सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 781–790
सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 781–790
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गीताका गूढ उद्देश्य वा विषय ७१३ होगा । संसार सुखी और समृद्ध होगा । वस, फिर सफलता ही सफलता है; हमारे भारतकी फिर विजय ही विजय है । तभी इसको श्री एवं ऐश्वर्य प्राप्त होगा, फिर और चाहिये क्या? आइये पाठक! ' कर्म और ज्ञानका समुच्चय ' इस मूलमन्त्र का जाप कीजिये और फिर उठिये, इस ' ज्ञान ' को लेकर ' कर्म ' कीजिये और कराइये फिर तो हमारा बेड़ा पार है; विजय है, श्री है, आनन्द है । यही बतानेको ' गीता - जयन्ती ' हमारे पास आती है । ( १६ ) गीताका गूढ उद्देश्य वा विषय । गीताका उद्देश्य स्वर्ग है या मुक्ति - यह एक संशय है, गीता वेदविरोधिनी है या नहीं; यह दूसरा संशय है । गीताका विषय कर्म है वा ज्ञान; यह तीसरा संशय है । गीताका यज्ञ कौन - सा है— यह चौथा संशय है । इसपर विचार आवश्यक है । यदि गीताका उद्देश्य स्वर्ग है, तो वह ' स्वर्गपराः ' ( २।४३ ) ' क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ' ( ६।२१ ) ' यद् गत्वा न निवर्तन्ते तद् धाम परमं मम ' ( १५ | ६ ) यहाँ स्वर्गपर आक्षेप क्यों करती है? यदि गीताका उद्देश्य मुक्ति है; तो वह कर्ममें क्यों प्रवृत्त करती है? कर्मसे तो स्वर्ग वा नरक मिलता है, मुक्ति नहीं । मुक्ति तो कर्मके अत्यन्ताभावसे मिलती है, तभी वह नित्य होती है । कर्मसे मुक्ति मानी जावे; तो कर्मके अनित्य होनेसे मुक्ति भी अनित्य हो जायगी । तभी तो आर्यसमाज - सम्प्रदाय में कर्ममूलक - मुक्ति को अनित्य माना जाता है । या मुक्ति ज्ञानसे मिलती है; पर यह कर्मयोग - शास्त्र ज्ञान कैसे दिलवा सकता है? ४८ स ० ध ०
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७५४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) यदि गीताका उद्देश्य मुक्ति है; तो ' हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं ' ( २२३७ ) इस प्रकार स्वर्गमात्रदायक युद्धकेलिए अर्जुनको क्यों प्रोत्साहित करती है? यदि गीता वेदविरोधिनी नहीं है, तो ' यामिमां पुष्पितां वाचम् ' ( २।४२-४४ ) इत्यादि - श्लोकों द्वारा स्वर्गप्रापक वैदिक-कर्मकाण्डका खण्डन क्यों करती है? ' त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रै-' गुण्यो भवार्जुन! ' ( २४५ ) यहाँ अर्जुनको वह वेदसे विरुद्ध क्यों चलाना चाहती है? वैदिक - देवपूजा को वह ' यजन्त्यविधिपूर्वकम् ' ( ६।२३ ) यहाँ अवैध कैसे कहती है? यदि गीताका विषय ' कर्म ' है; तो गीतासे मुक्ति कैसे मिलेगी? मुक्ति कर्मसे नहीं मिलती, किन्तु ज्ञानसे मिलती है । फिर वह ' कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ' ( ३।२० ) इत्यादि में जनक -श्रादियोंकी कर्मसे मुक्ति ' सिद्धि ' शब्द से कैसे बताती है? यदि गीताका विषय ' ज्ञान ' है, तब इसे कर्मयोग- शास्त्र कैसे बताया जाता है? अर्जुन उसे सुनकर युद्ध - कर्म में कैसे प्रवृत्त हुआ? गीताको यज्ञ कौनसे इष्ट हैं? यदि वैदिक यज्ञ; तो उन्हें तो ' यामिमां पुष्पितां वाचं ' ( २।४२-४४ ) से गीताने खण्डित कर दिया है । वेदप्रोक्त - देवपूजाको विधिपूर्वक माना है । तब कदाचित ' प्राणेऽपानहवनम् ' इत्यादि चतुर्थाध्याय - प्रोक्त यज्ञ ही गीताको इष्ट हों - यदि ऐसा हो, तो गीता वेदविरोधिनी सिद्ध हुई । फिर नास्तिकताको प्रवर्तक हुई; वैदिक लोग इसका सम्मान क्यों करें? इस प्रकार बहुत तरहके प्रश्न गीताके विषय में उपस्थित होते हैं । यदि इन सबका सर्वाङ्गीण- समाधान करें; तो स्वतन्त्र एक
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गीतका गूढ उद्देश्य वा विषय ७११ ग्रन्थ तैयार हो सकता है । पर यहाँ उतना अवकाश नहीं; हमारा विचार है कि इस विषय में गीताका ' कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ' ( २।४७ ) यह पद्य अंशतः उक्त प्रश्नोंका उत्तर दे देता है । इस पद्य से यह निष्कर्ष निकलता है कि - गीताका उद्देश्य मुक्ति है, गीता वेदविरोधिनी, वेदोक्त - कर्मकाण्ड - विरोधिनी अथवा वेदोक्त - यज्ञ-विरोधिनी नहीं है; किन्तु केवल उनके फलको ही हटवाना चाहती है । गीताका विषय है कर्म एवं ज्ञान । वह ज्ञानयुक्त कर्मसे मुक्तिका उद्देश्य रखती है । गीताको वैदिक यज्ञ भी इष्ट हैं; पर कामनाको छोड़कर ही । ' कर्मण्येवाधिकारस्ते ' जहाँ यह - पद्य शास्त्रीय - विषयमें लाभदायक है; वैसे लौकिक - विषय में भी । यह यहाँ यथासम्भव दिखलाया जाता है— यह ठीक है कि- मुक्ति ही सभीके मत में परम पुरुषार्थ है, स्वर्ग किसीके भी मतमें परम - पुरुषार्थ नहीं हो सकता । इस प्रकार गीताके मतमें भी मुक्ति ही परम पुरुषार्थ है । यदि ऐसा है; तब गीता कर्मकेलिए क्यों पुरुषको प्रोत्साहित करती है? इस पर यह जानना चाहिये कि मुक्ति यद्यपि कर्मके अत्यन्ताभावसे ही होती है, गीता से पूर्व, चतुर्थाश्रममें कर्मसंन्यास एवं ज्ञानसे ही मुक्ति मिलना माना जाता था; तथापि गीताने मुक्तिकेलिए बड़ा सुन्दर उपाय उद्भावित किया । उसके तरीकेसे गृहस्थी भी या कर्मकर्ता भी संन्यासी हो सकता है, मुक्ति पा सकता है । उसका उपाय यही बताया गीताने कि— पुरुषका कर्ममें ही अधिकार है, फलमें नहीं । इसलिए पुरुष
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श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) ७५६ कर्मफलका हेतु मत बने, कर्मरहित भी न बने । इस प्रकार कर्मफल हुआ हुआ भी वह कर्म अकर्म ही हो जाता है, जैसेकि -छोड़नेपर ‘ कर्मण्यकर्म यः पश्येद् अकर्मणि च कर्म यः ' ( ४ । १८ ) । वही अकर्म ज्ञानरूप होकर मुक्तिदायक हो जाता है । अथवा कर्मसिद्धता होने पर ज्ञान स्वयं ही उत्पन्न हो जाता है 1 । जैसेकि - ' तत् [ ज्ञानं ] स्वयं [ कर्म ] योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ' ( ४ | ३८ ) तब ज्ञानसे मुक्ति हो ही जाती है । ' प्रयोजनमनुद्दिश्य न मन्दोपि प्रवर्तते ' इस न्यायसे सभी कर्म किसी फलका उद्देश्य करके ही हुआ करते हैं; पर गीता बताती है कि फलोद्दश्यसे किया जानेवाला कर्म बन्धन-कारक अथवा गिरानेवाला होता है । मुक्तिदायक नहीं होता । बल्कि – फलाशा होनेपर बाह्य दृष्टिमें अकर्म भी वस्तुतः कर्म एवं बन्धनकारक हो जाता है । तात्पर्य यह है कि – वेदमें जो कर्मफल कहे गये हैं; वे प्ररोच-नार्थक हैं, कर्ममें प्रवृत्ति करानेकेलिए हैं । फल प्राप्तिकी आकांक्षा पैदा करानेकेलिए नहीं हैं । जैसे कि श्रीमद्भागवत में कहा है-' वेदोक्तमेव कुर्वाणो निःसङ्गोऽपितमीश्वरे । नैष्कर्म्यं लभते सिद्धिं रोचनार्थी फलश्रुतिः ' ( ११ | ३ | ४६ ) लेकिन अज्ञानी - बच्चोंकी भांति लोग उसकी प्ररोचनाको कर्मके प्रवर्तनमें साधनभूत न मानकर उसे साध्य मानते हुए उस प्ररोचनामें ही लग जाया करते हैं । उसका दुष्फल यह होता है कि उसमें कर्म करना मुख्य नहीं रहता; किन्तु वहाँ उसका फल ही आँखोंके आगे उद्देश्य - रूपसे नाचा करता है । तब उसी फलमें लगे रहने से मूल - कर्म में विगुणता आजाने से
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गीताका गूढ उद्देश्य वा विषय ७५७ बन्धन स्वाभाविक ही हो उठता है । कोई पुरुष गुलाबजामन पका रहा हो; और मनमें उसके स्वादरूप फलमें लगा हुआ, उसीके सोचनेमें लगकर, उससे हृत-चित्त हो रहे; तो उसका फल क्या होगा? यही कि उन गुलाब-जामुनोंके पाकमें भी त्रुटि हो जावेगी । जल जायेंगे वा यथायोग्य नहीं पकेंगे, जिससे उसका फल स्वाद भी नहीं मिलेगा । प्रत्युत वे - रोगजनक बनकर उसे बन्धनदायक होंगे; खाटमें वा घरमें उसे बांध रखेंगे । इस प्रकार रोग दूर करनेकेलिए कड़वी दवाई कुनाइन पीनेकी आज्ञा होनेपर पुरुष उसके ऊपर लिप्त हुई खाँडके चाटनेके स्वादमें लग जानेपर कुनाइन से हटनेवाले रोगको, उसके पीने में त्रुटि करके उसे वह अज्ञानी बढ़ाना ही चाहता है । बन्धन से छुड़ाने के लिए उसी फलकामनाको ही गीता छुड़ाना चाहती है; वैदिक यज्ञादि - कर्मोंको नहीं छुड़ाना चाहती — यह सूक्ष्म - तत्त्व जाननेवाले विद्वान जान सकते हैं; आपातदर्शी- जन नहीं । तभी तो कहा है-' कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ' । तब यह कहनेवाले भगवान् वैदिक - कर्म यज्ञादिसे कैसे हटवा सकते हैं?? वैदिक - यज्ञोंके लिए वेद में अर्थवादात्मक - कामनाओंके अनुस्यूत होने से उन कामनाओंके त्यागका ही भगवान्ने उपदेश दिया है । भगवान् चीनीसे लिप्त कुनाइन पीनेकी मनाही नहीं करते; किन्तु उसमें लिप्त खांडके स्वादकी आसक्ति ही छुड़ाते हैं; क्योंकि कामना अपनी ओर खींचकर पुरुषोंके कर्मके वैगुण्यको करानेवाली बन जाती है, जिससे सीमित - फल मिलता है, असीमित
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७५६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) मुक्ति आदि फल नहीं । गीताका मुख्य उद्देश्य मुक्ति है । भगवान् ‘ मा ते सङ्गोस्त्वकर्मणि ' ( २।४७ ) यहां अकर्मत्वका निषेध इस उद्देश से करते हैं कि - पहले तो पुरुष ' नहि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् । कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैगुणैः ' ( ३५ ) कर्मा हो ही नहीं सकता । यद्यपि बाहरी दृष्टिसे अकर्मा दीखे भी सही; तथापि मनमें विविध फलाकाङ्क्षाओं में लगा हुआ वह कुछ न करता हुआ भी कर रहा होता है; तो वह अकर्म भी कर्म होता है । और ' न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ' ( ३।४ ) यह भी भगवान्का मत है कि - विहित कर्मोंके त्याग से भी सिद्धि नहीं मिलती । इस प्रकार भगवान् कर्म नहीं छुड़ाना चाहते; किन्तु उसका फल ही छुड़ाना चाहते हैं । ऐसा होनेपर वह कर्म भी अकर्म ही होता है । भगवान् बिच्छूको नहीं मरवाना चाहते; किन्तु उससे अनुस्यूत उसके डंकको ही निकलवाना चाहते हैं । इस प्रकार डंकके निकलने पर वह विच्छू - विच्छू नहीं रह जाता । विच्छूका बिच्छूपन उसके डंक में ही है, उसके स्वरूपमें नहीं । इस प्रकार होनेपर फल - रहित कर्म और वास्तवमें अकर्म से मुक्ति ही होती है, जिसे भगवान् ने ' कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ' ( ३।२० ) यहाँ सूचित किया है । अभाव नित्य हुआ करता है; अतः उस कर्माभाव - रूप कर्मसे मुक्ति भी नित्य हुआ करती है, कर्मका अभाव उसकी फल - कामनाके त्यागसे ही है, स्वरूपतः कर्म छोड़ने से नहीं । तब भगवान् वैदिक यज्ञ आदियोंको नहीं छुड़वाना चाहते,
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गीताको गूढ उद्देश्य वा विषयं किन्तु उसकी फल - कामनाको ही छुड़वाना चाहते हैं । ' यामिमां पुष्पितां वांचं ' ( २।४२-४४ ) इत्यादि में ' स्वर्गपराः, कामात्मानः ' आदि-लिङ्गसे कामनाको छोड़ना - रूप अनासक्ति ही भगवान्को इष्ट है, वैदिककर्म - त्याग नहीं । इसी भांति ' निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन । ' ( २।४५ ) इत्यादिमें भी गुणन्त्रयके कार्यरूप ऐहिक - आमुष्मिक समस्त - भोगों में तथा उनके ॐ साधनभूत समस्त कर्मोंमें ममता, आसक्ति एवं कामना - आदिका उच्छेद ही निस्त्रैगुण्यभाव है । स्वरूपसे समस्त कर्मोंका त्याग भगवान्के मतमें निस्त्रैगुण्य नहीं; क्योंकि – स्वरूपसे सब कर्मों वा सब विषयोंको कोई भी पुरुष नहीं छोड़ सकता ( गीता ३।५ ) कर्ममात्र त्रिगुणमूलक हुआ करता है; तब गुणातीतता न होने से क्या भगवान् के मत में कर्ममात्र त्याज्य हो जावेगा? यदि ऐसा है; तो गीताका ' कर्मयोगशास्त्र ' यह नाम फिर कैसे हो सकता है? यदि त्रिगुणात्मक भी कर्म त्याज्य नहीं; किन्तु उसका फलमात्र ही त्याज्य है, जैसे कि - ' त्यक्त्वा कर्मफलासङ्ग ' नित्यतृप्तो निराश्रयः । कर्मण्यभिप्रवृत्तोपि नैव किञ्चित् करोति सः ' ( ४।२० ) इसमें कहा है, तब भगवान्के मतमें वैदिक यज्ञादिकर्म भी त्याज्य नहीं; किन्तु उसका फलमात्र ही त्याज्य है । इसके अतिरिक्त यह शरीर भी तो त्रिगुणका कार्य है ( गीता १८/४० ); तब शरीरके त्यागका भी गीता क्यों उपदेश नहीं देती?? बल्कि शरीर -यात्रा ( ३८ ) चलानेका उपदेश देती है । अपने शरीरका उपघात - रूप आत्महत्या पाप मानी गई है ।
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७६० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) परन्तु निष्काम उक्त कर्म तो आचरणीय कहे गये हैं; इस प्रकार त्रिगुणात्मक - कर्मोंका उपघात तो पाप है; परन्तु निष्काम उनका आचरण तो सभी अधिकारियोंके लिए कर्तव्य ही है । इसीलिए शरीर तथा उससे किये जाते हुए कर्मोंमें उनके फलरूप समस्त भोगों में अहन्ता, ममता, आसक्ति, कामना आदि से रहित होना ही यहां ' निस्त्रैगुण्य ' विवक्षित है; अर्थात् तीनों गुणोंके कार्य कर्मफल आदिका छोड़ना ही यहां अभिप्रेत है, वेदप्रोक्त - कर्मोंको छोड़ना यहां विवक्षित नहीं । इससे ' येऽप्यन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धया-न्विताः । तेपि मामेव कौन्तेय! यजन्त्यविधिपूर्वकम् ( १।२३ ) एतदादिक गीता श्लोकों की भी व्याख्या हो गई । यह आशय है कि — देवता- लोग भगवान्के विशेष अंग हैं ( गीता ११।१५, १५६, अथर्व ० १०/७/२७ ), तब अङ्गीकी पूजा अङ्गों के बिना कभी नहीं होती । यदि अङ्ग वा अङ्गोंकी पूजा केवल अङ्ग - पूजा मानी जावे; उसके पूजनसे केवल अङ्गकी प्रसन्नता मानी जावे; अङ्गीकी नहीं; तो वह केवल अङ्गपूजा गीताके मत में अवश्य ही अविधिपूर्वक है; परन्तु यदि अङ्गपूजा अङ्गीकी पूजा के लिए निमित्तमात्र मानी जावे; वहां लक्ष्य अङ्गीकी पूजा हो; अङ्गीकी प्रसन्नता हो; अङ्गकी नहीं; इस प्रकार अभेद माना जावे; और उसके पूजनमें फलाकाङ्क्षा न की जावे; तब गीताके मतमें वह अङ्ग - पूजन भी अविधि - पूर्वक नहीं होता, अज्ञान पूर्वक नहीं होता. । इसे इस प्रकार समझिये - दो शिष्य गुरुजीकी लातें दबा रहे थे । एक बाईं जांघ और दूसरा दाहिनी जांघको दबा रहा था ।
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गीताका गूढ उद्देश्य वा विषयं गुरुजीने करवट बदली । बाई एवं दाई ' जांघें भी बदल गई । परन्तु अपने - अपने स्थान पर बैठनेके दुराग्रही मूढ उन शिष्योंने यह न सहकर एक - दूसरेकी जांघपर लाठी मार दी कि — दूसरेके दबाने की टांग मेरी ओर कैसे आ पड़ी? गुरुजी चिल्ला उठे । यह सेवा उन दोनोंकी दृष्टिसे अङ्गपूजन थी; और फलाकांक्षासे की जा रही थी कि यदि गुरुजी की मेरे जिम्मे हुई लात दबानेपर प्रसन्न होगई - तो मुझे विद्या आजायगी । यदि वे अज्ञानी न होते, अङ्ग की सेवासे उसमें विद्यमान अङ्गीकी सेवा समझते, अङ्गको प्रसन्नता से अङ्गीकी ही प्रसन्नता समझते; तब उन द्वारा ऐसा अवैध आचरण न होता । यही अज्ञान भिन्न - भिन्न देवकी पूजामें परस्पर झगड़ने वालोंका होता है । गुरुजीके गलेमें पुष्पमाला डाली है; इससे अङ्गकी सेवा वा प्रसन्नता इष्ट नहीं होती, किन्तु अङ्गी - गुरुजी के आत्माकी प्रसन्नता हो उसमें अभिमत होती है । अङ्गका प्रसाधन माना जावे; तो वह पूजा चमड़े एवं रुधिर आदिकी होने से अवश्य अवैध होगी । फलतः अङ्गभूत वैदिक - देवोंकी पूजा भी यदि अङ्गी - परमात्मासे अभेद बुद्धि करके तथा कर्मफलको अनुद्दिष्ट करके की जावे; तो वह गीता - सम्मत है; एवं मुक्ति प्रदात्री है! फलका उद्देश होने पर वहीं स्वर्गादि - सीमितफल एवं बन्धन देनेवाली होती है । गीतानुसार केवल उससे फलकी आकाङक्षा हटा दो । भगवान् ने अर्जुन - द्वारा युद्ध करवाया और अर्जुनने किया; क्या अर्जुन नहीं जानता था कि - शास्त्रों में युद्धका ऐहिक - फल विजय
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७६२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) है और प्रत्यक्ष तो हिंसा है, और पारलौकिक फल स्वर्ग है?? जैसे कि वेदमें कहा है — ‘ ये युध्यन्ते प्रधनेषु ( युद्धं षु ) शूरासो ये तनूत्यजः । ये वा ( यज्ञेषु ) सहस्रदक्षिणाः ' ( ऋ ० १० १५४ ३ ) कौटलीय - अर्थ-शास्त्रमें भी कहा है- ' वेदेष्वपि अनुश्रूयते - समाप्तदक्षिणानाम-वभृथेषु, सा ते गतिर्या शूराणाम् ' ( १०।३।३२-३३ ) । बोधायन-पितृमेध - सूत्र में भी कहा है- ' यां गतिं यान्ति युधि युद्धशूराः ' ( ३ । ४ । १४-१५ ) । मनुस्मृति में भी कहा है- ' युध्यमानाः परं शक्त्या स्वर्गं यान्त्यपराङ ्ममुखाः ' ( ७।२१ ) । क्या भगवान् श्रीकृष्ण भी नहीं जानते थे कि युद्धका फल स्वर्ग है, मैं उस क्षयी फलवाले स्वर्गके लिए अर्जुनसे क्यों युद्ध करवाता हूँ? अवश्य जानते थे; बल्कि स्वयं ही तो भगवान्ने अर्जुनको कहा था - ' यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् । सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ! लभन्ते युद्धमीदृशम् ' ( २।३२ ) ' हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ' ( २।३७ ) । इस प्रकार श्रीकृष्ण एवं अर्जुन दोनों ही जानते थे कि युद्ध का पारलौकिक - फल स्वर्ग है, और ऐहिक- फल राज्यभोग है, तथा वर्तमान- फल हिंसा है; तब गीता में स्वर्गको क्षयो दिखलाने वाले और कामोपभोग छुड़वाने वाले तथा मुक्तिकेलिए प्रोत्साहित करने -वाले भगवान्ने, गुरुओं की हिंसा आदि से डरे हुए अर्जुनसे युद्ध क्यों कराया? गुरुओंकी हिंसा से डरे हुए अर्जुनने ही युद्ध क्यों किया? उसमें तात्पर्य यह है कि जब भगवान्ने अर्जुनको आश्वासन दे दिया कि — ' मामेकं शरणं व्रज ' ( १८।६६ ), और