सनातन धर्मलोक ६ — पृष्ठ 131–140

सनातन धर्मलोक ६ · पृष्ठ 131–140

पृष्ठ 131

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श्री सनातनधर्मालोक ( ६ ) २३६ ( घ ) यदि इसमें अद्विज आनेको लालसा रखते हैं; तो इससे लेकिन मन्दिर में चढ़ावा और भी अधिक चढ़ सकता है । मन्दिरकी भारी में उस श्राय बढ़ सकती है, पर हिन्दु धर्म में इन बातों का कुछ भी मूल्य नहीं । नमें आ वह ( धर्म ) अपने ऋषि - मुनियोंके जो अतीन्द्रियदर्शी एवं सूक्ष्मदर्शी फ़्तार अ थे, सिद्धान्तका संरक्षण करना चाहता है । अन्यथा उस प्रतिमामें जा सक देवत्वशक्ति नहीं रहती, ऐसा हिन्दुधर्मका अपने प्रमाणित पुस्तकोंके ते । अनुसार विश्वास है । किसी धर्मके माननेवालोंके विश्वासको करने बलात् नष्ट करना - यह उस धर्म पर अत्याचार है, धर्मनिरपेक्षता त्यजादिषे नहीं; किन्तु दूसरेका धर्म भ्रष्ट करना है । यह तो एक ढंगसे मूर्ति कर्हिचित् । पूजाके सिद्धान्तकां अन्त करना है । ईसाई हो, मुसलमान हो, इस प्रकार बौद्ध हो, जैनी हो, सिक्ख हो, आर्यसमाजी हो, उनके धार्मिक मांगने असूलोंका आदर किया जाता है; पर सनातन हिन्दुधर्मके सिद्धान्तों षेध किय का बलात् मङ्ग किया जाता है; क्या यही धर्मनिरपेक्षता है? तब शु गर्भगृह - स्थित मूर्ति तथा बिकने के लिए दूकान पर रखी हुई मूर्तिका मनुली! खड़ी की अन्तर क्या रह जावेगा — यह क्यों नहीं सोचा जाता? जो कार्य नों का कोई विदेशी शासन भी करनेका साहस न कर सका, उसे यदि स्वदेशी -शासनके बलसे उस सिद्धान्त में अविश्वस्त सुधारक- जनता करती ब ) मन्दिर है, तो यह ' घरका भेदी लंका ढांहे ' चरितार्थ होगा, यह भारतको मेहनतकी ' यूरोप ' बनाना होगा । पूर्व की ओर से मुख मोड़कर पश्चिम की ओर जपनादि मुख करना होगा । उदयको छोड़कर अस्त को अपनाना होगा, से मूर्त देश - शान्तिको छोड़कर उत्पातका बुलाना होगा । जीवमात्रहितैपी कारियों सनातन हिन्दुधर्म इसमें प्रजाकी हानि देखकर इस सिद्धान्तभङ्गको देवमन्दिर प्रवेश २३७ सहन नहीं करना चाहता । हां, वे अन्त्यज्ञादि स्वयं अपनी देवमूर्ति वा देवमन्दिर बनवा सकते हैं, उसमें वेदमन्त्रोंकी प्रतिष्ठा न हो; तब उन्हें देवपूजाका कोई निषेध नहीं । पर वेदमन्त्रसंस्कृत देव-मूर्तियोंके मन्दिरमें मीतर जानेका तो उनको निषेध शास्त्रीय हो है । जो आर्यसमाजादि यह बात नहीं मानते, उन्हें उचित है कि-वे अपने मन्दिरोंमें देवमूर्ति प्रतिष्ठापित करके उसके द्वारा अपना भी उद्धार करें, और अन्त्यजादिका भी । उन्हें स्वतन्त्रता है, पर दूसरों के धार्मिक विश्वासका अपमान न करें । ( १५ ) हम इस विषय में पहले वेदमन्त्रों की सांकेतिक सूत्ररूप सम्मति तो दिखला ही चुके हैं । अत्र हम इस विषय में देवपूजाविधि-पुस्तकों के कुछ अंश भी उद्धृत करते हैं । सो यदि पूजामें सचमुच ही इच्छा हो, और उसमें श्रद्धा भी हो, तो पूजाविधायक - निबन्ध-ग्रन्थोंकी बात माननी ही होगी । ' दर्शनं गेह ( मन्दिर ) चूडाया दर्शनं गोपुरस्य च । अन्त्यजादीनां तथाऽन्त्यानां विज्ञेयं देवदर्शनम् ' शैव-सिद्धान्त रहस्य के इस प्रमाण में अन्त्यजोंका मन्दिरके शिखरका दर्शन ही कर लेना देवदर्शन माना गया है । यदि यह न माना जावे; तो मन्दिरके अन्दर घुसकर ही पुण्य होता है - इस बातमें भी माननीयता नहीं रहती । यदि यह प्रमाण है, तो पूर्व - प्रमाण भी मानना पड़ेगा; अर्धजरतीय न्याय ठीक नहीं । ( ख ) न शक्या यज्ञमध्यस्था वेदिः स्रुग्भाण्डमण्डिता । द्विजाति-मन्त्र - सम्पूता चाण्डालेनावमर्दितुम् ' ( ३ ५६३१८ ) वाल्मीकि रामायण के - इस प्रमाण में द्विजातिमन्त्रसंपूत ( संस्कृत ) यज्ञपात्रमण्डित, यज्ञवेदिमें CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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२३८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) चाण्डालके जानेका निषेध बताकर द्विजातिमन्त्र - संस्कृत देवमूर्ति -मण्डित, यजन ( देवपूजा ) स्थान देवमन्दिर में अन्त्यजादिका निषेध सूचित किया गया है । मूर्तिपूजा भी यज्ञ है, अतः इसमें यज्ञिय तीन वर्णोंका ही प्रवेश शास्त्रीय है, यह हम पहले बता आये हैं । रामायणका यह प्रमाण इस विषय में बहुत बलवान् है । रामायण वादि - प्रतिवादिसम्मत होने से सर्वमान्य है । ( ग ) ' नमेद् यः शूद्रसंस्पृष्टं लिङ्ग वा हरिमेव च । स सर्व-यातनाभोगी यावद् आचन्द्रतारकम् ' निर्णयसिन्धुके प्रतिष्ठा -प्रकरणमें उद्धृत नारदपुराणके इस वचनमें शुद्र - स्पष्ट मूर्तिकी ' अपूज्यता कही है । बृहन्नारदीयमें भी स्पष्ट कहा है- ' स्त्रीणाम-नुपनीतानां शूद्राणां च जनेश्वर! स्थापने नाधिकारोस्ति विष्णोर्वा शङ्करस्य वा । यः शूद्रसंस्कृतं लिङ्ग ं विष्णु ं वापि नमेन्नरः । इहै-वात्यन्त - दुःखानि ( अतिवृष्टयनावृष्ट्यादीनि ) पश्यत्यामुष्मिके किमु ' । शूद्रो वाऽनुपनीतो वा स्त्रियो वा पतितोपि वा । केशवं वा शिवं वापि दृष्ट्रा नरकमश्नुते ' । तब उनको नरकके मार्ग में क्यों पटका जाता है? भृगुसंहितामें लिखा है - ' चाण्डालैरन्त्य जैश्चैव तथाऽन्यैः प्रतिलोमजैः । म्लेच्छैश्च नीच चाण्डालैर्गुरु निन्दादि दूषितैः । एवमादिभिः संस्पृष्टे देवागांरे विशेषतः । स्पृष्ठे प्रवेशने बाघा पूजाकाले च दर्शने ' ( धर्मप्रदीपके १४१ पृष्ठमें उद्धृत ) यहाँ भी वही बात कही गई है । इसलिए वोधायनीयगृह्य - शेषसूत्रमें भी इस अवसर पर मूर्तिका पुन: -प्रतिष्ठापन ( मन्त्र - संस्कार ) कहा गया है - ' अस्पृश्य- स्पर्शे शूद्र- रजस्वला-पतिताद्युपप्लुतत्वे वा देवार्चायाः पुनः प्रतिष्ठापनम् ' ( २।१६।१-६ ) । CC - 0. Ankur Joshi Collection देवमन्दिर प्रवेश २४० ( घ ) ' खण्डिते स्फुटिते दग्धे भ्रष्टे स्थानविवर्जिते जावेग यागह शुष्टे पतिते युद्धभूमिषु I । अन्यमन्त्रार्चिते चैव पतित स्पर्शदूषिते देवको दशस्वेतेषु नो चक्रुः सन्निधानं दिवौकसः ' ( स्मृतितत्त्वके । बाढ़ों पृष्ठ में उद्धृत ) इस अग्निपुराण के वचनसे पतित -चाण्डालादि ५ ३ स्पर्शसे दूषित देवतायतनमें थीं नागप है । ( ङ ) वैखानसागमके ६७ र्ध्वे पटल में चाण्डालादिसे दूषिततरे! अपने देवमूर्तिकी पुनः प्रतिष्ठाका विधान आया है । वृद्धहारीतस्मृति सकता ( ६।४०८-४१० ) में भी ऐसी विधि पाई गई है । ' रुद्रस्य वा दुष्परि विष्णोर्वा प्राकाराभ्यन्तरे यदि । रजस्वला वधूश्चैव चाण्डाल कि - ज समागतः ।--- ': ' ' तद् देवस्य कलाहानी राज्ञो मरणमेव च । तद- विश्वा ग्रामस्य क्षयः प्रोक्तः सस्यानां नाशनं परम् ' कारिकावृत्ति ( कारणागम ) के प्रायश्चित्तकाण्डके इस प्रमाण में मन्दिर के अन्दर अन्त्यजादिके जनता प्रवेशमें देवसत्ताकी शून्यता, राजा एवं प्रजाकी तथा खेती श्रादिकी । हानि दिखलाई गई है, जो वर्तमान में भी प्रत्यक्ष है । हिन्दु बढ़ेगी इस प्रकार के प्रमाण प्रचुर मात्रा में मिलते हैं । यह सब प्रमाण पूर्वोक्त वेदमन्त्रों तथा पञ्चमवेद रामायण - महाभारतादि के वचनों कारण भी । भाष्य होने से प्रामाणिक एवं उपादेय हैं । शासन संविधान नब बहुत सबकी धार्मिक स्वतन्त्रता मानता है; तब लीडरों का हिन्दुजाति के धर्म स्वातन्त्र शास्त्रवेदादिसे विरुद्ध अन्त्यजोंके देवमन्दिर प्रवेशको प्रोत्साहित करनेका अधिकार नहीं; क्योंकि यह एक बड़ी जातिकी धार्मिक ह यज्ञका स्वतन्त्रताका अपहरण है, क्या धर्मनिरपेक्षताका अर्थ हिन्दुधर्मको मारना ही है? जब अनधिकृत व्यक्ति उसमें अधिकृत किये Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) २४० २३ ॥ अधिकारी विद्वान उस कर्मको छोड़ देंगे; इससे प्रजाकी यागहरे जगे, तो जो हानि हो सकती है; वह समय - समय पर अतिवृष्टि, स्पर्शदूषिते । • देवकोपवश भूकम्प आदि से प्रत्यक्ष मिलती रहती है । बाढ़ वा त्त्व ५६२ हिन्दुधर्म एक विशालधर्म और बड़ा उदारधर्म है । यह तो डालादिरे नागपञ्चमी वाले दिन नागों को भी दूध पिलवाता है । पर वह मानी अपने अनुशिष्ट कर्तव्य में दूसरोंका विरुद्ध हस्तक्षेप नहीं सह दूषितारे सकता । राजा वेनने भी शास्त्रविरुद्धता की थी; उसका उसे ड्रारीतस्मृदि दुष्परिणाम भोगना पड़ा था | अतः शासनका कर्तव्य हो जाता है, द्रस्य वाज्य कि - जैसे वह अपनी उदारता से अहिन्दुओं के धार्मिक - प्रन्थों तथा चाण्डाल ' विश्वासोंका आदर करता है, वैसे ही हिन्दु जातिके धार्मिक - ग्रन्थों च । तद् एवं विश्वासका आदर भी करे; जिससे उनके विरुद्ध लीडर लोग रणागम जनताको प्रोत्साहन न दें, किन्तु विरुद्धता में दण्ड विधान करे । त्यजादिके फलतः मन्दिर मर्यादा नष्ट होनेसे जहाँ सनातनधर्मियों एवं 7 आदिको हिन्दुओंकी धार्मिक - क्षति होगी, वहाँ प्रत्येक विषय में उच्छृङ्खलता बढ़ेगी 1 । प्रकृतिका सन्तुलन बिगड़ने से अतिवृष्टि- बाढ़ों आदिके नवप्रभा कारण प्रजाको मी उसका दुष्फल अवश्य भोगना पड़ेगा, राजाको वचन मी । अतः यह विषय हँसी वा उपेक्षामें उड़ानेका नहीं है, किन्तु धानब बहुत विचारका विषय है यह । संविधानानुसार किसी जातिका ति के धर्म स्वातन्त्र्यापहरण सर्वथा अवाञ्छनीय है । नोत्साहित हमारा हिन्दुधर्म तथा उसका साहित्य बड़ा विशाल है, उसमें 7 धार्मिक यज्ञका विषय तथा महिमा भरी पड़ी है । जहाँ भी यज्ञका वर्णन किये छो; वा यज्ञशालाका; वहाँ देवमूर्तिपूजा तथा देवमन्दिरकी रचना कृत CC - 0. Ankur Joshi देव मन्दिर प्रवेश २११ Collection Gujarat. उसीके अन्तर्गत आ जाती है । देवमन्दिरके सम्बन्ध में वह सारा साहित्य उसीसे लिया जा सकता है । ग्रन्थतात्पर्य- निर्णयकी सर्बमान्य - पद्धति यही है कि - ' उपक्रमोपसंहारौ अभ्यासोऽपूर्वंता फलम् | अर्थवादोपपत्ती च लिङ्ग ' तात्पर्य - निर्णये ' तो हमारे धार्मिक-साहित्य में उपक्रम - उपसंहार और अभ्यास ( पुनः पुनः कथन ) तथा फल एवं उपपत्ति आदिके देखनेसे सारे साहित्यका तात्पर्य यही निकलता है कि- वैदिक - देवपूजामें अन्त्यजादिका अधिकार नहीं । अतः तदर्थं प्रोत्साहन न प्रजाको देना चाहिये, न राजाको । यदि उक्त तात्पर्य निर्णायक छः हेतुओं का परित्याग किया जायगा, तो उस सम्पूर्ण साहित्यका कुछ भी तात्पर्य नहीं निकलेगा । यह वेदप्रोक्त- देवपूजा वेदोंमें बीजरूपसे, संकेतरूपसे आई है, और आगमग्रन्थों वा तन्त्रशास्त्रों में पल्लवितरूपसे आई है । उनमें अन्त्यजादिके मन्दिर प्रवेश में प्रजाकी बड़ी हानि दिखलाई है, बल्कि देवमूर्ति से उस समय देवसत्ता की भी शून्यता हो जाना -बताया है । तब वह देवमूर्ति देव नहीं रह जाती, पूजनीय नहीं रह जाती, किन्तु पत्थरमात्र रह जाती है, तब उससे किसीकी भी इष्ट-फल प्राप्ति नहीं होती, बल्कि अनिष्टकी प्राप्ति हुआ करती है । हमारा सनातनधर्मं जीत्रमात्र हितैषी है, उसके साहित्यके बिरुद्ध • जाकर प्रजाकी हानि करना तथा किसी जातिके विश्वासपर प्रहार करना बुद्धिमत्ता नहीं । ( १६ ) यह कहना कि - वेदवेदाङ्गों में अन्त्यजों की अस्पृश्यता ही अनुशिष्ट नहीं - यह मी बात गलत है । वेदके प्रमाण दिये ही जा स ० ० १६ An eGangotri Initiative

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२४२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) चुके हैं । अब वेदाङ्ग देखिये - वेदका मुख व्याकरण है; उसके प्रणेता वादिप्रतिवादिमान्य- पाणिनिका अष्टाध्यायी में एक सूत्र है-' प्रत्यभिवादेऽशूद्रे ' ' स्त्रियांन ' ( २३ ) यहां पर स्त्री - शुद्रों को प्रत्यभिवादन में द्विजोंवाला प्लुत नहीं कहा गया । यह व्यवहार-वैषम्य है । अब अस्पृश्यताके विषयमें देखिये - ' शूद्राणामनिर-वसितानाम् ' ( २ | ४ | १० ) यहां दो प्रकारके शूद्र बताये गये हैं, पहले अनिरवसित, दूसरे निरवसित । यहां भाष्यकार पतञ्जलिने उनका यह लक्षण लिखा है- ' यैर्भुक्ते पात्र संस्कारेण शुध्यति, तेऽनिरवसिताः । यैर्भुक्ते पात्रं संस्कारेणापि न शुध्यति, ते निरवसिताः ' जिनको हम पात्र दें, और मांजकर उस पात्रको हम वापिस ले सकें, वे तो होते हैं अनिरवसित । उन्हें एकवचन होता है । भाष्यकारने इनका उदाहरण दिया है - ' तक्षायस्कारम् ', ' रजकतन्तुवायम् ' यहां बढ़ई, लोहार, धोबी, जुलाहा आदि शूद्रोंको भाष्यकारने यज्ञका अधिकार तो नहीं दिया; पर उसको पात्र देकर फिर संस्कार से उनके पात्रको व्यवहार्य माना है, अर्थात् उन्हें अस्पृश्य नहीं माना । पर ' चाण्डालमृतपाः ' आदिको अस्पृश्य माना है । इनको दिये गये हुए पात्रकों संस्कार से भी शुद्ध एवं ग्राह्य नहीं माना । इससे बढ़कर अस्पृश्यताकी सिद्धि और क्या हो? ( ख ) आर्यसमाजके प्रवर्तक, उदार - सुधारक कहे जानेवाले स्वा. द. जीने भी अपने ' सामासिक ' के ४७ पृष्ठ में तथा अपने अष्टाध्यायी माध्यमें उक्त सूत्रके व्याख्यानमें भी यही माना है । अपने अन्य पुस्तकों में उन्होंने ' चाण्डाल ' का अर्थ ' भंगी ' किया है । CC - 0. Ankur Joshi Collection देव मन्दिर प्रवेश ' स्त्रैणताद्धित ' ( ४/२/७३ ) में उन्होंने ' चाण्डाल ' शब्दको जातिवाचा माना है, क्योंकि वह शार्ङ्गरवादिगण में है, और उसमें ' ब्राह्मर तथा ' चाण्डाल'का नाम भी है और जातिकी अनुवृत्ति भी है एवम् अन्यत्र भी उन्होंने अन्त्यजोंकी अस्पृश्यता मानी है । एव * ' श्रीसनातनधर्मालोक ' पञ्चम - पुष्प देखिये । यों तो स्वामीके उद्धर देत बहुत हैं; पर एक यह भी ' आलोक'- पाठकगण देख लें- तत्र ( ग ) ( प्रश्न ) कद्दोजी, मनुष्यमात्रके हाथकी की हुई रसोई जा खानेमें क्या दोष है? क्योंकि ब्राह्मण से लेके चाण्डालपर्यन्तके शरी हाड - मांस - चमड़ेके हैं, और जैसा रुधिर ब्राह्मण के शरीर में है, वैस ही चाण्डाल आदिके, पुनः मनुष्यमात्र के हाथकी पकी हुई रसोई खानेमें क्या दोष है? ( उत्तर ) दोप है । क्योंकि जिन उत्तम पदा के खाने - पीने से ब्राह्मण और ब्राह्मणी के शरीरमें दुर्गन्धादि दो अ शा रहित रज - वीर्य उत्पन्न होता है, वैसा चाण्डाल और चाण्डाली शरीर में नहीं, क्योंकि - चाण्डालका शरीर दुर्गन्ध के परमाणुथोंसे भर हुआ होता है, वैसा ब्राह्मणादि - वर्णोंका नहीं । इसलिए माझ शा उत्तम - वर्णोंके हाथका खाना, और चांडालादि नीच भङ्गी - चमार श्राहि ध्य न खाना । भला जब कोई तुमसे पूछेगा कि जैसा चमड़ेका शरी माता, सास, बहिन, कन्या, पुत्रवधूका है, वैसा ही अपनी खीच हे, तो क्या माता आदि स्त्रियोंके साथ भी स्वस्त्री के समान बर्तोंगे? तब तुमको संकुचित होकर चुप ही रहना पड़ेगा । है बी उत्तम अन्न हाथ और मुख से खाया जाता है, वैसे दुर्गन्ध वां * पञ्चमपुष्पका मूल्य व ६ ) हो गया है । यह Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) २४४ जातिवाच सकता है, तो क्या मल आदि भी खाओगे? क्या ऐसा ' ब्राह खाया भी कोई जा हो सकता है? ( सत्यार्थप्र. १० समु. पृ. १६६ ) । मो है । ( घं ) इस प्रकार स्वा.द.जी यज्ञका अधिकार भी शुद्रको नहीं है । एतद देते । जैसे कि अपनी ‘ आख्यातिक'में ं उन्होंने लिखा है — ' अपि के उद्धरण तत्र भवान् वृषलं याजयति, गर्हामहे ' ( पृ. २६२-२६३ ) वृषल शूद्र-जातिको कहते हैं; इसलिए ' जातेर स्त्रीविषयात् ' ( पा. ४।१।६३ ) रसोई सूत्रका उदाहरण भी स्वामीजीने अपने स्त्रैण - ताद्धित में ' वृषली ’ के शरीर दिया है; यह शूद्रजातीय - स्त्रीका नाम है । ' शूद्राय कमण्डलं न में है, वैस ' दद्यात् ' यह उनका स्त्रैणताद्धितका उदाहरण हम पूर्व दे ही चुके ई रसोई हैं । जब ऐसा है तो अन्त्यजों का यज्ञरूप - प्रतिमापूजनादिमें भी तम पदार्थों अधिकार नहीं । तब उन्हें बलात् अधिकार दिलवाना यह हिन्दु-धादि दोस् शास्त्रोंपर खुला आक्रमण है । चाण्डाली । ( १७ ) यह नहीं कहा जा सकता कि यह भंगी आदि धर्म-सेमर शास्त्रोक्त ' चाण्डाल जाति नहीं । हमारे पूर्वज लोग इन बातोंका पूरा एमा ध्यान रखते थे कि निम्न जातियां कहीं अन्य उच्च जातियों में मार श्राि प्रविष्ट न हो जाएँ । तदनुसार जन्मना जाति तथा पारस्परिक वर्ग में बड़ेका शरी विवाहादि व्यवहार, परम्परासे चलता रहता था । ' वैखानसधर्मप्रश्न ' नीबीच में कहा है – ' चण्डालः सीसकालायसामरणो वर्धाबद्धकण्ठः, कक्षे समान । मल्लरीयुक्तो यतस्ततञ्चरन्, सर्वकर्म- बहिष्कृतः, पूर्वाह्न प्रामादौ ड़ेगा वीध्यामन्यत्रापि मलानि अपकृष्य बहिरपोहयति ' ( ३ | १४ | ७ ) ग्रामाद् दुर्गन्ध वहिदूरै स्वजातीयैर्निवसेत् ' ( ८ ) मध्यान्हात्परं ग्रामे न विशत्ययम् ' ( ६ ) यहां चाण्डालका कर्म मल उठाकर ग्रामके बाहर डाल आना लिखा देवमन्दिर प्रवेश २४५ है । औशन सस्मृति में भी चाण्डालोंके लिए यही लिखा है- ' वर्थी कण्ठे समासज्य झल्लरीं कक्षवोपि वा । मलापकर्षणां ग्रामे पूर्वा परिशुद्धिकम् । न पराह्न प्रविष्टोपि बहिर्ग्रामाच्च नैर्ऋते । पिण्डी-भूता भवन्त्यत्र ' ( ६-१० ) । मनुस्मृतिमें इनका काम कुत्ते आदिको मारना और दिन में राजासे दी हुई वर्दी पहनकर सफाईका काम करना - गांव के बाहर रहना - इत्यादि बतलाया है ( मनु. १० / ५१-५५ ) नारदीय - मनुस्मृति में जो कि बहुत प्राचीन ग्रन्थ माना जाता है— कहा है - ' अशुभं दासकर्मोक्तं शेषं कर्मकृतः स्मृतम् । गृहद्वाराऽ. शुचिस्थानरथ्यावस्करशोधनम् । गुह्याङ्गस्पर्शनोच्छिष्ट - विण्मूत्रग्रहणो-मनम् । अशुभं कर्म विज्ञेयम् ' ( ५५-६-७ ) यहां पर दास ( अन्त्यजादि ) का कर्म गलीका कूड़ा साफ करना, टट्टी - पेशाब उठाकर फेंक आना कहा है । इसी पारम्परिक ( परम्परासे श्राये हुए ) व्यवहार से ही तो हम अपने - आपको ब्राह्मणादि कहते हैं । अतः यह नहीं कहा जा सकता है कि अब चाण्डालादि जाति नहीं है । वह है, और यही है, इसीलिए इसे ' अन्त्यज ' कहते हैं-' अन्त्यात् - शूद्रात् जायते ' यह उसकी व्युत्पत्ति है । सो उनका प्रतिलोम होनेसे देवमन्दिरों वा यज्ञादिमें प्रवेश शास्त्रीय नहीं । अतः आजकल के लीडरोंको भारतीय शास्त्रोंसे विरुद्ध व्यवहार करके अभारतीयताको प्रोत्साहन देना उचित नहीं । भारतीय सब व्यवस्थाएँ यथाधिकार चलती हैं, प्रकृतिकी त्रिगुणात्मकतावश व्यवहार - वैषम्य प्रकृति प्राप्त है I । यदि लीडर लोग धर्मशास्त्रोंको न मानकर उनसे विरुद्ध दूसरोंके लिए गढ़ा खोदेंगे, तो उनके लिए भी CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 136

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२४६ श्री सनातनधर्मालोक ( ६ ) कुंयां तैयार हो जायगा । ( ख ) यदि किसी पुराणके काचित्क - इतिहासमें कहीं इस विधिसे विरुद्धता दीखे, या तो वहां ऐकदेशिकता होगी, या कोई अर्थबाद होगा । श्रर्थवादमें एक विशेष बातकी सिद्धि अपेक्षित होती है, वह विधिवाक्य नहीं हो जाता । इतिहास भी एक भूतार्थवाद नामक अर्थवाद होता है । ऐसे सैंकड़ों भी इतिहासको उसका विरोधी एक छोटा - सा विधिवाक्य बाधित कर दिया करता है । अब जैसे किसी उपाख्यानमें आ जावे कि वहां कर्महीन -ब्राह्मणके प्रवेश करनेपर तो वह मूर्ति न बढ़ी, पर स्वकर्म में लगे हुए चाण्डालके आनेपर वह बढ़ गई; इस अर्थवादका तात्पर्य कर्म-परककी प्रशंसा में है, चाहे वह चाण्डाल भी हो; और कर्महीनकी निन्दामें हैं, चाहे वह ब्राह्मण भी हो । इससे ब्राह्मणका अनधिकार वा शूद्रका अधिकार मन्दिर प्रवेशमें नहीं हो जाता; ' स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ' ( गीता १८४३ ) इस भगवद्-वचनानुसार स्वकर्मपरकताको प्रशंसा में ही तात्पर्य विवक्षित होता है - मर्यादा भङ्ग तात्पर्य नहीं होता । ( ग ) इस प्रकारके भूतार्थवाद कई कल्पित और कई पारम्परिक मिलते हैं, जिनमें कई निर्मर्यादित बातें भी मिलती हैं पर उनमें तात्पर्य क्या है, यह निष्पक्ष तथा दूरदर्शी ही जान सकता है, किसी अर्वाचीन- विचारका पक्षपाती उसे नहीं जान सकता । उदाहरणतः एक अर्थवाद पाठकगण देखें । एक शिव मन्दिर जो नगरसे बाहर था, उसमें नियमानुसार दो व्यक्ति जाया करते थे । CC - 0. Ankur Joshi Collection देव मन्दिर प्रवेश २४८ एक तो उस मन्दिरमें शिवमूर्तिके आगे दीपक जलाता था, किया विद्वान दूसरा मुँहमें पानी मरकर शिवमूर्ति पर कुल्ला कर देता था । वेदाव दिन बड़ी सख्त अँधेरी चली । दीया जलानेवाला तो मन्दिरों नहीं पहुँच सका, और कुछ ढीला भी हो गया कि आज दोश सम्मत नहीं जल सकेगा, बुझ जायगा; किन्तु कुल्ला कर देनेवाला देखि किसी नियमानुसार पहुँच ही गया और उसने शिव प्रतिमापर कुद्धा ह पड़ता ही दिया । इससे महादेव साक्षात् प्रकट हो गये और वर मांगने कहा । उसने सिरपर दो सींग हो जाना मांगा । एक क यह उपाख्यान स्पष्ट भूतार्थवाद है, चाहे यह कल्पित हो, काकन यह ऐतिह्य हो; पर इससे देवमूर्तिपर कुल्ला कर देना भगवान् यम के दर्शनकारक सिद्ध नहीं हो जाता; यह मर्यादा है । कि - इ तो श्रद्धासे नियमबद्ध - पूजा आपत्तिकाल में भी न छोड़नेपर भगवान की प्रसन्नता होती है, चाहे वह पूजा शास्त्रानुसारिणी न भी हो तो इस निकले जिसके लिए अर्जुनने भी भगवान् से प्रश्न किया था - ' ये शास्त्रविधि तात्पर्य मुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः । तेषां निष्ठा तु का कृष्ण! सत्त्वमई रजस्तमः ' ( गीता १७ । १ ) यही तात्पर्य उस पौराणिक अर्थवादका है । पर उप वादी सिद्ध होता है; अतः पौराणिक वा तान्त्रिक कई उपाख्यान परि यदि वेदमर्यादा विरुद्ध भी मिलते हों; तो वहां विवक्षित तात्पर्य मात्र मिल लेना पड़ता है; वहां प्रत्येक शब्दका अर्थ नहीं लेना पड़ता । स्वकर्म ह विशेषकर श्रुति वा स्मृति के मुख्य विधेयांशसे वह विरुद्ध हो; विन्दति वह अनुकरणीय वा अनुसरणीय नहीं हो जाता । जव पौराधिक कर प्र इतिहासों को वेदानुकूल · तात्पर्यके दृष्टिकोण से देखा जायेगा; ह Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 137

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) २४८ कोई विरुद्ध शङ्का सन्देह के गर्त में नहीं डाल सकेगी । 7 था, किन विद्वान्को 1 वेदादिके सिद्धान्त से चाण्डालादिको अस्पृश्यता तथा वेद में था । स तथा वेदमन्त्र संस्कृतमूर्तिपूजनमें अनधिकार यह श्रुति-1 मन्दिारों अनधिकार सम्मत सिद्ध बात है, इस बात से विरुद्ध मिलनेवाले उपाख्यानका -श्राज ला किसी विशेष स्वकर्मपरकता आदिकी प्रशंसामें तात्पर्य समझना. दैनिक र पड़ता है, वेदविरुद्ध - सिद्धान्तके अवलम्बनमें नहीं । कुल्लामांगने ( घ ) स्वा.द.ने स.प्र. ११ समु. ( पृ. २२६ ) में भक्तमालके नाम से एक कथा लिखी है - ' कोई मनुष्य सोता - सोता ही मर गया; ऊपर से काकने विष्ठा करदी; वह ललाटपर तिलकाकार हो गई । वहां हो यमके दूत भगवान् कि इसके 7 है । ले जाएँगे ' भगवा तो इससे नमी हो निकलेगा; शास्त्रविधि तथा विष्णु के दूतों में विवाद हुआ । विष्णुदूतोंने कहा ललाट में वैष्णवका तिलक है इसलिए हम इसे वैकुण्ठ में ऐसी कथा भक्तमाल में आती तो नहीं । यदि कहीं होगी वींटके तिलकसे विष्णुलोककी प्राप्तिमें तात्पर्य नहीं किन्तु वह अर्थवाद वहांपर वैष्णव तिलक लगाने का तात्पर्य रखनेवाला सिद्ध होगा । यदि स्वामी यह समझते; तो इस सत्त्वमाह पर उपहास न करते । तब क्या पौराणिक अर्थवादोंको देनेवाले. वादका बादी इससे वींटके तिलक लग जानेको वैकुण्ठप्रद मान लेंगे? या पर्यमात्र यदि नहीं; तब चाण्डालका कोई देवमूर्तिपूजाका पौराणिक इतिहास " मिल जावे; वहां उसमें तात्पर्यं न होकर ' स्वकर्मपरक - चाण्डाल भी न्ना पड़ता स्वकर्महीन ब्राह्मणसे अच्छा होता है - ' स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं रुद्ध हो विन्दति ' ( गीता १८/४६ ) और भगवान् उससे अपनी पूजा समझ पौराणिक कर प्रसन्न होते हैं'- यह तात्पर्य निकलता है । अथवा वहां वेदमन्त्र-जायगा । स देवमन्दिर प्रवेश २४३-प्रतिष्ठापित मूर्तिका वर्णन इष्ट न होकर असंस्कृत दिव्य - लिङ्गादिरूप कोई विशेष मूर्ति इष्ट होती है । ऐसा होनेपर वहां वह उपाख्यान सोमित होजानेसे सामान्य संस्कृत - मूर्तिकेलिए नहीं रह जाता । ( ङ ) इस प्रकार जो कई पण्डित लोग पुराणोंसे अन्त्यजोंकी मूर्तिपूजा दिखाया करते हैं; उनको याद रखना चाहिये कि - मूर्ति-पूजा भी एक यज्ञ हुआ करता है; यह हम पूर्व बता चुके हैं । याज्ञिक अग्नि दो प्रकारकी होती है, एक वेदमन्त्र - संस्कृत, दूसरी असंस्कृत; जैसाकि मनुजीने कहा है- ' प्रणीतश्चाऽप्रणीतश्च यथाग्नि-दैवतं महत् ' ( ६।३१७ ) ' प्रणीत ' का अर्थ वेदमन्त्र - संस्कृत, आहित श्रौत अग्नि है, और ' अप्रणीत ' का अर्थ मन्त्राऽसंस्कृत, अनाहित लौकिक - अग्नि होता है । इस प्रकार देवमूर्ति भी दो प्रकार की होती है, एक वेदमन्त्र संस्कृत, दूसरी असंस्कृत | इसीको लक्ष्य करके श्रीमद्भागवतमें भी कहा है- ' वैदिकस्तान्त्रिको मिश्र इति मे त्रिविधो मखः ' ( ११।२७१७ ) यहाँपर यज्ञ वैदिक, तान्त्रिक, मिश्र भेदसे तीन प्रकारका कहा है । वेदमें शास्त्रानुसार त्रैवर्णिकका अधिकार होनेसे वैदिक यज्ञका अधिकारी भी त्रैवर्णिक होता है; तन्त्रों - पुराणविशेषों में शुद्र - निषादादिका भी अधिकार निषिद्ध न होनेसे उस तान्त्रिक - यज्ञमें शूद्र - निषादादि पञ्चजनों का मी अधिकार हो जाता है । सो जहाँ वेदादिमें अग्निको पाञ्चजन्य ( पञ्चजनों के यज्ञार्थ ) बताया गया हो, वहाँ आहित श्रौत अग्नि इष्ट नहीं होती, किन्तु अनाहित लौकिक- अग्नि ही इष्ट होती है । इस प्रकार आधान संस्कृत मूर्ति में भी संस्कृत अर्थात् उपनयनादि - संस्कार-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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देव मन्दिर प्रवेश २१० श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) २४० सम्पन्न त्रैवर्णिकोंका ही अधिकार होता है, असंस्कृत शुद्र - अन्त्यजों का नहीं; पर असंस्कृत - मूर्ति में सभी शूद्र अन्त्यजादिका भी. अधिकार होता है । ( च ) इसमें प्रमाण यह है कि- ' कात्यायन श्रौतसूत्र ' में रथकार-स्थपतिकी इष्टि बताई गई है; वहाँ पर रथकार एवं स्थपतिको अत्रैवर्णिक सिद्ध किया है; उसके कर्कभाष्य में इसकी स्पष्टता देखी जा सकती है । फिर वहाँ प्रश्न किया गया है कि- ' तन्त्रैतद् विचार्यते-स्थपतीष्ट्यां किम् आधान संस्कृतोऽग्निः, उत लौकिक इति? ' अर्थात् स्थपति - आदि अत्रैवर्णिकोंका यज्ञ संस्कृत - अग्निमें होता है, वा लौकिंक ( असंस्कृत ) अग्नि में? वहाँ उत्तर दिया गया है - ' लौकिके ' ( १ | १ | १४ ) ' लौकिके अग्नौ एतत् स्याद् [ न तु आधानसंस्कृते इति ] ' इसी प्रकार मीमांसादर्शन - शावर भाष्य में भी कहा है- ' तस्माल्लौकिकेषु वग्निषु स्थपतीष्टिः [ न तु प्रधानसंस्कृतेषु ] ' ( ६।८।२१ ) । इस प्रकार जैसे वैदिक यज्ञ में त्रैवर्णिकसे अतिरिक्त शूद्र - अन्त्यजका अधिकार शास्त्रीय नहीं, प्रत्युत पूर्वमीमांसा ( मीमांसादर्शन ) तथा उत्तरमीमांसा ( वेदान्त दर्शन ) इन वेदकी मीमांसा करनेवाले दर्शनों में ' अपशूद्राधि-करण ' और ' यागे शूद्रानधिकाराराधिकरण ' भी उपनिबद्ध हुए हैं । इसलिए आर्य समाज के श्रीतुलसीरामः स्वामीने मी मनु. ६३१६ की टीकामें लिखा है- ' यज्ञमें शूद्रके घरका अग्नि भी वर्जित है ' ( पृ. ३५१ ). इसीलिए स्वा. द. जीने भी सं.वि. के सामान्य - प्रकरण में लिखा है-' ॐ भूर्भुवः ' इस मन्त्रका उच्चारण करके ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यके घरसे अग्नि ला ' ( पृष्ठ २३ ) इससे अत्यन्त स्पष्ट हो रहा है कि-CC - 0. Ankur Joshi Collection वैदिक यज्ञ के अधिकारी न होनेसे शुद्रकी अग्नि संस्कृत होती, अतः वह याज्ञिकोंके उपयोग में नहीं आती । इस नहीं प्रचा शूद्र - अन्त्यजादिके वेदाधिकारी न होनेसे शूद्रकी प्रतिमा संकृत नहीं होती, अतः वह याज्ञिकों के दर्शनाई नहीं होती । इस प्रकार महा शूद्र - अन्त्यजादिके वेदाधिकारी न होनेसे उनका वेदमन्त्रसं ' वृषत देवमूर्ति में भी अधिकार नहीं होता । वेद तभी तो ब्राह्मणभागात्मक वेदमें कहा है — ' न वै देवाः सर्वेदेव हमनु संवदन्ते - त्राह्मणेन वैव, राजन्येन वा, वैश्येन वा, ते हि यि । २८ । ५ ( यजुर्वेदशतपथ • ३ | १ | १ | १० ) मन्त्रभाग के व्याख्याता होने से शब्पक- पुराण ब्राह्मण वैदिकयज्ञमें शूद्रको अनधिकृत बता रहा है । तभी शूद्रादि के लिए बचन आया है - ' तस्मात् शूद्रो, यज्ञेऽनवक्न सः ' ( कृष्णयजु. तै.सं ७११४६ ) । ठीक ' मन्त्रवर्ज न दुष्यन्ति ' ( १०।१२६ ) इस मनुपद्य में आर्यसमा श्री तुलसीरामस्वामी ने लिखा है - ' धर्मकार्य यज्ञादि करनेका शूद्रोचे वाक्य अधिकार नहीं है । यदि द्विज शूद्रको अयोग्य समझकर रोके तो स में भी ( शूद्र ) का यह अधिकार नहीं है कि वह राजद्वारादिसे कानूनन अपना एक भी क सिद्ध कर पावे । परन्तु उसको धर्म करने की मनाई भी नहीं है कि • चतुष्प शूद्र धर्म करे ही नहीं, किन्तु यदि शूद्र धर्म करना चाहें तो निषेध वेदमन्त्रोंके उच्चारण ही यज्ञहोमादि कर सकते हैं; उसमें उन ' पद्यु: ( श्रमन्त्र होमका कोई दोष नहीं । इस प्रकार शूद्रकी देवपूजा में नाध्येय वेदमन्त्राऽसंस्कृत - मूर्ति द्वारा होगी, वेदमन्त्र संस्कृत - मूर्तिद्वारा नहीं तव्यम्, यह इस विषय में आर्यसमाजी- विचारधारा अपनानेवाले सुधारक यहाँ प सनातनधर्मियोंको भी याद रख लेना चाहिये । इस बिषय बहिर्भूत Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक. ( ६ ) २१२ कृत नहीं । स्पष्टता पाठक ' आलोक ' के तृतीयपुष्प ( ३३१-३३५ पृ. ) इस प्रकार में देखें । मासंकृत ( छ ) ' न च शूद्र - समभ्याशे वेदान् उच्चारयन्त्युत ' ( १।६४।२० ) इस प्रकार महाभारतके इस वचनमें, तथा ' न शूद्रजनसंनिधौ ' ( ४६ ) न्त्रसंस्कृत ' वृषलस्य च संनिधौ ' ( ४ | १८० ) इन मनुजीके वचनों में शूद्र के सामने वेदके उच्चारणका भी निषेध किया गया है- ' भावं न चाऽस्या-सर्वे हमनुप्रदातुमलं द्विजो मन्त्रमिवाऽद्विजाय ( शूद्राय ) ' ( वाल्मी. सुन्दर. यि २८ । ५ ) ' नाधीयीत प्रतिषिद्धोस्य यज्ञः । स्यादेवं स्मृतः शूद्र - धर्मः से शतपथ- पुराण: ' ( महामा. उद्योग. २६ । २६ ) इत्यादि पञ्चमवेद के बिधि-हादिके लिए बचनोंमें भी शूद्रका वेदाधिकार निषिद्ध किया गया है । यह - ७११४१६ ) | ठीक भी है । आर्यसमाजी ( ज ) ' श्मशाने नाध्येयम् ' यह एक प्रसिद्ध तथा प्रामाणिक का शूद्रोंको वाक्यं है । इसमें श्मशान में वेदपाठका निषेध किया है । मनुस्मृति-के ठोस में भी कहा है- ' नाधीयीत श्मशानान्ते ' ( ४ | ११६ ) । महाभाष्य में अपना स भी कहा है- ' देशः खल्वपि आम्नाये नियतः श्मशाने नाध्येयम्,. नहीं है कि चतुष्पथे नाध्येयम् ' ( ५ २ १५६ ) यहाँ श्मशान में वेद पढ़ने का हैं तो दि निषेध किया गया है । शूद्रको भी जङ्गम ' श्मशान ' माना गया है -' पद्यु ( पादयुक्त ) हवा एतत् श्मशानं यत् शूद्रः, तस्मात् शूद्रसमीपे देवपूजा में नाध्येयम् । अतएव अध्ययन - प्रतिषेधः । यस्य हि समीपेपि नाध्ये--द्वारा नहीं तव्यम, स कथमश्रुतमधीयीत ' ( वेदान्तदर्शन शाङ्करभाष्य १ | ३ | ३६ ) लसुधार यहाँ पर शुद्रको चलता - फिरता श्मशान कहनेसे उसे वेदाधिकारसे विषय बहिर्भूत किया गया है । इसी प्रकार ' मीमांसादर्शन ' में भी कहा देवमन्दिर प्रवेश २१३ है- ' तथा चान्यार्थदर्शनम् ' ( ६१ ३८ ) इस सूत्र के शावरमाध्यमें भी कहा है- ' वा एतत् श्मशानं यत् शूद्रः । तस्मात् शूद्रसमीपे न अध्येतव्यमिति अनध्ययनं शूद्रस्य दर्शयति ' । सो जब एतदादिक प्राचीन वचनोंसे वेदाधिकारका " शुद्रको निषेध है; तो शूद्रान्त्यज - आदिका वेदमन्त्रसंस्कृत - देवमूर्तिमें मी अधिकार नहीं रह जाता; तब यदि कहीं किसी पुराण में शूद्र-अन्त्यजादिका देवमूर्तिपूजा करना दीख रहा हो; वहाँ वह वेदमन्त्र-- संस्कृत मूर्तिमें न होकर असंस्कृत, अथवा पुराण या तन्त्र लौकिक मन्त्रोंसे संस्कृत लौकिक मूर्तिकेलिए, या दिव्यलिङ्ग ( जो * कई महाशय ' तत् कृएमो ब्रह्म वो गृहे संज्ञानं पुरुषेभ्यः ' ( श्र. ३ | ३० | ४ ) इस मन्त्रसे पुरुषमात्रको वेदका अधिकार बताकर शुद्रको भी वेदाधिकारी कहते हैं; उनसे प्रष्टव्य है कि यह मन्त्र मनुष्योंको सम्बोधित करके कहा जा रहा है, वा द्विजोंको? यदि मनुष्योंको, तो ' चो गृहे ( तुम मनुष्योंके घरमें ) पुरुषेभ्यः का क्या अर्थ है? यदि ' पुरुषेभ्यः का मी ' मनुष्योंको ' अर्थ है, तो यह व्यर्थकी पुनरुक्ति होगी । यदि ' पुरुषेभ्यः ' का अर्थ ' पुरुषों ( मर्दों ) को ' है, तो त्रियोंका वादीले श्रभिमत वेदज्ञान इससे खण्डित होगया । जबकि अथर्ववेद ( १६/७१११ ) के अनुसार वेदर्मे द्विजका अधिकार है - ( यह हम छठे निबन्धमें सिद्ध कर चुके हैं ) तब प्रकृत - मन्त्रमें भी उन्हीं द्विज - पुरुषोंको अधिकृत किया गया है, इससे स्त्री - शूद्रोंका व्यवच्छेद ( दूरीभाव ) होगया । वे इसके श्रनधिकारी सिद्ध होगये । वस्तुतः वादिदत्त - मन्त्रमें वेदाधिकारीकी बात भी नहीं; किन्तु परस्पर एकतारूप ब्रह्म घरके पुरुषोंके लिए अधिकृत किया गया है; क्योंकि— .. घर पर शासन पुरुषोंका ही होता है । स्त्रीके अबला होने से वह उससे नहीं . निभ सकता । यह सूक्त एक परिवारके पुरुषोंके परस्पर प्रेम - बर्ताव के.. CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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२२४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) बिना प्रतिष्ठा के स्वतः शक्तिशाली हैं - ) के लिए समझना चाहिये । तब जिन लोगोंने पुराणोंके वचनों द्वारा शूद्र - अन्त्यज आदिका मूर्ति-पूजाधिकार ढूढने में परिश्रम किया हो; वह अनाहित ( असंस्कृत ) लौकिक - मूर्ति विषयक होने से वेदमन्त्रप्रतिष्ठापित - मूर्ति विषयक नहीं समझना चाहिये; अतः उनका वह अनुसन्धानका परिश्रम व्यर्थ सिद्ध है । वह मत कि ' शूद्र अन्त्यजादि भी देवपूजा करें'-भविष्यपुराण के अनुसार [ जिसे प्रतिपक्षी भी प्रेमसे दिया करते हैं; पर उसका पूर्वोत्तर पाठ छिपा दिया करते हैं । जिसका हम पूर्व उद्धरण दे चुके हैं - दैत्यमत है, देवमत नहींः अतः सनातनधर्मसे विरुद्ध है । आशा है ' आलोक ' पाठकोंने यह भली - भांति हृदयङ्गम कर लिए विनियुक्त है । उसमें ' अनुव्रतः पितुः पुत्रो, मा भ्राता भ्रातरं-द्विचन्, ' वो गृहे ' ( श्र. ३।३०१२-३-४ ) श्रादि इस सुतके मन्त्र साक्षी हैं । वेदोपदेश के अधिकारी द्विज - पुरुष होनेसे वे वे पुरुष स्त्रियों में वह प्रेम-भाव उपदिष्ट कर देंगे; और द्विज - पुरुष शूद्रोंको उपदिष्ट कर देंगे-' प्रधानेन हि व्यपदेशा भवन्ति ' इस न्यायसे प्रधानके ही जिम्मे सब लगाना पड़ता है । छोटी श्रेणीके एवम् श्रधीन स्त्री - शुद्रको वे ही प्रधान अपनी भाषा में समझा देते हैं । इस मन्त्रका देवता भी ' सांमनस्य ' है, जिसका अर्थ है - ' एक परिवार वा घरवालोंके हृदयों को परस्पर मिलाना । सो इस मन्त्रमें स्त्री - शूद्रके वेदाधिकारका कुछ गन्ध भी नहीं । वेदोंको बलात् अपने पीछे चलाना वैदिकता नहीं; किन्तु वेदके पीछे चलना ही वैदिकता होती है । यदि वर्तमान - जमाने के अनुकूल अर्थ वेदके किये जावेंगे; तो वेद, वेद न रह जायेंगे । जुमानेसाजीका श्रर्थ ही वेद हो जावेगा; वा श्राजकलका जमाना ही वेदके शब्दोंका गुरु हो जावेगा -पर यह वैदिकम्मन्यों के लिए उचित नहीं । CC - 0. Ankur Joshi Collection देवमन्दिर प्रवेश लिया होगा । ( c ) तब जोकि कई अर्वाचीन प्रवाहपतित व्यक्ति इस सिद्धान को ' अदूरदर्शी लोगोंका मत ' कहकर उसमें शुष्क - कुल केमात्र देते । हैं कि - ' संस्कृतमूर्ति में बैठा हुआ परमेश्वर शूद्रसे अपना मुख दिपा लेगा कि मैं इस संस्कार करनेवालोंकी आज्ञा में जकड़ा हूँ, मेरा प्राकृत- मूर्ति में दर्शन करो ' इत्यादि ( पृ. ८०-८१ ) और उन्ही तुम तर्कोंको ‘ भारतीय - धर्मशास्त्र ' नाम देते हैं । यह भारतीय धर्मशाखोला अपमान करना है । वस्तुतः यह वेदादि - शास्त्रोंके अनवगाहन आपातावगाइनका फल है यह अनुसन्धाता विद्वानोंने पूर्वोह शास्त्र - वचनों से जान ही लिया होगा । ' वेदशास्त्राऽविरोधिना । पर र्केणानुसन्धत्ते स धर्मं वेद नेतरः ' ( १२/१०६ ) वेदशास्त्रविरोधी तर्कसे धर्मज्ञान नहीं होता - यह इस मनुवचन से सिद्ध है । नहीं तो ' पुण्य करो, पाप न करो ' इस परमेश्वर की आज्ञा होने पर पाप करने से क्या परमात्मा उसका हाथ पकड़ने आता है! यदि नहीं, तो पापी यदि कहे कि - " मुझे तो पाप करते हुए ईश्वर कहने नहीं आया; अतः वह है ही नहीं; अथवा उसे आप लोगोने-अपने इच्छानुसारी बन्धनों में जकड़ रखा है; उसके नाम से वेद भी आप लोगोंने बना रखे हैं; नहीं तो क्या वह निराकार भार लोगोंके कानमें कहने आया? " तो क्या उसकी बात मान ही जायगी? नास्तिक तो ईश्वर की सत्ता नष्ट करने पर तुले हुए हैं । तब क्या उन्हें उसी समय प्रत्यक्ष - दण्ड न देने पर यही मान जावेगा कि - ईश्वर है ही नहीं? रूस वालोंने ईश्वर की मू बिनास Gujarat. An eGangotri Initiative