सनातन धर्मलोक ६ — पृष्ठ 121–130
सनातन धर्मलोक ६ · पृष्ठ 121–130
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२१६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) आदिका पूजाविधि बताई गई है । से कहे ( ४ ) पहले बताया जा चुका है कि - यज्ञमें द्विजका, एवं यज्ञो-प्रकारोको पबीतीका अधिकार होता है, द्विज - भिन्न एवम् अयज्ञोपवीती दिष्व मागिर आदिका नहीं । इसी कारण यज्ञकी अग्नि भी इन्हींके घरसे लाई दोनों को जाती है, शूद्रके घर से नहीं । गोमिलगृह्यसूत्र में यही कहा है-सिद्ध होन ‘ आगाराद् ब्राह्मणस्य वा, राजन्यस्य वा, वैश्यस्य वा ' ( १११ १६ ) यहाँ शूद्रका नाम न लेनेसे शूद्रका यज्ञमें अनधिकार सिद्ध हो रहा है । सूक्ष्मभा खादिरगृह्यसूत्रमें इसी को स्पष्ट कर दिया है- ' बहुयाजिनो वा कासे पि. आगारात, शूद्रवर्जम् ' ( ११५५ ) जैसे श्र ( ख ) ब्राह्मणभागात्मक - वेदमें भी यही कहा है- ' न वै देवाः देवमूर्ति में सर्वेणेव संवदन्ते, ब्राह्मणेन वैव, राजन्येन वा, वैश्येन वा । ते हि है यह यज्ञियाः ' ( शतपथब्रा. ३ | १ | १ | १० ) यहाँ बताया गया है कि- देवता द्विजोंको ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यसे संवाद करते हैं, शूद्रसे नहीं । इसका कर्मकार भाव भी यही है कि - यज्ञका अधिकार द्विजसे भिन्नको नहीं होता । यज्ञोप जिसने यज्ञमें दीक्षा ले रखी है, उसे शूद्रसे बातचीत करनी हो; ने पड़ते है तो वह सीधे उससे बोल नहीं सकता; ( क्योंकि वह मी देववत् भाग । होता है ' देवो भूत्वा देवानेति ' ) बीचमें अन्य, यज्ञमें अदीक्षित धमें देखि ब्राह्मण, क्षत्रिय वा वैश्यके द्वारा ही उस शूद्रसे बात हो सकती है यह भी कि - ' इस ( शूद्रको ) यह कह दो, वह बात कह दो ' - ' तस्माद् यदि कार है + ए ँ [ यज्ञदीक्षितं ] शूद्रेण संवादो विन्देद्ः एतेषामेव [ ब्राह्मण-लटने प क्षत्रिय - वैश्यानां मध्ये ] एकं ब्रूयाद्, इममिति विचव, इममिति के, बिन विचक्ष्व - इत्येष उ तत्र दीक्षितस्य उपचार: ' । यह भी उसी शतपथ-देवमन्दिर प्रवेश २१७ ब्राह्मण में इसी स्थलमें लिखा है । इसे शतपथने स्पष्ट कर दिया है- ' ब्राह्मणो वैव, राजन्यो वा, वैश्यो वा, ते हि यज्ञियाः ' ( ३ | १ | ११६ ) यहाँ यज्ञका अधिकार द्विजोंको दिया गया है, द्विज - मिनोंको नहीं । ' ब्राह्मणो वैव ' से ब्राह्मण को द्विजों में विशेषता दी गई है । यह ब्राह्मणभागात्मक वेदका कथन है । जो इसे वेद नहीं मी मानते, तथापि प्रमाणित दृष्टिसे वे भी इसे अवश्य देखते हैं । ( ५ ) केवल ब्राह्मणभाग ही नहीं, मन्त्रभागात्मक - वेदमें भी यही कहा है- ' अयं स होता यो द्विजन्मा ' ( ऋ. ११४६५ ) ' अमि द्विजन्मा... होता यजिष्टः ' ( ऋ. ११४६४ ) । यहां अग्निरूप होता का द्विज होना कहा गया है, सो द्विज यहांपर ब्राह्मणवाचक है; तथापि उसके उपलक्षणसे तीनों द्विज ( ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ) यज्ञके अधिकारी सूचित किये गये हैं । यही महाभारतमें मी कहा गया है— ' यजन्ते च महायज्ञैस्त्रयो वर्णाः पृथग्विधैः ' ( शान्तिपर्व. ६८ । ३४ ) ' यष्टव्यं त्रिभिर्वर्णैर्यथाविधि ' ( ७६।१२ ) । तव यज्ञमें शुद्रका अधिकार सिद्ध न हुआ । इसलिए कृष्णयजुर्वेद में भी कहा है-‘ तस्मात् शूद्रो यज्ञे अनवक्ल तः, नहि देवता अन्ववसृज्यत, तस्मात् पादौ उपजीवतः ' पत्तो हि असृब्येताम् ' ( त. सं. ७ १११ ( ६ ) यहां शूद्रके यज्ञमें अनधिकारका कारण यह बताया गया है कि जैसे मुख, वाहु, ऊरुसे तीनों वर्णोंकी उत्पत्ति अपने आराध्य अग्नि, इन्द्र, विश्वेदेव इन तीन देवताओं, तथा गायत्री, त्रिष्टुप, जगती छन्दके साथ बताई गई है; वैसे शूद्रकी उत्पत्तिके साथ किसी देवता तथा वेदप्रवेशक गायत्री, त्रिष्टुप, जगती छन्दकी उत्पत्ति CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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२१८ श्रीसनातनधर्मा लोक ( ६ ) नहीं बताई गई है, यह हम गत - निबन्धमें स्पष्ट कर चुके हैं, इसलिए शूद्रको न कभी वेदप्रवेशक - उपनयनका अधिकार है, न ही वैदिक - देवपूजा ( वेदमन्त्र - प्रतिष्ठापित देवताकी मूर्तिके पूजन-नमन ) का अधिकार है । ( ख ) यही बात ताण्ड्य - महाब्राह्मण में भी कही गई है - ' सपत्त एव ( पादात् ) एकविंशमसृजत्, न काचन देवता, शूद्रो मनुष्यः । तस्मात् शूद्रोऽयज्ञियः, विदेवो [ देवरहितो ] हि, नहि काचन देवताऽन्व-सृजत ' ( ६।६।१० ) यहां भी स्पष्टरूप से शुद्रको विदेव - देवरहित कहा है | इसका भाव यह हुआ कि वेदके मतमें शूद्रको वेदमन्त्र - संस्कृत यज्ञ तथा वैसी देव - मूर्तिकी पूजामें अधिकृत नहीं किया गया । वेदानुसारिणी मनुस्मृति में भी इसी वेदवचन के अनुकूल कहा गया है— ' न हि शूद्रस्य यज्ञेषु कश्चिदस्ति परिग्रहः ' ( ११।१३ ) । ( ग ) ' स्तुता मया वरदा वेदमाता प्रचोदयन्तां पावमानी द्विजानाम् ' ( अथर्व. १६।७१ । १ ) यहां पर वेद में द्विनोंसे भिन्नको वेदका अधिकार नहीं दिया गया, यह गत- निबन्ध में स्पष्ट किया जा चुका है; तब मूर्तिपूजा में भी शुद्रका अधिकार शास्त्रीय नहीं; क्योंकि— प्रस्तरादिमूर्तिकी भी द्विजोंसे अधिकृत वेदमन्त्रोंसे प्रतिष्ठा करके • उसे देवमन्दिर में प्रतिष्ठापित किया जाता है; तब उसमें शूद्रवर्णका भी जब अधिकार नहीं; तब अवर्ण - अन्त्यजादिका अधिकार भला उसमें कैसे हो सकता है? ( ६ ) इसोका संकेत एक वेदमन्त्र में अन्यत्र भी मिलता है- ' ऋषीणां प्रस्तरोऽसि, नमोस्तु दैवाय : प्रस्तराय ' ( अथर्व. १६।२।६ ) ' ऋषि ' का अर्थ वेदमन्त्र अथवा उनके CC - 0. Ankur Joshi Collection देवमन्दिर प्रवेश प्रकटकर्ता द्विज ऋषिजन हैं, क्योंकि ऋषियों में कोई शूद्र - अनार ऋपि नहीं । ( इसे तृतीय पुष्पसें देखिये ) । उक्त मन्त्रमें बताया है कि तू ऋषियों का प्रस्तर है, अर्थात् वेदमन्त्रों से प्रतिष्ठापित पत्थर वा आसन है । उस दैव - देवसम्वन्धी प्रस्तर जो वेदमन्नोचे प्रतिष्ठापित है उसको नमस्कार हो । इससे वेदमन्त्रोंसे न प्रतिष्ठि हुए प्रस्तरको वैदिकोंके नमस्कारका अभाव सूचित होने से, वेद-मन्त्राधिकार - विरहित शूद्र - अन्त्यजादि के प्रस्तर ( मूर्ति ) में ऋषियो सन्तान द्विजके नमस्कारका अधिकार भी सिद्ध न हुआ । इसे प्रकार द्विज - ऋषियोंसे प्रतिष्ठापित प्रस्तर ( मूर्ति ) में शुद्र - अन्त्यज्ञादि का भी अधिकार सिद्ध न हुआ । ( ७ ) इसीलिए ' पत्युर्नो यज्ञसंयोगे ' ( ४ | १ | ३३ ) इस पाणिि सूत्रके महाभाष्य में द्विजोंके यज्ञसंयोग होनेसे उन्हींको खोरे मुख्यतासे ' पत्नी ' कहा है, परन्तु शूद्रको यज्ञाधिकार न होने से उस ( म स्त्रीको मुख्यता से ' पत्नी ' नहीं माना गया, किन्तु अङ्ग विन्यासां शुद्ध समानतासे ' पत्नीव पत्नी ' इस उपचारमात्रसे उसे ' पत्नी ' नि • जाता है । उपचारसे किया जानेवाला व्यवहार, मुख्य न होनेसे शास्त्रीत शक नहीं माना जाता । इसीलिए वादि - प्रतिवादिमान्य महाभाष्य में व तुम तक कहा है कि जिस द्विजकी दस - पीढ़ियों में भी किसीको शुद्ध गय स्त्रीरही हो; तो ' शूद्रावेदी पतत्यत्रेः ' ( मनु. ३।१६ ) इस स्मरणक शूद्र वह द्विज भी सोमका उपयोग अर्थात् यज्ञ नहीं कर सकता । हि याज्ञिकाः पठन्ति - ' दशपुरुषानूकं यस्य शूद्राः ( शुद्रजाती यात्रियो देव न विद्येरन्; स सोमं पिवेत् ' ( ४ | १ | ६३ ) ' सोमपान यहां यहाँ अन्य Gujarat. An eGangotri Initiative
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२२० श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) शूद्र - धन्यर अभिप्राय से है । जैसे कि - ' सोममर्हति यः ( ४ । ४ । १३७ बताया ग पाणिनिके वैदिकसूत्रकी व्याख्या में ' सोम्यो ब्राह्मणः ' का ' यज्ञार्हः ) इस प्रतिष्ठापित इत्यर्थः ' यह अर्थ काशिका - कौमुदी आदिमें कहा गया है । सो वेदमन्त्रोंये शूद्राके निषेधका कारण महाभाष्यके प्रदीप में प्रख्यात - विद्वान् नप्रतिनि श्रीकैयट ने यह लिखा है- ' शूद्राः विवाहिताः, ' शूद्रा वेदी पतत्यधः ' नसे, बेर इति वचनात् पतनहेतुः शूद्रा । एकस्मिँश्च पतिते सर्वेषां पात इत्येतद् - ऋषियो ' दशपुरुषानूक ' शब्देन उक्तं भवति ' । तब यज्ञ में याज्ञिकोंका ही हुआ । इसे वचन माननीय होगा । इससे भी यज्ञमें शूद्रका अधिकार निषिद्ध अन्त्यजादि सिद्ध हो रहा है । मूर्तिपूजा भी यज्ञ है - यह हम पूर्व बता ही चुके हैं । पाणिनि ( ७ ) शुद्रको यज्ञका अधिकार न होनेसे ही युधिष्ठिर को यज्ञ-ड़की हे वेदी के पास कोई भी शूद्र नहीं था, यह पञ्चमवेद - रूप- इतिहास होनेसे उस ( महाभारत - रामायण ) में आया है - ' न तस्या: ( यज्ञ - वेद्याः ) सन्निधौ विन्यास शूद्रः कश्चिदासीद् न चाऽव्रती । अन्तर्वेद्यां तदा राजन्! युधिष्ठिर-पत्नी ' निवेशने ' ( २ | ३६ | ६ ) । इसी प्रकार ( वाल्मीकि रामायण ) में भी ' न से शास्त्र शक्या यज्ञमध्यस्था वेदिः स्रुग्भाण्डमण्डिता ।...... · ' चाण्डालेनावमर्दि-माध्य में तुम् ' ( २५६।१८ ) यहाँ यज्ञ वेदिका चाण्डाल - स्पर्श निषिद्ध किया केसीको शु गया है । इस प्रकार यज्ञ - वेदि ( देवमन्दिर ) में स्थित मूर्ति में भी स्मरण शूद्रकी संनिधि एवं चाण्डालावमर्दन पञ्चमवेदसे भी निषिद्ध है । कता ( ख ) इसलिए वेदमें भी कहा है- अन्यत्रतममानुषम् अयज्वानम् नातीयविष अदेवयु - • दस्युम् ' ( ऋ. ८७०।११ ) ' अकर्मा दस्युरभि नो अमन्तुः, यहां यह अन्यन्त्रतो अमानुषः ( कुत्सित मनुष्यः ) । त्वं तस्य दासस्य ' ( ऋ. देवमन्दिरकी वैदिकता २२१ १०।२२८ ) यहाँ पर वेदने दस्यु दासको अमानुष - कुत्सित पुरुष, अयज्या - यज्ञहीन, अदेवयुः - देवमन्दिरके प्रवेश में अनधिकृत, बताया है । ' देवं - देव - सदनं देवमन्दिरं यातीति देवयुः, न देवयुरिति अदेवयुः ' सो देवसे देवमन्दिर इष्ट होता है; क्योंकि वह देवायतन-देवसदन होता है - ' तात्स्थ्यात् ताच्छच्यम् ' यह एक न्याय है । ( ८ ) देव - सदन ( देवमन्दिर ) का निर्माण वेदसम्मत है; इसमें कुछ वेदमन्त्र देखिये –'योनिष्टे इन्द्र! सदने अकारि ' ( सामवेद सं. ३: ६/२, पू. ४ | ३ | २ ) यहाँ पर इन्द्रकी सदन ( मन्दिर ) में योनि ( स्थिति ) कही गई है I । इन्द्रसे विष्णु ( श्रीकृष्ण ) गृहीत हो जाते हैं । तभी भगवद्गीता में कहा है- ' देवानामस्मि वासवः ( इन्द्रः ) ' ( १०।२२ ) । वेदान्तदर्शन ( १।४।२७ सूत्र ) के शाङ्करमाध्यमें कहा है-' स्थानवचनोपि ' योनि ' शब्दो दृष्टः- योनिष्टे इन्द्र! निपदे अकारि तम् आ निषीद ' बनवाया है; उसमें निघण्टु ( ३४ ) में है । निरुक्त ( २ लिखा है । स्वा. द कहा है । उन्हीं की ' घरके ' किया है ( हे इन्द्र! तुम्हारे रहनेकेलिए हमने मन्दिर आकर प्रतिष्ठित होवो ) ( ऋ. १११६४१ ) । वैदिक-भी ' योनि ' शब्द गृह ( मन्दिर ) वाचक आया . ६ पा. २ खं. ) में भी ' योनि ' का अर्थ ' स्थान ' . के यजुर्वेद के संस्कृत माध्य में भी ' योनिर्गृहम् ' संस्कारविधि ( १८० पृष्ठ ) में ' योने: ' का अर्थ । तब ' इन्द्र ' - जिसका वादी ' इन्द्र ' मित्रं ' के अनुसार ' परमात्मा ' अर्थ करते हैं, तो उसका मन्दिरमें घर ( स्थिति ) होनेसे देवमन्दिर निर्माणका सिद्धान्त वैदिक सिद्ध हुआ । वेद में ' इष्टापूर्ते स ँ सृजेथाम् ' ( यजु: १५/५४ ) ' इष्टापूर्तेन ' CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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२२२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ( अथर्व. १८/३/५८ ) में पूर्तके निर्माणकी आज्ञा है । पूर्तका लक्षण यह है - ' वापी - कूप - तडागादि देवतायतनानि च । अन्नप्रदानमारामः पूर्तमित्यभिधीयते ' ( अत्रिस्मृति ४५ ) ' देवतायतनानि च । स पूर्त -फलमश्नुते ' ( लिखित स्मृति ४ ) यहाँ पूर्त में वापी, तालाब, बागीचा आदिके साथ देवमन्दिर मी गृहीत है । स्वा. द. जीने भी सं. वि.के गृहाश्रम ( १८८ पृ. ) में ' पूर्त'का ' जलाशय और बाटिका आदि बनवाना ' अर्थ किया है, सो वहाँ ' आदि ' शब्दसे उक्त स्मृति - पद्य के अनुसार ' देवमन्दिर ' भी परिगणित होनेसे देवमन्दिर - निर्माण वैदिक सिद्ध हुआ । ( ख ) इसी कारण सृष्टिकी आदिमें बनी हुई मनुस्मृति में भी लिखा है- ' तडागान्युदपानानि वाप्यः प्रस्रवणानि च । सीमासन्धिषु कार्याणि देवतायतनानि च ' ( ८२४८ ) यहाँ भी नगरकी सीमासन्धिमें पूर्वके लक्ष्यभूत देवतायतन ( देवमन्दिर - देवमूर्ति ) के स्थापनका भी आदेश दिया है कि लोग देवदर्शन कर सकें । ' देवतागारभेद-कान | हन्यादेवाऽविचारयन् ' ( ६२८० ) ' प्रतिमानां च भेदकः । प्रतिकुर्याच्च तत्सर्वं पञ्च दद्यात् शतानि च ' ( ६२८५ ) यहाँ पर देवमन्दिर तथा देवप्रतिमाके तोड़नेवालेको दण्डविधान किया है । स्वा. द. जी मी मनुस्मृतिको ( स.प्र. के ११ वें समु. के आरम्भ में ) सृष्टि-की आदिमें बना हुआ मानते हैं, श्रीयास्क भी निरुक्त ( ३ | ४ | २ ) में । सो देवमन्दिर निर्माण भी सृष्टिकी आदि वैदिककाल से ही सिद्ध हुआ । यज्ञशाला भी इसी देवमन्दिरका नाम होता है, क्योंकि - ' यज्ञ ' की मूल धातु यजूका अर्थ भी ' देवपूजा ' ही है । तब CC - 0. Ankur Joshi Collection देवमन्दिर प्रवेश २३ पूर्वोक - वेदमन्त्र के कथनसे दस्युके ' अयन्त्रा ' एवम् ' अदेवयु ' होनेसे शूद्रका यज्ञ एवं देवमन्दिरके प्रवेशमें अधिकार वेदानुसार निषिद्ध होगया । इसी वेदमन्त्रके अनुवादभूत अत्रि - संहिताहे भी ‘ इष्टापूर्ते द्विजातीनां सामान्ये धर्मसाधने । अधिकारी भवेत् शुद्धः से धर्मे न वैदिके ' ( ४६ ) इस वचनके अनुसार वैदिक पूर्त - धर्म ( देस् मन्दिरप्रवेश एवं देवपूजा ) में द्विज ( ब्राह्मण - क्षत्रिय - वैश्य ) अधिकारी सिद्ध हुए, शूद्र - अन्त्यज उसमें अनधिकारी ही सिद्ध हुए । ( ६ ) ' विजानीहि आर्यान् ये च दस्यवः ' ( ऋ. ११५१८ ) ' यो से दास आर्यों वा ' ( ऋ. १० | ३८ | ३ ) इन मन्त्रों से आर्योंसे भिन्न दस बादास कहे जाते हैं । सो आर्यों में त्रैवर्णिक गृहीत होते हैं । शूद्रादि नहीं । इसी कारण ' उत शूद्रे उत आर्ये ' ( अथर्व. १६६२॥१ ) इस मन्त्रमें शुद्रको आर्यसे भिन्न माना गया है । ' मुखबाहूरुपज्ञागं या लोके जातयो बहिः । म्लेच्छवाचश्चार्यत्राचः सर्वे ते दस्यवः स्मृताः ( १०/१५ ) इस मनुवचन में चाण्डाल आदि वर्ण बाह्य ( प्रतिलोमत्र ) जातियों को दस्यु कहा गया है । आर्यसमाज के विद्वान् श्रीरघुनन्दन शर्मा अपनी विशाल पुस्तक वैदिक - सम्पत्तिके ४१८ पृष्ठमें इसका अर्थ करते हैं- ' वर्णाश्रमहीन जातियां चाहे आर्यभाषा बोलनेवाली हों; चाहे म्लेच्छभाषा, सबं दस्यु हैं । स्वा. दयानन्दजी ने अपने प्रसिद्ध - ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाशमें लिखा है- श्रार्थोंसे भिन्न मनुष्योंन नाम दस्यु है ' ( ११ समु. १७२ पृष्ठ ) । पूर्वोक्त मन्त्रों में ' दस्यु ' ' अदेवयु ' कहा है । ऋ.सं. के ११३३।४-५ मन्त्रों में भी दस्यु Gujarat. An eGangotri Initiative
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२२४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) २३ यु ' होनेसे इस दानुसार भी है । -संहिता त् शूद्रः -धर्म ( देव यह - वैश्य ) ही हुए और अव्रत कहा है । ' चाण्डालाद्यैश्व दस्युभिः ' ( ५.१३१ ) मनुवचनमें चाण्डालादि - अन्त्यजोंको स्पष्टरूपसे ' दस्यु ' कहा ऋ.सं. ( ८ । ६७१३ ) मन्त्रमें मी ' अदेवयु ' का वर्णन है । फलतः इससे अन्त्यजादिका देवमन्दिरगमन तथा देवपूजन वेदानुसार छानधिकार चेष्टा एवं वैदिक - कानून से निषिद्ध सिद्ध । केवल निषिद्ध ही नहीं; वल्कि उनके अनधिकृत कर्मको करने धिकारी से प्रजा में भी हानि होती है; अतः उसमें दण्डविधान करना ही हो शास्त्रीय है, न कि तदर्थं प्रोत्साहन देना । इसीलिए मनुस्मृति में कहा है- ' वैश्यशूद्रौ प्रयत्नेन स्वानि कर्माणि कारयेत् । तौ हि ८ ) ' यो जो भिन्न द च्युतौ स्वकर्मभ्यः क्षोभयेतामिदं जगत् ' ( ८४१८ ) यहां पर शूद्र यदि होते हैं, अपने कर्म से च्युत होकर अन्योंके कर्म करने लग जाय, तो जगत्की - प्रजाकी हानि कही है । इसीके उदाहरण में शूद्रके १६।६२।१ ) रामायणकाल में अपनी अनधिकृत वैदिक तपस्या कर रहे होनेपर रुपन नवः स्मृताः प्रजा में हानि हो रही थी । ब्राह्मरणकुमार पिताके बैठे ही मरने लग तिलोमज ) गये थे । राजाके दण्डविधान न होनेसे ही अनधिकारीको अपने अनधिकृत कर्म के करने में प्रोत्साहन मिलता है, अतः मनुस्मृति के रघुनन्दन इसरा अनुसार चलने वाले राजा रामचन्द्रने ( इस पर वाल्मीकि रामायण बोलने वाली ( ४ | १८ | ३० ) द्रष्टव्य है ) अपने राज्यकाल में उस शम्बूक - शुद्रको जीने अपने ' नादण्ड्यो नाम राज्ञोस्ति यः स्वधर्मे न तिष्ठति ' ( मनु. ८ | ३३५ ) मनुष्यच्च तान् सर्वान् घातयेद् राजा शूद्राँश्च द्विजलिङ्गिनः ' ( ६।२२४ ) इस ' दस्यु'को वचन के अनुसार दण्ड - विधान किया । दण्ड देनेसे गड़बड़ी हट दस्यु को गई । ब्राह्मण कुमार जी उठा । चाहे वह दण्ड़ बहुत कड़ा था, पर CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat देवमन्दिर प्रवेश २२५ मर्यादारक्षक था । ब्लैकमार्केटिंग करनेवालेको कड़ा दण्ड फाँसी दे देनेपर आगे ब्लैकमार्केट रुक जाती है । नहीं तो वह सर्व-साधारण हो जानेसे प्रजाको हानि देनेवाली सिद्ध हो जाती है-यह प्रत्यक्ष है । ( ११ ) जोकि - ‘ गौतम - धर्मसूत्र ' में कहा गया है- ' अथ हास्य वेदमुपञ्शृण्वतः त्रपुजतुभ्यां श्रोत्रप्रपूरणम्, उदाहरणे जिह्वाच्छेदः, धारणे शरीरभेदः ' ( २ | ३ | ४ ) सो यह वचन वेदमें शुद्रानधिकारका अर्थवाद है । अर्थवादमें यथाश्रुत अर्थ नहीं हुआ करता, किन्तु उसका तात्पर्य देखा जाता है । इसका ' शूद्र वेदको न सुने, न स्वयं उच्चारण करे, न याद करे ' इतने ही अर्थ में तात्पर्य है । वेदके अशुद्ध - उच्चारणमें वृत्रासुरकाण्ड सुप्रसिद्ध है । शूद्र भी अनुपवीती तथा विद्या - रहित होने से वेदको सुनकर कहीं उसके उच्चारणका प्रयत्न वा अनुकरण न कर ले, जिससे स्वयं हानि उठा बैठे, वा किसीकी हानि कर बैठे, यही तात्पर्य वेदश्रवण - उच्चारण - धारण में प्रवल निषेधका है । शासनको कई अनिष्ट - विभीषिकाएँ भी रखनी पड़ती हैं, जिससे उच्छृङ्खलता न हो जाए, उसमें शासनका दूसरे-केलिए हित निहित होता है; पर श्रापाततोदर्शीको ' जो ब्लैक-मार्केटिंग करेगा, उसे फाँसी मिलेगी ' ऐसा कड़ा दण्डविधान अखरता है, वह उसे अत्याचार मानता है, पर सर्वतोमुख- दृष्टि वालेको इसमें परिणाम- हितावहता मालूम पड़ती है । वैसे कठोर दण्डविधान से वैसी परम्परा नहीं बन पाती । वैसा दण्ड देना भी एक - आध को ही पड़ता है, समीको नहीं । पर विधानमें आ जाने से स ० ध ० १५ . An eGangotri Initiative
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२२६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) वैसी परम्परा नहीं बन पाती । रामराज्यसे पूर्व ही यह नियम परम्परासे चला आ रहा था— ' शूद्राः स्वकर्मनिरतास्त्रीन् वर्णान् उप-चारिणः ' ( वाल्मी. १।६।९ ) अर्थात् शूद्र तीनों वर्णोंकी सेवा करते थे, पर एक शूद्रने उससे विपरीत तपस्या शुरू कर दी । खराब फोड़े के शुरूसे चीरने से ही आगे वह हानिप्रद सिद्ध नहीं होता; तब एक शूद्रके दण्डविधान से शेष- इतिहास में फिर इस काण्डकी आवृत्ति नहीं हुई । निम्न - लोग कड़े दण्डके उल्लेखसे फिर कोई अव्यवस्था नहीं कर पाते । इसीलिए मनुजीने भी कहा है- ' वैश्य- शूद्रौ प्रयत्नेन स्वानि कर्माणि कारयेत् । तौ हि च्युतौ स्वकर्मभ्यः क्षोभयेतामिदं जगत् ' ( ८: ४१८ ) ( वैश्य - शूद्र द्वारा अपने कर्म प्रयत्नपूर्वक कराये जाने चाहियें । यदि वे अपने कर्मसे गिरे; तो जगत् में हलचल मची ) । वैश्य केलिए भी इसी कारण प्रेरणा है कि वह सबके निर्वाहक धनका संग्राहक है । उस कार्यको यदि वह छोड़ दे; तो शेष - वर्णोंके निर्वाह में रोड़ा पड़े । जब उच्च वर्णवाले देखते हैं कि यह निम्न जातिका - पुरुष हमारे अधिकृत कर्मको कर रहा है, तब वे उस अपने कर्म को छोड़ देते हैं । वे भी उनका कर्म शिल्पादि अथवा धन संग्रह करने लग जाते हैं । इस प्रकार देवताओंका प्रकोप हो जाता है कि - निम्न वर्ण उच्च वर्णके यज्ञादि करने लग जाएँ; क्योंकि - निम्न वर्णों के यज्ञ देवताओंकी तृप्ति करनेवाले न होने से देवताओं के निस्तेज करनेवाले सिद्ध होते हैं । भविष्य-पुराणका इस विषय में ' इन्द्र ' से कहा हुआ पद्य पहले उधृत किया जा चुका है । उसमें इन्द्रने शूद्रोंके यज्ञोंसे अपनी तृप्ति न होना CC - 0. Ankur Joshi Collection देवमन्दिर प्रवेश २२ और इसी कारण अपना निस्तेज हो जाना कहा है ( भविष्य हैं । ४ खण्ड २० / ७५ ७७ ) इसका मूल मनुवचन भी हम. श्री लिङ्ग हैं कि - जिसकी स्त्री शूद्रा हो; देवता उसे देवलोक नहीं मिलता ( मनु. क्या कहना? देवता उसकी पूजा इन्द्रके अनुयायी देवता भी प्रकुपित हैं, उसी से बाढ़ आती हैं, अन्नका पड़ती है । प्रकृतिका सन्तुलन बिगड़ने बता रे संस्क उसका भी भोजन नहीं करते-३ | १८ ) तब साक्षात् शूद्रका स्वीकार नहीं करते । इससे अन्त होकर अतिवृष्टि आदि को मैं अकाल पड़ता है, वा मंहगाई तेषा से प्रजाकी बड़ी हानि होती है ॥ नाम ( १२ ) फलतः शास्त्रों में शूद्र अन्त्यजोंका जो वेदमन्त्रप्रतिष्ठापित स्थान मन्दिर में जाना निषिद्ध किया गया है; उसमें यही रहस्य है । इससे देवशक्ति निम्नके उपहारको स्वीकार न करनेसे निस्तेज हो । प्रति जाती है और दैत्यशक्ति तेजस्विनी हो जाती है, जो आज भी होता प्रत्यक्ष है । हाँ, जो मूर्तियाँ वेदमन्त्रप्रतिष्ठापित न होकर पुराए- प्रवेश मन्त्रोंसे प्रतिष्ठापित होती हैं; वा बिना मन्त्र के स्वयं ही स्थापित । है, होती हैं; अथवा कई विशिष्टज्योतिर्लिङ्ग होते हैं, वहाँ शूद्रादिश मूर्ति निषेध नहीं हुआ करता । पुराणों में जोकि शूद्रों का काचिल धर्म क देवपूजन दीखता है, वहाँ यही रहस्य है । जैसे - ' येऽर्चयन्ति शिवं नित्यं लिङ्गरूपिणमेव च । स्त्रियो वाऽप्यथवा शूद्राः श्वपचास्त्वन्तवा शास्त्र गर्भग सिनः । ते शिवं प्राप्नुयुरन्ते सर्वदुःखोपनाशनम् ' ( स्कन्दपुराण ) अस्पृ ' ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रो वा प्रतिलोमजः । पूजयेत् सततं लिङ्ग तत्तन्मन्त्रेण सादरम् ' ( विश्वेश्वर संहिता ) यह वचन शुद्रादिके सं. स्वस्थापित पार्थिवादि - लिङ्गकी नाममन्त्र वा नमस्कारमन्त्र से पूजा बतानेवाले । Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) २२८ हैं; वेदमन्त्रप्रतिष्ठापित - मूर्तिकी नहीं; क्योंकि वहाँ ' यदा प्रतिष्ठितं विष्य. शी लिङ्ग मन्त्रविद्भिर्यथाविधि । ततः प्रभृति शूद्रश्च योषिद् वापि न चला चुरे संस्पृशेत् ' एतदादिक बचनोंसे पूजार्थ स्पर्श उनकेलिए निषिद्ध है । हीं करते- और उक्त पौराणिक मन्त्रोंमें भी संकीर्ण अर्थात् असच्छूद्र-शूद्रका से अन्त्यजादिका अधिकार नहीं माना गया है; जैसेकि - भविष्यपुराण-इससे में भी कहा गया है - ' ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा ये शुचयोऽमलाः । नादि करते तेषां [ पौराणिका ] मन्त्राः प्रदेया वै न तु संकीर्णधर्मिणाम् ( अवर्णा-मंहगाई नामन्त्यजानाम् ) ' ( उत्तरपर्व १३ ६२ ) । वे पौराणिक मन्त्र उ होती है । स्थान में लिखे हुए हैं । नतिष्ठापित हाँ, कई ज्योतिर्लिङ्ग होते हैं; वे बिना भी वेदमन्त्रोंकी प्रतिष्ठा के है कि प्रतिष्ठित होते हैं; उनमें शूद्रादिका भी अधिकार निषिद्ध नहीं निस्तेज हो होता; पर अन्त्यजादिकी शास्त्रप्रोक्त - अस्पृश्यतावश उनका गर्भगृह में आज भी प्रवेश नहीं हो सकता । उनके लिए एक छिद्र ऐसा रख दिया जाता पुराए है, जिससे वे बाहर से दर्शन कर लें; और कहीं वैसी अप्रतिष्ठित 1 स्थापित मूर्ति, मन्दिर के शिखर पर रख दी जाती है कि अन्त्यजादि उनका शूद्रादिश दर्शन कर लें | यदि राजकीय - संविधान द्वारा सभीको अपने - अपने न्ति शिव धर्म के अनुसरण में स्वातन्त्र्य है; तो हम कह सकते हैं कि- वेदादि-शास्त्र अन्त्यज आदिको अस्पृश्यता भी मानते हैं; तब उनका इत्वन्तवा गर्भगृहमें प्रवेशका अधिकार कैसे हो सकता है? हम इनकी दपुराण ) अस्पृश्यताके विषयमें भी वेदके कुछ प्रमाण देते हैं-। ( १३ ) ' यद्वोऽशुद्धाः पराजघ्नुः, इदं वस्तत् शुन्धामि ' ( यजुर्वेद-द्रादिके तानेवाले । स. १११३ ) यहाँ पर तक्षा ( बढ़ई ) से बनाये हुए यज्ञिय काष्ठके शूद्रादिकी शुद्धता २२६ पात्रों को भी वेदने अशुद्ध मानकर उन पात्रोंकी जलसे शुद्धि बतलाई है । कोई हमारा किया हुआ अर्थ न मानें, तो वे वेदकी मीमांसा करनेवाले दर्शनकी साक्षी देखें । ( ख ) मीमांसादर्शन ( ३ | ३ | १४ ) में उन बढ़ईसे स्पर्श किये हुए पात्रोंकी इस मन्त्र जल - द्वारा शुद्धि सूचित की गई है । अतः इस मन्त्रका अन्य अर्थ नहीं किया जा सकता । ( ग ) अब इस मन्त्र पर भाष्यकार - महीधरा-चार्य की व्याख्या भी देखें । यदि उसे न मार्ने; तो उबटाचार्यका माध्य देखें । यदि इन दोनोंकी व्याख्या न मानी जावे; तो उसमें अन्य साक्षी देखें । ( घ ) शुक्लयजुः - काण्वसंहितामें श्रीसायणाचार्यने भी इस मन्त्रकी ऐसी ही व्याख्या की है, जैसेकि - ' हे पात्राणि! ] वो-युष्माकं सम्वन्धि यद् अङ्गम् अशुद्धो - नीचज्ञातिस्वचादिः पराजघान-पराहतं कृतवान्; छेदनतक्षणादिकाले स्वकीयहस्तस्पर्शरूपम् श्रशुचित्थं कृतवान्, तदेतद् वो- युष्माकमङ्ग, प्रोक्षामि- प्रोक्षणेन शुद्धं करोमि ' क्योंकि- मनुस्मृति में तृणकाष्ठ आदि की शुद्धि प्रोक्षणसे मानी गई । है ( ५।१२२ ) यज्ञ - पात्रों की शुद्धि प्रक्षालन ( ५/११६ से मानी गई है । ( ङ ) कदाचित् कोई श्रीसायणकी व्याख्या मी न माने, तो यहाँ मन्त्रभागके परमात्मकर्तृक - भाष्य अतएव वेद माने जाते हुए ब्राह्मणभागकी भी उक्त मन्त्रकी व्याख्या हम दिखलाते हैं । देखिये शतपथब्राह्मण-' अथ यज्ञपात्राणि प्रोक्षति तद् यदेव एषामत्र अशुद्धः तक्षा वा, अन्यो वा श्रमेध्यः कश्चित् पराहन्ति; तदेव एषाम् [ पात्राणाम ] अद्भिर्मेध्यं करोति । तस्माद् आह - ' यद्वोऽशुद्धाः, इति ' ( १ । १ । ३ । १२ ) । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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२३० श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) यहाँ श्रीसायणाचार्यने भाष्य किया है- ' तक्षा - वर्द्धकिः, अन्यस्तद्-व्यतिरिक्तो वृषलादिः [ शूद्रादिः ], स सर्वोपि अशुद्धत्वाद् अमेध्यः । तत्संस्पर्शकृतं यत् - तत् एषां पात्राणां दोषजातम् अनेन प्रोक्षणेन एषां निवर्तयन् ' । कितनी स्पष्टता है? अमेध्यता शूद्रकी पादोत्पत्तिके कारण है । जैसाकि मनुजीने कहा है- ' ऊर्ध्वं नाभेर्मेध्यतरः पुरुषः परिकीर्तितः । तस्मान्मेध्यतमं त्वस्य मुखमुक्त ं स्वयम्भुवा ' ( ११६२ ) ' ऊर्ध्वं नाभेर्यानि खानि तानि मेध्यानि सर्वशः । यान्यधस्ताद् यमेध्यानि ' ( मनु. ५।१३२ ) । ' नामिसे ऊपरकी इन्द्रियाँ मेध्य ( शुद्ध ) हैं; और नीचेकी अमेध्य ' । ( च ) इस प्रकार ब्राह्मणभागात्मक - वेदके वचन से शूद्रकी अमेध्यता सिद्ध होगई । फिर भी कोई स्वेच्छाधर्मी शतपथब्राह्मण-को वेद न माने, वा वेद - इतना मान न दे; वह यह कहे कि -शतपथने वक्षाको निर्मूलतासे ही अशुद्ध ( अस्पृश्य ) माना है; इसमें तो मन्त्रभागात्मक - वेदका प्रमाण चाहिये; तब उनके परितोषार्थ हम मन्त्रभागका भी प्रमाण देते हैं; देखिये- ' यत् त्वा शिक्कः— परावधीत् तक्षा हस्तेन वास्या । श्रापस्त्वा तस्माज्जीवलाः पुनन्तु शुचयः शुचिम् ' ( अथर्व. १०।६।३ ) यहाँ समय हाथसे छूनेमात्र से अशुद्धता शुद्ध करनेका आदेश दिया है । श्रीराजाराम शास्त्रीका भाष्य यह जो तुझे हाथसे वसूलेसे पराहत देनेवाले चमकते हुए जल तुमे खदिरमणि की तक्षासे छीलनेके बताई गई है; और जलसे उसे ( छ ) यहाँपर आर्यसमाजी- विद्वान् है- ' चतुर बनानेवाले तरखानने किया है, उस ( दोष ) से जीवन चमकता हुआ बनाकर पवित्र CC - 0. Ankur Joshi Collection शूद्रादिकी अशुद्धता २६ करें । अब देखिये यहाँ वादीका बहाना नहीं बन सकता कि तुम मध्यकालकी विचारधारा है । इसलिए वादियोंके तथाकथित वैदि अ स्वामी दयानन्दजीने भी ‘ मा स्म कमण्डलूं शूद्राय दद्यात् ' यह वैदि आ वचन अपने स्त्रैणताद्धित ( ४/१/७१ ) में दिया है, जिसमें शुद्ध अपना पात्र देनेका निषेध किया है; और अपनी ' आख्यातिरु रख लकारार्थ - प्रकरण में शूद्रको यज्ञका निषेध किया है । जा । तक्षाको सत् - शूद्रोंमें गिना गया है- ( तज्ञायस्कारम्, ' शूद्राणा सूत्र निरवसितानाम् ' ( पा. २ | ४ | १० ), फिर भी उसके स्पर्शमात्रः यज्ञिय - पात्रोंको अशुद्ध माना गया है; उस अशुद्धिके दूरीकरखार्द उपर जलसे प्रोक्षण आदिष्ट है; तो वेदाङ्गानुसार चाण्डाल आदि अस यज्ञ शूद्रको ( चाण्डालमृतपाः ) भला यज्ञरूप - मूर्तिपूजा - स्पर्शादिमें अधिका वेद - सम्मत कैसे हो सकता है? ( १४ ) वेदका एक अन्य मन्त्र देकर फिर हम आगे चलेंगे । ' यद्वा दासी आर्द्रहस्ता समक्त उलूखलं मुसलं शुम्भत आपः । है । ( अथर्ववेदसं. १२।३।१३ ) यहाँपर गीले हाथ वाली दासी ( शुद्र ) हुए हुए यज्ञोपयोगी ऊखल - मूसलकी शुद्धयर्थ जलोंसे प्रार्थना ई करन गई है कि - ' आर्द्रहस्ता दासी - गीले हाथवाली दासी ( शूद्रा कुछ उलूखलं - मुसलं - ऊखल - मूसलको, समक - छू लिया है, हे आर अन ऐ जलो! तुम उस ऊखल- मूसलको शुम्भत शुद्ध कर दो ' | इस ही अर्थ आर्यसमाजी - विद्वान् श्रीराजाराम शास्त्रीने यह किया है-' जब कालापक्षी काक इधर आकर चिपटे हुए अन्नको चुराता हु अपन ऊखलके सिर पर आ बैठा, यद्वा गीले हाथवाली दासीने लेप वि किस Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) २३२ तुम है जस्तो! ऊखल और मूसलको शुद्ध करो ' यह सम्पूर्ण मन्त्रका अर्थ है । ' यो नो दास आर्थो वा ' ( ऋ. १० । ३८ । ३ ) ' उत शूद्रे उत वैदि यह वैदिक आर्ये ' ( अथर्व. १६।६२।१ ) इत्यादि बहुत प्रमाणों से ' दास ' नाम समें ' शूद्र'का होता है । इसलिए शुद्रके नाम के साथ ' दास ' शब्द भी शुद्रों ख्यातिक रखना पड़ता है, और वह आर्य जाति भी नहीं होता । तब ' दास ’ जाति होने से उसे ' जातेरखीविषयादयोपधात् ' ( पा. ४ | १ | ६३ ) इस ' शूद्राणार सूत्रसे ङीष् होनेसे ' वृषली ' की तरह ' दासी ' कहा गया है । स्पर्शमात्र जब इस प्रकार शूद्रको भी यज्ञके पात्र छूनेका वा उसके हरीकरण उपयोगका निषेध है; तब अन्त्यजादिका देवमन्दिरगमनरूप दिसम् यज्ञमें तथा यज्ञके पात्र देवमूर्ति में अधिकार मला कैसे हो सकता अधिका है? तब यदि लीडर लोग राजपुरुषोंके परिचयका लाभ उठाकर हिन्दुओंके परममान्य - ग्रन्थ वेदसे भी विरुद्ध कानून बनवाते हैं; गे चलेंगे । तो वह उनका हिन्दुजाति के आधार पर कठोर कुठारका आघात त आपः है । तब राजकीय- संविधान में प्रत्येकके धर्ममें स्वातन्त्र्यका क्या सी ( शु ) अर्थ रह जाता है? केवल दिखलावा! यह एक जातिको प्रसन्न प्रार्थना करना और दूसरीको पाँव तले दबाना है; इसके अतिरिक्त और ( शूद्रा ) कुछ नहीं । यदि कोई विदेशी जाति हमारे वैदिक - नियमोंकी अनभिज्ञतावश ऐसा करती, तो वह क्षम्य हो सकता था; पर हमारे हो ' । इस हो भारतीय लीडर यदि ऐसा करते हैं, तो भारी भूल करते हैं । किया है । ' कं यामः कं प्रति ब्रूमो गरदायां स्वमातरि यदि अपनी माँ ही चुराता हु अपने पालनीय लड़केको विष दे रही हो; तो किसे कहें, और लेपदि किसके पास जावें? देवमन्दिर प्रवेशपर वैदिक - दृष्टि २३३ फलतः अन्त्यजादिका देवमन्दिरप्रवेश में अधिकार नहीं । वे शास्त्रानुसार मन्दिर - शिखरपर रखी देवमूर्तिके दर्शन करके ही पुण्य प्राप्त कर सकते हैं । हमारे हिन्दुधर्म में धनीको जो लाख रुपये दान देने से फल कहा है, वहीं निर्धनको एक कौड़ी देनेसे भी कहा है- ' ईश्वरा भूरिदानेन यल्लभन्ते फलं किल । दरिद्रस्तश्च काकिण्या प्राप्नुयादिति नः श्रुतिः ' ( पञ्चतन्त्र ) सो द्विजोंको गर्भगृह में वेदमन्त्रप्रतिष्ठापित - मूर्तिको नमस्कार करनेसे जो फल मिलता है. वही द्विजेवरोंको बाहर उसी मन्दिरके दर्शन से वा मन्दिरपर रखी मूर्ति के दर्शनसे भी मिल जाता है - ' अक्के चेन्मधु विन्देत किमर्थं पर्वतं व्रजेत् ' । यही हिन्दुधर्मकी विशेषता है — ' स्वल्पमध्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो मयात् ' ( गीता २।४० ) । इस धर्मका थोड़ा अंश अनुसृत करनेसे भी फल मिलता है । यहां सभीकेलिए एक ही उपासना नहीं । सबको समान अधिकार नहीं दिये जाते, पर फल सभीको समान दिलवाया जाता है | बच्चेका हाथ - पांव हिलाते रहनेसे ही व्यायाम हो जाता है; वृद्धका कुछ सैर करनेसे ही व्यायाम हो जाता है; पर युवकको डंड पेलने पड़ते हैं - उसीसे उसका व्यायाम होता है । इन कर्मों में अन्त्यज शिशु है, शूद्र अबोध बालक है; क्षत्रिय - वैश्य वृद्ध हैं, ब्राह्मण युवक है । ( ख ) चाण्डालादि तो अन्त्यज हैं, उनको वैदिकमूर्तिपूजाका अधिकार न मिले; पर परमहंस को भी वेदप्रतिष्ठापित मूर्तिका नमन-रूप यज्ञ तथा अन्य यज्ञ भी आदिष्ट नहीं । अन्त्यजकी भांति अनधिकृत होनेसे परमहंसको अनधिकार नहीं, किन्तु यज्ञोपवीती CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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२३४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) से उच्चाधिकारी होने से उस कर्मकाण्ड - उपासनाकाण्डीय वेदमन्त्रों से प्रतिष्ठापित मूर्तिको नमन एवं यजन उसे निषिद्ध होता है । इस कारण परमहंस दण्डी - स्वामी केवल अपना दण्डमात्र मूर्तिसे बुला लेते हैं, उस मूर्तिको नमस्कार नहीं करते, हां, वे अपनी मूर्ति अलग रख सकते हैं । परमहंसको हिन्दुधर्म में बड़ा माना जाता है, शिखासूत्र उसके भी नहीं होते, वैदिक यज्ञ भी नहीं होते; अनधिकारवश नहीं, किन्तु उच्चाधिकारवश । जब शास्त्र उच्चा-घिकारी होने से भी उसे मूर्ति नमन एवं यज्ञका अधिकार नहीं देता; तब वैध शिखा सूत्र के अधिकारी अन्त्यजादिको मला उसमें अधिकार कैसे हो सकता है? ( ग ) इस बात को कभी मस्तिष्क द्वारा सोचा ही नहीं जाता कि एक मूर्ति दूकानपर पड़ी होती है; उसका दर्शन करनेकेलिए अन्त्यजोंको क्यों आर्डर नहीं दिया जाता? यदि कहा जाय कि-उसके दर्शनमें पुण्य नहीं; तो हम पूछेंगे कि - यह कहां लिखा है? यदि कहा जावे कि - देवपूजा विधिपुस्तकों में, तो फिर उन्हीं देव-पूजाविधायक पुस्तकों में अन्त्यजादिको गर्भगृहमें प्रवेशका अधिकार नहीं दिया गया; तो उस समय उनकी बात क्यों नहीं मानी जाती? पहली ही बात उनकी कि - ' गर्भगृहमें मूर्तिके दर्शनसे पुण्य होता है ' - कैसे मानी जाती है? इतनी बड़ी विशेषरूपवाली बिल्डिङ्ग ( गर्भगृह ) बनवाकर खर्च करके जो उसमें मूर्तिको वेदमन्त्रों द्वारा प्रतिष्ठापित किया जाता है, उसमें भी यही रहस्य निहित होता है कि-उसमें प्रतिष्ठापित देवकी शक्ति स्थिर रहती है, उसमें प्रवेशका CC - 0. Ankur Joshi Collection देवमन्दिर प्रवेश २३ He पासपोर्ट वा प्रमाणपत्र स्वाधिकृत उपनयनसूत्र होता है लेकिन उपनयनकी परिधि में नहीं; द्विज नहीं, एकज है उसमें , ब म , उस प्रवेशाधिकार वर्जित है; पासपोर्ट से हीनको नियत स्थानमें आ नहीं दिया जाता । नकली पासपोर्ट बनानेवालेको गिरफ्तार श्र वह - दण्डित किया जाता है । नहीं तो बाहर भी प्रतिमा रखी कर थे, जा सकती थी; उसका अधिकारी - अनधिकारी सभी दर्शन कर लेते । फि विशेष - प्रकारकी देवमन्दिरकी बिल्डिङ्गपर भारी खर्च करनेकी अ क्या आवश्यकता थी? और उसके लिए रुपया शूद्र अन्त्यजादिये बल लिया भी नहीं जाता - ‘ न यज्ञार्थं धनं शूद्राद् विप्रो भिक्षेत कर्हिचित् ॥ यजमानो हि मिक्षित्वा चाण्डालः प्रेत्य जायते ' ( ११।२४ ) इस प्रकार पूजा यज्ञ ( अग्निहोत्र एवं देवमूर्ति प्रतिष्ठापन ) के लिए शूद्रसे धन मांगने चौर परमात्मा के अवतार ( मनुस्मृति ( २/१२३ ) मनुजीने निषेध किय अस है; और शूद्रसे धन मांगने पर चाण्डालता कही है, तब शुर का और चाण्डालका दोनों प्रकार के यज्ञों में वादिप्रतिवादिमान्य मनुजीके । गभ अनुसार अधिकार भी कैसे होगा? तब द्विजोंके धनसे खड़ी को अन गई असार्वजनिक - बिल्डिङ्ग ( देवमन्दिर ) के अन्दर अद्विजों का कोई अधिकार नहीं रह जाता । यदि कहा जावे कि वे ( शूद्रादि ) मन्दिर शास है, बनाते हैं; तो इस पर जानना चाहिये कि उनको उनकी मेहनतकी ' यूर रकम दे दी जाती है, फिर मन्दिरकी बाहरी तथा मन्त्रजपनादि मुख द्वारा मीतरी शुद्धि करके उसके बाद जाकर वेदमन्त्रों से मूर्ति देश-प्रतिष्ठापित की जाती है । तब उसमें उन्हीं मन्त्रों के अधिकारियोंश सना अधिकार रहता है; द्विज - भिन्नोंका नहीं । Gujarat. An eGangotri Initiative