सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 381–390
सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 381–390
पृष्ठ 381
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
कुशासनका वैदिक विज्ञान ३१३ आसन विल्लानेसे उपासनाके समय पार्थिव विद्युत् हमारे शरीर में संक्रान्त नहीं हो सकती, इसीलिए हमारे ध्यान में विघ्न भी नहीं पड़ सकता । - मृगचर्म तथा व्याघ्रचर्म पर स्थिति भी शुद्धि देने वाली है । मृगचर्म पर बैठनेसे उसकी शीतलतावश कामोत्तेजना नहीं होती, जो ध्यान में विघ्नकारिणी होती है और भगन्दर आदि रोग नहीं होते । यदि हों; तो नष्ट हो जाते हैं । मृगोंमें जो तेज होता है, जिससे वे पवित्र माने जाते थे, और मुनियोंके आश्रमों में रहते थे; मृगचर्म पर बैठने से वही तेज उस पर बैठनेवाले ब्रह्मचारी आदिको प्राप्त होता है । मृगचर्म इतना शीतल होता है, और कामोत्तेजनाको इतना दबाता है कि हमें नपुंसकता भी शीघ्र प्राप्त हो सकती है । ब्रह्मचारियोंके लिए, वानप्रस्थी वा संन्यासियों-केलिए केवल मृगचर्म पर स्थिति भी लाभदायिनी होती है; पर गृहस्थोंके लिए, तथा ब्रह्मचारी जिन्होंने आगे गार्हस्थ्य लेना है; केवल मृगचर्म पर स्थिति भी ठीक नहीं, अतः उसके ऊपर उन्हें कुशासन वा रेशमी आसन रख देना पड़ता है । उससे उत्तेजना तो दूर रहती है; पर नपुंसकता नहीं आती । व्याघ्रचर्म पर सर्प - वृश्चिक आदि विषयुक्त प्राणी नहीं चढ़ते; इसलिए व्याघ्रचर्म पर बैठकर ध्यान करनेसे निश्चिन्तता रहती है । ( १६ ) कुशासन का वैदिक विज्ञान 1. सनातनधर्मके प्रत्येक कर्मोंमें कुशका उपयोग दीखता है; परन्तु अर्वाचीन लोगोंकी इधर आस्था नहीं दीखती; अतः वे उसका २३ स ० ध ०
पृष्ठ 382
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३२४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) उपयोग नहीं करते । कुशोपयोग शास्त्रीय ही है । महाभाष्यकार श्रीपतञ्जलि ने श्रीपाणिनिमुनिकी अष्टाध्यायी निर्माण के समय में भी उनका, हाथोंमें कुश के पवित्रे पहिनना दिखलाया है | देखिये-' प्रमाणभूत आचार्यो दर्भपवित्रपाणिः शुचौ अवकाशे, प्राङ्मुख उपविश्य, महता प्रयत्नेन सूत्राणि प्रणयति स्म । तत्राशक्यं वर्णेनापि अनर्थकेन भवितुम्; किं पुनरियता सूत्रेण ' ( महाभाव्य १११११ सूत्र तृतीय आह्निक ) यहां श्रीपाणिनिका पूर्वमुख होने तथा दर्भसे पवित्र हाथवाला होने से उनके सुन्न प्रणयनकर्मकी सफलता तथा निरर्थकताका अभाव दिखलाया है । तभी तो पारस्कर आदि गृह्यसूत्रों में यज्ञ आदिके समय कुशकण्डिका प्रसिद्ध है । वेदमें भी उसका वर्णन दीखता है-' दर्भो य उग्र ओषधिः, तं ते बध्नामि आयुषे ' ( १६ | ३२ | १ ) अथर्ववेदके इस मन्त्रमें दर्भके धारणसे ओषधि जैसा प्रभाव तथा युकी वृद्धि सूचित की गई है । उसमें रहस्य यह है कि-कुश से भूतप्रेत आदि की बाधा दूर होती है - यह आयुर्वेदकी संहिताओं में स्पष्ट है । इसलिए श्रीवाल्मीकिमुनिने कुशों से लवकुशकी उत्पत्तिके समय रक्षा की थी । जैसे कि रामायण में— ' कुशमुष्टिमुपादाय लवं चैव स तु द्विजः । वाल्मीकिः प्रददौ ताभ्यां रक्षां भूतविनाशिनीम् ' ( ७१६६७ ) यहाँ पूरे कुशसे श्रीरामके बड़े लड़केकी रक्षा की गई; इसीलिए उसका नाम भी कुश रखा गया । छोटेकी रक्षा कुशके लव ( अंश ) से की गई, इसलिए उसका नाम ही ' लव ' हो गया; और दोनोंकी आयु भी बड़ी होगई ।
पृष्ठ 383
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
कुशासनका वैदिक विज्ञान ३१२-' त्वं भूमिमत्येषि ओजसा, त्वं वेद्यां सीदसि चारुरध्वरे । त्वां पवित्रमृषयो भरन्त त्वं पुनीहि दुरितानि अस्मत् ' ( अथर्व ० १६।३३।३ ). इस मन्त्रमें कुशकी लोकोत्तर - शक्ति, पवित्र करनेकी योग्यता और पापको दूर कर देनेकी क्षमता बताई है; और उसका यज्ञकी वेदीमें उपयोग भी वताया है, ' स्तृणीत बर्हिः ' ( १।१३।५ ) इस मन्त्रमें भी यही बताया है; तब यज्ञोंमें गृह्यसूत्रप्रोक्त कुशकण्डिकाकी वैदिकता भी सिद्ध हुई; वेदका विषय यज्ञ भी सिद्ध हुआ । इसी कारण ' यज्ञानां जपयज्ञोस्मि ' ( गीता १०/२५ ) इस यज्ञस्वरूप जप वा ध्यानादिके अवसर पर भगवान् ने ' चैलाजिनकुशोत्तरम् ' ( ६।११ ). कुश वा उसका आसन सबसे ऊपर रखवाया है । ' भूमिमत्येषि ओजसा ' ( अथर्व ० १६।३३।३ ) इस पूर्वोक्त मन्त्रके अंशसे कुशोंकी भूमिकी विद्युत्के निरोध में क्षमता संकेतित की गई है । तभी तो ध्यानके समय भूमिकी विद्युत् से विघ्न न हो, अतः भूमिपर रखे हुए आसनपर भगवान्ने कुशका निवेश भी आवश्यक माना है । इसी कारण पिण्डपितृयज्ञमें पिण्डोंके नीचे भी कुश रखे जाते हैं । कुशोंका महत्त्व और भी देखिये- ' त्वामाहुर्देव वर्म! त्वां दर्भ! ब्रह्मणस्पतिम् । त्वामिन्द्रस्य आहुर्वर्म, त्वं राष्ट्राणि रक्षसि ' ( अथर्व ० १६ | ३० | ३ ) इस मन्त्र में कुशोंको देवताओंका कवचरूप माना गया है; तब उनकी भूत - प्रेतोंकी बाधाको दूर करने में क्षमता भी सिद्ध होगई । कई व्यक्ति भूतप्रेतोंको कीटाणुरूपमें मानते हैं; तब इनकी कीटाणुओं को दूर करने की शक्ति भी सिद्ध होगई । ब्राह्मरण-भागात्मक वेद- शतपथ ( वाजसनेयक ) में भी कहा है- ' या वै वृत्राद
पृष्ठ 384
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३५६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) बीभत्समाना आपो धन्व दृभन्त्य उदायन, ते दर्भा अभवन् [ यहाँ दर्भों की उत्पत्ति बतलाई गई है ] यद् हसन्त्य उदायन्, तस्माद् दर्भाः । ता ह एताः शुद्धा मेधा आपो वृत्राभिप्रक्षरिता यद् दर्भा, यदु दर्भा:, तेन श्रोषधयः ' ( १२।३।२ ) यहां पर पापों तथा रोगोंकी दूर करनेकी शक्ति दर्भ में कहकर उन्हें ओषधिस्वरूप बताया गया है । दर्भ ( कुश ) के धारणसे पवित्रता भी बताई गई हैं । जैसे कि ' अमेध्यो वै पुरुषो यद् अनृतं वदति, तेन पूतिरन्तरतः [ यहाँ मनुष्यको असत्यभाषी होने से भीतर से अपवित्र बताया गया है । उसकी भी पवित्रता कुशों से बताते हैं- ] मेध्या वै दर्भाः, मेध्यो भूत्वा दीक्षै इति । पवित्रं वै दर्भाः । पवित्रपूतो दीक्षै इति । तस्माद् एनं दर्भ - पवित्रेण पावयति ' ( शतपथ ३ | १ | ३ | १८ ) यहांपर यज्ञकी दीक्षा में कुशोंका पवित्रा ( अंगूठी ) पहिनना कहा है । कुशमें एतदादिक विज्ञान भरे होनेसे ही सनातन हिन्दुधर्मके प्रत्येक कर्मोंमें — चाहे मृतककर्म हो, चाहे विवाहादि शुभ कर्म हों-कुशोंका उपयोग आदिष्ट किया गया है । वेद में अन्य भी इसके लिए कहा है- ' स नोऽयं दर्भः परिपातु विश्वतो देवो मणिरायुषा संसृजाति नः ' ( अथर्व ० ११६।३३।३ ) ' दर्भे य उग्र ओषधिः तं ते बध्नामि आयुषे ' ( अ ० १६।२२।१ ) इसमें कुशको आयु देनेवाला कहा गया है — उसमें कारण शरीरको दूषित करनेवाले कीटा-ओंका दूर करना ही है । इसी कारण सूर्य - चन्द्र आदिके ग्रहणके अवसर पर जब कीटाणुओंका प्रावल्य हो जाता है - उनके
पृष्ठ 385
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
मृगचर्मासनका वैज्ञानिक रहस्य ३२७ उपशमनार्थ कीटाणुओं को दूर करनेकेलिए कुशका उपयोग किया जाता है । इस प्रकार कुशका उपयोग जहां शास्त्रीय सिद्ध हुआ; वहां विज्ञानपूर्ण भी सिद्ध हुआ; कुशासन में भी प्रायः वे ही लाभ सिद्ध हुए; इसलिए कुशासन अदृष्टमें पुण्यदायक होता हुआ में भी लाभदायक सिद्ध हुआ । ( २० ) मृगचर्मासनका वैज्ञानिक रहस्य । ध्यानमें भगवान्के वाक्यमें ' जिन ' - मृगचर्मका उपयोग भी आया है । इसे भी शास्त्रकारोंने परम पवित्र माना था । यज्ञोपवीत के समय ब्राह्मण - ब्रह्मचारीको मृगचर्म ओढनेके लिए कहा गया है । तपोवनों में मृगोंका रहना भी उनकी पवित्रता सूचित करता है. इसी प्रकार मृगचर्मासनका हिन्दुधर्ममें जिस भी पदार्थकी अनुसन्धान करनेसे उसमें जीवितमें गुण होता है. उसके कहते हैं कि एक स्थानमें दूसरी थी शेरके चमड़ेकी । थाप दी जाती थी, तो बकरीके भी बहुत महत्त्व आया है । हमारे बहुत प्रशंसा आई है; विचारने वा रहस्यपूर्णता प्रतीत होती है । जो चर्म में भी वह गुण देखा गया है । एक ढोलक थी बकरीके चमड़ेकी; जब शेरके चमड़ेवाली ढोलक पर चमड़ेवाले तबलेका स्वर गिर जाता था; उसे बांटोंकी मारसे फिर ठीक करना पड़ जाता था । इसमें कारण क्या? वह यही कि शेरकी खालका भी प्रभाव बकरीकी खालपर मृतकावस्थामें भी हुआ । वर्तमानकालके नवयुवक नवीन - विज्ञानके चमत्कार से चकाचौंध आँखोंवाले होकर ऋषि - मुनियों को उससे अनभिज्ञ जानकर उनसे
पृष्ठ 386
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३५८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) नियमित व्यवहारोंको अज्ञान मानकर, उनके प्रवर्तकों को डैमफूल, वा पोप कहने में नहीं सकुचाते; पर उनकी आंखें तब खुलती हैं; जब उन्हीं व्यवहारों वा नियमोंको वर्तमान विज्ञानसे भी अनुमोदित देखते हैं । इसका उदाहरण भी देख लीजिये । सनातनधर्मी हिन्दु प्रातः दातुन किया करते थे; पर यह अर्वाचीन उन पर हँसते थे कि मुहमें लकड़ी चबाते रहते हैं, उसका उपयोग नहीं करते थे । पर आज के विज्ञानने सिद्ध कर दिया कि अधिकांश बीमारियाँ दाँतोंकी मलिनता रहनेसे हुआ करती हैं । एक तो मैल भीतर रह जानेसे दाँत गिरते जल्दी हैं, दाँतों की शिथिलता से दृष्टि भी क्षीण होती है, अजीर्ण ( वदहज़मी ) भी जल्दी होती है, वाल भी जल्दी सफेद हो जाते हैं, बुढ़ापा भी जल्दी आ जाता है, मुहसे दुर्गन्ध अलग फैलता है । अतः जीवन के आनन्दकेलिए जैसे शुद्ध जल तथा शुद्ध वायुकी, तथा शुद्ध भोजनकी प्रयोजनीयता है, वैसे ही दन्त - शुद्धिकी भी आवश्यकता है । दातुन से दाँत दृढ हो जाते हैं, पाचनशक्ति अच्छी रहती है । दृष्टि तीव्र हो जाती है, आँखों में रोग नहीं होता, जुकाम नहीं होता । यह जब नवयुवकोंने सुना; तब उन्होंने भी दन्तधावन शुरू किया; पर वह भी प्राचीन प्रणालीसे नहीं; किन्तु अर्वाचीन - प्रणालीसे । वे सुअर आदिके बालोंसे बने हुए ब्रुशोंसे अशुद्ध अंग्रेजी दवाइयाँ दाँतोंकी शुद्ध्यर्थ सेवन करते हैं । फिर भी वे प्राचीनोंका विज्ञान-प्रेम नहीं पहचान सकते । प्राचीन महानुभाव दन्तधावनार्थ विविध वृक्षोंके काष्ठका उपयोग करते थे, जिनमें विविध लाभ थे । जहाँ
पृष्ठ 387
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
मृगचर्मासनका वैज्ञानिक रहस्य ३१६. पर कौडियोंके व्ययसे सुलभता थी । अपना धन अपने ही देश में रहे - यह अर्वाचीन लोग प्राचीनता में नहीं विचारते । इस प्रकार जिस मृग - चर्मके आसनका यज्ञोपवीतके आरम्भ में पूर्वजोंने आदेश दिया था; उसमें अर्वाचीनोंने यह आक्षेप किया कि - सनातनधर्मी तो चमड़ेको अशुद्ध मानते हैं; तब मृग - चर्मका आदेश क्यों देते हैं? पर दयनीय - बुद्धिवाले वे प्राचीनोंके अभि-प्रायोंको नहीं समझ पाते । अरे भाई । हमारे प्राचीनोंने विज्ञानको जान रखा था । वे पशुको अशुद्धों में गिनते हैं; पर उन्होंने गायको शुद्ध माना; लेकिन उसके मुखको अशुद्ध माना । वे मूत्रको अशुद्ध मानते हैं; पर गोमूत्रको उन्होंने शुद्ध माना । विष्ठाको वे अशुद्ध मानते थे; पर गोबरको उन्होंने शुद्ध माना । सामान्य- शास्त्रके अपवाद भी अवश्य हुआ करते हैं । इसीसे प्राचीनोंने चर्मको अशुद्ध मानते हुए भी मृग - व्याघ्रादि चर्मको शुद्ध माना; और उनका उपयोग आदिष्ट किया । क्योंकि अनुसंधानसे उन्हें उसमें पवित्र विद्य त् - शक्ति प्राप्त हुई, और इस प्रकारकी प्रभा उसमें उनको प्राप्त हुई, जिससे विशेषतया योगी एवं ब्रह्मचारी लाभको प्राप्त करते हैं । 445 कीड़ा अशुद्ध था; पर उससे निकले रेशमको उन्होंने पवित्र कहा । उच्छिष्टको वे अपवित्र कहते हैं; पर बछड़ेके पीने से निकले हुए उच्छिष्ट भी गोदुग्धको उन्होंने पवित्र माना । वमन ( उल्टी ) को अपवित्र कहते हुए भी शहदको उन्होंने पवित्र माना । कौए की वींटको अपवित्र मानते हुए भी उन्होंने तदुत्पन्न पीपल और वट वृक्षको पवित्र माना । वीर्यको मल मानते हुए भी तदुत्पन्न पुत्रको
पृष्ठ 388
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३६० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) उन्होंने अपने हृदयका आधार माना । यह क्यों? इसमें हमारे पूर्वजोंके विज्ञानका ज्ञान ही कारण है । अब मृगचर्मकी भी सुनिये | एक आयुर्वेद विद्वान्का मित्र भगन्दर रोग से ग्रस्त था । पर्याप्त परिश्रम करने पर भी वह स्वस्थ न हो सका । अंग्रेजी चिकित्सा में प्रवीण डाक्टर भी उसे ठीक नहीं. कर सके । यदि भगन्दर दवता था; तो ववासीर हो जाती । वह ठीक हो जाती; तो रोगकी कोई अन्य शाखा निकल आती । रोग क्रमशः भयङ्कर होता हुआ चला जा रहा था । तब उस आयुर्वेद -विद्वान् ने उसे मृग चर्मके आसन के तथा रविताण्डवरस और सौभाग्यादि - मरहमके उपयोगार्थ कहा । ऐसा करने पर उस फोड़ेसे पीप निकलना तीसरे दिन ही वन्द होगया । उस गाँठरूप व्रणका स्थान भी एक सप्ताह में स्वाभाविक रूप में परिणत होगया । उक्त चिकित्साके अपूर्व प्रभावको देखकर डाक्टर भी चकित होगये । इस प्रकार उसी वैद्यके पास एक भयानक बवासीरका रोगी आया । उसे भी उसने मृगचर्मासनका उपयोग लेनेको कहा । उसका भी वह रोग हट गया । एक वर्ष ऐसा करनेसे दोनों ही रोगी पूर्ण स्वस्थ हो गये । तब उस वैद्यने मृगचर्मके गुणोंके अनुसन्धानार्थ प्रयत्न किया । पाश्चात्य वैज्ञानिकोंसे भी उसने विचारविनिमय किया । पर वे उसका कारण न जान सके । तब उसी वैद्यने उपवेदस्वरूप आयुर्वेदके सुश्रुतसंहिता आदि ग्रन्थोंके अनुशीलनसे शारूप - अरुणकी कतिपय किरणें देखीं । उसने विचारा कि- जिस प्रकार वृक्षोंके जो गुण कहे गये हैं; वे उसकी
पृष्ठ 389
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
मृगचर्मासनका वैज्ञानिक रहस्य ३६१ त्वचामें भी माने जाते हैं; वैसे मृग - मांस के जो गुण सुश्रुतादिमें कहे गये हैं, वे उसकी त्वचा ( चर्म ) में भी मिलने सम्भव हैं । भेद केवल बाहर - भीतरका ठहरता है, जो सूक्ष्म - बुद्धिसे विचारनेपर हट जाता है | भगवान् धन्वन्तरिने जाङ्गल मृगके वर्णनावसरमें कहा है - – ' जाङ्गला मृगाः कषाया मधुरा लघवो वातपित्तापहाः, तीक्ष्णाः, हृद्याः, वस्तिशोधनाश्च ' । ( सुश्रुत ० सूत्रस्थान ४६ अ ० ) इस प्रकार मृग कषाय और मधुर - गुणविशिष्ट होनेसे वात और पित्तको नष्ट करके रक्तविकारको दूर कर दिया करते हैं । भगन्दर और खूनी बवासीरमें वात - पित्तके द्वारा रक्तमें दवाव अवश्य पड़ता है । जैसा कि कहा है- ' वाताद् ऋते नास्ति रुजा, न पाकः पित्ताद् ऋते ' । सम्भवतः इसीसे ही मृगचर्म के निरन्तर सेवनसे उक्त रोग नष्ट हो गये । यह मृगचर्म भी स्वतः मरे हुए मृगोंका होना चाहिए, वध किए हुए मृगोंका नहीं । एक तो उसमें हिंसा -दोष उपस्थित होता है; दूसरा मारनेके समय जो उनकी दयनीय दशा होती है; वे गुण उसके भीतर से भी नष्ट हो जाते हैं, बाहर क्या रहेंगे? अतः उसका मांस भी उपयोग योग्य नहीं । अस्तु विज्ञानका परिशीलन भी उक्त विषयमें सहायता देता है कि मृगचर्ममें भी विशेष विद्य त्की तरंगें उत्पन्न होती हैं, जिनका प्रभाव जीवित प्राणियों के स्नायुमण्डलपर अद्भुत होता है । प्रकृत विषयमें तरङ्गोंके संक्रमणका वास्तविक मार्ग गुदाके विवरमें स्थित स्नायुमण्डल ही है । उस स्नायुमण्डलका प्रधान - केन्द्र नाभिमण्डल है । यहींसे विभिन्न प्रान्तोंकेलिए आवश्यक सामग्री जाती है ।
पृष्ठ 390
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३६२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) नाभि से ही सम्बद्ध महाप्रचीरानामकी नाडी है, जो अर्श ( बवासीर ) का अधिष्ठान कही जाती है । यहीं पित्त धारण करनेवाली ग्रहणी कला विद्यमान होती है, जो अग्निका अधिष्ठान है । कुण्डलिनी-चक्र भी यही है, जिससे योगाभ्यासी मनका निग्रह करते हैं । अर्शकी भांति भगन्दर में भी कई कारणोंकी समता मिलती है । इस कारण मृगचर्मोत्पन्न विद्युतकी तरंगें उक्त रोगोंको नष्ट करनेमें समर्थ होती हैं । अन्य रोगों में भी इस प्रकार सृगचर्मासनकी सफलताकी आशा है । इसीलिए भगवान् नन्दनन्दनने ' चैलाजिन-कुशोत्तरम् ' ( गीता ६।११ ) में आसन में ' अजिन ' ( मृगचर्म ) का भी ग्रहण किया । वेदमें भी ' परामित्रान् दुन्दुभिना हरिणस्याजिनेन च 1 । सर्वे देवा अतिनसन् ' ( अथवे ० ५।२१।७ ) इस मन्त्र में नगाड़ेके शब्द तथा मृगचर्मसे शत्रुओं का देवताओं द्वारा डराना कहा है । सो यहां शत्रु यही रोग इष्ट हो सकते हैं, जिनसे हमारा सतत युद्ध जारी रहता है, नगाड़ेके शब्दसे भी कई रोग - कीटाणुओंका नाश होता है - वह भी इससे सूचित होता है; इसीलिए जो कि— देवमन्दिरोंमें मृगचर्मका आसन तथा नगाड़ा भी रखा जाता है-उसमें बहुत लोगोंका सम्मर्द होनेसे जो कि — रोग - कीटाणुओंका आक्रमण श्रशङ्क्ति होता है उनका दूर हो जाना इन मृगचर्म तथा नगाड़ेके शब्दसे इस मन्त्र द्वारा सूचित हो रहा है । हमारे पूर्वज बहुत दूरदर्शी थे; विचारनेपर हमें उनकी दूरदर्शिता समय - समयपर मिलेगी । अथर्ववेदसंहिता आयुर्वेदका मूल माना जाता है । तब इस अथर्ववेदके सूक्तमें जो युद्धदुन्दुभि वर्णित की गई है, बहुत