सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 81–90

सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 81–90

पृष्ठ 81

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श्रीगणेशका मङ्गलाचरण २१ न ? र में एक ही कालमें ( इसमें १५-२० वर्षोका अन्तर नगण्य है ) बड़ा भेद मिलता है । इस पाश्चात्य दृष्टिकोण से तो ऋग्वेदसं ० के प्रथम और दशममण्डल शेष मण्डलोंसे अर्वाचीन सिद्ध होजाते हैं । डा ० सम्पूर्णानन्दजी स्वयं ब्रात्यकाण्डकी भूमिका में अथर्ववेदकी भाषा को देखकर कहते हैं- " कहीं - कहीं भाषा इतनी आधुनिक - सी है कि प्रक्षेपका सन्देह होता है । " यह अंग्रेजी दास्यमनोवृत्ति है । संस्कृत-भाषाके विषय में ऐसी बात वन भी नहीं सकती । एक ही कर्ता मधुर, वैदर्भी रीतिका प्रयोग भी कर सकता है, और कठोर, गौड़ी रीतिका भी । एक ही वारणभट्ट कठिनतर ' हर्षचरित ' को भी वना सकता है, मधुर ' कादम्बरी ' को भी । इससे उपनिषत्काल संहिता-कालसे पीछेका नहीं हो सकता । समाधिसे वह पीछे मिला हो-यह भिन्न बात है, वहाँ प्रतिपक्षियोंके अनुसार पौर्वापर्यका व्यपदेश-मात्र है । कहीं भाषा परोक्षवृत्ति हुई हो; तो वह कठिन होजाती है; कहीं प्रत्यक्षवृत्ति हुई हो, तो वह सरल होजाती है । कोई नद - नदी वा समुद्र कहीं कुटिल वा कहीं सरल, और कहीं अतलस्पर्श गम्भीर और दुष्प्रतर वा तलस्पर्श एवं सुखतरणीय हो; कहीं पृथिवी दुर्गम और कहीं सुगम; कहीं संसार दुर्बोध और कहीं सुबोध सम्भव है; इससे भिन्नकालीनता वा भिन्नकर्तृ कता नहीं होजाती । अपौरुषेयतामें ऐसी प्राकृतिकता वा विभिन्नता पिक है । सृष्टिके एककालमें बने हुए भी पुरुषोंकी आकृति पोरों, कुत्ते में मिलती इसी तरह अपौरुषेय रचना मन्त्रभाग वा ठीक नहीं । विभाषा में एकरूपताका नियम अनिवार्य नहीं ।

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५२ श्री सनातनधर्मालोक ( ५ ) ( १८ ) गणेशजीके वाहन मूषकको देखकर भी असम्भवकी आशङ्का करके गणेशको उडाना वा उसे अनार्यदेवता बताना अन्याय है । गणेशजीके देवता होने से उनका वाहन सूषक भी दिव्य समझना चाहिये, लौकिक नहीं । सूर्य कितना बड़ा है, १३ लाख पृथिवी - इतना, पर वह वृश्चिक, मकर, मीन आदि राशियों पर आरोहण करता है । वे वृश्चिक आदि लौकिक विच्छू आदि नहीं होते; किन्तु दिव्य राशि होती है । कुछ लौकिक आकृति वा गुणके सादृश्यसे वही वृश्चिक, मूषक आदि नाम रख दिये जाते हैं । वस्तुतः उस मूषकको भी देवावतार तथा दिव्य समझना चाहिये, लौकिक नहीं । उससे गणेशजीका कोई उपहास नहीं । श्रीयास्कने निरुक्तमें देवताओंके वाहनोंकी अनित्यता की चर्चा उठाकर पूर्वपक्षीके अनुसार उन्हें अनित्य वा अप्रमाण ( देवता ) माननेकी शङ्का उपस्थापित की है- ' अपि हि देवता देवतावत् स्तूयन्ते । यथा - अश्वप्रभृतीनि ओषधिपर्यन्तानि, अथापि अष्टौ द्वन्द्वानि ' ( ७१४७ ) । इस शङ्काका समाधान श्रीयास्कने यह किया है - ' माहाभाग्याद् देवताया एक आत्मा बहुधा स्तूयते ' ( ७४ ) ' आत्मैव एषां रथो भवति, आत्मा अश्वः आत्मा आयुधम, आत्मा इषवः, आत्मा सर्वं देवस्य देवस्य ' ( ७ | ४ | १५ ) अर्थात् देवताके १ वाहन एवं आयुध बाण आदि सब उसीका अपना दूसरा रूप है । " यही बात मूषकवाहनके सम्बन्धमें भी समझनी चाहिये - इस मूषकवाहन होनेसे भी गणेशजी अनार्य देवता ि सकते ॥ वेदमें भी अश्वियोंका वाहन रासभ बताय लेखककी रचके ।

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7 7 ३ i [ ा । 7 । श्रीगणेशका मङ्गलाचरण घोड़े, अग्निका रोहित ( मृग ), पूषाका अजा, इस प्रकार मूषक, मयूर आदि वाहनोंसे भी अश्वी आदि की भांति गणेशजी भी अनार्यदेव नहीं होजाते । ( ख ) यजुर्वेद संहिता में ' आस्ते पशु: ' ( ३।५७ ) चूहेको गणपति का वाहन माना गया है । उणादिकोष ( १।३३ ) में स्वा ० दयानन्द जीने भी ' खु ' ' चूहेका नाम माना है । यद्यपि इस मन्त्रका देवता रुद्र है; तथापि रुद्रसूक्तमें ही ' नमो गणेभ्यो गणपतिभ्यश्च ' ( १६।२५ ) इस मन्त्रमें रुद्रको गणपतिरूपमें वर्णित किया है । यजु ० ११।१५ में रुद्रका गणपतित्व कहा गया है, सो यह ' आत्मा वै जायते पुनः ' ( महाभारत ३।३१३।७२ ) के अनुसार है । इसमें वैदिकता है, अनार्यता नहीं । वैदिक यज्ञकी क्रियामें चूहेके विलकी मिट्टी आव-श्यक होती है ( देखो शतपथ २।१।७ ) । सो उसके अध्यक्ष गणपति की भी यज्ञमें पूजा होती है । ' गणानां त्वा ' ( यजु ० २३।१६ ) मन्त्र से अश्वमेध यज्ञमें उसके नायक अश्वमें गणपतिका आह्वान किया जाता है; अतः गणपति याज्ञिक क्षेत्रमें ही हैं । प्राकृतिक गणपति-प्राणके च्युत होने पर उसका प्रथम प्लेगरूप आघात चूहे पर होता है; उस प्लेग के उपशमनके लिए गणपति - याग ही शास्त्रोक्त उपाय है । अतः गणपति चूहे पर चढ़े रहते हैं कि वह आक्रान्त रहे । ( ग ) “ रुद्रके रूप गणपतिके प्रणाम करनेसे गणपतिकी महत्ता इसलिए न मानना कि- जबकि यजुर्वेदके उसी सूक्तमें रुद्रके रूप • चोरों, कुत्ते आदिको भी नमस्कार किया गया है " यह कहना भी ठीक नहीं । विष्णुपादोत्पन्न गङ्गाको पूजा तो होती है; पर पादोत्पन्न

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१४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) शूद्रकी नहीं । शूद्रकी महत्ता नहीं मानी जाती, पर गङ्गाकी मानी जाती है । वहाँ किरात- रूपधारी रुद्रके गणों को नमस्कार अवश्य आई है, आजकल के चोर आदि को नहीं । न चोर यादिकी पूजा कहीं मिली है, पर गणपतिकी पूजा तो मिली है; तब उनकी महत्ता भी सिद्ध होती है । पर जैसे प्रतिपक्षी रुद्रके वेद - वर्णित विचित्र आकृतिवाले गणों को अनार्य नहीं मानते, वैसे गणपति के लिए भी जान लेना चाहिये | ( घ ) यह भी प्रष्टव्य है कि प्रतिपक्षी लोग सप्तसिन्धु - प्रदेशको आयका आदि देश मानते हैं; वा अनायका? यदि नायका, और बाहर से ही इसमें वैदिककाल में आये; और उनसे आर्यों ने गणपति - पूजा सीखी; तब अनार्य सभ्यता आर्य सभ्यता से प्राचीन सिद्ध होजायगी; और गणेशपूजा वेदकालसे भी प्राचीन सिद्ध हो जाएगी । यदि सप्तसिन्धु - प्रदेश आर्योंका ही आदिदेश था; तो आर्यों के साथ अनार्य भी वैदिककाल में थे या नहीं? यदि थे; तो गणेशपूजा वेदसमकालीन सिद्ध हुई । यदि पहले आर्य ही थे; सम्पूर्ण भूमण्डलमें आर्योंकी ही सभ्यता थी, पीछे अनार्य सभ्यता फैली; तो सभी देशों वा स्थानों में किसी न किसी रूपमें गणेशपूजाको फैला हुआ जानकर प्रतिपक्षी को अनुमान करना पड़ेगा कि यह आर्योंकी ही देन है । ' एतद्देश-प्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः । स्वं स्वं चरित्र शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्व-मानवाः ' ( मनु ० २।२० ) सब देशों वा जातियोंको सिखलानेवाली जगदगुरु आर्य हिन्दु जाति अनायसे नये अपदेवकी. पूजा सीखे

पृष्ठ 85

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श्रीगणेशका मङ्गलाचरण यह अश्रद्धेय है । वैसा मानना उसका अपमान करना है । वस्तुतः अनार्यों में भी यह आर्योंसे ही गई, और वहाँ कुछ भिन्न - रूपमें होगई । जैसेकि - स्त्रियोंकी अवगुण्ठन प्रथा ( पर्दा ) वेद पुराण एवं इतिहास - सम्मत है; यह हम अन्य पुष्प में लिखेंगे । पीछे हुए मुसलमानोंने यह प्रथा हमींसे सीखी; और उसे कठोररूप दे दिया; पर आजकलके नवशिक्षित यह न जानकर उसे मुसल-मानी प्रथा मानने लगे जोकि एक अक्षम्य अपराध है । यह संस्कार उनके चित्तमें पड़ा होनेसे जब इन्हें ब्राह्मणभाग तथा रामायण एवं महाभारत में पर्दा प्रथा मिलती है; तब वे उसे उसमें प्रक्षिप्त मान लेते हैं । पुराणों में मिलने पर वे पुराणों को मुसलमानी कालके मान लेते हैं । यही प्रकार प्रतिपक्षी गणेशपूजामें अपनाते हैं । पर यदि वे अस्तकी दिशावाला ' पश्चिमी ' ( अंग्रेज़ी ) काला चश्मा उतार लें; और अपनी श्रद्धासे संस्कृतकी हुई ' पूर्व ' की आँखों से काम लें; तो उनका भ्रम स्वतः दूर होजावेगा; तब उन्हें कुछका अन्य कुछ न दीख पड़ेगा । ( १ ९ ) ' विघ्नेश्वर ' गणेशका नाम देखकर " वह गणेश ' विघ्न-विनाशक ' कैसे हो सकते हैं; तब अच्छे कार्यों में विघ्न डालने वाले होनेसे वे अपदेव अतः अनार्योंके देव हुए " यह प्रतिपक्षियों का कहना भी अज्ञानातिशयके कारण है । ' मृगेन्द्र ' सिंह मृगोंका ' स्वामी ' होता हुआ ' मृगोंका विनाशक ' भी होता है । ' जगदीश्वर ' जहाँ ' जगत्का स्वामी ' है वहाँ ' जगत्संहारक ' भी है । एक ही देवको जब कर्ता, भर्ता और हर्ता भी माना जाता है; तो ' विघ्नेश्वर ' में

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५६ श्री सनातनधर्मालोक ( ५ ) ' विघ्नविनाशकता ' की शङ्काका अवकाश ही क्या? क्योंकि — ईश्वर में अनुग्रहके समान निग्रहकी शक्ति भी हुआ करती है । उपक्रमके समान उपसंहारकी शक्ति भी हुआ करती है । ' महेश्वर ' क्या ' संहारकारी ' नहीं? गणपतिको उपनिषद्रों ' ' सर्वेश्वर ' भी माना गया है । जो सर्वेश्वर है, वह ' विघ्नेश्वर ' भी है | जब कोई ' विघ्नेश्वर का अस्तित्व नहीं जानता, तो ' सर्वेश्वर ' को भी नहीं जानता । विघ्नेश्वर के व्यापारकी आवश्यकता भी पड़ती है । जिस व्यक्तिको सतत दस्त आरहे हों; उसमें विघ्नेश्वर यदि प्रतिबन्ध - स्वरूप विघ्न न डालें; तो वह व्यक्ति मर जाय । राजाकी अंगुली कट गई; मन्त्रीने कहा- जो विघ्नेश्वर करता है, ठीक करता है । राजा ने क्रुद्ध होकर मन्त्रीको निकाल दिया । मन्त्री ने उस विघ्नको भी अच्छा समझा । एकवार राजा सेनासे छूट गया । जंगलमें वह अकेला कापालिक लोगोंसे देवीके आगे बलि देनेके लिए पकड़ लिया गया । वलि देनेके समय उसका अङ्ग भङ्ग देखकर उन लोगोंने उसकी बलि नहीं दी । तब राजाको मन्त्रीकी बात ठीक ज्ञात हुई । उसने मन्त्रीको फिरसे बुला लिया । राजाने मन्त्रीको कहा कि तुम्हारा निकालना तो तुम्हारे हकमें ठीक सिद्ध न हुआ । पर उसने उत्तर दिया कि आप तो अङ्गभङ्ग होनेसे बलिदानसे बच गये; मैं आपके साथ ही होता; और पूर्णाङ्ग होने से बलि दे दिया जाता; अतः आप द्वारा मेरा निकालना मेरे लिए विघ्नस्वरूप भी ठीक ही हुआ ' । यह विघ्नेश्वर के विघ्नोंका भी

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श्रीगणेशका मङ्गलाचरण १७ लाभ हुआ । यदि ' विघ्नेश्वर ' के विघ्न न हों; तो पुरुष अशुभ व्यवहारोंस निवृत्त कैसे हो? उनमें विघ्न ही तो उनसे पुरुपको बचाते हैं । प्रतिबन्धस्वरूप विघ्न होने से ही हमें सुख तथा दुःख भी क्रमशः मिलते हैं । अप्रतिबन्धवश निरन्तर सुख मिले तो हम अभिमत्त होकर मर जाएँ; निरन्तर दुःख मिले; तो हम निराश होकर मर जाएँ । संसारकी गाड़ी एक सुव्यवस्थासे चले; उसमें प्रतिबन्धत्ररूप विघ्न न हो; तो गाड़ी किसी स्टेशन पर रुके ही नहीं, यात्री कैसे चढ़ें वा उतरें । वही विना लाइनक्लियर के कहीं जा टकराये -बड़ी हानि करे । राजा बलि के बढ़े हुए वैभवमें वामनावतारका याचनावृत्ति करके उसमें विघ्न डालना वैष्णववृत्ति थी, आर्यवृत्ति थी; वामन अनार्यदेव नहीं थे | हम लोग भी कई कार्य ऐसी शीघ्रता से करने लग जाते हैं; जो हमारी प्राणहानि भी कर सकते हैं । यदि विघ्नेश्वर उसमें विघ्न न डालें; तो हम मर जाएँ । यदि विघ्नेश्वर न हों; और पापकर्मोंमें विघ्न न हों, तो पापकर्म कैसे रुकेँ? हमारा मरण भी बड़ा विघ्न है; पर वह भी हमारा नया संस्करण करके हमारा नवजीवनदाता होता है । अतः जगत्की सृष्टि, स्थिति और प्रलयके देव त्रिमूर्ति की तरह विघ्न व्यापारके देवकी भी अवश्य आवश्यकता होती है । अद्वैत एक तत्त्व होने पर भी व्यवहार में सब नामरूप भिन्न हैं; वही गणेश हैं । विघ्न होनेसे कई लाभ भी हो जाते हैं!

पृष्ठ 88

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श्रीसनातनधर्मालोक ( १ ) जिस कार्यके शीघ्र कर देनेसे हमें वह लाभ न होता, जो हमारे कार्यमें विघ्न पड़नेसे देरी हो गई, और वह देरी लाभका कारण सिद्ध हुई । अतः विघ्नकारक होनेसे भी विघ्नेश्वर गणेश ' ' अपदेव ' कभी नहीं बन सकते, जैसा कि प्रतिपक्षी कहा करते हैं । ईश्वर तभी हो सकता है; जब उसमें अनुग्रह के समान निग्रह -शक्ति भी हो । अतः विघ्नेश्वर विघ्नविनाशक भी हो सकते हैं । असत्कर्मों में विघ्न करनेपर वे शुभसंस्कारोत्पादक भी हुए । शुभ संस्कार विद्या एवं बुद्धिसे होता है; अतः विघ्नेश्वर विद्या एवं बुद्धि के अधिष्ठाता भी सिद्ध हुए । विद्या एवं बुद्धि बाकूसे ही प्राप्त होती है; अतः विघ्नेश्वर वाकूपति भी हुए । वाकूपति होनेसे ही उन्हें वेद एवं गणेश आदि पुराण में ' बृहस्पति ' कहा जाता है, क्योंकि ' वागू हि बृहती, तस्या एष पतिः, एतमु एव बृहस्पतिं मन्यते ' ( छान्दोग्य उ ० १२।११ ) । इसीलिए गणपतिको बृहस्पति भी कहा जाता है— ' वाग् वै बृहती तस्या एष पतिः, तस्मादु बृहस्पतिः ' ( बृहदारण्यक १।३।२० ) ' एष उ एव ब्रह्मणस्पतिः, वाग् वै ब्रह्म, तस्या एष पतिः, तस्माद् ब्रह्मणस्पतिः ' ( १।३।२१ ) । ' वागर्थाविव संपृक्तौ ... पार्वती - परमेश्वरौ ' ( रघुवंश १११ ) बृहती वाकू पार्वतीरूपा है; अतः गणपति भी बाग्रूप होने से पार्वती पुत्र हैं । इस प्रकार जब विघ्नेश्वर विद्या एवं बुद्धिके अधिष्ठाता भी सिद्ध हुए; तो ऋद्धि, सिद्धि एवं निधिके दाता होने से निधिपति एवं प्रिय बातोंके अधिष्ठाता होनेसे ' प्रियपति ' भी हुए । अच्छे कार्यों में विघ्नोंके भी विघ्न करनेसे विघ्नविनाशक भी हुए ।

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श्रीगणेशका मङ्गलाचरण इस कारण ही वे अभीप्सितार्थसिद्धिदायक होनेसे सुरासुर -पूजित भी हुए । तभी तो उनके लिए कहा जाता है- ' अभीप्सितार्थसिद्-ध्यर्थं पूजितो यः सुरासुरैः 1 । सर्वविघ्नच्छिदे तस्मै गणाधिपतय नमः । इन्द्रदेवता भी ‘ गणपति ' हैं - यह पहले कहा जा चुका है; वे भी देवताओंके पति हैं । उनको भी मर्यादा - रक्षारणार्थं कई तपस्वियोंकी तपस्या में, वा यज्ञकर्ताओंके यज्ञोंमें भी विघ्न डालना पड़ता है; अतः उन्हें शाप आदि भी प्राप्त हुए । इसी प्रकार समान - कार्यतावश विघ्नेशको भी गणपति होनेसे विघ्नकारकतावश प्रतिपक्षियों से ' अनार्योके देवता ' वा ' गणेश हैं ही नहीं ' इत्यादि गालियाँ सुननी पड़ती हैं; पर जिस प्रकार इन्द्र अपदेव नहीं मान लिये जाते; वैसे विघ्नेश्वर गणपति भी ' अपदेव ' नहीं हो सकते । यदि कोई देव सौम्य नियमोंका सञ्चालक है; विघ्नादि कठोर नियमोंका नहीं; तब वह किसी गणका पति वा सर्वेश्वर भी नहीं हो सकता । गणेशजी में विघ्न सञ्चालनकी शक्ति होने से ही वे गणपति तथा सर्वेश्वर भी बने । ' अकृतोपद्रवः कश्चिन्महानपि न पूज्यते ' इसीसे आक्षेप्ता श्रीसम्पूर्णानन्दजीको भी उनके आगे सिर झुकाना पड़ा । जोकि — रुद्रकी भान्ति गणपतिको कहीं ' चोर गणपति ' कहा जाता है; वहां ' सब विघ्नोंका चोर ' यह भाव है । जैसेकि— ' नारायणो नाम नरो नराणां, प्रसिद्ध चौरः कथितः पृथिव्याम् । अनेकजन्मार्जितपापचौरं चौराग्रगण्यं पुरुषं नमामि ' । इस प्रकार श्रीकृष्णको ' चोर ' कहा जाता है । गणेशजीको ' उच्छिष्ट गणपति '

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६० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) भी कहा जाता है । वहां वही भाव है जो अथर्ववेदसं ० में ' उच्छिष्टसूक्त ' ( १११७ ) का है कि - ' सर्वान्तेऽवशिष्टः ' । उसी ' उच्छिष्ट ' से सब वेदादिकी उत्पत्ति बताई गई है । सो गणपति ब्रह्म होने से - जैसाकि ' गणपति - उपनिषद् ' में कहा है - वे ' उच्छिष्ट ' भी हैं । जहां गणेशजीको ' पिचण्डिल ' लिखा है, वहां भाव है कि-' लम्बोदर ' । इससे गणपति अनार्य देव नहीं हो सकते । ( २० ) ' लम्बोदर ' शब्द से डरकर गणपतिको देव बताना भी ' भारी भूल ' होगी । जब गरगपतिको परब्रह्म कहा गया है; तब उसमें ' लम्बोदर ' का भाव यह है कि — ' जगन्ति यस्यां सविकासमासत ' अर्थात् सारा जगत् उनके पेट में समाया हुआ है; अतः उनका पेट बहुत बड़ा है । यही भाव इस शब्दमें ओत - प्रोत है । तब डरनेकी आवश्यकता नहीं । ( २१ ) ' गजमुख ' से डर जाना भी ठीक नहीं । कदाचित् यह डर इसलिए हो कि वे गजमुखसे बोल कैसे सके, और सिर कटने पर गजमुखका सन्धान कैसे हुआ, और उनकी मृत्यु क्यों न होगई '? यह सन्देह भी दूर हो सकते हैं; पर चाहिये श्रद्धा । ब्राह्मणभागात्मक वेदको उठा लीजिये; उस ( शतपथ ब्रा ० ) में १४ | १ | १ | १६,२०,२१,२२, २३, २४ यह स्थल देखना चाहिये । अथव के लड़के दध्यङ्का अश्वियोंने सिर काटकर उसपर घोड़ेका सिर जोड़ दिया । उस दध्यङ के घोड़ेके सिरसे यज्ञपूर्तिकी विद्या अश्वियोंने सीखी । सिर काटने से दध्यङ् मरे भी नहीं, घोड़ेके सिर का वैद्यों द्वारा सन्धानभी होगया, उससे बोलचाल वा विद्या भी