तु ' तोसुन् ' प्रत्यय है । इस प्रकार पूर्वपक्ष तथा उत्तरपक्ष दोनों ही वेदको इष्ट नहीं दीख पड़ते । अर्थात् ‘ सबिता ' में न तो ' पु प्रसवैश्वर्ययोः ' ( भ्वा.प.अ. ) यह ‘ सवति'का प्रयोग है, और न ही ' षु प्रसवैश्वर्ययोः ' ( अदा. प. अनि. ) इस ' सौति ' धातुका प्रयोग है और न ही ' पूङ् प्राणिगर्भ-विमोचने ' ( अदा ० आ ० वे ० ) इस ' सूयति ' का प्रयोग है, और न ही ' पुत्र अभिषवे ' ( स्वा ० उ ० अनि ० ) इस ' सुनोति ' का ही रूप इष्ट है । उत्पादनार्थक धातु तथा परमात्मा अर्थ ' सविता ' में मानने पर कुछ विरोध भी आता है; क्योंकि –जगत्का उत्पादक उनके मतमें परमात्मा नहीं, किन्तु प्रकृति मानी जाती है; तब वह धातु भी परमात्मार्थमें कैसे हो सकती है, यदि ' सविता ' का अर्थ ' परमात्मा ' माना जाय । और एक प्रवल युक्ति यह है कि सविता में उक्त धातुएँ नहीं हैं 1 । जहाँ भी ' सविता ' शब्द आता है, उस मन्त्रमें कहीं भी सवति, सूति, सौति, सूयति, सुनोति धातुओंकी क्रिया भी नहीं दीखती; तब ' सविता ' शब्दमें उन धातुओं के अर्थ भी कैसे इष्ट हो सकते हैं? वस्तुतः ‘ सविता ' पदमें वेदको ' षू प्रेरणे ' ( तु ० प ० से ० ) यह तौदादिक धातु ही इष्ट है; वह ' अनिट् ' भी नहीं है, ' वेट् ' भी नहीं है, किन्तु ' सेट ' है । ' सुवति - प्रेरयति कर्मणि लोकम् ' यह ' सविता ' की व्युत्पत्ति है । यही धातु तथा यही अर्थ ' सविता ' में वेदको इष्ट है, उत्पादन आदि अर्थ नहीं । इसमें वेदमन्त्रों की साक्षी भी द्रष्टव्य
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१७६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ) ५ है । ' देव! सवितः प्रसुव ' ( यजुः वा ० सं ० ६१ ) इस मन्त्रमें ' सविता ' को सम्बोधित किया गया है । यहां पर तुदादिगणकी ' षू प्रेरणे ' धातु ही क्रिया में प्रयुक्त की गई है । तुदादिसें ' श ' विकरण होनेसे अपित् - सार्वधातुकता के कारण ङित्संज्ञा मानी जाती है । तव गुणनिषेध होनेसे उवङ् हो जाता है । इसी प्रकार ' सविता नः सुवतु सर्वतातिम् ' ( ऋ ० १०/३६/१४ ) यहां भी ' सुवति'का प्रयोग किया गया है, सवति, सौति, सूति, सूति तथा सुनोति धातुका प्रयोग नहीं किया गया । इसी तरह ' सुधाति सविता ' ( ऋ ० ५८२२३-६ ) ' सवितर्वरेण्यं भागमा सुव ' ( ऋ ० १०।३५।७ ) सविता तु वो देवः... सुवतु ' ( ऋ ० १०।१७५।४ ) ' देवेषु च सवितर्मानुषेषु च त्वं नो अत्र सुवताद, अनागसः, ( ऋ ० ४ । ५४।३ ) ' सविता धर्मं साविपत् ' ( यजुः ६५ ) [ यहां अपने अष्टाध्यायी भाष्य में स्वा ० दयानन्दजीने लिखा है- ' अत्र साविषत् ' इति ' षू प्रेरणे ' इत्यस्य प्रयोगः ( ३ | १ | ३४ ) ] इन मन्त्रों में भी पाठक स्वयं देखें । इस प्रकार ऋ ० ३।५६ ६, ४ | ५४१२, ५८२ | ४-५, ६।७१।६, ३।५४ | ११, ७१३८/२ इत्यादि मन्त्रों में भी देखा जा सकता है । सविताका प्रसिद्ध एक मन्त्र भी देखना चाहिये । ' विश्वानि देव! सवितर्! दुरितानि परासुव । यद् भद्रं तन्न आसुव ' ( यजुः ३०।३ ) यहां पर भी विधि - निषेधमें सविताके लिये तुदादिगणी ' षू प्रेरणे ' धातुका ही प्रयोग किया गया है । केवल वही धातु क्यों; अपितु वेद में ' सविता ' में अर्थ भी ' पू प्रेरणे ' धातुका ही इष्ट है । इस विषय
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गायत्री मन्त्रकी महत्ता १७७ में प्रकृत सावित्र मन्त्रमें ही दृष्टि डालनी चाहिये । ' तत् सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ' यहां पर क्रियामें यद्यपि ' सुवति ' धातुका तो प्रयोग नहीं किया गया; तथापि उसका प्रेरणा अर्थं ' प्रचोदयात् ' इस ' चुद संचोदने ' धातुसे ही प्रकाशित किया गया है । इस प्रकार ' सविता ' की ' सूते, सौति, सवति, सूयते, सुनोति, ये व्युत्पत्तियाँ वेद से विरुद्ध सिद्ध हुई ' । तब ' सुवति कर्मणि लोकम् ' इस व्युत्पत्तिके ही बचनेसे और वेदसम्मत होने से युक्तता सिद्ध हुई । तब इस व्युत्पत्तिसे सूर्यदेव का ग्रहण स्वतः सिद्ध हुआ; क्योंकि वह उदय होता हुआ ही लोगोंको कर्ममें प्रेरित करता है । इसी कारण यजुर्वेद ( शतपथ-ब्राह्मण ) में कहा है- ' असौ वै यादित्यो देवः सविता ' ( ६।३।१।२० ) । अतः ' सविता ' के पर्यायवाचक ' सूर्य ' शब्द में भी यह धातु मानी गई है । जैसे कि - ' राजसूयसूर्य ' ( पा ० ३।१।११४ ) इस सूत्र में ' सूर्य ' शब्दके व्युत्पादनके अवसर में ' सिद्धान्तकौमुदी ' के कृत्यप्रकरण में कहा है- ' सरति आकाशे सूर्यः । यद्वा - पू प्रेरणे तुदादिः, क्यपो रुट् । सुवति कर्मणि लोकं प्रेरयतीति सूर्यः ' । वादिप्रतिवादिमान्य निरुक्तकार श्रीयास्कने भी ' सूर्य'की यही निरुक्ति की है- ' सूर्य: सर्तेर्वा सुवतेर्वा । ' ( १२।१४।२ ) । इसीलिए वेदमें भी ' सूर्य! अप सुव ' ( ऋ ० १०३७१४ ) इस मन्त्रमें सूर्यके सम्बोधनमें ' सुवति ' धातुका प्रयोग किया गया है । इसी प्रकार स्वा ० दयानन्दजीने भी ‘ आख्यातिक ' कृत्यप्रक्रियामें ६८४ सूत्रकी व्याख्यामें कहा है- ' सरति आकाशमार्गेण गच्छति, वा ' सुवति लोकं १२ स ० ध ०
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१७८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) कर्मणि प्रेरयतीति सूर्यः ' यहां ' सृ गतौ वा पू प्रेरणे धातुसे क्यप प्रत्यय रुडागम निपातन है ' ( पृ ० २६६ ) । इस प्रकार सविता तथा सूर्य पर्यायवाचक होनेसे सविता सूर्यार्थक हुआ । इसमें मन्त्रभागकी साक्षी भी द्रष्टव्य है । ' सूर्यां यत् पत्ये शं-सन्तीं मनसा सविताऽददात् ' ( ऋ ० १०१८ ९ ) इस मन्त्र में ' सूर्या ' को सविताकी लड़की बताया गया है । ' युवो ( अश्विनोः ) रथं दुहिता सूर्यस्य ' ( ऋ ० १।११७ । १३ ) यहाँ ' सूर्यकी लड़की ' ( सूर्या ) का अश्विनों के रथमें चढ़ना कहा है । यहां ' सूर्यकी लड़की ' शब्द कहा गया है; अन्य इसी अर्थको बतानेवाले मन्त्र में ' सूर्या ' का नाम स्पष्ट है । जैसे कि - ' ता वां ( अश्विनोः ) रथं वयमद्या हुवेम अश्विनौ! ' ' यः सूर्यां वहति ' ( अथर्व ० २०।१४३ । १ ) यहां पर सूर्याको अश्विनों के रथ पर चढ़ा हुआ बताया गया है । पूर्वं कहें मन्त्र में सूर्याका अपने पिता सविता द्वारा पतिको देना कहा गया है । इससे सविता और सूर्यकी पर्यायवाचकता सिद्ध हो जानेसे ' सविता ' का ' सूर्य ' अर्थ हुआ । इसलिए उपनयन - समय में ' देव! सवितः । एष ते ब्रह्मचारी ' ऐ सविता! यह तेरा ब्रह्मचारी है, यह कहकर उसे सूर्यके सामने ठहराया जाता है । इस पर स्वामी दयानन्दजीकी ' संस्कार - विधि ' का ८४ वाँ पृष्ठ भी देखा जा सकता है । इससे ' सविता ' सूर्यवाची है - यह अत्यन्त स्फुट हो गया । सूर्यके ही ब्रह्मचारी होने से उसे सावित्र ( सविताके, सूर्यके ' तत्सवितुर्वरेण्यं ) मन्त्रकी दीक्षा देना ठीक भी है । तब सविता सूर्य - वाचक ही सिद्ध हो गया । इसीलिए उपनयन तथा सन्ध्यामें
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गायत्री मन्त्रकी महत्ता १७३ भी ' तच्चतुर्देवहितं ' इत्यादि सूर्य देवतावाले चार मन्त्रोंसे जहां सूर्यका उपस्थान होता है, वहां जपन भी ' तत्सवितु: ' इसी सूर्यके मन्त्रका ही होता है । इस प्रकार सावित्र मन्त्र में ' योऽसौ आदित्ये पुरुषः सोऽसावहम् ' ( यजु ० वा ० सं ० ४८।१७ ) एतन्मन्त्रोक्त सूर्य-मण्डलाभिमानी देवता ही उपासनाका विषय सिद्ध हुआ । उक्त सावित्र - मन्त्रमें अपनी बुद्धिकी प्रेरणा प्रार्थित की गई है । सविताका परमात्मा अर्थ मानने पर तो आत्माका कर्ममें परतन्त्रता पक्ष भी मानना पड़ जायगा । सूर्यकी उपासनाके विषयमें १।१।२० ' ब्रह्मसूत्र ' के सूत्रके शाङ्कर-भाष्य में भी कहा है- ' य एषोन्तरादित्ये '. इति श्रूयमाणः पुरुषः परमेश्वर एव, न संसारी । यदपि आधारश्रवरणान्न परमेश्वर इति? अत्रोच्यते - स्वमहिमप्रतिष्ठस्यापि आधारविशेषोपदेश उपासनार्थो भविष्यति । सर्वगतत्वाद् ब्रह्मणो व्योमवत् सर्वान्त-रत्वोपपत्तेः ' । इसलिए सूर्यमण्डलाभिमानी देव ही सन्ध्यामें उपास्य सिद्ध हुआ । तभी प्रातः सन्ध्या में मुखको पूर्वाभिमुख करना पड़ता है और सायंकालमें पश्चिमाभिमुख; क्योंकि सूर्य उस अवसर में उस - उस दिशामें होता है । इसीलिए ' सत्यार्थप्रकाश के चतुर्थ समुल्लास ५६ पृष्ठमें उद्धृत हुए सामवेदके ' षड्विंश - ब्राह्मण ' के वचनमें कहा है — ' तस्माद् अहोरात्रस्य संयोगे ब्राह्मणः सन्ध्या-मुपासीत उद्यन्तमस्तं यान्तमादित्यमभिध्यायन् ' ( ४ | ५ ) यहां पर उदय और अस्त होते हुए सूर्यके ध्यानको ही ' सन्ध्या ' कहा गया है । . इसीलिए मन्त्रभागमें भी कहा है- ' उद्यते नमः, उदायते नमः,
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१८० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) उदिताय नमः ' ( अथर्व ० शौ ० १७११।२२ ) ' अस्तं यते नमोऽस्तमेष्यते नमोऽस्तमिताय नमः ' ( ० १७११।२३ ) यहां पर उदय हो रहे हुए, उदय होनेवाले, और उदय हो चुके हुए तथा अस्त हो रहे हुए, अस्त होनेवाले, और अस्त हो चुके सूर्यको नमस्कार करना कहा है । इसी मूलको लेकर पुराण आदि - ' उत्तमा तारकोपेता, मध्यमा लुप्ततारका । अधमा सूर्यसहिता प्रातः सन्ध्या न्निधा मता ' ' उत्तमा सूर्यसहिता, मध्यमा लुप्तभास्करा । श्रधमा तारकोपेता सायं-सन्ध्या त्रिधा मता ' यहां दोनों सन्ध्याओंके तीन भेद कहे हैं । अथवा उक्त मन्त्रों में दोनों सन्ध्याओं की अवधि हो । तभी मनुजीने कहा है - – ' पूर्वी सन्ध्यां जपँस्तिष्ठेत् सावित्रीमार्कदर्शनात् । पश्चिमां तु समासीनः सम्यग् ऋक्षविभावनात् ' ( २।१०१ ) । ‘ प्रातः - सन्ध्या सूर्यदर्शन तक करे, सायं सन्ध्या तारोंके दीखने तक करे ' । यह प्रसक्तानुप्रसक्त कहा गया है; अब प्रकरण पर आना चाहिये । सावित्र - मन्त्रकी मुख्यताका कारण अदृष्टमें तो जो भी हो; क्योंकि यह वेदका सार रूप है; पर दृष्टमें भी यह मुख्य है । इसकी मुख्यता वा इसकी महत्ताका कारण यह है कि इस मन्त्रमें बुद्धिकी प्रार्थना है । सूर्य से बुद्धिकी प्रार्थना इस कारण है कि वह बुद्धिका अधिष्ठाता देव है । इसी बुद्धिके दाता होने से ही सूर्योदयके समय चोरोंकी चौर्य - प्रवृत्ति तथा जारोंकी जास्ता प्रवृत्ति हट जाती है । सूर्यसे ही वैज्ञानिकोंने ऐसी सूई तैयार की है जिसके इन्जैक्शनसे कुलटा स्त्रियोंमें सद्बुद्धि उदय हो आती है । सूर्योदयसे