सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 711–720

सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 711–720

पृष्ठ 711

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मृतकश्राद्ध - विज्ञान ६८३ पदार्थोंको छूता हुआ वहीं पर बैठता है । इसलिए यह सब हवि आदि सामग्री उसी प्रकारका यन्त्र बन जाती है, जिस प्रकार चन्द्रमरिण । इसी में पितर खिंचकर आते हैं । ' परायात पितरः सोम्यासः ' ( अथर्व ० १८ | ४ | ६३ ) और हविः पिण्ड सूघने अथवा खाने से वीर्य और गर्भ में आते हैं । शतपथ - ब्राह्मण ( १४ | ४ | २/२६ ) में लिखा है - जो प्रजाकी इच्छा रखता हो, वह पितृयज्ञ करे । यजुर्वेद ( २।२३ ) में लिखा है - आधत्त ' पितरो गर्भं कुमारं पुष्करस्रजम् ' इस पुरुषकी तरहके आकाशस्थ कुमार - पितर गर्भ धारण करते हैं । गृह्यसूत्रमें इसी मन्त्रकेलिए लिखा है - इस ' आधत्त ' मन्त्रको कहकर बीचके पिण्डको पत्नी खा लेवे । यही बात मनुस्मृतिमें भी लिखी है-' पतिव्रता धर्मपत्नी पितृपूजनतत्परा । मध्यमं तु ततः पिण्डमद्यात् सम्यक् सुतार्थिनी । आयुष्मन्तं सुतं सूते यशोमेधासमन्वितम् । धनवन्तं प्रजावन्तं सात्त्विकं धार्मिकं तथा ' ( ३।२६२-२६३ ) अर्थात् पितृपूजनमें रत, पुत्रकी इच्छा रखनेवाली, पतिव्रता स्त्री बीचका पिण्ड खावे - – इस प्रकार पुत्रेष्टियज्ञकी क्रिया पितृपिण्ड - श्राद्धके अन्दर घुसी हुई पाई जाती है । ' [ यह सब मृतक श्राद्ध में ही घटता है, नहीं तो ( यजु ० २।२३ ) मन्त्रसे पुत्र क्या जीवित - पिता से प्रार्थना करेगा कि मेरा पुत्र उत्पन्न करो; तब क्या जीवित पिता ही पुत्रकी खीमें गर्भ धारण करेगा? तब क्या वह नहीं कहेगा कि तुम यदि नपुंसक थे तो विवाह ही क्यों किया था? पर मृतपितृश्राद्धमें तो ऐसी कोई अनुपपत्ति नहीं

पृष्ठ 712

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श्री सनातनधर्मालोक ( ५ ) ६८४ होती 1 । जो कि हमारी पत्नीको प्रजा होती है, उसमें पितरों चौर देवोंकी सहायता ही होती है । इसलिए स्वामी दयानन्दजी भी विवाह - संस्कारमें यह मन्त्र स्त्रीकी मजाकी प्राप्तिकेलिए पढ़वाते हैं- ' इन्द्राग्नी द्यावापृथिवी सातरिश्वा मित्रावरुणा भगो अश्विनो • भा । बृहस्पतिर्मरुतो ब्रह्म सोम इमां नारीं प्रजया वर्धयन्तु ' ( अथर्व ० १४ | १ | ५४ ) यहां सोमसे चन्द्रमा तथा चन्द्रलोकसे चन्द्रलोकस्थ पितर भी गृहीत हो जाते हैं । शेष देवता हैं । यदि आर्यसमाजी इस विषयपर निष्पक्ष होकर विचार करें, तो वे भी मृतक श्राद्धको सिद्धान्तित कर लें । वैसे तो वे भी मृतक-श्राद्ध कर ही रहे हैं; जितने डी ० ए ० वी ० कालेज, गुरुकुल, आदि दयानन्दके नामकी संस्थायें हैं, वे सब मृतकश्राद्ध हैं । मृतकके नामसे जो कुछ भी विद्या, वा अन्न आदि दान दिया जाय; वह सब मृतक-श्राद्ध हैं । आर्यसमाजके उत्सवों में ' ऋषिलंगर ' भी हुआ करता है, ऋषिसे ' स्वामी दयानन्द ' आर्यसमाजों को इष्ट हैं; तब उनके नाम से उत्सवों में आये विद्वानों वा अभ्यागतों को खीर आदि न खिलाना मृतक - श्राद्ध ही तो है । इससे मृतक दयानन्दकी आत्मा तृप्त होगी, प्रसन्न होगी । दीपमाला यादिके दिन स्वा ० दयानन्दकेलिए हवन आदि करना, स्वा ० दयानन्दके नाम अपनी पुस्तकोंको समर्पण वारना, ( जैसे देखो – चन्द्रमणि पालीरत्नकी टीकावाले ' निरुक्त ' का ' समर्पण ' ) गुरुकुल आदिमें अपने मरे हुए पिताके नामसे कमरा बनवाना —यह सब मृतक श्राद्धके ही प्रकार हैं । वैध - मृतकश्राद्ध मान लेनेसे सब अनुपपत्तियाँ दूर होंगी ] ।

पृष्ठ 713

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मृतकश्राद्ध - विज्ञान ६८१ ( ७ ) मृतक श्राद्ध - विज्ञान । [ अव मृतक श्राद्ध - विषयमें सुगम तथा प्रमाणित विज्ञान ' आलोक ' पाठकोंके समक्ष उपस्थित किया जाता है; पाठकगण इसका भी मनन करें; इससे भी उन्हें मृतक श्राद्धकी विज्ञानपूर्णता प्रतीत होगी ] | हमारे शास्त्रों में लिखा है- ' वालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पि-तस्य च । तावान् जीवः स विज्ञेयः सूक्ष्मात् सूक्ष्मतरो हि सः । ' अर्थात् एक वालके अग्रभागके सौ टुकड़े किये जावें; उसका भी सौवाँ भाग जितना सूक्ष्म हो सकता है, आत्मा भी उतना सूक्ष्म है । इस प्रकार सूक्ष्म - परमाणुस्वरूप आत्मा शरीर त्यागके बाद सूर्य-किरणोंकी आकर्षण - शक्ति के द्वारा सूर्यमण्डलकी ओर जाता है । उसमें दो मार्ग हैं । एक अनावृत्तिमार्ग, दूसरा पुनरावृत्तिमार्ग । जो प्राणी ज्ञान, भक्तियोग एवं अनासक्ति - कर्मयोग के द्वारा कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है, वह मुक्तात्मा तो मुक्तिलोक में जाता है, जिसका मार्ग सूर्यलोकके भीतर से है । वह वहाँ पुनरावृत्ति ( पुनर्जन्म ) से छूट जाता है । उससे नीचे नहीं गिरता । पुनरावृत्ति उन प्राणियों की होती है; जिन्होंने सत् - काम्ययज्ञ आदि कर्म द्वारा पुण्य वा निषिद्ध असत् - कर्म आदि द्वारा अहम्भाव आश्रित करके पापका सवय किया है । तब सुकर्मफल- भोगके लिए उनका आत्मा रश्मियों द्वारा बिना रोक - टोक चन्द्रलोक में जाता है । चन्द्रमण्डलमें जाकर सभी आत्मा पितृलोकके पितर कहते हैं । चन्द्रलोकके एक विशेष द्वीपका नाम ' पितृलोक ' है ।

पृष्ठ 714

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६८६ श्री सनातनधर्मालोक ( ५ ) ज्योतिष - द्वारा यह सिद्ध ही है कि चन्द्रलोक अन्य उपग्रहों की अपेक्षा पृथिवीके अधिक समीप है । जैसे पृथिवीमें महासागरके मध्यमें रहने वाले किसी महाद्वीपके पासका उपद्वीप महाद्वीप के स्वभावको प्रायः धारण करता है । जैसेकि - एशिया महाद्वीप के पासकी लङ्का उपद्वीप है, वैसे ही आकाशकक्षाके मध्यवर्ती भूमण्डलके सम्बन्धसे चन्द्रमण्डल भी इस भूगोलके स्वभावको धारण करता है । जैसे इस भूगोलमें जल आदि होने पर भी मिट्टीका भाग अधिक होनेसे पृथिवी मट्टीकी कही जाती है; वैसे ही चन्द्रमण्डलमें भी जलभाग अधिक और मृत्तिका आदिके न्यून -मात्रामें होनेसे चन्द्रमण्डलको भी जलमय कहा जाता है । चन्द्रमण्डलका ऊपरी भाग ही पितृलोक होता है 1 । जैसेकि — ‘ सिद्धान्त-शिरोमणि ' गोलाध्याय त्रिप्रश्नवासनाके १३ वें पद्यमें कहा है-‘ विधूर्ध्वभागे पितरो वसन्ति ' । चन्द्रमण्डलका आगेका भाग इस भूगोलके निवासियोंको दीखता है, पर उसका पृष्ठभाग नहीं दीखता । इसी अदृश्य - भागका नाम ' पितृलोक ' है । जैसे पृथिवीमें सूर्य - दर्शन ही दिनका कारण होता है, वैसे ही चन्द्रलोकमें भी सूर्य ही दिन - रातका कारण होता है । इस कारण ' सिद्धान्तशिरोमणि में कहा है- ' कुपृष्ठगानां द्युनिशं यथा नृणां तथा पितॄणां शशिपृष्ठगानाम् ' ( ' गोलाध्याय त्रिप्र-इनवासना १० वां श्लोक ) । इस पृथिवीमें जैसे २४ घंटोंका दिन - रात होता है, वैसे चन्द्रलोकके पितृलोकमें भी हमारे एक महीने में ही पितृलोक वालोंका दिन - रातका चक्र पूर्ण होता है । यह हम

पृष्ठ 715

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मृतकश्राद्ध - विज्ञान ६८७ ' आलोक ' के चतुर्थ - पुष्प में ' पितरोंका समय - विभाग ' में लिख चुके हैं । कृष्णपक्ष की अष्टमी से शुक्लपक्षको अष्टमी तक पितरोंका दिन होता है, और शुक्लाष्टमी से कृष्णाष्टमी तक पितरोंकी रात्रि होती है । अमावास्या में पितरोंका मध्याह्न, और पूर्णिमामें उनकी आधी रात होती है । यह भी हम ' पितरोंकी घड़ी में टाईम ' लेख में गत चतुर्थ - पुष्पमें दिखला चुके हैं । पितर दो प्रकारके होते हैं । एक स्थायी और दूसरे अस्थायी । स्थायी पितर वसु, रुद्र, आदित्य, अर्यमा, विश्वेदेव, अग्निष्वात्त आदि होते हैं । यह श्राद्धदेव कहे जाते हैं । इन्हींके द्वारा यहांसे मरे हुए जीवोंकी प्रत्येक व्यवस्था हुआ करती है । परमात्म - रूप गवर्नमेण्टके उक्त - विभाग का प्रबन्ध इन्हींके हाथों सौंपा गया है । श्राद्धसे तृप्त हुए यही श्राद्धकर्ताको आयु, प्रजा, धन, स्वर्ग आदि देते हैं । इस प्रकार मृतकोंका जीव जहाँ भी होता है, चाहे स्वकर्मानुसार द्युलोकमें, अथवा अन्तरिक्ष में, अथवा पृथिवी लोकमें; वहीं स्थायी पितर अपनी दिव्य शक्तिके बलसे उनको फल प्राप्त जैसे सूर्य अपनी दिव्य - शक्तिके बलसे जल बरसाकर मनुष्य, पशु, पक्षी, वृक्ष, आदि सभी पृथिवीलोकके प्राणियोंको जहाँ - तहाँ सुखी करता है, वैसे ही अपनी अदृष्ट - दिव्यशक्तिके द्वारा वसु, रुद्र, आदित्य आदि नित्य पितर हमारे यहां से मरकर गये हुए पिता, पितामह, प्रपितामह आदियोंके पास हमसे ब्राह्मणादिको दिये वा खिलाये श्राद्धके सूक्ष्मान्नको भिजवाकर उन्हें यत्र - तत्र सुखी करते हैं ।

पृष्ठ 716

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६८८ श्रीसनातनधर्मालीक ( ५ ) पृथिवीलोक में, अथवा अन्तरिक्ष वा स्वर्गलोक में मृत- पितर स्वकर्मा-नुसार जहाँ भी जन्म लिये होते हैं, वहाँ पर ' स्वधा पितृभ्यः पृथिविषद्भयः, स्वधा पितृभ्यो अन्तरिक्षसद्भ्यः स्वधा पितृभ्यो दिविषद्भयः ' ( अथर्व ० १८६७८-७९ -८० ) इन मन्त्रों द्वारा श्राद्ध के पढ़ार्थोंका सूक्ष्म अन्न वे स्थायी पितर उन्हें वहाँ पहुँचा देते हैं । अस्थायी पितर वे कहे जाते हैं, जो सूक्ष्म परमाणुस्वरूप यहां से मर कर गये हुए आत्मा नियत कालकेलिए पितृलोक में प्राप्त हुआ करते हैं 1 । जैसे देवता पुण्य समाप्त हो जाने पर ' क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ' ( गीता ६।२१ ) मनुष्यलोकमें जन्म लेते हैं, वैसे ही अस्थायी पितर भी पुण्य - समाप्तिवश फिर भूलोक में क्रमसे जन्म लेते हैं । नियत समय के बाद सूक्ष्म - जीव पितृलोक - चन्द्रमण्डलसे वायुमण्डलमें, फिर मेघमण्डलमें प्राप्त होकर ओससे मिलता है । फिर पृथिवीके अन्न - शाक आदि पदार्थों में प्राप्त होकर उस भोजनके द्वारा पुरुषके वीर्य में आता है, और वीर्य - द्वारा स्त्रीके गर्भाशय में प्रवेश करता है । तव कर्मानुसार पशु, पक्षी, वृक्ष आदि योनियोंके शरीरोंको धारण करता है । उसको वह नित्य- पितरों द्वारा प्राप्त सूक्ष्म अन्न भी अपनी - अपनी योनि के अनुसार ही मिलता है; यह नहीं कि - यदि उसके निमित्त खीर दी गई है; तो आगे भी खीर मिले । यदि वह कारणवश किसी पशु आदि योनिमें गया है; उसे उसके अनुसार यह अन्न तृण आदि रूपमें प्राप्त होता है । जैसे कि मनीचार्डर द्वारा भेजा हुआ रुपया वह तो इसी पोस्ट आफिसमें जमा होता है; दूसरे पोस्ट-

पृष्ठ 717

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मृतकंश्राद्ध - विज्ञान ६८६ आफिसमें उसका आर्डर भेजा जाता है; वहीं यदि वह भारतमें है; तो उसे रुपये आदिमें मिलता है । यदि अमेरिकामें है; तो सेंट आदि रूपमें; इङ्गलैंड आदि में है, तो उसे पौण्ड - शिलिंग आदिरूपमें मिलता है । जैसे मनुष्योंका भोजनकाल मुख्यता से मध्याह्न होता है, वैसे ही पितरोंका भी मुख्य भोजनकाल अमावस्या हुआ करता है; क्योंकि — अमावस्या वाले दिन चन्द्रमण्डल सूर्यमण्डलके. नीचे होनेसे उसमें मध्याह्न हुआ करता है । इसलिए प्रत्येक अमावास्यामै श्राद्ध - विधान शास्त्रीय है । और पार्वण श्राद्ध के लिए आश्विन-मासका कृष्णपक्ष जबकि सूर्य कन्या राशिमें होता है - श्रेष्ठ माना गया है । क्योंकि- -तब सूर्य दक्षिणायन में होता है; और उसकी किरणें. पृथिवीलोकमें निकटतावश सरल रेखासे पड़ती हैं । पृथिवीके पितरोंके उद्देश्यवाले पदार्थ सूर्य किरणें दक्षिणा-भिमुख ऊपर आकर्षित कर लेती हैं । जैसे बैट्री यदि उत्तम हो, तो तारका कार्य प्रबलतासे होता है । वैसे ही सूर्य - किरणों की आकर्षण - शक्तिकी सहायता से पितृलोकके अधिकारी पितृगण भी अपने कार्यको उत्तमता से कर सकते हैं । इसीलिए ' सूर्यसिद्धान्त ' में कहा है - – ' ततः शेषाणि कन्याया यान्येहानि तु षोडश । क्रतुभिस्तानि तुल्यानि पितॄणां दत्तमक्षयम् ' ( १४।६ ) यहां सूर्यके कन्याराशिमें होनेपर सोलह दिन ( माद्रकी पूर्णिमा, और आश्विन कृष्णपक्षकी * इस विषय में पितरोंका टाइमटेबल देखनेकेलिए ' श्रीसनातन-धर्मालोक'का चतुर्थ - पुष्प मंगाइये । मूल्य ४ | ) ४४ स ० ध ०

पृष्ठ 718

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६६० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) अमावास्या तक पन्द्रह दिन ) पितरोंको दिये हुए श्राद्धका उत्तम फल कहा गया है । जैसे मातासे खाये हुए अन्नको गर्भका बालक प्राप्त कर लेता है; वैसे ही तर्पण, निवाप आदि द्वारा दिये हुए जल, तिल, यव आदियोंका सारभाग विश्वगर्भ भगवान् सूर्यके किरणोंके द्वारा वैदिक दिव्यशक्ति के बलसे पितृलोकमें सोमरूप होकर प्राप्त होता है । इसी रूप से ब्राह्मण - भुक्त अन्न भी मन्त्र शक्ति से उनमें प्रविष्ट पितरोंको प्राप्त हो जाता है । इसमें यह शंका नहीं करनी चाहिये कि ' यदि ब्राह्मणने पहले खाया, पितरोंने उसका अन्न पीछे खाया, तो ब्राह्मणका जूठा खाया; अथवा यदि पितरोंने पहले खायाः ब्राह्मणने पीछे खाया; तो ब्राह्मरणने पितरोंका जूठा खाया ' । वह अन्न जब सूक्ष्म हो जाता है; तो सूक्ष्मतामें जूठापन वा अशुद्धि नहीं मानी जाती । फिर इस वैदिक - कर्म में मन्त्र - शक्तिसे उच्छिष्टता नहीं मानी जाती । मधुमक्षिकाएं पुष्पकी सूक्ष्म - रस पीकर अपने छत्त में उगल देती हैं, बछड़ा पहले गायके स्तन में मुह मारता है, पहले दूध पीता है, पीछे हम पीते हैं । जैसे एतदादि - स्थल में उच्छिष्टता नहीं मानी जाती; वैसे ही श्राद्ध - विषय में भी समझना चाहिये । कथञ्चित् यहां उच्छिष्टता मानी भी जावे; तो पितरोंका जूठन ब्राह्मणने खाया हो, इसमें ब्राह्मरणको दोष नहीं लग सकता, क्योंकि पितर सूक्ष्म होते हैं; और मनुष्यसे उच्चयोनि वाले होते हैं । शेष रही ब्राह्मणके खाये हुएकी पितरोंके लिए उच्छिष्टता; उसपर भी

पृष्ठ 719

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मृतक श्राद्ध - विज्ञान ६६१ सूक्ष्मता उसकी उच्छिष्टता नहीं रहने देती; क्योंकि जैसे भोजन हमारी इन्द्रियां पहले खा लेती हैं; हमारी जठराग्नि उसे सूक्ष्म करके शुद्ध कर लेती है; वही सूक्ष्मभाग हमारे आत्माको मिलता है, जिससे वह तृप्त होता है । इसमें यह नहीं कहा जाता कि-इन्द्रियोंका जूठा आत्माने खाया; वैसे पितरोंके विषयमें भी जान लेना चाहिये । ब्राह्मणने खाया तो वह एक श्रेष्ठ योनिका माना जाता है, ' गुरोरुच्छिष्ट भोजनम्'का व्यवहार स्मृतियों में भी इसी ब्राह्मणकी उच्च - योनिके कारण रखा गया हैं । दूसरा फिर उसमें रहनेवाली अग्नि उसे सूक्ष्म करके फिल्टरके तरीके से उसे शुद्ध करती है; फिर वह सूक्ष्म होकर महाग्निके साथ मिलती है; महाग्नि उसे और भी शुद्ध करती है । फिर उस महाग्निका आकर्षण करता है सूर्य, वह उसको और भी शुद्ध करता है; फिर उसको चन्द्र आकृष्ट करता है, फिर उसकी और भी शुद्धि और अमृतमयता हो जाती है; अब बताइये कि जूठनकी अशुद्धि कहां रही? इसका प्रबल प्रमाण भी देख लीजिये । सूर्य पृथिवीके सब पदार्थोंका आकर्षण करता है । पृथिवीमें मल भी पड़ता है, मूत्र भी पड़ता है, बलगम भी पड़ता है । सूर्य इनके रसका भी तो आकर्षण करता है । सूर्यमें ऐसी शक्ति है कि वह इन रसोंको भी फिल्टर कर दिया करता है, वही रस फिर आकाशमें जमा करके हमपर वर्षा -कालमें बरसाता है । आप उसे सहर्ष ग्रहण करते हैं; आप क्या यह मानते हैं कि — सूर्य हम पर मल - मूत्र - बलगमका रस भी डालकर हमें अशुद्ध कर रहा है? गाय चारा खाती है; उसीका अन्दर रस

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सनातन धर्मलोक ५, पृष्ठ 720 का मूल पृष्ठ
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६६२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) बनता है, और रससे दूध; उस दूधको आप पीते हैं; क्या यह गायका आप जूठन पीते हैं? वस्तुतः अग्नि, महाग्नि, सूर्याग्नि इनमें यही विशेषता है कि यह सर्वथा अशुद्ध वस्तुओंको भी - शुद्ध कर दिया करते हैं; तो उच्छिष्टका तो भला क्या कहना; अतः यहां इस विषय में उच्छिष्टता- जूठनका दोष नहीं दिया जा सकता । अस्तु । यह श्राद्धीय - शक्ति ऋषियोंने हजारों वर्ष साधे हुए तपस्या, योग आदि के बलके द्वारा प्राप्त की है । इसका कोई भी शास्त्रज्ञ विद्वान् खण्डन नहीं कर सकता । जो पितर पितृलोक में न होनेसे वैसी शक्ति नहीं रखते कि — सूक्ष्मरूप बनकर श्राद्ध खाते · हुए ब्राह्मणों के शरीर में प्रवेश कर सकें; किन्तु वे किसी मनुष्यादिके • स्थूल शरीर की योनिको प्राप्त कर चुके हों; तब हमसे दिये हुए • श्राद्धके अन्नको स्थायी सूक्ष्म - पितर वसु, रुद्र, आदित्य ही आकृष्ट करके उन स्थूल - योनिवाले पितरोंको सौंप दिया करते हैं । -इस प्रकार मृतक श्राद्ध रहस्यपूर्ण तथा सोपपत्तिक, और विज्ञानपूर्ण · सिद्ध हुआ । पितृपक्ष - पर्वके प्रवृत होनेसे हमने इसमें श्राद्ध - विज्ञानके छः प्रकार बताये हैं- पाठक इनका ठीक - ठीक मनन करके इंस श्राद्ध-• विषयकी समूलता जान लेंगे — यह हमारा दृढ विश्वास है । श्राद्ध-विषयपर वेदादि - शास्त्रों को साक्षी, तथा श्राद्धपर किये जानेवाले • शङ्का प्रवाहका उत्तर हम भिन्न- पुष्पों में देंगे ।