श्रीगणेशाय नमः।

सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 481–490

सनातन धर्मालोक ५ · पृष्ठ 481–490

पृष्ठ 481

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यज्ञका वैज्ञानिक महत्त्व ४५३ तो उसका प्रभाव नहीं होता । जब सूक्ष्म बिन्दु करते हैं; तो उससे हमारा हाथ जल जाता है । डाक्टर उससे पानी गर्म कर लेता है । इस प्रकार ओषधि जितनी सूक्ष्म होती जाती है; उसकी उतनी शक्ति बढ़ती जाती है । क्षयके कीटाणु बहुत सूक्ष्म होते हैं । उनपर स्थूल ओषधि काम नहीं देती; उसे जब इन्जैक्शनसे सूक्ष्म करके शरीरमें पहुँचाते हैं; तो उसका प्रभाव हमारे शरीर में तत्क्षण. पड़ता है । सूक्ष्म करनेके भी कई प्रकार होते हैं । स्थूल लाल-मिर्चको सभी सुगमतासे खा लेते हैं; वा हाथमें उठा लेते हैं । जब हम उसे घोटें; तो वह सूक्ष्मरूप से वायुमें फैलकर बहुत प्रभाव डालती है । कई दवाइयोंको आटेमें डालकर उसका लेप तबलेपर किया जाता है; तबलेको वजानेपर वही ओषधि वायुमें फैलकर रोगीके शरीरमें प्रविष्ट होकर उसके रोगको दूर कर देती है । पर अग्निसे अधिक पदार्थोंको सूक्ष्म और कोई ढङ्ग नहीं कर सकता । उसी लाल - मिर्चको अग्निमें हवन कर देने से उसका प्रभाव दूर - दूर तक बैठे मनुष्योंपर भी पड़ेगा । इसी प्रकार हमने किसी रोगीके रोग-निवारणार्थ यज्ञ करना है; तब उसमें विशेष - ओषधियां भी जो उस रोगके उपयुक्त हैं, डाली जाती हैं । अग्निमें मन्त्रद्वारा हुत होनेसे वे सूक्ष्म होकर रोगीके श्वासद्वारा वा परमाणुरूप होनेसे रोमकूपोंके द्वारा अन्दर जाकर रक्तमें प्रवेश करके रक्तको शुद्ध कर देती हैं, रोग - कृमियोंके अन्दर प्रवेश करके उन्हें अपने वैज्ञानिक गुणके कारण नष्ट कर देती हैं । विज्ञानसे यह सिद्ध होचुका है कि किसी पदार्थका नाश

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) ४१४ नहीं होता, केवल रूप बदल जाता है । अतः अग्निमें हवि डालने से वही वस्तु परमाणुरूपमें सूक्ष्म हो जाती है, नष्ट नहीं होती । गूगल, घृत, कर्पूर, खांड आदि अग्नि में जलनेपर सूक्ष्म होकर फेफड़ों में प्रवेश करके उनको शुद्ध तथा पुष्टकर डालते हैं । इससे यज्ञसे रोग-निवारण में वैज्ञानिकता भी सिद्ध हुई । इनमें अग्नि, वायु, और सूर्य तीनों देवता मिलकर सहायक हुए - यह बात कभी नहीं भूलनी चाहिए; इसलिए वेदमन्त्रमें - ' अग्निर्देवता, वातो देवता, सूर्यो देवता, ( यजुः १४।२० ) यह तीन देवता इकट्ठे तथा सबसे पूर्व आये हैं; इनका पदार्थोंको सूक्ष्म करके अपने पास रखना प्रत्यक्ष है । ' इसी-लिए वेदोंका भी अग्नि, वायु, रविसे दोहना हमारे धर्मशास्त्रों में आया है; क्योंकि — वेदों को भी यही तीनों देवता सूक्ष्म करके अपने में रखते हैं । उनका उनसे दोहन ब्रह्मा - जैसा देवता कर सकता है । इस बातका ज्ञान न होनेसे आर्यसमाजने अग्नि, वायु, सूर्य मनुष्य ऋषि बना डाले हैं । वस्तुतः यही देवता यज्ञके तथा यज्ञ - विषय वाले वेदोंके प्राण हैं । निरुक्तकार श्री यास्कमुनिने भी इन्हीं तीन देवताओंको मुख्य मानकर शेषोंको इन्हीं में अन्तर्भूत है । फलतः यज्ञके प्रसारमें यही तीनों देवता मूलकारण होते हैं । पृथिवीलोकका देवता अग्नि है; इसलिए पृथिवीस्थित हम लोगोंको भी इसी कारण अग्निका सहारा लेना पड़ता है । जबसे अग्निं प्रकट हुई, तबसे यज्ञ भी जारी हुए । वही अग्नि उस यज्ञहुत पदार्थको सूक्ष्म करके उसे अपने मित्र वायुको देती है । सूर्य न हो; तो वायु

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यज्ञका वैज्ञानिक - महत्त्व ४२१ . कैसे चले; अग्नि कैसे जले, इनका प्रसार कैसे हो? पर हमारे अधिकार में अग्नि देवता है; अतः हम उसे मन्त्रशक्तिसे अभि-मन्त्रित करके उसमें अपनी लाभप्रद - सामग्री मन्त्र से डालकर फिर उसे प्रभावितरूपसे वल वाली करवाकर उसे स्वयं प्राप्त करते हैं । मन्त्रशक्तिका महत्त्व हम पहले बता ही चुके हैं । मन्त्रोंके अक्षरोंके उच्चारण शरीरके कुछ विशेष भागोंपर प्रभाव डालते हैं । वेदके अक्षरोंमें जो आनुपूर्वी होती है, वह विशेष क्रम रखे हुए होती है; छातः उनका प्रभाव हमारे शरीरपर पड़ता ही है । न केवल हम पर, प्रत्युत देवताओं पर भी पड़ता है । सृष्टि- सञ्चालन करनेवाली ईश्वरकी शक्तियोंका नाम देवतां होता है । इन शक्तियोंका समस्त संसारकी विभिन्न समस्याओंसे तथा मनुष्यके व्यक्तिगत जीवनकी सुखसमृद्धि, उन्नति - अवनति, लाभ - हानि, रोग - शोक आदि से अत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्ध है । इन . देव- शक्तियों की अनुकूलता प्राप्त करके मनुष्य बड़ी सरलतासे अपने अभ्युदयका मार्ग खोल सकता है । यदि ये देव प्रतिकूल हो जावें; तो मनुष्यका कठोर परिश्रम भी निष्फल हो जाता है । देवशक्तियों को अनुकूल बनानेकेलिए जितने भी साधन गिनाये जाते हैं; उनमें यज्ञ सर्वश्रेष्ठ है; यज्ञ देवताओंकी पूजा होती है - यह हम पूर्व बता चुके हैं । यज्ञसे देवताओंकी प्रसन्नता एवं अनुकूलता होती है - इससे वे अभीष्ट - परिणाम प्रदान करते हैं । यज्ञसे सुख - शान्तिकी प्राप्ति भी कही जाती है । यज्ञमें वेद-मन्त्रोंका उच्चारण, विशेष प्रकारकी समिधाएँ, विशिष्ट हवि, चर,

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४५६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) पुरोडाश आदि, तथा भावनाओंका प्रवाह आदि अनेकों सूक्ष्म प्रक्रियाओंसे एक अदृश्य सुन्दर वातावरण बनता है; उसकी शक्तिसे यज्ञकर्ताओंको ही केवल नहीं; अपितु समस्त - संसारको भी अनेक प्रकारके भौतिक एवं आध्यात्मिक लाभ होते हैं । अन्तःकरणकी पवित्रता से मल, विक्षेप, आवरण आदि दोषों एवं कुसंस्कारोंका निवारण होनेसे आत्म - वलकी वृद्धि होती है । इससे यज्ञसे अनन्त सुख - शान्तिकी प्राप्ति भी सोपपत्तिक ही है । पड़ोस के शत्रुओं पर भी यज्ञके ऐसे परमाणु प्राप्त हो जाते हैं, जिससे उनका मनोमालिन्य - रूप रोग हट जाता है; इस प्रकार शत्रुका मित्रत्व भी यज्ञसे ही सिद्ध हुआ । यज्ञसे सुसन्तानकी भी प्राप्ति कही जाती है । यज्ञका आश्चर्य-जनक प्रभाव जहाँ मनुष्य की आत्मा, बुद्धि एवं नीरोगता पर पड़ता है; वहाँ उससे प्रजनन - प्रणालीकी भी शुद्धि हो जाती है । रज - वीर्यमें जो दोष होते हैं; उनका निवारण होता है । ओषधियोंका सेवन केवल शरीरके ऊपरी भागों तक ही प्रभाव दिखाता है; पर यज्ञ द्वारा सूक्ष्म की हुई ओषधियाँ यजमान तथा उसकी स्त्रीके श्वासों तथा रोमकूपों द्वारा शरीरके सूक्ष्मतम भागों तक पहुँच जाती हैं; और उन्हें शुद्ध कर डालती हैं । गर्भाशय एवं वीर्यकोषोंकी शुद्धिमें यज्ञ विशेष - रूपसे सहायक होता है । यज्ञ - सामग्रियों में अग्नि - तत्त्व-प्रधान तथा सोमतत्त्व - प्रधान दोनों प्रकारकी ओषधियाँ यथायोग्य डालते थे । तब दम्पतिमें जिसमें जिस शक्तिकी न्यूनता होती थी; वह यज्ञरूप - इन्जैक्शनसे उन्हें प्राप्त होती थी; स्थालीपाक एवं

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यज्ञका वैज्ञानिक महत्त्व ४५७ खीर आदि जो यज्ञमें हुत होते थे, उनका शेष भाग दम्पतिको खिलाया जाता था— इससे बाहरी - भीतरी भाग में लाभ प्राप्त होकर सुसन्ततिकी प्राप्ति हो जाती थी, तब पुत्रेष्टि यज्ञसे सन्तति - प्राप्ति भी सोपपत्तिक सिद्ध हुई । तभी वेदमें कहा है- ' अग्निः पुत्रं ददाति दाशुषे ' ( ऋ ० ५२५५ ) यज्ञसे वृष्टिका होना भी कहा जाता है । उस यज्ञकी सामग्रीमें ऐसे तत्त्वोंका संमिश्रण करके अग्निमें हुत करते थे, जो सूक्ष्मरूप-में शक्ति - सम्पन्न होकर अन्तरिक्ष में जाकर हाइड्रोजन और आक्सीजन नामक दो गैसोंके मिलानेका काम करते थे- इससे जल बनकर पृथिवीपर बरसता था; मानसून वायुओंको यज्ञका पोषण प्राप्त हो जाने से वृष्टि होना अस्वाभाविक नहीं - इस प्रकार कारीरी - इष्टिसे वर्षांका होना भी सोपपत्तिक ही सिद्ध हुआ । वेद में भी इसीलिए कहा है- ' स ( अग्निः ) नो वृष्टिं दिवस्परि ' । ( ऋ ० २२६५ ) । यज्ञमें अग्नितत्त्व - प्रधान हविको अग्निमें डालने से सूक्ष्म हुई विद्युत् - शक्ति हमारे शरीर में प्रविष्ट होकर हमारी प्राण - शक्तिकी अभिवृद्धि करके हमारी जीवन - शक्तिको बढ़ाती थी- इससे यज्ञसे आयु की प्राप्ति भी सोपपत्तिक है । वेदमें अग्निदेवतावाले जितने मन्त्र हैं, आर्यसमाजी इसमें अग्निदेवताकी पूजा सिद्ध हो जानेसे मूर्ति - पूजाकी सिद्धि मानकर डरके मारे वहां ' परमात्मा ' अर्थ कर दिया करते हैं; वस्तुतः वेदका विषय यज्ञ होनेसे - जैसा कि हम पहले संकेत दे चुके हैं - वहां अग्निसे याज्ञिक अग्नि इष्ट होती है ।

पृष्ठ 486

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श्री सनातनधर्मालोक ( १ ) उसी याज्ञिक अग्निसे वे वे वेदोक्त लाभ अवश्य प्राप्त होते हैं । तभी तो वेद अग्निकेलिए गाया है -- ' त्वमग्ने! बृहद क्यो दधासि देव! दाशुषे ' ( ऋ ० ८ १०२ १ ) श्रीसायणाचार्यने इसका अर्थ लिखा है - ' हे द्योतमान अग्ने! कान्तकर्मा, गृहपालकः त्वं हविषां दात्रे यजमानाय महदन्नं दधासि । ' वयः का अर्थ ' अन्न ' भी होता है, आयु. भी; क्योंकि अन्नसे ही आयुः प्राप्त होती है- ' अन्नं वै प्राणिनां प्राणाः ' । यज्ञसे यश तथा श्रद्धा और मेधाकी प्राप्ति भी मानी जाती है । -जैसे कि - ' जातवेदो! यशो अस्मासु घेहि ' ( क ० २४ | १० ) यज्ञ करने से यश हो जाता है, यह तो प्रत्यक्ष है ही । ' अग्नये समिधमा-हार्ष बृहते जातवेदसे । स मे श्रद्धां च मेधां च जातवेदाः प्रयच्छतु ' ( अथर्व ० १६६४ । १ ) ' यां मेधां देवगणाः पितरश्चोपासते । तया मामद्य मेधयाऽग्ने! मेधाविनं कुरु स्वाहा ' ( यजु ० ३२।१४ ) यहां अग्निसे श्रद्धा तथा मेधाकी प्राप्ति आई है । यह भी प्रत्यक्ष है । यज्ञ करने से यजमानके हृदय - पटलपर श्रद्धाका भाव अधिक बढ़ जाता है । शारीरिक तथा मानसिक एवं आत्मिक स्वच्छता से मेघाकी प्राप्ति भी स्पष्ट है । : मनुष्य सुन्दर और सुस्वादु भोजन करके अपान वायु, पसीना, अशुद्धश्वास, मल - मूत्र आदि निकालकर वायुमंडल को दूषित करता रहता है; और फिर अपनी आवश्यकताओंकी पूर्त्यर्थ कई प्रकारके इञ्जन-कारखाने आदियोंकी चिमनियों के तथा सिगरेट - हुक्कोंके धुएँ निकाल करके भी जल - वायुमें विकृति उत्पन्न करता रहता है, उससे

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यज्ञका वैज्ञानिक महत्त्व ४५६ अनेक रोगोंकी वृद्धि होती रहती है । इस दूषित वायुमण्डलकी शुद्ध्यर्थ भी होंम - यज्ञको व्यवस्था की गई है । अग्निमें भेदक - शक्ति • होने के कारण उसमें डाला हुआ घृत, मधुर पदार्थ तथा शेष हव्य · पृथक् - पृथक् रूपमें, सूक्ष्मरूपमें होकर वायुमण्डलमें मिल जाते हैं । वह वायु हलकी होकर ऊपर उठती है, उससे उसकी गति में तीव्रता आ जाती है । इससे पहली 2 अशुद्ध वायु बाहर निकल जाती है; उसके स्थानपर बाहरकी शुद्ध वायु प्रवेश करती है । मनुष्यने अपने शारीरिक गैसोंसे जल - वायुको दूषित किया; अतः उस पापका प्रायश्चित्त भी तो उसे करना चाहिए । वही यज्ञ है । यज्ञ करनेसे अपने कर्त्तव्यका पालन करते हुए प्राणिमात्रका जो अप्रत्याशित उपकार होता है, उससे उसे जन्मान्तर में स्वर्ग मिले — यह सोप-पंत्तिक ही है । पर उसमें देवताओं तथा वेदमन्त्रोंका - आश्रय लेना अनिवार्य है । इसमें आस्तिकता भी है, वास्तविकता भी है क्योंकि — देवताओं के अनुग्रहके बिना उक्त लाभ नहीं होते । " देवताओं के अनुग्राहक वेदमन्त्र हुआ करते हैं । यज्ञका उत्तरदायित्व * द्विजोंपर डाला गया है । शूद्रादि कृच्छ्रकर्म में लगे होने तथा शारीरिक - बाह्याभ्यन्तरिक अपवित्रता होने से उन्हें छूट है । यज्ञोंमें अग्निशक्ति, शब्द - शक्ति और कालविशेषकी शक्ति- इन तीन शक्तियोंका अभूतपूर्व सम्मिश्रण होता है । वर्तमान वैज्ञानिक-संसार शब्दशक्ति और कालपरिवर्तनकी गति के ज्ञानसे सर्वथा शून्य है । मन्त्रों, विशेष करके वेद मन्त्रों में शब्दशक्तिका रहस्य अन्तर्निहित होता है । ग्रहगतियोंके परिवर्तनानुसार नाना - नक्षत्रोंसे

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४६० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) यज्ञोंका जो सम्वन्ध होता है, वर्तमान वैज्ञानिक उस मुहूर्त - विशेषके विज्ञानकी ओर एक क्षण के लिए भी विचार करनेका कष्ट नहीं उठाते । हविके धूमके प्रभावका भी विश्लेषण करना चाहिये । ऐटम-बमके धुएंके विषैले प्रभावने यह सिद्ध कर दिया है कि धूम कितनी दूर तक फैलता है । तब यज्ञकी अभिमन्त्रित अग्निका धूम भी अपनी सुगन्धसे व्यापक वातावरणपर अपने व्यापक प्रभावको क्यों न करेगा? वर्तमान विश्वका समस्त वायुमण्डल लाखों कारखानोंकी चिमनियोंके विषाक्त धूमसे परिपूर्ण हो रहा है । अपनी भौतिक आवश्यकताओंको लोलुपता में आजका कोई भी व्यक्ति इस बातका परीक्षण नहीं करता कि — इस धूमका हमारी वर्षा, हमारे अन्न, हमारे जल और हमारे मस्तिष्कपर कैसा प्रभाव हो रहा है? इन धूमके प्रभावके नाशक यज्ञ - धूम यदि नहीं फैलाये जायेंगे; तो हमारी मस्तिष्क- शक्ति विकसित होनेके स्थान विष व्याप्त होती जावेगी और विवादों, युद्धों एवं महायुद्धोंके करनेवाली निष्पन्न होती जावेगी । यज्ञ - धूमसे ही सम्पन्न हुई वर्षा पृथ्वीके प्रत्येक पदार्थ में एक विशेष गुणकी आधायक सिद्ध हो सकती है । ' उदिते जुहोति, अनुदिते जुहोति ' इन विकल्पोंमें तारतम्य, उन धूमादिकी गतिके अन्तरका ज्ञान यन्त्रोंकी सहायतासे हो सकता है । यज्ञ - विषयवाले वेदमें वेदाङ्ग ज्यौतिषकी उपयोगिता यही है कि - जिससे ऋतु - परीक्षणके अनुसार भिन्न - भिन्न प्रकारकी

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यज्ञका वैज्ञानिक महत्त्व ४६१ कालगतियोंका परीक्षण हो कि किस कालमें कौनसा यज्ञ और कौनसी सामग्री विशेष फलदायक हो सकती है? इस प्रकार ग्रहगतिके अनुसार होनेवाले अनेकों परिवर्तन भी परीक्षणीय होते हैं । यज्ञ- द्वारा ' अपूर्व की उत्पत्ति शास्त्रकार बताते हैं, परन्तु श्रद्धा एवं विश्वाससे शून्य वर्तमान युग उस सिद्धान्तका ज्ञान नहीं कर सकता । उन लोगोंको कालकी त्रिकालाबाध्य - परिस्थिति. केवल भौतिक दृष्टिसे समझमें नहीं आ सकती । मन्त्रोंके अशुद्ध उच्चारणमें तथा कुण्ड - मण्डपादिके निर्माण में प्रमाद होनेसे भी फलकी विपरीतता वा निष्फलता हो सकती है । एक - एक अक्षरके उच्चारण से पृथक् - पृथक् भौतिक परिवर्तन वा परिणाम होते हैं । वैज्ञानिक जिस प्रकार संगीत - लहरीके भिन्न - भिन्न प्रभावोंका परिणाम पाते हैं;. वैसे ही याज्ञिक मन्त्रोंके उदात्तादि - स्वरोंकी विशेषताएँ भी होती हैं; जिनका विश्लेषण हमारे ऋषि - मुनियोंने किया था । उन्होंने यह निरीक्षण करके ही तो कहा था कि - स्वर आदिकी थोड़ी त्रुटि रह जाने से वृत्रासुरवधकाण्ड हो जाया करते हैं; अतः यज्ञके मन्त्रो-चारण में विशेष शुद्धता अपेक्षित होती है । नानाप्रकारके पदार्थोंके द्वारा जो आहुति दी जाती है; उन पदार्थोंके सम्मिश्रणसे विशेषताएँ भी अवश्य होती हैं । इस प्रकार विविध पशुओंकी आहुति द्वारा भी विविध परिणाम प्रतीत हो सकते हैं; परन्तु कलियुग में कुछ हानि समझकर ऐसे विधानोंको रोका गया है ।

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४६२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) इस प्रकार यदि हम यज्ञसे वर्षा विज्ञान पूरी तरह समझ लें; तो हमारी अन्नादिकी समस्याएँ सहज में ही सुलझ सकती हैं । यज्ञोंकी प्रगतिकेलिए यज्ञसे सम्बन्ध रखनेवाले समस्त कालज्ञान, मन्त्रज्ञान, स्वरज्ञान, हवनसामग्री - विज्ञान, तत्तद्यज्ञोपयुक्त देव भूर्ति-उपासना आदि ज्ञानों और साधनों को भी सुसज्जित रखना चाहिये । .. फलतः यज्ञकी जो महिमा सनातनधर्मी शास्त्रों में थाई है, वह निरुपपत्तिक नहीं है । यज्ञसे वेदका सम्बन्ध है, अतः यज्ञमें वेदमन्त्र भी पढ़े जाते हैं । इसलिए वेदमें अग्निदेवतावाले: मन्त्र भी बहुत हैं । वेदका विषय यज्ञ है - इस विषय में हम ' ब्राहाण-भाग भी वेद है? इस निबन्ध में बहुत से प्रमाण अग्रिम पुष्प में उपस्थित करेंगे । पर कई आर्यसमाजी इसका विरोध करते हैं; इसलिए कि अग्निकी पूजा मूर्तिपूजा सिद्ध हो जाती है; और यज्ञ वेदका विषय होनेसे सनातनधर्मप्रोक्त याज्ञिक - कर्मकाण्ड फिर वैदिक सिद्ध हो जाता है, पर वैदिकम्मन्योंको यह विरोध शोभित नहीं होता, क्योंकि - वेद स्वयं अपना विषय यज्ञ बताता है, उसीमें उसका अभिनिवेश है । इसका प्रमाण यह है कि वेदों में यज्ञ - वर्णनपरक जितने मन्त्र हैं, उतने अन्य किसी विषयपर नहीं । निघण्टुमें यज्ञके यज्ञ १, वेन २, अध्वर ३, मेघ ४, विदथ ५, नार्य ६, सवन ७; होत्रा ८, इष्टि ६, देवताता १०, मखं ११, विष्णु- १२, इन्दु. १३, प्रजापति १४, धर्म १५ यह पन्द्रह नाम आये हैं । इनमें केवल ' यज्ञ ' शब्द और यज - धातु भी ले ली जाय; तो उससे भी वेदका अधिकांश भरा पड़ा है । आर्यसमाजके स्वा ० विश्वेश्वरानन्द-