सनातन धर्मलोक ६ — पृष्ठ 101–110

सनातन धर्मलोक ६ · पृष्ठ 101–110

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) नवीन तर्कों पर विचार १७७ १७६ लकर ही चाहिये - यह भाव निकलता है | जैसे देवताओंके बाहुल्य होने पर म भी भक्त को अपने ही इष्टदेवमें निष्टा करनी पड़ती है, जैसे बहुत विचार मी वैद्योंमें बीमारको अपने ही वैद्यमें निष्टा करनी पड़ती है, वैसे क ही बाजसनेयी - शाखाके दर्श - पौर्णमास आदि यज्ञोंके सामिधेनी तायो यो ि मन्त्रों में ' होतारं विश्ववेदसम् ' इस शाकलसंहितावाली ऋचाका नत्र मन्त्र ही पढ़ना चाहिये - यह तात्पर्य है । इसलिए ' गृह्यासंग्रह'में ब अनुत्र मी कहा है – ' यः स्वशाखोक्कमुत्सृज्य परशाखोक्तमाचरेत् । अप्र-बा अर्थात् माणमृषिं कृत्वा सोन्धे तमसि मज्जति ' ( २२६३ ) ' ऊनो बाप्यतिरिक्तो स्थान वा यः स्वशाखोक्तमाचरेत् । तेन सन्तनुयाद् यज्ञं न कुर्यात् इससे पारतन्त्रिकम् ' ( २।६२ ) । एँ सब मह एक में निष्ठा रखने के लिए दूमरेकी निन्दा भी की जाती है, कोई सम्मन जसे कि विष्णु पुराण में शित्रकी; और शिव के पुराण में विष्णु-की । वहाँ निन्दा में अभिप्राय न होकर स्वेष्टदेव - निष्ठा में तात्पर्य भी होता है. वैसे अन्य शाखा - पाठ के निन्दनमें भी पूर्वोक्क ही तात्पर्य हैं । होता है । यदि ' मानुष ' शब्दके उल्लेख से शाखाएँ मनुष्य सम्बद्ध है कि- सर एवं त्यान्य हो जायें; तो ' यजुर्वेदस्तु मानुषा ' ( ४ | १२४ ) इस मनु-अन्य संहि कथनसे यजुर्वेद भी अप्रमाण हो जावे । यदि वादी शतपथोक्त ज्ञाना उ पाठ वालो ही ऋ.सं.को मूल वेद मार्ने; तद्भिन्नको ' मानुष ' मानें; ही संहि तो ‘ शतपथ ' ( ११ | ५ | १ | १० ) में ' इत्येतदुक्तप्रत्युक्तं पञ्चदशचं बद्द्द्वृचाः दतुं प्रवत् प्राहुः इस उर्वशी पुरूरवा के ऋग्वेदके सूक्तको १५ ऋचा वाला ही कहा गया है, उसीको मूल वेद मानना पड़ेगा; फिर वादिसम्मत निष्ठा का ( १०/६५ ) १८ ऋचा बाली उनकी ऋ. संहिता मूल - वेद न रहेगी । CC - 0. Ankur Joshi Colla Gujarat. वादीने यह भी नहीं बताया कि - ' होता यो विश्ववेदसः ' यह किस संहिताका पाठ है? शतपथ ' तस्मादेतद् ऋषिणा अभ्यनृक्तम ' कहकर मन्त्रभागको स्थान - स्थान पर उद्धृत करता है । वहां लिखा है-' तस्मादेतद् ऋषिणाऽभ्यनृक्तम्- ' मनसा संकल्पयति, तद्वातमभि-गच्छति । वातो देवेभ्य आचष्टे यथा पुरुष! ते मनः इति ' ( ३।४।२२७ ) तब वादीको बताना पड़ेगा कि यह वचन किस मूल वेदसंहिताका है? अथर्ववेदसंहिता ( १२ | ४ | ३१ ) में इसका पूर्वार्ध तो है, उत्तरार्ध उससे भिन्न है, सो ब्राह्मणवाला उत्तरार्ध जिसमें होगा; वही संहिता वादीके अनुसार मूल वेद होगी । श्रव यह वादिसम्मत अथर्वसं. वादी के अनुसार ही मानुष हो गई । श्रीयास्क भी ( नि.६३ ) अपनी ही ऋग्वेदसंहिताका पाठ मानते हैं; इस शाकल्यसंहिता के ' वाया ' इस भिन्न - पदवाले पाठको नहीं मानते, तब वादिसम्मत यह ऋग्वेदसंहिता भी शाकल्यसे ' वा य: ' इस प्रकार भिन्न पद की हुई मानुषी हो जाएगी; आर्यसमाजी-स्वा. विश्वेश्वरानन्दकी ऋग्वेद पदसूचीमें भी ' वायः ' कोई पद नहीं है, किन्तु ' वा ' ( देखो उसका पृ. ३५१ ) और ' य: ' ( पृ. ३२१ ) यह भिन्न पद हैं; तदनुसारिणी अथर्वशौ.संहिता ( २०६१ ) मी मानुषी हो जायगी । इस विषय में ' आलोक'का चतुर्थ - पुःप देखना चाहिये । फलतः ' मानुष ' स्वका धारोप अपनी शाखामें निष्ठार्थ होता है, अन्य वेदत्यार्थं नहीं । नहीं तो वादियों को अपनी यह चारों संहिताएं पूर्वोक्त- प्रकार से मानुपी समझकर छोड़ देनी पड़ेंगी । पर इसके लिए वे भी तैयार न होंगे । इसीलिए शतपथ में ' स होतुरिह स ० ध ० १२ An eGangotri Initiative

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१७८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) निलिम्पति’से शुरू करके ' देवाय इदं हविर्जुषन्ताम् ' ( १।४।८।१, १४-३७ ) इन २४ खण्डों में ' तैत्तिरीय ब्राह्मण ' ( ३।५।१३ ) में पढ़े हुए मन्त्रोंका आशीर्वादादि - कर्मों में विधान माना गया है । इससे स्पष्ट है कि सभी शाखा ( संहिता ) तथा ब्राह्मरण मिलकर ही वेद हैं । पहले कृष्णयजुर्वेदसंहिता थी, पीछे याज्ञवल्क्यने सूर्य से शुक्ल यजुर्वेद प्राप्त किया; तब कृष्णका व्याख्यान ही शुक्लसंहिता हो ' सकती है । वह भी दूसरों की दृष्टिमें वेद ही होगी । इसलिए यह पूर्णरूप से सिद्ध हो गया कि - ' मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् ' इस विषय में विशेष स्पष्टता सम्भवतः अग्रिम पुष्पमें होगी । अब आगे वेदके अधिकारियोंके विषयमें निरूपण किया जाता है । ( ६ ) वेदाधिकार - विचार ( वेदमाता... द्विजानाम् ) [ ' गुरुकुल पत्रिका ' ( ११५ पूर्णाङ ) के एक निबन्ध पर विचार ] -- वेदस्वरूपके निरूपण के बाद वेदके अधिकारियोंका निरूपण करना भी अनिवार्य है । तदनुसार यह प्रस्तुत निबन्ध है । ' स्तुता मया वरदा वेदमाता प्रचोदयन्तां पावमानी द्विजानाम् ' ( १६७१११ ) अथर्ववेद ( शौ. ) संहिताके इस मन्त्रसे वेदमें अधिकार द्विजों ( ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ) का तथा गायत्री में अधिकार ब्राह्मणोंका सिद्ध होता है; पर आजकलकी विचारधाराके पिछलगुआ, शूद्र-अन्त्यजोंको भी वेदका अधिकार दिलाना चाहते हुए, आजकल के अर्वाचीनतम विचारों में बह गये हुए, वेदादिशास्त्रों को भी अपने CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदाधिकार - विचार पीछे चलानेवाले कई विद्वान् इस मन्त्र में द्विजोंको वेदमाता अधिकार ' पीछे के विद्वानों द्वारा आविष्कृत ' मानते हुए, कहनेवाले अथर्ववेदको ही वे प्रकारान्तर से ' पीछे के विद्वानों द्वार प्रणीत ' सूचित करते हैं; क्योंकि उन्होंने अथर्ववेदकी शू सहानुभूति नहीं देखी । ' उत शूद्रे उताऽऽर्ये ' ( १६।६२।१ ) कहन जो कि अथर्ववेदने शूद्रको आर्य से भिन्न बताया है, जिसके श्री स्वा. दयानन्दजी आदि बहुतसे आधुनिक विद्वान् मी सहमत है । पदपाठ तथा अथर्व के अन्य मन्त्र भी साक्षी हैं ( यह अन्य पुष्पदे बताया जायगा ); वे आधुनिक विद्वान् उस अथर्ववेदसे इस प्रकार अपना बदला ले लिया करते हैं । ( १ ) वस्तुतः इसमें वेदकी भूल नहीं है, किन्तु उन अर्वाचीने की ही भूल है । वे एक मोटी - सी बात भी सोच नहीं सकते कि यदि अथर्ववेदको वेदमाताका सर्वसाधारणको अधिकारी बनान इष्ट था; तो उसने ' वेदमाता पावमानी द्विजानाम् ' का द्रविड- प्रारणायार का नाटक क्यों खेला? ' वेदमाता पावमानी जनानाम्, वा नराणाम् । यह सीधे शब्दों में क्यों नहीं कहा? वैसा न कहने और ' द्विजानाम् कहने से वेदके अधिकारी भी सीमित ( द्विज ) सिद्ध हो गये । और जिस ( ' यथेमां वाचं कल्याणी मावदानि जनेभ्यः ) मन्त्रका सहार एतदर्थं लिया जाता है, वहांपर ' जनेभ्यः ' ' आनेपर भी ' वेद वाल ' नहीं आया - इससे वेद आधुनिकोंके पक्ष के प्रतिपक्ष ही सिद्ध हुए । इसमें ' द्विज ' पर यह तर्क उठाना कि - " द्विज कौन है Gujarat. An eGangotri Initiative

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१८० श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) 1 इस प्रश्नका उत्तर कौन दे? वेदमावा शास्त्र? यदि कोई धर्म - शास्त्र उत्तर बेद्वानों हुए, है और वेदशास्त्र गौण; तब वेद द्वारा बन जाता है, उसकी स्वतःप्रमारणता की शो २१ वेद, शब्द हैं, शब्द सदा अर्थकी ) वेद स्वयं उत्तर दे, या कोई धर्मं-दे; तो धर्मशास्त्र मुख्य हो जाता अपने अर्थकेलिए परमुखप्रेक्षी मारी जाती है ” यह चिन्त्य है । अपेक्षा करेगा ही, इसीलिए तो सके कह उसकी व्याख्यार्थ मन्त्रभागका अपना व्याख्यानभाग - ब्राह्मणभाग अ सहमत तथा वेदोंके अङ्ग - उपाङ्ग आदि अनादि काल से चले आ रहे हैं, है जिनका वेदोंके साथ ही तपस्यामूलक समाधि द्वारा साक्षात्कृतधर्मा अन्य पुष्परे ऋषि - मुनियोंने साक्षात्कार करके उन्हें ग्रन्थबद्ध किया; जैसे कि इस प्रकार न्यायदर्शन के ४ | १ | ६२ सूत्र के माध्य में श्रीवात्स्यायनमुनिने संकेत दिया है - ' द्रष्टृ - प्रवक्तृसामान्याश्च अप्रामाण्यानुपपत्तिः । ( मन्त्र-चीन ब्राह्मण, पुराण - इतिहास तथा धर्मशास्त्रोंके द्रष्टा- प्रवक्ता समान ही सकते ह हैं ) । ये एव मन्त्र ब्राह्मणस्य ( वेदस्य ) द्रष्टारः- प्रवक्तारश्च; ते खलु री बनान इतिहास - पुराणस्य धर्मशास्त्रस्य च [ द्रष्टारः - प्रवक्तारश्च ] ' तब इसमें ड - प्राणायाम क्या वादी ' शब्द'को ' परतः प्रमाण ' मान लेंगे? वादी भी तो वानराणा ' द्विजानां ' का कुछ अर्थ करेंगे ही; तब क्या वेदकी स्वतः प्रमाणताको ' द्विजानाए वे आप ही न मार डालेंगे? क्योंकि वे भी ' द्विज ' का अर्थ ' वेदका ये । और किया ' तो बताते नहीं; किन्तु इसमें भट्टोजिदीक्षितको ले बैठते हैं । का सद्दसि' वेद बा बादियों का कहना है कि - ' आजकल के प्रायः सभी विद्वान् वेदका अर्थ मनुस्मृति खोलकर ही करते हैं; उसमें लिखा है— ही सिद्ध ' ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः, त्रयो वर्णा द्विजातयः ' । ऐसा कहनेवाले कौन है वादी यदि अन्य किसीको प्रमाण नहीं मानते; तो स्वा.द.जीको तो CC - 0. Ankur Joshi Collection वैदाधिकार - विचार ११ श्रद्धेय मानते ही हैं । उन स्वामी ने माना ही ' मनुस्मृति'को है, अन्य किसी स्मृतिको नहीं माना । वे मनुस्मृतिको सृष्टिकी श्रादिमें बना हुआ मानते हैं, देखिये स.प्र. ११ वें समुल्लासका श्रारम्भ, और भट्टोजि-दीक्षितको प्रमाण मानते हैं; पर वादी लोग सृष्ट्यादिजात मनुकी-जिसके लिए ' विसर्गादौ ( सृष्ट्यादौ ) मनुः स्वायम्भुवोऽत्रवीत् ' ( निरुक्त ३ | ४ | २ ) श्रीयास्कमुनि मी सहमत हैं- बात इस विषय में न मानकर १७ वीं शताब्दीके अर्वाचीनतम भट्टोजिदीक्षित की ' वंशो द्विधा - विद्यया जन्मना च ' इस पीछेके विद्वान‌की उक्तिसे वेदका अर्थ करते हैं; तो क्या दीक्षितजी सृष्ट्यादिजात हैं कि-उनकी बात मान्य, और मनुजी २० वीं सदीके हैं, अतः उनकी बात अमान्य है, यही क्या वादियोंका अभिमत है? क्या वादियों के हृदयमें यह बात जमती प्रतीत नहीं होती है कि - ' यः कश्चित् कस्यचिद् धर्मो मनुना परिकीर्तितः । स सर्वोमिहितो वेदे. सर्वज्ञानमयो हि सः ' ( मनु ० २ | ७ ) ' मनुर्वे यत् किञ्चिदवदत् तद् भेषजम् ' ( ताण्ड्य-त्रा ० ) ' वेदार्थोपनिबद्धत्वात् प्राधान्यं हि मनोः स्मृतम् ' । मन्वर्थविप-रीता या स्मृतिः सा न प्रशस्यते ' ( बृहस्पति ० ) इस प्रकार साक्षा-त्कृतवेदधर्मा मनु तो होजाएँ प्रमाण, और आजकल के नवशिक्षित हो जाएँ प्रमाण! यदि हम श्रीमट्टोजिदीक्षितके धर्मशास्त्रसम्बन्धी पुस्तक ' चतुर्विंशतिमतसंग्रह ' के वचन से ' ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ही द्विज हैं और वे ही वेदके अधिकारी हैं- ' यह सिद्ध करदें; तब फिर उसी श्रीदीक्षितको वादी ' पीछेका भ्रान्त पण्डित ' कहकर उससे पीछा छुड़ा लेंगे । इससे प्रमाणता- अप्रमा-Gujarat. An eGangotri Initiative

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१८२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) गता तो केवल वादियोंकी अपनी वाणी वा इच्छा पर निर्भर है; उनसे प्रतिकूल वेद भी अप्रमाण; और उनके अनुकूल एक साधारण व्यक्ति भी प्रमाण! श्रीदीक्षित तो वंश ( कुल ) के दो भेद बताते हैं कि - ' विद्यया जन्मना च ' । यहाँ उन्होंने वर्णके दो भेद नहीं बताये । इसका श्रीदीक्षितका बताया हुआ - ' एकविंशतिभार-द्वाजम् ' उदाहरण ही हमारी बातको सिद्ध करता है । क्या ' भारद्वाज ' किसी वर्णका नाम है? कुल और वर्ण भिन्न - भिन्न होते हैं । वादी ' द्वाभ्यां जायते द्विज: ' यह कहकर ' द्विज ' की यौगिकता बताते हैं । तब क्या मनुजी ' द्विज'का यह अर्थ नहीं बताते? श्रीयास्क केवल वैदिक शब्दों के लिए तो यौगिकता बताते नहीं; वे तो ' सर्वाणि नामानि आख्यातजानि ' कहते हैं; ' वैदिकानि नामानि श्राख्यातजानि ' नहीं कहते । सो वादी लोग पुरुषको ' द्विज ' कब कहेंगे? आचार्यकुलसे निकलनेके बाद, या आचार्यकुल में प्रवेश करनेके दिन? यदि आचार्यकुलसे निकलनेके बाद; तो श्राचार्य-कुल पढ़ने तक वह पुरुष द्विज न होनेसे वादीके अनुसार भी ' वेदमाता में अधिकृत ' न रहा । यह वादीने सर्वसाधारण ब्रह्मचर्याश्रमवालों के लिए वेदका दर्वाजा बन्द कर दिया, या खोल दिया, यह तो वे ही. जानें! बनावटमें झोल पड़ता ही है । वादीने वेदका अधिकार २५ वर्ष शिक्षित होने के बाद बताया । ( २ ) वादी गृह्यसूत्रों को तो मानते ही होंगे, जिनसे वे संस्कार कराते होंगे । यह भी वे जानते होंगे कि वेद पढ़नेका अधिकारी वह है, जिसका यज्ञोपवीत हो । यज्ञोपवीत केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यका CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदाधिकार - विचार 151 ही होता है, शूद्रका किसी भी संस्कारविधि वा गृ.सू. में यज्ञोपवीत लिखा । वादी इसमें अपने श्रद्धय स्वा. द. की संस्कारविधि भी देख सक हैं । अथबा जिससे संस्कार कराते हैं, उस पार गृ.सू.को देख लें । जब शूद्रका अनधिकारवश वेदपट्ट - यज्ञोपवीत ही नहीं होगा; तब आचार्यकुल में प्रवेशका अधिकारी ही कैसे होगा; क्योंकि - श्राचा कुल में यज्ञोपवीतका अधिकारी प्रवेश नहीं पा सकता, तब उसन वेदारम्भ ही कैसे होगा? वादीके मान्य स्वा.द.जीने स. प्र. में लिखा है- ' वें वर्ष आरम्भ में द्विज अपने सन्तानोंका उपनयन करके प्राचार्यकुल में ' " भेत्र और शूद्रादि - वर्णं उपनयन किये बिना विद्याभ्यास के लिए गुरुकुलों भेज दें । ( २ समु ० पृ. १५ ) इससे दो बातें सिद्ध होती हैं । ए यह कि शूद्र द्विज नहीं, दूसरा - शूद्र आचार्यकुल में नहीं ह सकता । आचार्यकुल में उपवीती वा उपवीतका अधिकारी ही ह सकता है । यह भेद आचार्यके ( देखो मनुस्मृति - ' उपनीय तु व शिष्यं तमाचार्यं प्रचक्षते ' ( २।१४० ) तथा गुरुके लक्षण के भे होने से ( देखो मनु ० २।१४२ ) किया गया है । आचार्य ही उपनगर करके वेद पढ़ाता है, गुरु नहीं । गुरु साधारण विद्या देता है । इसीलिए मनुस्मृति में ' श्राचार्यं स्वमुपाध्यायं पितरं मातरं गुरु ( ५/६१ ) इस पद्यमें आचार्यं और गुरुको पृथक् - पृथक् कहा गया है । द्विजत्व यज्ञोपवीतसे ही होता है- ' मातुरग्रेऽधिजननं द्वित मौलिबन्धने ' ( मनु ० २।१६६ ) । यह बात सर्वसम्मत है । ' नामि व्याहारयेद् ब्रह्म ' ' ' ' ' ' शूद्र ेण हि समस्तावद् यावद् वेदे न जायते । Gujarat. An eGangotri Initiative

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958 श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) चोपवीत ( २।१७२ ) कृतोपनयनस्यास्य व्रतादेशनमिष्यते । ब्रह्मणो ग्रहणं चैव श्रीदेख क्रमेण विधिपूर्वकम् ' ( २।१७३ ) यह मनु - पद्य भी सर्वसम्मत है । जब को देख लें । बेद - ग्रहणसे पहले, पुरुष शूद्रके समान माना गया है, और उपबीती-शाः को ही वेदमें अधिकार दिया गया है, द्वितीय जन्म ( द्विजत्व ) तच क- आचार्य यज्ञोपवीतसे हो कहा गया है; तब इससे साक्षात् शुद्रका द्विजत्व - तब उस तथा वेदाध्ययन सर्वथा प्रतिहत होगया । जब वादी किसी भी गृह्यसूत्र वा संस्कारविधिसे शूद्रको यज्ञोपवीत नहीं दे सकते; -'हवें वर्ष क्योंकि - न शूद्र के लिए कोई छन्दोमन्त्र रखा गया है, न कोई छन्द: -प्रदान वर्ष, न कोई छन्दकी ऋतुः तव शूद्र वेद पढ़ेगा ही कैसे? - गुरुकुलो फिर शेष ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ही द्विज सिद्ध हुए । यह वही हैं । ' घट्टकुट्यां प्रभातायितम् ' वाली बात चरितार्थ होगई । कई गाड़ीवान नहीं चुंगीघर से बचने के लिए रातको ही चल पड़े, जहाँ उन्हें प्रभात कारीही हुआ वहीं चुंगीघर मी आगया - उन्हें वही चुंगी भरनी पड़ी-ननीय तु जिससे बचना चाहते थे । तब वादीकी प्रतिज्ञा कहाँ गई कि-तण के भेद ' ऐसा द्विज तो मनुष्यमात्र ही हो सकता है ' । जब वादी कहते हैं प कि- ' जो माता से जन्म लेकर गुरुकुलसे - गुरुके घरसे विद्वान् बनकर या देता है । बाहर निकले, वह द्विज है; उस द्विजको वेदमाता पवित्र कर सकती नातरं गुरु है ' तब गुरुकुलके अन्दर रहने तक तो वह वादीके अनुसार ' द्विज ' हा गया है । हुआ नहीं; तब उसका वेदमें अधिकार भी रहा नहीं; मनु तो ननं द्वितीय वेचारे बन बैठे ष्अब पीछे के विद्वान्, और वादी बन बैठे वैदिक-' नाम कालके विद्वान्; जोकि वादीने गुरुकुल पढ़नेकी अवधि में वेद ही न जा सबके लिए अनधिकृत कर दिया, यहाँ तो ' कहाँ तो चौबेजी गये CC - 0. Ankur Joshi वेदाधिकार - विचार १८१ Collection Gujarat. थे छच्वे बनने; दुब्बे बनकर आये ' वाली बात चरितार्थ होगई । यदि वादी ' द्विज ' यज्ञोपवीत वाले दिन बनाते हैं, तो फिर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ही द्विज बने, शुद्रका कहीं भी उसमें नाम न आने से वे बेचारे वेदसे कोरे ही रहे । बात बही निकली वादीसे ' तथा-कथित पीछेके विद्वानों ' की । द्विजसे भाव दो जन्मका है, सो उपनयनसे ही दूसरा जन्म होता है, आचार्यकुलसे निकलने के बाद नहीं । उपनयन होता है तीन वर्णोंका ८-११-१२ वर्षोंमें; सो द्विज भी वही तीन हुए । यही दूसरा जन्म ही उनका महत्त्वपूर्ण है । ( ३ ) यह ' द्विज ' का लक्षण हम ही नहीं कहते, वादिसम्मत वेद स्वयं कहता है । देखिये- ' आचार्य उपनयमानो ब्रह्मचारिणं कुरुते गर्भमन्तः । तं रात्रीस्तिस्र उदरे विमर्ति तं जातं द्रष्टुमभि-संयन्ति देवाः ' ( अथर्व ० ११।५।३ ) यहाँ तीन रात ब्रह्मचारीको उप-नयनार्थ आचार्यके गर्भ ( कुल ) में रहना पड़ता है, जैसेकि वादीके श्रद्धेय स्वा. द. जीने भी सं. वि. में लिखा है- ' जिस दिन बालकका यज्ञोपवीत करना हो; उससे तीन दिन अथवा एक दिन पूर्व तीन वा एक व्रत बालकको कराना ' ( पृ. ७१ ) इन तीन रात्रियोंके बाद बटुका उपनयन कर देने पर उसका दूसरा जन्म हो जाता है । उसे देखनेकेलिए देवता भी आते हैं । यह वेदके उक्त मन्त्रका तात्पर्य है । यही उसका दूसरा जन्म द्विजत्वाधायक होनेसे महत्त्व-पूर्ण होता है- ' तत्र यद् ब्रह्मजन्मास्य मौञ्जीबन्धन - चिह्नितम् । तत्रास्य माता सावित्री पिता त्वाचार्य उच्यते ' ( मनु ० २।१७० ) और यह द्विजत्व उपनयनवाले दिनसे हो जाता है; और केवल ब्राह्मण, An eGangotri Initiative

पृष्ठ 106

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१८६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) क्षत्रिय, वैश्योंका होता है, देखिये इस पर सभी गृह्यसूत्र । ( ४ ) गृह्यसूत्रों के अनुसार गायत्री - सावित्री ब्राह्मणको गायत्री-छन्दके एकपादके वर्णानुसार ८ वर्ष में ( पारस्करगृ. २ | ३ | ७ ), त्रिष्टुप् - सावित्री क्षत्रियको त्रिष्टुप् छन्दके एक पादके वर्णानुसार ११ वें वर्ष में ( पार. २ | ३ | ८ ), जगती - सावित्री वैश्यको जगती छन्द के एक पादके वर्णानुसार १२ वें वर्ष में ( पार. २३६ ) अथवा तीनोंको गायत्री देनेका ( पार. २ । ३ । १० ) विधान किया गया है । जब पहला पक्ष लिया जाता है कि - गायत्री - सावित्री ब्राह्मणको दी जावे; तब ' वरदा वेदमाता द्विजानाम् ' में ' द्विज ' का अर्थ केवल ' ब्राह्मण ' होता है । इसलिए गायत्री - सावित्री के विसर्जन के अवसर पर कृष्णयजुर्वेद में लिखा है- ' ब्राह्मणेभ्योऽभ्यनुज्ञाता [ जिसे ब्राह्मणों-केलिए स्वीकृत किया है ] गच्छ देवि! [ गायत्रि! ] यथासुखम् ' ( तैत्ति: आ. १०।३० ) । गायत्रीके ' आयातु वरदा देवी अक्षरं ब्रह्मसंमितम् । गायत्रि! च्छन्दसां मातः! ' ( बोधा.गृ.शे. सू. ३/६/४ ) इस आवाहनमन्त्र में ' ब्रह्मसंमितम् ' आया है । ' ब्रह्म ' ब्राह्मणको कहते हैं - ' ब्रह्म हि ब्राह्मण: ' ( शतपथ. ५ । १ । १ । ११ ) । ' समानार्थी एतौ ब्राह्मण- शब्दो ब्रह्मन् शब्दश्च ' ( महाभाष्य ५/१७ ) ब्रह्मति ब्राह्मणानां नामास्ति ' ( स्वा. दु. की ऋ. मा.भू. पू. ८७ ) ब्राह्मणभोजन में इसीलिए ही ' ब्रह्म - भोज ' शब्द प्रसिद्ध है । अथर्ववेदसं. के उक्त मन्त्र में ' वेदमाता द्विजानाम् । ब्रह्मवर्चसं मह्य ं दत्त्वा ' इसमें ब्रह्म-वर्चसकी प्रार्थना भी ' आ ब्रह्मन्! ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम् ' ( यजुर्वेदवा.सं. २२/२२ ) इस मन्त्रकी साक्षीसे ब्राह्मण केलिए है । CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदाधिकार - विचार 15 कृष्णयजुर्वेदकी साक्षीसे अथर्व के मन्त्रका ' वेदमाता ' शब्द ' गायत्री ' वाचक है । इस ( वेदमाता द्विजानाम् ) मन्त्रका ऋषि ब्रह्मा, ' देवता ' गायत्री ' भी इसी बात को सूचित कर रहा है । जब दूसरा पक्ष लिया जाता है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश तीनोंको गायत्री - सावित्री दी जाए; तो यहाँ ' द्विजाना ' शब्द ‘ त्रैवर्णिकों'का उपलक्षक हो जाता है, इसी द्विजत्वका विचार कर भगवद्गीता में ' ब्राह्मण - क्षत्रिय- विशां शूद्राणां च परन्तप ' ( १८६४४ ) यहाँ वर्णोंके द्वन्द्व - समासमें शुद्रको पृथक- कृत कर दिया गया है और ' ब्राह्मणेभ्योऽभ्यनुज्ञाता ' यहाँ भी ' ब्राह्मण ' शब्द द्विलोक उपलक्षक हो जाता है, और अथर्व के मन्त्रका ' ब्रह्मवर्चस ' शद क ‘ हस्तिवर्चस ' आदिका भी उपलक्षक हो जाता है । शूद्र यहाँ कि वह भी ढंग से प्रवेश न कर सका । इसीलिए महाभारत में भी कहा है- बर ' ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः त्रयो वर्णा द्विजातयः ' ( अनुशासन. ४७ | ७ ) शु कह अन्य स्मृतियों में भी कहा है- ब्राह्मण ' - क्षत्रिय विट्शूद्रा वर्णाः क द्यास्त्रयो द्विजाः ' ( याज्ञवल्क्य. १/२/१७ ) ' मातुर्यदये जायन्ते द्विती मर मौञ्जिबन्धनात् । ब्राह्मणक्षत्रियविशः, तस्माद् एते द्विजाः सव ( याज्ञ. आचारा. ३६ ) इत्यादि बहुत प्रमाण इसमें दिये E सकते हैं । ( ५ ) जोकि वादिमहोदय पर - ‘ जनः ' और ' पुरुषः'को उस वेदको केवल द्विजों इस पर यह जानना चाहिये चट जा कहते हैं- ' जिस वेदमें अनेक स्थ चल सम्बोधन कर उपदेश दिया गया है । वाद तक सीमित कैसे रखा जा सकता है । व्या कि जब यज्ञोपवीत जो वेदांधिकार Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 107

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) द ' गायत्री पट्ट है - तीनों वर्णोंका होता है, तब वेदका पुरुष भी वही उपवीती -ब्रह्मा द्विज हुआ वहाँ अनधिकारी ' अद्विज ' शुद्र कहांसे टपक पड़ा? , यदि वादी शूद्रको वेदका अधिकार देते हैं; तो उन्हें यह बताना त्रिय पड़ेगा कि - वे शूद्रादिवर्णोंको जन्मसे मानते हैं, वा गुणकर्मसे? , वैश यदि जन्मसे; तब शूद्र आचार्य कुल में प्रवेशका अधिकारी ही न विचार शब्द रहेगा; तब वह वेदमें वैसेका वैसा अनधिकारी रहा । यदि शूद्रादि-' ( १८१४ करते को वे गुणकर्मसे मानते हैं; तो उनके मतमें अत्यन्त मूर्ख ' शूद्र ' ९ ० ) रहेगा; वह वेद तो कहाँ रहा, साधारण विद्या भी नहीं पढ़ दद्विलोक सकेगा । यदि मनुष्य शूद्रके कर्म करने से शूद्र है; तो उसको यज्ञ ' श करना तथा वेदादि पढ़नेका अधिकार है या नहीं? यदि है तो यहाँ किसी वह ब्राह्मण होगया या शुद्र ही रहा? यदि शूद्रः तो ' कर्म से ब्राह्मणं कहा है- घनता है ' यह वादीसे अभिमत सिद्धान्त कहाँ गया? यदि वह ४७७ ) शूद्र ब्राह्मण बन गया; तो यह अधिकार ब्राह्मण को मिले, शूद्रको वर्णाः क कहाँ मिले, शूद्र अधिकार से वचित ही रहा; वा शूद्रता में ही यन्ते द्वित मर गया । जाः स्मृताः ( ६ ) जोकि - वादी महोदय ' उद्यानं ते पुरुष नावयानं ' ( अ. दिये १६ ) मन्त्रको संसार के मानवमें लगाते हैं कि- ' तेरा ऊपर चढ़ना ही हो, जीवन में उत्थान ही होता चले, नीचे पतन न हो नेक स्थ जाय ' । यहाँ अपने मनमाने अर्थ करके वादीने वेदको अपने पीछे गया है- चलाकर वेदकी स्वतः - प्रमाणताको मार डाला । मालूम होता है कि-या सकता है वादी वेदका पूर्वापर देखते नहीं । कई आधुनिक नव- शिक्षितोंकी दांधिकाल व्याख्या देखकर परप्रत्ययनेयबुद्धि होते हुए, उसमें इतने आनन्द-CC - 0. Ankur Joshi वेदाधिकार - विचार १८६ विभोर हो जाते हैं कि- प्रकरणकी उपेक्षा कर डालते हैं । उक्त ( ८१ ) सूक्त मृत्युके निकट पहुँचे हुए पुरुपको बचाने और पूर्ण आयु तक पहुँचाने के लिए कल्प द्वारा विनियुक्त है । उस सूक्तका पूर्वापर भी यही सूचित करता है । उसके श्रादिम मन्त्रमें ' अन्त-काय मृत्यवे नमः इह् अयमस्तु पुरुषः सह असुना ' ( १ ) यहाँ मृत्युके देवता यमराजको नमस्कार किया गया है और मरणासन्न पुरुष के प्राणों की रक्षार्थ प्रार्थना की गई है । इस प्रकार प्रममन्त्र में भी स्पष्ट है - ' त्वां मृत्युर्दयतां मा प्रमेष्टाः ' ( ६५ ) तुम पर मृत्यु दया करे, तू मत मर ' । इस प्रकार ३ य मन्त्रमें भी स्पष्ट है— ' इह तेऽसुरिह प्राणः, इह आयु:, इह ते मनः ' ( ३ ) । इस प्रकार अम मन्त्र में भी कहा है - ' मा अनुगाः पितॄन् ( मृतान ) विश्वेदेवा अभि-रक्षन्तु त्वा इह ' । यहाँ मृतक पितरोंका अनुगमन अर्थात् रोगीका परलोकगमन ( मरण ) न हो, यह प्रार्थित किया गया है । यह वादि - महोदयको वेदकी श्रद्धा है कि वे वेदको भी अपने पीछे चलाते हैं । द्विज अधिकृत होनेसे द्विज - पुरुष ही यहां संबोधित है । फलतः यह तथा ' सुविज्ञानं चिकितुषे जनाय ' यह मन्त्र वादीका पक्ष किसी भी प्रकार सिद्ध नहीं करते । ' चिकितुपे ' का अर्थ वादीने इच्छार्थक क- - स सन्का कर डाला, जबकि यहाँ ' सन् ' प्रत्यय है ही नहीं, किन्तु ' क ' प्रत्यय है । निरुक्तकारने ' चिकित्वान् ' का अर्थ ' चेतना-वान् ' ( २।११।१ ) किया है । इसी प्रकार ( | ८ ५ | २ ) में भी । इससे वादीकी कुछ भी इष्ट सिद्धि नहीं । ( ७ ) जो कि वादी एक नई बात बताते हैं कि- " और तो और, Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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१६० श्री सनातनधर्मालोक ( ६ ) यजुर्वेद तो यह कहता है कि- प्रत्येक मनुष्यके मनमें ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद पहले से ही विद्यमान हैं । वे वेद उनमें ऐसे चिपके हुए हैं, जैसे रथकी नाभिमें अर ' यह कह कर मन्त्र देते हैं - ‘ यस्मिन् ऋचः साम यजूंषि यस्मिन् प्रतिष्ठिता रथनाभावि-वाराः । यस्मिन् चित्तं सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ' ( यजुः ३४५ ) इसमें स्पष्ट ' प्रजानां ' कहा है, ' द्विजानां ' नहीं कहा है " । इन्हीं से वादी वेदको सर्वव्यापक बनाया चाहते हैं । वेदकी इच्छाको छिपाकर अपनी इच्छानुसार अर्थ करके वे वेदके स्वतः प्रामाण्यको काट रहे हैं; इससे हमें बड़ा दुःख होता है । यह वेदके गले पर छुरी फेरना है । यहाँ वादी वेदोंको प्रजाओंके चित्तमें ओत - प्रोत बताते हैं, और कहते हैं— ' वेदोंको केवल द्विजों तक सीमित रखनेवाले ऐ भारतीय विद्वानो! अब क्या करोगे? वेद तो अब शूद्र तक पहुँच गये, क्योंकि - मन तो उनका भी है, अब वेदको शूद्रोंके मनसे कैसे बाहर निकालेंगे? ' ' इस पर हम कहते हैं कि यदि ऐसी बात है; तो यह सब गुरुकुल तथा गुरुकुल - पत्रिकाएँ वन्द करवाइये; जिससे जनताका व्यर्थ व्यय हो रहा हुआ पैसा तो बचे | जब वेद सबके मनमें पहले ही विद्यमान हैं; तब आप उनको उनके मनमें क्या डालेंगे? यह तो वदतोव्याघात होगा । यह पिष्टपेषण किसलिए? यह वादीने अपने पक्षकी सिद्धिकी अतिशयित प्रसन्नता में शूद्रोंकी तो दूर, द्विजोंकी भी वेदकी पढ़ाई बन्द करवा दी । -CC - 0. Ankur Joshi Collection वैदाधिकार- विचार वस्तुतः उक्त मन्त्रका तथाकथित अर्थं ठीक नहीं । वहां प्रजाओ के मनों में वेदोंका निवास नहीं बताया, किन्तु ऋषिके मनमें; I तभी तो याज्ञवल्क्य ऋषि कह रहा है ' यस्मिन् वेदाः प्रतिष्ठिताः, तद् मनः शिवसंकल्पमम्तु ' यहां ‘ तद् मे ऋषेः मनः ' कहा है, ' प्रजान ध मनः ' नहीं कहा । याज्ञवल्क्य ऋषि कह रहा है कि मेरे जि मन में वेद प्रतिष्ठित हैं, और प्रजाओं का चित्त ( ज्ञान ) भी लिए मेरे मनमें ओत - प्रोत है, वह मेरा मन शिवसंकल्पवाला हो । प्रजाओंके मनमें वेदोंकी ओत - प्रोत होने की बात कहीं भी नहीं कही गई | तब उसे उससे बलात् कैसे निकाला जा रहा है? वेद तो ऋषिके मनमें ठहरे रहे; तब क्या याज्ञवल्क्य ऋषि शूद्र व तर्क जो कि वादी शूद्रके मनमें वेदको घुसाये बैठे हैं? नम्र निवेदन यह है कि - व्यापारियों की भांति बादी भी वेदमें ब्लैकमार्केट करें । वाच इस ( ७ ) जोकि वादी आप बीती सुनाते हैं कि - ' वेदाध्ययनाधिकार इस स्त्री - शूद्र विषयकोऽप्यस्ति, मानवमस्तिष्कस्य ज्ञानमात्रेऽधिकारित्वात् मँगा अद्यतनस्त्रीशूद्रगृहीतवेदज्ञानवत् । तथा चेमे सर्वे स्त्रीशूद्रा वेदज्ञानत्वा धिकारिणः । तस्मात् तथा " इस हमारे पञ्चावयव प्रक्रिया से सावित काशी वेदाधिकारपर काशीका कोई भी विद्वान् न बोला, सब शान्त हो गये ' । पर हमें तो वादि - महोदय की इस साधनप्रक्रिया में करें वेदक महत्त्वपूर्ण बात नहीं मालूम होती । वादीके तो प्रतिज्ञा, हेतु तथा शङ्कर निगमन में ही परस्पर विरोध है । प्रतिज्ञा, वादी ' वेदाध्ययनाधिकार ' मधि की करते हैं, और हेतु देते हैं - ' ज्ञानमात्रेऽधिकारित्वात् ' धौर Gujarat. An eGangotri Initiative

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१६२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) हां निगमन देते हैं— ' स्त्रीशूद्रा वेदज्ञानाधिकारिणः ' । जब वादीकी प्रजाओ प्रतिज्ञा ही असिद्ध हो गई, यह प्रतिज्ञाविरोध आदि निग्रहस्थान मनमें, हमी उपस्थित हो गये । तब उसके आधार पर बनाया महल स्वयं ही ताः, तद्रे धराशायी हो गया । वल्कि यह बादीका अनुमान न्याय न होकर --मेरे न्यायाभास हो गया । कैसे? इसे देखिये । श्रीवात्स्यायनने लिखा जिस है — ' प्रत्यक्षागमाभ्यामीक्षितस्य अन्वीक्षणमन्वीक्षा, तथा प्रवर्तते-भी जिए इति आन्वीक्षिकी - न्यायविद्या । यत् पुनरनुमानं प्रत्यक्षाऽऽगम-विरुद्धम्, न्यायाभासः सः ' ( १ | १ | १ ) क्योंकि बादीकी उक्त साधन-मी नहीं प्रक्रिया ' वेदमाता पावमानी द्विजानाम् ' इस आगम से विरुद्ध शुष्क-है? वेद, तर्क है । यदि वेदको ' मानवमात्र ' अधिकारी इष्ट होता, तो शूद्रय ' वेदमाता जनानाम् ' होता, ' द्विजानां ' न होता । ' द्विज ' यहां ' ब्राह्मण, निवेदन क्षत्रिय, वैश्य हैं, यह हम पूर्व सिद्ध कर चुके हैं । जिस ' यथेमां कमार्केट २ वाचं ' में वादी ' जनेभ्यः ' बताते हैं, उसमें ' वाचं ' है, ' वेदवाचं ' नहीं । इस मन्त्रका वादीसे अभिमत अर्थ ' सिद्ध ' नहीं, किन्तु ' साध्य ' है, नाधिकार इस विषय में ' श्रीसनातनधर्मालोक ' ( तृतीय पुष्प, मूल्य ३। ) हमसे कारित्वात्, मँगावें । अतः वादीका यह प्रमाण भी प्रसिद्ध हो गया । साध्यसम - वेदज्ञानहेत्वाभास हो जाने से यह भी निग्रहस्थान हो गया । तब वादीको से साधि काशीसे ' विजयपत्र ' क्या मिलता? शान्त हो यहां पर वादी स्त्री - शूद्रकी सामर्थ्य लौकिक लेते हैं कि - वे यामें कोई वेदका ज्ञान प्राप्त करते हुए देखे गये हैं ' यह ठीक नहीं । स्वा • , हेतु तथा शङ्कराचार्यने ठीक ही लिखा है - ' सामर्थ्यमपि न लौकिकं केबल-वनाधिकार अधिकारकारणं भवति, शास्त्रयेऽर्थे शास्त्रीयस्य सामर्थ्यस्य श्रपेक्षितत्वात् । बातू ' चौर-CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदाधिकारि - विचार १६३ शास्त्रीयस्य च सामर्थ्यस्य अध्ययननिराकरणेन निराकृतत्वात् ' ( ब्रह्मसूत्र १ | ३ | ३४ ) केवल लौकिक सामर्थ्य कि वह यह काम कर सकता है, अधिकारका कारण नहीं बन जाती । शास्त्रीय अधिकार में शास्त्रीय सामर्थ्य ही अपेक्षित होती है । शास्त्रने स्त्रीशूद्रका अध्ययन निराकृत करके उनकी लौकिक सामर्थ्य असिद्ध बता दी है । अन्यत्र मी आचार्य शङ्कर ने लिखा है- ' श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् ' ( गीता ३।३५ ) इति स्मरणाद् न्यायाच्च । यो हि यं प्रति विधीयते स तस्य धर्मः नतु यो येन स्वनुष्ठातु ं शक्यतेः चोदनालक्षणत्वाद् धर्मस्य । न च रागादिवशात् प्रच्युतिः, नियम-शास्त्रस्य बलीयस्त्वात् ' ( ब्रह्मसूत्र ३४१४० ) ' अपना धर्म विगुण भी अच्छा, दूसरेका धर्म अच्छा भी अपनेलिए ठीक नहीं । जिसका जिसके लिए विधान किया जाता है; वही उसका धर्म होता है, जो जिसे कर सकता हैं, वा स्वेच्छानुसार कर लेता है वह उसका धर्म नहीं हो जाता ' | ( ८ ) वादी की पञ्चावयवप्रक्रिया आगमसे विरुद्ध होनेसे तर्का-भास ही है । वादीका उक्त तर्क ऐसा है कि - जैसे कोई कहे कि - ' हिन्दुपु परस्परविवाहाधिकारः सर्वविध - भ्रातृमगिनीविषयको ऽप्यस्ति, उभयो-गर्भाधाने योग्यता - दर्शनात्; अद्यतन - मौहम्मदेशवीयादिषु पितृव्य-मातुल - सुतादिरूपभगिन्या सह तादृश - भ्रातुर्विवाद्देऽपि सन्तत्युत्पत्ति-दर्शनवत् । यत्र यत्र गर्भाधान - जननोभयविधयोग्यतावत्त्वम्; तत्र-तत्र विवाहाधिकारवत्त्वम । तथा च हिन्दुष्वपि भगिनीभ्रातरो मिथो सन्ध ० १३ Gujarat. An eGangotri Initiative

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१६४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) विवाहाधिकारिणः; तस्मात् तथा ' अर्थात्- ' हिन्दुओं में विवाहाधिकार भाईका बहिन के साथ मी है; क्योंकि उनमें गर्भाधानकी तथा सन्तानोत्पादनकी योग्यता देखी गई है । जैसे कि मुसलमान एवं ईसाइयोंमें चचेरी - ममेरी आदि बहिनोंके साथ विवाह तथा वंश-वृद्धि प्रेमभाव आदि देखे गये हैं । जिस - जिसमें गर्भाधान वा सन्तानोत्पादनकी योग्यता है, उन उन सभीका परस्परमें विवाहा-धिकार है । हिन्दुओंमें भी वैसी वात दीख सकती है; अतः उनमें मी माई - बहनों का परस्पर- विवाह वैध है । ' तब क्या वादी इस अपने - जैसे तर्कको अव्यमिचारी बता सकते हैं? यहां क्या लौकिक-शक्ति देखी जावेगी, या शास्त्रीय - शक्ति? अतः हृपष्ट है कि इस प्रकारके अधकचरे अनुमान ' यत्पुनरनुमानं प्रत्यक्षागमविरुद्धम्, न्यायामासः सः ' इस न्यायोक्ति के अनुसार श्रागम - त्रिरुद्ध होनेसे न्यायाभास ही हैं, इनसे साध्यकी सिद्धि न हो सकने से ' काशीसे विजयपत्र ' भी नहीं मिल सकता | ' मानव मस्तिष्कस्य ज्ञानमात्रेऽ-घिकारित्वात् ' जैसे यह हेतु एक वृद्ध विद्वान्ने कभी नहीं सुना था, वैसे ‘ मानवमात्रस्य मानवोषु गर्भाधाने योग्यतादर्शनात् ' यह हेतु भी वृद्ध- महाशयने कभी नहीं सुना होगा । . ( ६ ) ' वेदमाता पावमानी द्विजानाम् ' यह मन्त्र गायत्री - सावित्री के लिए है - यह कदाचित् वादीको मालूम नहीं होगा । इस मन्त्रका ऋषि ब्रह्मा, तथा देवता ( प्रतिपाद्य ) गायत्री है; तब इस मन्त्र में गायत्री ही वर्णित है । वेदपाठ वा गायत्रीजपकी समाप्ति के अनन्तर पठनीय यह मन्त्र है । ' वेदानां मातरं गायत्री- सम्पदम् ' ( १ । १ । ३८ ) CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदाधिकारि - विचार 18 इस गोपथब्रा के वचनसे स्पष्ट है कि- वेदमाता गायत्री है । ' गायत्री वेदमातरम् ।... स तथा पाठितो देव्या ब्राह्मणो नष्टकिल्विषः ( वनपर्व २००८३ ) महाभारतके इस वचनसे भी यह सिद्ध है ॥ ‘ गायत्री छन्दसां माता ' ( १०।२६ ) तैत्तिरीयारण्यकके इस वचनये भी यही बात सिद्ध है । वहीं कहा गया है - ' गायत्री मावाहयामि ' । सो उस गायत्रीमें ब्राह्मणका अधिकार होनेसे ही अथर्ववेददे मन्त्रमें भी ' वेदमाता द्विजानाम् ' कहा गया है । यहां ' द्विज'च अर्थ ' ब्राह्मण ' है, क्योंकि मुख्य - द्विज वही होता है । इसीलिए ‘ गायत्र्या छन्दसा ब्राह्मणमसृजत् ' ( वशिष्टधर्मसूत्र ४।३ ) इस वचनमें गायत्री छन्द से ही ब्राह्मणका जन्म बताया गया है । गायत्री के एक पादके = अक्षर होते हैं, अतः उसके अधिकारी ब्राह्मणका सी ८ वें वर्ष में यज्ञोपवीत होकर और गायत्री मन्त्र देकर उससे उसका द्वितीय जन्म होकर द्विजत्व हो जाता है । इसीलिए पारस्कर गृह्यसूत्र में ' गायत्रीं ब्राह्मणेभ्योऽनुब्रूयात् ' ( २।३।७ ) यह कहा है । इसी प्रकार मानवगृह्यसूत्र ( १ / २ / ३ ) में तथा ऐतरेयत्रा. ( १ | ५ | २८ ) शाङ्खायनना. ( २२५ । ३८१ - ३८३ ) में तथा अन्यत्र भी कहा है । उसीका अथर्ववेद के उक्त मन्त्र में वर्णन है; तब अशिक्षित शूद्र वेदवे मतमें भी वेदसे वंचित रहा । उक्त - सिद्धान्तको स्पष्ट करने के लिए कि - शूद्रको उपनयन तथा वेदादिका अधिकार नहीं - हम इसपर शास्त्रीय उपपत्ति देते हैं, ' आलोक ' के विद्वान् पाठक तथा वादी भी इस पर ध्यान दें । ( १० ) वादी जानते होंगे कि - ‘ अष्टवर्षे ब्राह्मणमुपनयेत, गर्भाने Gujarat. An eGangotri Initiative