सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 61–70

सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 61–70

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श्रीगणेशका मङ्गलाचरण ३१ पति: ( १ २ ।११ ) । इस छान्दोग्य उपनिषद्वचनके अनुसार वाणीरूप बुद्धिके पति होने से गणपतिही यौगिक बृहस्पति बने । । इसीही मन्त्र से ' गं गणपतये नमः ' यह वीजमन्त्र बनता है, ब्रह्मणस्पतिका वीज-मन्त्र ' गं ' कहीं नहीं देखा गया । ( ग ) एक देवताका नानारूपों तथा नाना नामोंसे भी वर्णन आता है, जिसमें ' माहाभाग्याद् देवताया एक आत्मा बहुधा स्तूयते ' ( निरु ० ७१४८ ) तथा ' विश्वा हि वो नमस्यानि वन्द्या नामानि देवा! उत यज्ञियानि वः ' ( ऋ ० १०६३/२ ) ' देवो देवानां गुह्यानि नामा-ऽऽविष्कृणोति ' ( ऋ ० ६६५२ ) एतदादिक प्रमाण साक्षी हैं । गणेश के ब्रह्मणस्पति होनेसेही ' गणपत्युपनिषद् ' में गणेशकेलिए ' वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि, त्वं ब्रह्मा त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्म असि, त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि ' इत्यादि कहा है । गणेशपुराण के सहस्रनामों में तो उसे ' कविं कवीनामृषभो ब्रह्मण्यो ब्रह्मणस्पतिः ' ( ४६।१४ ) स्पष्ट ही ज्येष्ठराज, ' ब्रह्मणस्पतिः ' नामसे कहा है । ( घ ) अन्य वैदिक शैली यह भी है कि - समान स्थान, समान गुण तथा समानकार्यता एवं इतरेतरप्रकृतिवश तत्तद्देवको एक - दूसरे के नामसेभी बुलाया जाता है, जैसाकि निरुक्तमें भी कहागया है-' अपि सत्त्वानां प्रकृतिभूमभिऋषयः स्तुवन्ति ' ( ७ | ४ | १० ) ' तत्र सस्थानैकत्वं सम्भोगैकत्वं च उपेक्षितव्यम् ' ( ७१५८ ) ' सम्भोगैकत्वं ' के दुर्गाचार्यके शब्दों में ' लोकेपि समानकार्यता येषां भवति, तेषा-मैक्यमित्युच्यते ' दोनों देवोंकी सम्मानकार्यताभी याद रख लेनी चाहिये, जिसमें दोनोंका एकत्व सिद्ध होता है । देवताओं में इतरेतर

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३२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) प्रकृतिभी निरुक्तमें मानी गई है, तभी तो निरुक्लकारका कई करोड़ वा कई हज़ार देवताओंका तीन संख्या में गिन लेना सङ्गत होजाता है । तब बृहस्पतिकेभी देवगुरु तथा बुद्ध्यधिष्ठाता प्रसिद्ध होने से तथा गणपतिकेभी देवगणोंके पति तथा उपनिषद्के शब्दों में ज्ञानमय अर्थात् बुद्ध्यधिष्ठाता होनेसे बृहस्पतिको गणपति रूपमेंभी स्तुत किया जा सकता है, अश्वमेध अश्व भी उसे स्तुत किया जा सकता है । ' यहाँ गणपतिका काम भी है ' । गणपतिको विघ्नदूरी -करणार्थ यज्ञस्थलमें प्रतिष्ठित न किया जावेगा, तो अन्य किसे प्रतिष्ठित किया जाएगा? एक ही गणने दक्षका यज्ञ विध्वस्त कर दिया था; तव यज्ञकी निर्विघ्नतार्थ अश्वमेध अश्वमें गणपतिभी आहूत किये जाते हैं । वे इसमें अन्यथासिद्ध नहीं, यज्ञके क्षेत्रमें हैं । ' यज्ञ ' यज धातुका रूप है । ' यज ' धातु देवताओंके पूजनमें आता है, तब इतने बड़े यज्ञ अश्वमेध में विघ्नदूरीकरणार्थ देवाधि-पति गणपतिका पूजन वा स्तुति अनिवार्य है । जैसे ' ब्रह्मणस्पति ' के मन्त्रके आदि - अन्तसे ' गम् ' यह गणेशका वीजमन्त्र निकला है, वैसे अश्वमेधाध्यायवाले ' गणानां ' ' ' गर्भधम् ' मन्त्रके आदि अन्त से भी । तब दोनों, गणेशके ही मन्त्र सिद्ध होगये, और गणपति वैदिक देव सिद्ध होगये । तब इसमें अपने प्राच्य ग्रन्थोंको न मानना और निकल्स तथा एलिसगेटी आदि पाश्चात्योंका मत मान लेना यह उनका मानसिक दास बनना है । गणपतिके पुराणोंमें विभिन्ननाम वेदमें ‘ इन्द्राय वृन्नध्ने, इन्द्राय वृत्रतुरे, इन्द्राय अंहोमुचे ' इस निरुक्त ( ७११३६ ) के कहे प्रकारसे आये हैं; उन भिन्न - भिन्न नामोंसे भिन्न-

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श्रीगणेशका मङ्गलाचरण ३३ ना भिन्न आहुति भी दी जाती है; पर इससे इन्द्र अनार्य नहीं हो जाते; य इस प्रकार इन्द्रान्तर्गंत गणेशभी पुराणों में वर्णित भिन्न नामोंसे वा I भिन्न जन्मकर्मके निरूपण से अनार्यदेव नहीं होजाते । य ( १५ ) तैत्तिरीयारण्यकमें जैसे गरुङगायत्री है, वैसे ही ' तत्पुरुषाय न विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि । तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ( १०।१ ) यह T गणेशगायत्री भी आई है । उसीमें गरुडगायत्री भी है, दुर्गागायत्री भी है, नारायणगायत्री भी । उसमें यह कहना कि ( संहिता भाग में ते सहस्रों मन्त्रोंमें दन्ति या वक्रतुण्डके नामसे एक भी मन्त्र नहीं है, और आरण्यक में जो मन्त्र आये हैं, वे कहीं नहीं जिलते, ब्राह्मणोंमें 7 वैसे ही मन्त्र होने चाहियें, जैसे संहितामें, क्योंकि ब्राह्मणमें संहिताकी ही i व्याख्या - सी होती है, यह प्रतिपक्षियोंका वचन भी व्यर्थ है । यदि इसका तात्पर्य यह है कि जैसे ' तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि, वक्रतुण्डाय धीमहि, सुवर्णपक्षाय धीमहि, कात्यायनाय क विद्महे, कन्याकुमारि धीमहि, ' नारायणाय विद्महे वासुदेवाय 1 २ न क धीमहि ' इन कृष्णयजुर्वेद - तैत्तिरीयारण्यकके मन्त्रोंका कृष्णयजुर्वेद की किसी संहितामें मिलना आवश्यक है, पर यह मन्त्र अन्य किसी भी संहितामें नहीं मिलते ' ऐसा कहना अपनी दृष्टिको असर्वतोमुखी बनाना है । कृष्णयजुर्वेदको ' मैत्रायणी - संहिता ' के दूसरे काण्ड, नवम प्रपाठक, प्रथम अनुवाकमें यही मन्त्र मिलते हैं; बल्कि वहाँ कई विशेष मन्त्र भी मिलते हैं । पाठकगण भी देखें — ' तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि । तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ' ( २ । ६ । १ । ३ ) यह . रुद्रगायत्री ‘ तद् गाङ्गौच्याय विद्महे गिरिसुताय धीमहि, तन्नो गौरी ३ स.ध.

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३४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) प्रचोदयात् ' ( ४ ) यह गौरीगायत्री ' तत्कुमाराय विद्महे कार्तिकेयाय धीमहि । तन्नः स्कन्दः प्रचोदयात् ' ( ५ ) यह कार्तिकेय - गायत्री मिली है । स्कन्द रुद्र के बड़े लड़के माने जाते हैं, गणेश छोटे, और गौरी पत्नी । अब यह सारा परिवार ही वैदिक सिद्ध होगया । अब उसी संहिता में दन्तीका मन्त्र भी देख लीजिये -' तत्कराटाय विद्महे हस्तिमुखाय धीमहि । तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ' ( २ | ६ | १ | ६ ) अब भी क्या सन्देहकी गुञ्जायश रह गई १ इस प्रकार आगे रुद्रकी अन्य विभूतियाँ भी देखिये- ' तच्चतुर्मुखाय विद्महे पद्मासनाय धीमहि । तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात् ' ( ५ ) यहाँ चतुर्मुख ब्रह्मा की ' तत् केशवाय विद्महे नारायणाय धीमहि । तन्नो विष्णुः प्रचो-दयात् ' ( ८ ) यह नारायणकी, ' तन्नो भानुः प्रचोदयात् ' ( ६ ) यह सूर्यकी ' तन्नश्चन्द्रः प्रचोदयात् ' ( १० ) ' तन्नो वह्निः प्रचोदयात् ' ( ११ ) इत्यादि बहुत - से गायत्रीमन्त्र हैं । तब आरण्यकके मन्त्रोंके मूल संहितामें मिल जानेसे कई व्यक्तियोंका पूर्वोक्त व्याज कट गया । वही दन्तीका मन्त्र नारायणोपनिषत् तथा गणपत्युपनिषत् वा गणपत्यथर्वशीर्ष आदिमें भी आया है, मिताक्षरा आदि टीकाग्रन्थों में भी उद्धृत है; तब प्रतिपक्षियोंसे आविष्कृत प्रक्षिप्तता कट गई । अभी तो ११३१ संहिताओं में कठिनता से १२-१३ ही संहिता मिलती हैं, उनमें भी जब गणेशका वर्णन स्पष्ट मिल रहा है; तब अलभ्य संहिता में पता नहीं कि गणेश विषयक सामग्री कितनी मिल सकेगी? तो बिना सारी संहिताओं के देखे ' गणपति अवैदिक देव हैं ' यह फतवा दे देना साहसमात्र है । यहाँ संहिताने स्पष्ट

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श्रीगणेशका मङ्गलाचरण?? 7 I । गणेशको हस्तिमुख बताया है । ( ख ) जोकि तैत्तिरीयारण्यकके उक्त दन्तीके मन्त्रके लिए कहा जाता है कि ' सायरणने इनको खिलमन्त्र माना है, और कहा है-' इत ऊर्ध्वं तेषु - तेषु देशेषु श्रुतिपाठा अत्यन्तविलक्षणा: ' इन बातों से अनुमान होता है यह अंश प्रक्षिप्त है, इस पर जानना चाहिये कि ' खिल ' न तो अप्रमाण ही होते हैं, और न उनका कर्ता भिन्न होता है; किन्तु ' खिल ' उसी ग्रन्थकर्ताका अनियमित संग्रह होता है । प्राजकल भी ग्रन्थकर्ता अपने ग्रन्थके अन्त में ' परिशिष्ट ' रखते हैं, वह अन्यकृत वा अप्रमाण नहीं होजाता । ऋग्वेदका परिशिष्ट भी ' ऋकू-. परिशिष्ट ' प्रसिद्ध है; इसे अप्रमाण नहीं माना जाता । ' नेज्जिह्मा-यन्तो नरकं पताम ' यह ' ऋक्परिशिष्ट ' ( ८ अष्ट ०, ६ अध्या. २ वर्ग ) का मन्त्र निरुक्तकारके द्वारा निपातप्रकरण ( १ | ११ | १ ) में तथा ' उपसंवादाशङ्कयोश्च ' ( ३ | ४ | ८ ) इस पाणिनिके छान्दस सूत्रके उदाहरणमें दिया गया है । इस प्रकार ' भद्रं वद दक्षिणतः ' इस ऋपरिशिष्ट ( २।१३।१ ) के मन्त्रको श्रीयास्कने ' तदभिवादिनी एषा ऋग् भवति ' ( ६ । ५ । १ ) कहकर इसे ऋग्वेद माना है । इससे स्पष्ट है कि - ' खिल ' प्रक्षिप्त वा अप्रमाण नहीं हुआ करते । ( ग ) जिस सायणाचार्यकी ' खिल ' कहनेके लिए दुहाई दी जाती है; उसने लिखा है- ' यथा बृहदारण्यके सप्तमाष्टमाध्यायौ ‘ खिल ' काण्डत्वेन आचार्यैरुदाहृतौ, तथा इयं नारायणीयाख्या याज्ञि-की उपनिषदपि खिलकाण्डरूपा, तल्लक्षणाक्रान्तत्वात् ' । तब क्या बृहदारण्यकत्रे ७ म ' खिल ' में आये ' पूर्णमदः पूर्णमिदम्, तथा म

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३६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) में ये ' यो ह ज्येष्ठ श्रेष्ठं च वेद ' इत्यादि नाना उपासनाओं तथा ' स यः कामयेत महत् प्राप्नुयाम्, इत्यादि मन्थ नामक कर्मको, ' अथ य इच्छेत् पुत्रो मे पण्डितो जायेत सर्वान् वेदाननुश्रुवीत ' इत्यादि कर्मोंको प्रक्षिप्त वा अन्यकृत मान लेंगे? यजुर्वेद संहिता में ' अग्निश्च पृथिवी ' ( २६।१ ) यह अध्याय ' खिल ' माना गया है; तब क्या यह प्रक्षिप्त है? ऋ ० सं ० में १६ के लगभग तथा अथर्व ० सं ० के २० वें काण्डमें ३ खिल सूक्त हैं । श्रीसायणने आरण्यकके उस सारे ही प्रपाठकको ' खिल ' माना है; तब प्रतिपक्षी उसकी ' रुद्रगायत्री ' " को ही क्यों प्रमाण मानते हैं? उसमें स्थित ' इमं मे गंगे, ऋतं च ` सत्यं ' मन्त्रों को भी क्या प्रक्षिप्त मान लिया जायगा? यदि उन्हें अन्य संहिताओं में मिलने से प्रक्षिप्त न माना जाए; तो गणेशगायत्री आदि भी ' तत् कराटाय विद्महे हस्तिमुखाय धीमहि । तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ' इत्यादि रूपमें कृष्णयजुर्वेद मैत्रायणी -संहितामें मिलती है; तब वे अप्रमारण क्यों होंगे? ( घ ) प्रतिपक्षी, निष्पक्ष विचारक श्रीसायणकी कही ' खिल ' की परिभाषाको भी याद रखें - ' कर्मोपासनब्रह्मकाण्डेषु त्रिष्वपि यद् - चंद् वक्तव्यमवशिष्टम् ' तस्य सर्वस्य अभिधानेन प्रकीर्णरूपत्वं खिलत्वं ' यहाँ कर्म, उपासना, ज्ञानकाण्डसे अवशिष्टके संग्रह कर देनेका नाम ' खिल ' है; तब संग्रह प्रक्षिप्त कैसे होगा? ( ङ ) ' खिल ' की परिभाषा श्रीनीलकण्ठने ' हरिवंश ' की अव तरणिकामें यह लिखी है — ' यच्च शाखान्तरस्थं शाखान्तरे प्रयोजन-वशात् पठ्यते, यथा - बाहूवृचे श्रीसूक्तमेधासूक्तादि तत् खित्त्रमुच्यते ' ।

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श्रीगणेशका मङ्गलाचरण ३७ अन्य शाखाके निगमको अन्य शाखा में रखना ' खिल ' होता है । महाभारत शान्तिपर्वके ' प्रतिष्ठास्यति ते वेदः सखिलः ' ( ३१८ | १० ) इस पद्यकी टीकामें श्रीनीलकण्ठने ' खिल ' का यही अर्थ दिया है-‘ परशाखीयं स्वशाखायामपेक्षावशात् पठ्यते, तत् खिलमित्युच्यते । यथा बह ्मवृचानां ‘ हिरण्यवर्णां हरिणीम् ' इतिसूक्तम् । सो ' खिल ' निर्मूल न हुए, किन्तु समूल ही हुए, दूसरी संहिताओंके ही हुए । सभी संहिता वेद ही तो होती हैं । ( च ) खिलोंके प्रमाण होनेसे ही पितृकर्म में मनुजीने ' स्वाध्याय श्रावयेत् पित्र्ये ' ' ' पुराणानि खिलानि च ' ( ३।२३२ ) यहाँ खिलोंका सुनाना आदिष्ट किया है । ( छ ) श्रीकुल्लूक भट्टने लिखा है-' खिलानि श्रीसूक्तशिवसंकल्पादीनि ' । ( ज ) यही प्रतिपक्षी लोग ' निरुक्त ' के ' खिल ' से ' एतं तर्कमृषिं प्रायच्छन् ' ( १३ | १२ | १ ) इसे ' निरुक्त ' के नामसे उद्धृत करके प्रमाणित कर लेते हैं, पर दूसरे के लिए ऐसा करने पर रोड़ा अटका देते हैं- यह क्यों? यामलाष्टकतन्त्र में ' खिल ' का लक्षण यह आया है - ' पुरा व्यासेन वेदेषु संक्षिप्तेषु चतुर्ष्वपि । अनुवाकाष्टकाध्यायसूक्त-वाक्य - पदात्मसु । तत्र तत्र तु शिष्टानि यानि वाक्यानि सन्ति हि । खिलानि तानि प्रोच्यन्ते ' । अतः स्पष्ट है कि ' खिल ' अप्रमाण नहीं होते । ( झ ) श्री सायणाचार्यके ' इत ऊर्ध्वं तेषु तेषु देशेषु श्रुतिपाठा अत्यन्तविलक्षणाः ' इन शब्दों से ' वक्रतुण्डाय ' आदि मन्त्रोंकी प्रक्षिप्तताका अनुमान भी ठीक नहीं । श्रीसायण इसमें शाखाभेदको

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३६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) कारण बताते हैं और सभी पाठोंको उपादेय मानते हैं - ' तदीयपाठसम्प्र-दायस्तु देशविदेशेषु वहुविध उपलभ्यते । तत्र यद्यपि शाखाभेदः कारणम्, तथापि तैत्तिरीय शाखाध्यापकैः तत्तद्देशनिवासिभिः शिष्ट-राहतत्वात् सर्वोपि पाठ उपादेय एव ' । और फिर श्री सायणाचार्य पूर्वोक्त पाठके आगे ' तत्र विज्ञानात्मप्रभृतिभिः पूर्वैर्निबन्धकारैद्रविड-पाठस्य आहतत्वाद् वयमपि तमेव आहत्य व्याख्यास्यामः ' यह लिखकर उन मन्त्रोंका आदर करके उनके भाष्य में प्रवृत्त हैं, इससे स्पष्ट है कि उनकी प्रक्षिप्तता एवं निर्मूलता वा श्रप्रमाणता नहीं । पाठभेद भी अनुवाकक्रमसे है । द्रविड ६४ अनुवाकों का, आन्ध्र ८० अनुवाकका, कई कर्णाटक ७४ अनुवाकोंका, कई ८ का मानते हैं । पर गणेशगायत्री आदि सभी पाठों में है । पूजाके छपे तै ० आ ० में १० म प्रपाठक ६४ अनुवाकोंका छपा है, ८० का भी । दोनों में ही गणेशगायनी उपलब्ध है । इस प्रकार कर्णाटक पाठ में भी समझ लेना चाहिये । पाठभेद भी यह होगा कि कहीं गरुड का मन्त्र होगा, स्कन्दका नहीं । नन्दीका होगा, ब्रह्माका नहीं । तब गणेशकी अवैदिकता कैसी? ( ञ ) बल्कि श्रीसायणाचार्यने उक्त गणेशगायत्रीकी व्याख्या करते हुए अवतरणिका लिखी है- ' वीजापूरगदेकार्मुक ' इति आगमप्रसिद्धमूर्तिधरं विनायक प्रार्थयते ' । इस प्रकार गणेशको आगम-प्रसिद्ध मानकर ‘ वक्रतुण्ड ' की व्याख्या की है— ' गजसमानवक्त्रत्वेन तुण्डस्य रत्नकलशादि - धारणार्थं वक्रत्वम्, दन्तिर्महादन्तः ' । यहाँ श्रीगणेशको रत्न धारण करनेवाला माना है । इसलिए ही. ' आतू

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श्रीगणेशका मङ्गलाचरणं ३६ न इन्द्रः क्षुमन्तं चित्रं ग्राभं संगृभाय । महाहस्ती दक्षिणेन ' ( ११ ) ऋग्वेदसंहिताके इस इन्द्र के मन्त्रमें उसे गणपतिके रूप होनेसे ( जैसेकि हम पहले बता चुके हैं ) ' महाहस्ती ' कहा है, और उस हस्तसे धन देना प्रार्थित किया है । ( ट ) बृहत्पराशरस्मृतिमें ' श्रा तू न इन्द्र वृत्रहं सुरेन्द्रः स गणेश्वरः ' ( ११।३२ ९ ) इस मन्त्रको गणेश्वरपरक माना है । इस प्रकार गणेश वैदिकदेवता सिद्ध होगये । तभी वेदभाष्यकार श्री सायणने प्रत्येक स्थानमें ' वागीशाद्याः तं नमामि गजाननम् ' गणेश को नमस्कार किया है । . ( १६ ) गणेशके बारह नामों में ' धूमकेतुर्गणाध्यक्षो ' ' धूमकेतु ' नाम भी आया है; उस नाम से भी वेदमें गणेशका वर्णन देखिये-' शं नो ग्रहाश्चान्द्रमसाः शमादित्यश्च राहुणा । शं नो मृत्युधूमकेतुः शं रुद्रास्तिग्मतेजसः ' ( अथर्व ० सं ० १६६ १० ) यहाँ पर सूर्य - चन्द्र आदि सात ग्रहोंसे तथा राहु - ग्रहसे कल्याणकी प्रार्थना की गई है । ‘ राहोश्छाया स्मृतः केतुः ' ज्यौतिष शास्त्र के इस वचनसे राहुसे केतु, धूमकेतु आदिका ग्रहण भी हो जाता है, इसलिए पञ्चांगोंमें राहुके राशि अंश आदि लिखकर केतुके नहीं लिखे जाते, क्योंकि केवल ६ राशिका उन दोनोंमें अन्तर होता है; शेष अंश, कला, विकला, गति - विगति उन दोनोंकी बिल्कुल बराबर होती हैं । सो राहु - केतु दोनोंसे ग्रस्त सूर्य - चन्द्रमाके ग्रहणोंसे इसमें कल्याण प्रार्थित कर दिया गया । उत्तरार्धके चौथे पादमें तीच्ण रुद्रसे कल्याणकी प्रार्थना की गई है, उस रुद्रके साहचर्यसे ' धूमकेतु ' यहाँ गणेशका नाम ही है ।

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४० श्रीसनातनधर्मालोक ( ) ५ क्योंकि गणेश रुद्रके पुत्र माने जाते हैं । पहले गणेशका नाम रखना पुत्रके पिता से बढ़ जाने के कारण है । ' गुणाः सर्वत्र पूज्यन्ते पितृवंशो निरर्थकः । वासुदेवं नमस्यन्ति वसुदेवं न मानवाः । पर रुद्र भी उनके पीछे पूजनीय होते हैं । इसलिए रुद्रके विवाह में भी गणेश - पूजन हुआ । उस धूमकेतु ( गणेश ) का विशेषण यहाँ पर ' मृत्यु ' माना गया है, इसका कारण यह है कि श्रीगणेश ' विघ्न-स्वरूप होने से जैसे कि - बौधायन गृहाशेपसूत्र में लिखा है- ' विघ्न! विघ्नेश्वरागच्छ विग्नेत्येव नमस्कृत! अविघ्नाय भवान् सम्यक् सदा-ऽस्माकं भव प्रभो! ' ( ३ | १०१२ ) जैसेकि मानव - गृह्यसूत्र में कहा है-' एतैः खलु विन्नायकैराविष्टाः... स्त्रीणामाचारवतीनामपत्यानि न्नियन्ते ' ( २।१४।१-२-३-२१ ) जैसाकि ' बृहत्पराशरस्मृति ' में भी कहा है-‘ विघ्नार्थमसृजद् ब्रह्माशङ्करश्च विनायकम् ' ( ६३ ) उसी, विघ्नकारक होनेसे मृत्युस्वरूप श्रीगणेश से ' शं ' की प्रार्थना उक्त मन्त्रमें की गई है । विवाहादिमें गणेश महादिपूजन हुआ ही करता है; वह इस मन्त्रके मूलसे है । मनुस्मृति में ' मङ्गलार्थं स्वस्त्ययनं प्रयुज्यते विवाहेषु ' ( ५।१५२ ) विवाहादि में ' स्वस्त्ययन ' करना बताया गया है । इससे मनुजीको गणेशपूजन इष्ट है । यह हम पहले बता चुके हैं कि श्रीगणेशका ‘ स्वस्तिक ' से बोध होता है; सो स्वस्तिवाचनमें गणेश - पूजा भी अन्तर्भूत होजाती है । अस्तु । उक्त मन्त्रमें गणेशजीका नाम ' धूमकेतु ' है, संहिताओंके अन्य स्थलों में गणपति, दन्ती, हस्तिमुख, वक्रतुण्ड, महाहस्ती, बृहस्पति आये हैं; तब गणेशजी वैदिक ही सिद्ध हुए । वेदसे ही वे पुराण में