सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 801–810
सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 801–810
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श्रीमहीधरका अर्थ यजमानकी कन्यासे हँसी - ठट्ठा आदि कराना सिवाय वाममार्गी-लोगों से अन्य मनुष्यका काम नहीं है ' ( स ० प्र ० १२ पृ ० २५६ ) । एक अन्य महाशयने लिखा है - ' वेदमें कोई मन्त्र अश्लील है ही नहीं तो यहां अश्लीलता कैसे हो सकती है? अतः यह दोष टीका-कार- महीधरका है । ' ( ३ ) इसपर हमारा कथन यह है कि - अश्वमेधके मन्त्रोंका जो श्रीमहीधराचार्य कृत - अर्थ उद्धृत किया जाता है, उसमें श्रीमहीधराचार्यकी अपनी कुछ भी कल्पना नहीं है । जो अर्थ उन मन्त्रोंका सम्भवी है; और शतपथब्राह्मण तथा यजुर्वेद संहिताके कल्प ' कात्यायन - श्रौतसूत्र आदि सूत्रकारोंने जो अर्थ किया है; वही अर्थ श्रीमहीधराचार्यने भी किया है । यदि शतपथ तथा श्रौतसूत्रका अर्थ बदला जावे; तो श्रीमहीधर का अर्थ भी तदनुसारी होनेसे बदला जा • सकता है । केवल श्रीमहीधरने ही नहीं; किन्तु उवटाचार्य तथा श्रीसायणाचार्यं तथा श्रीभवदेव आदिने भी वही अर्थ किये हैं । क्या आक्षेप्ता- लोग शतपथब्राह्मण तथा श्रौतसूत्रकारोंको वाममार्गी मानते हैं? क्या वाममार्गी भी स्त्रियोंका अश्वसे समागम कराया करते हैं? यदि नहीं; तब श्रीमहीधरको ' वाममार्गी ' कैसे कहा जाता है? | ऋ ० भा ० भू ० के प्रणेता स्वा ० द ० जी अपने यजुर्वेद-भाष्यकी कसौटी ' शतपथ ' को बना गये हैं । अपने वेदभाष्यकी उत्तमतामें उन्होंने यही कारण बताया है कि वह शतपथाद्यनुकूल है । उनके शब्द पाठकगण देखें- ( प्र ० ) किञ्च भोः! नवीनं
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७७४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) भाष्यं त्वया क्रियते, आहोस्वित् पूर्वाचार्यैः कृतमेव प्रकाश्यते? ( उ ० ) पूर्वाचार्यैः कृतं प्रकाश्यते । तद् यथा- यानि पूर्वैर्देवैर्विद्वद्भिः-ब्रह्माणमारभ्य याज्ञवल्क्य - वात्स्यायन जैमिन्यन्तै ऋषिभिश्च, ऐतरेय-शतपथादीनि भाष्याणि रचितानि आसन्; तथा यानि पाणिनि-पतञ्जलि - यास्कादिमहर्षिभिश्च वेदव्याख्यानानि वेदाङ्गाख्यानि कृतानि ..एतेषां संग्रहमात्रेणैव सत्योर्थः प्रकाश्यते, नचान्न किञ्चिद, अप्रमाणं नवीनं स्वेच्छया रक्ष्यते ' ( पृ ० ३४१-३४२ ) । ( ४ ) शताब्दी - संस्करण में प्रकाशित दयानन्द - ग्रन्थमालाके प्रथम भागके १८ वें पृष्ठ में श्री हरविलास सारडा लिखते हैं- ' ऋषि ( दयानन्द ) का भाष्य उवट आदि भाष्यों से अर्थोकी दृष्टिसे सर्वथा भिन्न प्रतीत होता है, परन्तु इसका यह अभिप्राय नहीं कि — ऋषि दयानन्द इन आचार्यों [ महीधर ध्यादि ] के उन भाष्योंको सर्वथा गलत समझते थे, क्योंकि -ऋषिने वेदोंके याज्ञिक अर्थोको भी स्वीकार किया है । ( देखो -ऋषिभाष्य यजुर्वेद् तथा ऋ ० भा ० सू ० के वेदविषय- विचार तथा प्रतिज्ञाविषय - प्रकरण ) उन [ याज्ञिक ] अर्थोंकी सत्तासे ऋषिने इनकार नहीं किया । हाँ, जहाँ - जहाँ ये भाष्यकार शतपथ ब्राह्मणके भावोंसे उल्टे चले गये हैं, उन - उन भागोंकी संक्षेपसे ऋषिने आलो-चना भी करदी है । ' इससे यजुर्वेदके याज्ञिक अर्थ भी ठीक सिद्ध हुए; और यजुर्वेद-' भाष्यकी कसौटी ' शतपथ ' सिद्ध हुआ । इस कारण जहाँ आक्षेप्ता ( स्वा ० द ० ) ने महीधरभाष्यका खण्डन किया है; वहाँ ' सत्यार्थ ' शतपथका देकर स्वयं उसका व्याख्यान लिखा है । सो जब हम
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श्रीमहा ७७५ वही महीधर भाष्यवाले शब्द शतपथसे, वह भी आर्यसमाजी- प्रेस वैदिक-यन्त्रालय अजमेर के छपे हुए शतपथ ब्राह्मण से दिखला दें; तब श्रीमही-धराचार्य अपने उत्तरदायित्वसे मुक्त हो जायेंगे । तब जो अर्थ शतपथके उद्धरणोंका किया जायगा; वही महीधरभाष्यका हो जाएगा । इससे महीधरको बदनाम करनेका उत्तरदायित्व भी उन लोगों पर पड़ जावेगा । वस्तुतः यह दुर्नीति है । इसी दुर्नीति पर आर्यसमाजके विद्वान्, गुरुकुल ज्वालापुरके आचार्य, श्रीनरदेवजी शास्त्रीने अपने ' ऋग्वेदा-लोचन ' के पृष्ठ २६८ में आश्चर्यमिश्रित- खेद प्रकाशित किया है । देखिये श्रीनरदेवजीके शब्द— ' स्वामी [ दयानन्दजी ] ने यजुर्वेदभाष्यकार - महीधराचार्य, ऋग्वेद-भाष्यकार - सायणाचार्यादिके भाष्यका खण्डन तो किया; किन्तु जिन शतपथादि - ब्राह्मणोंके आधार और प्रमाणोंसे वे [ महीधरादि ] इस प्रकारका भाष्य करने पर बाध्य हुए; उन ब्राह्मणों [ ब्राह्मणभाग ] के विषयमें मौन साध लिया ' । ( ५ ) अब हम शतपथब्राह्मणका वह पाठ उद्धृत करते हैं, जिनके अनुसार श्रीमहीधरने लिखा है - ' तस्मिन् एनमधिसंज्ञप-यन्ति । संज्ञप्तेषु पशुषु पत्न्यः पान्नेजनैरुदायन्ति । चतस्रश्च जायाः, कुमारीपञ्चमी, चत्वारि च शतानि अनुचरीणाम् ' ( १३।५।२।१ ) पान्नेजनेषु महिषीम् अश्वाय उपनिषादयन्ति [ यही महीधर के निष्ठितेषु ‘ महिषी अश्वसमीपे शेते ’ इन शब्दोंका मूल है ] । अथ एनौ [ महिषीम् अश्वं च ] अधिवासेन संप्प्रोणुवन्ति ' । [ वस्त्रेण आच्छादयन्ति ]
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७७६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) निरायत्य अश्वस्य शिश्नं महिषी उपस्थे निधत्ते, [ यही वे शब्द हैं; जो श्रीमहीधरके थे ] ' वृषा वाजी रेतोधा रेतो दधातु ' ( यजुः २३।२० ) इति मिथुनस्यैव सर्वत्वाय ' ( १३/५/२२ ) ' तयोः [ अश्वमहिष्योः ] शयानयोः अश्वं यजमानः अभिमेथति - ' उत्सवध्या अवगुदं धेहि ' इति [ यजुः २३।२१ ] ( शत ० ३ ) ' अथ अध्वर्युः कुमारमभिमेथति— हये कुमारि! ' यकासकौ शकुन्तिका ' [ यजुः २३२२ ] ' ' तं कुमारी • प्रत्यभिमेथति - हयेऽध्वर्यो - ' यकोऽसकौ शकुन्तकः ' इति [ यजुः २३।२३ ] ' ( शत ० ४ ) । ' अथ ब्रह्मा महिषीमभिमेथति - हये महिषि । ' माता च ते पिता च ते ' [ यजुः २२।२४ ] । शतं राजपुत्र्योऽनुचर्यः ब्रह्माणं प्रति अभिमेथन्ति - हये ब्रह्मन्! ' माता च ते पिता च ते ' [ यजुः २३ २५ ] ( शत ० ५ ) ' अथ उद्गाता वावातामभिमेथति " " अनुचर्य उद्गातारं प्रति अभिमेथन्ति ' ( शत ० ६ ) होता परिवृक्तामभिमेथति • अनुचर्यो होतारं प्रति भिमेथन्ति ( शत ० ७ ) ' क्षत्ता पालागलीमभिमेथति । अनुचर्यः क्षत्तारं प्रत्यभिमेथन्ति ' ( शत ० ८ ) । ' सर्वाप्तिर्वा एषा वाचः यद् अभिमेथिकाः । ‘ उत्थापयन्ति महिषीम्, ततस्ता [ महिष्यादयः ] यथेतं [ यथागमनं ] प्रतिपरायन्ति ' ( शत ० १३ । ५ । २ । ६ ) । यह शतपथका सारा ही पाठ श्रीमहीधराचार्यका उपजीव्य है, ' तब श्रीमहीधराचार्य पर दोष क्यों?? यह उद्धरण हमने आर्य-समाजके प्रामाणिक - प्रेस ' वैदिक यन्त्रालय अजमेर ' में सं ० १ ९ ५६ वि ० में मुद्रित एवं प्रकाशित ' शतपथ ब्राह्मण ' के ६६१ पृष्ठकी २०-२१-२२-२४ आदि तथा ६६२ पृष्ठकी आरम्भिक - पंक्तियों से दिया है । इसी प्रकार वेदके अङ्ग कल्प ' कात्यायन श्रौतसूत्र ' में भी
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श्रीमहीधरका अ देख लीजिये - ' अश्वशिश्नमुपस्थे कुरुते - वृषा वाजीति ' [ यजुः २३ | २० ] ( २०१६ १६ ) आक्षेप्ता महाशय देखें । महीधर तथा शतपथके इस प्रकरणके शब्द भी बराबर हैं । ऋ ० भाष्यभूमिका में ( पृ ० ३४६ ) यही महोधरका अर्थ — अश्वशिश्नमुपस्थे ' कुरुते - वृषा वाजीति ' आक्षेप्य माना है, वही शतपथ में अन्य भी स्पष्ट कर दिया गया है- ' अश्वस्य शिश्नं महिषी उपस्थे निधत्ते, वृषा वाजी रेतोधा रेतो दधातु ' ( शत ० १३/५/२/२ ) । तब दोनों स्थान अर्थ बराबर होगा । अब आक्षेप्ता बतावें कि — क्या शतपथ भी वाममार्गियोंका ग्रन्थ है? उसमें अब प्रक्षेप बताना अपने पक्ष की दुर्बलताका प्रकाशन होगा । तब प्रतिपक्षी जो इन श्रार्ष - उद्धरणोंका अर्थ करें; वही तदाश्रित- महीधरभाष्यका कर लें । शेष रहा महिषी कुमारी आदिसे ठट्ठा - वह शतपथमें भी ' अभिमेथन ' शब्द से कहा ही है । हम अभी - अभी उनके उद्धरण दे चुके हैं । अभिमेथनके वेद - मन्त्र भी दोनों स्थलों ( शतपथ एवं महीधरभाष्य ) में समान बताये गये हैं । कात्यायन श्रौतसूत्रमें भी वही अर्थ मिलेगा । केवल इसमें ही नहीं; लाट्यायन श्रौतसूत्र में भी वही मिलेगा । उसमें लिखा है- -' संज्ञप्तेषु पशुषु होत्रामिमेधिते ब्रह्मा वावातामभिमेथेत् ' ( ६।१०।३ ) : उक्त - सूत्रपर अग्निस्वामीका भाष्य भी देखिये- ' अभिमेथनं नाम असंयतया मन्त्रवत्या उक्ति - प्रत्युक्तिः ' । इसी प्रकार वहां ६ १०१७ में भी कहा है । फिर अभिमेथनकी शान्त्यर्थ आचमन करके वामदेव्यगान करना कहा है । यह वचन ' सा याऽसौ फाल्गुनी
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७७८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) पूर्णमासी भवति ' ( शतपथ ० १३ । ४ । १ । ४ ) । फाल्गुनकी पूर्णिमा में होलिकाके अवसरपर अश्वमेध यज्ञमें कहे जाते थे; इसी परम्पराके फल - स्वरूप होलियों में अश्लील - परिहास की शैली छाव भी मिलती है । इसे हम ' होलिका -विज्ञान ' में स्पष्ट करेंगे । इससे इसकी वैदिकता सिद्ध हो रही है । ( ६ ) इन आक्षेप्ताओंको जो कि यह ( रानीसे घोड़ेके मैथुनका ) भ्रम हुआ है, उसका कारण यह है कि वे लोग उस समय घोड़ेको जीवित समझते हैं, यद्यपि यह घोड़े के जीवन में भी उपपन्न नहीं हो सकता । क्योंकि घोड़ेका मानुषीसे समागम तथा घोड़ेके वीर्यसे मानुषीमें गर्भं उपपन्न नहीं । अतः आक्षेप्ताओं का यह महामोह है । उस समय श्रश्वमेधका अश्व संज्ञप्त ( मृतक ) है; उसके अङ्ग भी पृथक् - पृथक् संशोधित होकर पड़े होते हैं । हम पहले शतपथका पाठ लिख चुके हैं कि - ' संज्ञप्तेषु पशुषु ' । ' संज्ञप्त ' का अर्थ ' मृतक ' है । देखो - वेदाङ्ग - व्याकरण, श्रीपाणिनिमुनिका धातुपाठ 1 उसमें ' मारण तोषणनिशामनेषु ज्ञा ' ( ८११ ) यहां मित्संज्ञक धातुओंमें ' ज्ञा ' धातुका अर्थ ' मारना ' सबसे पूर्व लिखा है । ‘ वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी ' में भी यही है । इतना अधिक लिखा है — ' ज्ञप मिच्च ' इति चुरादौ । ज्ञापनं मारणादिकं च तस्यार्थः ' । यहां ' तत्त्वबोधिनी ' में लिखा है - ' पशुं संज्ञपयति मारयति इत्यर्थः ' । ' बालमनोरमा ' में भी यही लिखा है- ' पशुं संज्ञपयति - अक्षतं मारयतीत्यर्थः । यही: स्वा ० द ० संगृहीत ' धातुपाठ ' में लिखा है - ' मारतोषण- निशामनेषु ज्ञा ' ( पृ ० १२ ) यहां मित्संज्ञक ' ज्ञा '
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श्रीमहीधरका यर्थं ७७३ धातुका पहला अर्थ मारण है । यही बात स्वामी दयानन्दके आख्यातिक भ्वादिगण ( पृ ० ८३ ) में लिखी है । यदि प्रतिपक्षियोंको वेदाङ्गपर विश्वास न हो; तो हम ' संज्ञप्त ' शब्दपर वेदभाग ' ब्राह्मण ' की सम्मति देते हैं; देखिये - घ्नन्ति वै एतत् पशुम्, यद् एनथं संज्ञपयन्ति ' ( शत ० १३ । २ ॥ २ ) । तो जब पशु उस समय संज्ञप्त ( मृतक ) है; तो उस समय प्रतिपक्षियोंका दुरभिप्राय कैसे सङ्गत हो सकता है? ( ७ ) जब घोड़ेके पास महिषीको रखा जाता है; उस समय अश्व मृतक होता है— इस विषयकी ब्राह्मणभागकी साक्षी हम दे चुके | अब इसमें इतिहासकी साक्षी भी पाठकगरण देखें— ( क ) वाल्मीकि - रामायणमें पुत्रेष्टियज्ञ करनेके लिए पूर्वजन्मकृत, कार्य - प्रतिबन्धक पापके क्षयार्थ पहले अश्वमेघ यज्ञ किया गया था । उस समयका वहां वर्णन है— ' कौसल्या तं हयं तत्र परिचर्य ( परिक्रम्य ) समन्ततः । कृपाणैर्विशशासैनं त्रिभिः परमया मुदा ' ( १।१४।३३ ) यहां अश्वकी ' पत्न्यः एनं त्रिः परियन्ति ' ( शत ० १३ | २ | ८ | ४ ) इस कथनसे परिक्रमा और ( शत ० १३।२।८।२ के अनुसार ) कौशल्या-द्वारा अश्वका विशसन ( हनन ) कहा है । फिर आगे लिखा है— ' पतन्त्रिणा तदा सार्धं सुस्थितेन च चेतसा । अवसद् रजनीमेकां कौसल्या धर्मकाम्यया ' ( १४ | ३४ ) यहां पर मृतक घोड़ेके पास रहना धर्मेच्छा से कहा है, सम्भोगेच्छासे नहीं । ( ख ) इसी प्रकरणके तैत्तिरीय ब्राह्मणके भाष्य में श्रीभट्टभास्करने भी यही भाष्य किया है- ' तप एव सन्तापहेतुत्वात् अस्या ( महिष्या )
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) एतत् तपस्थानीयं यद् मृतेन मिथुनीभवनम् [ सह उपवेशनम् ] ' ( ३ ॥ ६।२६ ) यहां भी अश्वकी मृतकता स्पष्ट है । ( ग ) अब इसकी अन्य साक्षी महाभारत में देखें- ' ततः संज्ञप्य तुरगं विधिवद् याजकस्तदा । उपासंचेशयन् राजन्! ततस्तां द्रुपदात्मजाम् ' ( आश्व-मेधिकपर्व ८ धा २ ) यहां भी मृतक घोड़े के साथ द्रौपदीको बैठाया गया है । जब अश्व मृतक है; तब यहां आताओंके आक्षेप व्यर्थ हैं । जैसे कि - ' वेदोंका सार्वभौम संदेश ' ( पृ ० ३६ ) में उसके व्याख्याताका यह कहना कि - महीधरके अपने - वेदभाष्य में किये अर्थ स्पष्टतया अश्लील ग्राम्यधर्म ( संभोगादि ) - परक हैं; यह निष्पक्ष विद्वानोंको लज्जाके साथ स्वीकार करना पड़ेगा ' इत्यादि निराकृत हो गया । यहां बतलाया जा चुका है कि अश्व मृतक है, और उसे गणपतिदेवके रूपमें आहूत किया गया है, जैसा कि हम आरम्भिक-मयूखमें विस्तार से बता चुके हैं । ' हवामहे ' ऐसा आह्वान भो वैदिक - शैली से चेतन - देवताका होता है; उसमें प्राकृत अश्व, उसमें भी मृतकका आह्वान नहीं हुआ करता । सो ' शिश्न ' वा ' रेत ' एवं वीर्य उसी गणपतिदेवका इष्ट है, मृतक अश्वका नहीं । इस बात पर न विचारने से ही प्रतिपक्षी भ्रमकूपमें गिरे हुए हैं । यदि यहां प्रतिपक्षी भी प्राकृत अश्वका वर्णन न समझकर ' गणपति ' देवका वर्णन समझ लें, क्योंकि - ' गणानां त्वा ' मन्त्रका देवता आर्यसमाज * ' मिथुनीभवनम् ' का अर्थ इकट्ठा होना है । वेदादि - शास्त्रों में भाई-बहिनके जोडेको भी ' मिथुन ' कहा जाता है । जैसे कि - निरुक्त ( ३।४।२ ) में ।
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श्रीमहीधरका अ ७८१ की छपाई हुई यजुर्वेदकी संहितानुसार भी ' गणपति ' है; तब उन्हें यह भ्रम वा दूसरोंपर आक्षेप करने का अवसर ही न रहे । जब जीवित-अश्वसे भी यह प्रार्थना सङ्गत नहीं हो सकती, जोवित अश्व भी न निधिपति, न प्रियपति, और न गणपति वन सकता है, न उसका आह्वान ही उपपन्न हो सकता है; न उसके वीर्यका मानुषीमें गर्भ करने से कोई सम्बन्ध है, न अश्वका मानुषीसे समागममें कोई सम्बन्ध है; तब मृतक घोड़ेसे यह प्रार्थना सङ्गत कैसे हो ' सकती है? तब वादियोंकी यह अपने नियोग आदिकी कल्पनासे विकृत हुए मस्तिष्ककी उपज है, प्राचीन ग्रन्थोंसे इसका कोई भी सम्बन्ध नहीं । अतः वहां अश्वरूपमें प्रजापति - गणपतिकी ही प्रार्थना है, जैसे कि शतपथमें कहा है- ' प्राजापत्यो वै अश्वः ' ( शतपथ ० १३ | ३ | ३ | ४ ) ' प्रजापतिर्देवता अस्य - इति प्राजापत्यः, अश्वः । वही गणपतिदेव आरम्भिक -मयूखमें निदर्शित की हुई सरणिसे विघ्नेश्वर एवं सर्वेश्वर होनेसे प्रजाके पति - रक्षक, हमारी निधिके रक्षक, वसु आदि वा कूष्माण्ड आदि गणों तथा साध्य आदि गणदेवताओंके पति, पद्म महापद्म आदि निधियों के पति, पति - पुत्र, प्राण - धन आदि प्रिय वस्तुओंके भी पति होते हैं । वही सम्पूर्ण-जगत्में व्यापकतासे निवास करनेसे ' वसु ' नामसे सम्बोधित किये जाते हैं, मरा हुआ अश्व सम्बोधित नहीं किया जाता । वह मृतक-अश्व तो केवल मूर्तिपूजाकी मूर्तिकी तरह सम्बोधन वा अर्चना साधन है, मूर्तिपूजामें पत्थरकी मूर्तिका आह्वान न करके मूर्तिस्थित देवताशक्तिको आहूत किया जाता है । इसी प्रकार यज्ञके नायक
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७८२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) अश्वमें भी गणपति - देवताको ही आहूत किया जाता है कि- -‘ गणानां त्वा गणपतिं हवामहे, ( यजुः २३ | १ ९ ) । अब इस मन्त्र का शेष भाग है - ' वसो! मम आहमजानि गर्भधमा त्वमजासि गर्भधम् ' । यहां पर ‘ गर्भधं ' – गर्भं दधातीति गर्भधं रेतः अहम् आ अजानि -- आकृष्य क्षिपामि, तच्च गर्भधं रेत आ अजासि - आकृष्य क्षिपसि ' इस महीधरकी व्याख्यापर बिना विचारके ही बड़ा होहल्ला मचाया जाता है । यहां ' रेतः ' का अर्थ ' वीर्य ' किया जाता है; सो अश्व के जिस रेतः ( वीर्य ) को प्राप्त करना श्रीमहीधर ने लिखा है, वही वेदने स्वयं कहा है, देखिये - ' वृषा बाजी रेतोधा रेतो दधातु ' ( यजुः २३।२० ) यहां ' रेतः " का अर्थ छिपा लिया जाता है । यदि यतेप्ता ' रेतः ' का ' बल ' अर्थ करते हैं; तो ' वीर्य का भी ' बल'ही अर्थ होता है; वही ' तेज'का आशय निकला | फिर किस मुहसे महीधरको बदनाम किया जाता है? जो ' वाजी रेतो दधातु ' वाले मन्त्रका अर्थ एवं आशय है, वही महीधरके भाष्यका भी है-यह क्यों नहीं सोचा जाता? अब इस विषय में पाठकगण | देखें — ( ८ ) ' गर्भधं ' पर ' शतपथब्राह्मण ' में लिखा है- ' प्रजा वै पशवो गर्भः, प्रजां वै पशून् आत्मन् धत्ते ' ( १३ २ २ ५ ) इस श्रुति से ' गर्भ ' शब्द यहां प्रजा एवं पशु - वाचक है । उस प्रजा- पशुरूप गर्भके धारण करनेवाले दैवी रेतः- गणपतिदेव के तेजके आकर्षणकी प्रार्थना की गई है, प्राकृत - घोड़े के प्राकृत - वीर्य की नहीं; क्योंकि — - अश्वके वीर्यका और फिर उसमें मृतक अश्वके वीर्यका मानुषी - बीमें गर्भसे सम्बन्ध हो