सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 811–820
सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 811–820
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( ) श्रीमहीधरका अर्थ: ७८३ भला क्या हो सकता है? क्या मृतकका वीर्य भी रह जाता है? वीर्य -की शुष्कता से ही तो मृत्यु होती है । ( ख ) अक्षेताओंकी कुमारियां वा स्त्रियां प्रार्थना करती हैं-‘ वीर्यमसि वीर्यं मयि धेहि ' ( यजुः १६६ ) ' अग्निः प्रजां बहुलां मे करोतु, अन्नं पयो रेतो. अस्मासु धत्त ' ( यजुः १६४८ ) इत्यादि मन्त्रोंसे कुमारियाँ वा स्त्रियाँ अपने में रेतः या वीर्यके आधानकी प्रार्थना करती हैं क्या? ( ग ) ' आर्याभिविनय ' ( पृ ० ४६ ) के अनुसार वे प्रार्थना करती हैं - ' हमारे हृदय में रमण कीजिये ' ( ऋ ० १ | ११ | १३ ); तो क्या वे आक्षेप्ताओं की स्त्रियाँ उसी ' प्राकृत वीर्य ' तथा ' रमण ' की प्रार्थना कर रही होती हैं, जिसे प्रतिपक्षी यहाँ बताते हैं? ( घ ) ' इमं ते उपस्थं मधुना ससृजामि ' इस स्वा ० द ० जीकी संस्कारविधिमें लिखे, विवाहकालीन मन्त्र में भी श्रोतागण क्या स्त्रीके उसी उपस्थको मधुसे युक्त कर रहे होते हैं? यदि ऐसा है; तो दूसरों पर आक्षेप क्यों? ( ङ ) ' अथैनं मनुष्याः उपस्थं कृत्वा उपासीदन् ' ( शतपथ २ | ४ | २ | ३ ) यहाँ क्या प्रजापतिके सामने मनुष्योंका गुप्त- अङ्ग निकालना माना जावेगा? जो अर्थ ' वीर्य, उपस्थ ' आदिका प्रतिपक्षी यहाँ करेंगे, वही महीधरभाष्यमें भी हो जायगा? ( च ) परमैश्वर्यकेलिए बैलसे, छेरीसे भोग करें ' [ उपयोग लें ] ( यजुः २१।६० ) यह स्वा ० द ० जीका किया अर्थ है; तब क्या आक्षेप्ताओं-की वेद पढ़नेवाली स्त्रियोंका बैलसे और उनका स्वयं छेरीसे भोग
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७८४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) वा उपयोग लेना वही तथाकथित अश्व के भोग वा उपयोग जैसा माना जावेगा या नहीं? ( छ ) ' मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् ' ( १४३ ) इस गीताके पद्यमें भी योनि में गर्भ धारण करनेका ' तस्य योनिं परि-पश्यन्ति धीराः ' ( यजुः ३१।१६ ) यहां भी क्या योनिका वही अश्लील अर्थ किया जावेगा? ' मम योनिरप्स्वन्तः समुद्रे ' ( ऋ ० १०।१२५ / ७ ) यहाँ वागाम्भृणी - ऋषिकाकी योनि, ' नागं योनि च लिङ्ग ं च बिभ्रती नृप! मूर्धनि ' ( प्राधानिकरहस्य ५ ) क्या यहां भी श्रीदुर्गादेवीकी योनिका वही अश्लील अर्थ किया जावेगा? ( ज ) यदि नहीं; तो याज्ञिक - प्रक्रिया में भी ऐसी बात नहीं; वहां-पर अश्व मृतक है, ' मेढू ' ते शुन्धामि ' ( यजुः ६ १४ ) उसके अंग पृथक् - पृथक् शोधित कर रखे हैं; उससे मैथुन हो ही कैसे सकता है? ' गणानां त्वा ' इस यजुर्वेद के मन्त्रका ऐतरेय ब्राह्मणसे ' ब्राह्मणस्पत्यम् ' यह जो अक्षेताओं द्वारा अर्थ बताया जाता है, उन लोगोंको यह पता नहीं कि - यह याजुष मन्त्रका अर्थ नहीं, किन्तु ऋग्वेदके ' गणानां ' इस ब्रह्मणस्पतिवाले मन्त्रका अर्थ है । उसमें ' गर्भधं ' आदि याजुषमन्त्र के पदोंकी व्याख्या है ही नहीं । जिन्हें यह पता नहीं; वे चले हैं महीधरके अर्थपर आक्षेप करने । यदि दोनों ऋग्वेद एवं यजुर्वेद के गणपति एक हैं, इसलिए याजुष-मन्त्रका ऋग्वेदके ऐतरेय ब्राह्मण से अर्थ किया जाता है; तब भी हमारा ही पक्ष सिद्ध हुआ कि अश्वमें उसी गणपति - देवताका याह्वान किया जा रहा है; उसी गणपतिदेव के तेजके श्राकर्षणार्थ प्रार्थना है; तब
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श्रीमहीधरा अर्थ ७८१ भी हमारा ही पक्ष सिद्ध हुआ । ' आ अजासि ' में ' अज ' धातुका ' क्षेपण ' ( ' अज गतिक्षेपणयो: ' इस धातुके अनुकूल ) अर्थ प्राकरणिक था; पर आतेताओं द्वारा ' आ समन्ताज्जानासि ' यह अर्थ बदलकर अपनी जान बचा ली जाती है । इस प्रकार श्रीमहीधरके अर्थका आशय भी जान लिया जा सकता है; तब उसपर आक्षेप क्यों? ( १ ) प्रतिपक्षिगण अश्वके... डरते हैं; और उससे स्त्रीके जीवित न रहनेकी शङ्का प्रकट करते हैं; पर उपवेद आयुर्वेद पुरुषको ही ' वाजीकरण ' ओषधि देकर स्त्रीकेलिए ' अश्व ' बनाया चाहता है; और वेद भी पुरुषके अंगको ' अश्वका अङ्ग ' बनाया चाहता है । देखिये — ' यावदंगीनं पारस्वतं हास्तिनं गार्दभं च यत् । यावद् अश्वस्य वाजिनः तावत् ते ( पुरुषस्य ) वर्धतां पसः, ( अथर्व ० ६।७२।३ ) पस ‘ शिश्न ' को कहते हैं; देखिये इसपर स्वा ० द ० जीका यजुर्वेदभाष्य ( २०१६ ) । तो क्या स्त्री उस पुरुषके अश्वके शिश्नसे जीवित रह सकेगी, जिसका वेद विधान कर रहा है? यदि यहां प्रतिपक्षी ' अश्व'का साक्षात् ' अश्व ' अर्थ नहीं लेते; वैसे यहां पर भी वे ' अश्वशिश्न ' खास अर्थ कैसे करते हैं? ( १० ) यह स्पष्ट किया जा चुका है कि जो अर्थ श्रीमहीधराचार्यने किया है; वह शतपथब्राह्मणसे लिया है । सो जो तात्पर्य शतपथ में होगा, महीधरभाष्य में भी वही तात्पर्य होगा । सो ' गर्भधं रेतः स्व-योनौ स्थापयति, अश्वशिश्नमुपस्थे कुरुते ' आदिका अर्थ भी यही जान लेना चाहिये कि - स्त्री प्रजा- पशुरूप गर्भको धारण करनेवाले ५० स ० ध ०
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७८६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) गणपति देवके सोमरूप तेजको — जैसे कि वेदमें कहा है- ' अयं सोमो वृष्णोऽश्वस्य रेतः ' ( यजुः २३६२ ) - प्रार्थित करके उसे अपने भीतर आकर्षित करनेकी भावना करती है । इसी भावनाके फलस्वरूप उसे चक्रवर्ती पुत्र पैदा होता है । विवाह - संस्कार में स्वा ० द ० ने संस्कारविधिमें ' इन्द्राग्नी... बृहस्पतिर्मरुतो ब्रह्म सोम इमां नारों प्रजया वर्धयन्तु ' ( पृ ० १५४ - १५५ ) यह मन्त्र लिखा है । उसका अर्थ किया है — बृहस्पतिः - राजा, मरुतः - सभ्य मनुष्य... . • इस मेरी स्त्रीको प्रजा से बढ़ाया करते हैं ' यह वरकी उक्ति है । तो क्या वरकी स्त्रीमें राजा और सभ्य मनुष्य मैथुन करते हैं? यदि नहीं, यह केवल आशीर्वादमात्र है, वैसे वहां भी गणपतिके तेजके आकर्षणकी भावनामात्र है । सो यहां अर्थ यह है-.. ' अश्वस्य– अश्नुते व्याप्नोति सर्वं जगद् - इति अश्वः, गण-पतिदेवः ( नमस्ते गणपतये... त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि ' इति गणपत्युपनिषदुक्तेः ) तस्य गणपतिदेवस्य शिश्नम् - ' शिश्नं श्नथतेः ' ( निरुक्त ४।१६ / ६ ) श्नथयति - ताडयति हिनस्ति वा विघ्नरूपं तम इति शिश्नम्, शेषति – हिनस्ति वा प्रतिबन्धकतामिति वा शिश्नम्, · शश प्लुतगतौ शशति शीघ्र व्याप्नोति इति वा शिश्नम्, शिनोति-तीक्ष्णीभवति इति वा शिश्नम् ' ( सर्वत्र पृषोदरादिः ( ६ | ३ | १०६ ). शिश्नं- तेज इत्यर्थः तद् व्यापकं गणपति - तेज आकृष्य भक्त्या स्वयोनौ — कर्मफलोत्पादके कारणभूतस्वसूक्ष्म शरीरान्तः फलोत्पादन-पर्यन्तं सूक्ष्मरूपेण धारयति । वाजी - वेगवान् बलवान् वृषा-
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श्रीमहीधरा अर्थ ७८७ फलानां वर्ष कः, प्रजापतिः - गणपतिः, रेतः - स्वकीयं तेजः, मयि.. दधातु - स्थापयतु ' । महिषी यहां गणपतिके तेजकी प्रार्थना करती है, और उसे अपने अन्दर आकर्षण करनेकी भावना करती है । जैसे * कि — ‘ वीर्यमसि वीर्यं मयि घेहि ' ( यजुः १६६ ) ' रेतो अस्मासु धन्त ' ( यजुः १६४८ ) आप्ताओंकी स्त्रियाँ यह वेद - मन्त्र पढ़कर अपने वीर्याधानकी प्रार्थना करती हैं । + अथवा — ' मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् ' ( गीता १४ ३ ) के अनुसार प्रकृतिरूप - पत्नी में चिदाभासरूप गर्भका आधान करनेवाले गणपतिदेवका मैं आह्वान करती हूँ, यह अर्थ है, शेष. पूर्ववत् । यहां अश्वके मृतक होनेसे उससे मैथुन असम्भव है; जबकि जीवितके.. साथ भी वैसा नहीं हो सकता । तब जिस - यज्ञमें अपने पतिसे भी कामवासना श्रादिका निषेध होता है, उसीमें मृत अश्वके साथ वासनारूप - ग्राम्यधर्म कैसे हो सकता है? तब यहां पूर्व कहा हुआ. अर्थही वास्तविक है । उक्त शब्द परोक्ष - वृत्तिसे कहे गये हैं । क्या कभी आक्षेप्ताओंकी स्त्रियां अपने मृतक पतिसे मैथुन कर सकती हैं? यदि नहीं; तब मृतक अश्वसे ही वैसे कैसे हो सकता है? अतः गणपतिदेवका तेज ही यहां प्रार्थित किया गया है । इस अवसरपर अश्वकी तीन - परिक्रमा शतपथ ( १३ | २ | ८ | ४ ) और. कातीयश्रौतसूत्र ( २०।६।१३ ) के अनुसार की जाती हैं, परिक्रमा देव-पूजामें ही हुआ करती है; सो यह स्पष्ट देवपूजा ही है । इसी दैवी तेजके आकर्षणके फलस्वरूप महिषीका चक्रवर्ती - लड़का उत्पन्न
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७८८. श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) है । कर्मकाण्ड में भी अश्वमहिषी - प्रसङ्ग में कोई सम्भोगका सम्बन्ध नहीं दीखता; क्योंकि अश्व मृतक है; तब केवल मृतक अश्व पृथग्भूत और संशोधित अङ्गका स्पर्शमात्र, उपस्थ ( उत्सङ्ग, गोदमें, अथवा अपने अङ्गपर ) स्थापनमात्र ही इष्ट है, वहाँ विलासिता न होनेसे तथा भावना दूषित न होनेसे पातिव्रत्य भंग की आशङ्का भी नहीं होती, क्योंकि वह भी शास्त्राज्ञानुसार पतिकी आज्ञा से उसके यज्ञको पूर्त्यर्थ किया जाता है । गायके स्तन वा मूत्रस्थानका पुरुष स्पर्श करते हैं; तो क्या वहाँ पुरुषोंको स्त्रीके अङ्गोंके स्पर्शका विचार आ जाता है? वा उन्हें उससे काम - वासना हो जाती है? यदि नहीं; तब स्त्रीको ही घोड़ेके अङ्गके स्पर्शमात्र से काम - वासना कैसे उत्पन्न हो जावेगी? क्या वह मनुष्य है? प्रतिपक्षियोंको जो ऐसी - वासना उत्पन्न हो जाती है; उसका कारण नियोग आदिकी कामुकताके प्रचारसे मस्तिष्क में विकृतिका उत्पन्न हो जाना है । प्रतिपक्षी लोग नियोगसेवा विधवा विवाहसे मृतककी पत्नीके अङ्गमें अन्य पुरुषके अङ्गका स्पर्शमात्र तो क्या; उसमें तो विलास भी करवाते हैं; वहाँ उनको उस पत्नीके पातिव्रत्य भङ्गकी शङ्का ही नहीं होती । यदि वे उसे अपने अभिमत - शास्त्र के अर्थके अनुसार व्यवहार करानेसे उसके पातिव्रत्यके भङ्गकी शङ्का नहीं. करते; तब इस कर्मकाण्डमें शङ्का करना अपने नियोग वा विधवा-विवाहसे आँख मूँद लेना है । जिस प्रकार आप लोग यहाँ उपहास छउपस्थके उत्सङ्ग - अर्थमें शतपथ ब्राह्मण की साक्षी हम दे चुके हैं ।
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श्रीमहीधरका ३50 करते हैं; वैसे नियोगमें आप लोगोंका भी उपहास होता है, पर विचार करनेसे यह सब आप कट जाते हैं । प्रसव करनेमें डाक्टर भी खीकी योनिका स्पर्श कर रहे होते हैं । उसमें हाथ भी डाल रहे होते हैं; इससे क्या उस स्त्रीका आप पतिव्रत्यभङ्ग मान लेंगे? विवाहको ही ले लीजिये; इसके अङ्ग- गर्भाधान में ही क्या अश्लीलता नहीं है? पर शास्त्रानुसार व्यवहारसे वहाँ धर्म्यता मान ली जाती है; अश्वमेधमें तो न कोई कामवासना है, न ही विलास वा सम्भोग ही; तब बलात् वहाँ समागम वा सम्भोग बताना प्रतिपक्षियोंका अपने कलुषित - हृदयका ही यह कलुषित - विचार है, प्रकृत में ऐसी कोई बात नहीं । यदि वादी ऐसा मानते हैं; और अपनेको वेद - प्रेमी मानते हैं; तो वे जरा अथर्ववेदके कुन्तापसूक्तपर दृष्टि डालें । उसमें मन्त्र है-' महानग्नी उपब्रूते अश्वस्य आवेशितं पसः ' ( २०।१३६।६ ) इस मन्त्रमें महानग्नी स्त्रीमें ' अश्वस्य पस आवेशितम् ' का अर्थ क्या करेंगे? इन्हीं अश्वमेध मन्त्रों तथा कुन्तापसूक्तोंसे त्रस्त होकर आर्यसमाज के एक अन्वेषक - विद्वान् ने अपने काँगड़ी वेद - सम्मेलन के सभापति-भाषण ( ११ अप्रैल १६५० ) के ४२ पृष्ठमें कहा है- ' प्रतिवर्ष भारतके भिन्न - भिन्न प्रदेशों के वेदोंके विद्वान् एक केन्द्रिय- स्थानपर एकत्रित हों, ' ' अश्वमेधसुक्ल, कुन्तापसूक्त, तथा ' त्रीणि शता त्री सह-स्राणि अग्निं त्रिंशच देवा: ' ' इन्द्रो दधीचो अस्थिभिः ' इत्यादि मन्त्रों में विशेषरूपसे विचार किया जाए, जो वेदोंका अनुशीलन करने वालों के लिए विशेष कठिनाई उपस्थित करते हैं ' । इससे स्पष्ट है कि—
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७६० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) श्रश्वमेधसूक्लके उक्त मन्त्रोंका जो अर्थ स्वा ० द ० जीने किया है, वह उन्हें भी सन्तोषप्रद प्रतीत नहीं हुआ; उसमें उन्हें भी उनकी प्रसह्यकारिता मालूम होती है ( ११ ) शेष मन्त्र ही नहीं ( यजुः २३।२२ ) कि- ' यदा भगे -धारका -योनिः वा करोति ' ॥ प्रश्न यह रहता है कि - ' वेदमें तथाकथित अश्लील होते 1 । ' आहन्ति गभे पसो निगलगलीति धारका ' आदि मन्त्रोंका महीधरने अश्लील अर्थ किया है योनौ शिश्नमागच्छति, तदा धारका - धरति लिङ्गमिति ( बच्चेदानी ) गिलति - वीर्यं क्षरति, गल्गलेति शब्द इसपर उत्तर यह है कि - इनं अर्थोके करनेसे यदि श्री-महीधराचार्यको अपवादित किया जाता है; तो इसका भाव यह हुआ किं — वेदमें तथाकथित अश्लील वर्णन नहीं हो सकता । पर ऐसा कहना अज्ञान है । वेदमें सर्वाङ्गीणता होती है । सर्वाङ्गतामें सब कुछ होता है । यदि वेद में ऐसे वर्णन अश्लील माने जावें; तो ' रेतो मूत्रं विजहाति योनिं प्रविशदिन्द्रियम् ' ( यजुः १६७६ ) इस मन्त्रका अर्थ आर्यसमाजी - आचार्य अपने पास वेद पढ़नेवाली १७१२४ वर्षकी कुमारियोंको क्या बताते हैं? ' यस्यां 2 बीजं मनुष्या वपन्ति । यस्यामुशन्तः प्रहराम शें ’ ( ऋ ० १० | ८५ | ३७ ) इस मन्त्रका अर्थ कुमारियोंको क्या पढ़ाते हैं? वा विवाहित हो रही हुईको स्पष्ट बताते हैं? ' मेढू ' ते शुन्धामि पायु ' ते शुन्धामि ' ( यजु ० ६ १४ ) इस मन्त्रका अर्थ कुमारियों को क्या, पढ़ाते हैं? क्या यह तथाकथित अश्लीलता है या नहीं?
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श्रीमहीधरका अ फिर महीधरका अपवाद क्यों किया जाता है? ' त्रिः स्म माऽह्नः श्नथयो चैतसेन ' ( ऋ ० सं ० १०/६५५ ) यहां निरुक्तमें ' वैतसेन ' का ' पु'स्प्रजनेन ' ( ३ । २ ९ । ३ ) अर्थ किया है । इसका भी अर्थ कुमारियों को क्या बताते हैं? यहां कहनेवाली उर्वशी अप्सरा है, क्योंकि वही ऋषिका ( वक्त्री ) है । ' यभ माम् अद्धि ओदनम् ' ( अथर्व ० २० । १३६।११,१३ ) यहांपर ' यभ मैथुने ' धातु है । इसका भी अर्थ बताया जाता है या नहीं? प्रतिपक्षी इन मन्त्रोंमें तथाकथित अश्लीलता मानते हैं या नहीं? यदि मानते हैं वा नहीं मानते; तो दोनों ही पक्षोंमें महीधराचार्यपर ही तथा कथित वेदसम्मत-अर्थ करने पर वाग्वाणोंकी वर्षा क्यों होती है? शेष रहा ' आहन्ति गभे पसो निगल्गलीति धारका ' का श्रीमहीधराचार्यका अर्थ; सो वह वेदको पूर्व - वचनोंकी साक्षीसे अमान्य नहीं । ' पसः ' का अर्थ ' शिश्न ' तथा ' धारका ' का अर्थ ' योनि ' वेदको अनिष्ट नहीं । ' आनन्दनन्दौ आण्डौ मे भगः सौभाग्यं पसः ' ( यजु ० २०११ ) यहां स्वामी दयानन्दजीने भी ' पसः ' का अर्थ ' शिश्न ' किया है । ' धारका ' का ' योनि ' अर्थ शतपथमें देखिये- ' ते स्त्रियमाविशतः, तस्या उपस्थमेव आहवनीयं कुर्वते, धारका ँ समिधम् । धारका ह नाम एतया ह वै प्रजापतिः प्रजां धारयाञ्चकार, रेत एव शुक्रामाहुतिम्, ते स्त्रियं तर्पयतः । स य एवं विद्वान् मिथुनमुपैति, अग्निहोत्रमेव आहुतं भवति, यः ततः पुत्रो जायते, स लोकः, एतद् अग्निहोत्रं याज्ञवल्क्य! नातः परमस्ति ' ( ११।६।२।१० ) ।
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७६२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) केवल यहीं नहीं, तैत्तिरीय संहिता में भी यह प्रसिद्ध है-' आहतं गर्भे पसो निजल्गुलीति धाणिका ' ( ७ | ४ | १६ | ३ ) यहां ' धारका ' के स्थान पर ' धाणिका ' है । इस ' धाणिका ' को कुन्तापसूक्त में देखिये – ' महानग्नी कृकवाकुं · ' शीष्ण हरति धाणिकाम् ' ( अ ० २० । १३६।१० ) । इस सूक्तमें अश्लील होने से ही आर्यसमाजी विद्वान् श्रीराजारामजी शास्त्रीने इस पर भाष्य ही नहीं किया । ' भगे ' का ' गर्भ ' लिखना अक्षरके वैदिक - आद्यन्तविपर्ययके कारण है, जैसे ' पसः ' का विपरीत ' सप ' का अर्थ ' शिश्न ' होता है, देखो निरुक्त ( ५।१६।२ ) । तब श्रीमहीधरको वैसा अर्थ लिखने में क्यों दोष दिया जाता है?? शेष प्रश्न है कि उसको कुमारीको कहा गया है; सो शतपथमें भी तो कुमारीको कहा गया है- हम उसका उद्धरण दे चुके हैं । इसी प्रकार ' आहं तनोमि ते पसो अधिज्यामिव धन्वनि ' ( अ ० ४ | ४ | ७ ) ' मैं धनुष में तनी हुई डोरीके समान तेरे पसः -पु'व्यञ्जनको तानता हूँ ' । यहां भी वादी कुमारियोंको यह अर्थ बताते हैं वा नहीं? यदि हाँ, वा नहीं, तब तादृश व्याख्या करने से महीधरको दोष क्यों दिया जाता है? अतः उस मन्त्रमें ' गर्भ ' और ' पसः ' का अर्थ वही हुआ जो श्रीमहीधरने किया है । इसमें श्रीसायणकी सम्मति भी देखिये –'धनुरिवातानय पसः ' ( अ ० ४ | ४ | ६ ) इस मन्त्रके भाष्यमें उसने लिखा है - ' अस्य पसः - पुंव्यञ्जनं वीर्यप्रदा-तृत्वेन धनुरिव ऊर्ध्वायतं कुरु ' यह लिखकर श्रीसायणने लिखा है-' पसः शब्दस्य लिङ्गवाचित्वम् ' आहतं गभे पसो निजल्गुलीति धाणिका '