सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 51–60

सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 51–60

पृष्ठ 51

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श्रीगणेशका मङ्गलाचरणं २१ ६ ' । ( ऋ. २ । १ । ३ ) ' त्वमग्ने! राजा वरुणो... त्वं मित्रो ' ( ऋ. २।१।४ ) ' त्वमग्ने! रुद्रो... त्वं पूषा ' ( ऋ. २ | १ | ६ ) इत्यादि मन्त्रोंमें अग्निको वहुत देवताओंके रूपोंवाला कहा है; वैसे यहाँ इन्द्रको गणपतिदेव में के रूपमें स्तुत किया गया है । की ( घ ) एक प्रश्न यहां प्रतिपक्षियोंका यह उपस्थित होता है कि-वक्त ' यद्यपि यहां इन्द्रको ' गणपति ' कहा गया है; तथापि सम्भव है कि — यह उस इन्द्र का अपना ही नाम हो, गजानन — गणेशवाला यह ' गणपति ' शब्द न हो । सो जब तक इन्द्रका कहीं गजाननत्व, ' वा गजके किसी चिह्नवाला होना वेद में न मिले; तब तक यहांके Cho ' गणपति ' से गजानन – गणेशके रूपका बोध कैसे होसकता है? इस पर जानना चाहिये कि – जब ' गणेशपुराण तथा गणपति-TT: उपनिषद्में वर्णित गणेशको ' गजानन ' माना जाता है, और उसका जो वहां बृहस्पतित्व, अथवा इन्द्रत्व वा रुद्रत्व कहा है; वह वेदमें से ते ने मिलता है, और स्वस्तिकको भी गणेश ही माना जाता है, वेदानुसार उसमें इन्द्र तथा बृहस्पति आदिका अंश भी आ जाता है — यह हम पूर्व बता चुके हैं; तब इन्द्र वा बृहस्पति के मन्त्र में जब गणपतिका नाम आजाय; तो समझना पड़ेगा कि यह वही गजानन - गणेश का बोधक ' गणपति ' शब्द है । तो वेदमें ' गजानन ' आदि चिह्न न मिलनेपर भी स्वयं विचार लेना पड़ता है कि - यह वही गणपति हैं, जिन्हें गणपति - उपनिषद् तथा गणेशपुराण आदिने कहा । ( ङ ) फिर भी यदि प्रतिपक्षियोंका इससे सन्तोष न हो तो फिर हम इन्द्रदेवताका ऐसा मन्त्र दिखलाते हैं; जिसमें उसे ' हस्ती ' कहा

पृष्ठ 52

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२२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) गया है । वह मन्त्र यह है- ' आ तू न इन्द्र! ' महाहस्ती दक्षिणेन ' ( ऋ ०८८११ ) इस इन्द्रके मन्त्र में उसे महाहस्ती – महाहस्तधारी कहा है । महाहस्तकी विशेषता ' हस्ती ' में होती है । यही गणेशजीका स्वरूप है । ' सामविधान ' ब्राह्मणसें ' आ तू न ' ( सामवेद पू ० २।३।३ ) इति ' सुहस्त्या ' ( साम ० पू ० ६।३।७ ) इति प्रथमषष्ठे च एषा वैनायकी नाम संहिता, एतां प्रयुञ्जन् विनायकं प्रीणाति ' यह कहकर एतदादिक मन्त्रोंको गणेशार्थक माना गया है । बौद्धग्रन्थोंमेंभी विनायकी - शक्ति का स्वरूप ' हस्ताकार - समायुक्ता ' मिलता है । अतः वेदको गणपतिभी ' गजानन ' इष्ट हैं, क्योंकि किसी भी जीवका स्वरूप उसके आनन 2 ( मुख ) से जाना जाता है, अतः ' हस्ती ' से भी ' हस्तिमुख ' का बोध हुआ । इसलिए कृष्णयजुर्वेद - मैत्रायणी संहिता में तो गणेशजीके लिए ' तत्कराटाय ' ·· हस्तिमुखाय धीमहि ' ( २६१२६ ) कहा है । करं हस्तं, शुण्डादण्डमिति यावत्, आटयति - भ्रमयतीति कराटः । इससे गजानन - गणपतिदेवका पूजन वैदिक सिद्ध हुआ । ( १० ) ' गणपति ' कोई देवविशेष वेदमें है ही नहीं ' यह कहना भी ठीक नहीं; क्योंकि - यजुर्वेदसं ० ( २३ | १ ९ ) मन्त्रका वैदिकप्रेस अजमेरकी छपी हुई यजुर्वेदसं ० में ' गणपति देवता ' लिखा है, इस प्रकार ११।१५ मन्त्रकाभी ' गणपति ' देवता लिखा है । तब गणपति देवताकी वेदमें सिद्धि होजाने से हमारे पक्षकी सिद्धि होगई । ( ११ ) ' गणेशाथर्वशीर्ष ' उपनिषदों में है । उसमें भी ' गणेश ' जीका वर्णन है । देखिये- ' ॐ नमस्ते गणपतये, त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि । गकारः पूर्वरूपम्, अकारो मध्यमरूपम्, अनुस्वारश्च

पृष्ठ 53

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श्रीगणेशका मङ्गलाचरणे २३ अन्त्यरूपम्, बिन्दुरुत्तररूपम् । ( यह गणेशके वीजमन्त्र ' गं ' के लिए कहा गया है । )... एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि । तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ' । एकदन्तं चतुर्हस्तं पाशमङ्कुशधारिणम् । अभयं वरदं हस्तैर्विभ्राणं मूषकध्वजम् । रक्तं लम्बोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम् । रक्तगन्धानुलिप्ताङ्ग रक्तपुष्पैः सुपूजितम् ।... नमो गणपतये, नमः प्रमथपतये, नमस्तेस्तु लम्बोदराय, एकदन्ताय, विघ्न-नाशिने, शिवसुताय, श्रीवरदमूर्तये नमः ' इसमें गणपति - विषयक सव सिद्धान्त स्पष्ट आगये हैं । यह उपनिषद् है । उपनिषद् ब्राह्मण-भागके अन्तर्गत हुआ करती है । ब्राह्मणभाग भी वेद होता है-यह हम अग्रिम पुष्पमें बतानेवाले हैं । यह गणेशको अनार्यदेव प्रसिद्ध करनेवाले डाक्टर श्रीसम्पूर्णानन्द जी भी मानते हैं । यह उनके शब्द हैं- ' कुछ लोग केवल संहिता - भागको वेद मानते हैं; परन्तु हम ' मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् ' की पुरानी पद्धतिको स्वीकार करते हैं, जिसके अनुसार ब्राह्मण अर्थात् आरण्यक और उपनिषद् भी वेदके अन्तर्गत हैं ' ( गणेश पृ ० १ ) जब ऐसी बात है; तब गणपतिदेव स्वयं वैदिक देवता सिद्ध हो गये; क्योंकि मन्त्रभागकी संहिता ११३१ हैं, उतने ही ब्राह्मण-भागके ग्रन्थ हैं । प्रायः उतने ही आरण्यक तथा उतनी ही उपनिषदें हैं । इसलिए ' मुक्तिकोपनिषद् ' में लिखा है — ' एकैकस्या हि होती शाखाया एकैकोपनिषन्मता ' । ( १ । १४ ) । उपनिषदें १०८ वा २५० नहीं होती; किन्तु ६०८ तो उपलब्ध हैं । सारी उपनिषदे तो ११३१ होती हैं,, ११३१ मन्त्रोपनिषत्, ११३१ ब्राह्मणोपनिषत् । आरण्यक

पृष्ठ 54

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) भी इतने ही होते हैं । वादिप्रतिवादिमान्य श्रीयास्कने भी ' यस्मात्परं नापरमस्ति ' ( निरु ० २ | ३ | १ ) यहां ' श्वेताश्वतरोपनिषत् ' ( ३६ ) की इस कण्डिकाको निगम कहा है । श्रीयास्क ' निगम ' शब्द वेद-प्रमाणके लिए देते हैं-- यह बात विज्ञ - समाज में प्रसिद्ध है । तब उपनिषत्प्रोक्त गणपति - पूजा भी वैदिक सिद्ध होगई । मन्त्रभागके संकेत तो पहले हम दे ही चुके हैं । ( ख ) भाषाभेदके आधार से उक्त उपनिषद्को अर्वाचीन बताना ठीक न होगा, यह पाश्चात्य दृष्टिकोण है । इस दृष्टि से तो ऋग्वेद के १ म तथा १० म मण्डल भाषाभेदवश अन्य मण्डलोंकी अपेक्षा अर्वाचीन सिद्ध हो जाते हैं । अथर्ववेद तो उससे भी अर्वाचीन हो जावेगा । श्रीसम्पूर्णानन्दजी उसमें भी कहीं कहीं आधुनिकताका सन्देह करते हैं; पर निश्चय नहीं करते; तव उक्त उपनिषद्की आधुनिकताका भी निश्चय नहीं कर लेना चाहिये । मेरे सं ० १ ९८१-८२ आदिकी तथा आजकलकी मेरी संस्कृत भाषा के शैलीभेदसे भी दो दीनानाथ -' शर्मा सिद्ध किये जा सकते हैं; पर जैसे यह असंगत होगा; वैसे वह दृष्टि भी विषम है । एक ही लेखकका भी एक काल में भी भाषा-भेद हो जाना अस्वाभाविक नहीं । ( ग ) ' अथर्वशिराः ' को महाभारत ( शान्तिपर्व ३३८ | ३ ) तथा . ' शंखस्मृति ' ( ११।४ ) आदिमें स्मरण किया गया है । श्रीशंकराचार्य के भाष्य होनेसे ही यदि १० उपनिषदोंको प्रमाण माना जावे; तो उनसे अव्याख्यात मन्त्रसंहिता तथा ब्राह्मण एवं अन्य उपनिषद् अमुख्य वा अप्रमाण हो जाएंगे । फिर उन्होंने अपनेसे ' अव्याख्यात

पृष्ठ 55

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श्रीगणेशका मङ्गलाचरण २१ जावाल, कैवल्य, मुक्तिका, श्वेताश्वतर ' आदि उपनिषदोंके प्रसारण अपने ब्रह्मसूत्रके भाष्य में क्यों दिये? यदि आचार्य शंकर गणेशको न मानते तो शास्त्रार्थ में गाणपत्यों से कह देते किं - गणेश हैं ही नहीं, वा वेद नहीं; पर उन्होंने तो उसे माना है और कहा है - ' प्रतिपादितं ब्रह्मैव गणपतिरिति... रुद्रपुत्रो गणपतिरिति चाप्य-विरोधः; अंशाशिनोरभेदात् । अतो देवकार्यार्थं जगन्निर्मारणादिषु विघ्नकर्ता, ( आनंद गिरिंकृत शंकर दिग्विजय में देखिये ) । प्रतिपक्षियों से मान्य उन्हीं श्रीशंकराचार्य स्वामीने भी जब अपने सुब्रह्मण्यभुजङ्ग-स्तोत्र के आरम्भ में ' सदा बालरूपापि विघ्नादिहन्त्री महादन्ति - वक्त्रापि पंचास्यमान्या । विधीन्द्रादिमृग्या गणेशाभिधा मे विधत्तां श्रियं कापि कारुण्यमूर्तिः ' इस प्रकार गणेशजीसे प्रार्थना की है, इस प्रकार उनके ‘ गणेशपंचरत्न ' ' गणेशाष्टक और वरदगणेशस्तोत्र प्रसिद्ध हैं । तव आचार्यशङ्करकी दृष्टिमें ' गणपत्युपनिषद् ' उनसे अव्याख्यात होनेपर भी अप्रमाण नहीं हो सकती । १ ९ ३१ संहिताओं तथा इतने ही ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषदोंको बिना देखे ही गणपति-देवको अवैदिक कह देना साहसमात्र है । वेदमन्त्रोंमें तथा अनुक्रमणि-काओं में जो देवता कहे हैं; वे सब वैदिक देवता हैं । निरुक्तमें कहा गया है — ' यत्काम ऋषिर्यस्यां देवतायामार्थपत्यमिच्छन् स्तुतिं प्रयुङ्क्त े , तद्दैवतः स मन्त्रो भवति ' ( ७११।४ ) इसी कारण ‘ निरुक्त ' में तीन देवता बताकर शेष देवता इन्हीं तीनमें अन्तभूत कर दिये हैं । यदि ऐसा है, तो देखना चाहिये कि किसी मन्त्रका देवता ' गणपति ' लिखा गया है या नहीं?

पृष्ठ 56

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२६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) ( १२ ) ‘ रुद्रस्य गाणपत्यं ' ( यजु ० वा ० सं ० ११।१५ ) इस मन्त्रका देवता ' गणपति ' है । ' गणानां त्वा गणपतिहवामहे ' ( यजुः २३।११ ) यहां भी ' गणपति ' देवता है; यह अजमेरके वैदिक यन्त्रालयकी यजुर्वेद - संहितामें देखा जा सकता है । ' अश्वपत्यादिभ्यश्च ' ( ४ | ११८४ ) इस प्रकार वेदाङ्ग पारिणनिव्याकरण से सिद्ध ' गाणपतो ( गणपतिर्देवता अस्य मन्त्रस्य इति ) मन्त्रः ' यह उदाहरण भी गणपतिको किसी वेदके मन्त्रका देवता बताकर उन्हें वैदिक देवता बता रहा है । शेष प्रश्न यह है कि वे तो मेधके लिए उपस्थित अवको ' गणपति ' कहा है; इसपर जानना चाहिए कि उस समय अश्व आलब्ध ( मृत ) है; तब मृतकको गणपति, प्रियपति निधिपति एवं वसुरूप कैसे कहा जा सकता है? क्या मरे घोड़ेकी पुरुष प्रार्थना कर सकता है और वह उन कामनाओं को पूर्ण कर सकता है? उस अश्वको वहां यज्ञियदेव गणपति के रूपमें आहूत किया जाता है, और पूजा जाता है उसीसे ही प्रार्थना की जाती है I । इसे हम अन्यत्र स्पष्ट करेंगे । अन्य देवताके मन्त्रमें अन्य देवताके वर्णनको श्रीयास्क ( निरुक्त १/२०१३ ) ' नैघण्टुक ' कहते हैं; सो इसी रीति से इस मन्त्र में अश्वमें गणपतिको आहूत किया जाता है । तभी श्रीकात्यायन मुनिने अश्वमेधमें विनियुक्त इस मन्त्रका अपने ' यजुर्विधान ' में ‘ गणानांत्वा ’ •. • वक्रतुण्डस्य एतानि ' ( ४ ) यह कहकर इसे गणपति देवत्य माना है । तब गणपति वैदिक - देव सिद्ध होगये । ( ख ) इसी कारण ऋ ० सं ० में ' गणपतिं हवामहे ' ( २।२३।१ ) गणपतिको ब्रह्मणस्पति रूपमें स्तुत किया गया है; अवको नहीं ।

पृष्ठ 57

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श्रीगणेशका मङ्गलाचरण २७ ' नमो गणेभ्यो गणपतिभ्यश्च ' ( यजु ० १६ २५ ) यहाँ गणपतिदेवका रुद्ररूपमें वर्णन है, अश्वका नहीं । बहुवचन यहांपर पूजार्थक है । ( ग ) वेदमें केवल ' गणपति का वर्णन ही नहीं; बल्कि उसके लिए हवि देना भी कहा है- जैसे कि ' वसुभ्यः स्वाहा, रुद्रेभ्यः स्वाहा, आदित्येभ्यः स्वाहा, ( यजु ० वा ० सं ० २२/२८ ) यहां पर रुद्र यदि देवताओंको हवि दी गई है । फिर ' गणश्रिये स्वाहा, गणपतये स्वाहा, ( यजुः २२/३० ) यहां गणपति आदि देवताओंको हवि दी गई है । वैदिक यन्त्रालय अजमेरकी यजुर्वेद - संहितामें इस मन्त्रके देवता ' वस्वादयः ' लिखे हैं । इसका भाव वह हुआ कि — इस मन्त्रके देवता वसु, विवस्वान्, गणश्री और गणपति आदि पृथक् - पृथक् हैं । श्री पं ० ज्वालाप्रसादजीकी व्याख्यात यजुर्वेदसं ० में तो ' गणपत्यादयो देवता: ' यह स्पष्ट लिखा है । उवट -महीधर आदिकी यजुः सं ० में अस्वादयः असु आदि पृथक् - पृथक् देवता माने गये हैं; इन्हीं में स्थित ' गणपति ' भी एक भिन्न देवता सिद्ध होगये | ' सर्वानुक्रमसूत्र ' में यहाँ ' लिङ्गोक्ता देवताः ' बतलाया है, सो गणपति देवता पृथक् सिद्ध होगये । यहाँपर गणपति, इन्द्र ( २२ | ६ ), बृहस्पति ( २२।६ ) और रुद्र ( २२/२८ ) से पृथक गिने ग । इस प्रकार यजुर्वेदकाण्वासंहितामें भी ' गणपतये स्वाहा ' ( २४ । ४२ ) गणपति देवताको हविः आई है । इसी प्रकार यजुर्वेद - मैत्रायणीसंहिता ( ३।१२।१३ ) में भी ' गणपतये स्वाहा ' आया है । तब “ वैदिक यज्ञोंमें गणपति के नाम से आहुति देनेकी प्रथा नहीं है ". ऐसा व्याज कट गया । श्रक्षेप्ता श्रीसम्पूर्णानन्दजीने भी

पृष्ठ 58

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२८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) ' विघ्नाय विघ्ननाशाय संख्यातीताय मायिने । रुद्राय भद्ररूपाय गरणा-धिपतये नमः ' लिखकर इसी गणपतिके आगे सिर झुका दिया; उसीके लिए ' गणानां त्वा ' ( ऋ ० ) मन्त्र भी लिख दिया; तब तो हमारा पक्ष उनसे भी सिद्ध होगया । ( १३ ) गणपति अनादि देव हैं । देवोंके जब - तब अवतार भी होते हैं । तब रुद्रके विवाह में पूजित होकर भी गणपति रुद्रके पुत्र भी बन सकते हैं । इसीलिए यजुः ( ११।१५ ) में रुद्रका गणपतित्व भी दिखलाया है । इसमें कोई आश्चर्य नहीं; क्योंकि ' इतरेतर-जन्मानो भवन्ति इतरेतर - प्रकृतयः ' ( ७ | ४ | १२ ) निरुक्तके इस कथनके अनुसार देवता एक - दूसरेको भी उत्पन्न करते हैं; और एक - दूसरे की प्रकृतिको भी धारण करते हैं । ' आत्मा वै पुत्रनामासि ' ( बोधा-यनगृ ( २।१।४ ) इस कथनसे रुद्र -पिता, गणपति- पुत्र होने से दोनोंकी बातें एक - दूसरे में घट सकती हैं । वेदमें दक्षसे अदिति, और अदिति से दक्षकी उत्पत्ति बताई गई है- ' अदितेर्दक्षो अजायत, दक्षाद्वदितिः परि ' ( ऋ ० १०।७२।४ ) इसपर ' अदितेर्दक्षो अजायत, दक्षाद् अदितिः परि ' तत् कथमुप-' पद्येत समानजन्मानौ स्याताम् ' इस शङ्काका कि एक - दूसरेसे उत्पत्ति कैसे— श्रीयास्क मुनिने निरुक्त में समाधान कर दिया है-' अपि वा देवधर्मेण इतरेतरजन्मानौ स्याताम्, इतरेतरप्रकृती ' ( ११ | २३।३-४ ) कि एक - दूसरे से उत्पन्न ( प्रकट ) होना - यह देवधर्म है । " यही बात गणेश और महेशदेवके विषय में भी जान लेनी चाहिये । ( ख ) यजुर्वेदकी १०१ संहिताएँ हैं । इनमें ८६ कृष्णयजुर्वेदकी

पृष्ठ 59

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श्रीगणेशका मङ्गलाचरण २६ और १५ शुक्लकी होती हैं । इसीलिए ( ३१७ ) पाणिनिसूत्रके महा-भाष्य में श्रीपतञ्जलिने लिखा है- ' ऋषिः ( वेदः ) पठति शृणोत ग्रावाणः ' । यहां कृष्णयजुः के मन्त्रको ऋपि ( वेद ) कहा गया है । श्रीपाणिनिने भी ‘ तप्तनप् ' ( ७११४५ ) इस वैदिकसूत्र में ' कृष्णयजुः के प्रयोग ' शृणोत ' को वैदिकरूप माना है । सो यह मन्त्र ' कृष्णयजुर्वेद ' ( तै ० सं ० १ । ३ । १ । १३ । १ ) का है । इसप्रकार जब कृष्णयजुर्वेद वेद है, उसका ब्राह्मण तथा आरण्यक एवं उपनिषद् वेद हैं, तब उसमें वर्णित गणपतिदेव भी वैदिकदेवता सिद्ध होगये । कृष्णयजुर्वेदके आरण्यक एवं उपनिषद्का मन्त्र हम गणेशजीकी सिद्धिमें दे चुके । अब हम कृष्णयजुर्वेद की संहिताका मन्त्र इसपर देते हैं । वह मन्त्र यह है-' तत्कराटाय विद्महे हस्तिमुखाय धीमहि । तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ' ( २।६।१।६ ) यह कृष्णयजुर्वेद - मैत्रायणी - संहिताका मन्त्र है । करं-शुण्डाद्ण्डम् आटयति - भ्रमयतीति कराटः । यहाँ गजानन - गणेशका संहितात्मक वेदमें स्पष्ट वर्णन होने से वे वैदिकदेवता सिद्ध होगये । अब इस वेदमन्त्रको देखकर क्या किसीका साहस हो सकता है किं गणेशजीको अनार्यदेव, वा अपदेव वा अवैदिकदेव कह सके? वा उसे देव माननेवालेको वेदार्थानभिज्ञ कह सके? ( १४ ) अब वादिप्रतिवादिमान्य कृष्णयजुर्वेद तैत्तिरीयारण्यकमें भी गणेशजीका वर्णन देखें- ' तत्पुरुषाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि । ' तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ' ( १०११ ) यहाँ भी हस्तिमुख और एकदन्त गणेशजीका वर्णन स्पष्ट है । जो इसे प्रक्षिप्त मानते हैं; उनके पास

पृष्ठ 60

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३० श्रीसनातनधर्मालोक ( i ) अपने असत्याग्रहको पूर्ण करने के लिए इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय भी तो नहीं है । ( ख ) जो कि ऋग्वेदीय गणपति के मन्त्रको सायणाचार्य के कथन के अनुसार प्रतिपक्षिगण ब्रह्मणस्पतिवाचक मानते हैं; यदि उनका श्रीसायणपर इतना विश्वास है, तो प्रत्येक वेद भाष्य के आरम्भ में देखें, उसने ' वागीशाद्याः सुमनसः सर्वार्थानामुपक्रमे । यं नत्वा कृतकृत्याः स्युस्तं नमामि गजाननम्, मङ्गलाचरणभी गजाननका ही किया है | यदि वैदिक गवेषक श्रीसायण गजानन गणेशको अवैदिक देवता मानते; तो आरम्भमें उस गजाननकी स्तुति न करते । शेष रही ब्रह्मणस्पतिकी बात, सो ब्रह्मणस्पतिको ही यहाँ गणपति के रूप में स्तुत किया गया है । इसीलिए ' त्रिपुरातापिनी उपनिषत् की तृतीय कण्डिकामें ब्रह्मणस्पतिके ' गणानां त्वा ' ' सीद सादनम् ' इस मन्त्रको देकर इस मन्त्रके आदिम तथा अन्तिम अक्षरका बीजमन्त्र ' गं गणपतये नमः ' बताकर गणेशको नमस्कार कराया है । वहीं चतुर्थ कण्डिकामें फल लिखा है - ' गणानां त्वा - इति त्रैष्टुभेन पूर्वेण अध्वना गणाधिपमभ्यर्च्य गणेशत्वं प्राप्नोति ' इससे इस गणपति तथा गणेशमें स्पष्टही अभेद सिद्ध होजाता है । उपनिषत्के वेद होनेसे ( जैसेकि - अग्रिम पुष्प में हम कहनेवाले हैं ) उपनिषत्प्रोक्त संहिता- मन्त्रका विनियोगभी वैदिक सिद्ध होगया । इससे यहभी सिद्ध हुआ कि एक स्थल में विनियुक्त मन्त्रका अन्यत्र विनियोग बाधित नहीं होजाता । तब ब्रह्मणस्पतिका मन्त्र गणेशमें भी विनियुक्त होजाता है । ' एतमु एवं बृहस्पतिं मन्यन्ते, वागू हि बृहती, तस्या एष