सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 211–220
सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 211–220
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गायत्री मन्त्रकी महत्ता १८१, साधारण पुरुषोंका भय हट जाता है, उसके उदयसे बुद्धिकी शुद्धि और कर्मों की प्रेरणा से बुद्धिकी वृद्धि प्रत्यक्ष है । बुद्धिकी प्रार्थना से ही ' वृद्धकुमारी - वर ' तथा ' वृद्धान्धब्राह्मणवर ’ इन न्यायोंसे सब कुछ माँग लिया जाता है; इस कारण गायत्री - मन्त्र बुद्धिदाता होने से सभी कुछ देनेवाला है; अतः उसकी महत्ता स्पष्ट है । एक वृद्धा कुमारीने पति, पुत्र, धान्य, गाय आदि चाहते हुए भारी तपस्या की । देवने साक्षात् होकर उसे एक वर माँगनेको कहा; तो उसने वर माँगा - ' मैं अपने पुत्रको बहुत घी - दूध मिला भात सोनेके पात्रों में खाता हुआ देखना चाहती हूँ ' । इस प्रकार उसने एक ही वरसे ' यौवन, पति, पुत्र, सोना, धान्य, गाय ' आदि माँग लिये । इसी प्रकार एक जन्मान्ध, निर्धन, अविवाहित ब्राह्मण की भी कथा है । देवताके मुखसे एक वरकी प्राप्ति जानकर उसने उससे वर माँगा - ' मैं अपने पोतेको राजसिंहासन पर बैठा देखना चाहता हूँ ' । इस प्रकार उसने एक वरसे अपनी आंखें, धन, यौवन, विवाह, स्त्री, पुत्र - पौत्र आदि सन्तान माँग ली । यही बात है बुद्धिकी प्रार्थनाकी । हमारे जो काम सिद्ध नहीं होते, वा उल्टे पड़ जाते हैं; उसका मुख्य कारण है बुद्धिको विपरीतता । इस कारण प्रसिद्ध है कि- ' विनाशकाले विपरीत-बुद्धि: ' । ' महाभारत ' में भी देवताओंकेलिए कहा है- न ' देवा दण्डमादाय रक्षन्ति पशुपालवत् । यं तु रक्षितुमिच्छन्ति बुद्ध्या संविभजन्ति तम् । यस्मै देवाः प्रयच्छन्ति पुरुषाय पराभवम् । बुद्धिं तस्यापकर्षन्ति सोऽवाचीनानि पश्यति ' ( उद्योगपर्व ३४ / ८०-८१ ) ।
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१८२ श्रीसनातनधर्मालौक ( ५ ) ' देवता पशुपालकी तरह डण्डा लेकर पुरुषकी रक्षा नहीं करते । वे जिसकी रक्षा करना चाहते हैं उसे बुद्धि दे देते हैं । जिसको गिराना चाहते हैं; उसकी बुद्धि वे छीन लेते हैं । बुद्धिकी विपरीतता होने पर ही तो पाप होते हैं । इससे बुद्धिकी महत्ता सिद्ध हुई । इसलिए ' साङ्ख्यदर्शन ' में २।१३ सूत्रके विज्ञानभिक्षुभाष्य में कहा है— ' अस्याश्च वुद्धेर्महत्त्वं स्वेतर -सकलकार्यव्यापकत्वाद् महैश्वर्याच्च मन्तव्यम् ' | ' यह बुद्धि अपने से भिन्न सभी कार्यों में रहती है; और इसमें बहुत सामर्थ्य है ' । इस कारण इसका बहुत महत्त्व है । तभी न्यायकी पुस्तक तर्कसंग्रह में कहा है - ' सर्वव्यवहारहेतुर्गुणो बुद्धि-र्ज्ञानम् ' अर्थात् बुद्धि सब व्यवहारोंका कारण है । इसीलिए ' महाभारत'के उद्योगपर्वमें कहा है- ' येन त्वेतानि सर्वाणि संग्रही-तानि भारत! यद् बलानां वलं श्रेष्ठं तत् प्रज्ञाबलमुच्यते ' ( ३७१५५ ) अर्थात् बुद्धिवल सव बलोंसे श्रेष्ठ है । एक हाथीपर एक बालक चढ़ा हुआ अंकुशके द्वारा उसे अपनी इच्छा के अनुसार जहाँ - तहाँ चला रहा था । हाथीके गलेमें बंधा हुआ घण्टा बज रहा था । उस पर एक कविने यह उत्प्रेक्षा की कि यह घण्टानाद नहीं है किन्तु हाथीके मुख से यह शब्द निकल रहे हैं कि- ' मतिरेव बलाद् · गरीयसी, यद्ऽभावे करिणामियं दशा ' | ' इयं दशा ' का यह अर्थ है कि — एक बुद्धिमान् बालक भी बलवान्को अपनी इच्छानुसार जहाँ - तहाँ चलाता है । इस प्रकार जब सब व्यवहारोंके मूल होनेसे बुद्धिकी महत्ता सिद्ध हुई, और बुद्धिका सम्बन्ध सविताके साथ है; तब बुद्धि-
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गायत्री - मन्त्रकी महत्तां १८३ प्रार्थक सावित्र - मन्त्रकी महत्ता तो स्वतः सिद्ध हुई । इसीलिए ही इस गायत्री मन्त्रका फल वेद - मन्त्र में भी स्वयं कहा है- ' स्तुता मया वरदा वेदमाता ( गायत्री ) प्रचोदयन्तां पावमानी द्विजानाम् । आयुः, प्राणं, प्रजां, पशुं, कीर्ति, द्रविणं, ब्रह्मवर्चसं मह्य ं दत्त्वा व्रजत ब्रह्म-लोकम् ' ( अथर्व ० १६।७१।१ ) यहाँ पर वेदमाता गायत्रीका ही आयु, सन्तान, यश, धन, ब्रह्मतेज आदि फल कहा है । इसी गायत्री की महत्ता होनेसे ही उसे आदरार्थ ' प्रचोदयन्ताम्, व्रजत ' यहाँ बहुवचन दिया गया है । ' न तिष्ठति तु यः पूर्वं नोपास्ते यच पश्चिमाम् । स शूद्रवद् ' ( मनु ० २।१०३ ) यहाँ पर सन्ध्या न करने वालेको शुद्रवत् कहा गया है । यहाँ पर भी यही रहस्य है । सन्ध्याका सर्वस्व है सावित्री ( गायत्री ), और सावित्रीमें है बुद्धि-प्रार्थना । जो द्विज सन्ध्योपासन न करेगा, वह गायत्री - रहित होने से बुद्धिके अभाववश शूद्रसदृश ही रहेगा । इस वादिप्रतिवादिमान्य मनु - वचनसे शूद्रोंका द्विजकर्म - वेदात्मक सन्ध्या में अनधिकार भी सिद्ध होगया । इसी प्रकार ' मनुस्मृति ' के ' अकारं चाप्युकारं च मकारं च प्रजापतिः । वेदत्रयाद् निरदुहृद् भूर्भुवः स्वरितीति च ' ( २२७६ ) त्रिभ्य एव तु वेदेभ्यः पादं पादमदूदुहत् ' ( २२७७ ) एतदक्षरमेतां च जपन् व्याइतिपूर्विकाम् । सन्ध्ययोर्वेदविद् विप्रो वेदपुण्येन युज्यते ' ( २७८ ) इस पद्यके अनुसार वेदका भी सर्वस्व गायत्री है; तभी उपनयन होजाने पर वेदारम्भ संस्कार में वेदकी सारस्वरूपा गायत्री को ही उपनयनके दिन पढ़ाकर आचार्य ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्योंको
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१८४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) एकजसे उसी दिन द्विज करता है । तभी वेदाध्ययन न होनेसे गायत्री से रहित होनेके ही कारण श्रीमनुजीने ' योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यन्न कुरुते श्रमम् । स जीवन्नेव शूद्रत्वमाशु गच्छति सान्वयः ' ( २।१६८ ) इस प्रकार वेदके अनध्ययन में द्विजको भी शूद्र - सदृश कहा है । इस वादिप्रतिवादिमान्य मनु - वचनसे भी शूद्रको वेदाध्ययनका अनधिकार सिद्ध होरहा है । इसी कारण उसी वेदका अधिकारपट्ट यज्ञोपवीतसूत्र भी शूद्रोंका नहीं होता । बुद्धिका कार्य भी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्योंका होता है, शूद्रोंका नहीं । तभी स्वा ० दयानन्दजीने भी उपनयनमें आद्य तीन वर्णोंको ही अपनी ‘ संस्कारविधि'में अधिकृत किया है । फलतः वुद्धिप्रकाशक होनेसे ही सूर्य ' सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ' ( यजुः वा ० सं ० ७१४२ ) इस प्रकार जगत्का आत्मा माना गया है । बुद्धिका उदय होता है कर्मों में प्रेरणा से । तव ' सूर्य ' के पर्यायवाचक ' सविता ' में भी ' षू प्रेरणे ' इस प्रकार ' सुवति ' धातु ही है । यही वेदवाणीका अभिप्राय है । यद्यपि बुद्धि की प्रार्थना लौकिक लोकों से भी हो सकती है; तथापि वेदके नियत आनुपूर्वी वाले तथा नियतपद्मयोगपरिपाटी वाले होनेसे उसमें अनन्यसदृश अपूर्वता हुआ करती है, जिससे उसके द्वारा फलातिशय हुआ करता है, जैसे कि ' निरुक्त ' में श्रीयास्कमुनिने कहा है — ‘ पुरुषविद्याऽनित्यत्वात् कर्म -सम्पत्तिर्मन्त्रो वेदें ' ( १।२।७ ) । इसी कारण मन्त्रके पदोंको अन्यथा करने पर वह मन्त्र न रह जाने से उसमें वह शक्ति भी नहीं रहती । तब शक्ति न होने पर वह
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गायत्री मन्त्रकी महत्ता १८५ फल ही कैसे हो? ' इस प्रकार गायत्री मन्त्रकी महत्ता सिद्ध हुई । इसी कारण ' बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि ' ( गीता ७११० ) ' गायत्री छन्दसामहम् ' ( १८।३५ ) भगवद्गीता में वैष्णव आदि सबके मान्य भगवान् श्रीकृष्णने गायत्रीको अपनी विभूति कहा है । ' छान्दोग्योपनिषद् ' ( ३।१२ ) में गायत्रीको परब्रह्मस्वरूपा कहा है । ' गायत्री छन्दसां माता ' ( नारा-यणोपनिषद् ३४ ) यहाँ पर उसे वेदकी माता कहा है । तब गायत्री मन्त्रको गौण कहते हुए कई साम्प्रदायिक निरस्त होगये । तभी तो यदि मृतक कर्ममें जप कराया जाता है; तव भी गायत्री का । यदि शुभ कर्ममें जप कराया जाता है, तब भी गायत्रीका । चिरायुष्मत्ताकेलिए भी गायत्री मन्त्रका जपन कराया जाता है । इससे वहां पर उस रोगीकी, उसके स्वजनोंकी, उसके वैद्यकी बुद्धि-वृद्धि होनेसे स्वयं ही चिरायुष्य जनक कार्योंकी प्रेरणा होगी और रोगीको स्वास्थ्य - लाभ एवं शुभ प्राप्त होगा । इसी कारण कहा है-' गायत्री वा इदं सर्वम् ' ( छान्दोग्योपनिषद् ३।१२ ( १ ) श्रीमनुजीने भी कहा है । ' सावित्र्यास्तु परं नास्ति ' ( २२८३ ) । इस प्रकार बुद्धि-प्रार्थक होनेसे गायत्री - मन्त्रकी महत्ता सिद्ध हुई । इसके जपसे * यद्यपि जप ' जल्प व्यक्तायां वाचि ' इस प्रकार व्यक्त वाणीका नाम जप कहना चाहिये; तथापि ' जप मानसे च ' मानसिक भी जपन हुआ करता है । मानसका फल भी अधिक होता है । जैसे कि - ' विधियज्ञाज्जप-यज्ञो विशिष्टो दशभिर्गुणैः । उपांशु स्यात् शतगुणः साहस्रो मानसः स्मृतः ' ( २२८५ ) ।
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१८६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) ग्रह - बाधा भी दूर हो जाती है । जैसेकि - महाभारत में कहा है— ' प्रजपन् पावनीं देवीं गायत्रीं वेदमातरम् । ये चास्य दारुणाः केचिद् ग्रहाः सूर्यादयो दिवि । ते चास्य सौम्या जायन्ते शिवाः शिवतराः सदा ' ( ३।२००१८३-८५ ) । इसलिए द्विजोंको सदा ही इस मन्त्रका जपन करना चाहिये, जैसे कि मनुजीने कहा है – ' साविन्नीं च जपेन्नित्यम् ' ( ११।२२५ ) इसी से उनके सब मनोरथ पूर्ण होंगे । ' स्तुता मया वरदा वेदमाता ( गायत्री ) प्रचोदयन्तां पावमानी द्विजानाम् ' ( अथर्व ० १६ | ७११ ) इस वेद-वाणीसे गायत्रीमें द्विजोंका ही अधिकार है । द्विजके यहाँ दो अर्थ हैं, एक तो ' ब्राह्मण ' दूसरा ' ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ' । अर्थात् गायत्री में ब्राह्मणका अधिकार है - यह एकपक्ष है । गायत्री में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तीनोंका अधिकार है - यह दूसरा पक्ष है । केवल ब्राह्मण इसका अधिकारी है - इसमें प्रमाण है गायत्रीका विसर्जन मन्त्र — ' उत्तमे शिखरे देवि! भूम्यां पर्वतमूर्धनि । ब्राह्मणे-भ्योभ्यनुज्ञाता गच्छ देवि! यथासुखम् ' ( कृष्णयजुर्वेद - तैत्तिरीयारण्यक १०।३० ) यहाँ पर गायत्रीको ब्राह्मणों के लिए अनुज्ञात किया गया है । ' ब्राह्मणेभ्यः ' यह चतुर्थी है । इसीलिए पारस्कर आदि गृह्यसूत्रोंमें उपनयनसंस्कारमें ' गायत्रीं ब्राह्मणाय अनुब्रूयात्, त्रिष्टुभं राजन्यस्य, जगतीं वैश्यस्य ' ( पारस्करगृ ० २।३।७ ८-६ मानवगृ ० १ २ ३ ऐतरेय-ब्रा ० ११५२८ ) इस प्रकार ब्राह्मणको गायत्रीका उपदेश देना कहा है, क्षत्रियको त्रिष्टुप् तथा वैश्यको जगती छन्दके उपदेशार्थ कहा है । यह ठीक भी है । गायत्रीके आठ अक्षरोंवाली होने से ही
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गायत्री मन्त्रकी महत्ता १६७ गायत्रीका उपदेश लेनेवाले ब्राह्मरणका उपनयन भी आठवें वर्ष में अभ्यनुज्ञात किया गया है; अन्तिम उपनयनकी अवधि पूर्व से द्विगुण सोलह वर्षकी रखी गई है । क्षत्रिय के उपनयन के समय त्रिष्टुपूका उपदेश होने से और त्रिष्टुप्के ग्यारह अक्षर वाला होने से क्षत्रिय का उपनयन भी ग्यारहवें वर्ष में आदिष्ट किया है, अन्तिम अवधि पूर्वसे द्विगुण बाइस वर्षकी रखी गई है । जगतीके बारह अक्षर वाली होनेसे उपनयन - समय में उस ( जगती ) के ग्रहण करनेवाले वैश्यका उपनयन भी वारह वर्ष में माना है, अन्तिम अवधि पूर्व से दुगुने चौबीस वर्ष में मानी गई है । इसमें मेधातिथिने भी श्रुति उद्धृत की है - सावित्र्या ब्राह्मणमुपनयीत, त्रिष्टुभा राजन्यम्, जगत्या वैश्यम् ' । इसी प्रकार गायत्रीके ' आयातु वरदा देवी अक्षरं ब्रह्मसंम्मतम् । गायत्री छन्दसां मातः! ' ( बोधायन गृह्यशेषसूत्र ३२६ | १ ) इस गायत्री के आह्वान- मन्त्रमें भी उसे ' ब्रह्म - सम्मत ' माना है । ब्रह्म ब्राह्मणको कहते हैं । जैसे कि - ' ब्रह्म हि ब्राह्मण: ' ( शत ० ५ | १ | १ | ११ ) ब्राह्मण-भोजनमें ' ब्रह्म - भोज ' शब्द प्रसिद्ध है । अथर्व के ' स्तुता मया वरदा वेदमाता ' ं ‘ द्विजानाम् । ’ · ‘ ब्रह्मवर्चसं मह्यं दत्त्वा व्रजत ब्रह्मलोकम् ' ( १६७१।१ ) इस गायत्री - विसर्जन के मन्त्र में जहां ' द्विज ' शब्द आया है, वहां अन्तमें ' ब्रह्मवर्चस ' की प्रार्थना भी आई है । ब्रह्मवर्चसकी प्रार्थना वेदमें ब्राह्मणके लिए आई है - ' ब्रह्मन्! ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम् ' ( यजु ० वा ० सं ० २२/२२ ) इस प्रकार गायत्री में ब्राह्मणका मुख्य अधिकार सिद्ध हुआ ।
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१८८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) इसी प्रकार ' सहस्रकृत्वस्त्वभ्यस्य बहिरेतत् त्रिकं द्विज: ' ( २७ ९ ) इस मनुपद्य में भी ' द्विज ' से ब्राह्मण ही इष्ट है । ' वेदमाता ( गायत्री ) द्विजानाम् ' ( अ ० ११।७१।१ ) यहां पर दूसरा पक्ष ' द्विज'का ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य यह अर्थ स्वीकार करने पर तो ' ब्राह्मणेभ्योभ्यनुज्ञाता ' इस गायत्रीविसर्जनात्मक मन्त्र में ' ब्राह्मण ' यह शब्द ' प्रधानेन हि व्यपदेशा भवन्ति ' इस न्याय से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्योंका उपलक्षक है । तभी पारस्कर आदि गृह्यसूत्रों में ' सर्वेषां वा गायत्रीमनुब्रूयात् ' ( २ । ३ । १० ) यह पक्ष भी आया है । पूर्वोक्त वेदमाता के मन्त्रमें ' ब्रह्मवर्चस ' शब्द क्षत्रियादिके ' हस्तिवर्चस ' आदिका भी उपलक्षक है, इस पक्षमें ' ब्रह्मसम्मतम् ' में ' वेदसम्मतम् ' अथवा ' ब्रह्मदेवस्य सम्मतम् ' यह अर्थ है । इस प्रकार ' ब्रह्म गायत्री ' शब्द में भी जान लेना चाहिये । अस्तु । बुद्धिमन्त्र गायत्रीमें उपास्यदेव सूर्य है । उसकी वेदने ' सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ' ( यजुः वा ० सं ० ७१४२ ) इस प्रकार स्तुति की है । सूर्य - व्यायाम से सर्वविध स्वास्थ्य भी प्रत्यक्ष है । शारीरिक स्वास्थ्य होनेपर मानसिक स्वास्थ्य प्रत्यात्म - वेदनीय है । तब ' स्वस्थे चित्ते बुद्धयः संस्फुरन्ति ' चित्तस्वास्थ्य में बुद्धिविकास सुस्पष्ट है । इस प्रकार सूर्यसेवन आध्यात्मिक दृष्टिसे तथा आधिभौतिक एवम् आधि-दैविक दृष्टिसे भी लाभप्रद सिद्ध है । तभी हमारे पूर्वजोंने सन्ध्यावन्दन भी सूर्यके समक्ष ही करना नियमित किया था । यही बात शास्त्रोंसे जानकर पाश्चात्य - विपश्चिद्गरणने सूर्य द्वारा बहुत रोगों की चिकित्सा में साफल्य प्राप्त कर लिया । रोगका कारण
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गायत्री मन्त्रकी महत्ता १८६ होता है बुद्धिकी न्यूनता हो जाने पर मस्तिष्क तथा मनमें निर्बलता हो जानेसे बाह्य आहार - विहार - वैषम्यमूलक अपरिपाकः और उससे भीतरी अन्तड़ियों में त्रुटि हो जानेसे रोग हो जाया करते हैं । इस प्रकार सभी दृष्टियोंसे सविता तथा सावित्रीकी महत्ता सिद्ध हुई । आजकलके वैज्ञानिक जो कार्य यन्त्र आदिसे कर लेते हैं; उसे हमारे पूर्वज तपः - शक्ति से पूर्ण कर लिया करते थे । उसी तपस्यामें गायत्रीका जप भी अन्तर्भूत हो जाता है । उसके लिये श्रीमनुने ठीक कहा है-' सहस्रकृत्वस्त्वभ्यस्य बहिरेतत् त्रिकं द्विजः । महतोयेनसो मासात् त्वचेवाहिर्विमुच्यते ' ( २२७ ९ ) ' त्र्यक्षर ' ओम् ' ( अ, उ, म् ) तीन व्याहृति, त्रिपदा गायत्री इसके सहस्रवार ग्रामसे बाहर नदी तट वा वनमें हजार - चार एक मास जपनेसे द्विज महापापसे भी छूट जाता है । ' उसका कायाकल्प हो जाता है, वह नये क्रिया-शील जीवन में प्रवेश करता है । इसलिए इसे ' तारक- मन्त्र ' कहते हैं । ' इससे बढ़कर इसकी अन्य क्या महत्ता हो? अधिक कहना व्यर्थ विस्तार है । अतः हम यहीं समाप्त करते हैं । तथापि उसके माहात्म्यको देखनेके इच्छुक निम्नाङ्कित प्रमाणों. को देखें- मनुस्मृति ( २२७७-७८-७९ - ८०-८१-८२-८३ ) । बृहद्-विष्णुस्मृति ) ( ५५।१५ ) हारीतस्मृति ( ४।४०, ४७-४८ ) याज्ञवल्क्य-स्मृति ( ४ / २ / २२-२३ ) शङ्खस्मृति ( ११।१-२, १२।१, ३, ८, १४-१५-१६-१७-१८-२०-२३-२४-२५-२६-२६-३०-३१ ) । महाभारत ( भीष्मपर्व ( ४ | १८, अनुशासनपर्व १५०।१-४ ) देवीभागवत ( ११ / ३६।१५,
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१६० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) १२ / ८ / २ ९ ) इत्यादि । यद्यपि बुद्धिके मन्त्र लौकिक भी हो सकते हैं; तथापि वेदमें नियत आनुपूर्वी होनेसे, नियतपदप्रयोग - परिपाटीकत्व होनेसे उसके मन्त्रकी विशिष्टता भी स्वतः- सिद्ध है । वेदमें भी जब गायत्रीको सर्वस्व माना गया है; तथा उसे वेदमाता कहा गया है- — तब उसकी अन्य भी महत्ता तथा विशिष्टता सिद्ध होगई, यह ' श्रीसनातनधर्मालोक ' के विद्वान् पाठकोंने भली भांति समझ लिया होगा । प्रासङ्गिक होनेसे यहां क्षत्रिय वैश्य की सावित्रीके मन्त्र भी उधृत कर दिये जाते हैं-वाराहगृह्यसूत्रके उपनयन - प्रकरण पंचम खण्ड में यह मन्त्र लिखे हैं - ' तत्सवितुर्वरेण्यम् इति गायत्रीं ब्राह्मणाय, या देवो याति सविता सुरत्नः ' ( ऋ ० सं ० ७१४५ १ ) इति त्रिष्टुभं क्षत्रियाय, ' युञ्जते मन उत युञ्जते धियो ' ( ऋ ० सं ० १११ ) इति जगतीं वैश्याय ' वसिष्ठ धर्मसूत्र ( ४३ ) में भी इसी प्रकार कहा है । अन्यत्र यह मन्त्र आये हैं— ' तार्थसवितुर्वरेण्यस्य चित्रामाहं वृणे सुमतिम् ' ( यजु ० १७१७४ ) यह त्रिष्टुप् -सावित्री क्षत्रियके लिए, तथा ' विश्वा-रूपाणि प्रतिमुञ्चते कविः प्रासावीद् भद्रं... सविता वरेण्यः ' ( यजु ० १२।३ ) यह जगती - सावित्री वैश्यकेलिए है । इन मन्त्रोंका देवता भी सविता है; इनमें भी बुद्धिका सम्बन्ध है । अतः क्षत्रिय वैश्य इनको, इन अपने मन्त्रोंका उपयोग भी शास्त्रानुसार करना चाहिये । इनमें उन्हें अपने लिए अधिकृत होनेसे विशेष ही फल