सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 631–640

सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 631–640

पृष्ठ 631

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कल्प एवं सृष्टि - संवत्सरं ६०३ जाते हैं । इस जबर्दस्तीके अर्थ में भी वही हमारी कही संख्या निकली । पर उक्त वेदमन्त्रके इस अर्थ करनेमें कई दोष आते हैं । ४,३२,१०,००,००० ऐसी योजना हो जाने पर १० लाख वर्ष बढ़ जाते हैं, यह एक दोष है । तब मन्त्र में ' द्वे युगे ' यहां ' युग ' शब्द व्यर्थ हो जाता है, यह दूसरा दोष है । ' द्वे, त्रीणि, चत्वारि ' इन अङ्कोंको बाई बाईं ओर लिखो, ऐसा मन्त्र में कहीं नहीं कहा, यह तीसरा दोष है । ' कल्प ' का उन मन्त्र में नाम वा गन्ध भी नहीं है — यह चौथा दोष है । वेदवाणी से बलात्कार किया गया है - वह पांचवां दोष है । किसी प्राचीन वा अर्वाचीन भाष्यकारने ऐसा अर्थ नहीं किया - यह छठा दोष है । फिर यह बतानेवाला वेद ४,३२,००,००,००० केवल इतना पुराना होने से श्रादिमान् सिद्ध हो जावेगा; क्योंकि इससे अधिक संख्या ब्रह्माके सौ सालकी तो इसमें बताई नहीं गई — यह सातवां दोष है । इस मन्त्र में तो इतने जीवनकी आयु बताई गई है; तो जब आर्यसमाजी मनुष्यकी इतनी यु मान सकते हैं; तो पुराणों में जो ऋषि - मुनियोंकी बड़ी लिखे होनेसे उन्हें गप्प मानते हैं - वे उन्हें मानने पड़ जाएँगे— यह आठवां दोष है । फिर वेदमें ब्रह्माकी सारी आयु १०० वर्ष, तथा विष्णु, रुद्रकी आयु न बताने से वेदका अज्ञान वा त्रुटि माननी पड़ेगी - यह नवां दोष है । वस्तुतः यह सृष्टि - क्रम बताना वेदका विषय नहीं; ' सर्गश्च प्रतिसर्गश्व ' यह विषय बताना पुराणोंका काम है - इसलिए उन्हें ही इस विषय में मूल मानना पड़ेगा । तब वेद

पृष्ठ 632

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६०४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) तथा पुराणको एककालता भी सिद्ध हो जावेगी । जो जिसका विषय नहीं; उससे वह विषय निकालना - यह दसवां दोष है । अस्तु! ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में वर्णित स्वामी दयानन्दजीके भुक्त-भोग्य वर्षोंके संकलनसे-१,६६,०८,५२,६७६ भुक्त वर्ष २,३३,३२,२७,०२४ भोग्य वर्ष ४,२६,४०,८०,००० एक कल्प -A -- इतने वर्ष बनते हैं । इनमें भुक्त भोग्य सन्ध्यांशोंके वर्षोंके न मिलाने से ०५६ २०,००० वर्षोंकी कमी पड़ी है । यदि स्वामीजी के लिखे अङ्कोंमें भुक्त छः मन्वन्तरोंके सात सन्ध्यांशोंके वर्ष १,२०,६६,००८ तथा भोग्य ७ मन्वन्तरोंके म सन्ध्यंशोंके वर्ष १.३८,३४,००० मिला दिये जावें; तो-४,२६,४०,८०,००० स्वा ० द ० की लिखी कल्प संख्या १,२०,६६,००० भुक्त छः मन्वन्तरोंके ७ सन्ध्यंशोंके वर्ष १,३८,२४,००० भोग्य ७ मन्वन्तरोंके म ४,३२,००,००,००० एक कल्प - हमसे कही हुई कल्पकी वर्षसंख्या पूर्ण हो जाएगी । नहीं तो स्वामीके अनुयायियोंको चाहिये कि उनकी पुस्तकोंके बाहर -सृष्टि - संवत्सर आजकल १,६६,०८,५३,०५६ लिखें । १,६७,२६,४६, ०५६ मत लिखें | अथवा पुराण - निन्दाका प्रायश्चित्त करके पुराणोंको अपना धार्मिक ग्रन्थ मानकर सनातनधर्मी बनें । उनपर किये जाते हुए आक्षेपोंका समाधान हमारे ' श्रीसनातनधर्मालोक ' से लें । उक्त

पृष्ठ 633

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कल्प एवं सृष्टि - संवत्सर ६०८ स्थलमें स्वामी दयानन्दजीका अपनी उक्ति से भी विरोध है । उन्होंने ऋभाभू ० के २३ पृष्ठके भावार्थ में लिखा है- ' इन चारों युगोंके ४३,२०,००० तितालीस लाख, बीस हज़ार वर्ष होते हैं, जिनका चतुर्युगी नाम है । जो पूर्वं चतुर्युगी लिख आये हैं, उन एक हजार चतुर्युगियोंकी ब्राह्म - दिन ( कल्प ) संज्ञा रखी है । ' इस प्रकार उन्होंने संस्कृत में लिख रखा है - एकसहस्र चतुर्युगानि ब्राह्मदिनस्य ' परिमाणं भवति ' इस प्रकार उनके अनुसार ४३,२०,००० × १००० = ४,३२,००,००,००० यही संख्या कल्पकी वनती है । अतः उनका परस्पर विरोध वन जानेसे स्वामीजी अनाप्त सिद्ध हो जाते हैं । यहां उन्हें पुराणोंकी शरण लेनी पड़ेगी । तदनुसार प्रत्येक मन्वन्तर में एक सत्ययुगके वर्ष १७,२८,००० की एक सन्धि होती है । तब १४ मन्वन्तरोंकी १५ सन्धियोंके वर्ष २,५६,२०,००० यह मिला देने से गणना ठीक हो जाती है । अस्तु! एक कल्प ब्रह्माका एक दिन होता है । ब्रह्मा के दिनके उदयके साथ ही त्रिलोकीकी सृष्टि होती है । उसके दिनकी समाप्ति होनेपर उतनी ही रात्रि होती है । उसमें जगत्‌का प्रलय होता है । इस प्रकार-ब्रह्मा का दिन ४.३२,००,००,००० मानुषी वर्ष " की रात्रि ४.३२,००,००,००० दिनरात्रिका योग ८,६४,००,००,००० — इतने वर्षोंसे ब्रह्माका एक अहोरात्र ( दिन - रात ) होता है । इन्हीं वर्षोंको ३० से गुणा करने पर २,५६,२०,००,००,००० वर्षों

पृष्ठ 634

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६०६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) का ब्रह्माका एक मास होता है । इन्हीं अङ्कको १२ से गुणा करने पर ब्रह्माका एक वर्ष बनता है, अर्थात् ३१,१०,४०,००,००,००० वर्षोंका एक ब्राह्म - वर्ष होता है । फिर इन अङ्कों को १०० ' गुणा करनेपर ३१,१०,४०,००,००,००,००० वर्षों में ब्रह्माकी सौ वर्षो आयु समाप्त होती है । इस ब्रह्माको आयुमें से आज तक १५,५५, २१,६७,२६,४६,०५६ वर्ष बीत चुके हैं । अब चारों युगों के दिव्य तथा मानुष वर्ष एवं उनके सन्ध्या और सन्ध्यांश भी दिखलाये जाते हैं— चारों युगों के दिव्य वर्ष सं ० युगों के नाम सन्ध्या नियतकाल सन्ध्यांश सर्वयोग १ सत्ययुग ४०० + ४००० त्रेतायुग ३०० + ३००० द्वापरयुग २०० + २००० ४ कलियुग १०० + १००० चारों युगों के मानुष सं ० युगों के नाम सन्ध्या नियतकाल १ सत्ययुग १,४४,००० + १४,४०,००० + २ त्रेतायुग १,०८,००० + १०,८०,००० + द्वापरयुग ७२,०००+ ७,२०,००० + + ४०० = ४८०० + ३०० = ३६०० + २०० = २४०० + १०० = १२०० योग १२,००० वर्ष सन्ध्यांश सर्वयोग १,४४,००० = १७,२८,००० १,०८,००० = १२,६६,००० ७२,००० = ८,६४,००० ४ कलियुग ३६,००० ३,६०,००० + ३६,००० = ४,३२,००० चारों युगों के वर्षोंका योग ४३,२०,०००

पृष्ठ 635

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कल्प और सृष्टि - संवत्सर ६०७ संक्षेपसे यह जानना चाहिये कि - कलियुगके ४,३२,००० मानुष वर्ष होते हैं । उससे दुगुना द्वापर होता है । कलिसे गु त्रेतायुग और चौगुना सत्ययुग होता है । इस प्रकार चतुर्युग ४३,२०,००० वर्ष होते हैं । इस प्रकारके ७१ चतुर्युगों का एक मन्वन्तर होता है । इस मन्वन्तरके ३०,६७,२०,००० मनुष्य - वर्ष होते हैं । एक कल्प में १४ मन्वन्तर होते हैं, उनके वर्ष ४,२६,४०,८०,००० होते हैं । इनमें ६६४ चतुर्युग होते हैं । एक कल्पमें ' सूर्य - सिद्धान्त ' ( १।१६ ) के अनुसार १५ सन्धियां होती हैं । उनमें एकका परिमाण सत्ययुगके वराबर ( १७,२८,००० ) होता है । इस प्रकार सब सन्धियोंके वर्ष २,५६,२०,००० होते हैं इनके ६ चतुर्युग होते हैं । एक सहस्र चतुर्युग एक कल्प होता है । स्वा ० द ० जी इन सन्धियोंके वर्ष मिलाना भूल गये हैं, यह हम पहले संकेत दे ही चुके हैं । पौराणिकोंके ‘ ॐ तत्सत् श्रीब्रह्मणो द्वितीय - प्रहरार्धे [ श्रीश्वेतवाराहकल्पे ] वैवस्वते मन्वन्तरे, अष्टाविंशतितमे कलियुगे, कलिप्रथमचरणे, अमुक - संवत्सराऽयन ऋतुमास - पक्षदिन -नक्षत्रलग्न मुहूर्ते अत्र इदं कृतं क्रियते च ' ( ऋ ० भा ० भू ० पृ ० २२ ) इस संकल्पको भी स्वा ० द ० जीने ऋभाभू ० के २२ पृष्ठमें प्रमाणित कर लिया है, जिसे हम पूर्व लिख चुके हैं । क्या अब भी पुराण ' विषसम्पृक्तान्नवत् ' त्याज्य हैं? इसे स्वामीजीने नहीं लिखा, कदाचित् वराहावतारसे डर गये हों । यहाँ पर स्वामीजी लग्न, मुहूर्त तथा नक्षत्र - विशेषको भी मान गये हैं, इसको वे पैराणिक कथा मानते थे; अव वे भी पौराणिक बने ।

पृष्ठ 636

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६०८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) क्या अब भी ‘ असत्यमिश्रं सत्यं दूरतस्त्याज्यम् ' ( स ० प्र ० ४२ पृष्ठ ) यह कहने की आवश्यकता है? ( १ ) पहले पाश्चात्य लोग सृष्टिको केवल ५ हजार वर्षकी पुरानी मानते थे ( २ ) आर्कविशप उशरका मत है कि सृष्टि आज से ४००४ वर्ष पूर्व हुई थी । ( ३ ) अन्य ईसाई लोग सृष्टिका प्रारम्भ ६६८४ वर्ष पूर्व मानते थे, परन्तु कई अत्यन्त प्राचीन अस्थि-खण्डोंको देखकर उनकी धारणा परिवर्तित हो गई, और वे धीरे-धीरे हमारे सिद्धान्त की ओर आने लगे । ( ४ ) कई पाश्चात्य ग्रहनक्षत्रोंकी उष्णताका परिमारण जानकर जगत् की उत्पत्ति चालीस लाख वर्षोंसे मानने लगे । ( ५ ) इधर भूगर्भ - विद्याविशारदोंने पृथिवीकी आयु दस करोड़ वर्ष की । ( ६ ) प्रो ० जोलीने समुद्र-जलका खारापन देखकर उससे निर्णय किया कि — संसार में समुद्र दस करोड़ वर्षोंसे वह रहा है । ( ७ ) श्रीरेडियमने पृथिवीके प्रारम्भ से आज तक ७,५०,००,००,००० पृथिवीके वर्ष माने । ( ८ ) प्रो ० एस. न्यू. कोन्ब सृष्टिको एक करोड़ वर्षोंसे मानते हैं ( पापुलर ऐस्ट्रॉनमी पृष्ठ ५० ९ ) । ( ६ ) प्रो ० हिलनार २ करोड़ वर्षोंसे सृष्टिका आरम्भ बताते हैं ( सीक्रेट डाक्ट्रिन, भाग २ पृष्ठ ६६४ ) । ( १० ) केल्डविन मतके आधार पर प्रोफेसर वेकरने छः करोड़ वर्ष माने । ( ११ ) प्रो ० कालमहाशय ७ करोड़ वर्ष पूर्व मानते हैं ( क्लाइमेट इन टाइम पृष्ठ ३३५ ) । ( १२ ) चीन - निवासी वैज्ञानिक सृष्टिको ६,६०, ०२,४२३ वर्षोंसे मानते हैं । ( १३ ) सरविलियम टामसन १० करोड़ वर्षोंसे सृष्टिका उपक्रम मानते हैं ( सीक्रिट डाक्ट्रिन, भाग २

पृष्ठ 637

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कल्प और सृष्टि - संवत्सर ६०६ ( पृ ० ६६४ ) । १४ प्रसिद्ध अस्थितत्त्ववेत्ता डाक्टर विलियम तथा डाक्टर स्मिथ एडवर्ड आदि पृथ्वी की उष्णता की परीक्षा करके उसकी आयु दस करोड़ वर्षकी मानते हैं । १५ यूरेनियम, हीलियम, बोलोनियम आदि धातुओंके परीक्षक वैज्ञानिक २४ करोड़ वर्षोंसे ३० करोड़ वर्ष मानते हैं । १६ पृथिवीके स्तरोंके अध्ययन करनेवाले वैज्ञानिक कहते हैं कि वर्तमान सर्वाङ्गपूर्ण मानवजाति के क्रमशः इतने उन्नत होनेमें ३० करोड़ वर्षोंसे न्यून नहीं लगे । १७ प्रो ० निशचाफ ३५ करोड़ वर्षोंसे सृष्टिका निर्माण मानते हैं । ( सीक्रिट डाक्ट्रिन पृ ० ६६४ ) । १८ प्रो ० रेड महाशय ५० करोड़ वर्षसे सृष्टिको मानते हैं । १६ पृथिवीतल, सूर्यकी नीहारिका, चन्द्रमा, समुद्रका खारापन, बुध आदि ग्रहोंका सूक्ष्म - निरीक्षण करके नवीन वैज्ञानिक सृष्टिके उत्पत्तिका समय एक अरब वर्ष पूर्व कूतते हैं । २० प्रो ० हक्सले १ अरब वर्षोंसे सृष्टिका सर्जन मानते हैं ( बर्ल्ड लाईफ पृ ० १८७ ) । २१ कोई और वैज्ञानिक १ अरब ६० करोड़ वर्षोंसे सृष्टि को मानते हैं । ये वैज्ञानिक अभी अभ्यासशील विद्यार्थी हैं, अभी परिनिष्ठित ( पूर्ण ) नहीं हो चुके; अतः समय - समय पर इनके मत बदलते रहते हैं । अन्ततः यह पौरस्त्य मत पर पहुँच जायेंगे । अतः हमें विश्वास है कि ये लोग भी १ अरब, ६७ करोड़, २६ लाख, ४६ हजार, ०५६ वर्ष सृष्टिको प्रारम्भ हुए मान लेंगे । इस प्रकार इनके भूभ्रमण आदि सिद्धान्त भी क्रमशः परिवर्तित होंगे, कइयोंके ३६ स ० ध ०

पृष्ठ 638

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६१० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) मतभेद उसमें शुरू हो भी गये हैं । अस्तु । हम सृष्टि- संवत्सरका आरम्भ वता चुके । यह श्वेतवाराहकल्प है । इस प्रकार न मालूम कितने कल्प तथा कितने ब्रह्मा हो चुके और कितने विष्णु तथा कितने रुद्र हो चुके? ब्रह्माकी अपेक्षा विष्णुका, तथा विष्णुकी अपेक्षा रुद्रका संवत्सर अधिक होता है । अर्थात् ब्रह्माके एक सहस्र दिनोंकी विष्णुकी एक घड़ी होती है । उस गणनासे विष्णु अपने १०० वर्षों तक रहते हैं । उनकी श्रायु मानववर्षानुसार ६३,३१,२०,००,००,००,००,००,००० होती है । एक विष्णुकी आयु में अनेक ब्रह्मा उत्पन्न और विलीन हो जाते हैं । विष्णुकी बारह लाख घड़ियोंकी रुद्रकी आधी घड़ी होती है । इस गणनासे रुद्रकी आयु २,२३,६४,८८,००,००,००,००,००,००, ००,००,००० इतने मानववर्षोकी हो जाती है । एक रुद्रकी आयु में अनेक विष्णु प्रादुर्भूत और तिरोभूत होते हैं । ' बृहत्पराशरस्मृति ' में भी ऐसा संकेत मिलता है- ' तदेकसप्ततिगुणं मन्वन्तरमिति स्मृतम् । मन्वन्तरद्वयेनेह शक्रपातः प्रकीर्तितः । ( यहां दो मन्वन्तरोंमें इन्द्रकी समाप्ति बताई है । ) एतन्मानेन वर्षाणां शतं ब्रह्मक्षयः स्मृतः । ( यहां ब्रह्माकी अपने मानसे १०० वर्षकी आयु बताई है ) । ब्रह्म-क्षयशतेनापि विष्णोरेकमहर्भवेत् ( यहां सौ ब्रह्माओं के क्षयसे विष्णुका एकदिन माना गया है ) । एतद्द्विसमानेन शतवर्षेण तत्क्षयः । ( यहाँ विष्णुके भी अपने मानसे १०० वर्ष आयु बताई गई है ) । एतत्क्षयस्त्रिगुणोष्टाभी रुद्रस्य त्रुटिरुच्यते ( यहां २४ विष्णुओंके क्षयसे रुद्रकी एक त्रुटि ( बहुत थोड़ा काल ) बताई है ।

पृष्ठ 639

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कल्प एवं सृष्टि - संवत्सर ६११ एवमादिकमानेन प्रयातेऽब्दशते द्विजाः ( तब रुद्रकी भी अपने मान से १०० वर्षकी आयु होती है; इसमें भी बहुत से ब्रह्मा तथा विष्णु अपना समय विता जाते हैं ) । रुद्रश्चात्मनि लीयेत निरालम्बे निरामये ' ( १२ / १८८-१६१ ) । यहां पर रुद्रका अपने निरालम्ब आत्मामें अपने सौ वर्षके बाद लीन हो जाना कहा है; उतने समय को हम महा - महा - महाप्रलय कदाचित् कह सकें । इस प्रकार पता नहीं कि कितने रुद्र बीते । इस प्रकार यह संसार अनादि तथा उससे शुरू हुई हिन्दु संस्कृति भी अनादि तथा सर्व - प्राचीन सिद्ध हुई । तब जो कई जैनी अपने पुस्तक के आदिमें अङ्कों की तीन - चार लाइनें लगाकर जैन - संस्कृतिको प्राचीनतम सिद्ध करना चाहते हैं; हिन्दुसंस्कृति तो इतनी प्राचीन सिद्ध हुई कि— जहां अङ्क लिखे ही नहीं जा सकते, यह अनन्तकी उपासक तथा स्वयं भी अनन्त है । अतः इस हिन्दुसंस्कृतिके वेद - पुराण तथा सनातनधर्मभी उस अनन्तकालसे चले रहे हैं । उसमें प्रत्येक संस्करण में वेढ़ उसी रूपमें रहते हैं । पुराणोंका भी पूर्वके अनुसार नव - सम्पादन होता है । धर्म भी उसी रूपमें रहता है । अन्य किसी भी संस्कृति में इतना कालपरिमाण नहीं मिलता; अतः वे संस्कृतियां आदिमती, तथा अन्त वाली भी हैं, हिन्दुसंस्कृतिकी भांति अनादि और अनन्त नहीं । इसी संस्कृतिके एकदेशको आधार बनाकर वे अर्वाचीन संस्कृतियां उत्पन्न हुईं, और नष्ट भी होगईं । इस प्रकार आगे भी उत्पन्न होंगी, और नष्ट होंगी; पर यह हिन्दु - संस्कृति इसी रूपमें

पृष्ठ 640

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६१२ श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) अविचल रहेगी, यदि अपने ही ' विभीषण ' ' इसकी जड़ काटने पर न तुल जाएँ । तब उसी हिन्दुसंस्कृति तथा उसीके धर्म, तथा उसके पूर्वपुरुषों और उसीके शास्त्रोंका निरक्षर जनतामें खण्डन करते हुए अर्वाचीन सम्प्रदाय शोचनीय तथा अपने पैरों पर आपही कुह्लारा मारने वाले सिद्ध होते हैं । इस प्रकार १,६७,२६,४६, ०५६ वर्ष इस वर्तमान सृष्टिमें बीते हैं । वेदोंको यहांसे शुरू होना मानना वेदको सर्वथा अर्वाचीन सिद्ध करना है । वे तो अनादिकाल से चले आ रहे हैं, यह तो वर्तमान सृष्टिका प्रारम्भ है । चैत्र शुक्लपक्षकी प्रतिपद् वाले दिन सृष्टि संवत्सरका आरम्भ हुआ । अतः यह संवत्सरारम्भ गत बातोंका स्मरण करानेवाला होनेसे हिन्दु - जातिकेलिए अत्यन्त-महत्त्वपूर्ण है । अत: इस दिन हिन्दु जनता तीर्थस्नान करने जाती है, ध्यान, दान आदि करती है, और नये पञ्चाङ्गसे नववर्षका विवरण सुनती है, नये वस्त्र पहरती है - इससे अपनी प्राचीनताका ध्यान रहनेसे हिन्दुजातिको अपनी संस्कृति में दृढ - आस्था बनी रहती है, और वह अपनी इसी संस्कृति में अविचल होकर दूसरी विदेशी - जातियों तथा अर्वाचीन सम्प्रदायोंके उत्साहका कारण नहीं बनती । पर जो अपनी इन बातोंका तथा अपने पर्वोंके विज्ञानका ज्ञान वा उसमें ध्यान नहीं रखते; वे चञ्चल होकर अपनी संस्कृति को छोड़कर अन्य अर्वाचीन सम्प्रदायों में प्रविष्ट होकर कहीं के भी नहीं रहते ।