सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 501–510

सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 501–510

पृष्ठ 501

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श्री तुलसीपूजन - विज्ञान ४७३ हैं; वहाँ मानसिक एवं आत्मिक लाभ भी होते हैं - यह बात स्वयं जानी जा सकती है । ( ४१ ) श्रीतुलसी पूजन - विज्ञान । ( क ) चरणामृतमें तुलसीदलका उपयोग बता चुके हैं; अतः यहाँ तुलसीके विज्ञान पर लिखना भी अवसर प्राप्त है । हिन्दु जातिके आचार - विचारों पर ध्यान देनेसे प्रतीत होता है कि —उसकी सभी रीतियाँ वा रस्में वैज्ञानिक तत्त्वों से ओत - प्रोत होती है । ज्यों - ज्यों सूक्ष्म अनुसन्धान किया जाता है; त्यों - त्यों यह सिद्ध होता जा रहा . है । यह ठीक है कि अभी उसकी बहुत रीति - रस्मोंका रहस्य नहीं खुला, परन्तु यह हम डंके की चोट घोषणा करते हैं कि— ज्यों - ज्यों गवेषणाएँ जारी रहेंगी, सनातनधर्मकी रीतियाँ कसौटी पर खरे सुवर्णकी भांति सत्य - स्वरूप सिद्ध होगी; पर-T वाह ऐ भारतवर्ष!!! तेरे व्यक्ति आजकल परप्रत्यय - नेयबुद्धि हो रहे हैं, यह बहुत बड़े खेदका विषय है । यह लोग अपने धार्मिक शाखों पर श्रद्धा नहीं करते, अपने पूर्वजों पर विश्वास नहीं करते, अपने धर्माचार्योंको नहीं गिनते, अपने धार्मिक नेताओंकी नहीं सुनते, परन्तु समुद्र - पार ठहरे हुए पाश्चात्य विद्वानोंको ही अपना गुरु मानते हैं 1 । वे लोग जिसकी प्रशंसा करें, यह भी उसी की प्रशंसा करते हैं । वे जिस वस्तुकी निन्दा करें, यह भी उसीकी निन्दा करते हैं । वे पाश्चात्य विद्वान् जैसी आज्ञा करें, जैसे चश्मेसे देखनेका आदेश दें, यह अपने आपको वैदिक माननेवाले भारतीय

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) भी वैसे ही देखते हैं, वैसे ही तत्तद् - वस्तुका स्वरूप समझते हैं-ऐसा बुद्धिका दिवालियापन दूसरे देशों में प्रायः नहीं देखा जाता । जब पाश्चात्य विद्वानोंने वेदोंकी प्रशंसा की, तब इन्होंने भी मुक्तकण्ठसे इनकी प्रशंसा आरम्भ कर दी । जब उन्होंने भगवद्-गीताकी मुक्तकण्ठसे स्तुति की, उपनिषदोंको सर्वोच्च - साहित्य माना, तब यह भी वैसा कहने में पीछे क्यों हटें? जब उन्हीं पाश्चात्योंने पुराणोंकी कुछ अंशों में निन्दा की, तथा कुछ अंशों में स्तुति; तब उनके अनुयायी यह भारतीय भी उन पर अनुकूल - प्रतिकूल दृष्टिकोण क्यों न रखें? उन्होंने जब पूर्ण युवति लड़कियोंका विवाह आदिष्ट किया, तब यह भी वैसा क्यों न आचरण करें?? क्यों न शास्त्रसे बलात् वैसा दिखलावें? उन्होंने विधवा - विवाह एवं विवा-होच्छेद यदि जारी किया; तो यह लोग भी वैसा क्यों न स्वीकार करें? उन्होंने हैट - बूट आदि धारण किये; तव इन्हें भी इसमें शतशः लाभ दृष्टिगोचर होने लगे । जब उन्होंने अंग्रेजी भाषाके प्रचारक विद्यालय खोले, तब यह भी पीछे क्यों रहें? उन्होंने छुआछूत के सिद्धान्तकी अवहेलना की, यह भी वैसा क्यों न करें? वे मूर्तिपूजापर उपहास करते हैं - यह भी वैसे ही करते हैं । जब. उन्होंने कहीं आयुर्वेदकी स्तुति की, इन्होंने भी उधर ध्यान दिया । नहीं तो यह लोग भी पाश्चात्य - चिकित्सा प्रणालीको ही सर्वश्रेष्ठ मानते रहे । फलत: - प्रभु जो कहें, जो मानें, इन्हें भी वही करना और वही मानना है । इनके सामने यदि हम अपने प्राचीन सिद्धान्तोंको

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श्रीतुलसीपूजन - विज्ञान -४७५ शास्त्रीय प्रमाणोंसे रखें, तो यह लोग देखते ही नहीं, या उनके सुनने में कान बन्द ही कर लिया करते हैं । तब अगत्या हमें भी इनके सामने वह पाश्चात्योंकी ही गवेषणा रखनी पड़ती है । पहले यही लोग हमारे ग्रन्थोंमें लिखे होनेपर भी वृक्षों वा पौधों में जीव नहीं मानते थे, वृक्ष - पूजक धार्मिकोंको जड़ - पूजक अतएव जड़ कहा करते थे । जव पाश्चात्य विज्ञान पढ़े हुए श्री जगदीशचन्द्र वसुने यह प्रत्यक्ष दिखला दिया, तब यह चुप हुए । आजसे कुछ वर्ष पूर्व तुलसीके सम्बन्ध में भी इन लोगोंकी भ्रान्त धारणा थी । यही लोग तुलसी रखनेपर वा उसके पूजनपर सनातनधर्मियों पर हंसते थे, पर अब पाश्चात्य विद्वानोंके अनुसन्धानोंपर इनका ध्यान पड़ा । अब इस विषयमें विवाद प्रायः नहीं होते । यह याद रखनेकी वात है कि हमारे पूर्वज साक्षात् ऐहिक कारणोंसे तुलसीके पुजारी नहीं बने, किन्तु पारलौकिक पुण्य आदि कारणोंसे । पारलौकिक वस्तु ऐहिक लाभप्रद भी सिद्ध हुआ करती है । अतः आजकी जनताके समक्ष हमें ऐहिक लाभ रखने पड़ते हैं, नहीं तो यह लोग ध्यान ही नहीं देते । हमारे पूर्वज आमुष्मिक - लाभोंको मुख्य - प्रयोजनमें रखते थे और ऐहिक लाभोंको अवान्तर प्रयोजनमें, पर आजकलकी पश्चिमाभिमुख जनता परलोक में विश्वास नहीं रखती, अतः ऐहिक लाभोंको ही मुख्य उद्देश्य मानती है, तब सनातनधर्म - सम्मत वस्तुओंके महत्त्व इनके हृदयमें स्थिर करनेकेलिए हम भी तुलसीके ऐहिक प्रयोजन दिखलाते हैं । वैष्णव - धर्ममें तुलसीके बिना कोई कार्य सम्पन्न नहीं होता, पर

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४७६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) बीसवीं शताब्दी के बहुत से व्यक्तियोंके हाथमें यदि कोई भक्त तुलसी दल रख दे, तो यह उसे मुखमें डालनेके स्थान उसे उसी क्षण फेंक देते हैं, क्योंकि यह प्राचीनोंसे इष्ट सभी वस्तुओं से घृणा करते हैं, पर यदि यह उसके गुण जान लें, तो तुलसीका आदर करें । अव तो आर्यसमाज मन्दिरों में भी तुलसी लगाई है । अहह! प्राचीन समय कैसा था जब कि भारतीय आधुनिक-रोग - चक्र में निगृहीत न होकर सुख - शान्ति से अपना जीवन बिताते थे । आज क्या होगया है? आज भारत देश भी वही है, जो प्राचीन युग में था । वे ही भारतकी सन्तानें हैं । इसमें क्या अन्तर आगया? पाठक सावधानता से विचारें, उन्हें उत्तर मिल जायगा । वे ही भारतकी सन्तानें प्राचीन रीति - नीति आदि सभी कुछ छोड़कर पाश्चात्य सभ्यता में रंगकर नवीन व्याधियोंसे आक्रान्त होकर प्रतिवर्ष भारतवर्षको सरायकी भांति समय में छोड़कर परलोकको सिधार जाती हैं — यह खेद की बात है । आज रोग प्रारम्भ होते ही लोग राजकीय हस्पतालों में जाना चाहते हैं, वहाँकी अंग्रेजी दवाई पीते और अत्यन्त प्रसन्नता प्रकट करते हैं । वाह री अंग्रेजी दवाई! तेरी प्रशंसामें हमारी लेखनी भी असमर्थ है । अन्धपरम्परामें लगे हुए भारतीय मनुष्य यह सोचते ही नहीं कि अंग्रेजी दवाई हमारे देशकी जल- वायुमें परिणाम-हिताधायक प्रभाव नहीं डाल सकती; और उसके सेवनसे हमारे धर्मकी हानि होगी; क्योंकि - उस दवाई में मद्य आदि अपवित्र

पृष्ठ 505

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श्रीतुलसीपूजन - विज्ञान ४७७ पदार्थों का भी कुछ अंश रहता है । ऐ भारतीयो, आज भी समय है, संभल जाओ, अपनी विद्या-कलाको भुलाकर दूसरोंका मुख क्यों देख रहे हो? पारलौकिक पुण्य देनेवाली और ऐहिक स्वास्थ्य देनेवाली ओषधियाँ आपके निकट हैं; पर आप उन्हें देखते -भालते नहीं । घरमें प्राप्त हुए अतिथिको छोड़कर आप बाहरी अतिथियोंकी ढूढ़में लगे हुए हो । देखो, ' तुलसी ' किसीसे छिपी हुई नहीं | बच्चेसे लेकर बूढ़े तक उसे सभी जानते हैं । उसमें बहुतसे गुण हैं । प्राचीन लोग इसे बड़ी श्रद्धासे पूजते थे । शास्त्रोंमें इसकेलिए कहा है- ' तुलसी - काननं चैव गृहे यस्यावतिष्ठते । तद्गृहं तीर्थभूतं हि नायान्ति यमकिङ्कराः तुलसी-विपिनस्यापि समन्तात् पावनं स्थलम् । क्रोशमात्रं भवत्येव गांगेयेनेव चाम्भसा ' । यहाँ पर तुलसीसे मृत्यु - बाधा दूर होना बताया है । उसकी गन्धका प्रभाव एक कोस तक रहा करता है । जब इससे रोगोंकी निवृत्ति हो जाती है; तब यमकी बाधा तो हटी ही । रोग ही तो यमकिङ्कररूपमें आते हैं । वैज्ञानिकोंने यह स्वीकार किया है कि — तुलसीके संसर्गसे सुवासित वायु शुद्ध रहती है । मलेरिया आदिके विषैले कृमियोंके प्रभावको तुलसी नष्ट करती है । साधारण-ज्वर में तुलसीपत्र और कालीमिर्चको मिलाकर उसके क्वाथके पीनेसे ज्वर नष्ट हो जाता है । मरणकी निकटतामें तुलसी - मिश्रित गङ्गाजल पिलाया जाता है, जिससे आत्मा पवित्र होवे और सुखशान्ति से परलोकको प्राप्त हो । इसीलिए ब्राह्मणादि तुलसीकी श्रद्धापूर्वक

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४७८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) अर्चना करते हैं । सम्मान इसका ऐसा होता है कि कार्तिक मास में तो उसकी आरती एवं परिक्रमा भी की जाती है । हमारे पूर्वज इस रसायन - ओषधिके लाभोंसे परिचित होकर इसे प्रत्येक देवस्थान वा घरमें इसके रोपण के लिए प्रेरणा करते थे । परन्तु हमारे ही देशी बाबू सनातन धर्मके विरोधी इसकी पूजा करनेपर उपहास करते थे । जब वैज्ञानिकोंने इसके गुणोंका अनु-सन्धान किया; तब यह परप्रत्ययनेय - बुद्धि लोग चुप हुए । ठीक है - ' गुणाः पूजास्थानं गुणिषु न च लिंगं नच वयः ' । सनातनधर्मी लोग ' अभिमानिव्यपदेशात् ' ( वेदान्त ०२।१५ ) उन उन विभूतियों में परमात्मा की विशिष्ट सत्ता मानकर उनकी पूजामें लगते थे । इसमें कोई उपहासकी बात नहीं । सम्मान से ही तो उसमें श्रद्धा होती है । श्रद्धासे उसकी रक्षा होती है । रक्षासे उसका उपयोग होता है । तुलसीको प्रत्येक घरमें रोपना चाहिये । विषाक्त और विकृत वायु इसके प्रभावसे विलीन होकर स्वच्छ हो जाती है । मच्छर इसकी गन्धसे भाग जाते हैं । सब प्रकारके ज्वरोंको हटानेके लिये तुलसी अव्यर्थ औषध है । योग्य वैद्यके निरीक्षण में तुलसीके उपयोगसे राजयक्ष्माके रोगी भी पूर्ण स्वास्थ्य लाभ करते हैं । स्तन-पीनेवाले बच्चेसे लेकर बूढ़े तक यह समान लाभ देती है । प्राचीनकाल में तुलसीके सेनेटोरियम ( स्वास्थ्यगृह ) बनाये जाते थे । उस भवनका फर्श और दीवारें तुलसीके नीचेकी मट्टीसे लीपे जाते थे, और वहाँ रोगी रखे जाते थे, जिससे वहाँ रोगके कीटाणुओं का प्रवेश न होनेसे, और तुलसीके उपचारसे रोगी

पृष्ठ 507

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श्रीतुलसी पूजन - विज्ञान ४७६ शीघ्र स्वस्थ हो जाते थे । जिन रोगियोंके घरसे दूर होनेके कारण नर्मदा वा गङ्गा के किनारे ठहरकर स्वास्थ्यके सुधारकी सुविधा नहीं थी; वे तुलसी - वनों में ठहरकर अपने स्वास्थ्यको प्राप्त होते थे । उनको इस प्रकारका लाभ होता था, जैसा कि गङ्गा आदि के किनारे पर रहकर हुआ करता है । तुलसी, भाषण - दर्शन आदि सभी शक्तियोंको स्थिर करनेवाली है । तुलसीका सेवन शरीरमें सञ्चित मलोंको दूर कर दिया करता है, जिससे प्रत्येक अवयव पवित्र होता है । तुलसीके काष्ठका चन्दनकी भांति माथेमें लेप करने से परम्परासे आये हुए रोग भी रुक जाते हैं । दूषित जल शोधनार्थ तुलसीपत्रोंको जल में डाला जाता है । तुलसी से कफ हटता है, मूत्रावरोध दूर होता है, मलेरिया नष्ट होता है, पाचन - क्रिया सम्पन्न होती है, भीतरी विष निकल जाता है । रक्तकी शुद्धि होती है । जलन नष्ट होती है । श्वास, निमोनिया, शीत - ज्वर, मूत्र - विकार में तुलसी अतीव गुणकारी है । दैनिक इसका सेवन करने से वर्षा वा शरद् ऋतुमें मलेरिया की, और गर्मियों में लू आदि लगने की आशङ्का नहीं रह जाती । इससे अजीर्ण हटता है 1 । कफके जमनेसे पसलीमें होनेवाली पीड़ाकी तो यह · अचूक ओषधि है । तुलसीके बहुत से भेद होते हैं - उसकी परीक्षा पत्तोंसे होती है । प्रधान भेद दो होते हैं, सफेद और काली । सफेदको राम-तुलसी और कालीको कृष्ण -तुलसी कहते हैं । कृष्ण -तुलसी में अधिक गुण होते हैं । यह उष्ण है, कफघ्न है, तीक्ष्ण है, दन्तशूल

पृष्ठ 508

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४८० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) को दूर करती है, हृदयको लाभ देती है, उदाग्निको प्रदीप्त करती है । वायु, श्वास, उदरके कृमि, कै ( वमन ), शूल, कुष्ठ, मूत्रकृच्छ, विष, रक्तदोष, ज्वर आदिको नाशक है, आरोग्य वर्धक है । विशेष अनुपानोंसे तुलसी द्वारा १ शीतज्वर, २ विषम ज्वर, ३ श्रागन्तुक ज्वर, ४ प्यास, ५ पित्तदाह, ६ पसलीका दर्द, ७ मूर्च्छा, ८ कानका दर्द, ६ जुकाम, १० प्रमेह, ११ रतौन्धी, १२ दांत का दर्द, १३ बच्चोंका बुखार, १४ बच्चोंका पेट बढ़ना, १५ बच्चोंका दमा, १६ अग्निकी मन्दता, १७ मूत्रदाह, १८ रक्तातिसार, १६ अरुचि, २० वलगमी खाँसी, २१ इवेत कुष्ट, २२ कीड़े, २३ गजकर्ण - कुष्ठ, २४ जख्म, २५ विष, २६ बिच्छूका डंक, २७ स्त्रीका वन्ध्यात्व, २८ प्रदर, २६ स्त्रियोंकी दुग्धशुद्धि, ३० बालकोंका वमन एवम् अतिसार, ३१ खुजली, ३२ चूहेका काटना, ३३ उन्माद, ३४ दन्तकी त्वचाके छाले, ३५ जिगरकी तकलीफ, ३६ तिल्ली बढ़ना, ३७ ववासीर, ३८ सर्प - विष, ३६ ततैयाका डंक, ४० प्लेग, इत्यादि २०० रोगोंमें पूर्ण लाभ होता है । राजयक्ष्माकी प्रथमावस्था में भी इसके सेवन से रोग आगे नहीं बढ़ता । दादमें तुलसीके पत्तोंके रगड़ने से लाभ होता है । सूखे तुलसीके पत्तोंकी हुलाससे जुकाम वा सिर - दर्द जाता रहता है । चाय पीनेका रिवाज़ सा चल पड़ा है, जो बहुत हानिकारक है; पर तुलसीके सूखे पत्तोंकी चाय से - जिसमें ग्राम पीपल के सूखे * इसपर भक्त रामशरणदासजीकी ' चाय और तम्बाकू ' - पुस्तक पिलखुआ ( मेरठ ) से मंगाइये ।

पृष्ठ 509

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श्रीतुलसी पूजन - विज्ञान ४८१ पत्तोंको तथा मजीठ, लौंग, कालीमिर्च, इलायची मिलाकर जौ कूट दें; तो इससे रक्तविकार और वात, पित्तकी व्याधि दूर हो जाती है । तुलसीकाष्ठकी माला गलेमें पहननेसे गण्डमाला रोग नहीं होता । इसकी जड़को पत्थरपर घिसकर काजलकी भांति आँखों में लगानेसे जाला, धुन्ध, रतौंधी आदि नेत्र रोग नष्ट हो जाते हैं । एक तोला काली मिर्च लेकर १६ तुलसीके पत्तोंको घिसकर कालीमिर्च इतनी तुलसीकी वटी ( गोली ) बना ली जावे और उन्हें सुखाकर शीशी में रख दिया जावे । एक गोलीसे तीन गोली तक आयुके अनुसार दी जावे; तो दुःसाध्य रोग भी दूर हो जाता है । कुछ गर्म करके पिलाने से मल साफ होनेसे पेट ठीक हो जाता है । तुलसीकी चाय दूध - मिशरी मिलाकर पीनेसे सुस्ती, थकावट, सर्दी, खाँसी - जुकाम आदि दूर हो जाते हैं । चायसे होनेवाली हानियाँ भी नहीं होती । तुलसी घरका वैद्य है । इसके घरमें रहने से घर में रहनेवाली स्त्रीको कोई वेदना, कोई प्रसूति रोग नहीं होता, घरकी वायु शुद्ध रहती है, पर्देवाली स्त्रियोंके स्वास्थ्य में इसके घरमें होनेपर कोई हानि नहीं पहुँचती । मलेरियाके घातक कीटाणु इसकी सुवासित - वायुमें नहीं रह पाते । मच्छर भी वहां नहीं रह पाते । . तुलसीके पत्ते के रसको चूने के पानी में मिलाकर मुहमें लगाने से मुहासे, झांई आदिको लाभ पहुँचता है । इसके लेपसे त्वचा नर्म होती है । समस्त चर्म रोगोंके लिए तुलसी एक अचूक औषधि है । तुलसीकी जड़के चूर्णको ताम्बूलके साथ सेवन करनेसे वीर्य-३१ स ० ध ०

पृष्ठ 510

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४८२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) स्तम्भन होता है । ध्वजभंगके रोगीको तुलसीके जड़का चूर्ण घृतके साथ सेवन करानेसे उसके शरीर में पुनः वैद्युतिक क्रिया होगी और रोग भी जाता रहेगा । तुलसीके जड़के चूर्णको अल्पपरिमाण में प्रतिदिन सेवन करनेसे स्वप्नदोष रुक जाता है । तुलसीके बोजोंको पीसकर खाँडके साथ खाने से मूत्र - सम्वन्धी रोग दूर हो जाते हुए देखे गये हैं । इससे वीर्य गाढ़ा होता है, पुरुषत्वं बढ़ता है । बङ्गालके पानके साथ तुलसीकी जड़के खानेसे शीघ्रपतन दोष दूर हो जाता है । तुलसीका तेल, साबुन बनानेके समय उसमें डाल देने से उस साबुन के लगानेसे अनेक चर्म रोग जड़से चले जाते हैं । तुलसीके पत्तों का रस शहद में मिलाकर चाटने से गलेका दर्द दूर हो जाता है । पानीमें हींग घिसकर उसमें दो बूंद तुलसीका रस डालकर दोनों नथुनोंमें सुड़कने से लकवे में आराम होता है । इसके रसके सेवनसे मिर्गी भी दूर हो जाती है! इस तुलसीमें विशेष -विद्युत्की किरणें सदैव प्रवाहित होती रहती हैं, इसमें आक्सिज़न और नाइट्रोजन गैसोंका सुन्दर मिश्रण होता है, जिससे यह रोगी के शरीर में प्राप्त हुए विजातीय द्रव्यों को भापकी भांति उड़ा देती है । यह जिस घर में हो, उसपर बिजली नहीं गिरती । इसकी गन्धसे घरमें साँप भी प्रवेश नहीं करता । इस तुलसीके गुणोंका वर्णन कहाँ तक हो सकता है? हमारे तुलसीकी पत्तियों को एक - दिनकेलिए भिगोकर ढक देना चाहिए । फिर उसे तिलके तेलमें मिलाकर गर्म करना चाहिए । पानी सूखने पर उसे छानकर वोतलमें भर लेना चाहिए । यही तुलसीका तेल है ।