सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 701–710

सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 701–710

पृष्ठ 701

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मृतकश्राद्ध - विज्ञान ६७३ के अनुसार जीवको दो गतियां बताई गई हैं - एक उत्तरगति; दूसरी दक्षिण- गति । जो नैष्ठिक ब्रह्मचारी आदि बनमें श्रद्धासे तपस्या किया करते हैं; वे उत्तरगतिको प्राप्त होते हैं । वे सूर्य-किरणोंके द्वारा सूर्यलोकमें प्राप्त होकर वहांसे ब्रह्मलोकमें जाते हैं, फिर वे इस लोक में नहीं आते, अर्थात् उनका पुनर्जन्म नहीं होता इसी उत्तरगतिको भगवद्गीता में ' शुक्लगति ' कहा है, जैसे कि-' अग्निर्ज्योतिरहः शुक्तः, षण्मासा उत्तरायणम् । तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ' ( ८।२४ ) । जो नैष्ठिक ब्रह्मचारी न रहकर विवाह करके यज्ञादियोंको किया करते हैं; वे यज्ञके धूमाभिमानी- देवताके द्वारा पितृलोकमें प्राप्त होकर वहांसे चन्द्रलोक में जाते हैं । वहां अपने शुभ कर्मोका फल प्राप्त करके वहांसे नीचे इस लोक में आते हैं, अर्थात् उनका पुनर्जन्म होता है । यही दक्षिण- गति है । इसीको भगवद्गीता में ' कृष्णगति ' कहा है । जैसे कि - ' धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् । तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी ( कर्मयोगी ) प्राप्य निवर्तते ( २५ ) । देवता तथा पितरोंको सूक्ष्म होने से स्थूल - भोजनकी आवश्यकता नहीं होती; किन्तु सूक्ष्म - भोजनकी आवश्यकता होती है । इसलिए वे यज्ञ तथा श्राद्धादिकी हविको देखकर ही तृप्त हो जाते हैं, जैसे कि कहा है — ' न वै देवाः अश्नन्ति न पिबन्ति, एतदेव अमृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ' ( छान्दोग्य ३।६।१ ) । तात्पर्य यह है कि वे उस स्थूल - हविसे सूक्ष्म अंशको आकृष्ट कर लिया करते हैं । पितर भी देवविशेष ४३ स ० ध ०

पृष्ठ 702

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६७४ श्री सनातनधर्मालोक ( ५ ) हैं । जैसे कि सांख्यकारिकामें लिखा है- ' अष्ट विकल्पो दैवः ' ( ५३ ) । इन आठ विकल्पवाली देवसृष्टिमें पितृसर्ग भी अन्तर्भूत है । उनके सूक्ष्म होनेसे उनको तृप्त करनेवाला भी सूक्ष्मांश ही हुआ करता है | जैसे हमारा सूक्ष्म - आत्मा हमसे खाये हुए स्थूल भोजनके हमारे उदराग्नि द्वारा किये हुए सूक्ष्म अंशको आकृष्ट करके उससे तृप्त होता है । यह हम उत्तरगति तथा दक्षिणगतिका निरूपण कर चुके! इनमें दक्षिणगति जानेवाले पहले वसु, रुद्र, आदित्य इन तीन नित्य-पितरोंकी श्रेणीको समाप्त किया करते हैं, फिर मरुत् और साध्य इन दो श्रेणियोंके पार करनेके बाद ब्रह्मरूप हो जाते हैं । उत्तरगति से जाने वालोंकी भांति यह प्रवृत्ति - ( पुनर्जन्म - ) रहित नहीं होते; बीच - बीचमें इनकी आवृत्ति - पुनर्जन्म भी हुआ करता है । कभी द्युलोकमें, कभी अन्तरिक्ष- लोकमें, कभी पृथिवी - लोकमें । इसलिए वेदमें इन पितरोंकेलिए स्वधा ( श्राद्ध ) देनेका विधान आया है; जैसे- ' स्वधा ( मृतकश्राद्धं ) पितृभ्यः पृथिविषद्द्भ्यः, स्वधा पितृभ्यो अन्तरिक्षसद्भ्यः, स्वधा पितृभ्यो दिविषद्भयः ' ( अथर्व ० १८४७८-७ ९ -८० ) । सो वसु, रुद्र, आदित्य इन तीन श्रेणियों वाले पितरोंको पुत्रादिसे किये हुए श्राद्ध ( पितृयज्ञ ) की अपेक्षा हुआ करती है । इसलिए श्राद्धके समय के संकल्प में ' वसुरूपाय पित्रे, रुद्ररूपाय पितामहाय, आदित्यरूपाय प्रपितामहाय स्वधा ' ऐसा कहा जाता है । इसी प्रकार मातारह आदि तीन पुरुषोंके लिए भी कहा जाता है ।

पृष्ठ 703

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मृतकश्राद्ध - विज्ञान ६७५ स्त्रियोंकेलिए गायत्रीस्वरूपिण्यै मात्रे, सावित्रीस्वरूपिण्यै पितामह्यं, सरस्वतीस्वरूपिण्यै प्रपितामह्यै स्वधा नमः ' यह तीन पद आते हैं । पर जब यही पितर उक्त पाँच श्रेणियोंको उत्तीर्ण कर लिया करते हैं; तब पुत्र द्वारा किये हुए श्राद्धकी आवश्यकता नहीं रहती । इसलिए श्राद्ध भी तीन पीढ़ी तक होता है; उसके बलसे उन्हें तीन श्रेणियोंको पार करने में सहायता मिल जाती है, आगे उन्हें सहायताकी आवश्यकता नहीं रह जाती । वैदिक - साहित्यमें मनुष्य - शरीरको पाट्कौशिक - छः कोष वाला माना गया है । पिता, पितामह, प्रपितामह यह तीन पितृपक्षीय, और माता, पितामही, प्रपितामही - यह तीन मातृपक्षीय इन छहों कोषोंका ऋण मनुष्यके शरीर में विद्यमान होता है । इस कारण मनुष्यको श्राद्ध एवं पिण्डदानादि भी इन्हीं छःकेलिए अपेक्षित होता है । इस प्रकरण से पाठकोंने यह स्पष्ट समझ लिया होगा कि उत्तरगति तथा दक्षिणगतिसे परलोकमें जाता है । उनमें नैष्ठिक ब्रह्मचारी तथा परमहंस - संन्यासी तो उत्तरगतिको प्राप्त होते हैं, उनकी मुक्ति हो जाती है, उनकेलिए तो श्राद्धादि करने की आवश्यकता नहीं रहती । परन्तु गृहस्थी लोग दक्षिणगतिको प्राप्त करके पितरोंकी तीन श्रेणियों ( वसु, रुद्र, आदित्य ) को प्राप्त करते हैं । मृतकश्राद्ध-की आवश्यकता इन्हीं केलिए होती है । इनका आत्मा श्रद्धा नामक सूक्ष्म जलीयांशोंके साथ ( जिसका निरूपण हम पूर्व कर चुके हैं ) पितृलोक में प्राप्त होता है । स्निग्ध पदार्थोंके इसी जलीय - अंशको

पृष्ठ 704

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६७६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) वैदिक - साहित्यमें ' श्रद्धा ' शब्द से कहा जाता है - जैसा कि हम पूर्व लिख चुके हैं । इसी ‘ श्रद्धा ' शब्दसे अण् प्रत्यय करने पर ' श्राद्ध ' शब्द बनता है; उसका परलोक - गतों से सम्बन्ध है; इसलिए ' पितरः शुन्धध्वम् ' कहकर स्वा ० दयानन्दादि भी जो कि पृथिवीपर जल डलवाते हैं, और ' पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः ' कहकर जो दक्षिण - दिशाकी ओर पितरोंके नामसे अन्नभाग रखवाते हैं - यह सब परलोकगतों के लिए ही है; अतः श्राद्ध भी मृतकोंका ही सिद्ध है, जीवितों से इनका कुछ भी सम्बन्ध नहीं । पर वेदादि - शास्त्रों के पूर्णतया ज्ञान न होनेसे आज के सम्प्रदाय जीवित- श्राद्धका हल्ला मचाया करते हैं । इतना नहीं सोचते कि हमारी एक जलकी बूंद पृथिवीपर डालनेपर तथा अन्नका एक मास रखनेपर जीवित पितर क्या तृप्त होंगे? अथवा यदि ने वेदादिको कुछ जानते भी हैं; तो अपने एकदेशी- पक्षका दुराग्रह होने से वेद - मन्त्रोंका अर्दन-विमर्दन करके उन्हें जीवित पितृपरक लगाते हैं । मृतकों में श्राद्धकी असंगति दिखाकर साधारण- बुद्धिवालोंको अपनी ओर खींच लिया करते हैं । वह समझते हैं कि हमारा पिता आदि मरा; तो. नेस्तनाबूद हुआ; अर्थात् फिर उसकी सत्ता न रही । कोई परलोक आदि नहीं, जिसमें मृतककी फिर सत्ता रहे । पर वस्तुतः यह नास्तिकता याद है; सूक्ष्मदृष्टि वाले ही इन बातोंको समझ सकते हैं; स्थूलष्ट नहीं TM पञ्चाग्निविद्या के पहले कहे प्रकरण में हमने छान्दोग्य उपनिषत की कण्डिकाको लिखा था- ' तस्मिन्नेतस्मिन् नौ देवाः श्रद्धां

पृष्ठ 705

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मृतक विज्ञान ६७७ जुह्वति ' सो यहाँ ' श्रद्धा ' शब्दसे जलका तात्पर्य है । नैष्ठिक ब्रह्मचारी एवं परमहंस - संन्यासी तो सर्वेथा मुक्त - स्वतन्त्र हो जाते हैं; उनको पुत्रादिके बन्धन वा सहायता की आवश्यकता नहीं रहती । पर जिन्होंने नैष्ठिक ब्रह्मचर्यको नहीं लिया, वा परमहंस -संन्यासको अपनी असमर्थता आदिवश स्वीकृत नहीं किया; वे स्वयं मुक्ति नहीं पा सकते; तव अपने नैष्ठिक- त्रह्मचर्यके भङ्ग करने से उत्पन्न हुआ हुआ पुत्र ही उनकी मृत्यु हो जाने पर उनकी मुक्त्यर्थ श्राद्धमें दिये हुए पायसादि द्रव्यों के जलीय अंशसे उन पितरोंको उक्त तीन श्रेणियों में उत्तीर्ण करने में सहायता दिया करता है - यही मृतक - श्राद्धका विज्ञान है, जिसे न जानकर प्रतिपक्षि - गरण उसका विरोध करते हैं । वह समझते हैं कि एक दिनके श्राद्ध से ब्राह्मण हमारी सम्पूर्ण सम्पत्तिको हड़प कर लेते हैं; और वे कहते हैं कि उनको श्राद्ध मत खिलाओ; क्या उनका पेट लैटरबक्स है, जो कि उनका खाया पितरोंको पहुँचता है - इत्यादि; यह सब वेदादि - शास्त्रों के अज्ञानका फल है । अस्तु । अब उसी छान्दोग्योपनिषत् - प्रोक्क पञ्चाग्नि - विद्यापर आइये । पुत्रादि से दिये हुए श्राद्धीय - पदार्थोंके सूक्ष्म- जलांशसे राजा सोम बनाया जाता है । इसका तात्पर्य यह है कि सूर्यकिरणोंसे आकृष्ट श्राद्धीय - पदार्थोंके जलांशसे चन्द्रमाकी किरणें जलप्रधान हो जाती हैं । यह है प्रथम अग्निकी बात । फिर छान्दोग्योपनिषद् ( ५५ ) के अनुसार दूसरी अग्नि पर्जन्याभिमानिनी - देवता होती है । इस अग्निमें देवता पहले उत्पन्न हो चुके हुए सोसकी आहुति देते हैं । इससे वृष्टि होती है । तीसरी अग्नि है पृथिवी । उसमें पहले हुई दृष्टिकी

पृष्ठ 706

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६७८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) आहुति दी जाती है, इससे अन्न उत्पन्न होता है । चतुर्थ अग्नि है पुरुष, उसमें पूर्व उत्पन्न हुए अन्नकी आहुति दी जाती है; उससे वोर्य उत्पन्न होता है । पञ्चम अग्नि होती है स्त्री; उसमें पूर्व उत्पन्न हो चुके हुए वीर्य की आहुति दी जाती है । उससे पुरुष उत्पन्न होता है । इस प्रकार सूर्य किरणों से श्रकृष्ट, और देवगण - द्वारा हुत जलके यथाक्रम - परिवर्तनमें पांचवीं आहुतिसे पुरुष उत्पन्न होता है । यही छान्दोग्यमें कहा है- ' इति तु पंचम्यामाहुतौ श्रापः पुरुष-वचसो भवन्ति ' ( ५ | ६ | १ ) । इससे स्पष्ट है कि — जलीय अंशसे सूक्ष्म - आत्मा उस - उस स्थानमें प्राप्त हो जाता है । पूर्व - अग्निमें आहुति देने से जो वस्तु उत्पन्न होती है; वही अगली अग्निमें हुत की जाती है । इस प्रकार पंचम आहुतिका परिणाम पुरुष होता है । अर्थात् पहले द्युलोकाग्नि ( सूर्य ) में श्रद्धा- जलकी आहुति से सोमकी उत्पत्ति हुई, उसकी आहुति पर्जन्याग्नि ( विद्युत ) में देनेसे वृष्टि हुई । वृष्टिकी पृथिव्यग्निमें आहुति होनेसे अन्न उत्पन्न हुआ । अन्नकी आहुतिके पुरुषाग्नि ( उदर ) में हुत होनेसे वीर्य उत्पन्न हुआ । वीर्यकी स्त्री-अग्नि ( गर्भाशय ) में आहुतिसे पुत्रोत्पत्ति हुई । यही जीवकी जन्मान्तरकी कथा है । ब्रह्मसूत्रके पूर्व कहे हुए इस वर्णन से स्पष्ट है कि- एक शरीरको छोड़कर परलोकमें जाते हुए जीवके सूक्ष्म - शरीरके साथ वही श्रद्धारूप- जल सूक्ष्मता से जाता है । श्राद्ध में दिये हुए जल, पिण्ड, खीर, घी आदिका श्रद्धारूप - जल परलोकमें गये हुए वा जा रहे हुए

पृष्ठ 707

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मृतक श्राद्ध - विज्ञानं ६७६ जीवका उपकार करता है, उसके सूक्ष्म शरीरको आप्यायित करता है, जिससे उसकी सद्गति होती है । इसीके साथ वह मृतकका सूक्ष्म - शरीर सूर्य किरणोंके साथ द्युलोकमें जाता है । फिर उस द्युलोकसे चन्द्रलोकमें, फिर चन्द्रलोकसे अन्तरिक्ष - लोकमें मेघोंमें, फिर मेघोंसे पृथिवीलोक में अन्नमें; फिर अन्नसे वीर्य में; फिर वीर्यसे वह सूक्ष्मशरीर सहित जीव गर्भ में आता है । दक्षिण-गतिवाले गृहस्थोंका यही गतिक्रम होता है । अन्नमें प्राप्त होनेके बाद वह जीव अपने पूर्व कर्मोंके अनुसार स्थावर, जङ्गम आदि उत्तम, मध्यम, अधम योनियों में जाता है । यह पूर्व कहा जा चुका है कि- श्राद्ध या पिण्डदान आदिकी अपेक्षा इन्हीं दक्षिणगतिवाले जीवों को होती है । श्राद्धादू नाम पितृयज्ञ होता है । देवताओंके लिए देय - वस्तुका नाम हव्य, और पितरोंके लिए देय - वस्तुका नाम ' कव्य ' होता है । देवयज्ञके कार्य प्रातः-कालसे मध्याह्न तक पूर्व वा उत्तरकी ओर मुख करके किये जाते हैं; पर पितृयज्ञके कर्म मध्याह्नके बाद अपराह्न में दक्षिणकी ओर मुख-करके किये जाते हैं । देवकृत्यमें यज्ञोपवीतको बाएं कन्वेपर रखना पड़ता है, और पितृयज्ञ - श्राद्धादिमें उपवीतको दक्षिण कन्घेपर रखा जाता है । प्रातःकालसे मध्याह्न तक सूर्य पूर्वोत्तर दिशामें रहता है, और उसकी किरणें दक्षिण एवं पश्चिमकी ओर नत होती हैं; और पूर्वोत्तराभिमुख उन्नत । मध्याह्नके बाद यह क्रम बदल जाता है । तब सूर्य दक्षिण दिशा में प्राप्त होता है, और उसकी किरणें उत्तराभिमुख नत होती हैं, और दक्षिणाभिमुख

पृष्ठ 708

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६५० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) उन्नत । पृथिवी से सूर्य किरणोंसे आकृष्ट हुआ द्रवद्रव्य – ( रस, श्रद्धारूप जल ) उसी दिशा में जाता है । यही कारण है कि- जो हमारे पूर्वज उत्तरगति से देवत्वको प्राप्त हुए; उनके यज्ञ पूर्वाह्न में करने पड़ते हैं, जब सूर्यकी किरणें भी उत्तराभिमुख उन्नत हों; अर्थात् उनकी आकर्षण - शक्ति से खिंची हुई वस्तु उत्तर - पूर्व दिशाकी ओर जा सके; तव जनेऊ को भी उत्तर ( बाएं ) कन्धेमें रखा जाता है । इसप्रकार पितृलोक - जिसकी स्थिति दक्षिण दिशा की ओर है— उससे सम्बद्ध श्राद्धादि कर्म भी मध्याह्न के बाद होते हैं; जब सूर्यकी किरणें दक्षिणाभिमुख उन्नत हों । पितृलोककी स्थिति दक्षिण में होने से पहले कही हुई दक्षिण- गति से परलोक जानेवाले इधरसे ही जाते हैं; इसीलिए श्राद्ध आदि भी तभी होते हैं; जब पृथिवीसे सूक्ष्म श्रद्धाजलकी आकर्षक सूर्य किरणें भी दक्षिणाभिमुख. उन्नत हों । तब यज्ञोपवीतको भी दाहिने कन्धेपर एवं दक्षिणाभिमुख उन्नत किया जाता है । शारीरिक एवं मानसिक शक्तियोंको दक्षिणाभिमुख उन्मुख करनेकेलिए, उन्हें सूर्य- किरणोंके साथः एक - दिशामें प्रेरित करनेकेलिए वैदिकविधि अनुसार विगुण कर्म द्वारा पितृयज्ञके विशुद्ध अपूर्व संस्कारको उत्पन्न करनेकेलिए, और उसे दक्षिण - दिशामें स्थित पितृलोकके पितरों तक अविकल रूपसे पहुँचानेकेलिए पितृकर्मके समय यज्ञोपवीतका दाहिने कन्धेपर करना आवश्यक है । जैसे ' बेतारका तार ' भेजने के समय एक स्थानमें ठहरी

पृष्ठ 709

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मृतकश्राद्ध - विज्ञान ६८१ हुई विद्युदु - धाराको स्थानान्तर पर ठीक पहुँचानेकेलिए बिजली के खम्भोंका एक - दूसरेकी सीधपर रखना आवश्यक होता है, वैसे ही देवलोक एवं पितृलोकके कार्यों में भी सूर्य किरणोंके साथ ही शारीरिक एवं मानसिक शक्तियों का एक सीध में होना आवश्यक है । जैसे ' वेतारका तार ' भेजने में प्रत्यक्ष रूपसे ' बिजली नहीं दीखती, न कोई विकार ही मालूम होता है; तथापि उसका प्रभाव उस स्थान में ही होता है, जहांके खम्भे से उसका एकमुखीभाव है; इस प्रकार विशुद्ध स्वर वर्ण द्वारा उच्चारण किये. हुए वैदिक मन्त्रोंसे उत्पन्न हुई शक्ति हव्य ( देवनिमित्तक - पदार्थ ) कव्य ( मृतपितृनिमित्तक - पदार्थ ) के सूक्ष्म जलीय - अंशोंको सूर्य-किरण - द्वारा, अप्रत्यक्षता में भी इष्ट देवताओं तथा पितरोंके पास पहुँचा दिया करती है । जनेऊ का दक्षिण वा उत्तर - दिशाके कन्धे पर उन्नत करना उस कर्मका सहायक अङ्ग होता है । पितृकार्य अमावास्या आदि नियत समयपर किया जाता है; इस कारण यज्ञोपवीतको दक्षिण – दाहिने कन्धे पर भी तभी करना पड़ता है । परन्तु दैवी - सम्पत्तिका समय हमें सदा ही ' अपेक्षित होता है; अतः उत्तर - वाम कन्धे पर यज्ञोपवीत भी हमें सदा ही रखना पड़ता है - यही श्राद्ध आदिमें यज्ञोपवीत आदि परिवर्तनका रहस्य हुआ करता है । ( ६ ) मृतक श्राद्ध - विज्ञान [ रात निबन्ध वेदादि - शास्त्रोंके ज्ञाता तथा विज्ञानका ज्ञान रखनेवालोंके लिए उपयोगी था; अब हम ' आलोक ' - पाठकोंके समक्ष

पृष्ठ 710

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६८२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) इस विषयमें एक आर्यसमाजी विद्वान्‌का विचार रखते हैं । यह श्रीरघुनन्दनशर्माकी अपनी वनाई हुई विशालकाय ' वैदिक - सम्पत्ति ' के ३७१-३७२ पृष्ठसे उद्धृत किया जाता है । इससे श्राद्ध पर शङ्कित - दृष्टि डालनेवाले आर्यसमाजियोंको मृतक श्राद्धकी सोप-पत्तिकता वा समूलता प्रतीत हो जावेगी । यह विवेचना सुगम होगी ] मनुष्य पुत्र उत्पन्न करके ही पितृ ऋण से उऋण होता है, इसलिए पुत्रकाम मनुष्य पितृपिण्डयज्ञके द्वारा अपने पितरोंको हविष्यान्न में आकर्षित करके वह हविं स्त्रीको खानेकेलिए देवे । किन्तु प्रश्न यह है कि चान्द्रलोकोंसे जीवोंको किस प्रकार खींचा जावे? जीवोंके खींचनेका यही तरीका है - जो सूर्यकान्तमणिके द्वारा सूर्यतापके खींचनेमें और चन्द्रकान्तमणिके द्वारा चान्द्रजलके खींचनेमें प्रयुक्त किया जाता है । जिस प्रकार चन्द्रकान्तके प्रयोगसे चान्द्रजलकी प्राप्ति होती है, उसी प्रकार चान्द्र- पदार्थोंको एकत्रित करनेसे चान्द्रवीर्य भी आकर्षित होता है । चान्द्रवीर्य में ही जीव रहते हैं, इसलिए उन पदार्थों में खिंच आते हैं, जो चन्द्राकर्षणकेलिये विधिसे एकत्रित किये जाते हैं । वे पदार्थ दूध, घृत, चावल, मधु, तिल, रजतपात्र, कुश और जल हैं । यह प्रक्रिया शरत्पूर्णिमाके दिन लोग करते हैं; परन्तु विधिपूर्वक क्रिया तो पितृश्राद्ध के ही समय होती है । पितृश्राद्ध अपराह्न के समय होता है । उसमें घृत, दूध, मधु, कुश आदि सभी पदार्थ रखे जाते हैं । पितरोंका प्रतिनिधि पुत्र अथवा पौत्र भी उन