सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 891–900

सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 891–900

पृष्ठ 891

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होली विज्ञानकी कसौटीपर ८६३ गिराया, हाथीके पैरों तले दबवाया, तलवारसे उसकी गर्दन काटने का प्रयत्न किया; परन्तु वह हिरण्यकशिपु उसमें सफल न हुआ । अन्तिम उपाय उस दानवने उसके नाशका यह सोचा कि प्रह्लादको अग्निमें जलाया जाय । हिरण्यकशिपु की बहिन थी ' होलिका ' । उसे ब्रह्माका वर था कि वह अग्निमें भी नज थी । हिरण्यकशिपुने उसे प्रह्लादको गोदमें लेकर अग्निमें प्रवेश करनेकी आज्ञा दी, जिससे प्रह्लाद जल जाय । परन्तु — ' श्रीकृष्णस्य कृपालवो यदि भवेत् कः कं निहन्तु ं क्षमः ' वहांपर उल्टा ही हुआ । होली तो अग्निमें जल गई, पर वह परमात्माका भक्त प्रह्लाद बच गया । इस उल्लासको प्रकट करनेकेलिए लोगोंने उसकी भस्मको इधर - उधर विकीर्ण करके आमोद - प्रमोद किया और होलीको गालियां दीं । उस अभिनयकेलिए अब भी होलीमें जलती हुई अग्निसे प्रह्लादके प्रतिनिधि वृक्ष - खण्डको निकाल कर उसे जलाशय में ठंडा करते हैं । उस समयकी भस्मको इधर - उधर फेंकते हैं । यह होलिकोत्सव उसकी स्मृति रूपमें भी है । इस प्रकार होलीके स्वरूपमें दीख रहे हुए इस वैषम्यको कल्पभेदसे समाहित करना चाहिये । होली में अन्त्यजोंके स्पर्शका रहस्य ( ६ ) इस उत्सव में यह महत्त्वको बात है कि छोटेसे - छोटा बच्चा भी बूढ़ेसे बूढ़े पुरुषपर भी रंग डालता है । इस उत्सवमें छोटे बड़े, धनी - निर्धन, ऊंच - नीच सारे वर्षके भेद - भाव वा शत्रुता को हटाकर एकता उत्पन्न करते हैं । प्रधानतासे शूद्रोंका उत्सव

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८६४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) माने जाते हुए भी इसमें ब्राह्मण आदि सारे वर्ण एक दूसरे के साथ मिलते हैं । प्रत्युत इसमें श्वपचस्पर्श भी किया जाता है । जैसे कि ' हेमाद्रि ' ' निर्णय सिंधु ' ( ६-३४५ ) तथा ' भविष्य पुराण में भी है । “ चैत्रे मसि महाबाहो! पुण्ये तु [ कृष्ण ० ] प्रतिपद्द्ने । यस्तन्न श्वपचं स्पृष्ट्वा स्नानं कुर्यान्नरोत्तमः । न तस्य दुरितं किञ्चिद् नाधयो व्याधयों नृप! कृत्वा चावश्यकार्याणि संतर्प्य पितृ - देवताः । वन्दयेद् होलिकाग्नि सर्वदुःखोपशान्तये । ” यहां पर श्वपचस्पर्शका रहस्य यह है कि अपना पाप, रोग, दुःख आदि निकृष्ट अंश उस श्वपचको दिया जाय, उससे उसके पहले से ही वैसे होनेसे उसकी अपूर्व हानि नहीं होती । विषके कृमिको विष खिलानेसे उसकी पूर्व हानि नहीं होती; पर उससे हमारा लाभ हो जाता है । हममें रहनेवाले तत्सदृश कीटाणु -अपनी सजातीयतावश श्वपच - शरीर में शीघ्र प्रवेश कर जाते हैं । उसकी इससे हानि नहीं होती और हमारी सम्भावित हानि हट जाती है । फिर श्वपचस्पर्श - जन्य दोषके दूरीभावार्थं स्वयं स्नान कर लेना चाहिये । यह इस प्रकारकी चिकित्सा है कि जैसे श्वास पी जानेवाले सर्पविशेषके विष - दूरीकरणार्थ आकके पत्ते खा लेने पड़ते हैं; इससे उक्त सर्पका विष दूर होकर आकका विष उस पुरुषको चढ़ जाता है । फिर आकके विषके दूरीकरणार्थ तो बहुत सी ओषधियां प्राप्त हो जाती हैं । इसी लक्ष्यसे कि हमारे दिये हुए निकृष्टांशसे शूद्रको कुछ भी

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होली विज्ञानकी कसौटीपर ८६२ हानि नहीं होती - वेदमें अपने रोगका शूद्रा में जाना मांगा गया है । जैसे कि - ' तक्मन्! ( रोग! ) ' दासीं ' निष्टक्वरीमिच्छ ' ( अथर्व-वेद ( शौ ० ) सं ० ५'११।६ ) यहां ' दासी'का अर्थ ' शूद्रा ' है । इसी कारण अग्रिम - मन्त्रमें कहा है- ' शुद्रामिच्छ प्रफर्यं ' ( ५।२२।७ ) यहां पर ' शुद्रा ' शब्द त्रैवर्णिकेतरपरक हैं । ' भविष्य पुराण'ने इसी वेदाशयको प्रकट किया है । यह आशय है भी ठीक ही । हम द्विज लोग सदा पवित्र-वायुमण्डलके रहनेके अभ्यासी होनेसे साधारण अपवित्र - वायु-मण्डलके निवासी कीटाणुओंसे दृष्ट होकर रोगी हो जाते हैं । गन्दी - नालियोंके कीटाणु हमारे स्वास्थ्यको बिगाड़ देते हैं । पक-रहे हुए मांसकी दुर्गन्ध हमारे मस्तिष्क में चक्कर ला देती है; परन्तु अन्त्यजोंका तो नालीके पानीमें हर समय ही हाथ रहता है । बल्कि वे नालीके कूपमें घुसकर उसके कीचड़को निकाल रहे होते हैं ।. टट्टीको साफ कर रहे होते हैं, टट्टीके पात्रको उठा रहे होते हैं । इससे उनका अस्वास्थ्य नहीं हो जाता । इसलिए वे उनसे प्रबल - कीटाणुओंसे दृष्ट होकर ही बीमार होते हैं, साधारण-कीटाणुओं से नहीं । परन्तु हम लोगोंके रोग - कीटाणु वैसे प्रबल नहीं हुआ करते । इसलिए श्वपचके स्पर्शसे हमारे वे रोग वा पापके कीटाणु अपने सजातीय- कीटाणुओं को पाकर उसमें प्रविष्ट हो जाते हैं । इससे उनकी कोई नई हानि नहीं होती । पर हमें उसके स्पर्शसे सम्भावित दोषोंका कीटाणुओं के निरासार्थ स्नान करना पड़ता है । इसलिए ५५ स ० ध ०

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८६६ श्री सनातनधर्मालोक ( ५ ) हमारे देशके पुरुषोंमें प्रसिद्ध है कि - जिसे वारेका ( एक दिन छोड़कर आनेवाला ) बुखार हो, वह यदि भंगीसे आलिंगन कर ले, तब उसका वह ज्वर नष्ट हो जाता है । फलत: होली के श्वपच स्पर्श में भी यही रहस्य है । इससे पुरुष एक वर्ष स्वस्थ रहता है, ऐसा माना गया है । इसमें न तो सनातनधर्मका कोई सद्भाव है, न ही श्वपच - स्पर्शसे आजके सुधारकोंकी कोई अछूतोद्धार सम्बन्धी पक्षकी सिद्धि है; क्योंकि श्वपचके स्पर्शके बाद फिर स्नान भी तो लिखा है - यह सनातनधर्मका ही पक्ष है, सुधारकोंका नहीं । अस्तु! इस होलोत्सव में सम्पूर्ण वर्ष के चिन्ता - शोक आदि दग्ध हो जाते हैं । ( ७ ) जो पाश्चात्य शिक्षा - दीक्षा दीक्षित अर्वाचीन लोग होलीके नामसे भी घृणा करते हैं, और इस उत्सवको असभ्यता एवं अश्लीलताकी पराकाष्ठा मानते हैं, वे महापुरुष अपने प्रभुके ' एप्रिल फूल ' इस उत्सवको क्यों भूल जाते हैं? ' फूल ' का अर्थ ही उस भाषा में ' मूर्ख ' है । जहांके पाश्चात्य अपने उस उत्सव में मूर्खता कर रहे हैं, वहां तो सुधारकगरण सभ्यता देखते हैं; पर अपने उत्सवमें उन्हें असभ्यता वा अश्लीलता दीखती है । अब उन्हीं पाश्चात्योंकी अनुन्मत्तता ( सावधानता ) ऽवस्थाकी सभ्यता भी देखें । वे लोग उत्सवविशेषों में ' वाल ' नृत्य करते हैं । इस प्रकारकी चिकनी भूमि उस समय बनवाते हैं; जहां नाचते हुए स्त्री - पुरुषोंके फिसलने तथा एक - दूसरे पर गिर पड़नेको आशङ्का रहती है । वहां सभ्य कहे जाते हुए वे पाश्चात्य पुरुष दूसरोंकी पत्नी के साथ स - मद् होकर एक - दूसरेका हाथ पकड़कर नाचते हैं । चिकनी भूमिकी

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होली विज्ञानकी कसौटीपर ८६७. कृपासे फिसलकर एक - दूसरे पर जा गिरते हैं । यह उनकी सभ्यता मानी जाती है । इस प्रकार किसी यान ( सवारी ) आदिसे उतारनेके समय दूसरोंकी स्त्रियोंका हाथ पकड़ा जाता है, जिसमें लिखित - पत्र दे देना कठिन नहीं होता, जिसमें कोई अपनी वाञ्छा भी लिख दी गई हो 1 । मित्रके साथ एकान्त में बैठकर बातचीत करती हुई अपनी पत्नीके कमरेकी खिड़की में झांकना भी वहां असभ्यता मानी जाती है । वहां पर पतिका चला जाना तो असभ्यताकी पराकाष्ठा मानी जाती है । गुप्त धात्री - भवनोंका खोलना भी वहां सभ्यता मानी जाती है । यह तो अर्वाचीनों के दृष्टिकोण में सभ्यता है, पर होली में वैसे व्यवहार न होने पर भी अपने भारतीयोंको वह असभ्यता दीखती है! यह पाश्चात्योंका भाग्य समझना चाहिये । ( ८ ) पाठक - महोदयोंको यह भी जान लेना चाहिये कि जैसे कोई वेहोशी की दवाई सुघानेसे बेहोश हो जाए, फिर प्रयत्न - विशेष से उसकी बेहोशी हटा दी जाय, और उसका वहांसे शीघ्र भगाना इष्ट हो; तो नसोंमें शिथिलता होने से वह वहांसे दौड़ना तो दूर रहा — शीघ्र उठ भी नहीं सकता । उस समय उसकी नसोंमें स्फूर्ति संचारार्थ उत्तेजनाकी आवश्यकता पड़ा करती है । तब उस समय यदि उसे कोई गालियां देनेको तैयार हो जाय; अथवा उस पर कोई रंग डाल दे तब वह झट उत्तेजित होकर धमनियों में शक्ति प्राप्त कर उसी क्षण मुकाबला करनेको तैयार हो जायगा । इसी प्रकार वसन्त ऋतुके आने पर कार्य - प्रतिबन्धक तन्द्रा-

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८६८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) आलस्य आदि विघ्न पुरुषके ऊपर आक्रमण कर देते हैं, तब पुरुषोंकी नस - नाड़ियों में शिथिलता निर्वलता आ जाती है । उससे पुरुषोंके संरक्षणार्थ हमारे पूर्वजोंने यह प्रणाली बनाई है कि लोग एक दूसरे पर रंग डालें । इस प्रकार दौड़ने, कूढ़ने, उछलने आदि से एक दूसरेकी नसों में स्फूर्ति उत्पन्न होगी । कई नाचेंगे, कई गायेंगे, दूसरे कूदेंगे, दौड़ेंगे, उपहास वा गाली देनेसे एक - दूसरे को उत्तेजित करेंगे, कई रंग डालनेसे बिगड़ कर उत्तेजित होंगे । ऐसा होने पर पुरुषोंके इस ऋतुके स्वाभाविक तन्द्रा - आलस्य आदि हट जावेंगे; और वे फुर्ती पाकर अपने - अपने कार्य में लग जाएंगे । इसमें सब देश - कालोंके परीक्षक हमारे पूर्वजोंकी किस प्रकार वैज्ञानिकता है? ( e ) इसके अतिरिक्त सर्दीका हटना और गर्मीका प्रवेश इस प्रकार वसन्त ऋतु गर्मी- सर्दीका सन्धिकाल है । इस सन्धिकालमें जलवायुके खराब होने की ऐसी आशङ्का रहती है कि वे जनताको ज्वर, हैजा, शीतला, मलेरिया, प्लेग आदि रोगोंके पाशमें फंसा लें । वहां उस प्रकारके दूषित - गैसकी दूरी हो जाय, उत्तेजनासे स्फूर्ति उत्पन्न हो जाय; दुर्बलता हट जाय; इस से हमारे पूर्वजोंने होलीकी मर्यादा रखी, इसमें उनका विज्ञान - ज्ञान स्पष्ट अनुभूत हो रहा है । इसमें यह भी विज्ञान है कि शीत - कालका संचित कफ वासन्तिक - ऊष्माको प्राप्त करके पिघलता है । इसके कीटाणु सारे शरीरमें फैलकर अनेक प्रकारके खांसी, दमा, जुकाम आदि रोगों

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होली विज्ञानकी कसौटीपर ८६ है को उत्पन्न करते हैं । यह ऋतु कफ आदि रोगोंकेलिए आयुर्वेद तथा लोकमें सुप्रसिद्ध है, विशेष करके बालकोंको विविध - रोग इसी ऋतु में होते हैं । घरों में भी शीतकाल में पूर्ण - ऊष्माके अप्रवेश से भांति - भांति के कीटाणु अपना स्थान बना लेते हैं; जो कई-प्रकारकी हानि पहुँचाने वाले होते हैं । जो क्रीड़ाएं वा क्रियायें होलियों में होती हैं; वे ही इनके लिए प्राकृतिक चिकित्सायें हैं । शरीरमें उत्साह लाना, कूदना, उछलना, अग्निको जलाकर उसके पास ठहरना, ऊंचे स्वरसे गाना, हंसी - मखौल आदि कार्य कफ - निवर्तक हैं । उस समयके अन्नमें गुड़ मिलाना कफके निवर्तनार्थ है- ' गुडेन वर्द्धितः श्लेष्मा सुखं वृद्धया निपात्यते । ' घरोंकी स्वच्छता, गोबरका लेप, अग्निकी ऊंची ज्वाला, यह विधियां कीटाणुओं की विनाशक हैं । इन वैज्ञानिक अनुष्ठानोंसे कफ़ - रोगों की निवृत्ति स्पष्ट है । हास्य - प्रधान गाना, यथेष्ट - भाषण होलीके अवसर पर इसी आधार से व्यवस्थापित किया है कि मनुष्य स्वभावसे यह सब ऊंचे स्वरसे करता है; तब उत्साहजनित उच्च स्वर कफको हटाकर फेफड़ेको शुद्ध करता है, इस प्रकार यहां प्राचीनोंका विज्ञान - ज्ञान स्पष्ट है । इस अवसरपर रंग डालने में वैज्ञानिक कारण यह है कि लाल - पीला आदि रंग ‘ कारबोलिक एसिडगैस ' आदि दूषित - गैसको नष्ट करके स्वास्थ्य - संचारमें समर्थ हुआ करते हैं 1 । वैज्ञानिकों ने अन्दर भी रंगोंकी सत्ता स्वीकार की है, किसी रंग - विशेषकी हमारे ज्वर - विशेषका हो जाना भी बताया है । उस रंगकी पूर्ति न्यूनतासे

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६७० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) कर देने पर उस रंगकी न्यूनता - मूलक ज्वर आदिकी शान्ति भी मानी है । सुगन्धित रसके फेंकनेसे दुर्गन्धित विषाक्त- परमाणु एवं कीटाणु नष्ट हो जाया करते हैं । यह वात पौरस्त्य एवं पाश्चात्य दोनों प्रकार के भिषक लोग मानते हैं । इस प्रकार होलीकी क्रियाएँ विज्ञान - मूलक हैं, असभ्यता मूलक नहीं । ( १० ) कई विद्वानोंका यह विचार है कि होलीके अवसर पर गाना, बजाना, नाचना, कूदना आदि अज्ञानमूलक नहीं । शरद्, हेमन्त, शिशिर ऋतुओं में सभी लोग नवीन बलवीर्यशाली बनते हैं । शक्ति - संचय हो जाने पर वासन्तिक वायुके प्रभावसे विलास कर रही हुई प्रकृतिकी छटा देखनेसे प्रेमरूपमें कामकी उत्पत्ति भी स्वाभाविक हुआ करती है । इस कारण प्राचीन समय में इस अवसरपर कामदेवकी पूजाका प्रचार भी था । इस कारण वसन्त ऋतुको भी ' कामदेवका सखा ' कहा जाता है । वृद्धोंमें भी इस अवसर पर स्फूर्ति हो जाया करती है । किसी भी प्रवृत्तिके रोकने से कई रोगोंकी उत्पत्ति हो जाया करती है । यह बात ' चरक संहिता ' के वेगनिग्रहण - हानिनिरूपणा-ध्यायमें स्पष्ट है । कोप - शोक आदिके वेगको रोकने से बहुत से लोग पागल या बीमार हो जाते हुए देखे गये हैं । चिन्तासे वे व्यक्ति मानसिक - रोगोंसे पीड़ित होकर क्रमसे बड़े - बड़े रोगोंको प्राप्त हो जाते हैं । शोक एवं हर्षके वेग रोकने से तो क्षण में ही ' हार्टफेल ' हो जाने की सम्भावना भी रहती है । इस प्रकार मूत्रपुरीष - वेगों को रोकनेपर भी रोग हो जाया करते हैं । इस तरह कामके

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होली विज्ञानकी कसौटीपर वेगको रोकनेपर भी रोगके वेगकी आशंका सम्भव हुआ करती है । तब गाना, नाचना आदि - साधनों तथा यथेच्छ भाषण एवं. हास - उपहासोंसे उन दिनों उस वेगको चरितार्थ कर दिया जाता है; नहीं तो पथरी आदि रोगोंका उपद्रव, वीर्य हानि तथा क्लीवताके उदयका प्रसंग उपस्थित हो सकता है । तब वैसी वासन्तिक - वायुसे मस्त अपनी प्रमदाओं को वैसे पुरुष प्रसन्न कैसे कर सकते हैं? जो व्यक्ति सारा वर्ष गम्भीर - विचार में लगे रहते हैं; थोड़ा भी हास्य आदिमें प्रवृत्त नहीं होते, ' अति सर्वत्र वर्जयेत् ' ‘ नाति कुत्रापि शोभते ' इस न्यायसे उनके लाभार्थ सप्ताह में रविवारकी तरह वर्ष में यह होली स्थिर की गई है । इस कारण सभी इस अवसरमें राज - यक्ष्मा आदिके मूलभूत सतत परिश्रमकी प्रकृतिको छोड़कर नाचने - कूदने - आदिमें लगे हुए अपनी जीवन - यात्राको सुपरिणाम वाली बनाया करते हैं । इस प्रकार अलौकिक स्फूर्ति एवम् अदम्य उत्साहके उदय होने और नवीन - रक्तके संचारसे सम्पूर्ण वर्ष आनन्दसे बीत जाता है । गृहस्थ में शान्ति रहती है । ' सन्तानोंके मनोविनोद के साथ उनका स्वास्थ्य भी बढ़ता है । इसके अतिरिक्त सब हिन्दुओं का इन अवसरोंपर सम्मेलन तथा संगठन विधर्मियों तथा राष्ट्रके शत्रुओंके चित्तमें कंपकपी उपस्थित कर दिया करता है । जिससे इस भारतपर कुदृष्टि करनेमें उनका उत्साह शेष नहीं रहता । इस प्रकार शास्त्रीय - मर्यादाओंका प्रसारक, सुस्वास्थ्यका उत्पादक, देशरक्षाका सम्पादक, मनोमालिन्य वा उदासीनताको

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-८७२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) दूर भगाने वाला, शत्रुओं के चित्तपर चोट करने वाला, धर्म, अर्थ, कामकी मर्यादा फैलाने वाला, दूरदर्शीजनों के मनमें विहरण करने वाला होलीका यह महोत्सव पूर्ण - वैज्ञानिक एवं रहस्यमय है । यह विचार करनेसे स्वयं स्पष्ट हो जाता है । अन्तमें हम यह कहे विना नहीं रह सकते कि इस हास - परिहास में भी ' नाति कुत्रापि शोभते ' इस न्यायसे इतनी ' अति ' नहीं कर देनी चाहिये, जिससे शिष्टताका उल्लंघन हो जाय; और धर्म - मर्यादा कहीं अतिक्रांत हो जाय । हाँ, जो पाश्चात्य - चमत्कृति से चौंधियाई हुई आँखों वाले आपको इस उत्सव में सहयोग नहीं देना चाहते, आप उनको उनकी दयापर छोड़ कर उनसे कोई भी छेड़ - छाड़ न करते हुए अपने मित्र मण्डल में ही शिष्टजनोचित मनोविनोद करें, यही सामयिक मर्यादा है, जिनका पालन सामयिक - कर्तव्य है । सूचना - गत पृष्ठों में कई प्रूफकी भूलें रह गई हैं; वे ठीक कर ली जावें । पृ ० ६६ ‘ इन्द्रकी मूर्ति ( ऋ ० ४ | २४ | १० ) । पृ ० २८८ श्रघस्तम्ब-आपस्तम्ब । पृ ० ३४७ तीर्थस्थान- तीर्थस्नान । पृ ० ३५६ मेघा आपः-मेध्या आपः । पृ ० ३६१ ' गायत्रेण त्वा ' ( ५१२ ) । पृ ० ५४४ पं ० ६ संकुचित - संधुक्षित | पृ ० ६०४ पं ० १२, १, ३८, ३४, ००० यहां १, ३८, २४, ००० पाठ है । पृ ० ६४२ सीतया सह सचमानः- सज्जीभवन् । सु - असा स्वसा - सुन्दरी । पृ ० ८१० में ' गणानां त्वा ' यह मन्त्र और उसके ५ प्रियपति, ६ निधिपति, ७ वसु यह नाम देख लें । पृ ० ८५६ ( श्र. सा. ) - ( अ. स. ) । पृ ० ८५६ श्रवमेधयज्ञ - अश्वमेधयज्ञ । इत्यादि ।