सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 661–670
सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 661–670
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श्रीरामनवमी ६३३ बतानेसे उसका सूक्ष्मतम आकार सिद्ध कर दिया गया । केवल निराकार इष्ट होने पर अपेक्षाकृत सूक्ष्मत्व भी परमात्मामें नहीं हो सकता । इस प्रकार स्वामीने अन्यत्र भी कहा है- ' जो स्थूल होता है, वह प्रकृति और परमाणु जगत्का उपादान कारण है, और वे ( प्रकृति, परमाणु ) सर्वथा निराकार नहीं; किन्तु परमेश्वरसे स्थूल और अन्य कार्यसे सूक्ष्म आकार रखते हैं; ( पृ ० १३३ ) यहां स्वामीने कार्यको प्रकृतिकी अपेक्षा स्थूल माना है, और प्रकृतिको परमात्माके आकारकी अपेक्षा स्थूल कहा है । इस प्रकार परमात्माके प्रकृतिकी अपेक्षा भी सूक्ष्म कहने से वह सूक्ष्मतम श्राकारयाला, अतः साकार तो 1 सिद्ध हो ही गया । इसलिए स्पष्ट हैं कि - ' निराकार ' शब्दमें ' निर ' ' अनुदा कन्या'के नचूकी तरह अल्पार्थक, अस्फुटार्थक ही सिद्ध है, निषेधार्थक नहीं, नहीं तो परमात्मामें शून्यतापत्ति हो जावेगी । इस प्रकार ' जीवका स्वरूप... अल्प अर्थात् सूक्ष्म है और परमेश्वर अतीव सूक्ष्मात् सूक्ष्मतर... स्वरूप है ' ( स ० प्र ० ७ पृ ० ११६ ) यहां भी स्वामीजीने परमात्माका स्वरूप आत्मा के आकार की अपेक्षा मी सूक्ष्मतर माना है; तब परमात्मा साकार भी सिद्ध हो ही गया । इस प्रकार अन्यत्र भी स्वामी ने कहा है- ' परमेश्वर अतिसूक्ष्म और जीव उस [ परमात्मा ] से कुछ स्थूल होनेसे इनका स्वरूप भी भिन्न है ' ( स ० प्र ० ७ पृ ० १२३ ) यहां भी परमात्माका आकार आत्माकी अपेक्षा सूक्ष्मतर कहने से उसका आकार सिद्ध हो ही गया । इसलिए स्पष्ट हैं कि - ' निराकार ' शब्दमें ' निर'का ' अनुदरा कन्या, अन मित्रो राजा, अजातशत्रुर्युधिष्ठिरः, निर्मक्षिकम् आदिको
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६३४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) भांति ' अल्प ' अर्थ ही है । आकाश और जीवको निराकार कहा जाता है; पर स्वामी आकाश तथा जीवको परमात्मासे कुल स्थूल मानते हैं; तब जेसे वे सूक्ष्म आकारवाले होनेसे ' निराकार ' कहे जाते हैं; वैसे परमात्मा भी सूक्ष्मतम चाकार वाले होनेसे ' निराकार ' कहा जाता है, आकार के अभाव होने से नहीं ' । अस्तु । जो कि यह आशय कहा जाता है कि - ' परमेश्वर सबसे बड़ा एवं निराकार है, वह मनुष्य आदियों के लघु - शरीरमें और अत्यन्त-लघु- गर्भाशयों में कैसे प्रवेश कर सकता है; अतः परमात्माका अवतार नहीं हो सकता ' इसपर जानना चाहिये कि आकाश भी सब संसारी वस्तुओंसे महान् है, और निराकार है, ईश्वरकी अपेक्षा महास्थूल है; क्योंकि परमात्माके लिए ' सूक्ष्माच्च तत् सूक्ष्मतरं विभाति ' कहा गया है । इस प्रकार उसकी अपेक्षा स्थूल भी प्रकाश घट आदि छोटे - छोटे पदार्थोंमें पूर्णतया प्रविष्ट होकर घटमें घटाकाश नामसे, तथा मठ आदि में मठाकाश आदि नामों से प्रसिद्ध होता है । घट आदि उपाधिके हटने से उस आकाशका नाश नहीं होता, तब आकाशसे भी महासूक्ष्म परमेश्वर भी यदि माताके गर्भाशय में प्रविष्ट हो जाता है और दिव्य रूप से अवतीर्ण हो जाता है; तो इसमें श्राश्चर्य क्या? तब धर्मको क्षीयमाण देखकर जिस प्रकार से उसकी रक्षा * इस विषय में विशेष - स्पष्टता श्रीसनातनधर्मालोक - चतुर्थ पुप्पमें ' अवतारवाद - रहस्य ' में देखें । इस पुष्पका मूल्य ४ । ) है । पाठक हमसे मंगा सकते हैं । डाकव्यय पृथक् ।
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श्रीरामनवमी ६३५ देखता है; उसी ही प्रकारसे देव, मनुष्य, पशु, पक्षी आदिके शरीरोंमें प्रकट होकर धर्मकी रक्षा करता है, और अपने स्वरूप में भी । तथाभूत ही स्थित रहता है । जैसे आकाश घटके भीतर . विद्यमान होकर घटाकार दीखता है, घटाकृतिके दूर होनेपर वही घटाकाश अपने स्वरूप में आ जाता है, घटरूप उपाधिके योगमें भी आकाशमें कोई विकार नहीं रहता; वैसे परमात्माके अवतारके विषय में जान लेना चाहिये । उसी भगवान्के अवतार श्रीरामका चरित्र जाननेकी यदि इच्छा हो तो वाल्मीकि रामायण देखना चाहिये I । वहां पता लगेगा कि- आदिकविने किस मधुरिमा से और किस मार्दवसे रामचरित्र अङ्कित किया है । परन्तु आजका समय विचित्र है । वह कहता है कि- ' तुलसी- रामायण ( मानस ) में तो श्रीरामको भगवान् वा उसका अवतार स्पष्टरूपसे कहा है; पर वाल्मीकि रामायण में ऐसा नहीं है । वहां तो श्रीरामको पूर्ण मानव ही प्रसिद्ध किया गया है, ईश्वर नहीं । तब बाल्मीकि रामायणके आधारसे बनाये हुए ' मानस ' में गोस्वामी तुलसीदासने अपनी ही निर्मूल कल्पनाएँ डाल दी हैं; जिनका वाल्मीकि रामायणसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं । वाल्मीकि ० में श्रीराम के मुखसे स्पष्ट कहलवाया गया है - ' आत्मानं मानुषं मन्ये रामं दशरथात्मजम् ' ( ६।११६।६ ) । इस प्रकारके वक्ता सचमुच दयनीय हैं । राम परमात्माके अवतार सिद्ध न हो जाएँ; इस कारण उसकी अवतारताकी स्पष्टता बतानेवाले उत्तरकांडको वे रामायण से काटते हैं कि वह
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) वाल्मीकि - प्रणीत नहीं; वा उसका अङ्ग नहीं । परन्तु इस प्रकारके वक्ता वस्तुतः परप्रत्ययनेय - बुद्धि हैं । वाल्मीकि - रामायणमें तो स्थल - स्थल में श्रीरामको परमात्माका अवतार कहा और माना गया है । हां, यह अवश्य है कि जैसे श्रीकृष्ण गीताके श्लोक - श्लोकमें अपनेको स्पष्टतया परमात्मा घोषित करते हैं; वैसे श्रीराम नहीं । उसका कारण यह है कि — श्रीकृष्ण में दिव्यांश अधिक है, जिसके कारण उन्हें षोडश - कलासम्पूर्ण माना जाता है— उनमें लोकोत्तरता भी कुछ आगई है । इसलिए उनके कई चरित्र भी लोकोत्तर होने से सर्वसाधारणके अनुकरण - योग्य नहीं ठहरते । परन्तु श्रीराम के सम्बन्धमें ऐसा नहीं । उनमें श्रीकृष्णकी अपेक्षा कुछ न्यून ( बारह ) कला होने से वे लोकानुकरणीय चरित्र हो गये हैं । इस-लिए उन्हें संसार में ' मर्यादा पुरुषोत्तम ' माना जाता है । इसलिए उन्होंने अपने श्रीमुख से अपनी ' भगवत्ता ' सुस्पष्ट नहीं बताई । परन्तु रामायणमें उन स्थलोंकी न्यूनता नहीं है— जहां उन्हें भगवान्का अवतार संकेतित किया गया है । बल्कि रामायणके आरम्भसे अन्ततक यह बात भरी हुई है । इस विषय में विस्तार से हम अन्य पुष्पमें लिखेंगे । अब यहां कुछ उद्धरण दिये जाते हैं । जब महाराज दशरथ पुत्रेष्टि यज्ञ कर रहे थे; तभी दूसरी ओर देवतागण भगवान् को दाशरथिरूप में अवतार लेकर रावण वधार्थ प्रार्थना कर रहे थे कि - ' राज्ञो दशरथस्य त्वमयोध्याधिपतेर्विभो! ' ( १।१५१६ ) अस्य पुत्रत्वमागच्छ कृत्वात्मानं चतुर्विधम् । तंत्र. एवं मानुषो भूत्वा प्रवृद्ध लोककएटकम् ' ( २१ ) अवध्यं दैवतैर्विष्णो!
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श्रीरामनवमी ६३७ समरे जहि रावणम् ' ( २२ ) यहां श्रीरामकी भगवदवतारता स्पष्ट है । ' त्वं ब्रह्मा त्वं च वै विष्णुः, त्वं रुद्रस्त्वं प्रजापतिः ' ( ७१७ ) मैत्र्युपनिषत् के इस प्रमाणमें परमात्माको ' विष्णु ' कहा है । महाभारतमें विश्व-रूपधारी हरिने ' सन्ध्यांशे समनुप्राप्ते त्रेताया द्वापरस्य च । अहं दाशरथी राम्रो भविष्यामि जगत्पतिः ( शान्तिपर्व ३३६।८५ ) रामको अपना अवतार कहा है । विश्वामित्रने भी दशरथको यह संकेत किया था - ' शक्तो ह्येष मया गुप्तो दिव्येन स्वेन तेजसा । ' ( १ । १६ । ६ ) राक्षसा ये विकर्तारः तेषामिह विनाशने ' ( १० ) यहां सोलहवर्षसे छोटी आयुवाले श्रीराम का दिव्य तेज बताकर उसे विष्णुका अवतार सूचित कर दिया है । नहीं तो दुर्दान्त - राक्षसोंके मारनेकेलिए महारथी दशरथको न ले जाकर एक - चालक रामका अपने साथ लेजाना विश्वामित्रका और क्या अर्थ रखता है? परशुरामने पराजित होकर रामको स्पष्ट कहा था- ' अक्षय्यं मधुहन्तारं जानामि त्वां सुरेश्वरम् ' ( १२७६/१७ ) इससे अधिक अवतारताकी स्पष्टता कैसी हो? अयोध्याकाण्डके प्रथम - सर्गमें भी इसकी चर्चा है - ' स हि देवैरुदीर्णेस्य रावणस्य वधार्थिभिः । अर्थितो मानुषे लोके जज्ञे विष्णुः सनातनः ' ( १७ ) यहां श्रीरामको स्पष्ट सनातन - विष्णु कहा है । ' सूर्यस्यापि भवेत् सूर्यो ' ( २।४४।१५ ) दैवतं देवतानां च ' ( २।४४ । १६ ) इस सुमित्राके वाक्यमें भी श्रीराम की अवतारता स्पष्ट है । अरण्यकाण्ड में भी जब शरभङ्गमुनि अपनी तपस्या से अर्जित
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६३८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) लोक श्रीरामको अर्पण करते हैं, तब श्रीरामने कहा था- - ' ' अहमेवा-हरिष्यामि स्वयं लोकान् महामुने! ' ( ३ | ५ | ३३ ) यहां श्रीरामने मुनिको स्वर्गादिलोक - प्रदान कहकर अपनेको अवतार सिद्ध कर दिया है । इस प्रकार सुतीक्ष्णमुनिके प्रकरण में भी । इस प्रकार ' त्वयि देववरे राम! ' ( ३।७४ | १२-१३ ) इस शवरीके वाक्यमें भी श्रीरामको ' देव-वर ' कहकर और उनकी पूजासे शवरीकी स्वर्गप्राप्ति कहकर श्री -वाल्मीकिने श्रीरामको अवतार सिद्ध कर दिया है । इस प्रकार सुन्दरकाण्ड में भी ' ब्रह्मा स्वयम्भूः चतुराननो वा, रुद्रस्त्रिनेत्रः त्रिपुरान्तको वा । इन्द्रो महेन्द्रः सुरनायको वा स्थातुन शक्ता युधि राघवस्य ' ( ५१।४४ ) इस हनुमान् के वचनमें भी अवतारता स्पष्ट है । युद्धकाण्ड में तो श्रीरामका अलौकिक - प्रभाव बहुत स्थलों में स्पष्ट है । रावणवध के बाद मन्दोदरीने भी रावणको लक्ष्य करके कहा था कि — तुम्हारे सामने आया हुआ देवराज इन्द्र भी डरता था; तब मनुष्यने तुम्हें कैसे मार डाला, यह मुझे बड़ा आश्चर्य है! अन्तमें उसने कहा था- ' व्यक्तमेष महायोगी परमात्मा सनातनः । अनादिमध्यनिधनो महतः परमो महान् । तमसः परमो, धाता शङ्ख-चक्रगदाधरः ' ( ६।११३।११-१२ ) मानुषं रूपमास्थाय विष्णुः सत्य-पराक्रमः ' ( १३ ) यहां श्रीरामको भगवान्का अवतार कहा है । इस प्रकार युद्धकाण्डके अन्तिम ( ११७ ( ११६ ) सर्गमें भी श्रीरामकी अवतारता स्पष्ट है । इस प्रकार ३ | १ | १८ आदि पद्योंमें ऋषियोंका रामके प्रति अञ्जलि करना भी श्रीरामकी भगवदवतारता बता रहा है; नहीं तो
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श्रीरामनवमी ६३६ वे क्षत्रियको नमस्कार क्यों करते? अन्यान्य भी इस विषय में बहुत प्रमाण हैं । ' आत्मानं मानुषं मन्ये ' ( ६।११६६ ) यह श्रीरामका कथन तो अपनी मर्यादा पुरुषोत्तमता प्रदर्शनार्थ है, अवतारत्वके हटानेके लिए नहीं । नहीं तो मनुष्यका अपने आपको मनुष्य कहना क्या अर्थ रखता है? फलतः श्रीवाल्मीकिरामायण के अनुसार श्रीराम परमात्मा केही अवतार हैं । वेदमें अवतारवाद । वेद में भी वीजरूपसे अवतारवाद तथा रामावतारका वर्णन मिलता है | ‘ प्र तद् विष्णुः स्तवते वीर्येण मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठा: ' ( यजु: ५।२० ) इस मन्त्र में विष्णु भगवान्को ' कुचर ' ( कौ पृथिव्यां चरति ) कहा है । उस सर्वव्यापकका भी कुचर— पृथिवीपर संचरण कहना उसकी अवतारता सिद्ध करता है । इसी को इन्द्रके लिए मानकर श्रीउवटने ' सर्वैरेतैर्मृगादिभिः पदैः इन्द्रो विशिष्यते । स हि विष्णोरुपमानं भवितुमर्हति । मृगो न - मृजूष् शुद्धौ । शुद्धोऽपहतपाप्मा इन्द्रः... कुचरः - कौ पृथिव्यां चरतीति कुचरः, मत्स्यकूर्मादिरूपेण ' तथा श्रीमहीधरने- ' कुचरः - मत्स्यकूर्मादि-रूपेण इन्द्रः पृथिव्यां चरति ' यह लिखकर वेदमें अवतारवादकी स्थिति बता दी है । ' मत्स्यकूर्म आदि ' यहांपर आदि शब्दसे रामावतार भी स्वयं गृहीत हो जाता है — क्योंकि — उनमें उसकी गणना भी है । ' प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तरजायमानो बहुधा विजायते ' ( यजुः वा ० सं ० ३१।१६ ) इस मन्त्र में प्रजापति - परमात्माका गर्भमें
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६४० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) सञ्चरण करते हुए भीतर से साधारण - पुरुषकी भांति उत्पत्ति न कहकर कई ढंगसे विशेष प्राकट्य कहा है । ' विजायते ' का अर्थ स्वा ० दयानन्दजीने भी ' विशेषकर प्रकट होना ' कहा है । सो ' विशेषकर प्रकट होना ' ही तो ' अवतार ' होता है, वैसे वह अप्रकट-रूपमें तो सर्वत्र व्यापक रहता ही है । ' स एव पुरुषः प्रजापतिः अस्य गर्भस्य अन्तः अजायमानः चरति, स एव बहुधाऽनेकप्रकारं विजायते ' यहां श्रीउवटने ' स सर्वात्मा प्रजापति: अन्तर्हृदि स्थितः सन् गर्भमध्ये प्रविशति, यश्च अनुत्पद्यमानो नित्यः सन् बहुधा कार्यकारणरूपेण विजायते - मायया प्रपञ्चरूपेण उत्पद्यते ' यहां श्री-महीधरने भी वही अवतारका अर्थ किया है । सर्वात्माका कार्य-कारणरूपसे अपनी मायासे उत्पन्न होना ही तो अवतार होता है । इसी वेदमन्त्रकी स्पष्टता करनेवाले अन्य भी वेदमन्त्र देखिये -' एषो ह देवः प्रदिशोऽनुसर्वाः पूर्वो ह जातः स उ गर्भे अन्तः । स एव जातः स जनिष्यमाणः प्रत्यङ् जनास्तिष्टति सर्वतोमुखः ' ( वा ० यजु ० ३२।४ ) ' रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव, तदस्य रूपं प्रतिचक्षणाय । इन्द्रो मायाभिः पुरूष ईयते ' ( ऋ ० ६।४७११८ ) इन मन्त्रों में उसी परमात्माको गर्भके भीतर जाने वाला, और उसको प्रकट होनेवाला एवं पुरुरूप - बहुरूप कहा है । यही तो अवतारवाद है । इन्हीं वेदमन्त्रोंका भगवान् श्रीकृष्णने भगवद्गीता में अपने श्री-मुखसे यह अनुवाद किया है - ' जोपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोपि सन् । प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ' ( ४।६ ) । ' बहू व्यतीतानि जन्मानि ( ४ | ५ ) ' जन्मकर्म च मे दिव्यं ' ( ४ | १ ) अब उक्त
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वेद में श्रीरामावतार ६४१ वेदमन्त्र तथा इन गीता - पद्योंकी ' आलोक ' के पाठकगण तुलना देखें-वेदमन्त्र गीता - श्लोक अजायमानः जोपि सन् प्रजापतिः, देवः, इन्द्रः भूतानामीश्वरोपि सन् बहुधा विजायते, चरति गर्भे अन्तः सम्भवामि ( संभवति ) जातः जनिष्यमाणः, गर्भे अन्तः वहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि जन्म कर्म च मे दिव्यम् इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते सम्भवाम्यात्ममायया वेद अपौरुषेय भगवद् - चाणी है, और भगवद्गीता पौरुषेय-भगवद् - वाणी; तब दोनों स्थलों में पूर्ण- तुलना हो जानेसे अवतार-वाद वैदिक सिद्ध होगया । जब ऐसा है; तो वेदमें अवतार-विशेषके वीज भी मिल सकते हैं । -' भद्रो भद्रया सचमान आगात् स्वसारं जारो अभ्येति पश्चात् । सुप्रकेतैर्द्युभिरग्निर्वितिष्ठन् उशद्भिर्वर्णैः अभि राममस्थात् ' ( ऋ ० १०।३।३ ) । रामभद्र श्रीरामका नाम ' उत्तररामचरित ' आदिमें बहुत प्रसिद्ध है । ' विनापि प्रत्ययं पूर्वोत्तरपद- लोपः ' ( ' अप्रत्यये तथैवेष्टः ' वा ० ५२३ | ८३ ) इस वार्तिकसे ' सत्यभामा, भामा, सत्या ' की तरह ' रामभद्रः, भद्रः, रामः ' यह प्रयोग बन सकते हैं । सो उक्त मन्त्रमें ' भद्रः ' राम - शब्दके लोप होने से ' रामभद्र ' का वाचक है, और उक्त मन्त्रके अन्त में ' राम ' में ' भद्र'का उक्त वार्तिकसे लोप हो गया है । ' अब उक्त मन्त्रका अर्थ यह हुआ, ' भद्रः - रामचन्द्रः, भद्रया-४१ स ० ध ०
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+६४२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) सीतया सह गात् वनं प्राप्तः । स्वसारं - सीतां ग्रहीतु जार: -रावणः, पश्चात् —रामपरोक्षे अभ्येति श्रागतः । ततो रावणे हते, अग्निः – अग्निदेवता, राममभि— श्यामवर्णस्य यह अर्थ कैसा अन्वित पहुँचे, श्रीरामके पीछे मरनेपर ) अग्नि - देवता उपस्थित हुआ । इस अर्थ में मन्त्र द्युभिः - रामदारैः सीतया सह - इत्यर्थः, श्रीरामभद्रस्य अभिमुखम् अस्थात् - स्थितः ' । हो रहा है कि - श्रीराम सीताके साथ वनमें रावण आया ( सीता को ले गया, रावणके रामकी खीके साथ श्रीराम के सामने - रामायण तथा श्रीनीलकण्ठका भाष्य भी साक्षी है । यदि अर्वाचीन होनेसे उस भाष्यकी मान्यता मानी जावे; तो स्वामी दयानन्द आदिका भाष्य तो उससे भी अर्वाचीनतर, कलका बना होने से आक्षेप्ता को भी अमान्य मानना पड़ जायगा । वेद में किसी सिद्धान्त के बीज ही तो देखने पड़ते हैं; नहीं तो वेदमें वादियोंसे मान्य १६ संस्कारोंका तथा गुरुकुल आदिका भी क्रमिक एवं स्पष्ट वर्णन न होनेसे अमान्यता हो जावेगी । केवल बीज देखकर शेष बातोंका अनुमान करना पड़ता है । एक प्रश्न होता है कि – ' उक्त मन्त्रमें सायण आदि भाष्यकारोंने ' राम ' का अर्थ ' श्यामवर्ण ' किया है; उवट - महीधरने ' कृष्ण ' का अर्थ ' कृष्णवर्ण ' किया है, अवतारवादका अर्थ नहीं किया; आप यह अर्थ कैसे करते हैं '? इसपर निवेदन यह है वेदका मुख्य विषय यज्ञ होनेसे ( जैसे कि - न्यायदर्शन ४ । १ । ६२ यदि बहुत प्रामाणिक पुस्तकों में कहा गया है ) सायरण आदि भाष्य-