श्रीगणेशाय नमः।

सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 871–880

सनातन धर्मालोक ५ · पृष्ठ 871–880

पृष्ठ 871

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शिवरात्रिका मूषक एक सम्प्रदायका स्थापक ८४३ ( ११ ) मालूम होता है कि — दयानन्दजी आशय यह था कि— महादेव मेरे सामने प्रत्यक्ष होकर — चूहेको दण्ड देते; तभी दयानन्दजी देवपूजन मानते; पर यह भी ठीक नहीं; क्योंकि— ईश्वरका दर्शन बड़े भाग्यसे मिलता है । बालक- दयानन्द ईश्वर-दर्शनका अधिकारी नहीं था; न उसका पूर्वजन्मका कोई ईश्वरदर्शनयोग्य . पुण्यातिशय अनुमित होता है, और न ही इस जन्मकी उसकी अक्षुण्ण भक्ति दीखती है । भक्ति थी प्रह्लादमें; जो कि असीम - विपत्तियों में डाला गया हुआ भी स्थिर रहा, विचलित नहीं हुआ । पर्वतसे गिरानेपर भी, अग्नि में जलाने एवं समुद्र में डुबानेपर भी उसकी भगवान् में श्रद्धा - भक्ति चुरण नहीं हुई । बालक प्रह्लादके मनमें नहीं आया कि — ' यदि परमात्मामें कोई शक्ति होती; तो अपने तथा अपने भक्तके अपमानका बदला लेता । कुछ न करने से वह असमर्थ है, या है ही नहीं । भक्त- बालकके पवित्र हृदय में ऐसे कुतर्क ये ही नहीं । बहुत आपत्तियोंके झेलनेपर भी, परमात्माके इतने अपमान में अप्रकटता देखकर भी उसकी श्रद्धा क्षुण्ण नहीं हुई, बल्कि बढ़ी ही । उसके धर्म एवं धैर्य स्थिर ही रहे । अन्तमें श्रीभगवान्ने उसे दर्शन दिये, अपराधी उसके पिताको दण्ड दिया । परन्तु दयानन्दजीको तो न पहाड़से गिराया गया, न ही समुद्र में गिराया गया, न आगमें ही जलाया गया । न पिता ही मारनेको तैयार हुआ । परन्तु इस भक्त (? ) का धैर्य एवं विश्वास ऐसा हलका रहा कि— जिसे एक साधारण - सा चुहा ले भागा, खेद! अत्यन्त खेद!! ( १२ ) बालक- दयानन्दने मूर्तिपूजा इसलिए छोड़ी कि - महादेव

पृष्ठ 872

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८४४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) उस चूहेको न हटा सके; परन्तु यह जान रखना चाहिये कि संसार में जहां आस्तिक रहते हैं, वहीं ईश्वरके न माननेवाले नास्तिक भी रहते हैं । नास्तिक तो भगवान्‌ के अस्तित्वका घोर खण्डन करते हैं, भगवानको गालियां निकालकर उसकी निन्दा भी करते हैं । इसप्रकार के नास्तिक भी कोई दो - चार नहीं; प्रत्युत बहुत - संख्या में है । रूसका तो सारा साम्राज्य ही नास्तिक है । कहते हैं— ' रूसने परमात्माकी मूर्ति बनाकर उसे फांसी भी दे दी थी । चूहेने तो भगवान्की मूर्त्तिपर केवल पांव ही रखा था, परन्तु नास्तिक तो निराकार भगवान्‌को संसारसे ही नष्ट करना चाहते हैं । यदि निराकार परमात्मा इनसे आत्मरक्षा नहीं कर सकता; तो क्या आप यही कहेंगे कि परमात्मामें कुछ शक्ति ही नहीं? . उसकी उपासना छोड़कर वहांसे भाग खड़े होंगे, और एक नास्तिक-सम्प्रदाय खड़ा कर देंगे? यदि आप कहें कि — भगवान् किसी समय में उन्हें दण्ड दे देंगे, तब प्रश्न है कि उन्हें उसी समय दण्ड क्यों नहीं दिया . जाता, जो उसका अपमान करनेवाले उसे उड़ाना ही चाहते हैं? यदि उनको दण्ड देनेकेलिए तिथि नियत की जा सकती है; तो क्या चूहा ही इतना बड़ा अपराधी था कि उसी समय उसे फांसी चढ़ा दिया जाता? यह भी सोचिये - सन् १ ९ १५ में आर्यसमाज के काङ्गड़ी गुरुकुल के उत्सबपर ला ० मुन्शीराम ( स्वामी श्रद्धानन्द ) जीके सुझाव से वेदोंकी चार पोथियोंको सभापति बनाया गया था; इसपर देखिये

पृष्ठ 873

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शिवरात्रिका मूषक एक सम्प्रदायका स्थापक ८४५ मेरठका · वेदप्रकाश - पत्र ( सन् १ ९ १६ वर्षका १२७ पृष्ठ ) । क्या. वे वेदपुस्तकें जनतापर कण्ट्रोल करती थीं? यदि ऐसा नहीं; तब उन्हें सभापति क्यों बनाया गया? यदि उन्हें मान देनेकेलिए ऐसा किया गया; तो यह मूर्त्तिपूजा सिद्ध हुई! यदि उस समय कोई मूर्ख - व्यक्ति सभापति बने हुए - वेदपर पांव रखकर कहता कि— ' आपका सभापति वेद- भगवान् मुझे तो कुछ दण्ड नहीं देरहा, अतः वह असत्य है; प्रतारणा है, इसका त्याग कर दो '; तब क्या आप भगवान् के ज्ञानके मूर्तरूप वेदपोथियोंको सभापति बनने में निर्बल समझकर उन पोथियोंको परे फेंक देंगे? वा उनका मानना बन्द कर देंगे?? नहीं, बल्कि आप उस वेदको पांवकी ठोकर मारनेवालेकी बुद्धिको शोचनीय समझ लेंगे? हो सकता है, उसे दो - चार थप्पड़ भी लगा दें । इस प्रकार मूषक द्वारा महादेवकी ' मूर्तिका अपमान देखकर उसकी पूजा छोड़नेवाले तथा उस मूषकको वहांसे न हटाकर स्वयं ही वहांसे हट आनेवाले बालकका यह बोधोत्सव नहीं; किन्तु महान अबोध ही है । शासक कितने बलवान् होते है, किसीने शासकोंके शिरोमणि गांधीजीको मार डाला; फिर भी उसे एकदम दण्ड नहीं मिला । मुकदमे में ही बहुत - सा समय लग गया । बहुत समयके बाद गोडसेको फांसी मिली । ईश्वर भी प्रत्येक शुभ कर्मका यथासमय और यथाधिकार ही दण्ड विधान करता है । इधर ईश्वर में न्याय-कारिता और दयालुता यह दोनों ही गुण बराबर होते हैं । और वह अन्तर्यामी भी होता है, और जानता है कि- इसने यह

पृष्ठ 874

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८४६ श्री सनातनधर्मालोक ( ५ ) अपराध ज्ञानसे किया है, वा अज्ञानसे । यदि चूहेने सचमुच ही महादेवका अपमान किया था, वह महान देव यथाधिकार तथा यथासमय उसे दण्ड देगा ही । बालक दयानन्द कौन था उस व्यवस्थामें हस्तक्षेप करनेवाला? अथवा आपका यह अभिप्राय हो कि - महादेवकी मूर्त्ति चूहे से अपनी रक्षा न कर सकी; अतः वह असमर्थ होने से पूजनीय नहीं, तो आप निराकार परमात्माको तो सर्वशक्तिमान् मानते ही हैं । हमारे सामने आप उसी निराकार ईश्वरको करोड़ों गालियां देकर अपमान करें; तब देखिये कि क्या वह आपको उसी समय दण्ड दे देगा? वहिरा तो है नहीं कि वह सुन नहीं सकता । आप भी तो मानते हैं कि - ' स शृणोत्यकर्ण: ' इस प्रकार आपके देखते ही देखते किसी नास्तिकने आपके ईश्वरको गाली देकर अपमानित कर दिया, तब उसी समय उसे दण्ड दिया जाता हुआ न देखकर उस सर्वशक्तिमान् निराकार परमेश्वरका मानना भी बन्द कर देंगे?? यदि नहीं; तो फिर काम-क्रोधादि, तथा रक्त - माँस, एवं मल - मूत्रादि - दोषरहित शुद्ध मूर्तिके ऊपर चूहेके चढ़नेसे, और मूर्ति द्वारा चूहेके न हटाने से यदि मूर्ति-पूजाको हटाते हैं; तो यह आपका बोध ही है । यदि निराकार-परमेश्वरको गालिप्रदानरूप पापका वा ईश्वरको उड़ानेरूप- पापका फल वा दण्ड होना आप कभी मानेंगे; तो वेदोक्त महादेवको मूर्तिके तिरस्कारकों को भी यथासमय दण्ड मिलेगा ही । अन्य यह भी ध्यान देनेकी बात है कि - सनातनधर्मियोंकी

पृष्ठ 875

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शिवरात्रिका मूषक एक सम्प्रदायका स्थापक ८४७. भांति आर्यसमाजी तथा उनके स्वामी भी ईश्वरको सर्वव्यापक मानते हैं । तब इन्हींसे सर्वव्यापक माना हुआ वह महान् देव मूर्ति में भी व्यापक है; तथा उस समय भी व्यापक था ही । तब उसी निराकार ने अपनी आश्रित मूर्तिपर चढ़ते हुए चूहेको – यदि प्रतिपक्षियोंके अनुसार यह उसका अपमान था - तो नष्ट क्यों नहीं किया; वा क्यों नहीं हटाया? यदि उनसे माना हुआ निराकार - ईश्वर भी अपने ऊपर चढ़ते हुए चूहे को न हटा सका; तब इसी प्रकारकी शङ्का करके मूर्तिपूजा से हटना क्या यह बालक दयारामका अबोध नहीं? यदि वे कहें कि — ईश्वर मूर्ति में व्यापक नहीं; तब उनका ईश्वरको सर्वव्यापक मानना ही क्या अबोध नहीं? यदि वे कहें कि— ईश्वर तो चूहे में भी व्याप्त था; तो फिर कहिये कि - फिर कौन किसको रोकता? तब भी वह शङ्का अबोध ही है । फिर भी यदि वे कहें कि — चूहा चेतन है, और मूर्ति जड़ । चेतन - चूहे में ईश्वर चेतनरूपमें व्यापक है; और जड़ मूर्तिमें व्यापक ईश्वर भी जड़ होने से चेतन मूषकको ऊपर चढ़ने से न हटा सका; अतः मूर्तिपूजा ठीक नहीं; तब तो उनका यह कथन भी इसलिए अबोधरूप है कि - फिर आप जड़मूर्ति में प्राण - प्रतिष्ठा एवम् आवा-हनादि से इस प्रकारकी शक्तिका उत्पन्न होना कैसे मानते हैं, जो चूहेको अपने ऊपर चढ़नेसे रोके । जिस ईश्वर को आप सच्चिदानन्द मानते हैं; उस ईश्वरकी व्यापकतासे तो जड़मूर्ति में चेतनता आवे नहीं, और आवाहन एवं प्राणप्रतिष्ठासे उस मूर्ति में चेतनता आती हुई न देखकर मूर्तिपूजन यदि आप निषिद्ध मानें तो यह भी तो

पृष्ठ 876

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८४८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) अबोध सिद्ध होगा । फलतः बालक दयानन्दका महादेवकी मूर्तिके ' अपमानसे महादेव - द्वारा चूहेको दण्डविधान न देखकर महादेवकी मूर्तिकी पूजा से श्रद्धा हटा लेना यह बोध सिद्ध न हुआ; किन्तु बालकपनका अबोध ही सिद्ध हुआ । इसपर बोधोत्सव मनाना भी अबोध - परम्परा बन जाती है । वस्तुतः तब नींद - भूख आदिसे हुई - हुई बालककी व्याकुलता अबोध ही थी । यदि यह बोध ही था; तो इसके बाद किये हुए दयानन्दजीके आचार श्रार्यसमाजियोंको मान्य होने चाहियें । दयानन्द - चरित ' श्रीमद्द्यानन्द प्रकाश ' ५३ पृष्ठमें लिखा है - ' उन दिनों स्वामीजी भालपर विभूति रमाया करते थे, गलेमें रुद्राक्षकी एक माला होती थी ' । ७४-७५ पृष्ठमें लिखा है - ' उस [ स्वा ० द ० की वैष्णवों पर प्राप्त की हुई ] विजयसे प्रभावित होकर लोग धड़ाधड़ शैव बनने लगे । कण्ठियोंका स्थान रुद्राक्ष की मालाएं लेने लगीं । महाराजा रामसिंहने भी शैव सम्प्रदायको स्वीकार कर लिया । इससे राजकीय हाथी और घोड़ोंके गलेमें भी रुद्राक्ष की मालाएँ पड़ गईं । स्वामीजीके हाथ से भी मालाएँ वितरण कराई गईं ' । इसी प्रकार स्वामीजीके अपने कहे हुए जीवनचरित्रके ४६ पृष्ठमें भी कहा है । ' दयानन्दप्रकाश ' के ८० पृष्ठमें लिखा है- ' पुष्करनिवासके दिनों में स्वामीजी वहांसे विभूति मंगाकर रमाया करते थे । उनके कठमें रुद्राक्षकी माला थी, उसके बीचोंबीच में एक - एक दाना श्वेत काँचका भी था ' । यदि १४ वर्षकी आयु में चूहे की घटनासे दयारामजीको बोध

पृष्ठ 877

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शिवरात्रिका मूषक एक सम्प्रदायका स्थापक ८४६ होगया होता; तो २७ सालके बाद ४१ वर्षकी आयु में जयपुर में स्वामी दयानन्दजी मूर्तिपूजामूलक इस शैव सम्प्रदायको कैसे स्वीकार करते; और कैसे प्रचारित करते? यदि मृर्तिपूजा - विरोधी होते, तो देवमन्दिरों में क्यों निवास करते?? क्या आर्यसमाजी रुद्राक्ष मालाको धारण करना ठीक मानते हैं? यदि नहीं; तब आर्यसमाजियोंके मतमें स्वा ० दयानन्दजीका यह भी अबोध सिद्ध हुआ । यदि यह बोध है; तो उसका आचरण क्यों नहीं करते? अथवा व्यंग्यसे वे अबोधको वोध कहते हों? नहीं तो वे स्वा ० द ० जीका गुरु आदिज्ञानदाता, शिवरात्रिके चूहेको कैसे बतावें? और आर्य-समाजका भी आदिगुरु चूहा सिद्ध कैसे करें? वस्तुतः यह सब अबोध ही है । जब आर्यसमाजका मुलस्तम्भ भी अबोध ही है तब उसमें बोध कैसे प्राप्त होगा? यदि इस शिवरात्रिके दिन स्वामीको बोध होगया होता; तो वे अपने जीवनमें निर्भ्रान्त रहते । एक मत मानकर फिर उसे बदलते नहीं । बल्कि हम तो कहते हैं कि- जितने समय वे जीये; उनका जो मत अब बन गया है, उसके बाद यदि वे जीते रहते; तब । उनका यह मत भी न रहता, किन्तु बदल जाता । तब उनको बोध क्या हुआ, निर्भ्रान्तता क्या रही? यह हम ही नहीं कहते; किन्तु आर्यसमाज के शिरोमणि भारतके मान्य राजनीतिक नेता डी.ए.वी. कालेज लाहौरके सचालक स्वर्गीय ला लाजपतराय भी मान गये. हैं । वे अपने ' दयानन्द - जीवनचरित्र ' में लिखते हैं-' इसके अतिरिक्त हमको भलीभांति विदित है कि- स्वा ० ५४ स ० ध ०

पृष्ठ 878

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) ८५० दयानन्द सरस्वतीने अपने जीवनमें कई वेर अपनी सम्मतियाँ पलटीं । एक समय था कि- वे शिवमतको प्रतिपादन करते थे और रुद्राक्ष - कण्ठीमाला धारण करते थे । फिर एक समय आया कि — उसका खण्डन करने लगे । एक समय था कि-- वे मोक्षकी अवधि नहीं मानते थे, और उनको निश्चय था कि - सुक्त हुई आत्मा फिर देह धारण नहीं कर सकती, फिर वह समय आया कि उन्होंने अपनी सम्मति बदल ली, आदि आदि । किसको विदित है कि- यदि वे जीवित रहते, तो अपने जीवनमें और क्या - क्या सम्मतियां पलटते? जितनी आयु बढ़ती थी, उतनी ही विद्या और ज्ञान उनका अधिक होता जाता था । ऐसी अवस्थामें कौन कह सकता है कि- स्वामीजी निर्भ्रान्त थे? जो महाशय उनको निर्भ्रान्त मानते हैं; बे कृपाकर उस समयको भी प्रकट करें, जब कि वे निर्भ्रान्त हुए ( पृ ० १४२ पं ० ६ ) इससे स्पष्ट होगया कि - शिवरात्रि के मूषकसे उन्हें बोध नहीं हुआ, किन्तु भ्रान्तता बढ़ी । यदि बोध होगया होता; तो वे निर्भ्रान्त होगये होते । पर वे कभी भी निर्भ्रान्त नहीं हुए; यह हम नहीं कहते, किन्तु दृढ आर्यसमाजी नेता कह चुके हैं; जिस पर पर्दा नहीं डाला जा सकता । उक्त पुस्तकके १४ पृष्ठकी १४ पंक्तिमें ला लाजपतरायने लिखा है कि- ' एक वेर एक बालकने आप ( स्वा ० द ० ) की व्याकरणमें गलती पकड़ी । आपने तत्काल उस भूलको स्वीकार किया ' । क्या यही बोधका लक्षण है १? ॥ आरम्भ में स्वामीने ' संस्कृत वाक्यप्रबोध '

पृष्ठ 879

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शिवरात्रिका मूषक एक सम्प्रदायका स्थापक ८११ । I र I त हीं में या ' छपाया था । उसमें श्रीअम्बिकादत्त - साहित्याचार्यने ' अबोध-निवारण ' में स्वामीजी की १०० अशुद्धियां निकालीं । स्वा ० दयानन्द उसका उत्तर नहीं दे सके । द्वितीय - संस्करण में स्वामीजीने ' अबोध-निवारण ' पुस्तकके अनुसार संशोधन कर लिया । आज भी ' ऋग्वेदादि - भाष्यभूमिका ' की संस्कृतमें व्याकरणको भूलें हैं; क्या यही होता है बोध? यदि शिवरात्रिके दिन स्वामीजीको बोध हो जाता; तो उन्होंने योगानन्दजीसे योग, कृष्णशास्त्रीसे वेद, विरजा-नन्दजीसे व्याकरण क्यों पढ़ा १ स्पष्ट है कि - उन्हें चूहेसे अवोध प्राप्त हुआ था, बोध नहीं । ( १३ ) ' उपदेशमञ्जरी ' के १५ वें व्याख्यानमें २३६ पृष्ठमें कहा - ' एक दिन पूना शहरमें अपने जीवनचरित्रको सुनाते हुए इस चूहेकी घटनाका वर्णन स्वामीने किया कि - ' मैंने पिताजीको जगाकर पूछा कि - महादेव इस चूहेको हटाते क्यों नहीं? तब पिताजीने उत्तर दिया कि — तेरी बुद्धि तो भ्रष्ट है, यह तो केवल देवमूर्ति है । तब मैंने निश्चय किया कि- मैं इस त्रिशूलधारी - शिवको जब प्रत्यक्ष देखूंगा, तभी पूजा करूँगा, नहीं तो नहीं । ' इस व्याख्यानसे बात स्पष्ट हो गई कि – स्वा ० दयानन्द, बिना-तपस्या, बिना ही भक्ति - ज्ञानके, बिना ही परिश्रम ईश्वरके दर्शन करना चाहते थे । पीछे उसकी भक्ति करना चाहते थे; पर ' पहले होवे सेवा, फिर मिले मेवा ' | पहले होता है यत्न, फिर मिलता है रत्न | पर स्वामी उल्टी - गङ्गा बहाना चाहते थे । अनन्य-भक्तिके बिना भला भगवान् के दर्शन कैसे होते? । चूहेका तो

पृष्ठ 880

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८५२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) केवल बहाना ही मिल गया । ( १४ ) सत्यार्थप्रकाशके ७ म समुल्लास ११३ पृष्ठमें स्वामीने लिखा है — ' सहोसि सहो मयि धेहि । ' ( यजु ० १६।६ ) इसका अर्थ उन्होंने वहाँ यह किया है- आप ' निन्दा, स्तुति और स्व-अपराधियोंका सहन करने वाले हैं ' । यह परमात्मा के लिए कहा गया है । जो पुरुष मनमें द्वेष रखकर किसीके साथ नीचतासे व्यवहार करता है; वह अपराधी कहा जाता है । जब इस प्रकार स्वामीने स्वीकार कर लिया कि — परमात्मा निन्दा तथा स्व - अपराधको सहन करता है; तब श्रीमहादेव, आपसे अपराधी कहे जाते हुए चूहेको क्यों दण्ड देते? संसारके अपराधियोंको तो ईश्वर सह जावे; परन्तु उस चूहेका अपराध क्या इतना बड़ा था कि - जिसे प्रभु न सहते; ‘ किमाश्चर्य-मतः परम् ' । वस्तुतः यह बहुत लचर कुतर्क है; इसका विद्वानोंकी दृष्टिमें कोई मूल्य नहीं । हाँ बालबुद्धि अवश्य है; पर आज के युवा एवं आर्यम्मन्य वृद्ध - महाशय इसी पर लट्टू हैं । ( १५ ) हम तो समझते हैं कि चूहा शिवरात्रि वाले दिन कुछ लेने आया था । जब सेठ, साहूकार वा राजा - महाराजाओंके घरों मैं उत्सव हुआ करते हैं; तब उनके नौकरोंको बड़ी खुशी होती है, क्योंकि उत्सवों में नौकरोंको इनाम दिया जाता है । नौकर तो प्रेमका झगड़ा करके भी मालिकसे ले लेते हैं; यहां तक कि -जब वे देखते हैं कि स्वामी आज बहुत प्रसन्न है; तो उसके कन्धे से रेशमी - दुपट्टा तक उतार लिया करते हैं । उदारचित्त - स्वामी भी प्रसन्न हो जाते हैं और जानते हैं कि आज इनका दिन है ।