सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 71–80
सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 71–80
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श्रीगणेशका मङ्गलाचरण ४१ गये हैं; जैसेकि काशी केदारनाथ - माहात्म्य में उनके लिए कहा है- 1 ( ख ) ' विघ्नध्वान्तनिवारणैकतरणिविघ्नाट बीहव्यवाट् विघ्नव्यालकुलोपमर्दगरुडो विघ्नेभपञ्चाननः । विघ्नोत्तङ्गगिरीशमर्दनपविर्विघ्नाधिकुम्भोद्भवो ' विघ्नायुध वाढव विघ्नाभ्रौघघनप्रचण्डपवनो विघ्नेश्वरः पातु नः ' । वाराह - पुराण में ' नमस्ते गजवक्त्राय नमस्ते गणनायक । विनायक! नमस्तेस्तु नमस्ते चण्डविक्रम! नमस्ते रुद्रवक्त्रोत्थ! प्रलम्ब- जठराश्रित! सर्वदेव! नमस्काराद्विघ्नं कुरु सर्वदा ' । ' रुद्र-वक्त्रोत्थ'से वे रुद्रके लड़के सिद्ध हो रहे हैं । तैत्तिरीयारण्यकके एकदन्तका मन्त्र जो किन्हींको रुद्रका मालूम होता है; उसमें पिताके पुत्रके लिए ' आत्मा त्वं पुत्रनामासि ' ( मीमांसादर्शन ४ | ३ | ३८ ) यह न जानना ही उनकी भूलका कारण होता है । पुराणोंसे फिर गणेशजी बौद्ध - साहित्य में गये हैं । वहाँ विनायकी शक्तिका स्वरूप ' हस्ताकारसमायुक्ता ' मिलता है । महायान बौद्धधर्ममें भी गणेशका पूरा वर्णन मिलता है- ' भगवन्तं गणपतिं रक्तवर्णं ' ' " लम्बोदरैक वदनं ' · ‘ त्रिनेत्रमेकदन्तं, सव्यभुजेषु कुठारशराङ्कुश - वज्रखड्गशूलं च, वामभुजेषु मुसलचापखट्वाङ्ग, रक्तपद्मे मूषिकोपरि स्थितम् ' । ( ग ) अपने देशमें तो गणेशजी हैं ही, वे विदेशों में भी पहुँचे हुए हैं । क्योंकि भारतीय लोगोंने विदेशों में अनेक उपनिवेश स्थापित किये थे उसीके कारण हैं; अनायके देवोंके कारण नहीं । भारतीय संस्कृतिका दूर - दूर तक प्रचार हो चुका था । तुर्किस्तानसे लेकर मलयद्वीपपुरंज, बालि, जावा, बोर्नियो, स्याम, कम्बोडिया
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४२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) तक भारतीय लोग जाकर बसे थे । वहाँ आज भी हिन्दुओं के अनेक स्मारक मिलते हैं । इन्हीं हिन्दुओं द्वारा इन देशों में गणेश-पूजाका प्रचार हुआ । ये मूर्तियाँ हैं तो भारतीय मूर्तियों के सदृश ही, परन्तु उनमें कुछ विशेषताएँ भी हैं । जर्मनीमें स्वस्तिक रूपमें उन्हें राष्ट्रियपताकामें स्थान मिला । मेसोपोटामिया, बेबीलोनिया, ट्राय, इटली आदि देशों में जब भूगर्भकी खुदाई हुई; वहाँ पर स्वस्तिक मिला । दक्षिण यूरोप में भी इसका प्रचार पाया गया है । सिसली और क्रीट में स्वस्तिकका प्रचार प्राचीनकाल से चला आ रहा है, स्पेन और इटलीके इतिहास में स्वस्तिकका अस्तित्व बहुत काल से रहा है । अमेरिका में भी उसका प्रचार पाया जाता है । भारतमें तो प्रचार है ही । हिन्दुराजाओं के सिक्कों में भी स्वस्तिक प्रयुक्त किया जाता था । स्वस्तिकाकृति भूषण भी बनते थे । ( घ ) हिन्दुओंके विवाहादि - कार्यों में, पूजा - स्थलोंमें, व्यापारकी बहियोंमें, विशेष उत्सवोंमें, कुत्र आदिमें, द्रव्यकी पेटियों में, मन्दिरों वा घरोंके द्वारोंमें भी इसका प्रयोग होता है । लामाओंके दार्जिलिङ्गके महाकाल मन्दिरमें अभी तक स्वस्तिक उत्कीर्ण है । ' गीतारहस्य ' ५६० पृष्ठमें श्री तिलकजीने ' ईसाके सैकड़ों वर्ष पहले से ही इस स्वस्तिकको वैदिकों द्वारा शुभदायक माना जाना ' कहा है, कोलम्बससे भी कई शतक पूर्व पेरू तथा मैक्सिको आदिमें भी यह प्रचलित था । इतना यह गणेशजीका प्रचार हिन्दुधर्मकी एक महान् विजय है । आश्चर्य है कि हमारे ही देशके कई महाशय? उसके विरोध में लगे हैं । लेकिन भिन्नरूप में वे भी इसे प्रार्थित करते हैं-
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श्रीगणेशका मङ्गलाचरण ४३ ( ङ ) ' हे सर्व विद्यामय! सर्वार्थवित्! मदुपरि कृपां विधेहि, यया निर्विघ्नेन वेदार्थभाष्यं सत्यार्थं वयं पूर्णं कुर्वीमहि ' ( ऋग्वेदादि-आष्यभूमिका पृ ० ७ ) ' अस्मिन् वेदभाष्यकरणानुष्ठाने ये दुष्टा विघ्नाः, तान् प्राप्तेः पूर्वमेव परासुव - दूरं गमय ' ( पृ ० ३ ) यहाँ पर स्वा ० द ० जीने एक प्रकार से गणेशको मान लिया है । सत्यार्थप्रकाशमें-' गरण संख्याने ' इस धातुसे ' गण ' शब्द सिद्ध होता है, और इसके आगे ' ईश ' वा ' पति ' शब्द रखनेसे ' गणेश ' और ' गणपति ' शब्द सिद्ध होते हैं । ' ये प्रकृत्यादयो जडा जीवाश्च गण्यन्ते, तेषामीश: ' -स्वामी, पतिः - पालको वा ' यह लिखा है; तो थोड़ा ही भेद रहा है । गणपत्युपनिषद् में भी गणेशको ब्रह्म ही माना गया है । इससे विघ्न हटानेके लिए विघ्नाधिपति अनादि गणपतिदेवकी प्रार्थनात्मक पूजा स्वामीके मतमें भी सिद्ध हुई । यदि वे श्रद्धासे वैध गणपति की अर्चना करते; तो उनके वेदभाष्य अवश्य पूर्ण होजाते । अद्वैत में अवश्य एक तत्त्व है, पर जैसे उत्पत्ति, स्थिति, और लयमें हिन्दुधर्म के ब्रह्मा, विष्णु, महेश यह हिन्दुधर्म में भिन्न नाम रूपकी त्रिमूर्ति मानी गई है; वैसे ही विघ्नविभाग के भी अनिवार्य होनेसे उनसे भी भिन्न नाम रूपवाले देवकी सत्ता भी अनिवार्य है, अतः वह देव भी है; और वह गणपति है । ( १७ ) गणेशके जन्मके सम्बन्धमें विभिन्न कथाओं के पाये जानेसे इन्हें अपदेव वा अनार्यों का देव मानना और यह कहना कि- ' राम - कृष्णादि शुद्ध आर्य देवकल्प पुरुषोंके जन्मादिसम्बन्धमें इस प्रकारका कथा - वैषम्य नहीं है ' यह भी ठीक नहीं । एक के
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४४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) विषय में कथाओं की विभिन्नताका अनार्यो से कुछ भी सम्बन्ध नहीं होता । श्रीकृष्णादिकी कथा ही श्रीमद्भागवत, ' हरिवंश, गर्गसंहिता, ब्रह्मवैवर्तपुराण आदिमें देखने से उसमें कुछ - कुछ वैषम्य मिलेगा ही । श्रीरामकी कथाके लिए महाभारत, वाल्मीकि रामायण, पद्म-पुराण, उत्तररामचरित आदिको देखिये- कुछ वैषम्य मिलेगा ही । इससे वे अनार्य नहीं होजाते । ऐसे विरोध कल्पभेद द्वारा समाहित होजाते हैं । कल्पभेदसे सृष्टिमें कुछ परिवर्तन होते रहते हैं; जैसेकि स्वा ० द ० जीने भी ऋ ० सा ० भू ० में इसका संकेत दिया है ' मन्वन्तरपर्यावृत्तौ सृष्टेर्नैमित्तिकगुणानामपि पर्यावर्तनं किञ्चित्-किञ्चिद्भवति ' ( पृ ० २२ ) सृष्टिका स्वभाव नया- पुराना प्रतिमन्वन्तरमें बदल जाता है ( पृ ० २४ ) जब वे प्रतिमन्वन्तर में कुछ भेद मानते हैं, तब भिन्न कल्पों में कुछ - कुछ भेद होजाय; तो वहाँ क्या कहना? वेद - उपनिषदादिमें भी सृष्ट्युत्पत्ति में वैषम्य मिलेगा । कहीं आदि में सत्की उत्पत्ति, कहीं असत्की, कहीं आकाशादि - पूर्विका, कहीं अग्न्यादिपूर्विका, कहीं जलादिपूर्विका सृष्टि बताई गई है । तब क्या यह अनार्योका संग्रह होगा? अनादिदेव होने पर भी गणेश जीके भिन्न - भिन्न अवतार भी हुए हैं । अतः कहीं उनका अनादि रूपसे वर्णन आता है, कहीं उनके भिन्न - भिन्न अवतारों के रूपमें । कहीं - कहीं उनके भिन्न - भिन्न भावों पर बल देदिया गया है । कहीं विघ्नाभिमानी देवके रूपमें उनका वर्णन किया गया है । कहीं तात्पर्य - समानतामें भी उसी एकका वर्णन पूर्वसे विलक्षणतार्थ कुछ भिन्न करना ही पड़ता है, जिससे पाठकको वैरस्य प्रतीत न हो ।
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श्रीगणेशका मङ्गलाचरगा ४५ उससे भी कुछ भेद होजाना स्वाभाविक है । ( ख ) जोकि ' गरणानां त्वा ' मन्त्रको महीधर के अनुसार अश्वदैवत माना जाता है, तथा वैसाही अर्थ किया जाता है; तो इससे गणपति-देवका अभाव नहीं होजाता । कल्पके अनुसार एक मन्त्रके अनेक देवता वा अनेक विनियोग भी होते हैं । श्री महीधरके अर्थमें भी अश्वकी गणपतिदेव रूपसे स्तुति की गई है । यदि वेदभाष्यकार महीधरपर पूरा विश्वास किया जाता है; तो उसने भी वाजस ० संहिताके भाष्यके आरम्भ में ' प्रणम्य लक्ष्मीं नृहरिं गणेशं ' इस प्रकार गणेशजीको प्रणाम किया है । तब श्रीगणेश अनार्यदेव कैसे १ रुद्र वैदिक देवता हैं: तव ' आत्मा वै पुत्र नामासि ' ( निरुक्क ३।४।२ ) रुद्रके विग्रहविशेष - अंशावतार - पुत्र गणेश अवैदिकदेव कैसे हो सकते हैं? ( ग ) यदि अमङ्गलकारक होनेसे गणेश अपदेव माने जाएँ, तो ' ये अन्नेषु विविध्यन्ति पात्रेषु पिवतो जनान् ' ( यजु ० १८/६२ ) ( रुद्र अन्न- दूध खाने - पीनेवाले पुरुषोंको बींधा करते हैं ) मृत्युकारक होने से, तमोगुणी होने से ' मा नः प्रियास्तन्वो रुद्र! रीरिषः ' ( यजुः १६।१५-१६ ) इत्यादि प्रार्थित होनेवाले रुद्रको भी क्या अनार्यदेव मान लिया जायगा? ( घ ) ' या ते रुद्र! शिवा तनूरघोराऽपापकाशिनी ' ( यजुः २।४६ ) इससे शिवजी के भी घोर, तथा अघोररूप दिखलाने से क्या घोर-^ • रूपधारी रुद्र भी अपदेव हो जावेंगे? यदि नहीं, तो शिवसुत गणेशके भी; पिताके प्रभेदवश घोर अघोररूप मान लेनेसे व्यवस्था
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४६ श्री सनातनधर्मालोक ( ५ ) लग जाती है कि- घोररूप विघ्नकारक है और अघोर विघ्ननाशक । जो तत्त्व आध्यात्मिक उन्नतिमें स्वतः बाधक होता है, वही उपासना के द्वारा सहायक बन जाता है । अनिष्टकर भी इष्टकारी बन जाता है | विघ्नदेवताका स्वरूप साधना के बल से सिद्धिका देवता होजाता है, क्योंकि परमार्थतः विघ्न और सिद्धि, अविद्या और विद्या एक ही परा देवताके दो अविच्छेद्य रूप हुआ करते हैं । ( ङ ) यह कहना भी कि - वैदिककालमें जब आर्य सप्तसिन्धु प्रदेशमें रहते थे, गणेशकी पूजा नहीं होती थी- ठीक नहीं । इसमें प्रष्टव्य है कि वैदिककालमें अनार्य थे या नहीं?? यदि नहीं थे; तो पूर्व में आयका अनायसे सम्पर्क कैसे बढ़ा? यदि वैदिककालमें भी अनार्य थे, और गणेशपूजा आर्योने अनायसे सीखी; तो इससे स्पष्ट हुआ कि वैदिककालमें भी गणेशपूजा थी, केवल आर्यों ने उसे अनायसे सीखा; परन्तु अनार्यो से गणेशपूजन सीखना निष्प्रमाण है । जब वेदमें गणेशका वर्णन है; तब वे वैदिकदेव हुए । जब सभी वेदसंहिताएं तथा तदन्तर्गत आरण्यक उपनिषदादि वेद हैं; यह हम चतुर्थ पुष्पमें सिद्ध कर चुके हैं, कुछ अग्रिम पुष्पमें करेंगे, प्रतिपक्षीको भी यह सम्मत है, तब कृष्णयजुर्वेद - मैत्रायणी संहितामें, कृष्णयजुर्वेद - तैत्तिरीयारण्यकमें, अथर्ववेद - गणपत्युपनिषद् में, अथर्ववेदीय ' शान्तिकल्प ' ( जिसके लिए श्रीसायणाचार्यने अथर्व-वेदभाष्यके अपने उपोद्घात में ' शान्तिकल्पेपि प्रथमं वैनायकग्रह-गृहीतलक्षणानि, वैनायकहोमाः, तत्पूजाविधानम् ' इत्यादि लिखा है ) तथा स्मृतियोंमें और वेदोंसे स्मृत किये हुए अनादिज्ञान पुराणों में
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श्रीगणेशका मङ्गलाचरण ४७ जव स्पष्टतया गणेशजीका वर्णन आया है, तब उन वैदिकदेव गणेशको अवैदिक कहना परम साहस है । जो हिन्दु लोग मुसलमानी किसी पीर वा कवको पूजते भी हैं; तो दूसरेका देव समझकर; पर गणेशजीको कहीं दूसरों ( अनार्यों ) का देव नहीं कहा गया; वा समझा जाता । यदि गणेशजी अनार्योके देव होते; तो वे अब तक उन्हींके मुख्य देव होते; पर अनार्यों में तो गणेशजी की! मुख्य पूजा ही नहीं । जो है वह से गई है । रुद्रपूजा, विष्णुपूजा आदि उनमें भी यहाँ से गई है । ( च ) बात यह है कि आर्यसमाजादिके संस्कारवश पहले प्रति-पक्षिगण इन प्रचलित चार संहिताओं को वेद मानते रहे; तब इनमें भी बीजरूपसे उन्हें गणेश यद्यपि वर्णित तो प्रतीत हुए, तथापि उन्होंने उनसे सहज ही जान छुड़ाली । पर उन्हें जब अनुसन्धान से आरण्यक एवं उपनिषद् भी वेद मालूम पड़े; तब उनमें भी ' गणेशजी ' को वर्णित देखकर प्रतिपक्षियोंने अपनी भूल तो नहीं मानी, किन्तु उन वचनोंको ही उल्टी - सीधी युक्तियों द्वारा ' प्रक्षिप्त ' कहकर जान छुड़ा ली । जब उन्हें लुप्त संहिताएँ उपलब्ध हुई, तब मैत्रायणी - संहिता ने भी प्रतिपक्षियोंका पीछा न छोड़ा, उसमें भी गणेश मिल गये I । अभी अन्य भी संहिताएं मिलेंगी, उनमें भी मिलेगा । पुराणादि वेदके भाष्य ही तो हैं; वे भला अपनी निर्मूल कल्पनाएं कैसे कर सकते थे? उनके समय वेदोंकी प्रायः सम्पूर्ण संहिताएं थीं; उनमें गणेशका वर्णन देखकर ही तो पुराणोंने उसका विशकलन किया ।
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४८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) वस्तुतः एक बात यह भी है कि कई ऐसे देवविशेष हैं, जिनका ' कालक्रमसे घटता - बढ़ता रहता है । थाजसे पहिले महादेव -पूजन पूजन बहुत प्रचलित था; पर कालक्रमसे अव घट गया । कलिसें चण्डी एवं विनायकका प्रचार बहुत होता है; पर इससे उस देवका पूर्व अभाव वा नवीनोपास्यता नहीं हो जाती । अभी प्रतिपक्षियोंको अन्य संहिताएं नहीं मिलीं । यदि मिल जाएं; तब फिर प्रतिपक्षियों को उनसे आक्षिप्त देवोंका पूजन भी स्पष्ट मिल जाए । फिर वे पूर्व संस्कारवश उन्हें प्रक्षिप्त मान लेंगे । वास्तव में उनके पास उनसे जान छुड़ानेका इसके अतिरिक्त उपाय है भी क्या? शेष परिवर्तन मतिवैचित्र्यसे, अथवा अधिकारिभेदसे अथवा कल्पादिभेदसे अथवा कुछ नवीनतार्थ होजाते हैं । ( छ ) प्रतिपक्षियों का यह कहना कि ' अनार्योंसे आर्योने गणेश-पूजा सीखी ' यह ठीक नहीं । यह भी वे मानते हैं कि आने अनार्यों पर विजय पाकर इस देश पर अधिकार किया । तो विजित जाति पर विजेताका ही अधिक प्रभाव पड़ता है, विजेता पर विजितका नहीं । हम लोग तो विजेताके हैट - बूट आदि पहनने लग गये । अपना शिखा - यज्ञोपवीत तिलक आदि खो बैठे, अपनी मूर्तिपूजा हटा बैठे, ईसाइयों वा अंग्रेजोंका संक्षिप्त संस्करण बन चुके, पर विजेता अंग्रेजोंने हमारी धोती, पगड़ी, चोटी, जनेऊ, तिलक हमसे नहीं सीखे 1 । अभी तक भी पराजित दास्यमनोवृत्तिवाले हमारे बन्धु अंग्रेजियत नहीं छोड़ सके; बल्कि उनसे प्रभावित होकर अपने G प्राचीन साहित्यको ही दूषित करने लगे; और नवीन एवं विषैले,
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श्रीगणेशका मङ्गलाचरण ४६ अपने प्राचीन साहित्य में शङ्कित दृष्टि रखनेवाले साहित्यकी सृष्टि करने लगे । ( ज ) ' गणपतिके नामसे एक ' उपनिषद् ' की रचना पीछेसे कर दी गई ' यह आरोप भी असत्य है । यह केवल प्रतिपक्षियोंके अपने पक्ष के रक्षणार्थ है । प्रतिपक्षी जब अपना एक विचार स्थिर कर लेते हैं; तब उन्हें उससे विरुद्ध विचार जहाँ मिलता जावे; उसे या तो प्रक्षिप्त कह देते हैं; या उसे अर्वाचीन रचना, वा मध्यकाल का मूढाग्रह कह देते हैं । जब वह भी न बन सके; तो उसे आलङ्कारिक कहकर उससे अपनी जान छुड़ा लेते हैं । वस्तुतः इस पर यह जान रखना चाहिये कि जितनी मन्त्र - संहिताएं होती हैं; उतने ही ब्राह्मण, उतने ही आरण्यक एवम् उपनिषद् भी होते हैं । इनका काल भी भिन्न नहीं । समाधि - द्वारा उसका दर्शन और ग्रन्थ-रूपमें संग्रहणका काल भले ही भिन्न हो; पर अपौरुषेय वेद होने से यह सब एक ही कालमें विद्यमान थे । जैसेकि - व्रात्यकाण्डकी भूमिकामें उत्तरप्रदेशके मुख्यमन्त्री, गणेशको अनार्यदेव प्रसिद्ध करनेवाले, डा ० श्रीसम्पूर्णानन्दजीने लिखा है- ' ईश्वर नित्य है, अतः उसका ज्ञान नित्य है, इसलिए वेद नित्य है । परन्तु सारे मन्त्र एक ही साथ मनुष्य के सामने नहीं आये, भिन्न - भिन्न ऋषियोंको भिन्न - भिन्न अवसरों पर पृथक् मन्त्रोंका समाधि की अवस्थामें दर्शन हुआ । इस दृष्टिसे पौर्वापर्यका व्यपदेश हो सकता है ' यही बात उपनिषदादिके सम्बन्धमें भी समझनी चाहिये - क्योंकि वह भी वेद हैं । तत्र उपनिषत्काल भी संहिता काल से पीछे नहीं हो सकता ।
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ) ५ ५० जब विघ्नेश्वरका व्यापार भी जगत् में अपेक्षित है, वह अर्वाचीन नहीं; तब विघ्नेश्वर गणपतिकी उपनिषद् भी अर्वाचीन क्यों हो? अभी तक न तो सारी संहिताएं ही मिली हैं; न सारे ब्राह्मण और न आरण्यक उपनिषद् आदि, न सूत्रमन्थ । तव वर्तमान शास्त्रों में प्राप्त ' गणेशजी ' को एकदम ' अपदेव ' कह देना साहसमान है -जैसाकि - अप्रयुक्त शब्दोंके विषय में भाष्यकारने कहा है- ' महान् हि शब्दस्य प्रयोगविषयः, सप्तद्वीपा वसुमती, त्रयो लोकाः, चत्वारो वेदाः, साङ्गाः सरहस्याः बहुधा भिन्नाः, एकशतमध्वर्यु शाखाः, सहस्रवर्त्मा सामवेदः, एकविंशतिधा बाह्र, च्यम्, नवधा आथर्वणो वेदः, वाको-वाक्यम्, इतिहासः, पुराणम्, वैद्यकम् 1 । एतावन्तं शब्दस्य प्रयोगविषय-मननुनिशम्य ' सन्ति प्रयुक्ताः ' इति कथनं साहसमात्रमेव ' । ( झ ) भाषाभेद देखकर इस गणपति - उपनिषद्को अर्वाचीन बताना भी ठीक नहीं । यह लटका अंग्रेजोंकी देन है, और दास्य-मनोवृत्तिका परिचायक है । रघुवंश में सब सर्गों में सरलता होने पर भी नवम - सर्गकी यमककी कठोरता देखकर भिन्न - कालीनता वा भिन्नकर्तृ कता नहीं होजाती । भाषा तो विषयानुसार बदलती रहती है । वेदमें भी ' भाषायां ' वाले सूत्रोंको छोड़कर शेष सारी लौकिक संस्कृत आ सकती है, जिसके प्रमाण संहिताओं में प्रत्यक्ष हैं । उपनिषद् भी वेद हैं । संहिताओं में प्रायः देवताओंकी उपासना है; उनके लिए भाषा भी वैसी चाहिये; पर उपनिषदें जनताके हितार्थ हैं; अतः भाषा भी उनके लिए सुगम अपेक्षित है । उसमें भिन्न-कालीनता वा भिन्नकर्तृकता नहीं होजाती । एक ही लेखककी रचना