सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 731–740

सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 731–740

पृष्ठ 731

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दीपावलीका वैज्ञानिक - रहस्य ७०३ कृपा - कटाक्ष भी आ उपस्थित होते हैं । उस समय हमें घरोंकी स्वच्छताका अवकाश ही नहीं मिलता । फिर शीतकाल आजाता है; उस समय भी अत्यधिक - शीत पड़नेसे उतनी स्वच्छता नहीं हो सकती । इधर वर्षांकी समाप्तिके बाद रोगके कीटाणुओं की बाढ़ - सी आ जाती है, जिससे वायुमण्डल दूषित हो जाता है, और मलेरिया-रोग फैल जाता है । रोगोंके कारण जीवन ही सङ्कटपूर्ण हो उठता है; जिससे बहुत लोग इस लोकको ही सूना कर जाते हैं; जिसके लिए हमें उन कीटाणुओं को दूर करने वाले सूर्यदेवसे सौ शरद् ऋतुएँ जीनेकी प्रार्थना करनी पड़ती है- ' जीवेम शरदः शतम् ' ( यजु ० ३६।२४ ) । इसी संकटको दूर करनेकेलिए वर्षा ऋतुके बाद शरद् - ऋतुमें घरोंका मार्जन लेपन अनिवार्य हो जाता है; और वह वर्षासे जर्जर घर फिर नया हो उठता है, और उसकी आयु बढ़ जाती है । मेघाच्छन्नतावश वर्षा ऋतुमें सूर्यकी ऊष्मा पृथिवीपर पर्याप्त मात्रामें नहीं गिरती; पर पृथिवीकी ऊष्माका नीचेसे ऊपर उद्वमन होनेसे घरोंमें अन्न आदि गिरनेके कारण इनके संयोगसे बहुत रोग - कीटाणु उत्पन्न होकर वायु - द्वारा उड़कर वर्षा ऋतुसे लेकर शरद ऋतु तक हमारे घरकी दीवालोंके छिद्रों में भरकर घरके वायुमण्डलको दूषित करते रहते हैं । इसी कारण कार्तिक मासको ' यमदंष्ट्र ' ( यमकी दाढ़ मास कहा जाता है । इसमें सूर्य नीच-राशि तुला में रहता है । सूर्यकी तीन प्रकारकी किरणें होती हैं - ज्योतिः, आयुः, गौः । इनमें आयुकी किरणें प्राणयुक्त होने से

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७.४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) आयु देनेवाली मानी गई हैं । परन्तु सूर्यके तब नीच - राशिमें होनेसे वे श्रायु - नामक किरणें दुर्बल होनेसे अपना प्रभाव नहीं डाल सकतीं; इस कारण वायुमण्डल दूषित हो जाता है, जिससे रोगाणु बहुत बढ़कर फैल जाते हैं । इधर सूर्यकी नीच राशि हुई, इधर उसकी सुषुम्णारश्मिसे प्रकाशित होनेवाला चन्द्रमा भी कृष्ण-पक्ष होनेसे दुबेल हो जाता है । एक करेला, फिर वह भी नीमपर चढ़ा हुआ । उसमें भी अमावास्या - जिसमें आयुर्वेदानुसार बहुत से भूतप्रेतोंका आवेश प्रवेश रहा करता है; फिर उसमें भी तमोमयी रात्रि । यह तो ' मर्कटस्य सुरापानं तस्य वृश्चिकदंशनम् । तन्मध्ये भूतसंचारो यद्वा तद्वा भविष्यति ' ( बन्दरको जो पहलेसे चञ्चल है - शराब पिला दो; फिर उसे बिच्छूसे कटवा दो, फिर उसमें भी भूत - प्रेतका आवेश हो जावे; फिर वह जो नाकोंदम न कर दे, वह थोड़ा ही है ) यह कथन चरितार्थ हो जाता है । यह मास तभी तो ' यमदंष्ट्र ' कहा जाता है । सूर्यकी नीचतावश वह अपनी प्राणप्रद - ज्योति हमें नहीं देता, सौर - ज्योतिका छिपानेवाला दूसरा होता है चौमासा । तीसरी हुई अमावास्या, फिर उसकी भी हुई रात । चन्द्रमाकी भी उसमें थोड़ी भी ज्योति नहीं होती; क्योंकि उस सूर्यकी सुषुम्णा- किरण भूमिके व्यवधान से सर्वथा प्राप्त नहीं हो रही होती, अतः वह अपनी अमृतमय - किरणका प्रभाव हमारे भूलोकमें दिन तथा रात दोनों में नहीं छोड़ रहा होता । जब यह ज्योतियां नहीं; तब हमारी आंतरिक . ज्योति भी क्या सबल होगी? सूर्यके नीच राशिगत होनेसे सूर्य से

पृष्ठ 733

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दीपावलीका वैज्ञानिक - रहस्य ७०१: सम्बद्ध हमारी बुद्धि, चन्द्रमाके अप्रकाश से उससे सम्बद्ध हमारा मन भी अनालोकित होनेसे मन्द रहेंगे । हमारी बुद्धि और मनको मन्दतासे विचार - शक्ति तथा स्फूर्त के मान्द्यवश हमारी शरीर - ज्योति: तथा उसकी आधारित आत्मज्योति भी अवश्य निर्बल होगी । तब: तमोमय आसुर प्राणोंकी ही प्रधानता होने से आसुरी शक्ति ही बढ़ेगी । तव इस मास का ‘ यमदंष्ट्र ' यह नाम भला क्यों न हो? ': क्यों जनता इस मासमें कालके कराल - गाल में न जावे?: तब कार्तिकी अमावास्याकी रात्रि में - जिसे मेहरात्रि वा कालरात्रि: भी कहा जाता है— उसमें घनान्धकारके प्रभाव के दूरीकरणा अतिशयित - ज्योतिकी आवश्यकता सिद्ध हुई, जिसके लिए दीपावली-पर्वका - जिसमें दीपक तथा आकाशदीपक जलाए जावें; तथा अग्नि-क्रीडा की जावे; इन सब बातोंका आयोजन प्राचीनकाल से नियमित. किया गया है । इसी घनान्धकार से धनका आलोक भी नहीं होता । वर्षा ऋतु अभी - अभी गई होती है; उस समय व्यापार सर्वथा ठप होता है । कार्तिककी अमावास्यावाले दिन सूर्य और चन्द्रमा दोनों तुलाराशि.. पर होते हैं । सूर्य संसारका आत्मा और चन्द्रमा मन होता है-यह हम पूर्व संकेत दे चुके हैं । संसारके वाणिज्य - व्यवसाय-संचालनका मापदण्ड भी तुला- तराजू ही होती हैं; तुला और वाणिज्य - व्यवसायसे ही लक्ष्मी प्राप्त होती है । तो तुला और वाणिज्य - व्यवसाय एवं लक्ष्मी पर मुख्यतः सम्बन्ध वैश्यका होनेसे दीपावली - त्यौहार भी वैश्य - प्रधान माना जाता है - जिसकी हम ४५ स ० ध ०

पृष्ठ 734

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७०६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) पूर्व सूचना दे चुके हैं । पर लक्ष्मीकी आवश्यकता अनिवार्यतावश सभी को होती है । ब्राह्मणने भी यज्ञ करने हैं; उसमें दक्षिणा आदि देनी है, यज्ञका अन्य खर्च चलाना है, उसीने ज्ञानयज्ञका भी विस्तार करना है, ग्रन्थोंको लिखना - लिखवाना है; उसे प्रकाशित तथा प्रचारित करना है; उसकेलिए भी धन चाहिये । इसकेलिए वेद उठा लें, जिस मन्त्रपर भी दृष्टि डाली जाए; उसमें प्राय: धनकी प्रार्थना मिलेगी -'तदस्मासु द्रविणं घेहिं चित्रम् ( यजु ० २६ | ३ ) ' अग्ने! नय सुपथा रायेऽस्मान् ' ' नूनं सा ते प्रति वरं जरित्रे दुहीयदिन्द्र! दक्षिणा मघोनी ' ( ऋ ० २।११।२१ ) इत्यादि । क्षत्रिय आदि शासक हुए, उनकेलिए भी धन चाहिये । वैश्य आ ही गये । शूद्रोंसे हमें सेवा लेनी है; उन्होंने हमारी सेवाकेलिए कई यन्त्र बनाने हैं; कपड़े आदि बुनने हैं; उन्हें भी धन चाहिये । धन बिना - लक्ष्मीदेवीकी कृपाके कैसे प्राप्त हो? तब इस लक्ष्मीपूजन-महोत्सव - दीपावलीको सभी उत्साह से मनाते हैं । कहते हैं - इसी दिन महाराज पृथुने पृथ्वीका दोहन किया था । धर्मविरोधी राजा वेनके दुष्कर्मोंसे पृथिवीने अन्न, वस्त्र, ओषधियां, स्वर्ण, इत्यादि पदार्थको देना बन्द कर दिया था । राजा पृथुने पृथिवीका दोहन करके अन्न, वस्त्र, रत्न आदि प्राप्त करके नव निर्माण की योजना से संसारको पुनः श्रीसम्पन्न बनाया था । इसीलिए इसी दिन ही लक्ष्मीपूजन प्रारम्भ हुआ था । पूर्वोक्त कारणों से जब प्रत्येक घरका वातावरण ही कुत्सित होगा; और घरके व्यक्ति रुग्ण हुए - हुए खटिया पर पड़े होंगे;

पृष्ठ 735

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दीपावलीका वैज्ञानिक- रहस्य ७०७ तब लक्ष्मी प्राप्त ही कैसे होगी - यह सोचकर ऋषि - मुनियोंने इस पर्वका आयोजन किया - जिससे भीतरी बाहरी लक्ष्मी प्राप्त हो । तदनुसार वर्षासे जर्जर तथा रोग - कीटाणु - प्रोत घरोंमें झाड़ना-बुहारना तथा लीपना, तथा पीली मट्टी वा चूना लगानेकी आवश्यकता भी सिद्ध हुई । झाड़ने- बुहारने से कीटाणु इतस्ततः होकर दीवारों में चले जाते । फिर भूमिको तथा दीवारोंको भी लीपना पड़ता है । लीपनेसे कीटाणुओं के नष्ट होनेका कारण यह है कि - – गोबरसे युक्त जल डालनेसे पृथिवीके भीतरकी ऊष्माका उद्वमन होता है; इससे भूमि तथा दीवारोंके कीटाणु नष्ट हो जाते हैं । गोबरकी कीटाणु विनाशनशक्तिपर हम पूर्वके निबन्धों में प्रकाश डाल ही चुके हैं । भैंसका पुरीष छिपकलियां पैदा करता है । जल भूमिपर डालनेसे भूमिकी ऊष्मासे कीटाणुओंके नष्ट होनेमें एक उदाहरण देखिये । हमारी जन्मभूमि मुलतानमें— जो अब ' पाकिस्तान ' में है, पहले प्लेगकी बीमारी रहा करती थी, आये दिन लोगोंको शहर छोड़कर निकल जाना पड़ता था । तब म्युनि-सिपलिटीके हैल्थ - आफिसरोंने नाली साफ करनेवालोंको आर्डर दिया कि जब नाली में झाडू देकर तुम उसमें पानी डालते हो; तो उसके कीटाणु कुछ नष्ट होकर शेष उड़कर नालीके दोनों किनारोंपर जमा हो जाते हैं जो रोगोत्पादक सिद्ध होते हैं; अतः पानी केवल नाली में ही न डालो; बल्कि नालीके दोनों किनारों पर भी डालो । वैसा जब प्रारम्भ कर दिया गया; तो फिर मुलतान में प्लेग कभी नहीं पड़ी । उसका कारण यह था कि जो दोनों किनारों

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७०८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) पर रोग - कीटाणु इकट्ठे हो जाते थे; उनपर जल डालने से पृथिवीकी ऊष्माके उद्वमन होने से वहांके कीटाणु नष्ट हो जाते थे । वैसे लीपने आदिमें भी हमारे पूर्वजोंने यही रहस्य रखा था । इसीलिए प्रातः प्रत्येक - घर में झाड़ - बुहारकर पाकशालाकी भूमिको लीपा - पोता जाता है । पर दीवारों वा सारी भूमि का लीपना प्रतिदिन सम्भव नहीं होता । दीपावलीके दिनों में वह सब हो जाता है । इससे भूमि वा दीवारों के कीटाणु नष्ट हो जाते हैं; उसमें गायके गोबरके मिश्रणसे तो उनका बीज - नाश हो जाता है । फिर भी बचे - खुचे कीटाणु पीली मिट्टी वा चूना लगवाने तथा रंग - रोगन से समाप्त हो जाते हैं । तिसपर भी अवशिष्ट, रातको तिल वा सरसोंके तेलके दीपकोंके प्रकाश तथा सर्वत्र फैल गई हुई सूक्ष्म- गन्धसे नष्ट हो जाते हैं । यह दीपावली समस्त देश में एक साथ हो जाने से एक यज्ञ - सा हो जाता है, उस समयकी देशभर में व्याप्त अग्नि - किरणों के द्वारा सम्पूर्ण - वायुमण्डल पवित्र हो जाता है । दीपमालासे ही प्रायः लोग घरके अन्दर भी सोना शुरू कर देते हैं । इस दीपमाला के उपचारसे वह घर ठीक शुद्ध हो जाता है । घरके ऊपरी भागमें ठहरे हुए विषाक्त कीटाणु आकाशदीपकों अर्थात् छत आदिमें वा ऊपर लगाये दीपकों के प्रकाशसे नष्ट हो जाते हैं । ये दीपक सारा कार्तिक मास जलाये जाते हैं- ऐसा स्त्रियों में व्यवहार देखा गया है । इससे आगे कीटाणुओं का प्रभाव ह्रासको प्राप्त हो जाता है । फिर उस घर में रहने वा सोनेसे रोग के आक्रमणकी अशङ्का नहीं रह पाती । फिर इस मासमें उषः-

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दीपावलीका वैज्ञानिक - रहस्यं ७०६ कालमें स्नानका महत्त्व माना गया है; इससे रोगोंकी आशङ्काका ही समूलोन्मूलन हो जाता है । . इसी दीपावली में लाजाओं ( खोलों ) का तथा खाँडके खिलौनोंका तथा मिठाइयोंका भी उपयोग होता है । लाजा माङ्गलिक पदार्थ माने गये हैं । नागरिक - कन्याएं राजाके नगर में आनेपर उसपर भी लाजाएं गिराती थीं । ' आचारलाजैरिव पौरकन्या: ' ( रघु ० २। ) यह महाकवि कालिदासके रघुवंशका वचन प्रसिद्ध है । इससे राजाकी मङ्गल - कामना की जाती थी । विवाह - संस्कार में कन्या लाजा-होम करके अपने पतिकी शुभाभिलाषा प्रकट करती है । वे लाजाएं बहुत स्वास्थ्यप्रद होती हैं । रोग में कुछ नहीं खाना पड़ता; पर खीलोंका उपयोग उसमें भी आदिष्ट होता है । सो लाजाएं शारीरिक दूषित - परमाणुओं को दूर करके मस्तिष्क - शक्तिको स्वच्छ और मेदुर करती हैं । तब उसका दीपमालामें उपयोग लाभदायक सिद्ध हुआ । खाँडके खिलौनोंका उपयोग इसलिए है कि वर्षा ऋतु पित्त संचित होता है, और शरद ऋतुमें प्रकुपित होता है । दीपावली भी शरद ऋतु में होती है । खाँडके खिलौने उसे शान्त करते हैं । मिठाई आदि से कफ सञ्चित होकर शीघ्र बाहर निकल जाता है । जब रोगोंके मूल शान्त होगये; तब रोग होंगे कहाँ से? इन्हीं . रोगोंके कारण. हमारी घरकी लक्ष्मी हमसे रूठकर ओषधियों में जाने लगती है, पर दीपमालाके उपचारसे हमारी घरकी लक्ष्मी घरमें ही रह जाती है, इस प्रकार हमारी लक्ष्मीकी उपासना

पृष्ठ 738

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७१० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) अनायास हो जाती है । इस प्रकार हमारे पर्व जहाँ अदृष्टमें पुण्यप्रद हैं; वहाँ दृष्ट में वात, पित्त, कफ आदि दोषोंकी विषमता से जनित रोगोंकी चिकित्सा-केलिए भी हैं । यदि हम उनके नियमोंके अनुकूल व्यवहार करें; तो हम आध्यात्मिक तथा आधिदैविक एवं आधिभौतिक बलसे सम्पन्न हो सकते हैं | श्रद्धा - भक्ति के द्वारा पूजित हुई लक्ष्मी भी कृपा करती है । इसके अतिरिक्त हमारे पूर्वजोंने सब प्रकारकी वृत्तिवालोंको धन दिलवानेके उपाय भी विचारे थे । जेसे कि - दीपमालाके अवसर पर मिठाइयोंके अधिक विक्रयसे धन हलवाइयोंके घर जावे । होलीके अवसर पर रंग बेचने वालोंका घर भरे । कभी पुष्पमाला बेचने वालोंके पास धन जावे । कभी कागजों के बेचने वाले प्रसन्न हों; कभी घी - दूध वाले प्रसन्न हों; कभी लैक्चरारोंका सम्मान हो; तो कभी लेखकोंका । कभी ब्राह्मण, कभी क्षत्रिय, कभी वैश्य, कभी शूद्र, कभी सुनार, कभी लोहार, कभी पंसारी, कभी गन्धी, कभी अन्त्यज, कभी चमार, कभी कुम्हार, कभी दर्जी, कभी मज़दूर, कभी कहार, कभी गाय आदि पशु इस प्रकार सभी समय - समय पर प्रसन्न हों; लाभ प्राप्त करें, तृप्त हों; तो दूसरोंको भी वे लाभ देने वाले सिद्ध हों । इस प्रकार धन - मान आदि से सन्तुष्ट प्रजा में बेकारी न रहने से न कोई चोरी कर सके, न दूसरेका गला काट सके, न कोई किसी भी प्रकारका उपद्रव कर सके । इस प्रकार देशकी लक्ष्मी देशमें ही रह जानेसे राष्ट्र - लक्ष्मीकी समृद्धि हो; भिन्न राष्ट्र भी

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दीपावलीका वैज्ञानिक - रंहस्य ७११ इससे डरें । इसी प्रकार सभी पर्वों पर विचार करनेसे हमारे पूर्वजोंकी सर्वतोमुखी - प्रतिभाका परिचय सम्यक् मिल जाता है । इसके अतिरिक्त यह भी जानना चाहिये कि दीपमाला के दिन तिल वा सरसोंके तेलके दीपक जलानेका विधान है; इससे सारी प्रजाके अन्दर इन्जैक्शनके ढंग से तेलका सञ्चार हो जाता है, जो ऐसे समयकेलिए उपयुक्त सिद्ध होता है । इससे समस्त - वायुमण्डल में अद्भुत प्रकारको शक्तिका सञ्चार होनेसे देशका मङ्गल होता है । जैसे यज्ञ के धुएं से कृषिका हित होता है, घृतके वा विभिन्न ओषधियोंके परमाणु सूर्यकी किरणों में मिलकर उनके द्वारा वायुमण्डल में मिलकर जलीय परमाणुओं तथा हमारे फेफड़ों को शुद्ध करके पृथिवीमें स्निग्धता उत्पन्न करके अन्नकी बहुलता करके ' यज्ञाद् भवति पर्जन्यः पर्जन्याद् अन्नसम्भवः । अन्नाद् भवन्ति भूतानि ' ( ३ | १४ ) इस भगवान् की उक्तिको चरितार्थ करते हैं, और हममें बिना खाये भी अन्नका बल भर देते हैं, वैसे ही इस दीपमाला से भी तैलिक- परमाणुओंका रहस्य भी जान लेना चाहिये | कार्तिककी अमावास्या तक वर्षा प्रायः समाप्त हो जाती है, शीत भी मन्थर गति से शुरू हो जाता है । इससे " पूर्व गर्मीमें तेलका व्यवहार छूट जाया करता है, परन्तु शीतकालमें उसका उपयोग बढ़ जाता है । खाया भी जाता है, मर्दित भी किया जाता है । यद्यपि बंगाल आदि देशोंमें तैलका मर्दन तथा दक्षिण देशमें तैलका भक्षण सारा ही वर्ष होता है; तथापि शीतकाल में सर्वत्र ही

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७१३ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) उसके उपयोगकी मात्रा बढ़ ही जाती है । इससे स्पष्ट हो रहा कि- शीतकालकी प्रकृति तैलकी अधिक अपेक्षा करती है । तब समूचा ही देश तेलके मर्दन वा भक्षणका आवश्यक लाभ प्राप्त कर ले; इससे तेलके परमाणुओं से सार्वदेशिक वायुके आप्यायनार्थ दीपावलिको विधि बहुत सुन्दर है । जैसे यज्ञका घृत अग्नि तथा वायुके द्वारा अग्निहोत्रकी विधिसे ' यत्र - तत्र फैल जाता है, वैसे ही यहां तेल दीपकाग्नि तथा वायुद्वारा यत्र - तंत्र व्याप्त हो जाता है, अतः यह भी एक यज्ञ हो जाता है । अथवा जैसे वैद्य किसी ओषधिको भीतर प्राप्त कराने के लिए रोगी के मुखको आधारीभूत न करके इन्जेक्शनका प्रयोग करते हैं, जिससे . वह ओषधि तत्काल शरीर में प्रभाव कर दिया करती है; अथवा जैसे योग्य वैद्य औषधि - विशेषका मृदङ्ग ( तबले ) पर लेप करके उसके बजानेसे वायु - द्वारा वह श्रोषधि रोगीके भीतर, विना उसे खिलाये भी पहुँचा देता है; अथवा जैसे विशेष ओषधियोंका ' अग्निमें हवन करनेपर वे सूक्ष्म होकर वायु - द्वारा देशमें व्याप्त होकर जनता कल्याणार्थ, समर्थ सिद्ध होती हैं; वैसे ही तेल भी ' हमारे भीतर - बाहर पहुँच जावे; अतः हमारे पूर्वजोंने उस अपूर्व-' इन्जेक्शनका ' दीपमाला ' इस नाम से आविष्कार किया था । इधर दीपावली भगवान् श्रीरामचन्द्रके विजयकालकी प्रतीक है, यह भी जन श्रुति है । इससे पूर्व आश्विन मासमें हमारे पूर्वज पितृपूजा द्वारा पारलौकिक - पितरोंको प्रसन्न करके, उनके • आशीर्वाद प्राप्त करके, वर्षा ऋतुके कीचड़ आदिके सूखने के