सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 471–480
सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 471–480
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यज्ञका वैज्ञानिक महत्त्व ४४३ ऋषिमुनियोंने उपाय सोच लिया था । वह यह था कि - साक्षात् अग्निदेवता तथा ब्राह्मणस्थ वैश्वानर- अग्नि इन दोनोंके द्वारा उन्हें हव्य दिया जाय । वह भी यही पूर्व जैसा उपाय है । जब हम अग्निमें हव्य डालते हैं; तब स्थूल अग्नि उस स्थूल हविको जलाकर सूक्ष्म कर देती है, और शान्त होकर स्वयं भी सूक्ष्म हो जाती है । तब वह सूक्ष्म अग्नि, सूक्ष्म महाग्निके साथ मिलकर मन्त्रशक्ति से उस सूक्ष्म - हविको लेकर अपने मित्र सूक्ष्म वायुकी सहायतासे आकाशाभिमुख जाती हुई द्युलोकमें पहुँचकर देवोंको समर्पित करती है । वे देवता उस सूक्ष्म हविसे तृप्त होकर उच्च शक्तिवाले होनेसे प्रजाके हितकेलिए और धान्य आदिकी • उत्पत्तिकेलिए यथोचित वृष्टि कर देते हैं । जैसे कि मनुस्मृति में कहा है - ' अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यग् आदित्यमुपतिष्ठते । आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृ'ष्टेरन्नं ततः प्रजा ' ( ३ । ७६ ) । इसीका बीज वेद में भी मिलता है - ' हविष्पान्तमजरं स्वर्विदि दिविस्पृशि हुतं जुष्टमग्नौ ' ( ऋ ० सं ० २०१८८१ ) यहाँ श्रीदुर्गाचार्य ने स्पष्टता की है- ' हविः पान्तं - देवानां च पुरोडाशादि निर्दग्धस्थूल-भावमग्निना क्रियते । स्वः - आदित्यः तं वेत्ति, यथासौ वेदितव्यः इति स्वर्विद् अग्निः । दिविस्पृशि - द्यामसौ स्पृशति हविरुपनयन् आदित्यम् ' ( निरुक्त ७१२५ १ ) इससे स्पष्ट सिद्ध हुआ कि -जब हम देवताओंको प्रसन्न कर लेंगे; तो यह सम्पूर्ण चराचर — स्थावर-· जङ्गम पालित रहेगा; क्योंकि सभीका निर्वाह वृष्टि एवम् अन्नपर है । उन देवताओंको प्रसन्न करनेका उपाय है - यज्ञ । इस प्रकार
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४४४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) यज्ञसे देवपूजा सिद्ध हुई । अतः यज्ञका महत्त्व सिद्ध हुआ, जिसके लिए हमें भगवद्गीता आदेश देती है- ' देवान् भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः । परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ, ( ३ । ११ ) ' तुम देवताओं को प्रसन्न करो; देवता तुम्हें प्रसन्न करेंगे । परस्परकी प्रसन्नतासे तुम्हें कल्याण मिलेगा ' | ' इष्टान् भोगान् हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः । ' ( ३।१२ ) इससे यज्ञ करनेपर देवताओं द्वारा इष्ट - भोगोंकी दृष्टि करना भी बताया है । ' तैर्दत्तान् अप्रदायैभ्यो यो भुक्ते स्तेन एव सः ' ( ३ | १२ ) यहां पर बिना यज्ञ किये अन्न आदि पदार्थोंका उपभोग करना चोरी मानी गई है । ' तस्मात् सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् । ( ३ । १५ ) यहां पर यज्ञकी स्थिति ब्रह्ममें बताई गई है । ' अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् । मन्त्रो-ऽहमहमेवाज्यम् अहमग्निरहं हुतम् ' ( ६।१६ ) यहां पर यज्ञ तथा यज्ञके साधन अग्नि, घृत, विविध औषधियां, मन्त्रोच्चारण, आदिको भगवान्का रूप कहा है । ' यज्ञदानतपः - कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ' ( १८५ ) यहांपर यज्ञ - कर्मका त्याग निषिद्ध किया है । ' यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ' ( १८५ ) यहांपर यज्ञको पवित्र करनेवाला बताया गया है । ' यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ' ( ४ | ३१ ) यहांपर यज्ञशेषको अमृत तथा उसका उपयोग करनेवालेको सद्गतिकी प्राप्ति कही गई है । ' नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोन्यः कुरुसत्तम! ' ( ४।३१ ) यहां यज्ञहीनकी इस लोक तथा परलोकसे भ्रष्टता कही गई है । ' एष वोस्त्विष्टकाम-
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यज्ञका वैज्ञानिक महत्त्व ४४२ I ' धुकू ' ( ३ | १० ) वहां यज्ञको प्रजाके मनोरथोंकी तृप्ति करनेवाला कहा है । ' यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यन्त्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः ( ३।६ ) यहां तथा ' यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ' ( ३ | १३ ) यहांपर याज्ञिक कर्मको बन्धनसे दूर रखनेवाला माना है । कर्मकी कर्मता होने पर f ही मुक्ति मिलती है - यह कभी नहीं भूलना चाहिये । यह श्रेय यहां यज्ञको प्राप्त है — यह सूचित किया गया है । यह है यज्ञका महत्त्व, जिसके प्रचारका श्रेय सनातनधर्मी संसारको प्राप्त है । न यज्ञका प्रयोजन केवल वायुशुद्धि नहीं । केवल वायुशुद्धि ही फल होता; तो बहुत मंहगे घृतका उपयोग उसमें व्यर्थ था । उससे भी सस्ते उपायों से वायुशुद्धि हो सकती थी । तब तो यज्ञ म्युनिसिपलिटीके कूड़ेके पीपोंमें, पाखानोंमें, वा नालियोंके पास के ही करना ठीक होता । वहां तो वेदमन्त्रोंके बिना भी वायु शुद्ध हो जाती । वस्तुतः यज्ञ देवपूजन वा देवतर्पणार्थ हुआ करता है-यह पहले बताया ही जा चुका है । देवताओंका भक्ष्य घृत होता है । जैसे कि स्वर्गलोकसे इस मनुष्य - लोकमें आई हुई उर्वशी अप्सराको नं ‘ तुम कौनसा भोजन करोगी ' यह पुरूरवाने पूछा था । तब उसने त्र कहा था- ' घृतं मे वीर! भक्ष्यं स्यात् ' ( श्रीमद्भागवतपुराण ६।१४।२२ ) झ केवल पुराण में ही नहीं, ब्राह्मणभागात्मक वेदमें भी कहा है-का ' घृतस्य स्तोकं सकृद् अह्न आश्नाम्, तादेव इदं तातृपारणा चरामि ' ( शतपथ ११।५।१।१० ) यहां भी उर्वशी ही कहनेवाली है कि मेरा M की भोजन घृत है । केवल ब्राह्मणभागात्मक वेदमें ही नहीं; मन्त्र-म. भागात्मक वेदमें भी उर्वशीने यही कहा है- ' घृतस्य स्तोकं सकृद्
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४४६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) अह्न आश्नाम् ' ( ऋ ० सं ० २०६५/१६ ) इस मन्त्रमें उर्वशी और पुरूरवा ऋषि - देवता हैं । उर्वशी देव अप्सरा थी— इसलिए घृत उसका भक्ष्य कहा गया । इसी कारण देवपूजनात्मक यज्ञमें भी घृत अपेक्षित होता है । तभी शतपथब्राह्मणसें कहा है- ' एतद् वै देवानां त्रियं धाम यद् आज्यम् ( घृतम् ) ' ( १३ | ३ | ६ | ३ ) ' आज्येन जुहोति ' ( शत ० १३।३।६।२ ) इस कारण यज्ञके अङ्ग हवनमें-- जिसका उद्देश्य देवताओंका पूजन वा तर्पण है- ' वैश्वदेवी ' ( गोपथ ० २२३ | ११ ) गायके शुद्ध - घृतका उपयोग लिया जाता है । यहां मुख्य उद्देश्य देवताओंकी प्रसन्नता है, केवल वायुशुद्धि नहीं । इसके अतिरिक्त यज्ञमें वेदमन्त्र भी इसीलिए उच्चारित किये जाते हैं; क्योंकि - यज्ञ वेदका विषय है, यह हम ' ब्राह्मणभाग भी वेद है ' इस निबन्धमें अग्रिम पुष्प में कहेंगे; और यज्ञ होता है देवपूजार्थ; इस कारण उसमें वेदमन्त्रोंकी आवश्यकता भी पड़ती है, क्योंकि-वेदमन्त्रोंके उपास्य वा विषय भी देवता ही होते हैं । इस कारण यज्ञके समयकेलिए निरुक्तमें कहा है कि उस समय तत्तद् - देवताका मनसे भी ध्यान करे –'यस्यै देवतायै हविगृहीतं स्यात्; तां मनसा ध्यायेत् ' ( ८ | २२ | ११ ) इस कारण वेदमन्त्रोंका उच्चारण यज्ञमें सफल है । उनकी ध्वनियोंका भी प्रभाव पड़ता है - जिससे हमारे मनोरथकी पूर्ति में सहायता मिलती है । ' अहं वृष्टिं ( वर्षणं, मनोरथवर्षणं च ) [ हविः ] दाशुषे मर्त्याय [ अददाम् ] ' ( ऋ ० ४।२६।२ ) यज्ञाग्निमें डाला हुआ घृत आदि व्यर्थ नहीं होता; किन्तु भूमिमें
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यज्ञका वैज्ञानिक महत्त्व ४४७ ये द का सा में न बोये हुए वीजकी तरह सूक्ष्म होकर अधिक शक्ति - सम्पन्न होकर देवताओंके पास जाता है, और अधिक फलप्रद होता है । शतपथ-ब्राह्मण में लिखा है - ' सर्वा ह वै देवता अध्वर्यु हवि हीष्यन्तम् उपतिष्ठन्ते - मम नाम ग्रहीष्यति, मम नाम ग्रहीष्यतीति ' ( १ | १ | २ | १८ ) यहां देवताओंका नाम लेना देवताओं के प्रसन्नतार्थ माना है, इससे प्रसन्न होकर देवता आहुतिदाताके मनोरथोंकी पूर्ति करते हैं । इस कारण यज्ञोंका हिन्दुधर्ममें बहुत महत्त्व माना गया है । नारायणोपनिषत् में कहा गया है- ' यज्ञेन द्विषन्तो मित्रा भवन्ति, यज्ञे सर्वं प्रतिष्ठितम् y तस्माद् यज्ञं परमं वदन्ति ' ( ७१ ) यहां पर यज्ञसे शत्रुओंका भी मित्र बनना कहा है । श्रीमद्भागवतमें तो यहां तक कहा है कि जिस देशमें यज्ञपुरुष भगवान्की पूजा होती है; वहांपर भगवान् प्रसन्न होते हैं । भगवान् प्रसन्न हुए; तो कोई वस्तु अप्राप्य नहीं रहती —- ' यस्य राष्ट्र पुरे चैव भगवान् यज्ञ - पूरुषः । इज्यते स्वेन धर्मेण जनैर्वर्णाश्रमान्वितैः ॥ तस्य राज्ञो महाभाग्ये भगवान् भूतभावनः । परितुष्यति विश्वात्मा तिष्ठतो निजशासने ॥ तस्मिँस्तुष्टे किमप्राप्यं जगतामीश्वरेश्वरे ' ( ४ | १४ | १८-१६-२० ) । पद्मपुराण सृष्टि - खण्ड में भी कहा है- ' यज्ञेनाप्यायिता देवा वृष्ट्य त्सर्गेण मानवाः । आप्यायनं वै कुर्वन्ति यज्ञाः कल्याण-हेतवः ' ( ३ | १२४ ). यहां यज्ञोंको कल्याणका हेतु कहा है । इसी कारण अथर्ववेदसंहितामें यज्ञको सारे भुवनका केन्द्र कहा है-' यज्ञो विश्वस्य भुवनस्य नाभिः ( ६।१०।१४ ) । यज्ञोंके न होनेसे देवताओंका प्रकोप होता है; उसीसे देश में
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४४८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) अकाल, युद्ध - महायुद्ध तथा उनके कारण महर्घता -पिशाचीका अकाण्ड - ताण्डव हुआ करता है । देवताओंके कोपसे अतिवृष्टि वा अनावृष्टि, अतिवायु, अतिग्रीप्स, अतिशीत, वाढें आदि हुआ करती हैं; जिनसे अकालकी विकराल ज्वालाएँ फैलती हैं । देवताओंके कोपका दूसरा चिह्न होता है - हमारी बुद्धिका नाश । महाभारतमें आया है— ' देवता डण्डा उठाकर पुरुषोंकी रक्षा नहीं करते । जिसकी रक्षा करना चाहते हैं, उसकी बुद्धि बढ़ा देते हैं । जिसे गिराना चाहते हैं; उसकी बुद्धि छीन लिया करते हैं ( उद्योग-पर्व ० ३४ / ८०-८१ ) । कौन नहीं जानता कि -युद्ध - महायुद्ध आदि उसी बुद्धिभ्र ंशके परिणाम हैं, जिससे मंहगाई फैलती है । इन्हीं देवताओंके प्रसादनार्थ यज्ञ तथा उसके अङ्गभूत जपपाठ, देवमूर्तिपूजा आदि कर्म आवश्यक सिद्ध होते हैं । उसमें गायत्रीके जप वा यज्ञसे ग्रहोंकी प्रतिकूलता भी दूर हो जाती है । जैसे कि महाभारतमें कहा है — ' ये चास्य दारुणाः केचिद् ग्रहाः सूर्यादयो दिवि । ते चास्य सौम्या जायन्ते शिवाः शिवतराः सदा ' ( वनपर्व २००१८५ ) । देवगणकी सहायता से ही सकल अनर्थकारी अधर्म हटता है, और विश्वकल्याणकारी धर्मकी स्थापना होती है - ' यज्ञ -शिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्विषैः ' ( गीता ३।१३ ) अधर्मके कारण ही जनपदोंका ध्वंस होता है; जैसा कि सुश्रुतसंहिताके सूत्रस्थान ( ६।२० ) और चरकसंहिता ( विमानस्थान ३।२१-२२ ) में भी बड़े स्पष्ट शब्दों में कहा है । उसीको दूर करनेकेलिए ' देव-गो - ब्राह्मण - गुरु - वृद्ध - सिद्धाचार्यांन् अर्चयेत्; अग्निमुपचरेत् '
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यज्ञका वैज्ञानिक - महत्व ४४8 ( चरक - सूत्रस्थान ५ ( १८ ) ' जप- होमोपहार - इज्याऽञ्जलि - नमस्कार-तपोनियम - दयादान, दीक्षाभ्युपगम - देवता ब्राह्मरण- गुरुपरैर्भवितव्यम् ' ( सुश्रुत ० सूत्र ० ६ २१ ) देवपूजनादि कहा है । यज्ञों में वेदज्ञ - ब्राह्मण सम्मिलित होते हैं, तो यज्ञमें जहाँ देवपूजन होता है, उसके साथ ही साथ भूदेवोंका सत्कार भी हो जाता है । जो विविध - वृत्तियोंको छोड़कर, भोगविलासको दूर करके, वेदोंकी रक्षार्थं कठोर - ब्रह्मचर्य कर चुके हैं; उन विद्वान-ब्राह्मणोंका दर्शन भी हो जाता है । उनकी पूजासे भी देवता प्रसन्न होते हैं । जैसा कि कृष्णयजुर्वेद - तैत्तिरीयारण्यकमें भी कहा है--' यावतीर्वै देवताः, ताः सर्वा वेदविदि ब्राह्मणे वसन्ति । • तस्माद्. ब्राह्मणेभ्यो वेदविदुद्भ्यो दिवे - दिवे नमस्कुर्याद्, नाश्लीलं कीर्तयेद्, एता एव देवताः प्रीणाति ' ( २।१५ ) । इसी यज्ञसे निम्न वर्गको भी अच्छा धन प्राप्त हो जाता है । निम्न वर्गको वृत्ति प्राप्त होती रहे, तो अच्छा है; नहीं तो वे चोरी-लुट आदि शुरू कर देते हैं । सर्वप्रथम यज्ञों में भूमिके समीकरणार्थ श्रमिक - मजदूरोंकी, फिर यज्ञमण्डपके निर्माणार्थ ईंटें बनानेवालों, उसे ढोनेवालों, मिट्टी खोदनेवालों, वेदी - कुण्ड आदि के निर्माण में बढई, लोहार आदिकी, मण्डपको चटाईसे आच्छादित करने केलिए चटाई बुननेवालोंकी, यज्ञ - सामग्री निर्माणार्थ जुलाहे, कसेरे, सुनार, दर्जी, बनिये आदिकी, यज्ञमें आनेवाले अतिथि - अभ्यागतोंकी व्यवस्थाके लिए नाई, पनभरे, रसोई बनानेवाले ब्राह्मण, संरक्षक क्षत्रिय आदि, भोजनादि सामान देनेवाले बनिया आदि, यज्ञ २६ स ० ध ०
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४५० श्रीसनातनधर्मालोक ( ) ५ करनेवाले ऋत्विक् विद्वान् त्राह्मण इन सबकी यज्ञमें आवश्यकता पड़ती है । होता, अध्वर्यु, उद्गाता, ब्रह्मा आदि मुख्य यज्ञनेता तथा उनसे नीचे कर्म करनेवाले बहुतों की आवश्यकता होती है । सबको यथायोग्य अर्थका वितरण किया जाता है, आर्थिक विषमता ह जाती है । दूसरा यहाँ देश - विदेशों के विद्वानों- आदिका परिचय प्राप्त होने से ' वसुधैव कुटुम्बकम् ' यह कथन चरितार्थ हो जाता है । फलतः यज्ञ चाहे धार्मिक रूपसे हों, चाहे लौकिक - रूपसे, चाहे वैज्ञानिकरूपसे, सभी दृष्टिकोण से बहुत लाभप्रद हैं । यज्ञके प्रयोजन भी बहुत से होते हैं, उनमें स्वर्गकी प्राप्ति एक पारलौकिक - प्रयोजन • है, जैसे कि वेदमें कहा है- ' येरीजानाः स्वर्गं यन्ति लोकम् ' ( अथर्व ० १८ | ४ | २ ) । इसी प्रकार - ऐतरेय ब्राह्मण ( १ | २ | १० ), शतपथ-ब्राह्मण ( १२ | ४ | ३ | ७ ), न्यायदर्शन ( १ | १ | ३ ), तथा महाभाष्य ( ६ ॥ ८४ ) में भी कहा है । यज्ञमें प्रत्येक देवताके नामसे आहुति दी जाती है; यह देवताओंकी पूजा होती है । तब उनकी प्रसन्नतासे स्वर्गकी प्राप्ति स्वाभाविक है । तभी भगवद्गीतामें कहा है- ' देवान् देवयजो यान्ति ' ( ७ | २३ ) ' देवयज्ञ करनेवाले देवताओंको प्राप्त होते हैं ' । देवताओंका निवास होता है स्वर्ग में । जैसे कि वेदमें कहा है-' दिवि देवाः ' ( अथर्व ० ११/७/२३, १८।४।३ ) । . यज्ञका प्रयोजन केवल पारलौकिक स्वर्ग - प्राप्ति ही नहीं, अपितु ऐहिक. विविध - कामनाओं की पूर्ति भी यज्ञका प्रयोजन हुआ करता है । उसमें भी कारण देवपूजा ही हुआ करती है; क्योंकि देवताओं में विविध कामनाओं को पूर्ण करनेकी क्षमता है, जैसे कि - ऋग्वेद-
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यज्ञका वैज्ञानिक महत्त्व ४२१ संहिता ( १०।६४।२ ) में कहा है । तभी तो वेद कहता है- ' यत्कामास्ते जुहुमः, तन्नो अस्तु ' ( ऋ ० सं ० १० १२१।१० ) इस मन्त्रमें भी यज्ञ-हवनसे विविध - कामनाओंकी पूर्ति सूचित की गई है । ' वयं स्याम पतयो रयीणाम् ' इस उक्त मन्त्रके अन्तिम अंशसे यज्ञसे विविध-ऐश्वकी प्राप्ति बताई गई है । इस मन्त्र में प्रजापति - देवताका वर्णन है, तभी हवनमें ' प्रजापतये स्वाहा ' यह सबसे पूर्व हविर्दानपूर्वक बोला जाता है । • यज्ञोंके विविध - कामनाओंको पूर्ण करनेवाला होनेसे ही महा-भाष्य ( १ | १ | ६३ ) में ' चक्षुष्कामं याजयाञ्चकार ' इस उदाहरणमें यज्ञ-द्वारा नेत्रशक्तिदान - रूप फल भी सूचित किया गया हैं । न्यायदर्शन ( २१६८ सूत्रके भाष्य ) में ' ग्रामकामो यजेत् ' यह वैदिक - प्रमाण देकर यज्ञविशेषका फल ग्रामाधिपति हो जाना भी कहा है । इस प्रकार उसी दर्शनके भाष्य में ' पुत्रकामः पुत्रेष्ट्या यजेत ' ( २ | | १ ५७ ) इस वैदिक प्रमाणसे यज्ञविशेषका फल पुत्रप्राप्ति भी सूचित किया गया है । इसप्रकार वृष्टिकी कामनासे कारीरी इष्टि ( यज्ञ ) का करना भी सुप्रसिद्ध है । इसी तरह शतपथ ( १३ | २ | ६ | ३ ) में अश्वमेधयज्ञका फल तेज, इन्द्रिय, पशु, ब्रह्महत्या दूर होना, तथा लक्ष्मीका प्राप्त होना कहा गया है । राजसूययज्ञका फल - अकालमृत्यु- निवारण तथा राज्यकी दृढता कहा गया है । यदि यह कामनाएं स्वार्थपूर्ति केलिए न की जाएं, तब वह यज्ञ समष्टिगत हो जाने से अतिशयित महत्त्वशाली हो जाता है । उक्त फलोंकी प्राप्ति में कोई अतिशयोक्ति वा अर्थवाद भी नहीं है ।
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४१२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) एक तो इसमें अलौकिक - सामर्थ्यशाली परमात्माकी अङ्गभूत देव-शक्तिकी प्रसन्नताका भी फल होता है; और फिर वैदिक मन्त्रशक्ति तो सद्यः - फलदायिनी प्रसिद्ध भी है । दूसरा विद्वान् - भूदेवोंकी आशीष तथा उपस्थिति भी फल देने में सहायक होती है । सभी वर्णं वा आश्रमवाले तथा अन्य सभी जातियां भी उन महायज्ञों में उपस्थित होती है; उनका सत्कार होजानेसे भी यज्ञकर्ता के लिए सद्भावनाकी शुभाशंसा हृदयसे निकलती है । अन्य बात यह है कि विशेष विशेष यज्ञोंमें विशेष विशेष सामग्रियां भी रखी जाती है; उनको मन्त्रपाठ -पूर्वक अग्निमें डालने से उनकी सूक्ष्मता होजाने-के कारण उनके परमाणुओं के हमारे शरीर के भीतर प्राप्त होनेसे बड़ा भारी लाभ होता है । क्योंकि —यह बात अनुभवसिद्ध है कि — स्थूल की अपेक्षा सूक्ष्म हुई वस्तु अधिक शक्तिशाली होती है, और सूक्ष्म वस्तु स्थूल में प्रवेश भी शीघ्र कर जाती है । इसपर कुछ तर्क देखिये— परमात्मा सभीसे सूक्ष्म है, तभी तो उसे सर्वशक्तिमान कहा जाता है । परमाणु कितने सूक्ष्म होते हैं; उनकी शक्तिका हाल जानना हो; तो परमाणुबमसे विध्वस्त हुए जापानके दो नगरोंसे पूछिये । सोनेका एक छोटा टुकड़ा मनुष्य खा ले; उसपर कोई प्रभाव नहीं होता; उसी टुकड़ेको सूक्ष्म करके वर्क बनाकर खावें; तो हमें पुष्टि प्राप्त होगी । यदि उसे और भी सूक्ष्म बनाकर अर्थात् उसकी भस्म खावें; तो हमारा शरीर बहुत बलवान् हो जायगा । आतसी- शीशेसे सूर्यकी किरण जब हम स्थूल लेते हैं;