सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 821–830

सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 821–830

पृष्ठ 821

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७३३ ( तै ० सं ० ७ । ४ । १६ । ३ ) इत्यादि मन्त्रान्तर- प्रसिद्धम् ' । यही वह मन्त्र है, जिसका स्वामी दयानन्दजीने महीधरका अर्थ उपस्थित करके उसे फटकार दो । श्रीसायणाचार्यको भी उक्त मन्त्रका श्रीमहीधर-जैसा ही अर्थ ही विवक्षित है, यह स्पष्ट है । ( १२ ) व इसी तथाकथित - अश्लीलताको यदि परोक्षवृत्ति मान लिया जाय, और उसके स्थानापन्न अन्य वस्तु रख दी जाय; तो फिर भाव उत्तम हो जाता है । जैसे कि शतपथमें कहा है-‘ विड् वै गभः, राष्ट्र ं वै पसः, राष्ट्रमेव विशि आहन्ति, तस्माद् राष्ट्री विशं घातुकः ( १३ | २ || ६ ) यहां ' गम ' और ' पसः ' का अर्थ नहीं बदला गया; अर्थ वही रखा गया है । ' विड् वै गमः, राष्ट्र ' वै पसः में ‘ वै ’ पदसे पर्यायवाचकता विवक्षित नहीं; नहीं तो ' आयुर्वै घृतम् ' ( तै ० सं ० शशश २ ) में भी ' वै ' शब्दसे ' आयु ' शब्द ‘ घृत ' का वा ' घृत ' आयुका पर्यायवाचक हो जावे; पर वैसा नहीं होता । तो जैसे पसः ( शिश्न ) के गर्भ ( भगमें ) आहनन करनेसे धारका ( बच्चेदानी ) ताडित हो जाती है और शब्द - सा करती है; वैसे ही अन्यायी राजा जब प्रजामें गमन करता है और उसे ताडन करता है; तब प्रजाकी धारिका - व्यवस्था ताड़ित हो जाती है, और प्रजाकी चिल्लाहट का शब्द निकलता है । यहां पर अश्वमेधयज्ञका प्रकरण है; जो राजाको करना पड़ता है; तो कर्मके व्याज से राजाको परोक्ष - वृत्तिसे उपदेश भी किया जाता है । जैसे हमसे पूर्वोद्धृत शतपथके वाक्यसे पस - भगं आदिके व्याजसे अग्निहोत्रकी विधि उपदिष्ट कर दी गई है; वैसे

पृष्ठ 822

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) ही उपहासके मन्त्रोंमें भी समझ लेना चाहिये । छान्दोग्य में पञ्चम आहुति में ' योषा वाव गौतम! अग्निः, तस्या उपस्थ एव समित, योनिरर्चिः, अभिनिन्दा विस्फुलिङ्गाः । तस्मिन् एतस्मिन् अग्नौ रेतो जुह्वति ' ( ५८ | १-२ ) इस उल्लेख से क्या तथाकथित अश्लीलता मान ली जावेगी? ( १३ ) यह भी याद रख लेना चाहिये कि - वेदमें एक मन्त्र के भी विविध भाव हो जाते हैं । यदि कहीं तथाकथित अश्लीलता है; तो इसमें वेदकी निन्दा नहीं । वेदकी सर्वाङ्गीणताका यह चिह्न है । क्या एक समय दम्पतिको भी वेद के अनुसार तथाकथित - अश्लीलता नहीं करनी पड़ती? यदि न की जावे; तो सृष्टिका ही प्रलय हो जावे? और शङ्काकर्ता वादी ही उत्पन्न न हो सके । उस अश्लीलता का परिणाम उत्तम रहता है, वंश चल निकलता है; तब श्रीमहीधर-प्रोक्त स्वारसिक - अर्थकेलिए हो - हल्ला क्यों मचाया जाता है? कामशास्त्रकी भी तो गृहस्थीकेलिए आवश्यकता पड़ती है; उसका मूल भी तो वेदसे ही निकालना पड़ेगा । श्रीमनोहर विद्यालङ्कार - महाशयका जो गुरुकुल के स्नातक प्रतीत होते हैं, ' वैदिक धर्म ' पत्र ( ३०।५ पृ ० २०१ ) में ' महीधरभाष्य भी उपादेय है ' इस शीर्षकसे एक लेख निकला था । उसमें वे लिखते हैं - उस ( वेद ) के एक - एक शब्दके नाना अर्थ हो सकते हैं, इस प्रकार इन २० हजार मन्त्रों में अनन्त ज्ञान मिल सकते हैं; क्योंकि - वेद में सम्पूर्ण ज्ञान है । इसलिए बहुत सी ऐसी बातें भी वेदमें दिखाई देंगी, जो आदर्श दृष्टिसे हमें अनुचित मालूम पढ़ें इनके द्वारा वेदकी पूर्णता ही समझनी चाहिये ' ।

पृष्ठ 823

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श्रीमहीधरका अर्थ आगे विद्यालङ्कारजी लिखते हैं- ' यजुर्वेद के २३ वें अध्यायका भाष्य करते हुए भाष्यकार - महीधरने जो अर्थ किये हैं, वे विचार-रणीय हैं । कामशास्त्रका बहुत ही अच्छा ज्ञान देते हैं, जो वेदको शैलीके अनुरूप हैं । इस प्रकार के ज्ञानकी वेद में अनावश्यकता है-यह कहकर पिण्ड नहीं छुड़ाया जा सकता ।... • एक समय था जब महीधरके भाष्य को भी अश्लील कहकर त्याज्य ठहराया गया था; किन्तु आज कामशास्त्र ज्ञानकेलिए उसकी वैज्ञानिकताको परखना चाव-श्यक है ।.. ' महीधरका भाष्य भी युक्तियुक्त है, और वह भी एक विज्ञान ( कामशास्त्र ) पर प्रकाश डालता है ' । इससे स्पष्ट है कि — इसमें महीधरको बदनाम करना अपने-आपको अल्पश्रुत बनाना है । वेदमें पुरुषके अङ्गकेलिये ' अश्व'का सा वर्णन बहुत आया है; एक - दो मन्त्र इस विषयके दिये जा चुके हैं । एक मन्त्र अन्य देखिये- ' अश्वस्य अश्वतरस्य अजस्य पेत्वस्य च । अथ ऋषभस्य ये वाजाः ( वीर्याणि ) तान् अस्मिन् [ पुरुषे ] घेहि तनूवशिन्! ' ( ० ४ ४ ८ ) ' मृतभ्रजे ओषधिं शेपहर्षणीम् ' ( ४ | ४ | १ ) इस प्रकारके बहुत से मन्त्र हैं; जिनसे वाजीकरण - ष-धियोंका ज्ञान होजाता है; कौन कह सकता है कि अश्वमेध - यज्ञमें भी उक्त - कर्मोंके व्याजसे कोई राजाकेलिए वाजीकरणका रहस्य नहीं भरा है? यह रहस्य अश्लीलता कहकर उससे आँख मूँद लेनेसे, और अर्थ सर्वथा बदल देनेसे नहीं मिलते; यहाँ तो मूलमें ही घुसकर देखनेसे आगे पता चलता है । फलतः श्रीमहीधरको बदनाम करना अपनी ही कलुषित मनोवृत्तिको परिचायित करना

पृष्ठ 824

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हे ६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) है, श्रीमहीधरने कहीं भी महिषीका अश्वसे समागम नहीं बताया; स्वा ० द ० जीने बलात् उसे ठोंसा है; अतः जनताको स्वामीजी की बातों पर न आकर स्वयं भी कुछ देखभाल करनी चाहिये । ( १४ ) स्वा ० दयानन्दजीने ' मेढ्र ' ते शुन्धामि, पायुं ते शुन्धामि ' ( यजुः ६।१४ ) इस मंन्त्रका अश्वमेध यज्ञसे अपने बचाव के लिए पृ ०५०० में यह अर्थ किया है कि - ' हे शिष्य! मैं तेरे लिङ्गको पवित्र करता हूँ, तेरे ‘ · ‘ गुदेन्द्रियको पवित्र करता हूँ ' क्या यह अर्थ कुमार वा कुमारियों को पढ़ाया जाता है?? यह अर्थ कितना उपहासयोग्य बन गया है? कहते हैं कि इस अश्लीलताका एक गुरुकुल में काण्ड भी बन गया था । आर्यसमाजी लोग इस अर्थकी हिमायतकेलिए बड़ी - बड़ी बातें कहते हैं; पर गुदेन्द्रियकी शुद्धि वे ठीक नहीं बता सकते । यह अर्थको तोड़ - मरोड़ करनेका परिणाम होता है । तो फिर महीधरका ही अपवाद क्यों किया जाता है? उवटने भी वैसे अर्थ किये; श्री-सायणाचार्यने भी । कल्पने भी वैसे अर्थ किये, शतपथब्राह्मणने भो । जहाँ कुमारीको उपहास वचन कहा जा रहा है; वहाँ कुमारी भी उसका उत्तर उपहास में दे रही है; इस प्रकार वावाता आदिके उत्तर- प्रत्युत्तर उपहासके हैं; शतपथब्राह्मणने भी वहाँ वैसा ही लिखा है । शतपथब्राह्मणको अपने भाष्यकी कसौटी मानते हुए भी ' स्वामीजीने क्या शतपथानुकूल अर्थ इन मन्त्रोंका लिखा है कि- जो कुमारी यदि उत्तर- प्रत्युत्तरमें घट जावें? किसीका तोड़ - मरोड़ करके अर्थ करनेमें कठिनाई नहीं होती; कठिनाई यह होती है कि – स्वारसिक-प्राकरणिक अर्थ किया जाए, और उसकी सङ्गति बैठाई जाय । पर

पृष्ठ 825

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श्रीमहीधरका ७३७ वैसा स्वयं सामर्थ्य न होनेसे दूसरेका अपवाद कर देना, दूसरेको वाममार्गी तक कह देना बहुत बुरी बात है । फलतः ' परोक्षवादा ऋषयः परोक्षं मम च प्रियम् ' ( श्रीमद्भागवत ११।२१।३५ ) इत्यादि - वचनोंके अनुसार कहीं गुप्त बात परोक्षतासे कही जाती है, वहां सर्वसाधारणको ज्ञान न हो सकने से आक्षेप्ताओं को वाममार्गिता वा अश्लीलता प्रतीत होती है । जैसे कोई कहे कि— ' करशनजीके लड़केने अर्वाचीन - जगत् में हलचल मचा दी ' । इस. वाक्यको परोक्षवृत्तिसे कहा जावे; तो ऐसे बनेगा - ' करशनजीके शिश्नके वीर्यने नव- शिक्षित जनताकी योनि में पड़कर खूब विप्लव मचा दिया । उसमें अनुरक्त एक विशेष जनताने उसे अपने उपस्थमें डाल लिया । इससे उसे गर्भ होगया, उससे बहुतसे तादृश - विचारवाले लड़के प्रसूत होगये ' । इस दूसरे वाक्यका परोक्ष पूर्वोक्त - अर्थं न समझकर उसके प्रत्यक्ष - शब्दोंका ही केवल अर्थ समझनेवाला अल्पश्रुत व्यक्ति इस वाक्यसे चिढ़ उठेगा । यही बात स्वामी वा उसके अर्धघट अनुयायियोंकी है, जिन्होंने गणपतिदेव के तेजके ध्याकर्षणकी बात न समझकर मृतक -अश्वसे महिषीका असम्भवी - समागमका अर्थ करके श्रीमहीधराचार्यको वाममार्गी लिख डाला । क्या वाममार्गी स्त्रियोंका मृतक अश्वसे सम्भोग कराया करते हैं? ( १५ ) जिस प्रकार स्वामीजीने भूलसे मृतक अश्वका समागम-अर्थ श्रीमहीधरके भाष्य में समझकर उसे ' वाममार्गी ' शब्दसे बदनाम किया; वैसे ही वाममार्ग के परोक्षवृत्तिसे कहे हुए योग-

पृष्ठ 826

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७६८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) विषयको न समझकर उसके प्रत्यक्ष- शब्दोंका अर्थ करके जनता में उसे भी कलङ्कित कर दिया । प्रकरणवश हम वाममार्गके विषय में भी उसके रहस्यका दिग्दर्शन करा देते हैं, जिससे सर्वसाधारणकी भ्रान्ति दूर हो जावे । ( क ) रुद्रयामल - तन्त्रका एक पद्य है- ' रजस्वला पुष्करं तीर्थ चाण्डाली तु स्वयं काशी । चर्मकारी प्रयागः स्याद् रजकी मथुरा मता । अयोध्या पुक्कसी प्रोक्ता ' यहाँ भी परोक्षवादके वर्णनको न. समझकर इस तन्त्र - वाक्यके लेखकको घृणित - शब्दों से स्मरण किया जाता है; और कहा जाता है कि- ' शास्त्रोंमें रजस्वला [ चाण्डाली, चर्मकारी, रजकी, पुक्कसी ] आदि स्त्रियोंके स्पर्शका निषेध है, उनको वाममार्गियोंने अतिपवित्र माना है । सुनो इनका. अण्ड-बण्ड श्लोक - ' रजस्वला पुष्करं तीर्थ, चाण्डाली तु स्वयं काशी ' इत्यादि । रजस्वलाके साथ समागम करनेसे जानो पुष्करका स्नान, चाण्डाली से समागम में काशीयात्रा, चमारीसे समागम से मानो प्रयाग स्नान, धोबी- स्त्री से समागम से मथुरा - यात्रा और कञ्जरीके साथ लीला करनेसे मानो अयोध्यातीर्थ कर आये ' । ( स ० प्र ० ११ समु ० वाममार्ग - आलोचनाप्र ० ) खेद है कि - संन्यासीजीको समागमके स्वप्न बहुत आया करते थे । श्रीमहीधरके भाष्यमें घोड़ेसे महिषीके समागमकी कोई गन्ध भी नहीं थी; पर स्वामीजीको बहुत जल्द आगई । इस प्रकार इस श्लोक में भी । यह निन्दा स्वामीकी आपात -दृष्टि के कारण लिखी गई, और वे परोक्षवाद समझ न सके । रजस्वला आदि यहाँ

पृष्ठ 827

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पारिभाषिक शब्द हैं कि - जहाँ रजस्वलाके गमनसे स्वर्गप्राप्ति बताई हो, वहाँ पुष्करतीर्थके गमनसे वैसा समझना चाहिए । जहाँ चाण्डाली-गमन लिखा हो; वहाँ काशीयात्रा समझनी चाहिए । इसी भांति.. चर्मकारीगमनसे प्रयागगमन, रजकीगमनसे मथुरागमन तथा पुक्कसीगमनसे अयोध्यागमन समझना चाहिये । पर यह न समझकर उसका उल्टा अर्थ लिख दिया गया । उन्हें गाली भी दे दी गई । वे नहीं जानते थे कि - ' इत्याचक्षते परोक्षेण, परोक्षप्रिया इव हि देवा. भवन्ति प्रत्यक्षविद्विषः ' ( गोपथब्रा ० १ । १ । १ ) । देवकल्प- शास्त्रकार परोक्ष - शब्दों से अपना विवक्षितार्थ सूचित करते थे । तभी तो स्वामीजीने इनके लिए स्वयं भी लिखा है - ' इसलिए ऐसे - ऐसे नाम धरे हैं कि — जिससे दूसरा न समझ सके ' ( स ० प्र ० पू ० १७८ ) यदि ऐसा है; तो उनपर उपालम्भ क्यों? कोई बड़े - से - बड़ा व्यभिचारी भी रजस्वला आदि गमन की प्रशंसाको कभी भी ग्रन्थ - बद्ध नहीं कर सकता । जब उक्त स्थलमें प्रशंसा की गई है, तो यह स्पष्ट है कि- इन परोक्षवादोंको समझा नहीं गया । वस्तुतः तन्त्रशास्त्रों में परोक्ष- शब्दोंसे योगविषय वर्णित किया गया है । उसकी परिभाषाओंका रहस्य न जाननेवाला वहाँ पर घृणित - वर्णन समझने लग जाया करता है । इस अवसरपर यथाश्रुत - अर्थ करनेपर ' मातुर्दिधिषुमन्त्रवं स्वसुर्जारः शृणोतु नः ( ऋ ० ६।५५।५ ) इस मन्त्रका भी अश्लील अर्थ प्रतीत होगा । अब देखिये — ‘ गोमांसं भक्षयेन्नित्यं पिबेदमरवारुणीम् ' । इस पद्यको देखकर साधारण आपाततोदर्शी - पुरुष भ्रम में पड़ जाते हैं कि-

पृष्ठ 828

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८०० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) यहां गोमांस भक्षण और मद्यपान आदिष्ट किया गया है; पर इसकी परिभाषा देखनेसे भ्रम दूर हो जाता है कि- ' गोशब्दे -नोदिता जिह्वा तत्प्रवेशो हि तालुनि । गोमांसभक्षणं प्रोक्तं महापातक-नाशनम् । जिह्वाप्रवेशसंजात- सुषुम्णाक्षोभसम्भवः । चन्द्रात् स्रवति यः सारः सैवेहामरवारुणी ' ( हठयोगप्रदीपिका ) । ( १६ ) इस प्रकार तान्त्रिक मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा, मैथुन आदि पञ्च मकारोंकी परिभाषाओंका ज्ञान जब तक ' नित्यतन्त्र, महा-निर्वाणतन्त्र, मेरुतन्त्र ' आदि ग्रन्थोंसे न किया जावे; तब तक आपात-दृष्टि रखनेवालेको बड़ा भ्रम सम्भव हो जाता है । यह न जानने से ही ( स ० प्र ० ११ समु ० पृ ० १७७ में ) कालीतन्त्र के पञ्च मकारों का उपहास उड़ाया गया है । पञ्च - मकारों को तो योगियोंको मुक्तिदायक बताया है — ' मद्यं मांसं च मीनं च मुद्रा मैथुनमेव च । मकारपंचकं प्राहुर्यो-गिनां मुक्तिदायकम् ' । स्वामीजीसे उद्धृत उत्तरार्ध में कहा है- ' एते पंच मकाराः स्युर्मोक्षदा हि युगे युगे ' । कोई व्यभिचारीसे व्यभिचारी भी प्रचलित मद्य - मांस मैथुन आदिको योगियोंके लिए मुक्तिदायक कभी भी नहीं कह सकता । जब कहा है; तो स्पष्ट है कि — इनमें रहस्य हैं । सो इनको परिभाषाओं को जाननेसे ही उनका मुक्तिसे सम्बन्ध सिद्ध होगा । अब देखिये वे परिभाषाएँ -१ मद्य - ' यदुक्तं परमं ब्रह्म निर्विकारं निरञ्जनम् । तस्मिन् प्रमदनं ज्ञानं तद् मद्य ं परिकीर्तितम् ' ( विजयतन्त्र ) यह ' मद्य'की परिभाषा है कि - निरञ्जन परब्रह्ममें मस्त हो जाना । इसी मद्यके लिए कहा गया है - ' पीत्वा - पीत्वा पुनः पीत्वा यावत् पतति भूतले ।

पृष्ठ 829

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श्रीमहीधरका ८०१ पुनरुत्थाय वै पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते ' ( महानिर्वाणतन्त्र ) । क्या यहाँ साधारण - मद्यके पानसे पुनर्जन्मका दूरीभाव कभी सम्भव हो सकता है? यह तान्त्रिकता सद्गुरु द्वारा ही जानी जा सकती है; और संयमी ही इसका अधिकारी हो सकता है । जो ऐसा नहीं करता; केवल ग्रन्थोंके शब्दोंके ही अर्थ अनुसृत करने बैठता है; वह कुमार्ग में प्राप्त होकर पथभ्रष्ट हो सकता है । २ मांस — ' मा - शब्दाद् रसना ज्ञेया तदंशान् रसनाप्रियान् । सदा यो भक्षयेन्नित्यं स भवेन्मांससाधकः ' ( आगमसार ) पुण्यापुण्यपशु हत्वा ज्ञानखड्गेन योगवित् । परे लयं नयेच्चित्तं मांसाशी स निगद्यते ' ( कुलार्णवतन्त्र ) यह मांसभक्षणकी परिभाषा है कि ज्ञानखड्गसे पुण्य - पापरूप पशुको मारकर परब्रह्म में चित्तको लगाना । ३ मत्स्य ( मीन ) - ' गङ्गा ( शरीरस्थित - इडानाडी ) - यमुनयो: ( पिङ्गलानाडी ) मध्ये मत्स्यौ द्वौ ( श्वासप्रश्वासौ चरतः सदा । तौ मत्स्यौ भक्षयेद्यस्तु ( प्राणायामे ) स भवेद् मत्स्यसाधकः ' ( आगम-सार ) यह मत्स्यभक्षणकी परिभाषा है कि- प्राणायाममें श्वासप्रश्वास को खाना ( रोकना ) । ‘ मनसा चेन्द्रिय - ग्रामं संयोज्यात्मनि योगवित् । मत्स्याशी स भवेद् देवि । शेषा धीवरवृत्तयः ' यह मेरुतन्त्रप्रोक्त मत्स्यकी परिभाषा है । ४ मुद्रा - ' सत्संगेन भवेन्मुक्तिरसत्संगेन बन्धनम् । असत्सङ्ग-मुद्रणं यत्तु सा मुद्रा परिकीर्तिता ' ( विजयतन्त्र ) आत्मनो जायते मोद-स्ता मुद्राः परिकीर्तिताः । ता ज्ञेया धारणा- ध्यानसमाध्यान्यास्तु मोक्षदाः ' ( मेरुतन्त्र ) यह मुद्राकी परिभाषा है कि - असत्सङ्गका ५१ स ० ध ०

पृष्ठ 830

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८०२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) मुद्रण करना और धारणा ध्यान आदि से आत्माकी मोक्षप्राप्ति । ५ मैथुन - ' कुलकुण्डलिनीशक्तिर्देहिनां देहधारिणी । तयोः शिवस्य संयोगो मैथुनं परिकीर्तितम् ' ( विजयतन्त्र ) ' सहस्रारोपरि बिन्दौ कुण्डल्या मैथुनं शिवे! । मैथुनं शयनं दिव्यं यतीनां परिकीर्ति -तम् ' ( योगिनीतन्त्र ) | ' सुषुम्णा शक्तिरुद्दिष्टा जीवोऽयं तु परः शिवः । तयोस्तु सङ्गमो देवाः! मैथुनं परिकीर्तितम् । वीर्यपातस्य समये सुषुम्णासन्नमारुते । उत्पद्यते तु यत् सौख्यं शतकोटिगुणं तु तत् । एतदेव रतं ( मैथुनं ) प्रोक्तम् अन्यद् स्याद् रासभं रतम् ' ( मेरुतन्त्र ) यह मैथुनकी परिभाषा है कि - सुषुम्णारूप - शक्ति और जीवरूप-शिवसे सम्मेलन । इससे सुषुम्णा के साथकी वायुका वेगप्रवाह ही सुखजनक - वीर्यपात हुआ करता है - यह बताया गया है । बालरण्डाबलात्कार — अब बालविधवासे बलात्कारकी परिभाषा देखिये – ' गङ्गायमुनयोर्मध्ये बालरण्डां तपस्विनीम् । बलात्कारेण गृह्णीयात् तद् विष्णोः परमं पदम् ' । परिभाषा यह है - ' इडा भागीरथी गङ्गा, पिङ्गला यमुना नदी । तयोर्मध्यगता रण्डा सुषुम्णैव सरस्वती ' ( हठयोग - प्रदीपिका ३३१ ) इडा, पिङ्गलाकी मध्यवर्तिनी सुषुम्णानाडीका ग्रहण ही बालरण्डा- वलात्कार है । ( १७ ) आक्षेप्ता- वैदिकम्मन्योंका यह प्रश्न होता है कि - ' यदि तन्त्रग्रन्थों में इस प्रकार उत्तम विषय है; तो उसे उद्वेजक - शब्दोंसे क्यों कहा जाता है? ' इसपर उत्तर पूर्व दिया गया है कि- ' इत्या-चक्षते परोक्षेण, परोक्षप्रिया इव हि देवा भवन्ति प्रत्यक्षविद्विषः ' ( गोपथ १।२।२१ ) ' परोक्षवादा ऋषयः ' ( श्रीमद्भागवत ११।२१।३५ ) ' परो-