सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 31–40

सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 31–40

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हिन्दुधर्मके आचार विचार -एवम् उनका वैज्ञानिक रहस्य ( १ ) वैदिक मङ्गलाचरणम् । ॐ गणानां त्वा गणपतिं हवामहे, कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम् । · ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पते! या नः शृण्वन्नूतिभिः सीद सादनम् ' ' ( ऋ ० सं ० २।२३।१ ) ॐ निपुसीद गणपते! गणेषु, त्वामाहुविंप्रतमं कवीनाम् । न ऋते त्वत् क्रियते किञ्चनारे महामकं मघवचित्रमर्च ' ( ऋ ० सं ० १०/११२६ ) ॐ गणानां त्वा गणपतिं हवामहे, प्रियाणां त्वा प्रियपति १ हवामहे । निधीनां त्वा निधिपतिं थं हवामहे, वसो! मम आहमजानि गर्भधमा त्वमजासि गर्भधम् ' ( यजुः ० वा ० सं ० २३।११ ) ॐ तत्कराटाय विद्महे हस्तिमुखाय धीमहि । तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ' ( कृष्णयजुः मैत्रा ० सं ० २ शा १६ ) ' ॐ तत्पुरुषाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि । तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ' ( कृ ० य ० तैत्तिरीयारण्यक १०।१ ) ' प्र णो देवी सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती । धीनामवित्र्यवतु ' ( ऋ ० सं ० ६६१/४ ) ' शंनो ग्रहाश्चान्द्रमसाः शमादित्यश्च राहुणा । शुंज्ञो मृत्युधूमकेतुः शं रुद्रास्तिग्मतेजसः ( अथर्व सं ० १३।६।१० )

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२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) ( २ ) श्रीगणेश का मङ्गलाचरण ।

ज्ञानार्थवाचको गश्च पश्च निर्वाण - वाचकः ।

- तयोरीशं परं ब्रह्म गणेशं प्रणमाम्यहम् ॥१ ॥

अगजाननपद्मार्क गजाननमहर्निशम् ।

अनेकदन्तं भक्तानामेकदन्तमुपास्महे ॥२ ॥

आलम्बे जगदालम्बे हेरम्यचरणाम्बुजे ।

शुष्यन्ति यद्रजःस्पर्शात् सद्यः प्रत्यूह - वार्धयः ॥ ३ ॥

( १ ) सनातन हिन्दुधर्मके आचार - विचारके अनुसार पहले-पहल सब कार्योंमें श्रीगणेशका नसन तथा स्तवन किया जाया करता है; अतः आजकी भाषासें कार्यारम्भका मुहावरा भी ' श्रीगणेश ' नामसे कहा जाता है । इस कारण हमने भी वैदिक-मङ्गलाचरणमें गणपति- गणेशका ही स्तवन किया है । ऋग्वेद - संहिताके उक्त मन्त्रका कथन है कि ' न ऋते त्वत् क्रियते किञ्चन ' अर्थात् — हे गणपति गणेश! तुम्हारे बिना कोई भी कर्म नहीं किया जाता । कृष्णयजुर्वेद मैत्रायणीसंहितामें गणेशको ' हस्तिमुख ' ओर तैत्तिरीयारण्यकके मन्त्रमें उसे ' वक्रतुण्ड ' कहा है । इस प्रकार गणेश वैदिक देवता हैं । पर आजकलके कई व्यक्तियोंका विचार है कि गजानन गणेश, अवैदिक एवं अनार्योंके देवता हैं । वेदमें गणपतिका कहीं गजाननत्व नहीं आता; अतः यह पौराणिक ही देवता हैं । प्रकररण-वश हम इसपर विचार करते हैं । यह बहुत आवश्यक विषय है ।. ( २ ) कहा जाता है - ' गणेशजीकी गणना वैदिक देवोंमें नहीं

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श्रीगणेशका मङ्गलाचरण है, परन्तु वे सर्वत्र पुजते हैं । उनके लिये ' गणानां त्वा गणपतिथ हवामहे, यह यजुर्वेद का मन्त्र पढ़ा जाता है । इसमें ‘ गणपति ’ शब्द तो आया है पर गणेशके लिए नहीं; किन्तु ' अश्वमेधके अश्वके लिए है । शब्दसाम्यके बल पर यह घोड़ेवाला मन्त्र गणेश जीके मत्थेपर मढ़ा गया है । इस प्रकार ' गरणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनाम् ' यह ऋग्वेदका मन्त्र ब्रह्मणस्पति- बृहस्पतिके लिए है, गणेशके लिए नहीं । अर्थज्ञानविहीन लोगोंने ही इसमें ' गणपति ' शब्द देखकर गणेशको वैदिक देव बना डाला । गणेश-के. वैदिक देवता न होनेसे ही आर्ष ग्रन्थोंमें कहीं गणेशका मङ्गलाचरण नहीं दीखता ' । आजकल प्रतिपक्षियोंकी विचित्र प्रकृति दिखलाई पड़ती है । हमारे शास्त्रोंमें जिस देवताका वर्णन या पूजन स्पष्ट दीखे, उसमें तो वे श्रद्धा नहीं रखते; परन्तु जिसका उनके मतमें स्पष्ट वर्णन न मिले; पर उसका पूजन प्रचलित हो, वे वहाँ अशास्त्रीयता की घोषणा करने में उद्यत हो जाया करते हैं । इसको यों समझिये कि शास्त्रोंमें इन्द्र, सूर्य, अग्नि, वरुण आदि देवपूजनको देखकर भी वे उसे नहीं करना चाहते; परन्तु गणेश - पूजनको व्यवहारमें प्रचलित, पर ग्रन्थों में अपनी समझमें थोड़ा देखकर उसे अर्वाचीन कहने के लिए तैयार हो जाते हैं । परन्तु वे लोग नहीं जानते कि देवता बहुत होते हैं । कालकी महिंमासे अथवा रुचि - वैचित्र्यसे कभी एक देवताकी प्रधानता हो जाती है तो कभी दूसरेकी । आजकल अवतारोंमें भगवान्

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) श्रीकृष्णको महिमा बहुत बढ़ गई है । भगवान्‌का जेलखाने में जन्म, अन्यायी राजाओंसे विरोध, उनकी राजनीति, शत्रूच्चाटननीति, गो - सेवा, सर्वप्रिय उपदेशशैली, सब प्रकारके पुरुषोंको प्रसन्न करना — यह सब कुछ वर्त्तमान समय के अनुकूल होनेसे, अव-तार न माननेवालोंको भी प्रभावित किये विना नहीं रहता । तो फिर भगवान् श्रीकृष्ण जहां प्राचीन भक्तोंके उपास्य थे, वहां पर वे अर्वाचीन शिक्षितोंके लिए भी श्रद्धास्पद होगये हैं । भगवान् श्रीराम भी प्रसिद्ध अवतार हैं । उनकी महिमा भी अधिक मात्रामें रही है, परन्तु वर्तमान कालके शिक्षित व्यक्ति कई कारणोंसे उन्हें अपनी आलोचनाका विषय बनाते हैं - तव आजकलकी पुस्तकों में श्रीकृष्ण - स्मरणात्मक मङ्गल अधिक मात्रा में और श्रीरामका स्मरण अल्प मात्रामें देखकर क्या श्रीरामका मंगला-चरण अशास्त्रीय वा अर्वाचीन हो जायगा? यदि नहीं; तब उन्हें यहाँ पर भी इसी प्रकार जानना चाहिये । ( ३ ) ' कलौ चण्डीविनायकौ ' के अनुसार गणेशका प्रधानता से कलियुगमें अधिक प्रचार देख, पूर्वयुग के ग्रन्थोंमें उसकी अल्पता देखकर इसमें गणेशपूजनकी अर्वाचीनता नहीं हो जाती । यथार्थता यह है कि — पहले यह शैली सर्वसाधारण हुआ करती थी कि सबसे पूर्व गणेशपूजन विधिपूर्वक पृथक् करके तब ग्रन्थादिका इ.णयन हुआ करता था । इस कारण ग्रन्थोंकी आदिमें उसका उल्लेख आवश्यक नहीं था । इसलिए ही बहुतसी प्राचीन पुस्तकोंकी आदिमें मङ्गलाचरण भी दिखाई नहीं देता । तब क्या इससे प्रतिपक्षी लोग

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श्रीगणेशका मङ्गलाचरणं मङ्गलाचरणको भी अर्वाचीन मानने लगेंगे? ऐसा नहीं हो सकता । हमारे पूर्वज मङ्गलाचरणके प्रेमी अवश्य थे । जैसा कि - सहाभाष्य में कहा है — ' मङ्गलादीनि, मङ्गलमध्यानि, मङ्गलान्तानि शास्त्राणि प्रथन्ते ( १ । ३ । १ ) । साङ्ख्यदर्शनमें भी लिखा है - ' मङ्गलाचरणं शिष्टाचारात् फलदर्शनात् श्रुतितश्च ( ५१ ) । फिर भी उन पूर्वजोंक शास्त्रों में स्पष्टतया मङ्गल न दीखने ही प्रतीत होता है, कि वे अपने मनमें अथवा पृथक् मङ्गल अवश्य कर लेते थे । फिर कई उत्तरकालीन विद्वान् शिष्यशिक्षाके लिए ग्रन्थके आरम्भ में भी अपने इष्टदेवका स्मरण करने लगे, पर गणेशके सर्वसाधारण होने से पृथक् ही उसका स्तुतिपाठ कर लिया करते थे । पहले भारतीयोंका धोती - पगड़ी आदि वेष सर्वसाधारणतासे होता था, पर सर्वसाधारण होने से उसे ग्रन्थोंमें न देखकर क्या यह कल्पना की जाएगी कि धोती आदि पहिनना अर्वाचीन वेष है, क्योंकि वेदादि प्राचीन साहित्यमें नहीं मिलता? ( ४ ) अन्य बात यह भी है कि - अथर्ववेदकी ६ शाखाओं में ६ शाखाओंका विनियोग ' नक्षत्रकल्पो वैतानः तृतीयः संहिताविधिः । तुर्य आङ्गिरसः कल्पः ( आभिचारिकः ) शान्तिकल्पस्तु पंचमः ' ( वायु पुराण ६१।५४ ) इन आचार्य उपवर्षप्रणीत कल्पसूत्रके अधिकरणमें उद्धृत पांच सूत्र - ग्रन्थों में किया गया है । इनमें ' न-क्षत्रकल्प ' में नक्षत्र आदिको भिन्न - भिन्न शान्तियां तथा पूजा बतलाई गई है । दूसरे ' वैतानसूत्र में दर्श- पूर्णमास अग्न्याधान आदिका विधान है । तीसरी संहिताविधि में - जिसका दूसरा

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) नाम कौशिकसूत्र है - शत्रूच्चाटन, भूत, प्रेत, पिशाच, वालग्रह आदियोंके हटानेवाले कर्म तथा दुःस्वप्ननिवारण, पापनक्षत्रोत्पत्ति-शान्ति, अपशकुनशान्ति, आभिचारिककर्म, अन्यके अभिचारका निवारण इत्यादि वर्णित किया है । चौथे आङ्गिरसकल्पमें ' अभिचार कर्मोंका स्वतन्त्रता से निरूपण तथा उनके निवारणका प्रकार बताया गया है । पांचवें ' शान्तिकल्प ' में विनायक ( गणेश ) पूजा, ग्रहपूजा, ग्रहयज्ञादिका वर्णन किया गया है । वह अथर्ववेदकी श्रीसाय-णाचार्यकृत भाष्यभूमिका में देखा जा सकता है । भिन्न - भिन्न सूत्रों में जो गणेश, नवग्रह यदिकी पूजा नहीं दिखलाई गई, उसका कारण यह है कि प्रत्येक कर्म में शान्तिकर्मकी श्रावश्यकता होती है । प्रत्येक गृह्यसूत्र तथा प्रत्येक संस्कारमें शान्तिकर्म प्रतिपादन करनेसे गौरव हो सकता है; इसलिए परि-• भाषास्वरूप में एक ही शान्तिविधि नियत कर दी गई है । अन्य स्थलोंमें उसी गणेशादि - पूजनको श्राभ्युदयिक, स्वस्तिक, स्वस्त्ययन आदि नामों से संकेतित किया गया है । कात्यायनीशान्ति उक्त सूत्र के आधार पर बनाई गई है । गृह्यसूत्र के प्रारम्भमें कुश-कण्डिकाका कृत्य तथा सर्वयज्ञशेष एक ही वार उपदिष्ट किया गया है । फिर ' एष एव विधिर्यत्र क्वचिद. होमः ( पारस्करगृ १।१।२७ ) इस सूत्र के कथनसे वह विधि सब स्थान पर निरूपित नहीं की जाती । जो लोग प्रत्येक गृह्यसूत्र में, प्रत्येक संस्कार में ग्रह- गणपति-पूजनादि वर्णित न देखकर उसकी अकर्तव्यता मानते हैं, उनके

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श्रीगणेशका मङ्गलाचरण मार्गप्रदर्शक स्वा ० द ० जीने अपनी ' संस्कारविधि ' ( पृ ०४ ) में १६ संस्कारोंमें की जानेवाली ' सामान्यकर्मकी विधि ' भिन्न - भिन्न स्थानोंमें न बताकर एक स्थानमें ही उसका उल्लेख कर रखा है । इस प्रकार ही ' शान्तिकल्प ' में गणेश ग्रहपूजा आदिका उल्लेख हो जाने से, प्रत्येक सूत्रादिमें उसका पृथक् उल्लेख अनावश्यक समझा गया था । यदि वेदमन्त्रोंमें इस प्रकारकी प्रक्रियाके स्पष्ट उल्लेख न होने से उसे अप्रमाणिक माना जावे, तब तो वैवाहिक पद्धतियोंमें लिखित सप्तपदी आदि प्रक्रियाओं तथा शिखा, उपनयनादिकी पद्धतियों का भी किसी संहिता के मूलमन्त्रों में उल्लेख न होनेसे तदादिक विधियाँ भी अवैदिक सिद्ध हो जाएँगी, पर यह प्रतिपक्षियोंको भी अनिष्ट है, इस प्रकार गणेश - पूज़नके विषय में भी जान लेना चाहिये । ( ५ ) अब हम इस सम्बन्धमें प्राचीन ग्रन्थोंके प्रमाण उपस्थित करते हैं-( क ) ‘ याज्ञवल्क्यस्मृति ' आचाराध्याय गणपतिंकल्पमें कहा गया है — ' विनायकं सम्प्रपूज्य ग्रहांश्चैव विधानतः । कर्मणां फलमाप्नोति श्रियं प्राप्नोत्यसंशयम् ( २१३ ) । इस प्रकार गणेश-पूजन स्मार्त भी सिद्ध हुआ । यह याज्ञवल्क्य स्मृति शतपथब्राह्मणके प्रवक्ता श्रीयाज्ञवल्क्यसे प्रोक्त है; अतः जहाँ वह प्राचीन है; वहां प्रामाणिक भी सिद्ध है । ( अ ) न्यायदर्शन के ४ । १ । ६२ सूत्रके वात्स्यायनभाष्य में लिखा है-' द्रष्टृ - प्रवक्कु सामान्याच्च धर्मशास्त्रस्य अप्रामाण्यानुपपत्तिः । ( जो

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) मन्त्र- - ब्राह्मण के द्रष्टा - प्रवक्ता है; वे ही धर्मशास्त्रोंके भी द्रष्टा प्रवक्ता हैं; अतः धर्मशास्त्र ( स्मृति ) की अप्रमाणता नहीं होती ) । य एव मन्त्र-ब्राह्मणस्य द्रष्टारः, ते खलु इतिहासपुराणस्य धर्मशास्त्रस्य च ( इसलिए समानप्रवक्तृकता होनेसे मन्त्र- ब्राह्मणके प्रामाण्यकी तरह इतिहास - पुराण तथा स्मृतिका भी प्रामाण्य है 1 ) इससे शतपथ ब्राह्मणके दृष्टा एवं प्रवक्ता श्रीयाज्ञबल्क्ष्य ' याज्ञवल्क्य -स्मृतिके प्रवक्ता भी सिद्ध होगये । दोनोंके भाषाभेदका कारण यह है कि शतपथब्राह्मण सूर्यसे श्रीयाज्ञवल्क्यको प्राप्त अपौरुषेय रचना है, ( देखो इसपर महाभारत शान्तिपर्व ३१ ८ ६ ) और ' याज्ञवल्क्य -स्मृति ' उनकी अपनी अपौरुषेय रचना है । अतः भाषाभेद् स्वाभाविक है । यहाँ कालभेदकी कोई बात नहीं । संस्कृत भाषा में ' समता ' दोष माना गया है । अतः उसमें एक पद्य में भी विषयानुसार भाषा बदल जाती है; भिन्न पुस्तकमें तो भला क्या कहना? इससे कर्तृ - भिन्नता नहीं हो जाती । अतः संस्कृत में भाषा - शैली से प्राचीनता अर्वाचीनता ठहराना आधुनिकोंकी निराधार कल्पना है । ( आ ) इसे केवल हम ही नहीं कहते; आर्यसमाजके रिसर्चस्कालर श्रीभगवद्दत्तजी बी ० ए ० भी मानते हैं । वे ' वैदिक वाङ्मय का इतिहास ' ( द्वितीय भाग १६० पृष्ठ ) में लिखते हैं- ' वही ऋषि ब्राह्मणोंका प्रवचन करते थे, और वही धर्मशास्त्र आदिका भी । अतः भाषाके साक्ष्य पर कोई बात सिद्ध नहीं की जा सकती । भाषा तो विषयानुसार भिन्न - भिन्न प्रकारकी हो सकती है । ' ( इ ) ' भारतवर्षका बृहद् इतिहास ' ( १ म भाग ७२ पृष्ठ ) में वही

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श्रीगणेशका मङ्गलाचरण लिखते हैं- ' जिन ऋषियोंने चरक, काठक आदि संहिताएं और ब्राह्मण तथा कल्पसूत्र प्रवचन किये, उन्हीं ऋषिमुनियोंने इतिहास, पुराण, धर्मशास्त्र और आयुर्वेद ग्रन्थोंकी लोकभाषा संस्कृतमें रचना की । यही कारण है कि वर्तमान धर्मसूत्रोंके अनेक वचन तथा याज्ञवल्क्य स्मृति और महाभारत के अनेक पाठ ठीक ब्राह्मणसदृश भाषामें हैं । ' ( ई ) इसीको स्पष्ट करते हुए उक्त अनुसन्धाताजी आगे लिखते हैं- ' पं ० ईश्वरदत्तजी ( भूतपूर्व दयानन्दोपदेशक विद्यालय लाहौरके दर्शनाध्यापक ) ने ' ब्राह्मण ग्रन्थोंके द्रष्टा और इतिहास - पुराण तथा धर्मशास्त्र के रचयिता ऋषियोंका अभेद ' नामक एक बृहद् ग्रन्थ रचा है । इस ग्रन्थ में उन्होंने सिद्ध किया है कि शतपथ ब्राह्मणकी भाषा वैदिक प्रवचनशैलीकी भाषा होने, तथा ' ह, वै ' आदिकी बहुलता पर भी याज्ञवल्क्य स्मृतिकी भाषासे पर्याप्त सदृशता रखती है । याज्ञवल्क्य स्मृतिके अनेक पाठ पाणिनीय व्याकरणके प्रभावसे उत्तरोत्तर बदले गये हैं । पहले वे पाठ पुरातन लोकभाषा में थे । ( पु ० ७३ ) ( उ ) उक्त ग्रन्थके ५४ पृष्ठमें तो श्रीभगवद्दत्तजीने सर्वथा स्पष्टता कर दी है । वे लिखते हैं- ' याज्ञवल्क्य स्मृति ' वाजसनेय ( शतपथ ) ब्राह्मणके प्रवक्ता ( श्रीयाज्ञवल्क्य ) ने बनाई थी... इस विषयका विशद विवेचन पं ० ईश्वरचन्द्रजीके ग्रन्थ में देखिये । याज्ञवल्क्य स्मृतिके १०० से अधिक प्रयोग पाणिनिसे पूर्वके हैं । " ( ऊ ) श्रीभगवद्दत्तजी बी ० ए ० की यह बात समूल भी है । शतपथके अन्तमें कहा है- ' आदित्यानि इमानि शुक्लानि यजूंषि

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१० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) वाजसनेयेन याज्ञवल्क्येन श्रख्यायन्ते ' ( १४ | ६ | ४ | ३३ ) यहाँपर श्रीयाज्ञवल्क्यको सूर्यके द्वारा शतपथ ब्राह्मणकी प्राप्ति कही है । इसका स्पष्टीकरण महाभारत के शान्तिपर्व में है । यहाँ याज्ञवल्क्यने मिथिलाके राजा जनकको कहा था - ' मयाऽऽदित्याद, अवाप्तानि यजूंषि मिथिलाधिप! ' ( ३१८ १ ) ततः शतपथं कृत्स्नं... चक्रे सपरिशेषं च ( ३१८/१६ ) इससे स्पष्ट है कि - श्रीयाज्ञवल्क्य मिथिलामें राजा जनकके पास रहा करते थे । यही याज्ञवल्क्य-स्मृति में भी कहा है- ' मिथिलास्थः स योगीन्द्रः ( याज्ञवल्क्यः ) क्षणं ध्यात्वाब्रवीन्मुनीन् ' ( १ | १ | २ ) उसी स्मृति में श्रीयाज्ञवल्क्यने अपनी ' बृहदारण्यक ' के लिए जो कि शतपथका अन्तिम ( १४ वां ) काण्ड है— कहा है- ' ज्ञेयं चारण्यकमहं ( याज्ञवल्क्यः ) यद् यादित्याद, ( सूर्याद् ) अवाप्तवान् ' ( प्रायश्चित्ताध्याय ४ | ११० ) यहाँ श्रीयाज्ञवल्क्यने अपनी स्मृतिमें • अपने से प्रवचन किये हुए ' बृहदारण्यक ' ( शतपथके १४ वें काण्ड ) की सूर्य द्वारा प्राप्ति कही है । इससे स्पष्ट है कि शतपथब्राह्मणके तथा याज्ञवल्क्यस्मृति के प्रवक्ता श्रीयाज्ञवल्क्य कोई भिन्न - भिन्न नहीं; किन्तु एक व्यक्ति हैं । जब ऐसा है; तो याज्ञवल्क्य स्मृति में प्रोक्ल गणेश - ग्रहपूजन दि प्राचीन तथा प्रामाणिक सिद्ध हुया । ( ख ) इस प्रकार ' कात्यायन ( गोभिल ) स्मृतिमें भी गणेश - पूजन आया है — ' गणेशेनाधिका ह्ये ता वृद्धौ पूज्याश्चतुर्दश । कर्मादिषु तु सर्वेषु मातरः सगणाधिपाः । पूजनीयाः प्रयत्नेनं ( १ । १३ ) । - याज्ञवल्क्य