श्रीगणेशाय नमः।

सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 621–630

सनातन धर्मालोक ५ · पृष्ठ 621–630

पृष्ठ 621

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संवत्सरका प्रारम्भ फाल्गुन मासमें १४ शिवरात्रि तथा १५ होलीको कई पर्वोंसे सम्बद्ध अन्य विषयोंपर भी लिखा है — इससे ' श्रीसनातनधर्मालोक ' के पाठकोंको प्राप्त होगा । अब संवत्सरपर लिखते हैं । ब्रह्मपुराणमें २३३ लिया है । इनमें गया है, आशा कुछ लाभ हो कहा है — ' चैत्रे मासे जगद् ब्रह्मा ससर्ज प्रथमेऽहनि ' अर्थात् चैत्र शुक्ला प्रतिपद्को ब्रह्माने सृष्टिका आरम्भ किया । तब जब यह सृष्टिके आरम्भका दिन है; तब प्रजाका नये कार्यारम्भका दिन भी हुआ; इसीलिए इसको उत्साहसे मनाया भी जाता है । इस दिन ब्राह्मणगण नये संवत्सरका भविष्यफल पंचांगोंसे सुनाते हैं, जिससे सृष्टि-संवत्सरका ज्ञान भी हो जाता है । वेदके ब्राह्मणभाग में संवत्सरको प्रजापतिकी प्रतिमा बताया गया है - ' स [ प्रजापतिः ] इमं ( संवत्सरं ) वा आत्मनः प्रतिमामसृति, यत् - संवत्सरमिति, तस्माद् आहुः - प्रजा-पतिः संवत्सरः इति, आत्मनो हि एतं [ संवत्सरं ] प्रतिमामसृजत, यद्वेदेव चतुरक्षरः संवत्सरः, चतुरक्षरः प्रजापतिः, तेन उ ह एव अस्य [ प्रजापतेः ] एष ( संवत्सरः ) प्रतिमा ' ( ११ | १ | ६ | १३ ) यहां संवत्सरको प्रजापतिकी प्रतिमा ( मूर्ति ) बताया गया है । यह ठीक भी है; क्योंकि इसी दिन प्रजापतिने सृष्टिका नवनिर्माण किया । इसीदिन नवरात्रों का आरम्भ भी होता है, अष्टमीको दुर्गाष्टमी मनाई जाती है । हमें भी धार्मिक, सामाजिक, एवं राजनीतिक नवनिर्माणके कार्य में लग जाना चाहिये, जिससे देशकी उन्नति हो । इस देशमें संवत् बहुत से जारी हुए; पर आजकल विक्रमका ३८ स ० ध ०

पृष्ठ 622

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५६४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) संवत् २०१३ है, और शालिवाहनीय शक १८८ तथा ईसवी संवत् १६५६ है, यह अत्यन्त प्रसिद्ध हैं । महाभारतके युद्धके बादसे युधिष्ठिर संवत्का भी प्रचलन रहा । श्राजकल कलियुग — जो महाभारत के युद्ध से प्रारम्भ हुआ था, उसका ५०५६ संवत्सर है । इस कल्पका सृष्टिसंवत्सर १,६७,२६,४६, ०५६ है; इससे यह सिद्ध हो रहा है कि -- हिन्दुजाति तथा उसका सनातन - धर्म अत्यन्त प्राचीन है । हमने एक जैनीकी पुस्तकपर सम्भवतः महावीर - संवत् लिखा हुआ देखा था; जिसके अङ्क चार - पांच पंक्तियोंमें जाकर समाप्त हुए थे; यह हमें देखकर बहुत हँसी आई । इससे उनका यह भाव प्रतीत हुआ कि - जैनधर्म सबसे प्राचीन है; पर ऐसी बात नहीं । सबसे प्राचीनतम धर्म सनातन हिन्दुधर्म ही है । उसके आरम्भ बतानेमें संख्या भी समाप्त हो जाती है । आर्यसमाजी भी आर्यसृष्टि - संवत्सर ऊपर कहा ही लिखते हैं; पर यह याद रखना चाहिये कि - यह इस कल्पका सृष्टि - संवत्सर है । कल्पोंकी संख्या भी नियत नहीं है कि इतने हैं, और आगे इतने होने हैं; अतः हमारा यह सनातनधर्म अनादि तथा अनन्त है । हमें एतद्विषयक ज्ञान अवश्य रखना चाहिये; तदनुसार लिखा जाता है-इस कल्पका सृष्टि - संवत्सर । जहां पुराणोंने प्राचीन इतिहास बताकर हमारी जाति तथा हमारे धर्मकी प्राचीनता बताई है, वहां कल्प और सृष्टि- संवत्सर की गणना बताकर भी इस हिन्दुजातिकी अत्यन्त प्राचीनता, अर्थात्

पृष्ठ 623

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कल्प एवं सृष्टि - संवत्सर इसे सारे संसारकी जातियों वा धर्मोका आदिम - उद्गम, आदि - मूल सिद्ध कर दिया है । केवल बिना हिसावके पंक्तियां भरनेके लिए अंक लिख नहीं मारे, किन्तु उसका पूरा - पूरा हिसाव दिया है । स्वा ० दयानन्दजीने भी वह हिसाव पुराणोंसे ही लिया है, पर पुराणोंके पूर्ण ज्ञान न होने से उनके हिसावमें कुछ भूल रह गई है; पर उनकी पुस्तकोंके आरम्भ में आर्यसृष्टि - संवत्सर लिखते हुए वह भूल ठीक कर डाली गई है; बल्कि हमने ऋग्वेदादि-भाष्यभूमिकाका एक संस्करण निकला हुआ देखा था; जिसमें स्वा ० दयानन्दजीकी वह भूल निकाल दी गई थी । अस्तु । सनातनधर्मके प्रत्येक कर्म में एक संकल्प पढ़ा जाता है, वह यह है-ॐ तत्सदद्य ब्रह्मणो द्वितीयपरार्द्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्तैकदेशान्तर्गते कुमारिकानामक्षेत्रे वैवस्वत मन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे, कलिप्रथम चरणे बौद्धावतारे ' । इसीके द्वारा सृष्टिसंवत्सर सरलता तथा संक्षेपसे प्राप्त हो जाता है । इसमें वर्तमान श्वेतवाराहकल्प और उसमें भी वैवस्वत-मन्वन्तर बताया गया है; और ब्रह्माका द्वितीयपरार्ध बताया गया है । इसकी स्पष्टता की जाती है-इस पर यह जानना चाहिये कि - ब्रह्माजी की अपने परिमाण से सौ वर्षकी आयु होती है ॥ ब्रह्माण्डकी सृष्टिसे लेकर महाप्रलय तक इतना समय व्यतीत होता है । ब्रह्माजीका प्रथम - परार्ध बीत चुका है; अर्थात् उनकी आयु पचास साल बीत चुकी । अब द्वितीय परार्धका

पृष्ठ 624

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५३६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) प्रथम कल्प उनके ५१ वें वर्षका प्रथम दिन यह वर्तमान है, जिसका नाम श्वेतवाराहकल्प है । उसकी भी १३ घड़ियाँ, ४२ पल, ३ विपल, ४३ प्रतिविपल बीत चुके हैं । यही श्रीमद्भागवत में लिखा है-' एवं विधेरहोरात्रैः कालगत्योपलक्षितैः । अपक्षितमिवास्यापि ( ब्रह्मणः ) परमायुर्वयः - शतम् । यदर्धमायुषस्तस्य परार्धमभिधीयते । पूर्वः परार्धोपक्रान्तो ह्यपरोऽद्य प्रवर्तते ' ( ३।११।३२-३३ ) अयं तु कथितः कल्पो द्वितीयस्यापि भारत! वाराह इति विख्यातः ' ( ३।११।३६ ) इसी प्रकार मार्कण्डेयपुराण ( ४६।४२-४३-४४ ) में भी कहा है । एक कल्पमें एक हजार चतुर्युग होते हैं । उन एक हज़ार चतुर्युगों में चौदह मन्वन्तर होते हैं । १ सत्य, २ नेता, ३ द्वापर, ४ कलि - ये चार युग हैं । १४ मन्वन्तरोंके नाम यह हैं - – १ स्वा-यम्भुव, २ स्वारोचिष, ३ उत्तम, ४ तामस, ५ रैवत, ६ चाक्षुष, ७ वैवस्वत, सावर्णिक, ६ दक्षसावर्णिक, १० ब्रह्मसावर्णिक, ११ धर्मसावर्णिक, १२ रुद्रसावर्णिक, १३ देवसावर्णिक, १४ इन्द्र-सावर्णिक | यह वर्णन श्रीमद्भागवत ( ८ स्कं ० १, ५, १३ अध्याय ), मनुस्मृति ( १।६१-६२-६३ ), विष्णुपुराण ( ३।२ ) तथा हरिवंशपुराण ( १७ ) में देखा जा सकता है । स्वा ० दयानन्दजीने भी यह नाम पुराणोंसे ही उद्धृत करके अपनी ऋ. भा. भू. ( २१ पृष्ठ ) में लिखे हैं । मनुस्मृति में भी केवल ७ मन्वन्तरोंके ही नाम हैं, सभी के नहीं । पुराण मनुस्मृति से अर्वाचीन नहीं हैं । वेद और पुराण समानकालीन हैं । जैसे वेदोंको अग्नि, वायु, रवि आदिसे दुहा गया, वैसे पुराणोंके वक्ता भी अग्नि, वायु, रवि आदि हैं । प्रति-

पृष्ठ 625

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कल्प एवं सृष्टि - संवत्सरं IIII द्वापरमें उत्पन्न व्यास इनका संस्करण करते हैं । याधुनिक ( २ वां ) संस्करण श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासने किया है । व्यास यह उपाधि है; उत्पत्ति तो पुराणोंकी भी वेदोंके साथ ही है । इसी कारण वेद में पुराणोंका नाम और पुराण में वेदों का नाम मिलता है । व्यास तो पुराणोंके वेदकी तरह विभागकर्ता ही हैं, निर्माता नहीं । इसलिए मनुस्मृति, रामायणादि प्राचीन ग्रन्थों में पुराणोंका नाम देखनेसे हैरान न होजाना चाहिये । इसलिए मनुस्मृति में भी मन्वन्तर आदि का वर्णन पुराण- मूलक ही है । तभी मनुस्मृति में ' पुराणानि खिलानि च ' ( ३।२३२ ) यहां पुराणों का वर्णन भी है, और मनुस्मृति भी सृष्टिके आदि में बनी हुई है । यह स्वामी दयानन्द भी मानते हैं-देखिये सत्यार्थप्रकाशमें ११ वें समुल्लास का आरम्भ ।. पुराणोंका ही आश्रय लेकर ' सूर्य - सिद्धान्त ' ( १।१३, १४, १५, १६, १८, १ ९, २०, २१, २२, २३ पद्यों ) में भी कल्पका वर्णन आया है । तदनुसार वर्तमान ( श्वेतवाराह ) कल्पके स्वायम्भुव यादि छः मन्वन्तर अपनी - अपनी सन्ध्याओं समेत बीत चुके हैं । कल्पकी सन्ध्यासमेत सात सन्ध्याएं बीत चुकी हैं । वैवस्वत मन्वन्तरके ( जो आजकल चालू है ) ७१ महायुगों में २८ सत्ययुग, २८ त्रेता, २८ द्वापर, और २७ कलियुग बीत चुके हैं । अब अट्ठाइसवां कलियुग, उसका भी प्रथम चरण चालू है, जिसे आज ( सं ० २०१२ वि ० में ) ५०५६ वर्ष बीत चुके हैं । कलियुग के आरम्भमें ३६००० वर्षकी सन्ध्या हुआ करती है, अभी उस सन्ध्याकालके बीतने में ३०,६४४ वर्ष शेष हैं ।

पृष्ठ 626

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१६६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) एक मन्वन्तरमें ७१ चतुर्युग ( महायुग ) होते हैं; प्रत्येक - युगमें सन्ध्या तथा सन्ध्यांश हुआ करता है । एक कल्पका वर्षसमूह ब्रह्माजीका एक दिन हुआ करता है I । कल्पके वर्ष ४,३२,००,००,००० होते हैं । आज सं ० ( २०१२ ) तक इस कल्पके १,६७,२६,४६, ०५६ वर्ष बीत चुके हैं, तथा २,३४,७०,५०,६४४ वर्ष शेष हैं । यह विषय श्रीमद्भागवतपुराण आदिमें स्पष्ट है । इस विषय में कुछ प्रसारण द्रष्टव्य हैं-' कृतं त्रेता द्वापरं च कलिश्चेति चतुर्विधम् । दिव्यैर्द्वादशभिर्वर्षैः * यहांपर युगोंके वर्ष ' दिव्य ' ( देवताओं के ) कहे गये हैं । देवता तथा मनुष्योंकी वर्षव्यवस्था भिन्न - भिन्न हुआ करती है । जैसे कि - ' रात्र्यहनी वर्षं प्रविभागस्तयोः पुनः । ग्रहस्तनोदगयनं रात्रिः स्याद, दक्षिणायनम् ' ( मनुस्मृति १।६७ ) । यहां पर स्पष्ट कहा है कि मनुष्योंका साल ( ३६० दिन ) देवताओंका एक दिन - रात होता है । ऐसा ही ' सूर्य-सिद्धान्त ' ( १।१३ ) में भी कहा है । तब ' श्रीमद्भागवत ' के ' दिव्यैर्द्वादश-भिर्वर्षैः ' ( ३।११।१८ ) तथा मनुस्मृतिके ' एतद् द्वादशसाहस्रं देवानां युगम् ' ( १।७१ ) के कहे हुए चारों - युगों के १२ हज़ार वर्ष देवताओंके हैं । इनके मनुष्य - वर्ष बनानेकेलिए ३६० से गुणा करना पड़ेगा । तब १२,००० × ३६० इनका गुणनफल ४३,२०,००० यह चतुर्युग मनुष्य-वर्ष बनेंगे । यदि उक्त बारह हज़ार वर्ष देवताओंके न मानकर मनुष्योंके माने जावें, तब तो कलियुग समाप्त हो चुका हुआ माना जावेगा, और सत्ययुग को भी समाप्तप्राय मानना पड़ेगा । क्योंकि — कलियुगकी दिव्यवर्ष -संख्या १२०० है, और सत्ययुग ४८०० दिव्यवर्षोंका है । महाभारत युद्धकालसे प्रारम्भ हुए कलियुगको २०५६ साल बीत चुके हैं - यह सर्वसम्मत बात

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कल्प एवं सृष्टि - संवत्सर सावधानं निरूपितम् ॥ चत्वारि, त्रीणि, द्वे, चैकं कृतादिषु यथा-क्रमम् । संख्यातानि सहस्राणि द्विगुणानि शतानि च ॥ सन्ध्यां-शयोरन्तरेण यः कालः शतसंख्ययोः । तमेवाहुर्युगं तज्ज्ञा यत्र धर्मो विधीयते ' ( ३।११।२० ) त्रिलोक्या युगसाहस्र वहिः आ ब्रह्मणो-दिनम् । तावत्येव निशा तात! यन्निमीलति विश्वसृक् ( ३ | ११ | २२ ) निशावसाने आरब्धो लोककल्पोनुवर्तते । यावद् दिनं भगवतो मनून् भुञ्ज श्चतुर्दश । स्वं स्वं कालं मनुर्भुक्त साधिकां ह्यक-सप्ततिम् ' ( ३।११।१८-२०, २२-२४ ) । यही बात मनुस्मृति ( १।६८-७४, ७६-८० ) में तथा महाभारत ( वनपर्व १८८ / २२-२४,२६ ) तथा शान्तिपर्व मोक्षधर्मपर्व ( २३१।१६-१७,१६-२१, २६-३१ ) में भी स्पष्ट की गई है । है | अतः दिव्य वर्षोंको मनुष्यवर्ष मानना ठीक न होकर देववर्ष ही मानना ठीक है । कलियुगके ४८०० वर्ष तथा सत्ययुगके १२०० वर्ष मानना भी गलत है । क्योंकि — कलियुग सब युगोंले सब बातों में छोटा होता है । कलियुगसे दुगुना द्वापर, तिगुना ग्रेता, और चौगुना सत्य युग होता है — यह सर्वशास्त्रसम्मत बात है । मनुस्मृति व्यादिके अनुसार सत्य-युगके ४८००, त्रेताके ३६००, द्वापरके २४००, और कलिके १२०० -दिव्य वर्ष होते हैं । इन्हें जोड़ने पर १२,००० यह चतुर्युगोंके दिव्य वर्ष होते हैं । इन्हें ३६० से गुणा करनेपर ४३,२०,००० मनुष्य वर्ष होते हैं । देववर्ष और मनुष्य की भिन्नतामें यह प्रमाण हैं— ' मासेन स्याद अहोरात्रः पैत्रः, वर्षेण दैवतः ' ( अमर ० १।७।२१ ) अर्थात् मनुष्योंका एक मास पितरोंका एक दिन - रात होता है । मनुष्यों का एक साल देवताओंका एक दिन - रात होता है । बोधायनगृह्यपरिभाषासूत्र में भी कहा है - ' संवत्सरो वै देवानामहोरात्रम् । तस्य एतद उदगयनम् अहः,

पृष्ठ 628

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६०० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) अव हम इनका विवरण लिखते हैं । ' श्रीसनातनधर्मालोक ' के विज्ञ - पाठक सावधानता से देखें-( सं ० २०१२ वि ०, कलियुग ५०५६ सन् १ ९ ५६ ) कल्पके मानुषी - वर्णोंका विवरण । गत छः मन्वन्तरोंके वर्ष १,८४,०३,२०,००० इनकी सात सन्धियों के वर्ष १,२०,६६,००० ७ वें मन्वन्तरके गत २७ चतुर्युगों वर्ष ११,६६,४०,००० २८ त्रियुगोंके भुक्त वर्ष ३८,८५,००० वर्तमान २८ वें कलिके मुक्त वर्ष ५,०५६ भुक्त कल्पके वर्षोंका योग १,६७,२६,४६,०५६ दक्षिणायनं रात्रिः ' ( १।२।१३ ) । तैत्तिरीयब्राह्मण में भी - — ' एकं वै एतद देवानामहः, यत् संवत्लरः ' ( ३।६।२२ ( १ ) यही कहा है । इसकी ध्वनि ऋग्वेदसं ० में भी मिलती है- ' मानुषाणि युगानि पान्ति मर्त्यम् ' ( २४ ) यहां पर मय के साथ मानुष - युगों का सम्बन्ध बताया गया है । महाभारत शान्तिपर्व ( २३१।१६ - १७-१६ ) में भी मनुष्यवर्ष और दिव्य-वर्षोंका भेद स्पष्ट दिखलाया गया है । इससे जो लोग मानते हैं कि— २००० विक्रमी संवत् में कलियुग समाप्त होगया- उन श्रीराजनारायण आदि का पक्ष खण्डित हो गया । इस विषय में हम किसी अन्य पुष्पमें प्रकाश डालेंगे । इससे देवता और मनुष्योंका भेद भी सिद्ध होगया । आर्यसमाजी आदि देवता और मनुष्योंका भेद नहीं मानते, पर यह बात शास्त्रविरुद्ध है - इस विषय में ' श्रीसनातनधर्मालोक ' का चतुर्थ- पुप्प देखें । उसमें ' क्या विद्वान् मनुष्य ही देव हैं '? ' देवता और मनुष्योंकी भिन्नता ' यह दो निबन्ध पढ़ लेनेसे सब संशय दूर हो जायेंगे ।

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कल्प एवं सृष्टि - संवत्सर ६०१ भोग्यकल्पके मानुपी आगे सात मन्वन्तरोंके वर्ष उनकी आठ सन्धियोंके वर्ष आगे ४३ चतुर्युगों के वर्ष वर्तमान कलियुगके शेष वर्ष कल्पके अग्रिम वर्षोंका योग इस गणनासे कल्पके भुक्त वर्ष " } I भोग्यवर्ष इनका योग ( ब्रह्माका दिन ) वर्णोंका विवरण । २,१४,७०,४०,००० १,३८,२४,००० १८,५७,६०,००० ४,२६,६४४ -२,३४,७०,५०,६४४ १,६७,२६,४६,०५६ २३४,७८,५०,६४४ ४,३२,००,००,००० ये एक कल्पके वर्ष हैं । एक कल्प ब्रह्माका एक दिन होता है । आर्यसमाजके प्रवर्तक स्वामी दयानन्दजीने पुराण आदिका पूर्णज्ञान न होने से ऋभाभू ० ( ४ र्थ संस्करण ) के इस प्रकरणमें कल्पके मुक्त वर्षोंमें गत छः मनुओंके सात सन्ध्यंशों के मुक्त वर्ष १,२०,६६,००० यह नहीं मिलाये । तब इतनी उसमें कमी रह गई है । उन्होंने उक्त पुस्तकके २४ पृष्ठमें विक्रम सं ० १ ९ ३२ के अनुसार १,६६,०८, ५२,६७६ वर्ष लिखे हैं । उन्हें उनमें उक्त - सन्ध्यंशोंके भुक्त - वर्षों ( १,२०,६६,००० ) को मिलाना चाहिये था, इस प्रकार उन्हें १,६७,२६,४८,६७६ वर्ष सं ० १ ९ ३२ में लिखने अपेक्षित थे । प्रसन्नताका अवसर है कि स्वामीके अनुयायियोंने उनकी यह भूल मानी । जैसे कि - मेरठ के ' वेदप्रकाश ' ( ७१६-७ अङ्क ११५ पृष्ठ ) में श्रीतुलसीराम - स्वामीने और १ ९ १६ के अक्टूबर के अङ्क २४५ पृष्ठमें

पृष्ठ 630

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६०२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) श्रीछुट्टनलाल - स्वामीने भी यह स्वीकार किया । इसलिए अब सत्यार्थप्रकाश आदिके बाहर वैदिक स्वा ० दयानन्दजी के अनुसार नहीं, किन्तु अपने शब्दसे पौराणिकोंके अनुसार श्रार्य - सृष्टि-संवत्सर लिखा जाता है । इसी प्रकार उक्त पुस्तकमें भोग्य वर्षोंके लिखनेमें भी स्वामीजी-ने भूल की है । वहां लिखा है कि- ' २,३३,३२,२७,०२४ वर्ष इस सृष्टिको भोग करनेके बाकी रहे हैं; पर उनमें उन्होंने आगेके सात मन्वन्तरोंकी आठ सन्धियोंके १,३८,२४,००० वर्ष नहीं मिलाये । वहां उन्हें ( सं ० १ ९ ३२ के अनुसार ) २,३४,७०,५१,०२४ इन भोग्य - वर्षोंको लिखना चाहिये था । उनकी इस पुराण सम्बन्धी भूलको उनके समझदार अनुयायी मानते हैं, तभी तो वे कल्पके वर्ष हमारे अनुसार ४,३२,००,००,००० मानते हैं; और उन्हें वेदसे भी सिद्ध करते हैं । वह मन्त्र यह है— ' शतं तेऽयुतं हायनान्, द्वे युगे. नीरिण, चत्वारि कृण्मः ' ( अथर्व ० २।२१ ) । सुना गया है कि इस वेदमन्त्र से यह कल्पना श्रीलेखरामजी आर्यमुसाफिरने बलात् निकाली थी । इसका संकेत ला ० मुन्शीरामजीसे बनाये ' आर्यपथिक ' में दिया है । वे इस मन्त्रका भाव यह बताते हैं कि इकाई - दहाई आदिके क्रमसे शत ( १०० ) अयुत ( १०,००० ) लिखो, अर्थात् १०० × १०,००० = १०,००,००० यह अङ्क लिखो । फिर उसके बाएँ ' द्वे युगे – २ का अङ्क जोड़ो । फिर बाएँ ओर ' त्रीणि ' ३ का अक जोड़ो । फिर उसके बाएँ ' चत्वरि ' ४ का अ जोड़ो । ऐसा करने पर ४,३२,००,००,००० कल्पके वर्ष हो