सनातन धर्मलोक ६ — पृष्ठ 91–100
सनातन धर्मलोक ६ · पृष्ठ 91–100
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) अन्य आक्षेपोंका समाधान १२७ ताते हैं । इससे मन्त्रभागकी अवेदता न मानें; वैसे ही उन्हें वैशेषिकदर्शन के तब दिसूत्रों में तथा उक्त पाणिनिसूत्रमें; और अन्यत्र वेद - ब्राह्मणके ससे उन्हीं ग्रहण दीखने में भी जान लेना चाहिये ' । तब समान न्यायसे पृथक् विधिश्रवा की भी अवेदता नहीं मानी जा सकती । शेष उत्तर इस ब्राह्मणभाग हैं । निबन्धके आरम्भमें देख लेना चाहिये । ( १६ ) . ( ४० ) कई लोग निरुक्तमें निपात- प्रकरण में ' अन्वध्यायं'के २१ सूत्रों ) में ' बाह उदाहरणों में ब्राह्मणभागको उदाहृत न देख निपातोंके मन्त्रभागके आणि निसूत्रों ही उदाहरणों को देखकर उससे ब्राह्मणभागकी निरुक्तकारको ग्रह अवेदता इष्ट मानते हैं - यह भी ठीक नहीं । यद्यपि श्रीयास्कके मत में नाणानि ' अन्वध्याय ' वेदका नाम है; और ' भाषायां ' लोकका; तथापि इससे ना चाहिये हमारे पक्ष की कोई हानि नहीं । क्योंकि - ' अन्वध्यायम्'का जब भी यहां ' वेद ' में यह अर्थ है, और वेदके दो भाग हैं, एक मन्त्रभाग दूसरा ब्राह्मणभाग, तब उन दोनोंमें किसी एक भागके निपातोंके उदाहरण देने ( ६ाश २०६ पर भी ' अन्यध्यायं की सार्थकता हो जाती हैं; क्योंकि - ' समुदायेषु हि [ विलक्षणः शब्दाः प्रवृत्ता अवयवेष्वपि वर्तन्ते ' ( समुदायवाचक शब्द अवयव-को आक्षेप वाचक भी बन जाता है ) घृतं भुक्तम् ( घी खाया - घी समुदायवाचक निसूत्रमं शब्द है, सारे संसार के घीका नाम है; पर इस वाक्य में ' घृत ' गोभी के शब्द अवयववाचक है ) यह महाभाष्यसे प्रोक्त एक प्रसिद्ध न्याय है । सिष्ठन्याय यहां वन - जैसे कि - न्यायदर्शनमें ' तदप्रामाण्यमनृत व्याघातपुनरुक्तेभ्यः ' ग्रहस ( २ | १ | ५७ ) वेदविषयक इस आक्षेप के प्रस्तुत होनेसे उक्त दोनों CC - 0. Ankur Joshi भागों में एक भाग ब्राह्मणभागके उदाहृत करने पर वेदविषयक उक्क आक्षेपकी सफलता हो गई, अथवा जैसे महाभाग्य - पस्पशाह्निकमें ' बेदे-खल्वपि ' - कहकर ' पयोव्रतो ब्राह्मणो यवागूत्रतो राजन्य: ' इस केवल ब्राह्मणभागके उदाहृत करनेपर भी वेदके उदाहरण देनेकी सफलता हो गई । अथवा से ' अपि वा वेदनिर्देशाद् अपशूद्राणां प्रतीयेत ' ( ६।१।३३ ) इस मीमांसादर्शनके सूत्र में प्रोक्त वेदनिर्देशको दिखलाते हुए ' वसन्ते ब्राह्मणमुपनयीत, ग्रीष्मे राजन्यम् ' इत्यादि केवल ब्राह्मणभाग के प्रमाण देनेपर मी वेदके निर्देशकी चरितार्थता हो गई । अथवा जैसे महामाष्य में ' षष्ठ्यर्थे चतुर्थी छन्दसीति वाच्यम् ' ( २।३६२ ) इस वैदिक - वार्तिकका ' या खर्वेण पिवति, तस्यै खर्चः ' इस केवल ब्राह्मणभागका उदाहरण देने पर भी छन्दः ( वेद ) शब्द की सार्थकता हो गई; वैसे ही निरुक्तके ' अन्वध्याय ' ( वेदमें ) के उदाहरणमें यदि वेदके एक भाग मन्त्रभागका उदाहरण दे दिया गया है, तो इससे हमारे पक्षकी कोई हानि नहीं । क्योंकि प्रस्तुत निरुक्त मुख्यतया ऋग्वेदसं. के संग्रहीत कठिन शब्दों ( निघण्टु ) के निर्वचन के लिए ही प्रवृत्त हुआ है । हां, यदि निरुक्तकार निपात प्रकरण में भाषाका उदाहरण [ ह्मणभागका देते; तब इससे हमारा पक्ष खण्डित होता; पर वैसा उन्होंने कहीं भी नहीं किया । तब इससे हमारा पक्ष अक्षत ही रहा । बल्कि ' अन्वध्याय ' कहकर श्रीयांस्कने जिन निपातोंका जिस अर्थ में मन्त्रमागका उदाहरण दिया है; वे निपात ब्राह्मणभागमें भी उन्हीं अर्थो में सामान्य हैं और ब्राह्मणमागमें भी सुलभ हैं । जैसे-Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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११६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ' अग्निरिव, इन्द्र इव ' उपमार्थ में मन्त्रभागमें सुलभ है, वैसे ही ब्राह्मणभागमें भी । जिन अर्थों में ' नूनम् ' आदि मन्त्रमागमें मिलते हैं; उन्हीं अर्थों में ब्राह्मणभागमें भी मिल सकते हैं । उसी निपात-प्रकरण में श्रीयास्कने ' शिशिरं जीवनाय कम् ' ( १ | १० | १ ) यह ' कम् ' की अनर्थकतामें उदाहरण दिया है, यह प्रतिपक्षिसम्मत - वेदका नहीं, किन्तु किसी लुप्त - ब्राह्मणका है । वैसे तो निरुक्तकार ' कं ' की अनर्थकता में ' मुचामि त्वा हविषा जीवनाय कम् ' ( ऋ. १०।१६।१ ) यह प्रतिपक्षि-संगत संहिताका उदाहरण भी दे सकते थे; पर उन्होंने अन्य शाखा वा ब्राह्मणका उदाहरण दिया है - इससे उनके मतमें समस्त शाखाएँ तथा ब्राह्मण वेद हैं- यह स्पष्ट है । इसप्रकार ' नेज्जिह्मायन्त्यो नरकं पताम ' ( १।११।१ ) यह निपात ' नेत् ' का निगम भी श्रीयास्कने किसी भिन्न शाखा वा ब्राह्मणका दिया है, जो ऋक् - परिशिष्टमें मिलता है । निरुक्तकार छन्द, निगम, आम्नाय, समाम्नाय आदि शब्द वेद-वाचक मानते हैं; पर उसके उद्धरण ब्राह्मणभागके भी देते हैं-यह हम चतुर्थ पुष्प तथा इस निबन्ध में भी बता चुके हैं । इस कारण निरुक्तकारको भी ब्राह्मणभाग वेद इष्ट है - यह स्पष्ट होगया । ( ११ ) . ( ४१ ) कई लोग कहते हैं— ' समाम्नायः समाम्नात: ' इसमें निरुक्तकारने ' समाम्नाय ' पदका मुख्य अर्थ मन्त्रभागको ही माना है, ' छन्दोभ्यः समाहृत्य समाम्नाता ' यहाँ भी श्रीयास्क छन्दका अर्थ वेद लेते हैं; वैसा ही दुर्गाचार्यने लिखा भी है; पर फिर ' यथो एतद् रोहात् प्रत्यवरोहश्चिकीर्षितः, इति आम्नायवचन देत अन्य आक्षेपोंका समाधान १५३ भवति ' यहाँ ब्राह्मणभागका भी ' आम्नाय ' पदसे ग्रहण किया है-यह गौणवृत्तिसे किया है, मुख्य - वृत्तिसे नहीं । ' आम्नाय ' पदकी यह आतिदेशिक - वाच्यता ब्राह्मणभाग तक ही न रही; ' सोऽयमक्षर. समाम्नाय: में व्याकरण आदि अङ्गों को भी आम्नाय कहा जाने । लगा ' ( श्रीवेङ्कटेश्वरसमाचार ११ नवं. ५५ ) यह बात प्रतिपक्षियोंकी ठीक नहीं । यह श्रीसामश्रमी आदिका मत है | यदि श्रीयास्त्र समाम्नाय वेदको कहते हैं; और समाग्नाथ-पद यहाँ निघण्टुका वाचक है; तो निघण्टुके पद प्रतिपक्षियोंसे सम्मत वेदकी चार पोथियोंमें मिलने चाहियें पर उनमें नहीं मिलते । प्रति-पक्षिगण अपने वेदोंको प्रक्षेप - रहित तथा न्यूनता - रहित पूर्णं मानते । हैं; पर वे निघण्टुके कई पद उन ४ वेदपोथियों में नहीं मिलते । हम उनमें कई निघण्टुके पद उद्धृत करते हैं-' बुर्बुरम् ' ( १।१२ ) जलवाचक यह निघण्टुका शब्द चारों वेदों-की वर्तमान ४ पोथियों में नहीं मिलता । इसप्रकार यह: ' ( १ | १२ ) ' भविष्यत् ' यह जल के नाम, ' मल्मलाभवन् ' ( १११७ ) यह ' ब्वलन ' का पर्याय है । करन्ती ' ' ( २१ ) यह कर्मका नाम है । यह शब्द वादि सम्मत चारों वर्तमान - वेदसंहिताओं में नहीं हैं । श्रीदेवराज- यज्वाने ' निघण्टु ' की व्याख्या की है । उसके पर्दो निगम दिये हैं; जहाँ इन चारों वेद- पोथियों में उसे वह निगम नहीं मिलावा निघण्टु - प्रोक्त अर्थ में प्रयुक्त वेदमें नहीं मिला; उन पदों के लिए उसने लिख दिया है - ' निगमोऽन्वेषणीयः ' । वे निगम लुप्त संहिता वा ब्राह्मणों में मिल सकते हैं । वर्तमान चार वेदकी CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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१५३ १६० श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) याहै- पोथियों में न मिलने से स्पष्ट हो जाता है कि केवल यही वेद नहीं ; पदकी किन्तु ११३१ संहिता, तथा ब्राह्मणभाग भी वेद है; उनमें अनुप-यमक्षरः लव्ध शब्द मिलने सम्भव है । जब ऐसा है; तब आम्नाय , छन्द हा जाने आदि शब्दोंसे शाखा तथा ब्राह्मणभागका ग्रहण श्रीयास्कके मत में मुख्य - वृत्ति है, गौण - वृत्तिसे नहीं । क्योंकि - श्रीयास्क कहीं आदिका लिखा नहीं क्रि - छन्द वा समाम्नाय इन्हीं चार पोथियोंका नाम है । माग्नाव यतः ' ब्राह्मणभाग'का नाम ' समाम्नाय ' साक्षात् है, आतिंदेशिक सम्मत नहीं । ‘ अक्षर - समाम्नाय ' शब्द चतुर्दशसूत्र ' अ इ उ ' आदिकेलिए । प्रति आया है; व्याकरण आदि अङ्गके लिए नहीं । वे अक्षर ' येनाक्षर-- मानते समाम्नायमधिगम्य महेश्वरात् । कृत्स्नं व्याकरणं प्रोक्तम् ' ( ५७ ) मिलते । इस पाणिनिशिक्षा के प्रमाणानुसार महेश्वर- प्रोक्त होनेसे, अनादि होनेके कारण आम्नाय हैं - यह ठीक ही है; क्या वेदका कोई वेदों अक्षर इन अक्षरोंसे भिन्न भी मिलता है? सर्वथा नहीं । इसलिए ( १ । १२ ) इस अक्षर - समाम्नायको ' अल्वेद ' कहा जाता है । फलतः सब शाखाएँ तथा ब्राह्मणभाग इससे वेद ही सिद्ध हुए । दवादि ( २० ) ( ४२ ) कई लोग कहते हैं— ' यथो एतद् ब्राह्मणेन रूपसम्पन्ना पदके विधीयन्ते इति, उदितानुवादः स भवति ' ( १।१६ ५ ) इस निरुक्तके गम नही वचनमें ब्राह्मणभागको वेदका अनुवाद - व्याख्या माना गया है । ना; उन इस प्रकार ' यद्यपि मन्त्रब्राह्मणात्मको वेदः, तथापि ब्राह्मणस्य मन्त्र-निगम व्याख्यानरूपत्वाद् मन्त्र एवादौ समाम्नातः इस तैत्तिरीय संहिता-वेदक भाष्यभूमिकास्थित सायण के वचनसे, तथा ' विधिशब्दाच्च ' CC - 0. Ankur Joshi Collection अन्य तर्कोंका समाधान १६३ ( १/२/५४ ) इस मीमांसासूत्रस्थित ' मन्त्रव्याख्यानरूपो ब्राह्मणगतः शब्दो विधिशब्दवद् इत्युच्यते ' इस शबरस्वामीके वाक्यसे [ यह शबरस्वामीका बाक्य नहीं है; किन्तु श्रीसायणका है, ' विधि-शब्द: ' पाठ है, ' विधिशब्दवत् ' नहीं ], ' ऋगादीन् मन्त्रान् अधीते, अधीत्य तदर्थं ब्राह्मणेभ्यो विधिं च श्रुत्वा कर्माणि कुरुते ', ( छान्दोग्यभाष्य ७११४ | १ ) इस शाङ्करभाष्य के वचनसे ब्राह्मणभाग मन्त्रभागकी व्याख्या होनेसे वेद नहीं हो सकता ' । इस पर उत्तर यह है— जैसे अष्टाध्यायी, वार्तिक और इनकी व्याख्या महाभाष्य यह सब मिलकर ही व्याकरण बनता है । मूलका नाम सूत्रपाठ - अष्टाध्यायी है, व्याख्यात्मक - महाभाष्यका नाम सूत्रपाठ - अष्टाध्यायी नहीं; पर होते दोनों व्याकरण हैं । वैसे मूलका नाम मन्त्रभाग है, व्याख्या विधि आदि ब्राह्मण भाग है । ब्राह्मणभागका नाम मन्त्रभाग नहीं; परन्तु वेद दोनों ही हैं, यह सिद्ध हो ही गया । शवरस्वामी, सायणाचार्य, शङ्करस्वामी ब्राह्मणभागको वेद मानते ही हैं - पहले इनके प्रमाण हम दे चुके हैं । इसीलिए ' पूर्व तु भाषायाम् ' ( शहद ) यहां ' भाषा ' शब्द देखने से इससे पूर्वका ' विचार्यमाणानाम् ' ( ८२६७ ) यह अष्टाध्यायी का सूत्र वैदिक है - यह सिद्ध होता है । इसलिए सिद्धान्तकौमुदी में मी कहा है- ' भाषाग्रहणात् पूर्व [ ७ ] योग: ' छन्दसि ' इति ज्ञायते ' | उस छान्दस - सूत्रका उदाहरण ' होतव्यं दीक्षितस्य गृहा ३६ न होतव्यमिति ' यह ब्राह्मणभाग ( तैत्तिरीयारण्यक ३१२१४ ) का ही दिया गया है । इससे मन्त्रभागकी व्याख्या होने पर भी ब्राह्मणभाग के Gujarat. An स eGangotri ० घ ० ११ Initiative
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१६२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) वेदत्वमें कोई क्षति नहीं आती । शब्द एवं अर्थका सम्बन्ध नित्य होने से अर्थ भी शब्द ही होता है । द.ज. शताब्दी में प्रकाशित, संस्कृत में अनूदित स.प्र.को स.प्र. ही माना जाता है । यद्यपि शब्द और अर्थ अभिन्न होते हैं; फिर भी जब अर्थको पृथक् बताना पड़ता है तब उसे भी दूसरे शब्द से ही कहना पड़ता है । इस प्रकार जब ऋषियोंको समाधि द्वारा वेद के मन्त्रभागके मूल शब्द मिले, वैसे ही वेद के ब्राह्मणरूप अर्थके भी दूसरे मूल शब्द ही मिले । अतः दोनों का ही मूल - वेद होना स्वाभाविक है । वास्तवमें ब्राह्मणभाग मन्त्रभागकी अनुवादरूप व्याख्यामात्र नहीं; बल्कि उसका उपबृंहक एवं शेषपूरक भी है । इस पर हम दो आर्यसमाजी विद्वानों की सम्मति भी देते हैं । पहले श्रीराजाराम -शास्त्रीका मत उनके अथर्ववेदभाष्यकी भूमिका के १६ पृष्टसे देते हैं । ' वे लिखते हैं- ' कालकी दृष्टिसे मन्त्रोंके सबसे पुराने व्याख्यान ब्राह्मणग्रन्थ हैं । उनका मुख्य विषय यज्ञोंकी प्रक्रिया और उनके फलोंका वर्णन है; न कि मन्त्रोंका व्याख्यान । तथापि प्रसङ्गसे कई मन्त्रों वा मन्त्रखण्डों वा पदोंका व्याख्यान भी उनमें पाया जाता है, और यह भी कि उनमें कई मन्त्रोंके विनियोग से भी मन्त्रार्थ पर प्रकाश पड़ता है ' । इससे सिद्ध हुआ कि ब्राह्मणभाग में मन्त्रभागका कहीं प्रासङ्गिक व्याख्यान है, वह नियमसे अनुवादग्रन्थ नहीं; किन्तु मन्त्रभागका परिबृ हक वा शेषपूरक है; इस विषय में हम कट्टर आर्यसमाजी श्रीब्रह्मदत्तजी जिज्ञासुका मी मत उनकी ' यजुर्वेद भाष्य विवरणभूमिका ' CC - 0. Ankur Joshi Collection अन्य तर्कोंका समाधान १६४ ( प्रथमसंस्करण पृ. ४६-४७ ) से देते हैं — ' वह होते हुए भी हम इन्हें [ ब्राह्मणग्रन्थों को ] वेदके भाग्य नहीं कह सकतेः हां, वेदार्थापवृक्ष श्रौतस कह सकते हैं... वेदार्थके सीधे प्रतिपादक नहीं ।.....आरण्यक है । प उपनिषत् मी साक्षात् वेदोंके भाष्य नहीं कहे जा सकते; अन बोधा वेदके भाग्य नहीं ' | सामव जब ऐसा है; तो प्रतिपक्षियोंका इनके मन्त्रभागके व्याख्यान नहीं होनेसे आक्षिप्त अवेदत्व कट गया । व्याख्यान उसे माना भी जाने, तो क्या ‘ ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका ' के स्वा. द. जी से किये हुए हिन्द है । अनुवादको ' ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका ' नहीं माना जावेगा? ‘ सत्यार्क भी वे प्रकाश'के श्रीशिवशङ्करकाव्यतीर्थैसे किये गये हुए संस्कृत - अनुवाद क्या ' सत्यार्थप्रकाश ' न कहा जावेगा? यदि उस अनुवादको में गया वही कहा जायगा; तो वेदका उसीके प्रवर्तक से किया हुआ व्याख्यार यह श्रीहर ब्राह्मण भी वेद ही कहावेगा ।( २१ ) भाषा ब्राह्मणभागकी अवेदता में प्रतिपक्षियोंसे दिये जाते हुए जैसे-उनसे प्रवल समझे जाते हुए तर्क हमने सब खण्डित कर दिये संकु पर आजकल कई स्वा. द. जीके सिद्धान्तानुयायी नवीन - अनुसन्धाः यह प ऐतिहासिक दृष्टि से अपने विचारोंको उपक्षिप्त करके ब्राह्मणभा सर्वस अवेद सिद्ध करना चाहते हैं । वे जानते हैं कि पुराने तर्कों -ि ब्राह्मर हम समाहित कर चुके हैं — उन तर्कोंमें कोई दम नहींः अतः वे कई बातें कहते हैं । वह हम देते हैं-( ४३ ) पूर्वपक्ष - " ब्राह्मणभाग वेद है - इस बातका प्रधाना बन Carat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) १६४ भी इष ' मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् ' यह प्रसिद्ध - वचन पह श्रौतसूत्रकारोंका है । पर यह वचन कृष्णयजुर्वेदके श्रौतसूत्रों ( आपस्तम्ब, सत्याषाढ-आरण्य बोधायन आदि ) में मिलता है । शुक्लयजुर्वेद तथा ऋग्वेद-अर्थात् सामवेदादिके शांखायन, कात्यायन, द्राह्यायण लाट्यायन श्रौतसूत्रों में नहीं मिलता । उसका कारण खोजनेपर यह स्पष्ट हो जाता है व्याख्यान कि कृष्णयजुः की शाखाओं में मन्त्रोंके साथ ब्राह्मणोंका संमिश्रण मी लाने है । मन्त्रों का वेदत्व तो पहले लोक- प्रसिद्ध था; अतः उनके सूत्रोंमें हिन्दी तो वह वचन नहीं था; पर ब्राह्मणों की वेद प्रसिद्धि न होने से उनके • ' सत्यार्क मी वेदत्व - साधनार्थं ' मन्त्रत्राह्मणयोर्वेदनामधेयम ' यह सूत्र बनाया अनुवादको गया । इस प्रकार बनाने पर भी चिरकाल तक अनेक आचार्योंने वादको म यह मत नहीं माना । इसलिए आपस्तम्बसूत्रके व्याख्याता व्याख्यान श्री हरदत्त तथा उससे भी पूर्ववर्ती धूर्त - स्वामीने लिखा है-' कैश्चिन्मन्त्राणामेव वेदत्वमाख्यातम् ' । और फिर यह सूत्र परि-भाषासूत्र है । परिभाषाएँ तब बनती हैं- जब लोक - प्रसिद्ध न हों; हुए जैसे - अदेङ् गुणः ' आदि । और वे परिभाषाएँ उस शास्त्रमें कर दिये । संकुचित होती हैं; अन्यत्र नहीं । तब ' मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् ' अनुसन्धा यह परिभाषा उन सूत्रों में वा यज्ञमें ही नियत है, सर्वत्र नहीं; अतः झणभाक सर्वसम्मत भी नहीं । जहाँ याज्ञिक ग्रन्थोंमें भी ' वेद ' शब्द से तर्कों - बिरे ब्राह्मण भी गृहीत किया गया है, वहाँ याज्ञिक प्रभाव ही कारण ई है । अथवा व्याख्या - ग्रन्थों में व्याख्येय ग्रन्थके नामका उपचार हुआ करता है, इसलिए व्याख्या प्रन्थ होने से ब्राह्मण व्याख्येय मानाव वेदके उपचारसे ही वेद कहे गये हैं, वस्तुतः नहीं " । CC - 0. Ankur Joshi नवीन तर्कपर विचार १६२ उत्तरपक्ष – ' आलोक'- पाठकोंने देख लिया कि यहाँ कितने व्याज किये गये हैं । इस विषय में हम पूर्व बता चुके हैं कि-आपस्तम्बादिने यह कोई नयी परिभाषा नहीं बनाई, किन्तु सिद्ध बात का अनुवाद कर दिया है । यहाँ यह नहीं लिखा कि- ' मन्त्र-ब्राह्मणकी वेद - संज्ञा हो जावे ' किन्तु ' मन्त्र और ब्राह्मणोंका वेद नाम प्रसिद्ध है ' - यह लिखा है । यदि मन्त्रों की पहले वेद - संज्ञा थी, और ब्राह्मणोंकी नहीं थी; और नये सिरेसे उनकी वेद - संज्ञा की गई; . तो फिर ' मन्त्र ' शब्दको साथ क्यों रखा गया? ' एकयोगनिर्दिष्टानां सह वा प्रवृत्तिः, सह वा निवृत्तिः ' यह एक परम - प्रसिद्ध न्याय है । यदि पहले से वेदत्व होगा; तो दोनों का ही होगा; नहीं होगा तो दोनों का ही नहीं होगा । मन्त्र और ब्राह्मणका इतरेतरयोगद्वन्द्व वादीके सब व्यानोंको काट देता है । यदि दोनों परस्पर - निरपेक्ष होते; तो दोनोंका द्वन्द्व न होता । ' सत्याषाढ- श्रौतसूत्र ' में कहा गया है — ' यज्ञं व्याख्यास्यामः, स . त्रिभिर्वेदैर्विधीयते । मन्त्र - ब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् ' ( १११ ) यहाँ पर यज्ञका तीनों वेदोंसे विधान बताया गया है; और वेद, मन्त्र - ब्राह्मण दोनों-का नाम कहा गया है । अब वादी समझें कि जब उनके अनुसार कृष्णयजुःसे भिन्न अन्य वेदोंमें ब्राह्मणोंका मिश्रण नहीं; तब श्रौतसूत्रकारने तीनों वेदोंके अनुसार मन्त्र- ब्राह्मणोंको बेद क्यों कहा? इससे स्पष्ट है कि- केवल कृष्णयजुर्वेद में नहीं; किन्तु तीनों अथवा चारों वेदोंके जब मन्त्र एवं ब्राह्मण भिन्न - भिन्न हैं; तब भी सभी वेदोंके मन्त्र - ब्राह्मण मिलकर ही वेद हुआ करता है । तब Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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नवीन तर्कों पर विचार १६६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) १६० ' केवल यह बात कृष्णयजुर्वेद में है, और कृष्णयजुर्वेदकेलिए लागू है, ' अन्य वेदोंके लिए नहीं ' यह वाद्वियोंका व्याज निर्मूल सिद्ध हुआ । यदि वादी मन्त्रभागको वेद मानते हैं; तो कृष्णयजुर्वेदके मन्त्रभागको भी वे वेद क्यों नहीं मानते? इससे स्पष्ट है कि - कृष्ण-यजुर्वेदको वेदत्व से हटाने के लिए यह उनके हथकंडे हैं । यदि शुक्लयजुर्वेदका वेदत्व पहले प्रसिद्ध था; कृष्णयजुर्वेद में ब्राह्मणके मिश्रण से उसके वेदत्व प्रसिद्ध न होनेसे नये सिरे से उसके लिए उक्त वचन कहा गया तो यह सर्वथा गलत है । ऐति-हासिक दृष्टिसे कृष्णयजुर्वेद पहलेका है, शुक्लयजुर्वेद पीछे का । इसमें याज्ञवल्क्यका इतिहास प्रसिद्ध है । प्रतिपक्षी कृष्णयजुः का यज्ञादि - कर्मकाण्ड से सम्बन्ध भी अधिक बताते हैं, तो यह नहीं हो सकता कि- पहलेका वेदत्व प्रसिद्ध न हो, और पिछलेका वेदत्व अपने - आप होगया हो । और जब प्रतिपक्षी यह भी मानता है कि-कृष्णयजुर्वेद में भी मन्त्रभाग है, तो मन्त्रभाग तो वादीके कथनसे पूर्व से ही वेद प्रसिद्ध था; तो ' मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् ' यह दोनोंकी वेद - संज्ञा कैसे कही गयी? असत्यके पैर नहीं हुआ करते । वस्तुतः कृष्णयजुर्वेद के शुक्लयजुर्वेद की अपेक्षा ऐतिहासिक दृष्टिकोण में पूर्व होनेसे कृष्ण में मन्त्र और ब्राह्मण दोनोंके वेद प्रसिद्ध होनेसे पीछेके शुक्लयजुर्वेदके कल्पसूत्रोंमें अव उस. पूर्वसिद्धं बातको उठानेकी आवश्यकता नहीं थी, इसी कारण उन ( शुक्लके सूत्रों ) में उक्त सूत्र सर्वसाधारण रूपसे नहीं पढ़ा गया उसमें ब्राह्मणके अवेदत्वका कारण सर्वथा नहीं है । शुक्ल यजुर्वेद में भी ब्राह्मणका मिश्रण है, यह उवट - महीधरादि । बहुतोंने लिखा ही है, हाँ, कम है; पर है अवश्य ही । इस कारण उसको प्रमुखता से नहीं गिना जाता । संहिताके अन्तर्गत होनेसे ही । उसको यजुः माना जाता है । तैत्तिरीय संहिता में ब्राह्मणभाग है, फिर भी उसे ‘ तैत्तिरीयसंहिता ' अथवा कृष्ण यजुर्वेद ही कहा जाता है । संहिता केवल मन्त्रभागको ही कहा जाता है; फिर भी संहिता के अन्तर्गत ब्राह्मणको भी मन्त्र मान लिया जाता है । इसका एक उदाहरण देखिये | श्रीयास्क ‘ अनर्थका मन्त्राः ' मन्त्रभाग की अनर्थकता आलो. चित कर रहे हैं; उसमें ' अग्नये समिध्यमानाय अनुब्रूहि ' यह ' उद्धरण दिया गया है, यह कृष्णयजुर्वेदीय - मैत्रायणी संहिता-( १ | ४ | ४५ ) स्थित ब्राह्मणभागका है, फिर भी इसे मन्त्र एवं संहिता कहा गया है । इस प्रकार प्रकृत में भी समझ लेना चाहिये । शुक्लय.सं. में स्थित ब्राह्मणको भी किन्हीं का ऋक् यजुः, कहने से प्रतिपक्षीय पक्ष सिद्ध नहीं हो सकता । ' शतपथ ' के ब्राह्मण होनेपर भी उसे अन्तमें ' यजूंषि ' ही तो कहा है । ' अङ्गादङ्गात् सम्भवसि ' यह शतपथब्रा. में होनेपर भी श्रीयास्कने इसको ' ऋक ' कहा है । तब ' प्रतिपक्षीका यह परिश्रम व्यर्थ है । बांदीके अनुसार सामवेद और अथर्ववेद में ब्राह्मणका मिश्रण नहीं; किन्तु उनके ब्राह्मण पृथक् हैं; फिर अथर्ववेद के सूत्रकारने यह क्यों कहा — आम्नायः पुनर्मन्त्राश्च ब्राह्मणानि च ' ( कौशिकगृ १।३ ) यहाँ तथा अन्यत्र बहुत स्थलों पर दोनोंकी वेदता क्यों कही र गई, जैसाकि हम गत १०५ पृष्ठसे ११३ पृष्ठ तक दिखला चुके हैं । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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१६० श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) १६८ श्रीधरादि सत्याषाढ- श्रौतसूत्र ने तीनों वेदोंसे यज्ञ माना, और फिर तीनों के कारण मन्त्र त्राह्मणको - वेद लिखा- हम इसका उद्धरण पूर्व दे चुके हैं । तो होनेसे ही क्या ऋकूं साममें भी ब्राह्मणभागका मिश्रण था; जो कि उसे तीनों है, फिर बेदकेलिए - ‘ मन्त्रब्राह्मणयोर्वेद - नामधेयम् ' कहना पड़ा? क्या ता है । निरुक्ककार, पाणिनि, पतञ्जलि आदि प्राचीन विद्वान् कृष्णयजुर्वेदी, संहिता के वा वेद - विषयके अज्ञाता थे; जो कि उन्होंने मन्त्र ब्राह्मण दोनोंको दाहरण तथा कृ.य. तैत्तिरीयसं. को वेद माना? वस्तुतः वादियोंके अपने आलो निर्मल पक्ष के बचाव के लिए यह कुतर्कमात्र हैं । ' परिभाषाके उदाहरणमें ' अदेङ् गुणः ' आदि सूत्र रखना मी संहिता • ठीक नहीं; यह संज्ञा - सूत्र हैं, परिभाषासूत्र नहीं । तब आपस्तम्ब-- संहिता आदियोंके ‘ मन्त्रब्राह्मणयोर्वेद - नामधेयम् ' को ' परिभाषा ' यह लय - सं. ' नाम ' कैसे दिया जाता है? यदि यही संज्ञाएँ लोकप्रसिद्ध न होने पक्षीय से बनाई गई, तो पाणिनि से प्रोक्त संहिता और पद आदि संज्ञाएँ मी उसे ' परः सन्निकर्षः संहिता, सुप्तिङन्तं पदम् आदि यह भी क्या ' यह लोकप्रसिद्ध नहीं थीं, जो कि पाणिनिने संज्ञाप्रकरण में पढ़ीं? तब अतः यह कथन भी व्यर्थ है । यही बात मानी जावे तो ' मन्त्र-ब्राह्मणयोः ' यह इकट्ठा कहने से ' मन्त्र ' की वेदसंज्ञा भी लोक - प्रसिद्ध • मिश्रण नहीं माननी पड़ेगी । अतः प्रतिपक्षी उभयतःपाशा रज्जुःसे बँधा कारने हुआ है, उसका कारण यह है कि वह एक शास्त्रसम्मत प्रसिद्ध शिकगृ. बातको काटना चाहता है, इसके फलस्वरूप स्वयं वह बँधेगा ही । यों कही यह संज्ञा केवल कृष्णयजुर्वेद में है; तो कात्यायन के शुक्ल-चुके हैं । · यजुर्वेदके ' प्रतिज्ञापरिशिष्ट ' में कैसे है? उसे पीछे का मानना वा नवीन तर्कों पर विचार १६६ उसमें अन्यका मत मानना तो " अपने पक्षकी दुर्बलताका प्रकाशन ही है । क्या पाश्चात्य लोग ऋग्वेदसं. के प्रथम- दशम मण्डलको अर्वाचीन बतानेकी युक्तियां नहीं दिया करते? शुक्लयजुर्वेद के सूत्रोंमें ' मन्त्रत्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् ' यदि यह सूत्र नहीं मी मिलता; तो क्या हुआ; उनमें तथा अन्यत्र भी सर्वत्र ब्राह्मणभागको वेद माननेका व्यवहार तो है ही, और शुक्लयजुर्वेदके सारे सूत्र भी क्या मिलते हैं कि सभी में वादीको ' मन्त्रत्राह्मणयो: ' यह सूत्र नहीं मिलता? और प्रतिपक्षीने उन अनुपलब्ध सूत्रोंकों क्या देख लिया है? ' कैश्चिद् मन्त्राणामेव वेदत्वमाख्यातम् ' इस धूर्तस्वामीके वचनसे मी वादीकी इष्टसिद्धि नहीं, ' कैश्चिद् ' कहनेसे उस मतकी एकदेशिता तथा उस मतमें वादीसे सम्मानित धूर्तस्वामीकी भी रुचि स्पष्ट है । इससे मन्त्र ब्राह्मण दोनोंका वेद होना ' केषाञ्चिद् ' नहीं, किन्तु ' सर्वेषाम् ' इष्ट होनेसे यह सार्वदेशिक व्यवहार सिद्ध हुथा । जो कई केवल मन्त्रोंको वेद मानते भी हैं; वैसा कथन ' समुदायेषु हि शब्दाः प्रवृत्ता अवयवेष्वपि वर्तन्ते ' इस न्याय से है । इसी न्यायसे कई केवल ब्राह्मणभागको ही वेद कहते हैं, क्योंकि चोदनाएँ ( विधि - वाक्य ) इसी में हैं । यदि केवल मन्त्रों को ही वेद कहनेका मत सर्वमान्य होता; तो धूर्तस्वामी उसकेलिए ' कैश्चित् ' न कहते, किन्तु ' सः ' कहते, यह अत्यन्त स्पष्ट है. इसपर टिप्पणी करनेकी आवश्यकता नहीं । वादिप्रतिवादिमान्य श्रीपाणिनि, श्रीपतञ्जलि तथा श्रीयास्क आदि सभी तैत्तिरीयसंहिता आदिको तथा ब्राह्मण मागको भी तो CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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१७० श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) वेद मानते हैं - यह हम पहले कह चुके हैं, इनपर याज्ञिक प्रभाव बताना तो इनकी श्रविद्वत्ता बताना है, जो कि सर्वथा अक्षम्य है । जबकि वेदका विषय ही यज्ञ है; यह हम पूर्व बता चुके हैं; तब याज्ञिक - सम्प्रदाय कोई नया थोड़े ही होगा! जब ऐसा है; तो उसमें याज्ञिकता सदा होनेसे ब्राह्मणभागकी वेदता भी सदा से ही है । यज्ञके व्यापक अर्थ भी माने जा सकते हैं; तब याज्ञिकतासे डरने की भी आवश्यकता नहीं । वेदमें अन्य वाद याज्ञिकतासे अर्वाचीन हैं; याज्ञिकता ही सर्वतः प्राचीन और वास्तविक है । वस्तुतः यह वादीके पक्षकी निर्मूलता है, जो कि वह पहले तो प्रतिज्ञा करते हैं कि - यह बात कृष्णयजुर्वेद के सूत्रोंमें हैं; शुक्लके सूत्रों में नहीं । जब शुक्लके सूत्रोंमें भी अपने पक्षका खण्डन देखते हैं; तो फिर निस्सार युक्तियां देकर उनको अर्वाचीन सिद्ध करनेका प्रयत्न करते हैं । यदि किसी श्रौत सूत्रमें जहां उक्त सूत्र मिले, उसका सम्बन्ध शुक्लयजुर्वेदसे माना गया हो; तो वे उसे मानने के लिए तैयार नहीं होते । जब वे तटस्थ - ग्रन्थोंमें भी: मन्त्र - ब्राह्मण दोनोंका वेदत्व देखते हैं; तो उसमें याज्ञिक प्रभाव बताते हैं । जब अन्यत्र भी ब्राह्मणभागका वेदत्व वे देखते हैं; तो वहां व्याख्येय - प्रन्थका उपचार अपदिष्ट करते हैं । यह सब उनके ही पक्षकी शिथिलता के प्रमाण हैं । जब वे निष्पक्ष दृष्टि रखकर अन्य भी अधिक अनुसन्धान करेंगे, तो उन्हें मन्त्रभागकी भांति ब्राह्मणभाग भी पुराकाल से ही वेद दीखेगा । ब्राह्मणभागको वेद न मानने का बड़ा प्रयत्न श्रार्यसमाजका है, aala aur विचार 201 उसका कारण यह है कि- वैसा मानने से एक उनके तथाकथित अर्वाचीन सिद्धान्त कटते हैं, दूसरा उन्हें सनातन धर्म के सिद्धान्त फिर मन्तव्य हो जाते हैं -- जिससे उनके अब तक के परिश्रम । पर पानी फिर जाता है; अतः वस्तुतः उनका वेदकी सीमा संकुचित करनेका यह एक बड़ा भारी षड्यन्त्र है । कुछ वे ऐसा मानने पर विदेशियोंसे भी डरते हैं, जिन्होंने ब्राह्मणभागपर कई हिंसा आदि के दोष लगा रखे हैं । पर यह याद रखने की बात है कि जो कुछ ब्राह्मणभागमें है, वही मन्त्रभागमें भी है । यदि उनका अर्थ वे मन्त्र भागमें बदलते हैं; वैसे ब्राह्मणभाग में भी बदल सकते हैं । तद फिर परम्परासे आये हुए एक सिद्धान्तको लोकदृष्टि से हटवाने असत्य व्यवहार तथा तज्जन्य पाप अपने सिर पर लादना ठीक नहीं । यह ठीक है कि- मन्त्रभाग और है, और ब्राह्मणभाग और | ब्राह्मणभागको मन्त्रभाग नहीं कहा जाता, मन्त्रभागको ब्राह्मणभाग; परन्तु वेद दोनों ही हैं । ( ४४ ) जोकि - यह कहा जाता है कि जो स्वयं वेदकी प्रतीक देकर उसकी व्याख्या करता है, वह ग्रन्थ स्वयं वेद कैसे हो सकता है '? यह आक्षेप भी अज्ञान से है । इस प्रकार तो व्याकरणकी प्रतीक लिखकर उसकी व्याख्या करनेवाला ' महाभाष्य ' भी व्या करण कैसे कहा जा सकेगा? पर कहा जाता है । यदि कहा जाने कि- ' वह व्याकरणकी प्रतीक नहीं, किन्तु अष्टाध्यायीकी है, ' तो इस प्रकार वह प्रतीक भी मन्त्रभागकी है, वेदकी नहीं । व्याकरणकी तरह वेद भी कोई स्वतन्त्र पुस्तक नहीं । सो मूल अष्टाध्यायी है, CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) १७१ १७२ तथाकथित व्याख्या महाभाष्य है, महाभाष्यको अष्टाध्यायी नहीं कहा जाता है, सिद्धान और अष्टाध्यायीको महाभाष्य नहीं, पर व्याकरण दोनों ही हैं, रिश्रम पर इस प्रकार मन्त्रभाग, ब्राह्मणभाग नहीं; और ब्राह्मणभाग मन्त्र-संकुचित भाग नहीं, पर वेद दोनों हैं । यदि मूलको ही वेद माना जावेगा, मानने पर उसके समानकर्तृक - अनुवाद ब्राह्मणको वेद नहीं माना जावेगा, सादि तो ' ब्रह्मदो ब्रह्मार्ष्टिताम् ' ( ४।२३० ) इस मनुवचनमें वेदका दान जो कुछ देनेवालेको जो ब्रह्मलोक की प्राप्ति मानी गई है,. वह वेदकी मूल ' वे मन्त्र पोथीमात्रका दान देना ही वादियोंसे उस फलके देनेवाला माना हैं । जावेगा; वेदके अर्थदाताको उस फलको प्राप्त करनेवाला नहीं इटवानेका • मानना पड़ेगा । दना ठीक हमारा ' श्रीसनातनधर्मालोक ' महाग्रन्थ संस्कृत में है, उसका हारणमाग हम ही स्वयं हिन्दी अनुवाद प्रन्थमाला के रूपमें प्रकाशित कर रहे त्रभागको हैं; तो क्या यह ' श्रीसनातनधर्मांलोक ' नहीं माना जावेगा? अवश्य माना जावेगा । संस्कृत - हिन्दी दोनोंका समुदाय भी ' श्रीसनातन-की प्रतीक धर्मालोक ' माना जावेगा; उसका पृथक् - पृथक् संस्कृत और हिन्दी सकता अनुवाद भी ' श्रीसनातनधर्मालोक ' ही माना जावेगा, क्योंकि-किरणकी समुदायवाचक शब्दोंकी अवयववाचकता भी हुआ करती है । इसके भी व्या उदाहरणमें पाठक ' पुत्र ' शब्दको ही देखें । वह माता - पिता दोनों के कहा जा समुदाय से उत्पन्न होता है । अब वह चाहे अपने पिताका नाम कहे कि मैं ' दाशरथि ' लक्ष्मण हूँ; वा माताका नाम कहे कि -'मैं नाकरणको ' सौमित्रि ' लक्ष्मण हूँ, वा दोनोंका नाम कहे । इससे अवयव परकता नयी है । वा समुदायवाचकता में कोई क्षति नहीं पड़ती । CC - 0. Ankur Joshi अन्य पर विचार १७३ Collection Gujarat. यदि प्रतीकें रखने से त्राह्मणभागको वेद न माना जावे; तो शुक्लयजुर्वेदसं - में ' न तस्य प्रतिमा अस्ति ' ( ३२ ३ ) इस मन्त्र के साथ ' हिरण्यगर्भ इत्येषा ( २५।१०-१३ ) ' मा माहि सीरित्येषा ' ( १२/१०२ ) ' यस्मान्न जात इत्येषा ' ( ८३६-३७ ) इन तीन प्रतीकों को किसी यज्ञमें यहाँ बोलनेकेलिए रखा गया है । इस प्रकार ३३३२१ में ' तं प्रत्नथा, अयं वेनः ' इत्यादि अन्य स्थलकी प्रतीके हैं । वादियोंके स्वामीने भी अपने भाष्य में यहाँ पर यज्ञ - कर्म में बोलने के लिए इनका यहाँ रखना माना है, अपने माध्यकी टिप्पणीमें उनने बहुत्र लिखा है-' तं प्रत्नथा, अयं वेनः ' ये दां प्रतीकें यहाँ किसी कर्मकाण्ड - विशेष में बोलनेके अर्थ रखी हैं ' तो फिर वादियोंके अनुसार यजुर्वेद भी वेद नहीं रहेगा । क्या वादी ऐसा मानने को तैयार हैं? यदि नहीं; तब इससे ब्राह्मणभाग में भी मन्त्रको प्रतीकोंके रखने से उसके वेदत्व में क्षति नहीं होती । ( ४५ ) जोकि कहा जाता है- ' मन्त्रब्राह्मणयोवेदनामधेयम् ' यह कात्यायन श्रौतसूत्रके प्रतिज्ञापरिशिष्टमें होने से, परिभाषा - प्रकरण में न होने से इसके कर्ताको मतान्तर दर्शानामात्र अभिप्रेत है, अपना ' अभिमत नहीं ' यह व्याज भी ठीक नहीं । ( क ) यदि यह परिभाषा-प्रकरण में मिले; तब वादी उस परिभाषाको वहीं संकुचित मानते हैं । जब परिभाषा - प्रकरण में नहीं हो, तब तो बादीके अनुसार भी सिद्ध हो रहा है कि यह सार्वत्रिक प्रतिज्ञा ( नियम ) है । ( ख ) प्रतिज्ञा-परिशिष्ट में होने पर वह बिना ' एके ' ' केचित् ' आदिके कहने से दूसरेका मत कैसे हो सकता है? हो भी सही; तो वह श्रीकात्यायनको An eGangotri Initiative
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१७४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ' परमतमप्रतिषिद्ध - मनुमतम् ' इस न्यायसे अनुमत ही है; अन्यथा शुक्लयजुर्वेदका श्रौतसूत्रकार वादी के अनुसार उसका खण्डन करता । पर नहीं किया । ( ग ) परिशिष्ट मी उसी कर्ताके होते हैं, जैसेकि - श्राजकल भी लेखक अपनी पुस्तकके अन्त में परिशिष्ट रखते हैं, वह अन्यकर्तृक, वा अन्यका अभिमत नहीं हो जाता । ( घ ) स्वा. द. जीने भी ' मृतश्चाहं पुनर्जातः ' इत्यादि निरुक्तके पुनर्जन्म - साधक परिशिष्ट - चचनको अपनी ऋ.भा.भू.में श्रीयास्कका ही वचन तथा मत माना है, किसी दूसरेका मत दर्शाना नहीं माना । ( ङ ) ऋकूपरिशिष्टके ' भद्रं वद दक्षिणतः ' आदि मन्त्रोंको निरुक्त ( ६/५/१ ) में ' ऋचा ' ( वेद ) ही माना गया है, मतान्तर दर्शाना नहीं । ( च ) वादी लोग भी ' तर्क-मृषिं प्रायच्छन् ' इस निरुक्तके परिशिष्ट - वचनको निरुक्तका ही कहते हैं; मतान्तर दर्शाना नहीं मानते । सो वादियोंकी इस प्रकारकी बातें निसार हैं, इनका कुछ भी मूल्य नहीं । उक्त वचन ऋ.भा.भू.के स्वा.द.के वचनानुसार शुक्लयजुः - श्रौतसूत्रकार श्री-कात्यायनका ही है, ' भ्रमोच्छेदन ' के स्वाद के अनुसार अन्यका वचन यह नहीं । सो मन्त्र - ब्राह्मण दोनों सदासे ही वेद सिद्ध हैं, वैसा ही यास्क, पाणिनि, पतञ्जलि आदि वादिप्रतिवादिमान्य सभी विद्वान् मानते हैं; अतः इसी सिद्धान्तका मानना ही ठीक है; क्योंकि-यही सिद्धान्त वास्तविक हैं । कृत्रिम सिद्धान्तोंका अवलम्बन लेने पर उनमें कोई - न - कोई त्रुटि निकल ही आती है । मन्त्र एवं ब्राह्मण CC - 0. Ankur Joshi CollectionVaat. अन्य पर विचार १७६ अर्थात् ११३१ संहिता तथा ब्राह्मण दोनों भाग मिलकर चाहि वेदका स्वरूप बन जाता है - यह हमने दिखला दिया । ही म भी भ ( ४६ ) अन्त में हम शाखा सम्बन्धी एक बात पर विचार इस बृहत् - निबन्धको समाप्त करते हैं-( पूर्वपक्ष ) बादी कहता है — ' तदु हैकेऽन्वाहु: - " ' होता यो ि मन्त्रों वेदसः ' इति, नेदरमित्यात्मानं ब्रुवाणीति, तदु तथा मन्त्र मानुषं ह ते यज्ञे कुर्वन्ति । तस्माद् यथैवचनूतमेव अनुत्रष भी क होतारं विश्ववेदसम् - इति ' ( शतपथ. १ | ४ | १ | ३५ ) अर्थात् माणम शास्त्रावाले ‘ होतारं विश्ववेदसम् ' ( ऋ. १।१२।१ ) इसके स्थान है वाय यो विश्ववेदसः ' ऐसा पढ़ते हैं; यह मनुष्यकृत पाठ है, इससे पारतनि की हीनता है ' । इससे दो बातें सिद्ध हैं कि शाखाएँ सब मह हैं, दूसरा कोई ऋक्पाठ ऐसा है, जिसमें मनुष्यका कोई सम्बन जसे कि नहीं, और वही मूल वेद है ' । की । उत्तरपक्ष - जिन्हें वादी मूल - वेद मानते हैं, वे भी क्रम होता ह शाकल्य, वाजसनेयी, कौथुमी, शौनकी संहिताएं ही हैं । स होता संहिता ११३१ होती हैं । संहिताओं का यह प्रकार है कि - से एवं त्य ब्राह्मण सभी अपने - अपने पाठको ही युक्त मानते हैं, अन्य संदि कथन स के पाठको ' मानुष ' कहते हैं । उसे मनुष्य - रचित बताना उ पाठ वा निन्दार्थ नहीं होता; किन्तु अपने यज्ञों में अपनी ही संहियों तो ' शत मन्त्रपाठसें तात्पर्यं होता है— ' नहि निन्दा निन्द्यं निन्दितुं प्रवी प्राहुः अपि तु विधेयं स्तोतुम् ' यह न्याय है । इससे अपनी ही प कहा ग संहिताओं ( जिसे स्व- अध्याय स्वाध्याय, कहते हैं ) में निष्ठा कार ( १०/६५ An eGangotri Initiative