सनातन धर्मलोक ६ — पृष्ठ 111–120
सनातन धर्मलोक ६ · पृष्ठ 111–120
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१६६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) १३५ | ' गायत्री वा । एकादशवर्षं राजन्यम् द्वादशवर्ष वैश्यम् ' ' वें वर्ष में ब्राह्मण का टकिल्विषः तथा ११ वें में क्षत्रियका तथा १२ वें वर्ष में वैश्यका यज्ञोपवीत होता सिद्ध है । है ' यह सर्वतन्त्र - सिद्धान्त है, वादी - प्रतिवादी सबसे माझ्य है । वचन इसे पारस्करगृह्यसूत्र ( २।२।१-२-३ ) में मी उद्धृत तथा मान्य किया यामि । गया है, आपस्तम्बगृ. ( ४।१०११-२-३ ) द्राह्यायणगृ. ( ३ | ४ | १-३-५ ) थर्ववेदवे मैं भी | जैमिनिगृ. ( १-१२ ) ने भी इसे उद्धृत किया है, गोमिलगृ. ' द्विज ' २।१०।१-२-३ ) ने भी । वसिष्ठधर्मसूत्र ( ११।४४ ) तथा मनुस्मृति इसीलिए ( २।३६-३७ ) ने भी इसे अनूदित किया है । व्यासस्मृति ( १।१६ ) वचनमे शङ्खस्मृति ( २ अ. ) तथा याज्ञवल्क्यस्मृति ( आचाराध्याय १० ) और त्री के एक बाढ़ीके श्रद्धेय स्वा.द.जीने ( सं. वि. उपनयनप्र. ) में भी इसे उधृत एका भी किया है | उससे ' यस्तु अप्रमत्तगीत:; तत् प्रमाणम ' महाभाष्य के पस्पशाह्निकस्थ पारस्कर इस वचनसे इसमें सबका ऐकमत्य होने से प्रमाणता ही है; क्योंकि कहा है । यह सभी ऋषि - मुनि प्रमत्त नहीं बन सकते । ' सौ सयाने एकमत ' ( शश २८ ) ' व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन! ' ( गीता २।४१ ) यह कहावतें कहा है । प्रसिद्ध हैं । इनमें यह याद रखने की बात है कि - ब्राह्मण, क्षत्रिय, शुद्र वेदके वैश्यका तो उपनयन आदिष्ट किया गया हैं, उपनयन के वर्ष बताये गये हैं, उपनयनके छन्द बताये गये हैं; पर शुद्रका यह सभी कुछ नयन तथा नहीं बताया गया । उसके उपनयनका कोई वर्ष नहीं लिखा गया, देते हैं, कोई छन्द नहीं लिखा गया । यह क्यों? बस इसीसे वह वेदाधिकारसे वहिर्भूत सिद्ध है । , गर्भा इन तीन वर्णों यह वर्ष क्यों रखे गये हैं; इनमें शूद्रको वेदाधिकारि - विचार १६७ वेदाधिकार माननेवाले वादी कोई उपपत्ति नहीं दे सकते । पर शुद्रका अनधिकार माननेवाले हम इसमें उपपत्ति दे सकते हैं । वह उपपत्ति यही है कि यही तीन वर्ण द्विज होते हैं । द्विज कहते हैं कि - जिनकी दो उत्पत्ति होती हैं । द्वितीय उत्पत्तिका कारण उपनयन - संस्कार तथा सावित्री - मन्त्र - प्रदान है । जैसेकि - ' मातुर I-ऽधिजननं द्वितीयं मञ्जिबन्धने ' ( मनु. २।१६६ ) ' जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेयः संस्काराद् द्विज उच्यते ' ( अत्रिस्मृति ( ३८ ) ' हे जन्मनी द्विजातीनां मातुः स्यात् प्रथमं तयोः । द्वितीयं छन्दसां मातुर्ग्रहणाद् विधिवद् गुरोः । एवं द्विजातिमापन्नो ' श्रुतिस्मृतिपुराणानां मवेद् अध्ययनक्षमः ' ( व्यासस्मृति ११२२/२३ ) इसी प्रकार वसिष्ठ - धर्मसूत्र ( २।२-३ ) तथा शंखस्मृति ( २६ ) में भी कहा है । गृह्यसूत्रों में लिखा है- ' गायत्रीं ब्राह्मणाय अनुत्र यात्, त्रिष्टुम राजन्यस्य, जगतीं वैश्यस्य ' यह पारस्करगृ. ( २ | ३ | ७-८-१ ), मानवगृ. ( १२२३ ) और ऐतरेयत्रा. ( १/५/२८ ) आदि में कहा है । इसमें ब्राह्मणको द्विज करनेवाली गायत्री - सावित्री ( यजुः ३।३५ ), क्षत्रियको द्विज करने-वाली त्रिष्टुप -सावित्री ( यजु: १२/३ ), वैश्यको द्विजत्वार्थ जगती-सावित्री ( यजुः १७ | ७४ ) दी जाती है । यह मन्त्र सविताके होनेसे बुद्धिप्रद होते हैं 1 । सविता बुद्धिका देव है । ( ११ ) गायत्री - सावित्री मन्त्र के एक पादके ८ वर्ण हैं, और वह गायत्री - सावित्री ब्राह्मणको दी जाती है, इस कारण ब्राह्मणका गायत्री - ग्रहणार्थ उपनयन भी पवें वर्ष में होता है । उसके द्विगुण वर्ष १६ हैं; इसलिए ब्राह्मण की अन्तिम उपनयनावधि भी १६ वर्ष CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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185 श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) है - ' आषोडशाद् ब्राह्मणस्य अनतीतः कालः ' ( पार. २।५।३६ ) । त्रिष्टुप के एक पादके ११ वर्ण होते हैं; और त्रिष्टुप -सावित्री क्षत्रियको दी जाती है, इस कारण क्षत्रियका उस साविन्नीके ग्रहणार्थ उपनयन भी ११ वें वर्ष में होता है, उसका द्विगुण २२ वर्ष होते हैं, अतः क्षत्रियकी उपनयनकी अन्तिम अवधि भी २२ वर्ष है, जैसे कि-' श्रद्वाविंशाद् राजन्यस्य ' ( पार. २२५ ( ३७ ) । जगतीके एक पादके १२ वर्ण होते हैं । वह जगती - सावित्री वैश्यको दी जाती है, कारण जगती - सावित्रीके ग्रहरणार्थ उसका उपनयन भी १२ चें वर्ष में होता है । उसके द्विगुण वर्ष २४ होते हैं; अतः वैश्यको अन्तिम • उपनयनाबधि भी २४ वर्ष है । जैसेकि - ' चतुविशद् वैश्यस्य ' ( पार. २/५३८ ) । इन्हीं छन्दोंके वर्णोंसे इन तीनोंका नाम भी ' वर्ण ' होता है । इसके बाद गायत्री - सावित्री, त्रिष्टुप् -सावित्री, जगती-सावित्री ग्रहणका अधिकार नहीं रह जाता । ' अत ऊर्ध्व पतित-सावित्रीका भवन्ति ' ( पार. २/५/३६ ) और उन्हें व्रात्य कहा जाता है ( मनु. २३६ ) । अब देखिये इनमें कहीं भी शूद्रका नाम नहीं कहा गया । मनुस्मृति में व्रात्य ब्राह्मण ( १०।२१ ), व्रात्य - क्षत्रिय ( १०।२२ ) व्रात्य-वैश्य ( १०।२३ ) का नाम आया है, बात्य- शूद्रकी कहीं गंन्ध भी नहीं; तब वह उपनयन तथा वेदके अधिकारियोंमें परिगणित न होनेसे उसको वेदाधिकारका गन्ध भी प्राप्त नहीं । इन गायत्री, त्रिष्टुप, जगती छन्दोंसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यका दूसरी बार जन्म होता है; अतः इन्हें ' हिज ' कहा जाता है; पर शूद्रको कोई भी छन्द नहीं दिया CC - 0. Ankur Joshi Collection बेदाधिकारि - विचार २० गया; अतः वह एकज एवं अनुपय तथा वेदमें अनधिकृत मनु रहता है । इसीलिए वसिष्ठ - धर्मंसूत्र में श्रुति उधृत की गई है. उस ‘ गायत्र्या ब्राह्मणमसृजत्, त्रिष्टुमा राजन्यं जगत्या बै का न केनचित् छन्दसा शूद्गम् - इति असंस्कार्यो विज्ञायते ' ( ४ | ३ ) यां कहाँ गायन्नी, त्रिष्टुप्, जगती छन्दोंके एकपादके ८-११-१२ प निर ब्राह्मणादि वर्णोंका द्वितीय - जन्म कहा गया है, अतः उन छन्दों मनुष उपनयनवाले दिन द्वितीय - जन्म होने से ब्राह्मण - क्षत्रिय - वैश्यको ब्राह्म द्विज - त्रर्ण कहा जाता है; पर शुद्रका द्वितीय - जन्म किसी इन्द्र देवत नहीं कहा गया, अतः उसका द्वितीय जन्मका कोई प्रसङ्ग न हो वह द्विज न होकर ' एकज ' ही रह जाता और कहा जाता है । एक ( १२ ) इसकी अन्य उपपत्ति भी वादी देखें - ' वृहदारका देवत्र उपनिषद् में लिखा है- ' ब्रह्म वा इदमग्र आसीद् एकमेव ' ( १ | ४ | १ भुजा यहाँ पहले ब्राह्मणकी उत्पत्ति कही है – ' अग्निनैव देवेषु इसी ति अभवत्, ब्राह्मणो मनुष्येषु ' ( बृहदा. १ | ४ | १५ ) यहाँ ब्राह्म ५१११ अग्निके साथ उत्पत्ति बताई गई है, इसलिए ब्राह्मणको ' श्रा इन्द्रको कहा जाता है । जैसेकि - पारस्करगृह्यसूत्रमें - ' आग्नेयो वै ग्रङ्ग ' सर इति श्रुतेः ' ( २ । ३ । ७ ) । ‘ मुखादग्निरजायत ' ( यजुः ३१।१२ ) देवता, मुखसे अग्निकी उत्पत्ति बताई गई है । ' ब्राह्मणोस्य मुखम क्षत्रिय ( यजुः ३१।११ ) यहाँ मुखसे ब्राह्मणकी उत्पत्ति बताई गई । यजुर्वेद ' मुखाच्च योनेरग्निमसृजत् ' ( बृहदा. १ | ४ | ६ ) ' मुखमग्निः ' ( श्रीमह देवता २ । श २६ ) । सामवेद - ताण्ड्यमहाब्राह्राण में भी कहा है- ' समुह यहाँ पर मी बता वृतमसृजत्, तं गायत्री छन्दोऽन्वसृज्यत, अग्निर्देवता, Gujarat. An eGangotri Initiative
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२०० श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) अनधिकृत मनुष्यः ' ( ६ | १ | ६ ) यहां पर मुखसे ब्राह्मरणका, ब्राह्मणके साथ की गई है उसके अनुग्राहक अग्निदेवताका तथा उसके द्विजत्वकारक गायत्री त्या का जन्म बताया गया है । यही बात कृष्णयजुर्वेद ( तै. सं. ) में भी | ३ ) यहाँ कही गई है — ' प्रजापतिरकामयत प्रजायेयेति, स मुखतस्त्रिवृतं १-१२ व निरमिमीत, तमग्निर्देवताऽन्वसृजत, गायत्री छन्दः, ब्राह्मणो उन छन्द मनुष्यः । तस्मात् ते मुख्याः मुखतो हि असृज्यन्त ' ( ७ । १ । १ । ४ ) यहां - वैश्यको ब्राह्मणका सहचारी - छन्द गायत्री बताया गया है, तथा सहचारी किसी क देवता अग्नि बताया गया है । न हो अब आगे देखिये- बृहदारण्यक ' में लिखा है - ' तद् [ ब्रह्म ] जाता है । एक ँसद् न व्यभवत् । तत् श्रेयोरूपमत्यसृजत क्षत्रम्, यानि एतानि " बृहदारका देवना क्षत्राणि, इन्द्रो, वरुणः, सोम्यो रुद्रः, यमः ' ( १ | ४ | १० ) यहाँ ( १ ) भुजा से क्षत्रियके साथ इन्द्र देवताकी उत्पत्ति बताई गई है । देवे इसीलिए कहा जाता है- ' क्षत्र हि इन्द्रः, क्षत्रं राजन्यः ' ( शत. ५ | १ | १ | ११ ) ' इन्द्रादयो बाहव आहुरुस्रा: ' ( श्रीमद्भा. २१/२६ ) यहाँ को ' इन्द्रको भुजा बताया गया है । ताण्ड्यमहाब्राह्मणमें भी कहा है-यो वै प्र ' स उरस्त एव बाहुभ्यां पञ्चदशमसृजत, राजन्यो मनुष्यः, इन्द्रो ३१।१२ ) ३ देवता, तस्माद् बाहुवीर्यः, बाहुभ्यां हि सृष्टः ' ( ६ । १ । ८ ) यहाँ पर न्य सुखपार्क क्षत्रियके साथ इन्द्रदेवताकी उत्पत्ति भी बताई गई है । कृष्ण-नाई गई । यजुर्वेद में भी कहा है- ' बाहुभ्यां पञ्चदशं निरमिमीत, तमिन्द्रो नः ' ( श्रीस देवताऽन्वसृज्यत, न्निष्टुप् छन्दः, राजन्यो मनुष्याणाम् ' ( ७ | १ | १ | ४ ) - ' समुहल यहाँ पर क्षत्रियके साथ इन्द्रदेवताकी तथा त्रिष्टुप छन्दको उत्पत्ति मी बताई गई है । वेदाधिकारि - विचार २०१ वैश्य के लिए बृहदारण्यकमें भी कहा है - ' स नैव व्यभवत्, स विशमसृजत । यानि एतानि देवजातानि गणेश श्राख्यायन्ते, वसवो रुद्रा आदित्या विश्वेदेवा मरुत इति ( १२ ) यहाँ वैश्यके साथ विश्वेदेवाः, आदित्य आदि देवताओं की उत्पत्ति कही गई । है । ताड्यब्राह्मण में भी कहा है - ' स मध्यत एव प्रजननात् सप्त-दशमसृजत, वैश्यो मनुष्यः, विश्वेदेवा देवता: ' ( ६१ ) यहाँ पर भी वैश्यके साथ विश्वेदेवा जो आदित्योंका ही भेद है, उत्पत्ति कही गई है | कृष्णयजुर्वेद ( तै. सं. ) में भी यही कहा है - ' स मध्यतः सप्तदशं निरमिमीत, तं विश्वेदेवा देवता असृज्यन्त, जगती छन्दः, वैश्यो मनुष्याणाम् ' ( ५ ) यहाँ वैश्य के साथ विश्वेदेवा देवता, तथा जगती छन्दकी उत्पत्ति बताई गई है । अब शूद्रकेलिए देखिये - ' स नैव व्यभवत् स शौद्र ं वर्णंम-सृजत पूषणम्, इयं [ पृथिवी ] मैं पूषा ' ( वृहदा. १३ ) यहाँ शुद्रके साथ पूषा ( पृथिवी ) की उत्पत्ति बताई गई है । ' पद्भ्यां भूमिः ' ( यजुः ३१।१४ ) ' पद्भ्यां शूद्रः ' ( ३१।११ ) इनके सामञ्जस्य से शूद्रकी पादोत्पत्ति विवक्षित है । इसीलिए ताण्ड्यत्राह्मण में कहा है- ' स पत्त एव प्रतिष्ठाया एकविंशमसृजत, न काचन देवता, शूद्रो मनुष्यः, तस्मात् शूद्रोऽयज्ञियः, विदेवो हि, न हि तं काचन देवताऽन्वसृज्यत, पत्तो हि सृष्टः ' ( ६ | १ | १० ) यहाँ पर दिखलाया गया है कि प्रादोत्पन्न - शूद्र के साथ कोई यज्ञिय देव उत्पन्न नहीं हुआ इस कारण वृह यज्ञ तथा यज्ञ - विषयवाले वेदमें अधिकृत नहीं । यही कृष्णयजुर्वेद ( तै. सं. ) में भी कहा है- ' पत्त एकविशं निरमिमीत, तमनुष्टुप् CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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वैदाधिकारि - विचार २०२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) छन्दोऽन्वसृज्यत, शूद्रो मनुष्याणाम्, तस्मात् शूद्रो यज्ञेऽनवक्लतः, न हि देवता अन्वसृज्यत । तस्मात् पादौ उपजीवतः, पत्तो हि असृज्येत । म्, ( ६ ) यहाँ भी याज्ञिकदेव - हीनता के कारण शूद्रको यज्ञ एवं यज्ञ-विषयवाले वेद तथा उसके मूल यज्ञोपवीतका अनधिकारी होनेसे अद्विज ( एकज ) बताया गया है । यहाँका अनुष्टुप् छन्द भी वेदा-धिकारप्रद नहीं; क्योंकि द्विजत्वाधायक गायत्री, त्रिष्टुप् " जगती ही ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यके द्विजत्वाधायक बताये गये हैं । उनकी वर्णसंख्या मी ८-११-१२ समन्वित होती है; अनुष्टुप्की नहीं । ( १३ ) यह शास्त्रीय बातें निर्मूल भी नहीं हैं । पहले ' वशिष्ठ-धर्मसूत्र ' का प्रमाण इस विषय में दे चुके हैं कि - गायत्रीसे ब्राह्मण-को, त्रिष्टुपसे क्षत्रियको, जगतीसे वैश्यको उत्पन्न करके ' द्विज ' बनाया गया है, पर शूद्रको किसी छन्दसे उत्पन्न करके ' द्विज ' नहीं बनाया गया; अतः वह ' द्विज ' नहीं, किन्तु ' एकज ' होता है, अतः छन्द ( वेद ) का अधिकारी भी नहीं होता । यह हम लिख चुके हैं कि ब्राह्मणकी अग्निसे, क्षत्रियकी इन्द्रसे, और वैश्यकी विश्वेदेवा वा आदित्यदेव से उत्पत्ति बताई गई है । निरुक्तके सप्तमाध्यायमें देवताओंके भक्ति - साहचर्य के निरूपण के अवसर पर अग्निका वसन्त ऋतु तथा गायत्री छन्द ( १८२ ) बताया गया है; तब अग्नि - सहोत्पन्न ब्राह्मणको भी वसन्त ऋतुमें ही यज्ञोपवीत दिया जाता है, और यज्ञौपयिक एवं द्विजत्वाधायक गायत्री मन्त्र दिया जाता है, जिसे ' वेदमाता ( गायत्री ) द्विजानाम् ( ब्राह्मणानाम् ) ' ( अ. १६।७१।१ ) यह अथर्ववेदसं का मन्त्र कह रहा है । गायत्रीके CC - 0. Ankur Joshi Collection एक पादुके अक्षर होनेसे ही वह पवे वर्षमें ब्राह्मणको 'ि करता है । क्षत्रियकी इन्द्र- देवताके साथ उत्पत्ति बतलाई भक्ति - साहचर्य में निरुक्तमें इन्द्रदेवता की ग्रीष्म गई है । ऋतु, तथा त्रिष्टु छन्द ( ७ । १० । १ ) बताया गया है । त्रिष्टुपके एक पादक ११ होते हैं; तब इन्द्रके साथी क्षत्रियका भी द्विजत्वाधायक अक्षा यज्ञोपव - ऋतु ११ वें वर्ष में होता है; और उसे त्रिष्टुप् - सावित्री दिया जाता है । वैश्य के साथ के विश्वेदेवा के जो आदित्यका छन् दूसरा रूप है, जैसेकि निरुक्तके वैश्वानरके प्रकरण में लिखा है - ' यानि औत्तमिकानि [ द्युलोकस्थ - सूर्यसम्बन्धीनि ] सूक्तानि मागानि ( मग ) सावित्राणि [ सविता ], सौर्याणि ( सूर्य ) वा, पौष्णानि ( पूषा ), वैष्ट् वानि ( विष्णु ) वा, वैश्वदेव्यानि ( विश्वेदेवाः ) वा ' ( १२३१२ ) निरुक्तमें उस आदित्यके वर्षा ऋतु, तथा जगती छन्द ( नि. ७१११ ) बताये गये हैं । इसलिए जगती- छन्दके पादके १२ वर्ण होनेसे वैश्य वर्णको भी १२ वें वर्ष में वर्षा ऋतु में द्विजत्वाधायक यज्ञोपवीत तथा जगती - सावित्री छन्द मिलता है । इससे उसका दूसरा जन होकर वह द्विज हो जाता है; परन्तु शूद्रका द्वितीय - जन्म न तो किसी छन्दसे कहीं कहा है, न कोई छन्दो - मन्त्र ( सावित्री ) उसके लिए कहा गया है, न देवता, न उसके सावित्री - ग्रहणार्थ कोई । आरम्भिक वर्ष कहा है, न ही अन्तिम वर्ष । न ही त्रैवर्णिकोको भांति अन्तिम वर्ष अतिक्रमण करने पर उसको कहीं व्रात्य कहा-है; अतः शूद्रका यज्ञोपवीत भी किसी वर्ष वा ऋतु नहीं होता । शूद्रका कोई याज्ञिक - देवता ही नहीं और पूषाका कोई नियत छन्द Gujarat. An eGangotri Initiative
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२०४ श्रीसनातन धर्मालोक ( ६ ) ही नहीं; तब द्वितीय - जन्मापादक छन्दका अधिकारी न होनेसे ' द्वि ई गई वह द्विज न होकर एकज ही रह जाता है; अतः बेदका अधिकारी है । नथात्रि भी नहीं रहता । तब ' वेदमाता द्विजानाम् ' में गायत्री के अधिकारी ११ ब्राह्मणकी उपलक्षणतासे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ही द्विज हुए । यज्ञोप गायत्री से उपलक्षित वेदमाता -सावित्री उन्हीं द्विजोंकी पावमानी वित्री छन्द होनेसे वेदमें अधिकार भी उन्हीं द्विजोंका ही हुआ, और वह यका सोपपत्तिक भी हुआ । जब गायत्रीमें ही अधिकार ब्राह्मणका है; दूसरा है - यानि ' तब वेदमें भला शूद्रका अधिकार कैसे हो सकता है? तब शूद्रका नि ( भाग ), वेदानधिकार शास्त्रीय और उसे वेदका अधिकार देना अशास्त्रीय पा ), वैप तथा निरुपपत्तिक होने से निर्मूल ही सिद्ध हुआ । ७ ( १४ ) जोकि - वादी ' यमेव विद्याः शुचिमप्रमत्तं मेधाविनं ब्रह्म-२३/१२ ) चर्योपपन्नम् । यस्ते न द्रुह्य तू कतमचनाह, तस्मै मा ब्रूया निधिपाय .७१ ) होनेसे ब्रह्मन्! ' निरुक्तस्थ इस मन्त्र से ' जिस किसीको भी [ इसमें कोई यज्ञोपवीर द्विजकी शर्त नहीं है ] ब्राह्मण देवता विद्या दे दे ' -यह बताकर विद्यामें अद्विजका अधिकार भी सूचित करते हैं - इस विषय में सरा जन्म विस्तृत विचार वे ' श्रीसनातनधर्मालोक ' के तृतीय- पुष्प में देखें । न्मनो यहाँ प्रष्टव्य है कि - विद्या ब्राह्मण देवताके पास क्यों गई, शूद्र- देवता (? ) १ ) उसके के पास क्यों न गई? ब्राह्मण देवता तो ब्राह्मणको ही पढ़ावेगा; कोई इसीलिए तो उसने ब्राह्मणका पल्लो पकड़ा । यदि सबको अपना चणिकोको पढ़ाना उसे इष्ट होता; तो वह शूद्रके पास जाती; क्योंकि - वादी के चात्य कहा अनुसार तो वेद ' शूद्रोंके मनोंमें भी घुसा बैठा है ' और वह हीं होता || यत छन्द * तृतीय पुष्पका मूल्य ३। ) है, डाकव्यय पृथकू । वेदाधिकारि विचार २०१ गुरुकुल में भी जाता है । तभी छान्दोग्य ( ताण्ड्य ) ब्राह्मण में मी कहा है- ' विद्या ह वै ब्राह्मण माजगाम - तवाहमस्मि ' । यहाँ ' मैं तेरी ( त्राह्मणकी ) हूँ ' यह शब्द ब्राह्मणकेलिए आया है । यही बात मनुस्मृति में भी कही है- ' विद्या ब्राह्मणमेत्याह - शेवधिः तेऽस्मि ' ( २।११४ ) ' मैं विद्या तेरा ( ब्राह्मण का खजाना हूँ ' । यहाँ विद्याको शूद्रका खजाना नहीं कहा । ' अनर्हते मानिने चैव मा दाः ' ( छा. ) मुझे अनर्हन् ( योग्य ) ब्राह्मणको न देना- इससे भी वेदविद्यामें ब्राह्मणका ही अधिकार सिद्ध होता है; तभी तो वेदमें ' ब्रह्मणे ब्राह्मणं ' ( यजुः ३० ५ ) वेदका अधिकार ब्राह्मण के लिए आया है । ' तपसे शूद्रम् ' ( ३०१५ ) यहाँ शूद्रोंको कृच्छ्र - कर्म सेवाका अधिकार दिया है | ' तपः शूद्रस्य सेवनम् ' ( मनु ' ११: २३५ ) यहाँ पर शुद्रका सेवा करना तप बताया है- सो इस ' सेवा - धर्मः परमगहनो योगि-नामप्यगम्यः ' कृच्छ्र - कर्म में लगे हुएके सिर पर फिर कठिन वेदका भार रखना उनपर अत्याचार करना है । उक्त शाखा - मन्त्र से शूद्र वेदाधिकारी सिद्ध भी नहीं हो सकता; क्योंकि - षह उक्त मन्त्रानुकूल ' शुचि ' नहीं । शुद्रका अशुचित्व-वर्ण - व्यवस्था चाहे कर्मणा हो चाहे जन्मना - स्वाभाविक रहेगा । वह ' ब्रह्मचर्योपपन्न ' भी नहीं; आचार्य के कुल ब्रह्मचर्याश्रममें उपनीती ही जावेगा, शूद्र उससे दूर हो जावेगा; क्योंकि वह अनुपनीती है । इन्हीं शाखा के मन्त्रों में भी ' विप्रा वाचा मनसा कर्मणा वा ' इस तीसरे मन्त्र में ' विप्रा: ' शब्द है, यह शब्द ' जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेयः संस्कारै-र्द्विज उच्यते । विद्यया याति विप्रत्वं ' ( अत्रि १४१ ) जन्म - ब्राह्मणके लिए-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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वेदाधिकार - विचार २०६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) २०० जो विद्वान् है - आया है । वादीकी गुरुकुलपत्रिका ' ' के सम्पादक श्रीधर्मदेवजी ' सिद्धान्त ' पत्रके वर्ण - व्यवस्था में अपने ' वर्णव्यवस्था और आर्यसमाज ' निबन्धमें ' घिया विप्रो अजायत ' मन्त्रके ' विप्र ' शब्दका अर्थ ' ब्राह्मण ' करते हैं, उसी ' विप्र'की ' यमेव विद्या: शुचिमप्रमत्तं ' इस वादि - दत्तमन्त्र में अनुवृत्ति आ रही है । इसी मन्त्रके अनुवादभूत ' तस्मै मां ब्रूहि विप्राय निधिपायाऽप्रमादिने ' ( २।११५ ) इस मनुस्मृतिके वचनमें ' विप्र ' शब्द साक्षात् विद्यमान है, और सृष्टिकी आदिमें प्रोक्त मनुस्मृति ' विप्राणां ज्ञानतो ज्यैष्ठ्य * क्षत्रियाणां तु वीर्यतः ' ( ३।१५५ ) ' मस्मीभूतेषु विप्रेषु ' ( ३६७ ) ' त्रात्यात्तु जायते विप्रात् ' ( १०।२१ ) इत्यादि पचासों पद्यों में ' विप्र'का अर्थ ' ब्राह्मण ' करती है । अन्य प्रमाण ' आलोक ' के तृतीय पुष्पमें देखने चाहियें । सो यहाँ वादीके दिये हुए शाखामन्त्रमें वेदका अधिकार ब्राह्मणको सिद्ध हुआ, ' शूद्र ' को नहीं । ( १५ ) वादीके - ' ऐ भारतीय विद्वानो! यह घोषणा करदो कि-वेद ईश्वरीय ज्ञान है, मनुष्यमात्रको वेदका अधिकार है, उन्हें उपनीत कर गुरुके समीप लाकर गुरुकुल में सुशिक्षित कर वेदका अधिकार दो । वेदको बन्द रखना मानों सर्पको घड़ेमें बन्द करना है ' यह शब्द भी व्यर्थ हैं, और परस्पर विरुद्ध भी हैं । जब उनके अनुसार शूद्रोंके मनमें भी वेद ओत - प्रोत हो रहे हैं; तब वादी घोषणा किस बातकी कराते हैं? क्यों उनको सुशिक्षित करानेकी भोली वार्ते करके वेदकी पूर्व बातको खण्डित करते हैं? क्यों उन्हें गुरुकुलमें भेजकर ' तपसे शूद्रं ' ( यजुः ३०१५ ) वेदके CC - 0. Ankur Joshi Collection वादिप्रतिवादि- सम्मत अर्थके अनुसार कृच्छ्रकम - रत उसका समय नष्ट करते हैं? ' ब्रह्मणे ब्राह्मणं ' ( ३०१५ ) इस मन्त्र में वेदा अधिकार ब्राह्मणको दिया है, शूद्रको नहीं । यदि वादी ईश्वरको आज्ञाको मानना चाहते हैं; तो उससे बिरुद्ध शूद्रोंको बेद देन वैदिकधर्मके बिरोधी बनना वैदिकम्मन्य - उनको उचित नहीं । वादी यदि ईश्वरके ज्ञानका प्रसार चाहते हैं, तो वेदके माध्य - भूत | पुराणादिसे भी वे शूद्रको वह ज्ञान प्राप्त करा सकते हैं, उसके. लिए अनधिकृत वैदिक - शब्दयोजना अनिवार्य नहीं । सो वादी सारा वेद स्वयं पढ़ें; उसमें प्रयास करें, दूसरे पक्षपाती - लोगों क प्रकरण - मुक्त अशुद्ध - अर्थोंमें मुग्ध होकर वेदका प्रकारान्तरसे खण्डन न करें । उस वेचारे कृच्छ्र कर्म - निरत शूद्र के सिरपर शब्दका भारी भार न रखें; जिसके लिए उसको वेदाङ्ग - व्याकरण आदि पढ़ने माथापच्ची करनी पड़े ( जिससे विशेष करके स्त्री - शूद्र ही डरते हैं । और वह शास्त्रानुसार अधिकृत द्विज - सेवासे विमुख न हो जाये । सो शूद्रको बादी वेदका निचोड़ सुनाकर उनका समय बचा है; वह निचोड़ पुराण- श्रवणसे उन्हें मिल सकता है । इसमें वादीको कोई निषेध नहीं करेगा । अनुपनीत एवं अविद्य ( विद्या - रहित ) होने से शुद्रका वेदके शब्द में अधिकार नहीं । अर्थ में अधिकार विद्य तथा अनुपनीतका भी हो सकता है । ( १६ ) जोकि वादी ' यथेमां वाचं ' मन्त्र के लिए कहते हैं कि-ऋषि स्वयं प्रकाशित कर रहा है- ' जैसे मैं इस कल्याणी वाणी वेदको ‘ जनेभ्यः ’ सभी मनुष्योंको कहता हूँ ' पर यहाँ ' वेद ' शब्द Gujarat. An eGangotri Initiative
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२०० २०८ ' श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) नका समय है कहाँ? यह तो बादी वेदमें प्रक्षेप कर रहे हैं । बादी यहाँ वेदका ' ऋषिकी वाणी ' कह रहे हैं, सो यह ' प्रभु ईश्वर की वाणी ' कहाँ 7 ईश्वरको रही? ' जीवकी वाणी ' होगई । यहाँ वादीने वेदको भी ' जीवकी वेद देकर वाणी ' सिद्ध कर दिया । इस मन्त्र के अर्थ तथा ' पचजना मम होत्रं ह्रीं । वादी जुषध्वम् ' इस अपने दिये मन्त्रका वास्तविक अर्थ बादी हमारे भाष्य - भूत ' ' श्रीसनातनधर्मालोक ' के तृतीय पुष्प में देखें; तब उनका भ्रम दूर हो उसके जाएगा । कृत्रिम अर्थ करने में पूर्वापर विरोध उपस्थित हो जाता है । वेद स्वयं सबका सब बातों में अधिकार नहीं बताता । उषाका नी - लोगों के यह मन्त्र बहुत प्रसिद्ध है - ' क्षत्राय ( वलाय ) त्वं ( एक ), श्रवसे से ( अन्नाय ) त्वं, महीयै इष्टये ( यज्ञाय ) त्वम् अर्थमिव इत्यै ( गमनाय ) ” दका भारी ( ऋ. १।११३।६ ) इसमें एक ( क्षत्रिय ) का कार्य बल सचित करनेका, पढ़नेकी दूसरे ( वैश्य ) का अन्न सश्चित करनेका, अन्य ( ब्राह्मण ) का यज्ञ डरते हैं । करनेका, अन्तिम ( शूद्र ) का कई कार्यों को पूरा करने केलिए इधर-हजा उधर पैरों द्वारा जानेका संकेत किया गया है । सो यज्ञ तथा यज्ञके वह मूल वेदमें भी मुख्य अधिकार ब्राह्मणका सिद्ध हुआ 1 । शूद्रका वादी तो सेवा कर्म होने से वह वेद में वेदानुसार भी अधिकृत नहीं । द्या रहिव ) वेदानधिकार - विषयमें द्विज- स्त्री की कुछ विशेषता हुआ करती अधिकार है । वह यह कि शूद्र एकज होता है, स्त्री भी एकज होती है, पर उसका समन्त्रक - विवाह उसे द्विज - जैसा कर देता है; द्विज - जैसाका हैं कि भाव यह है कि उसका उपनयन साक्षात् नहीं होता, सो वह णी वाणी ' क्रमेण विधिपूर्वकम् ' तो स्वाध्याय में अधिकृत नहीं होती; पर ' शब्द स्व.विषयक - यज्ञादिमें कोई मन्त्र आजावे; तो उसे पति आदि की CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदाधिकारि - विचार २०६ सहायता से बोल सकती है । स्त्री - शूद्रके वेदानधिकार- विषयमें विशेष स्पष्टता ' आलोक ' के तृतीय- पुष्पमें देखनी चाहिये । अब वैदिक - देवपूजाके अधिकारियों का वेदादि - शास्त्रानुसार वर्णन किया जावेगा | ( ७ ) देवमन्दिर - प्रवेशपर वैदिक दृष्टि ( शुद्ध धार्मिक दृष्टिकोण ) वेदके अधिकारी द्विज हैं, यह हम बता चुके हैं । वेदका विषय यज्ञ है, यह भी हम वेद - स्वरूपमें बता चुके । यज्ञसे वैदिक देवपूजा ( मूर्तिपूजा ) मी गृहीत होती है - यह भी बताया चुका है । अब उस वैदिक - देवपूजाके अधिकारी मी द्विज ही हैं, शुद्र - अन्त्यज नहीं - इस पर भी कुछ प्रकाश डाला जाता है । प्रमाणभूत ग्रन्थ - ( १ ) महर्षि श्रीयाज्ञवल्क्यने अपनी स्मृतिमें विद्या तथा धर्मके स्थान यह बताये हैं- ' पुराणन्यायमीमांसा-धर्मशास्त्राङ्गमिश्रिताः । वेदाः स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश ( १ | १ | ३ ) पुराण से त्राह्म आदि १८ पुराण, और रामायण - महाभारतादि इतिहास, न्यायसे न्याय - वैशेषिक और सांख्य - योग, मीमांसासे पूर्वमीमांसा ( मीमांसादर्शन ) तथा उत्तरमीमांसा ( वेदान्त दर्शन ), धर्मशास्त्रसे मनु, अत्रिऋदिकी स्मृतियां और आगम - तन्त्रग्रन्थ, अङ्गसे शिक्षा, कल्प ( श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र, धर्मसूत्र आदि ), व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्यौतिष यह छः वेदाङ्ग, वेदसे मन्त्र - त्राह्मणात्मक भाग जिसमें आरण्यक एवम् उपनिषद् भी अन्तर्भूत होते हैं— यह चौदह धर्म में प्रमाणभूत माने गये हैं । स ० ध ० १४ Gujarat. An eGangotri Initiative
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२१० श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) श्रीयाज्ञवल्क्यने मनु, अत्रि, विष्णु, हारीत, याज्ञवल्क्य, उशना, अङ्गिरा, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, वृहस्पति, पराशर, व्यास, शङ्ख, लिखित, दक्ष, गौतम, शातातप, वसिष्ठ, यह २० धर्मशास्त्रप्रवर्तक बताये हैं; पर यह प्रदर्शनार्थ है; परि-संख्यान [ अन्योंकी निवृत्ति ] केलिए नहीं; तब वोधायन आदि अन्य भी गृहीत हो जाते हैं- जैसा कि मिताक्षरा में लिखा है । इनकी कई स्मृतियां लघु - बृहद् दोनों रूपों में भी मिलती हैं । धर्मके ज्ञापक श्रीयाज्ञवल्क्यने ' श्रुतिः, स्मृतिः, सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः । सम्यक् संकल्पजः कामो धर्ममूलमिदं स्मृतम् ' ( १।७ ) यह बताये हैं । इनमें प्रथम पद श्रुति ( वेद ) को दिया है, फिर स्मृतिको; स्मृति में भी पहले मनुको, फिर सत्पुरुषोंके आचारको । तब धर्मकी जो वात द्रष्टव्य हो, वह इन्हीं में देखनी पड़ेगी । धर्मका साक्षात् लक्षण बताते हुए स्मृतिमूर्धन्य मनुस्मृति में भी यह कहा है- ' वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः । एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद् धर्मस्य लक्षणम् ' । ( २।१२ ) यहां मी वेद तथा स्मृतिको धर्मका मूल बताया गया है । इसी बात को मनुजी ने अन्यत्र भी कहा है- ' श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः । ते सर्वार्थेष्वमीमांस्ये, ताभ्यां धर्मो हि निर्बभौ ' ( २।१० ) यहां पर श्रुति स्मृतिको श्रमीमांसनीय अर्थात् - उट्टङ्कना के बिना ही प्रमाण मानने के लिए कहा है । ‘ धर्मं जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः ' ( २।१३ ) यहां धर्मका ज्ञान करनेकेलिए श्रुति ( वेद ) को परम प्रमाण माना गया है । CC - 0. Ankur Joshi Collection देव मन्दिर प्रवेशपर वैदिक दृष्टि २ ' योऽवमन्येत ते मूले हेतु - शास्त्राश्रयाद् द्विजः । स साधु मिर्वहिष्य नास्तिको वेदनिन्दकः ' ( २।११ ) यहां श्रुति स्मृतिका शुष्क - तर्का अपमान करनेवालेको नास्तिक तथा बहिष्करणीय कहा है । धर्म के सिद्धान्तोंको जानने के लिए श्रुति स्मृतिका जानना इस आवश सिद्ध हुआ । स्मृतिसे पुराण - इतिहास - तन्त्र आदि सभी गृहीत? जाते हैं, यदि वेदसे विरुद्ध न पढ़ते हों । सदाचारसे सत्पुर परम्परागत - व्यबहार ब्राह्म है । स्वामी शंकराचार्य आदि आचार्योंने पुराण एवं महाभारत तथा तन्त्र आदि ग्रन्थोंका न अपने भाष्यों में ' स्मृति ' कहा है; अतः स्मृतिग्रन्थों में उनका समावेश हो जाता है । स्मृति आदिमें भी वेदादिकी विरुद्धता न आनी चाहिये । जैसाकि व्यासस्मृतिमें कहा है- ' श्रुतिस्मृतिपुराणारं त्रिरोधो यदि दृश्यते । तत्र श्रौतं प्रमाणं तु द्वयोर्द्वधे स्मृतिर्बंरा ' ( ११ ) अर्थात् - वेद, स्मृति, पुराण आदिमें विरोध हो, तो उसमें बै ही प्रमाणता होती है । स्मृति और पुराण में विरोध हो तो स्मृ ही उसमें प्रमाण होती है । पुराण - इतिहासमें लोकवृत्त मुख्य हुआ करता है, लोकव्यवहार व्यवस्था मुख्य नहीं । पुराण- इतिहास के सैकड़ों इतिहासे को भी विधि - विरोध विध्वस्त कर दिया करता है - यह स्म रखने की बात है । वेद मन्त्रभाग तथा ब्राह्मणभाग मिलकर र पृथक - पृथक् भी हुआ करता है - यह हम ' वेदस्वरूप ' में बता कु हैं । अब इस कसौटीसें यज्ञस्वरूप- देवपूजन एवं देवमन्दिर - प्रदेश क्रिसका अधिकार हैं - यह विचार किया जाता है । Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) २१२ मिर्वहिष्य ( २ ) सनातन - हिन्दुधर्ममें देवमन्दिरका महत्त्वपूर्ण स्थान । - सनातन-शुष्क हिन्दुधर्म मनुष्यसे ऊँची - योनि चन्द्रलोकस्थित पितरोंको तथा उससे - वर्कद्वार मी ऊपर के द्युलोकस्थित देवताओंको पूजनीय मानता है । उसका है । इस विश्वास है कि हम देव एवं पितरों की पूजा एवं यज्ञ करेंगे, तो वे ना आवश मी समय पर दृष्टि और हमारे मनोरथोंकी भी वृष्टि करेंगे । यदि गृहीत सत्पुरुषो उसके अधिकारी पुरुष वैसा न करेंगे, किन्तु अनधिकारी ही वैसा आदि करेंगे, तो वे देव इससे अपना अपमान वा अपनी तेजोहानि त्योंका मानते हैं, जैसे कि शूद्रोंने ब्राह्मणों में घुसकर वेद पढ़कर यज्ञ करके न इन्द्रदेवकी पूजाकी थी; यह वादीलोग भविष्यपुराण ( प्रतिसर्गपर्व. उनका में विरुद्धता ' ४ खंड २०७२-७३ ) से बड़े संरम्भसे निम्न - पद्य द्वारा बतलाया द करते हैं— ' मिश्र देशोद्भवा म्लेच्छाः काश्यपेनैव शासिताः । संस्कृताः तिपुराणानं वेरा ' ( शूद्रवर्णेन ब्रह्मवर्णमुपागताः । शिखासूत्रं समाधाय पठित्वा वेद-उसमें वेद मुत्तमम् । यज्ञैश्च पूजयामासुर्देवदेवं शचीपतिम् ' देखो ‘ सिद्धान्त ’ होतो ( वर्ण - व्यवस्थाङ्क ) में स्ना.धर्मदेवजीका पूर्वपक्ष, तथा ' वैदिकधर्म ' ( ४०1१ ) में श्रीशिव पूजन सिंहका लेख ) । पर यह उद्धर्ता वादी लोग कव्यवहार उस पुराणका पूर्वापर अपनी पारम्परिक प्रकृतिवश चुरा लिया इतिहा करते हैं— जनता के सामने नहीं आने देते; अतः साधारण लोग -यह स्म भ्रममें पड़ जाया करते हैं । यह प्रमाणोंकी ब्लैकमार्केट बहुत मिलकर अनुचित है । भविष्यपुराणके उसी प्रकरण के अनुसार कि - शूद्र बता वैदिक यज्ञ वा वैदिक - देवमूर्तिपूजनात्मक यज्ञ किया करें - यह बात दर प्रवेश यज्ञके देवता इन्द्रको भी इष्ट नहीं थी, भगवान् विष्णुको भी यह बात पसन्द नहीं थी, क्योंकि यह दैत्यमत था, देवमत नहीं । यह CC - 0. Ankur Joshi देवमन्दिर प्रवेशपर वैदिक - दृष्टि २१३ Collection Gujarat. वलिदैत्यके इशारेसे देवताओंको अतृप्त एवं निस्तेज करनेका प्रकार था, जैसे कि उसी प्रकरण में यह स्पष्ट है — ' शूट्टसंस्कृतमन्नं च खादितु ं न द्विजोऽर्हति । तथा च शूद्धजनितैर्यज्ञः तृप्तिं न चाप्नुयाम् । मम शत्रुर्वलिर्दैत्यः कलिपक्षमुपागतः! निस्तेजाश्च यथाऽहं स्यां, तथा वै कर्तमुद्यतः ( ३।४०।२०।७१-७७ ) ( देखिये- इसपर ' श्रीसनातनधर्मालोक ' तृतीय - पुष्प ) । मनुस्मृति में भी इसका निर्देश आया है- ' नाइनन्ति पितृ - देवाः तद्, न च स्वर्गं स गच्छति ' ( ३ | १८ ) इससे ' जिसके घरमें विवाहिता शूद्रा हो, उसका भी अन्न देव और पितर नहीं खाते ' यह कहा है । अन्न न खाने से खानेवालेकी निस्तेस्कता स्वतः - सिद्ध है । वही यज्ञके देवता अनधिकारियोंकी अनधिकार चेष्टाके कारण अतिवृष्टि वा तन्मूलक बाढ़ोंसे, अनावृष्टि वा तत्प्रयुक्त सूखेसे, अथवा जलवायुको विषैला करके पीलिया आदि रोग उत्पन्न करके प्रजाको संत्रस्त करते रहेंगे: ऐसा हिन्दुधर्मका चिरन्तन विश्वास हैं, और वह प्रत्यक्ष भी है । प्रमाण आगे देंगे! ( ३ ) देवपूजाके शास्त्रोंमें कई प्रकार आये हैं । यज्ञ करना - यह मुख्य देवपूजन माना जाता है । ' यज्ञ ' शब्द ' यज ' धातुसे नङ् प्रत्यय करनेपर बनता है । यजँ धातुका अर्थ देवपूजा, सङ्गतिकरण एवं दान आया है । अर्थात् देवोंकी अग्नि वा प्रतिमा आदिके द्वारा पूजा तथा देवोंका सङ्गतिकरण- इकट्ठा करना, अर्थात् उनका यज्ञमें अग्नि वा प्रतिमा द्वारा आह्वान करना, तथा देवोंके अर्थ दान देना यह सब ' यज्ञ ' है । देव द्युलोक ( स्वर्ग ) की एक योनि है, मनुष्य An eGangotri Initiative
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२१४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) नहीं, वा विद्वान् मनुष्य नहीं ( इस विषयपर स्पष्टता ' श्रीसनातन-घर्मालोक ' ( चतुर्थ पुष्प ) में देखनी चाहिये ) । यह सब ' यज्ञ ' है | यज्ञ भी कई प्रकार के होते हैं, १ वैदिक, २ पौराणिक और ३ तान्त्रिक । वैदिक - यज्ञमें केवल द्विज ( ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ) अधिकृत होते हैं, और पौराणिक एवं तान्त्रिक यज्ञमें शुद्रका भी निषेध नहीं होता । उस यज्ञमें भी दो भेद मुख्य हैं । उनमें एक वेदमन्त्र - संस्कृत- अग्निमें हवन - द्वारा तत्तद्देवताके नामसे हवि डालना, दूसरा वेदमन्त्र - संस्कृत प्रतिमा में पूजन द्वारा तत्तद् - देवताके नामसे उपहार रखना | यह दोनों ही ' यज्ञ ' हुआ करते हैं; क्योंकि-देवपूजार्थक यज - धातुका अर्थ दोनों स्थान समानतासे समन्वित होता है । इसलिए शाङ्खायन - ब्राह्मण में कहा है- ' स एवास्मै यज्ञं ददाति तद्यद् एता देवता यजति ' ( ४२ ) अर्थात् देवताओंकी पूजा ही यज्ञ है । श्रीमद्भागवत पुराण में भी अङ्गी भगवान्, तथा उनके अङ्ग देवताओंकी पूजाके प्रकार भगवान्ने स्वयं कहे हैं - ' यदा स्वनिगमे-नोक्त ं द्विजत्वं प्राप्य पूरुषः । यथा यजेत मां भक्त्या श्रद्धया तन्निबोध मे । अर्चायां ( मूर्ती ) स्थण्डिलेऽग्नौ वा सूर्ये वाऽप्सु हृदि द्विजे । द्रव्येण भक्तियुक्तोऽर्चेत् स्वगुरु माममायया ( ११।२७१८-१ ) अर्थात्, यजन - यज्ञ अग्निहोन्नादि, वा देवमूर्तिपूजनमें होता है और उसमें द्विजका अधिकार है, द्विज - भिन्नोंका अधिकार नहीं । वे द्विज भगवान्की पूजा या तो प्रतिमामें कर सकते हैं, वा अग्निमें, वा जल, ब्राह्मण आदिमें । ' स्नानालङ्करणं प्रेष्ठमर्चायामेव तूद्धव! बहौ आन्यप्लुतं CC - 0. Ankur Joshi Collection देवमन्दिर प्रवेशपर वैदिक दृष्टि हव: ' ( ११/२७/१६ ) अर्थात् - मूर्ति में स्नान अलंकार आदि और अग्नि घृताक्त हवि डाले । यह कर्म भगवान् से कहे प जन्मना द्विजकेलिए बताया है, और दोनों पूजन - प्रकारोंको प कहा है, जैसेकि - ' द्रव्यैः प्रसिद्धैर्मद्यागः प्रतिमादिष्वा ( ११ | २७ | १५ ) यहाँ प्रतिमापूजन तथा अग्निहोत्र दोनोंको क अर्थात् यज्ञ कहा है । तव यह दोनों प्रकार देवपूजन सिद्ध होते. और उसमें अधिकारी द्विज माने गये । श अग्नि हविके स्थूलभागको भस्म करके उसके सूक्ष्मभाव य उस - उस देवताको देती है, और देवमूर्ति मधुमक्षिकासे पिवे आ पुष्पकी भांति उसका सूक्ष्मभाग देवताओंको देती है । जैसे श्र वेदमन्त्रोंसे संस्कृत एवं प्रतिष्ठापित की जाती है, वैसे देवमूर्ति भ स वेदमन्त्रों तथा वेदमन्त्रोंके यज्ञमें अधिकार द्विजका है - यह से यहि सम्मत है यह गत निबन्ध में बताया जा चुका है । द्विजोंको ब्रा यज्ञोपवीतका अधिकार होता है; सो यज्ञोपवीतका कर्मकार भा होना आवश्यक होता है । वह यज्ञ - मूर्तिपूजा आदि भी यज्ञोपट जि को ७५ वर्ष तक जो कि कर्मकाण्डकी अवधि है - करने पड़ते है । वेद के दो भाग होते हैं, एक मन्त्रभाग, दूसरा ब्राह्मणभाग । होत दोनोंही मिलकर ' वेद ' कहलाते हैं । यह पूवें निबन्धमें देनिं ब्राह वेदका विषय यज्ञ है, और यज्ञका सम्बन्ध वेद से है - यह भी ह कि-वहीं बता चुके हैं । तब वैदिक यज्ञमें किसका अधिकार है- एन देखनेकेलिए हमें मन्त्र ब्राह्मणात्मक - वेदके पन्ने पलटने प उसके बाद वेदानुसारी स्मृति, पुराण एवं तन्त्रग्रन्थोंके, जिन् विच Gujarat. An eGangotri Initiative