सनातन धर्मलोक ६ — पृष्ठ 21–30
सनातन धर्मलोक ६ · पृष्ठ 21–30
पृष्ठ 21
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१४. श्रीसनातन धर्मालोक ( ६ ) 3518 ) मनुजीने नियोगको सनातनधर्मसे विरुद्ध कहा है । ' भ्रातुर्व भार्यायां त्यक्त्वा धर्मं सनातनम् ' ( वाल्मी ० किष्किन्धा १८१८ पर भ्रातृ - भार्याके साथ व्यभिचारको ) यहाँ प - वश सनातनधर्म से विरुद्ध कहा हा है है । ' प्रियं च नानृतं ब्रूयाद् एष धर्मः सनातनः ' ( मनु ० ४ । १३८ विग्रह ' भगवन्! श्रोतुमिच्छामि नृणां धर्मं ' सनातनम् ' ( श्रीमद्भा ० ७।११।२ ) ' श्रुतिगणान् यथा । तपसा ऋषयोऽपश्यन् ) त्माका यतो धर्मः सनातनः ' पर्व ( श्रीमद्भा ०८ | १४ | ४ ) स हि ( श्रीकृष्णः ) धर्मः सनातनः ' ( उद्योग यहाँ परमात्माका नाम ' सनातन ० ८५।७ ) त्मानं ' है । तब ' सनातनस्य - परमात्मनो २४/६ ) धर्मः ' यह विग्रह भी हो सकता है । इन प्रमाणों से सनातनधर्मकी सर्वादिमत्ता, परमात्म - प्रणीतता और वेदमूलकता नातन ' सिद्ध होती है । का भी तब इस शब्दकी अर्वाचीनता न होकर प्राचीनता ही सिद्ध हुई । सनातनधर्मियोंका तो यह अपना है ही; इसलिए वे इस शब्द-३०१३ ) का प्रयोग करनेके अधिकारी हैं ही, पर जो आर्यसमाजादि सम्प्रदायोंके संस्कारोंवाले हैं वे भी इसका प्रयोग करते हैं । जैसे-' हम देहकी रक्षाकेलिए सनातनधर्मको नहीं रायण- त्यागेंगे ' ( श्रीमद्दयानन्द नां यत्र प्रकाश, संगठन काण्ड १० सर्ग ३७८ पृष्ठ ) यह स्वा ० दयानन्दजीका जहाँ वाक्य है । अब उनका अपनी लेखनी से लिखा उक्त शब्द देखिये ' पुरुषके न्यायको सनातनधर्मके -धर्मकी आश्रय करके किया करें ' ( पृ ० १०२ ) ' सत्पुरुषों का आचार जो सनातन अर्थात् वेदद्वारा पादित कर्म... इन्हीं से धर्माधर्मका परमेश्वर - प्रति-मद्भा ० निश्चय होता है ' ( सत्यार्थ ० ही है । ३ समु ० पृ ० ३१ ).... • धर्म जिसको सदासे सब मानते मानते हैं, और मानेंगे भी, इसीलिए आये, यहाँ उसको सनातन - नित्य धर्म CC - 0. Ankur Joshi Collection सनातनधर्मकी प्राचीनता एवं महत्ता ११ कहते हैं, ( स ० प्र ० स्वमन्तत्र्यामन्तव्य के आरम्भ में ३५२ पृष्ठ ) ' आर्यों का वेदोक्त सनातन धर्म है ' ( स्वा ० द ० के ' भ्रान्तिनिवारण-( शताब्दी संस्करण ६०८ पृष्ठ में ) । तब इस शब्द के वादिसम्मत होने से भी इसकी अर्वाचीनता कट गई । ' वैदिकधर्म ' यह तो एकदेशी नाम है, जैसे - वैदिक - धर्म, श्रीत-धर्म, स्मार्त - धर्मः पौराणिक धर्म इत्यादि । परन्तु सबकी समुच्चित संज्ञा तो ' सनातनधर्म ' है । अथवा ' सनातनधर्म ' यह ' वैदिक धर्म ' का पर्याय भी है, क्योंकि - ' अग्निवायुरविभ्यस्तु त्र्यं ब्रह्म सनातनम् ' ( मनु ० ११२३ ) इत्यादि पद्य में ' सनातन ' शब्द से वेद भी स्मृत किये जाते हैं । तब सनातनधर्म वैदिकधर्म फलित हुआ । अथवा ' सना-तनधर्म ' यह याज्ञिकधर्मका भी पर्याय है ' यज्ञं चैव सनातनम् ' ( मनु ० ११२२ ) यहाँ यज्ञके लिए भी ' सनातन ' शब्द आया है, और यज्ञ वेदका विषय है - यह हम वेदके स्वरूप में दिखलाएँगे; तब भी वही अर्थ प्रतिफलित हुआ । ' आर्य धर्म ' यह तो व्यापक नाम नहीं; क्योंकि आर्य अधिक से अधिक द्विज होते हैं; शूद्र और अन्त्यज आर्य नहीं होते - यह भिन्न निबन्ध में बताया जायगा । ' आर्य धर्म ' शब्द स्थापनसे उसकी सार्वदेशिकता न रहेगी, परन्तु सनातनधमे में तो शूद्रवर्ण तथा चाण्डालादि - अवणौके धर्मका वर्णन भी होता है, अतः वही व्यापक शब्द है । ( २ ) संसारके सम्पूर्ण धर्म ( मत ) सनातनधर्म की ही शाखायें हैं; उसमें कई त्रुटित हैं. कई जीर्ण और कीट से व्याप्त हैं और कई टूटी हुई हैं । आर्यसमाज नामक अर्वाचीनतम सम्प्रदाय भी इसी Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 22
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) सनातनधर्मकी अर्वाचीन शाखा है, परन्तु बहुत प्रकारकी त्रुटियोंसे युक्त है । अर्वाचीन होने से ही इसकी हरियाली देखकर लोग इसपर लट्टू हो जाते हैं । उस सम्प्रदायवाले हमें द्वेषवश ही ' पौराणिक ' बुलाया करते हैं कि यह केवल पुराणों को ही मानते हैं, पर ऐसा नहीं, सनातनधर्मी वेदमूलक होने से ही सभी बातों को मानते हैं; उन्हींका यह कथन है — ' श्रुतिस्मृतिपुराणानां विरोधो यत्र दृश्यते । तन्त्र श्रौतं प्रमाणं तु तयोद्वैधे स्मृतिर्वरा ' ( व्यासस्मृति १।४ ) ( श्रुति, स्मृति और पुराणों का जहां विरोध हो; वहां वेद ही अधिक प्रमाण है, स्मृति और पुराणों के विरोधमें स्मृति अधिक मननीय है । ) मनुस्मृतिका कथन है — ' श्रुतिद्वैधं तु यत्र स्यात् तत्र धर्मावुभौ स्मृतौ । उभावपि हि तौ धर्मों सम्यगुक्तौ मनीषिभिः ' ( २१४ ) जहाँ वेदमें विरोध हो; वहाँ दोनों ही धर्म मननीय हैं । वैदिक परस्पर - विरुद्ध दो बातोंके मननका रहस्य यह है कि-वेद है द्विजजनहितैषी । वह परस्पर विरुद्ध उपायोंको भी कहता है । परन्तु वे दोनों ही हितजनक होते हैं, भिन्न - भिन्न अधिकारियों में उसकी चरितार्थता है । जैसे- विष दूर करनेके दो मार्ग हैं । एक मार्ग विषसे विरुद्ध पदार्थोंसे विषका नाश करना, दूसरा उपाय विषसे ही विषका दूर करना है । इस प्रकार गर्मीका दूर करना शीतल ओषधिसे भी हो जाता है, उष्ण औषधिसे भी । यह दोनों ही उपाय परस्पर विरुद्ध होते हुए भी लोगों का हित करते हैं; वैसे ही वेदमें परस्पर - विरुद्ध उपाय भी भिन्न देश - काल - पात्र में अवलम्वनीय हैं । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gurat. An सनातनधर्म की प्राचीनता एवं महत्ता १ ( ३ ) इस धर्मके सनातन ( अत्यन्तप्राचीन ) होने से ही इसका कर्ता नहीं कहा जा सकता । इस धर्मको भगवान् श्रीकृष्णने नहीं बनाया, किन्तु उनसे पूर्व भी यह था; श्रीकृष्ण भगवान् ने तो इसकी रक्षा की थी, रचना नहीं । यह धर्म भगवान् राम वा अन्य अत्रतारों से भी नहीं चालू किया गया — उनसे पूर्व भी यह था । इस धर्मको र है मनु, व्यास, याज्ञवल्क्य आदिने भी नहीं बनाया, किन्तु वा किया; या इसकी व्याख्या की । वेदप्रकाशन से भी यह प्राचीन है, क्योंकि वेदमें भी इसीका वर्णन है । जिस वस्तुका नियत स्वामी एक व्यक्तिविशेष न हो; उसका स्वामी राजा होता है । इस प्रकार सनातनधर्म का कोई भी स्वामी व्यक्तिविशेष नहीं; परमात्मा ही उसका स्वामी है— अतएव यह धर्म अपौरुषेय है । वह परमात्मा प्रक ही सनातन है, उसका यह धर्म है; इसीसे यह सनातन धर्म एवं अनादि वि धर्म है । अवतार तो इसके प्रवर्धक हैं, प्रवर्तक नहीं । सूर्यप्रका छीन प्रारम्भ कर्ता ईश्वर है; उसने आदिम ऋषि सृष्टिको अपने धर्मको अप शिक्षा दी, ईश्वर के सनातन एवं पुराण ( पुराने ) होने से उसका धर्म आ सनातनधर्म वा पुराणधर्म शब्द से कहा गया । ईश्वरके निर्भ्रान्त होने से यह धर्म भी निर्भ्रान्त एवं आप्त सिद्ध है । उस विश्वमात्र में सर्वोपयोगी यदि कोई धर्म कहा जाता है. तो संव वह सनातनधर्म ही है. अन्य नहीं । अतः इसे ' विश्वधर्म ' भी कहा जा प्रच सकता है । इसमें मनुष्यमात्र अपनी - अपनी जाति के अस्तित्वको प्राच रखता हुआ देशाचार एवं कुलाचार के साथ ही साथ अपने हमन अस्तित्वको स्थापित कर सकता है । ब्राह्मण से लेकर चाण्डाल तक देखा २ स ० ध ० eGangotri Initiative
पृष्ठ 23
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१७ १८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) इसका उच्चसे अवर ( निम्न ) तक इस धर्म में अपना निर्वाह कर सकते नहीं हैं । दूसरे मतों में तो अपने अस्तित्व एवं महत्त्वको च्युत कर के ही इसकी जीवन- निर्वाह प्राप्त होता है । संसार में अपना अस्तित्व स्थिर तारों रखते हुए अपनी उन्नति करना ही वास्तविक अभ्युदय हुआ करता धर्मको है । इससे विपरीत अवनति ही हुआ करती है । मनुष्य अपना न्यवद्ध वास्तविक अभ्युदय सनातनधर्म में रह कर ही कर सकता है । न है, सनातनधर्म वैसे वैद्यकी भांति नहीं है, जिसके पास केबल स्वामी एक ही ओषधि है; अतएव अपूर्ण है । यह तो वैसे वैद्यकी भांति प्रकार है, जिसके पास सभी तरह के रोगियोंकी सभी तरह की ओषधियां माही हैं । ईसाई, मुसलमान एवं आर्यसमाजादिकी तरह इसमें एक ही मात्मा प्रकारकी उपासनापद्धति नहीं है । यहां तो अधिकारियों की अनादि विविधतासे यथाधिकार व्यवस्था है । यहां दूसरेका अधिकार का छीनकर दूसरे को नहीं दिया जाता; यहां तो प्रत्येक पुरुष अपनी-धर्म की अपनी जाति में अपने कर्तव्यको पूर्ण करता हुआ भगवान्की आज्ञाको पूर्ण करता है । नम्रत ( ४ ) वर्तमान धर्म ( मत - मतान्तर ) तो अपूर्ण एवम् अर्वाचीन हैं; उसका यही लक्षण है कि उनके कर्ता स्मृत किये जाते हैं । उनके है. संवत् प्रसिद्ध ही हैं । इनमें कई १०० वर्षसे, कई १००० वर्ष से कहा जा प्रचलित हुए । इनमें अधिक प्राचीन भी ५००० वर्ष से अधिक तत्वको प्राचीन नहीं; परन्तु हमारा सनातनधर्म तो अत्यन्त प्राचीन है । अपने हमने एक जैनीकी पुस्तक के मुखपृष्ठपर महावीरसंवत्सर लिखा ल तक, देखा । उसके अङ्क तीन चार पंक्तियों में आये हुए थे । इसका CC - 0. Ankur Joshi सनातनधर्मकी प्राचीनता एवं मद्दत्ता 18 Collection Gujarat. तात्पर्य उनका यह है कि- जैनधर्म अत्यन्त प्राचीन है, हो वह प्राचीन; पर सनातनधर्मकी तो संवत्सरसंख्या ही अनन्त है । इसके आरम्भकी वर्षसंख्याकी इयत्ता ही नहीं की जा सकती । बल्कि यहां · यही कहना चाहिये कि - यहां संख्या भी समाप्त हो जाती है । इस विषय में ' कल्प और सृष्टिसंवत्सर ' देखिये । ( ५ ) अन्य सम्प्रदाय - अर्वाचीन धर्मोमें जैन, बौद्ध, नास्तिक आदि बहुत से सम्प्रदाय प्रचलित हैं । उनमें जैन हमारे मूर्तिपूजा आदि सिद्धान्तों के कुछ निकट हैं । हमारे समस्त साहित्य में वेद-दर्शनादि जो साहित्य है, उसमें एक योगदर्शनके, उसके भी एक पाद ( साधन ) के, उसके भी एक सूत्र ' यमनियमासन ' ( २२२६ ) के प्रथम योगाङ्ग यम, उसके भी ' अहिंसासत्यास्तेय ( २/३० ) इत्यादि भेदोंमें प्रथम अहिंसाको प्रधानता से आश्रित करके यह जैनधर्म प्रवृत्त हुआ है; अतः हमारा एक देश है । इसके प्रवर्तक श्रीमहावीर-स्वामी हैं । बौद्धोंके प्रवर्तक गौतम बुद्ध हैं । नास्तिक मतका प्रवर्तक चार्वाक है । यह सभी भारतीय होते हुए भी बहुत अंशों में सनातनधर्मसे विरुद्ध हैं । इनके वर्ष मी नियत हैं- ये बहुत प्राचीन नहीं । इनमें जैन विक्रमाब्दसे ४०० वर्ष पूर्व और बौद्ध ६०० वर्ष पूर्व शुरू हुए । इस प्रकार अन्य हिन्दुसम्प्रदाय सनातन-धर्मके ही किसी एकदेशको मुख्यतासे आश्रित करके डेढ चावलकी अपनी अलग खिचड़ी पकाया करते हैं । ईसाई धर्म विक्रम संवत् की प्रथम शताब्दी में प्रारम्भ हुआ है । इस विषयको देखनेकेलिए पञ्चम पुष्प मँगाइये । मूल्य ८ । ) An eGangotri Initiative
पृष्ठ 24
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२० श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) उसे चलते हुए अब १६५८-५६ वर्ष हुए हैं । उसके प्रचालक श्री ईशु ख्रिस्त हैं । उनके नाम से ही वह धर्म है; इसपर बौद्धधर्म की छाप पड़ी है । फिर मुहम्मदधर्मका आरम्भ विक्रमी संवत्की छठी शताब्दी में हुआ । इसे चालू हुए १३७८ वर्ष हो गये । श्रीमुहम्मद इसके प्रवर्तक हैं । फिर सिक्खधर्म जारी हुआ । उसके प्रचालक श्रीनानकजी हैं । इनका जन्म संवत् १५२६ विक्रमी, कार्तिक के अन्तमें और देहान्त सं ० १५६६ में हुआ । उन्हें इनके अनुयायी ' गुरु ' कहते थे; अपने आपको ' शिष्य ' कहते थे । मूर्धन्य ' ष'का . उच्चारण ' ख ' और ' श ' का उच्चारण ' स ' प्रसिद्ध होने से ' शिष्य ' से यह ' सिक्ख ' कहे जाने लगे । यह श्रीनानकजी हरिहरके भक्त थे । वे विष्णुको ' श्रीवाहगुरु ' कहते थे । ' श्रियं लक्ष्मीं वहतीति श्रीवाहः, स चासौ गुरुश्च ' यह उसका विग्रह था । पर वह उसे ' स्त्रीवाहेगुरु ' कहने लगे । शिवको वे ' अकाल- पुरुष ' कहते थे । ओङ्कारके प्रेमी भी थे । श्रीगोविन्दसिंह दुर्गा - भक्त थे । मुसलमानों के साथ युद्ध में वे कई आवश्यक वस्तुएँ रखवाते थे; तब उनके शिष्योंने उन्हें साम्प्रदायिक रूप दे दिया । ये इनके मत प्रवर्तक स्वयं वेद - पुराण आदिके भक्त, देवपूजक, मूर्तिपूजक एवं हमारे निकट थे, इसमें उनका ' प्रन्थ साहिब ' ही प्रमाण है । तव कालक्रमसे इनके अनुयायियों में साम्प्रदायिकतावाद निरूढ होगया; अपने प्रवर्तकों के बनाये ग्रन्थको वे वेदकी भांति पूजने लगे । ग्रन्थके अतिरिक्त मूर्तिपूजा भी इन्होंने धीरे - धीरे ढीली कर दी । फिर श्रीनानकजीके पुत्र श्रीचन्द्रजीने स्मृति - पुराणादिमें सनातनधर्मकी प्राचीनता एवं महत्ता : कलियुग के लिए संन्यासका निषेध देखकर उस आश्रमको प्रकारान्त त से प्रचालित करने केलिए उसकी अपेक्षा बहुत सुविधाओं वाल उदासीन - सम्प्रदाय चलाया । इस सम्प्रदायवालोंने भी सनातन द य की निकटता प्राप्त करके और संस्कृत भाषा पढ़कर सनातनधर्म ध बहुत सेवा की । यह संन्यासाश्रमका देशकालानुकूल हुआ - हुछ सं नवीन संस्करण है । पर इसके अनुयायियों का विश्वास है कि था यह सृष्टिकी आदि है । ब १४५६ विक्रमी संवत्में ( ज्येष्ठशुक्ल १५ सोमबार ) श्रीकबीर कि जन्म होनेसें कबीरधर्म और १६०१ वि ० में दादूधर्म इत्यादि वहु अ सम्प्रदाय चले । परन्तु इनकी व्यापकता न हुई । १८४७० ज ब्राह्मसमाज, प्रार्थनासमाज, देवसमाज आदि सुधारक सम्प्रदा हव चालू हुएः परन्तु वेदसे सम्बन्ध न होनेसे ये व्यापक न हो सो --क्योंकि भारतका सदासे वेदसे अभिन्न सम्बन्ध रहता च प्रा आया है । कर ( ६ ) आर्यसमाज । - तब इन्हीं सुधारक समाजोंका अनुसरण का आर्यसमाज ( दयानन्दमत ) प्रचलित हुआ । इसके प्रवर्तक स्व प्रा दयानन्दजी जन्मसे ( औदीच्य ) ब्राह्मण कहे जाते हैं । सुना जा इच है कि यह कापड़ी ब्राह्मण थे - यह जियालाल जैनने अपने ग्रन्थ होत अनुसन्धान करके लिखा है, जिसका खण्डन आर्यसमाज नहीं । अंग्र सकी । इनका जन्म १८८१ विक्रमी में और देहान्त १६४० में नर चल चतुर्दशी ( दीपावली से एक दिन पूर्व ) की रात्रिको सुना जाता है । देव पर आर्यसमाज दीपावलीवाले दिन मानता है । इनके आज स्वा CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 25
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) कान्ति तीन पिताओं ( पितृनामों ) का अनुसन्धान हुआ है । आजकल ओंवाल दयानन्दाब्द १३४ है । यह अब्द सनातनधर्मी दयानन्दका है; क्योंकि नातन यह उनका जन्माब्द है । वे जन्म से लेकर बहुत वर्षोंतक सनातन-तनधर्म धर्मी रहे । फिर सुधारकों - ब्राह्मसमाज आदिकी सङ्गति पाकर हुआ- हु सं ० १६३२ से काफी कुछ बदले । पहले इनका मरणाव्द लिखा जात । है कि-था; फिर उनकी जन्म - शताब्दी १६८१ में मथुरा में की गई । वहां बहुत वाद - विवाद के उपरान्त उनका जन्माब्द ही लिखना निश्चित कबीर किया गया । इस प्रकार शताब्दी भी सनातनधर्मी दयानन्दकी ही हुई । दि वह आर्यसमाजकी शताब्दी सं ० २०३२ में होगी । १८८१ में उनका ७ वि ० जन्म हुआ । उन्हें १४ वर्षकी अवस्था में मूषकसे मूर्तिपूज्ञासे श्रद्धा सम्प्रदा हटा लेनेका ज्ञान हुआ, पर फिर भी वे बहुत समय शिवभक्त रहे; हो रुद्राक्षमाला धारण करते थे; माथेपर भस्मका तिलक लगाते थे । 1 हता प्रायः शिवमन्दिरों में डेरा डालते थे । शैवोंकी ओर से शास्त्रार्थ करते थे । वरण यह पहले तो सनातनधर्म में सुधारमात्र चाहते थे; पर फिर वर्तक प्राचीन सिद्धान्तोंमें क्रान्ति करने पर बहुतसी असंयत और सुविधाकी सुना जा इच्छुक जनताको - जिस पर अंग्रेजी रंग चढ़ चुका था अपने पक्षमें होती देख वे अपना पन्थ चलानेकी सोचने लगे । उन्होंने प्रायः नहीं अंग्रेजी - सिद्धान्तोंको हिन्दुस्तानी जामा पहराकर उन्हें वेदादिसे में न निकालने का प्रयत्न किया । ' हमारे समाजकी भी ब्राह्मसमाज-देवसमाज आदि की भांति अव्यापकता न होजावे ' - यह सोचकर आज स्वा ० दयानन्दजीने आडम्बर रूपसे वेदके साथ अपने पन्थका CC - 0. Ankur Joshi सनातनधर्मकी प्राचीनता एवं महत्ता २३ Collection Gujarat. सम्बन्ध कर दिया । अर्थमें स्वेच्छाचारिताको ही प्रधानता दी । अवशिष्ट सनातनधर्म के साहित्यकी उन्होंने वेदानुकूल होने पर ही मान्यता रखी; पर वेदानुकूलता अपने ' मनमानेपन का नाम रखा । जिस ग्रन्थका जो अंश उन्होंने अपने अनुकूल समझा; उसे वेदा-नुकूल बता दिया; और अपने अनमीष्ट अंशको वेद - विरुद्ध घोषित कर दिया । वेदको भी कतरकर उन्होंने केवल चार पोथियों में बन्द कर दिया । उसमें भी केवल योगरूढिता वा यौगिकता मान-कर अपने मनमाने सिद्धान्तोंका उनसे निकालने का असफल प्रयत्न किया । इसके फलस्वरूप वे तो जिस किसी भी पुस्तकका अपने पक्षकी पुष्टिमें प्रमाण दे सकते थे, पर यदि सनातनधर्मी उसी पुस्तकका अपने पक्ष की पुष्टिमें प्रमाण दें तो वे उसे झट वेदविरुद्ध कह देते थे । इस प्रकारके कूट- जाल में बहुत से जिज्ञासुमृग आकर बंध गये । तब सं ० १६३२ में आर्यसमाज ( दयानन्देच्छाधर्म ) चालू हुआ । उससे पूर्व उसका नाम नहीं था । उस समय भी वे मृतक - श्राद्ध तथा अन्यान्य भी मुक्तिसे न लौटना आदि सनातन-धर्मके सिद्धान्तोंको १८७५ के ' सत्यार्थप्रकाश ' में मान गये । फिर स्वामीजी ईसाई आदियोंके प्रवाहको बहता हुआ देखकर स्वतन्त्र विचारवाले और प्राचीनतासे पराङ्मुख ईसायत - प्रेमी जनोंकी अपने समाजमें बहुतायत देखकर, उनको उसमें स्थिर करनेकेलिए वैसे पुरुषोंके लिए असुविधाजनक सनातनधर्मके सिद्धान्तों को अपनी वक्तृतामें अमान्य घोषित कर देते थे; और अपनी पुस्तकों में पहले लिखी हुई उन्हीं बातोंको मुद्रकों द्वारा प्रक्षित-An eGangotri Initiative
पृष्ठ 26
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) सनातनधर्मकी प्राचीनता एवं महत्ता २३ की हुई बताकर उन्होंने वर्तमान आर्यसमाज सम्प्रदायका आधारस्तम्भ द्वितीय ' सत्यार्थप्रकाश ' बनाया । उसका मुद्रण- प्रकाशन उनके मरनेके बाद हुआ - यह आर्यसमाजी भी मानते हैं; इसमें शताब्दी-संस्करणवाले स ० प्र ० की भूमिका तथा डा ० रघुवीर सम्पादित दयानन्दीय अष्टाध्यायीभाष्यभूमिका भी देखी जा सकती हैं । अतएव उनके अनुयायिओंने उसमें यत्र - तत्र पदों वा वाक्योंकी प्रक्षिप्तता भी कर दी । इसका सम्बन्ध भी चालाकी से श्रीलेखरामजीने दया-नन्द - जीवन - चरित्र में जोड़ दिया; कई स्वा ० द ० के नामसे कल्पित पत्रों से भी । यह बात अवश्य मननीय है कि यदि स्वामीजीने अपना यह सम्प्रदाय न चलाया होता; तो इतनी उनकी जनश्रेणी आज ' ईसाई ' होती; पर आज वह हिन्दु है; नाममात्र से सही, पर वेदको मानती है और अन्य जनश्रेणीको भी ईसाई वा मुसलमानी सम्प्रदाय से यथाशक्ति बचाती है । इस अंशमें स्वा ० दयानन्दजीका देशोपकार अवश्य मननीय है । जो कुछ भी हो; स्वामीजीके अनुयायियोंने उनके जीवन-चरित्रोंमें कृत्रिम माहात्म्य डालकर उन्हें यत्र - तत्र विख्यात कर दिया । इससे उनकी दूकान चल निकली । विख्यात करनेके प्रकार भिन्न - भिन्नोंने भिन्न - भिन्न ढंगके अपनाये । लाहौर डी ० ए ० वी ० कालेजके हिन्दी - विभागाध्यक्ष श्रीसूर्यकान्त शास्त्री M. A. M. O. L. ( वेदान्तरत्न, व्याकरणतीर्थ ) ने ' हिन्दी साहित्यका विवेचनात्मक इतिहास ' ( प्रथमावृत्ति ) में स्वा ० दयानन्दजीको हिन्दी भाषाके बीजारोपक सिद्ध करते हुए यह लिखा- ' ऋषिके प्रायः सभी ग्रन्थ हिन्दी गद्य में लिखे हैं । आपकी भाषा अत्यन्त ललित तथा मंजी - कसी होती है ' यह लिखकर उनकी हिन्दी - भाषाका आदर्श ' साधनचन्द्रिका ' के उपासना - विज्ञान-से दिखलाया — ' श्रीभगवान् रसके सागर हैं ' इत्यादि ६ पंक्तियाँ । इसमें कोई सन्देह नहीं कि भाषा बड़ी सुन्दर है; पर वह आर्य-समाजके स्वा ० दयानन्दजीकी नहीं, किन्तु भारतधर्म- महामण्डल के स्वा ० दयानन्दजीकी है । यह कितना बड़ा साहस है? यही बा स्वामीके अनुयायियोंने स्वामी के चरितके पुस्तकों में कर डाली है, वाद भर दिये हैं । अस्तु - जो कुछ भी हो । यह आर्यसमाज भी सनातनधर्मकी अन्य शाखाओं से निकटकी तथा अत्यन्त अर्वाचीन शाखा है.. भ इसीलिए इसकी हरियालीको देखकर लोग इसपर अनुरक्त हो जाते हैं । यदि यह प्रक्षिप्ततारूप ब्रह्मास्त्रका आविष्कार, तथा ब्राह्मणोंको गालिप्रदान न करता; तो यह अवश्य सनातनधर्म में विलीन हो जाता, परन्तु इस दोष से उससे पृथक् होगया । ' अव तो यह स्त्रा ० दयानन्दजीके सिद्धान्तों से भी क्रम - क्रम से पश्चात्पद त हो रहा है ' - यह हम ' स्वा ० दयानन्दजी और आर्यसमाज ' इस प निबन्धमें किसी पुष्पमें बताएंगे । सनातनधर्मसे तो दूर जा ही रहा है ।सनातनधर्म और आर्यसमाज में तारतम्य । म ठ ( ७ ) आर्यसमाज प्रायः ' एव ' ( ही ) वादी है, और ' सनातनधर्म ' हु है ' अप ' ( भी ) वादी । सनातनधर्मने जिस - जिस सिद्धान्तको ' भी ' CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 27
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) आपकी लिखकर शब्दसे दोनों प्रकारका माना; आर्यसमाजने ' ही ' वादी बनकर उन विज्ञान- दो सिद्धान्तों में एक सिद्धान्त अपना बना लिया । जैसेकि -सनातनधर्म परमात्माको निराकार भी मानता है, साकार भी; क्तियाँ । पर आर्यसमाज उसे निराकार ही मानता है । स ० ध ० सन्ध्या-हवन भी करता है, मूर्तिपूजा भी; पर आ ० स ० केवल सन्ध्या - हवन एडल ही करता है, मूर्तिपूजा नहीं । सव्ध ० कर्मकाण्ड - उपासनाकाण्ड तक मूर्तिपूजा मानता है, ज्ञानकाण्डमें उसे आवश्यक नहीं मानता; ली है । परन्तु आ ० स ० उसे सदा ही अनावश्यक मानता है । स ० ध ० प्रवृत्तिमार्ग मी चाहता है, निवृत्तिमार्ग भी, पर आ ० स ० प्रवृत्ति-धर्मकी मार्गको ही । स ० ध ० जन्मना वर्ण - व्यवस्था मानता है और गुण खा है,. कर्म से सम्मान; पर आ ० स ० गुणकर्मानुसार ही वर्ण - व्यवस्था हो मानता है । स ० ध ० मन्त्र -भाग को भी एवं ब्राह्मण - भागको भी वेद → तथा मानता है, पर आ ० स ० केवल मन्त्र -भागको ही । स ० ध ० मन्त्र-धर्म भाग में वर्तमान चार संहिताओं को भी वेद मानता है, शेष सभी | अव मन्त्र - संहिताओं को भी; पर आ ० स ० केवल वर्तमान चार संहि-श्वात्पद ताओं को ही वेद मानता है । स ० ध ० वेदों और तदनुकूल स्मृति, ज ' इस पुराण, इतिहासों को भी प्रमाण मानता है; पर आ ० स ० केवल जाही वेदोंको; उनमें भी अर्थ अपनी इच्छानुसार मानता है । स ० ध ० मृतक पितरोंका श्राद्ध भी करता है, जीवितों की सेवा भी; पर श्र ० स ० जीवितोंका ही श्राद्ध चाहता है । स ० ध ० अपने किये धर्म ' हुए सुकर्मका फल अपने को भी मानता है, पितर आदि दूसरेको को ' भी ' भी; पर ० स ० केवल अपनेको हो । स ० ध ० परमात्माकी पूजा CC - 0. Ankur Joshi Collection सनातनधर्मकी प्राचीनता एवं महत्ता २७ भी चाहता है, देवताओंकी भी पर आर्यसमाज परमात्माकी हो । स ० ध ० पारमार्थिकता में अद्वैतवाद मानता है, और भक्तिवाद वा उपासनामें द्वैतवाद भी पर आर्यसमाज केवल द्वैतवादको ही । स ० ध ० जीवात्माको पूर्वजन्म कर्मो के अनुकूल कर्मोंमें परतन्त्र भी मानता है, शेष स्वतन्त्र, पर आ ० स ० तो केवल स्वतन्त्र | सु ० ध ० चारों वर्णों को स्पृश्य मानता है, अवर्णो चाण्डालादिको अस्पृश्यः पर आ ० स ० संमीको स्पृश्य । स ० ध ० द्विजोंको यज्ञोपवीत देता है, स्त्री - शूद्रादिको नहीं; पर श्र ० स ० तो सभीको ही देता है । स ० ध ० मङ्गलार्थ आदिमें ' ॐ को भी रखता है ' श्रीः ' को भी, पर आ ० स ० केवल ' ओ ३ म् ' को । स ० ६० ज्योतिषमें गणित फलित दोनों को मानता है पर श्र ० स ० केवल गणितको ही । स ० ० पृथिवीको अधिकांशमें अचल मानता है, एकांश में पृथिवीकी गति-को भी; पर आ ० स ० केवल पृथिवीका घूमना ही मानता है, स्थिरता नहीं । स ० ध ० कालमृत्युको भी मानता है, अकालमृत्युको भी, पर श्र ० स ० कालमृत्युको ही । स ० ६० पुनरावृत्ति रूप स्वर्गको भी मानता है, अपुनरावृत्ति रूप मुक्तिको मी; पर आ ० स ० पुनरावृत्तिको ही मानता है, और नाम उसका ' मुक्ति ' रखता है, स्वर्ग नहीं । स ० ध ० अहिंसा को भी मानता है, राजादिकी मृगया में तथा विशेष यज्ञोंमें पश्वालम्भादिको भी मानता है, उसे भी कलिवर्जित; पर आ ० स ० अहिंसामात्र मानता है । इस प्रकार अन्य सिद्धान्तों में भी समझ लेना चाहिये; पर अब आर्यसमाज कई सिद्धान्तों में अपने स्वामीसे भी दूर जा रहा Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 28
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) है । स्वा ० द ० विधवाविवाहको द्विजों में नहीं चाहते, किन्तु ' नियोग ' चाहते हैं; पर आ ० स ० नियोग नहीं करता; पर विधवाविवाह करता है, इससे आ ० स ० स्वामीजी के अनुसार विधवाविवाहकर्ताओं को शूद्रसमाज बना रहा है । स्वामीजी सत्यार्थप्र ० द्वितीय समुल्लास-के अनुसार द्विजों के लिए ' आचार्यकुल ' में तथा शूद्र - अन्त्यजादिके लिए गुरुकुलों में अध्ययन बताते हैं; पर शूद्रोंसे सहानुभूतिकर्ता आर्यसमाजी सभीको गुरुकुलों में भेजते हैं, आचार्यकुल उन्होंने बनाये ही नहीं । स्वामी अन्त्यजोंकी अस्पृश्यता मानते थे; शूद्रोंको यज्ञोपवीत देना नहीं मानते थे, पर श्र ० स ० इससे विपरीत दिशामें चल रहा है । स्वा ० दयानन्द चाण्डालादियोंके हाथका भोजन करना नहीं मानते थे, पर आर्यसमाजी भङ्गीका भोजन प्रेमसे करते हैं । स्वामीजीने कन्याओंका यज्ञोपवीत किसी अपनी पुस्तक में नहीं लिखा; पर आर्यसमाज उसीमें आमही है, कहीं - कहीं उनके लेख स ० प्र ०, वेदभाष्यादिमें इस विषय में प्रक्षेप भी कर दिया गया है । अब आ ० स ० स्वा ० द ० की संस्कारविधिमें कई ( स ० ध ० जैसी ) विधियाँ दूर करना चाहता है और विवाहसंस्कार-का संक्षेप करना चाहता है । स ० प्र ० के दूसरे संस्करणसे आज-तक के संस्करणों में स्थान - स्थान पर संशोधन किया गया है; क्योंकि यह अपनी सुविधाओंको देखता है, और वेदादिका भी तदनुसार अर्थ करता है । आर्यसमाजका जन्म सनातनधर्मसे ही हुआ है । इसके प्रवर्तक स्वा ० दयानन्दजी हैं; वे एक मूर्तिपूजक सनातनधर्मी के जिनका नाम पहले तो अम्वाशङ्कर पर अब करसनजी तिवारी CC - 0. Ankur Joshi Collection सनातनधर्मकी प्राचीनता एवं महत्ता २६ कहा जाता है - पुत्र थे । स्वा ० द ० से पूर्व यह ऐकदेशिक विचार नहीं थे, और न उन्होंने उन्हें माताके गर्भ से सीखा; किन्तु सनातनधर्मके शास्त्रोंको आपाततः पढ़कर उन्होंने कई स्वेच्छा सिद्धान्तोंका संग्रह करके उन पर वैदिकता की मुहर लगा इस सम्प्रदायको जारी किया । आर्यसमाजकी सनातनधर्म से पर्याप्त निकटता होनेपर भी उसका सनातनधर्मके साथ बहुत खिंचाव है; अ हमने उस मतकी जहाँ - तहाँ आलोचना भी दी है । दूसरे मतवादी सनातनधर्मसे सर्वथा दूर हैं; अतः उनसे सर्वथा सम्बन्ध न होनेसे उनकी आलोचना हमने व्यर्थ समभी है । ( ८ ) फिर आर्यसमाजके बाद उससे ही एक वर्ग ' सुधारक ' नाम वाला प्रकट हुआ । आर्यसमाज में जो सनातनधर्मके शिखा, यज्ञोपवीतादि नियम थे, सुधारकने उसमें असभ्यता समझी- अतः उनका पहनना भी बन्द कर दिया । यह वर्ग स्वा ० द ० का नाम रखकर काम उनसे विरुद्ध करता है । यह अपने वेद से न सम्बन्धित भी कर्मोंको वैदिक कहता है । अब प्राचीन आर्यसमाजका प्रायः विलय होगया है । उसमें अब सुधारकों का ही बाहुल्य है । इस प्रकार अन्यान्य भी बहुत से सम्प्रदाय वा मतवाद हुए - जो सनातनधर्मियोंके आलस्य वा उपेक्षा वा भूलों से बने हैं । कई तो सनातनधर्मके सिद्धान्तोंमें कठिनता देखकर उसके एक सिद्धान्तको प्रधानतासे अवलम्बन करके चालू हुए | उन मतोंके सभी सिद्धान्तों को जांचें; तो उनमें सनातनधर्मके सिद्धान्तका मूल अवश्य प्राप्त Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 29
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२६ ३० श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) विचार होगा | सनातनधर्मंने वेद, स्मृति, पुराण- इतिहास आदि सभीको किन्तु अपने - अपने विषय में अधिक प्रमाण माना; उनमें आर्यसमाजने नुसारी नाममात्र वेदको ही प्रधान रख लिया । और स ० ध ० के दो - दो अपने सिद्धान्तों में एक - एक ले लिया, जैसेकि पूर्व बताया जा चुका है । इस प्रकार जैनोंने सनातनधर्मकी मूर्तिपूजा प्रधानतासे स्वीकृत कर भी ली । पर अपनी भिन्नता के लिए प्रकार - भेद तो करना ही था । ग्रन्थ में इस प्रकार बौद्ध - जैनोंने स ० ध ० की सिद्धान्तित अहिंसाको ही तवादी प्रधानता से अवलम्बित कर लिया । स ० ध ० में रजोगुणी - एवं हो + तमोगुणी व्यक्तियों के लिए हिंसा भी यज्ञ - विशेपोंमें नियमित की गई थी, मुसलमानोंने प्रकारान्तर से उसीकी प्रधानता बना ली । सनातन-सुधारक ' धर्म में पञ्चशिखाका धारण भी आता है; फिर चूड़ाकरणके अवसर शिखा, पर कई सभी शिखाओं को मूंड देते हैं, कई मुख्य शिखाको रखते की- अतः हैं, मुसलमान भी कई शिखाओंको पहले रखते हैं; फिर उन्हें का नाम कटवा देते हैं । हिन्दुओं से उन्होंने अल्ला ( आदिशक्ति अम्बादेवी ) म्वन्धित की पूजा सीखी । इस प्रकार ईसाइयोंने सनातनधर्मका अवतारवाद का प्रायः माना, गिरिजा ( देवी ) घर उपासनाकेलिए बनाए । सिक्खोंने 1 स ० ध ० से ग्रन्थपूजा सीखी । इस प्रकार दूसरे मतोंमें भी देख हुए जो लेना चाहिये । कई तो कइयोंने स ० ध ० में बहुत कठिनता तथा बहुत संयमका सद्धान्तको सिद्धान्त देखकर अपने सुविधानुसारी सम्प्रदायों को चलाया । सिद्धान्तों जिन्हें सुविधाका चस्का लग गया है— उनके आगे भी अवान्तर-श्य प्राप्त सम्प्रदाय चलेंगे । सुविधार्थ ही बने हुए आर्य समाज में बहुत से दल CC - 0. Ankur Joshi सनातनधर्मकी प्राचीनता एवं महत्ता ३१ Collection Gujarat. वने; अब मुख्यतः घासपार्टी ( गुरुकुलपार्टी ) और मांसपार्टी ( कालेज पार्टी ) अवशिष्ट हैं । सनातनधर्मं समीसे प्राचीन है; यह सभी धर्मोका पिता है; इसके सिद्धान्त स्थिर हैं; देशकाल के अनुसार शीघ्र नहीं बदलते । वह देखकर कई क्रान्तिके प्रेमी इससे उदास हो जाते हैं । इसका साहित्य सुदृढ है । उसके सिद्धान्त इस स्वैराचारके युग में भी यत्र - तत्र फैले हुए ही हैं । यदि सनातनधर्मी अपने साहित्यको देखने में लगे रहें; और अपनी लेखशक्ति तथा वाक्शक्ति बढ़ा लें; तब उनका प्रतियोगी कोई सम्प्रदाय नहीं रह सकता । इसी सनातनधर्मने प्राचीनकालमें नास्तिक, बौद्ध, जैन आदि सम्प्रदायोंके साथ शास्त्रार्थ करके उन्हें प्रायः समाप्त कर दिया; उनका प्रभाव भारतसे हटा दिया । यह अभी भी स्थिर है, आगे भी रहेगा । इस सनातनधर्म में अब भी इतने विद्वान हैं, जो भिन्न सम्प्रदायवाले विद्वानोंको वर्षों पदा सकें । इसकी जन - संख्या ब भी इतनी है कि उसमें सारे भिन्न सम्प्रदाय अपना ट्रेडमार्क पहिरकर भी इस प्रकार छिप जानें कि बहुत हूँढनेसे भी न मिलें । इसमें अब भी इतनी धनराशि है, जिससे भिन्न सम्प्रदायवाले अपने कपड़े, गहने, घरों आदिके साथ खरीद लिये जावें । यह धर्म गम्भीर है, वृन्द होनेसे चल नहीं है । कई अर्वाचीन धर्माभास आघे घड़े की तरह यद्यपि खूब छलकने वा चिल्लानेवाले युवा एवं चञ्चल है, उनमें कार्यस्फूर्ति तथा शोर मचाना भी दीखता है; तथापि उनमें परिणामके चिन्तनकी शक्ति वा दूरदर्शिता नहीं । इसीके फलस्वरूप वे जिस किसी आन्दोलनको An eGangotri Initiative
पृष्ठ 30
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) प्रारम्भ करते हुए भी उसका परिणाम विषैला देखकर उसमें परिवर्तन करने में बाध्य हो जाते हैं और नया आन्दोलन शुरू कर देते हैं । उन्होंने शीघ्रता में मोटरकी गति स्वीकार कर रखी है, पीछे देखना उनका काम नहीं; वे दूसरों पर धूल डालते जाते हैं; पर उस मोटरको शीघ्र चलनेवाला तथा सुन्दर देखकर जनता उस पर लट्टू होकर उसके पीछे दौड़ पड़ती है- अपने पर मट्टी पड़ती हुई भी नहीं देखती । पीछे जब वह मोटर उनसे परे भाग जाता है; तब तदनुगामी जनता अपनेपर गन्दा धुत्रां वा मट्टी पड़ी - देखकर लज्जित हुई- हुई उस मोटरके चालकको गालियां देती है, फिर उस पुराने रास्ते पर चलने को बाध्य होती है । इसमें सनातनधर्मकी गम्भीरता तथा दूरदर्शिता ही कारण है । ( ६ ) सनातनधर्म यद्यपि मँहगा धर्म है, दूसरे धर्माभासस्ते हैं; तथापि " मँहगा रोये एकत्रार, सस्ता रोत्रे बार - बार " यह लोकोक्ति भी ठीक घटती है । पुराने पुरुष जलकेलिए कुत्रां खुदवाते थे-वह मँहगा पड़ता था; पर वह सदा के लिए स्थिर हो जाता था; परन्तु आजकलके थोड़े खर्च वाले ' हैंड- पम्प ' ( नल ) जड़ते हैं; उनका फल मी वैसा होता है । उनको बार - बार सुधरवाना पड़ता है फिर भी जल्दी टूट जाते हैं; अन्त में उन्हें छोड़ ही देना पड़ता है । अथवा वाटरवर्क्स वाले नल आते हैं; वे भी समय - समयपर धोखा देते हैं, और मैलवाला जल पिला दिया करते हैं । यह बात अर्वाचीन धर्मो में स्वयं घटा लेनी चाहिये । अर्वाचीन मतों में यह भी एक दुर्बलता है कि वे दूसरे धर्मोकी CC - 0. Ankur Joshi Collection सनातनधर्मकी प्राचीनता एवं महत्ता केवल निन्दा ही करते हैं, उनका खण्डनमात्र ही करते रहते हैं, उन पास मण्डनकी सामग्री बहुत कम होती है । वे भिन्न मतावलम्बियों को अपने मतोंसे च्युत करनेमें भांति - भांति के उपायोंसे चेष्टा करते हैं; परन्तु सनातनधर्म ऐसा नहीं । वह नवयुवककी मांति क्रोधी नहीं, चञ्चल वा अधीर नहीं; बल्कि वह शान्तिप्रिय तथा स्थिर कार्यबाला, सबकी अस्थि - मज्जा में पहुँचा हुआ है । इसमें अन्य सम्प्रदायों की भांति छलका बल नहीं; किन्तु सत्यका बल है । मतमतान्तरोंमें ग्रन्थोंके अर्थों में ब्लैकमार्केटिङ्ग की जाती है, इसमें ऐसा नहीं । मतमतान्तरोंमें सभी प्रकार के पुरुषोंके लिए एक प्रकारकी ही साधना - सरणि बताई जाती है । चाहे कई मूर्ख हो वा बुद्धिमान्; संन्यासी हों वा गृहस्थी; धनी हों वा दरिद्रः ब्राह्मण हो वा शूद्रः उन सबको एक ही साधन - सोपानपर चढ़ना पड़ता है; । परन्तु सनातनधर्म में अंपूर्णता नहीं है । इस अपौरुषेय धर्म में अधिकारिभेदसे बहुत से साधनभेद बताये जाते हैं । विविध श्रेणीके मानव अपनी योग्यता के अनुरूप साधनको अपनाकर अपना उपकार कर सकते हैं । यह धर्म भिन्न - भिन्न अधिकारियों को समान ही मार्ग में चलनेको बाध्य नहीं करता । इसलिए इसकी शाखाएँ पाताल तक पहुंची हुई हैं । इसी गहराई से हटकर दूसरे-दूसरे मत - मतान्तर इसके ज्ञानमें कठिनता समझकर नूतनताको अपनाते हैं, अतः उनका मूल स्थिर नहीं होता । यह सनातनधर्म अनादि है, अनन्त है, ईश्वरीय है, सर्वदा एकरस है, प्राणिमात्रका कल्याणकारी है । इसका साहित्य अपरि ३ स ० ध ० Gujarat. An eGangotri Initiative