सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 231–240
सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 231–240
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षोडश संस्कार- रहस्य २०१ उसका संस्कार कहा जाता है । जब तक किसी पदार्थका संस्कार नहीं होता, तब तक वह सदोष और गुणहीन रहता है । संस्कार होने पर ही उस पदार्थके दोष दूर होते हैं और गुण प्रकट होते हैं । जब तक हीरेको शारण पर संस्कृत नहीं किया जाता, तब तक हीरेका न तो मिट्टीका आवरण ही हटता है, न उसमें चमक ही आती है । इस प्रकार शारण - संस्कारके बिना तलवारकी न तीक्ष्ण धार बनती है, न उसमें छेदनकी शक्ति प्राप्त होती है । जब ये वस्तुएँ शाणमें संस्कार पाती हैं, तभी उक्त दोष दूर होते हैं और गुण प्रकट होते हैं । गुण प्रकट होनेसे ही उनका मूल्याङ्कन होता है । जाति यदि स्वरूपकी सत्ताको देती है; तो संस्कार उसका उत्कर्ष उत्पन्न करते हैं । एक लोहा जिसकी साधारण - सी जाति है, संस्कार को प्राप्त करके घड़ीके बाल - कमानी आदि पुर्जे के रूपमें आता है; तब वह लोहा रहता हुआ एक घड़ी एवं उसका आत्मा बनकर महामूल्यवान् होजाता है । कभी - कभी तो विशेष सारंगियोंका तार . बनकर सुवर्ण से भी महँगा बिकता है । यह संस्कारकी महिमा है । संस्करणका नाम ' संस्कार ' होता है । सम् उपसर्गसे कृब् धातुको घन् प्रत्यय करने पर और ' सम्परिभ्यां करोतौ भूषणे ' . ( पा ० · ६।१।१३७ ) इस सूत्र से भूषण - अर्थ में सुट् करने पर ‘ संस्कार ’ • शब्द बनता है ।. सोनेका खानसे निकलने पर उसका मल हटाना यह उसका पहला दोषमार्जक संस्कार होता है; तब हम यदि उसका भूषण बनाना चाहें, तो उसे अग्निमें तपाकर, हथौड़ेसे उसे पीटकर, छैनीसे उसे जहाँ - तहाँ काटकर, यन्त्र- विशेषसे उसे घिसकर
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२०२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) तब उसका भूषण बनता है - यह उसका हीनाङ्गपूरक संस्कार होता है । फिर उसमें हीरा एवं मोती रत्न आदिको यथास्थान खचित ( जड़ना ) किया जाय तो यह उसका अतिशयाधान - संस्कार होगा । इससे सोना बहुत सुन्दर, उपादेय तथा बहुमूल्य होजाता है । लकड़ी में भी बढ़ई द्वारा संस्कार करने पर उसकी बहुमूल्यता हो जाती है । जब जड़ वस्तुओं में भी संस्कारसे इस प्रकारकी . विलक्षणता हो जाती है, तब मनुष्योंका तो क्या कहना? फलतः सांसारिक सब पदार्थोंकी यदि उपयोगिता इष्ट हो तो उनका संस्कार अवश्य अपेक्षित होगा । इस प्रकारकी कोई वस्तु नहीं मिलती, जिसका कार्योपयोग केलिए संस्कार न किया जाता हो । इस प्रकार मनुष्यका भी स्वरूप संस्कारसे ही यथार्थतः प्रकाशित होता है । संस्कारसे ही मनुष्यता प्राप्त होती है । संस्कार से ही मनुष्यका दृष्ट- अदृष्ट मल प्रक्षालित होता है । सोलह संस्कारोंका भी यही लाभ होता है । माता - पिताके रजोवीर्यगत दोषके कारण सन्तानमें शारीरिक और मानसिक बहुत सी त्रुटियाँ रह सकती हैं, -उनको दूर करने तथा पापोंको हटानेकेलिए संस्कारोंका यथाधिकार उपयोग हुआ करता है । जैसा कि मनुस्मृति में कहा है-गार्होमैर्जातकर्म चौडमौञ्जीनिबन्धनैः । बैजिक गार्भिकं चैन द्विजानामपसृज्यते ॥ ( २।२७ ) वैदिकैः कर्मभिः पुण्यैर्निषेकादिर्द्वि-जन्मनाम् । कार्यः शरीरसंस्कारः पावनः प्रेत्य चेह च ॥ ( २।२६ ) . यहाँपर शारीरिक संस्कारको इस लोक तथा परलोकमें पावन
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षोडश - संस्कार - रहस्य २०३ तथा वीजगत एवं गर्भगत दोषोंका दूर करनेवाला माना है । इनमें गर्भाधान, जातकर्म, अन्नप्राशन आदि संस्कार - द्वारा दोषमार्जन होता है । चूड़ाकर्म, उपनयनादि संस्कारों द्वारा हीनाङ्गपूर्ति होती है । गृहाश्रम, संन्यासाश्रम आदि संस्कारोंके द्वारा अतिशयाधान होता है । पुरुष इनसे ' सत्यं शिवं सुन्दरम् ' स्वरूपको प्राप्त करता है । शरीर, आत्मा एवं मन संस्कृत हो जाते हैं । ऋषियोंने संस्कारोंके सोलह प्रकाशस्तम्भ नियत किये हैं । वे उस मार्ग के अधिकारियोंको यथावत् मार्गनिर्देश करते हैं । इन संस्कारोंके प्रकाशमें जो जाता है, वह चन्द्रमाकी तरह षोडशकलापूर्ण होकर संसारमें प्रकाशित होता है । ये संस्कार धर्मरूप चावलोंकी रक्षा के लिये उसकी ऊपर की त्वचा हैं 1 । इसी त्वचासे धर्मरूप चावलोंका परिपोषण एवं वृद्धि होती है । संस्कारोंके अधिकारी ब्रह्मक्षत्रियविट्शूद्रा वर्णास्त्वाद्यारूयो द्विजाः । निषेकाद्याः श्मशानान्तास्तेषां वै मन्त्रतः क्रियाः ॥ ( १।२।१० ) इस याज्ञवल्क्यके वचनसे द्विज - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्योंके गर्भाधान से लेकर अन्त्येष्टितक सभी संस्कार मन्त्रसहित होते हैं । शूद्रोंके सब संस्कार नहीं होते । उनके श्राश्रम संस्कार तो होते ही नहीं; केवल गृहाश्रम ही विना वेदमन्त्रोंके होता है । ब्रह्मचर्याश्रम भी शूद्रोंका वैध नहीं होता; इस प्रकार उनके उपनयन - वेदारम्भ-समावर्तन आदि संस्कार भी नहीं होते । जब कि श्रीमनुजी के ' योऽनधीत्य द्विजो वेदम्... स जीवन्नेव शूद्रत्वम् ' ( २।१६८ ) ' स
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२०४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) शूद्रवद् बहिष्कार्यः सर्वस्माद् द्विजकर्मणः ' ( २/१०३ ) इन वचनोंको वादी - प्रतिवादी सभी अप्रक्षिप्त स्वीकृत करते हैं; तब शूद्रोंके वेदान-धिकारवश उसके उपनयन, वेदारम्भ, समावर्तन आदि संस्कार भी नहीं होते । उनके जो कई संस्कार होते हैं वे अमन्त्रक, पौराणिक एवं तान्त्रिक मन्त्रोंसे होते हैं; जैसे कि - ' व्यासस्मृति ' में भी लिखा है-' नवैताः कर्णवेधान्ता मन्त्रवर्ज क्रियाः स्त्रियाः । विवाहो मन्त्रतस्तस्याः शूद्रस्यामन्त्रतो दश ' ॥ ( १।१६-१७ ) वैध ब्रह्मचर्याश्रम स्त्रियोंका भी नहीं होता; विवाह ही उनका द्विजत्वाधायक संस्कार होता है । श्रीमनुजीने कहा है- ' वैवाहिको विधिः स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृतः । पतिसेवा गुरौ वासो गृहार्थोऽग्निपरिक्रिया ' ( २२६७ ) अर्थात् — स्त्रियोंका विवाह ही उनका उपनयन एवं वेदारम्भ होता है, क्योंकि स्त्रियोंका पति से व्यतिरिक्त गुरु न होनेसे पतिके पास विधिपूर्वक नयन तथा उससे उन्हें उपवस्त्रकी प्राप्ति और उसे यज्ञोपवीत - सूत्रकी तरह लपेट लेना ही उसका उपनयन और विवाहसम्बन्धी एवं यज्ञोपयुक्त स्त्रीसम्बन्धी कई विशिष्ट मन्त्रोंका पतिरूप गुरुके श्राश्रयसे उच्चारण ही उनका वेदारम्भ होता है । स्त्रियोंका स्वतन्त्रतासे न तो उपनयनका विधान है, न वेदारम्भका, गुरुस्थानीय पतिके पास निवास और पतिकी सेवा करना ही उनका गुरुकुलवास होता है, घरके काम - काज करके, गृहपतित्व प्राप्त करके, पतिको घरके कामोंसे निश्चिन्त करके उसके विद्या, पठन - पाठन आदि कमोंमें असुविधाओंको
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षोडश संस्कार- रहस्य २०१ हटाना, उसकी यज्ञादि सामग्री जुटाना, समिधाओंका परिमारणा-नुसार काटना, यज्ञमें पतिके साथ बैठना, अपने घरसे लायी गयी वैवाहिक अग्निको कभी भी बुझने न देना, उसीमें ही बलिकर्म तथा पाकक्रिया - निष्पादन - यही पत्नीका अग्निहोत्र - विधान है । जब इस प्रकार पत्नी अनायास ही ' द्विज ' हो जाती है, पति-कर्तृक यज्ञादि धर्म - कर्मकी और स्वर्गादिक फलकी इच्छाकी अधिकारिणी हो जाती है तो उसे अन्य क्या चाहिये? ' अक्के चेन्मधु विन्देत किमर्थं पर्वतं व्रजेत्? ' वैसे सोचा जाय तो घरके काम - धन्धे, पतिके धर्मकर्म में विघ्न न आने देना - इत्यादि कार्य भी बहुत कठिन हैं । पतिसे यह सम्भव नहीं । पतिकेलिए यह कृत्य . उसके धर्म - कर्म में विघ्न डालनेवाले तथा उसके अर्थकार्य में धक्का - पहुँचानेवाले हैं; तब उसमें सहायता पहुँचानेवाली, उसकी अभि-न्नताको प्राप्त हुई पत्नी भला पतिके धर्म - कर्मके फलमें अधिकारिणी हो भी क्यों नहीं? वस्तुतः विचारा जाय तो पति - पत्नी एक - दूसरे के शेष पूरक हैं? जिस कार्यको एक नहीं जानता या नहीं कर सकता, उसको दूसरा पूर्ण करता है । पति यदि विदेशमन्त्री है तो पत्नी स्वदेशमन्त्रिणी है । पति बाहरका स्वामी है तो पत्नी घरकी । पति यदि दाहिनी आँख है तो पत्नी बायीं । पति यदि दाहिनी भुजा है तो पत्नी बायीं । पति यदि दाहिनी जाँघ है तो स्त्री बायीं । पति यदि साइकलका अगला पहिया है तो पत्नी पिछला । पति यदि रथका . दाहिना पहिया है तो पत्नी बायाँ । पति यदि द्वारका दाहिना
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२०६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) किवाड़ है तो पत्नी बायाँ । इस प्रकार पति - पत्नी एक देहके गौरी - शङ्कर हैं; चतुर्भुज लक्ष्मी - नारायण हैं; सीता - राम हैं । अपने-अपने अधिकारमें रहना ही, समय - समयपर एक - दूसरेकी सहायता करना ही व्यवस्था स्थापन है । पति ' पोषक ' होता है, पत्नी ' पोष्या ' होती हैं । उसी पतिकी संतानकी ' पोषक ' भी होती है । फलतः पत्नीको स्वतन्त्र कुछ भी कार्य नहीं होता । पतिका संन्यासी होना या स्वर्गवासी होना — यही पत्नीका संन्यास होता है-इससे भिन्न नहीं । संस्कारों की संख्या ' गौतमधर्मसूत्र ' में ४० संस्कार कहे गये हैं- ' चत्वारिंशत्संस्कारैः संस्कृतः ' ( १ । ८ । ८ ) । वे संस्कार ये हैं -१ गर्भाधान, २ पु'सवन, ३ सीमन्तोन्नयन, ४ जातकर्म, ५ नामकरण, ६ अन्नप्राशन, ७ चूड़ा-कर्म, म उपनयन, ६-१२ चार वेदोंके व्रत, १३ समावर्तन, १४ विवाह, १५ देवयज्ञ, १६ पितृयज्ञ, १७ अतिथियज्ञ, १८ भूतयज्ञ, १६ ब्रह्मयज्ञ ( यह पञ्चममहायज्ञ ), २० श्रावणीकर्म २१ आश्विनी-कर्म, २२ आग्रहायणी - कर्म, २३ चैत्रकर्म, २४ अग्न्याधान ( श्रौत एवं स्मार्त ), २५ नित्याग्निहोत्र, २६ दर्श- पौर्णमासयाग, २७ चातुर्मास्य ( वश्वदेव, वरुणप्रघास, शाकमेध, शुनासीरीय ), २८ आमयणेष्टि ( नवान्नेष्टि ), २६ निरूढपशुयाग, ३० सौत्रामणीयाग ( यह सात हविर्यज्ञ ), ३१ अग्निष्टोम, ३२ अत्यग्निष्टोम, ३३ उक्थ्य, ३४ षोडशी, ३५ वाजपेय, ३६ अतिरात्र, ३७ आप्तोर्याम - ( यह सात सोमयाग ), ३८ पितृमेध ( पिण्डपितृयज्ञ ), ३६ अष्टका श्राद्ध, ४० पार्वणश्राद्ध ।
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घोडश संस्कार - रहस्य ( गौतम - धर्मसूत्र ११८ १४ - २२, गौतम - स्मृति ( ३ ) । १ दया, २ शान्ति, ३ अनसूया, ४ शौच, ५ अनायास, ६ मङ्गल, ७ अकार्पण्य, अस्पृहा – इन आठ आत्म - गुणोंके साथ गौतमने ४८ संस्कार कहे हैं । अङ्गिराने ये पच्चीस संस्कार कहे हैं -१ गर्भाधान, २ पु सघन, ३ सीमन्त, ४ विष्णुबलि - कर्म, ५ जातकर्म, ६ नामकर्म, ७ निष्क्रम, ८ अन्नप्राशन, ६ चूडाकर्म, १० उपनयन, ११-१४ चारों वेदोंके वेदारम्भ, १५ स्नान ( समावर्तन ), १६ विवाह, १७ आग्रयण, १८ अष्टका, १ ९ श्रावणीपर्व, २० आश्विनीपर्व, २१ मार्गशीर्षीपर्व, २२ पार्वण, २३ उपाकर्म, २४ उत्सर्ग, २५ नित्यमहायज्ञ । ‘ व्यासस्मृति ' ( १।१३-१४-१५ ) में ये १६ संस्कार कहे गये हैं-१ गर्भाधान, २ पुंसवन, ३ सीमन्त, ४ जातकर्म, ५ नामकरण, ६ निष्क्रमण, ७ अन्नप्राशन, ८ वपन, ( चूड़ाकर्म ), ६ कर्णवेध, १० व्रतादेश, ( उपनयन ) ११ वेदारम्भ, १२ केशान्त, १३ स्नान ( समावर्तन ), १४ विवाह, १५ विवाहाग्निपरिग्रह, १६ त्रेताग्निसंग्रह । कई विद्वान् यहाँपर ' चिताग्निसंग्रह ' पाठ मनाते हैं । सनातनधर्मके प्रसिद्ध विद्वान् श्री पं ० भीमसेन शर्माजीने १५ वें संस्कारका नाम ' आवसथ्याधान ' और १६ वेंका नाम ' श्रौताधान ' कहकर यही १६ संस्कार अपनी ‘ षोडशसंस्कारविधि ' में निरूपित किये हैं । श्रीजातूकर्ण्यने ये १६ संस्कार गिनाये हैं -१ आधान, २ पुस-वन, ३. सीमन्त, ४ जातकर्म, ५ नाम, ६ अन्नप्राशन ७ चौलक, ८ मौजी, ६-१२ चतुर्वेद - व्रत, १३ गोदान ( केशान्त ), १४ समावर्तन,
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२०८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) १५ विवाह, १६ अन्त्य । ' शूद्राणां चैव भवति विवाहश्चान्त्यकर्म च ' शूद्रोंके उसने दो संकार माने हैं- १ विवाह, २ अन्त्यकर्म । ये १६ संस्कार ब्राह्म कहे जाते हैं, पाकयज्ञ आदि दैव कहे जाते हैं । आर्यसमाज के प्रवर्तक स्वामी दयानन्दजीने अपनी ' संस्कार-विधि में १ गर्भाधान, २ पुंसवन, ३ सीमन्तोन्नयन, ४ जातकर्म, ५ नामकरण, ६ निष्क्रमण, ७ अन्नप्राशन, चूड़ाकर्स, ६ कर्णवेध, १० उपनयन, ११ वेदारम्भ, १२ समावर्तन, १३ विवाह, १४ गृहा-श्रम, १५ वानप्रस्थ, १६ संन्यास, १७ अन्त्येष्टि —ये १७ संस्कार कहे हैं । गृहाश्रमको भी उन्होंने पृ ० १७६ में ' संस्कार ' कहा है, अन्त्येष्टिको भी २८८ पृष्ठमें ' शरीर के अन्तका संस्कार ' कहा है । उक्त पुस्तककी सूची बनानेवालोंने ' अन्त्येष्टि ' के साथ ' संस्कार ' न लिख-कर ' अन्त्येष्टिकर्म ' शब्द लिख दिया है । पर स्वामीजीने गर्भाधान प्र ० ( पृ ०३१ ) में अन्त्येष्टिपर्यन्त १६ संस्कार माने हैं; अथवा गृहाश्रम-को विवाहसे पृथक संस्कार न गिनना चाहिये । सनातनधर्मके विख्यात - व्याख्याता भारतधर्म- महामंडल के श्रीस्वामी दयानन्दजीने अपने ' धर्मविज्ञान ' में १? गर्भाधान, २ पुंसवन, ३ सीमन्तोन्नयन, ४ जातकर्म, ५ नामकरण, ६ अन्नप्राशन, ७ चूडाकरण, ८ उपनयन, ६ ब्रह्मव्रत, १० वेदव्रत, ११ समावर्तन, १२ विवाह, १३ अग्न्याधान, १४ दीक्षा, १५ महाव्रत, १६ संन्यास – ये संस्कार कहे हैं । संस्कारोंकी संख्या में भेदका कारण उक्त संस्कारों में बहुतसे विद्वान् कर्णवेध को नहीं मानते । उपनयन
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षोडश संस्कार- रहस्य २०६ और वेदारम्भको पृथक् - पृथक् संस्कार गिनते हैं । कई विद्वान् केशान्तको पृथकू न गिनकर उसका समावर्तनमें अन्तर्भाव मानते हैं । वे भी उपनयन तथा वेदारम्भको पृथक् - पृथक् गिनते हैं, विवाह तथा गृहाश्रमको एक संस्कार मानते हैं । कई विद्वान् आवसध्याधान तथा श्रौताधानको पृथक् - पृथक् संस्कार गिनते हैं 1 । वे वानप्रस्थ तथा संन्यास एवं अन्त्येष्टिको संस्कारोंमें नहीं गिनते । गौतमस्मृतिमें चालीस संस्कार माने गये हैं - यह पहले दिखलाया जा चुका है, उसमें पहला संस्कार ' गर्भाधान ' कहा है, पिण्ड - पितृयज्ञको भी संस्कारों में गिना है, यही स्पष्ट अन्तिम ' पितृमेध ' है । श्रीजातूकर्ण्यने जिसका प्रमाण म ० म ० पं ० नित्यानन्दजीने अपने ' संस्कारदीपक ' में उद्धृत किया है - आदिम संस्कारका नाम ' आधान ' तथा अन्तिमका नाम ' अन्त्य ' कहा है, स्पष्ट है कि यह ' अन्त्येष्टि ' है । ' मनुस्मृति ' में ' भार्यांयै पूर्वमारिण्यै दत्त्वाग्नीन् अन्त्यकर्मणि ' ( ५।१६८ ) यहाँपर ' अन्त्यकर्म ' कहा है, स्पष्ट है कि यह ' अन्त्येष्टि ' है । ' निषेकादिश्मशानान्तो - १ ( २/१६ ) इस मनुके वचन में आदिम संस्कार निषेक ( गर्भाधान ) तथा अन्तिम ' श्मशान ' कहा है । इसी श्मशानक्कत्यका नाम मनुने ५६५ पद्यमें ' पितृमेध ' कहा है । ' निषेकादीनि कर्माणि ' ( २।१४२ ) इस मनुवचनमें ' निषेक ' आदि कर्मका नाम कहा है । ' निषेकादिर्द्विजन्मनाम् । कार्यः शरीरसंस्कारः । ’ ( २।२६ ) इस मनुपद्यमें निषेकादिको शरीरका संस्कार कहा है । मनुजीको यहाँ आदि पदसे ' श्मशान ' ही इष्ट प्रतीत होता है; १४ स ० ध ०
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२१० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) क्योंकि — अन्तिम कमें वे २।१६ पद्यमें वही कह चुके हैं । श्रीयाज्ञ-वल्क्यने भी—— ' ब्रह्मक्षत्रियविट्शूद्रा वर्णास्त्वाद्यास्त्रयो द्विजाः । निषेकाद्याः श्मशानान्तास्तेषां वै मन्त्रतः क्रियाः । ( १/२/१० ) यहाँपर आदिम गर्भाधानकी तथा अन्तिम क्रिया श्मशानकी मानी है । तब पितृमेधमें भी शरीरका संस्कार ही फलित हुआ । संस्कृत अग्निसे शरीरके दाहसे उसके आत्माकी परलोकमें सद्गति होती है । इसलिए संस्कृतों का पितृमेध न होकर पृथ्वीनिखनन ही होता है, मुसल्मानोंका मरनेपर गाड़ा जाना अथवा हिन्दु होते हुए भी मल-कानोंका गाड़ा जाना इसका साक्षी है । सोलह संस्कार हम मनुस्मृतिके अभिप्रायको लेकर १ निषेक ( गर्भाधान ), २ पुंसवन ३ सीमन्तोन्नयन, ४ जातकर्म, ५ नामकरण, ६ निष्क्रमण, ७ अन्नप्राशन, ८ चूडाकरण, ६ कर्णवेध, १० उपनयन - वेदारम्भ ( ब्रह्मचर्य व्रत ), ११ केशान्त, १२ स्नान- समावर्तन ( ब्रह्मचर्य समाप्ति ), १३ विवाह, स्मार्त एवं श्रौत अग्न्याधान, १४ वानप्रस्थ, १५ परिव्रज्या, १६ पितृमेध - ये सोलह संस्कार कहेंगे । इनमें विद्वानोंके मतभेद होनेपर भी इनमें पूर्वोक्त सभी संस्कारोंका अन्तर्भाव हो जाता है । ‘ मनुस्मृति ' में ‘ गार्भैर्होमैः ' ( २।२६-२७ ) इस वचनसे गर्भसंस्कार गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन इष्ट हैं जो कि सर्वसम्मत हैं । चौथा जातकर्म मनुके ( २२ ९ ) पद्यमें, पांचवां नामकरण ( २/५० ) पद्यमें, छठा - सातवाँ निष्क्रमण तथा अन्नप्राशन ( २।३४ ) पद्यमें, आठवाँ चूडाकरण ( २।३५ ) पद्यमें है । नौवां कर्णवेध मनुस्मृति-