सनातन धर्मलोक ६ — पृष्ठ 141–150
सनातन धर्मलोक ६ · पृष्ठ 141–150
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) २१६ फाँसी दे दी थी; तो क्या ईश्वरको ही न माना जावेगा? वा उसे उसे असमर्थ मान लिया जावेगा? वस्तुतः यह शुष्क - कुतर्कमात्र र्कमान सिद्धान • होते हैं, इनका महत्त्व कुछ भी नहीं होता । ऐसे कुतर्कियों को देते ' हैतुक ' कहकर मनुजीने ( ४ । ३०, २।११ में ) अनादरणीय माना है । मुख छिपा और उन्दी शा बगाहन ना । प मात्र विरोधी अतः वेदके भक्तोंको इन कुतर्कों में न लगकर यच्छब्द आह तदस्माकं प्रमारणम् ' ( महाभाष्य वेदकी आज्ञा मानने में संलग्न रहना चाहिये; निःश्रेयसकी प्राप्ति होगी । अब छुआछूत के किया जाता है | ( - ) छुआछूत हटाने के कुछ ' शब्दप्रमाणका बयं पस्पशा. ) के अनुसार तभी अभ्युदय एवं कुछ तर्कोंपर विचार तर्क? है । नहीं गत - निबन्ध में प्रकरणवश कुछ छुआछूतका प्रकरण आ गया 1 होने पर - है, अब छुआछूत हटाने के कुछ तर्कोंपर भी विचार किया जाता है । है? यदि ( १ ) तर्क- जो अन्त्यज आपके मलको हटाकर आपके घरको ईश्वर -निर्मल कर देता है, जो चमार आपके लिए जूता बनाकर आपके लोगोंने पैरको बिच्छू आदिसे बचाता है; जो दर्जी आपके लिए कपड़ों के नाम से वेद कई तरह के फैशन बनाकर आप लोगों को योग्यतावाला प्रसिद्ध दाकार - कर देता है; जो नाई आपकी हजामत बनाकर आपको सुन्दर बना मान देता है, जो बढ़ई या घरका बनानेवाला आपका घर बनाकर हुए है आपको आश्रय देता है; जो धाय आपकी स्त्रीके प्रसव में सहायता यही · देती है, आपके बालकको स्वच्छ कर देती है; जो कुएं में घुसनेवाला बिनाकर कुएँके कीचड़को निकालकर आपकी स्वच्छ जल पीनेमें सहायता CC - 0. Ankur Joshi Collection धाव घटानेके कुछ तर्क २१७ करता है; ये सब अन्त्यज, चमार, दर्जी, नाई, तरखान, धाय, आदि - सनातनधर्मके मत में निकृष्ट हैं । जो शूद्र तीन वर्णों की सेवा केलिए है; आश्चर्य है कि वह शुद्र तो निकृष्ट है; परन्तु जो आलसी किसी की कोई सेवा नहीं करता; मक्खी भी स्वयं नहीं उड़ाता, वहां भी उसकी सहायता पंखा चलानेवाला दास ही करता है, वह अभिमानी त्रैवर्णिक ऊँचे आसन पर बैठता है; वह आसन भी उस सेवकसे बनाया होता है- सेवकों को घृणा दृष्टिसे देखता है; सो वह ऐसा व्यवहार अवश्य अर्वाचीन है । वैदिककालमें ऐसा नहीं था । उस समय तो ' रुचं नो घेहि ब्राह्मणेषु. रुचं राजसु नस्कृधि । रुचं विश्येषु शुद्रेषु मयि घेहि रुचा रुचम् ' ( यजुः १-४८ ) यहां चारों वर्णोंकेलिए समान रुकू ( दीप्ति, बल ) की प्रार्थना है; तब शूद्रोंकी निकृष्टताका व्यवहार अवैदिक ही है । मनुष्यों की मनोवृत्ति ऐसी गिर गई है कि - तेलसे करें प्यार, पर तेलीसे घृणा करते हैं । दूध को तो चाहते है; परन्तु दुहने वाला गवाला निकृष्ट! हजामत आवश्यक है, किन्तु नाई स्नेहका पात्र नहीं । गहना तो चाहिये; पर सुनारको निकृष्ट बनाया जाता है । रथ तो होना चाहिये, पर रथ चलाने वाला सूत, तथा रथकार शूद्र! घोड़ेके लिए वास तो लिया जाय; पर घसियारा हो जाय पृश्य! मांस तो खानेको मिल जाय; पर मांस लाने वाला कसाई निकृष्ट! जलको ठण्डा करने के लिए घड़ा तो चाहिये; पर कुम्हार हो जाय निकृष्ट । कपड़ों का रंगना हो सौभाग्यका स ० ध ० १७ Gujarat. An eGangotri Initiative
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२१८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) चिन्ह; पर रङ्गरेज हो अन्त्यावसायी । कपड़ोंको मैला करने वाला द्विज तो हो उत्कृष्ट पर उनको धोनेवाला ( धोबी ) हो निकृष्ट । जूतेकी आवश्यकता तो सब को है; पर उसका बनाने वाला चमार हो अस्पृश्य । कपड़े के बिना काम ही न हो, पर कपड़े चुनने वाले जुलाहे से हो घृणा । इस आर्य जाति की घृणाको कहां तक गिर्ने । इसी घृणासे ही मुसलमानोंकी संख्या कई हज़ार गुनी होगई, और हमारी उतनी कम होगई ' | ( भारतीय - धर्मशास्त्रमें ) ( १ ) ( विचार ) सेवावृत्ति शास्त्रों में निन्दित मानी गई है, इस कारण सेवक भी सेव्यकी अपेक्षा निकृष्ट अवश्य होता है और माना भी जाता है । यह बात लोक, वेद, परमात्मा - जीव, प्रकृति, तथा सब देशों और सब प्राचीन अर्वाचीन जातियों में सर्वत्र सुलभ और स्वाभाविक है । इनमें परमात्मा सेव्य है, जीवात्मा सेवक है । जीव परमात्माकी सदा उपासना करता है, उसके यशके फैलाव में साधन है । यदि जीव न हो, तो परमात्माको बड़ा कौन माने १ परमार्थतः जीव और परमात्मा में कोई भेद नहीं भी है, फिर भी व्यावहारिकतामें परमात्मा सेव्य है, जीवात्मा सेवक है । परमात्मा स्वामी है, जीव दास है । परमात्मा नित्य - मुक्त है, जीव बद्ध है, इस कारण इनका एक आसन भी नहीं । परमात्मा उच्चासनासीन हैं, जीवात्मा निम्नासनासीन । शाङ्कर - वेदान्तके अतिरिक्त शेष व्यावहारिक दर्शन इन दोनों में सदा द्वैत ही मानते हैं, अतः जीव परमात्मा आसनको छूनेका अधिकारी ही नहीं । इस प्रकार स्वामी CC - 0. Ankur Joshi - Collection छुवाछूत हटाने के कुछ तर्क २५५ २६ परमात्मा उत्कृष्ट और सेवक जीवात्मा निकृष्ट एवम् अविद्याद्यपहर जा माना जाता है । प्रकृति - राज्य में ही देख लीजिये उसमें मनुष्य तथा उस पशु - पक्षी स्ना मी हैं । इनमें पशु तथा पक्षी मनुष्यकी सेवा करते हैं । घोड़ा पित मनुष्यों को अपने ऊपर चढ़ाता है, इस प्रकारं गधे बड़ा मार उठाने सेव हैं । इस प्रकार चील, गोध आदि पक्षी मुर्दे खाकर और सुर पि आदि विष्टा खाकर मनुष्यको शुद्ध श्रीयुके उत्पादनमें सहाय कि देते हैं । यह मनुष्यों के भंगी हैं । इस प्रकार ततैये वरं श्रादि मा तथा मक्खियां खराब वायुको खाकर हमें स्वस्थ रखते हैं । यह ' सर्वत्र देख लीजिये | कुत्ता तो सेवामें प्रसिद्ध ही है, फिर भी मनुष्योंके सेवक मी पशु - पक्षी मनुष्यों से उत्कृष्ट होना तो दूर रहा, म ध्य मनुष्योंके समान भी नहीं माने जाते, अपितु मनुष्यों से निकृष्ट हो क माने जाते हैं । कई इनमें अस्पृश्य भी होते हैं, मनुष्य के जीवनके वेद समक्ष उनका जीवन उत्तम नहीं माना जाता, किन्तु निकृष्ट ही माना जाता है । तभी तो शासक भी मनुष्यों का अन्न बचाने के लिए बन्दर हु भ कुत्ता, नीलगाय, मोर आदियोंको मरवा देते हैं । बल्कि सेवा छा ' श्ववृत्ति ' शब्द से ही कहा जाता है । स पैर सारे शरीर को इधर - उधर पहुँचाकर उसकी सेवा करते हैं, सारे शरीर का भार अपने ऊपर रखते हैं । यदि पांव न हों ज पुरुष पंगु ( लंगड़ा ) हो जाये । पुरुष मारनेकेलिए आये हुए है शत्रुको भगा भी न सके । ऐसा होने पर भी पांवको सम्पूर्ण शरीर उ से निकृष्ट माना जाता है, उसको छूते हुए हाथकी भी शुद्धि की Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) २६० वद्याद्युपदव जाती है । इसीलिए परमात्माने मी उसे निम्न ही पद दिया है, उसे सिर पर नहीं रखा जाता । पुत्र पिताकी सेवा करता हैं, उन्हें पशु स्नान कराता है, थकावट हटाने के लिए उनके पैरोंको दबाता है, हैं । - पक्षी पिताजी की सब प्रकार की आज्ञाओंको पालता है, सब प्रकारकी घोड़ा भार उठा सेवा करता है, फिर भी पुत्र पिता से उत्तम नहीं माना जाता । पुत्र र पिताको नमस्कार करता है, पर पिता पुत्रको नमस्कार नहीं करता, सुअर सहायता किन्तु उसे आशीर्वाद ही देता है । इस प्रकार बह उससे निम्न आदि माना जाता है । छोटा अध्यापक मुख्याध्यापककी सेवा करता है, उस विद्यालय के फिर मी मूलभूत विद्यार्थियोंको मूल अक्षरशिक्षण करके जोकि मुख्या-दूर रहा, ध्यापक के लिए कठिन कार्य है, उसकी सहायता करता है । ऐसा निकृष्ट ही करने पर भी वह मुख्याध्यापकसे निम्न माना जाता है, उसे थोड़ा जीवन वेतन दिया जाता है, छोटे अध्यापकों के कार्यसे यश उसी मुख्यका ही माना हुआ करता है । उस विद्यालयके चपरासीको - जो विद्यालयको लिए वन्दा झाड़ता - बुहारता है - थोड़ा वेतन मिलता है, अध्यापकोंके योग्य = सेवाको आसन में भी उसका अधिकार नहीं होता, वह श्रासन भी उसी सेवकसे ही स्वच्छ करके रक्खा जाता है । सेवा करते । वीर्यं शरीरका पोषक तत्त्व है, वीर्यका अभाव मृत्यु माना पांव न हो । जाता है, वीर्य के ह्रास होनेपर निर्बलतावश रोगकी उत्पत्ति होती है, वही सारे शरीरका सेवक भी वीर्य अस्पृश्य माना जाता है, पूर्ण शरीर उसे छूकर अपनी शुद्धि करनी पड़ती है, इसी प्रकार रक्त और शुद्धि की अस्थि आदि के लिए भी समझना चाहिये । CC - 0. Ankur Joshi भाव हटानेके कुछ तर्क २६१ पुरुषका पुरीष ( मल ) पुरुषका उपकारक तथा सेवक पदार्थ होता है । निलानां मलं बलम् ' यह कहकर उसकी स्तुति की जाती है । हमारे अन्दर मल रहने पर ही हमारा सौन्दर्य अपने रूपमें रहता है । कोई अछूत किसी राजकुमारीपर आसक्त होकर उसके रूपको सदा देखना चाहता था, बल्कि सदाकेलिए उस रूपको अपना बनाना चाहता था । उसके न मिलनेपर वह आजकलके अस्त्र भूख - हड़तालको मरणावधि प्रयुक्त करना चाहता था । अगत्या उस दयामयी राजकुमारीने यह सुनकर जुलाब ले लिया, उससे निकले हुए मलको पात्रों में भरकर एक भंगीके द्वारा उसने उस भंगीके पास भिजवाया और सन्देशा भेजा कि ले यह मुझ-राजकुमारीका रूप है, मल निकलने से वह उस समय असुन्दर दिखाई पड़ती थी । फलतः भीतरका मल ही पुरुषका रूप एवं बल है । केवल इतना ही नहीं, खेतोंमें डाला हुआ सड़ - गलकर खाद रूपमें वह खेतीका हितकारक होता है । इस प्रकार नालीका जल भी सड़ा हुआ खेतीको लाभप्रद होता है, उसका भी मूल्य होता है । इसी प्रकार सेवक भी मल वा कीचड़, लाभप्रद होनेपर मी अस्पृश्य व्यवहृत होते हैं । शिष्य गुरुजी की खूब सेवा करता है, उनकी थकावट हटाता है, उनको जल पिलाकर गर्मीके कष्टसे बचाता है, तथापि उसी शिष्यको गुरुसे उत्तम कोई नहीं मानता, किन्तु वह उससे निम्न ही माना जाता है, वह शिष्य गुरुके सिंहासन पर नहीं बैठ सकता, गुरुके हाथ से हाथ नहीं मिला सकता । इस प्रकार पत्नी पतिकी Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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२६२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) सेवा करती है, उसकी सब प्रकार की इच्छाओंको पूर्ण करती है, वह भी पति की अपेक्षा निकृष्ट ही मानी जाती है । उसके समान नहीं मानी जाती । वह यज्ञोपवीत भी नहीं पहन सकती । इस प्रकार राजा सेव्य है, पर प्रजा उसकी सब प्रकार से सेवा करती है । फिर भी राजा उत्कृष्ट और प्रजा उसकी अपेक्षा- निकृष्ट मानी जाती है, यहां तक कि उसके सिंहासन पर भी नहीं बैठ सकती । इस तरह संसारमें सब स्थान और सदा इस प्रकारका व्यवहार सुलभ एवं स्वाभाविक है । जूता आपकी सेवा करता है, पर आप जूतेको सिर पर नहीं रखते, जूते पर भोजन रखकर नहीं खाते । बल्कि हाथसे जब जूतेके छूने की आवश्यकता पड़ती है, तो हाथकी शुद्धि करनी पड़ती है । सेवक घोड़ा मनुष्यको उठाता है, सेव्य मनुष्य कभी घोड़ेको अपने ऊपर नहीं चढ़ाता, परन्तु घोड़ा से स्वामीसे वृत्तिमात्र लेकर सन्तुष्ट हो जाता है । ऊँट पर मनुष्य चढ़ता है, ऊँट मनुष्य पर नहीं चढ़ता । इनमें कई उपयोगी तथा अहिंसक एवं क्षमाशील गधे आदि अस्पृश्य भी माने जाते हैं । यदि अस्पृश्यता हटानेके व्रत लिये हुए वर्तमान नेता इन्हें अस्पृश्य नहीं मानते, तो घोड़ा आदि पर चढ़ते हुए भी गधे आदि पर क्यों नहीं चढ़ते, वा उसका सम्मान क्यों नहीं करते? वर्तमान नेताओंको मोटर ड्राईवर अथवा कोचवान अपने गन्तव्य स्थानमें पहुँचाते हैं, इस प्रकारके प्रश्नकर्ता भी उन सेवकोंको उन नेताओंके मञ्च पर नहीं बैठाते, उनको फिर पूछते भी नहीं । यह क्यों? यह सर्वदा सत्य है कि सेव्य सदा उच्च छुआछूत हटानेके कुछ तर्क २६ होता है, सेवक उसकी अपेक्षा सर्वदा निकृष्ट ही होता है । साथ वादमें सेवा कभी नहीं होती । इसके अतिरिक्त वह सेव्य सेवक द्वारा जो - जो सेवा कराता मार्ग है । उसका उसे पारिश्रमिक भी देता है । सेबक भी इसी वृत्तियेह ही लिए उसकी सेवा करता है, इस कारण उसमें उसका स्वार्थ है । चाहि है । तो फिर स्वार्थवश उसे झुकना ही पड़ता है । तभी तो निम उन्नत्यर्थ प्रणाम करता है, जीवनार्थ प्राणोंको छोड़ता है, श्र शुद्रो सुखकेलिए दुःख उठाता है । यह बात स्वाभाविक ही है । शु स्पृश् सेवक होता है । इसमें सब शास्त्रों का ऐकमत्य है । ' मनुस्मृति अन्त सेवाको ' श्ववृत्ति ' कहा गया है - ' सेवा श्ववृत्तिराख्याता ' ( ४६ ) कुछ श्ववृत्ति होने से वह निम्न होती है, बल्कि ' स्वच्छन्द चरति सेवकः परशासनात् ' इस कथन से सेवकको इवा ( कुत्ते ) से भी निि उत्पन कहा जाता है । ' शूद्र ऋण लेनेवाला धन देनेवालेका सूद बढ़ाकर उसका उपना करता है, तथापि वह ' अधमर्ण ' ही कहा जाता है और ' पुरुष सामने दीन रहता है, दूसरा ' उत्तम ' कहा जाता है, उसका ' अस ऊँचा रहता है । तो जब सेव्य सेवकको वेतन देता है, तब सेव स्पष्ट निकृष्टता स्वाभाविक ही है । फिटन चलानेवाला नौकर स्वामी सेव्या ऊँची गद्दी पर बैठता है, स्वामी तो नीचेकी गद्दी पर बैठता है है -वह वाहक फिटन चलाकर स्वामीका उपकार करता है, फिर मात्मा - रथचालक निम्न माना जाता है । यह स्वाभाविक ही है । स्वाम दास विकता में आक्षेपका क्या अवकाश? १६।६ CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्री सनातनधर्मालोक ( ६ ) २६४ है । साथ मल - मूत्रके प्रदेश पुरुषका कितना उपकार करते हैं । यदि ये मार्ग बन्द हो जाएँ, पुरुषका जीवन भी समाप्त हो जावे । कराता है भी ये प्रदेश अस्पृश्य माने जाते हैं । जलसे धोये हुए भी अस्पृश्य 7 वृत्तिके ही रहते हैं । इस प्रकार अन्त्यज आदि के विषय में भी जान लेना स्वार्थ हो चाहिये । सेवक सारे सेवाके कारण सदा निम्न ही होते हैं, तभी तो निम्न माने भी जाते हैं । उनमें कई स्पृश्य होते हैं, कई अस्पृश्य । है शुद्रोंके भी दो भेद होते हैं — सच्छूद्र और असच्छूद्र ॥ सच्छूद्र ही है । स्पृश्य होते हैं, असच्छूद्र - अन्त्यज अस्पृश्य । शूद्र सवर्ण होते हैं, " मनुस्मृति अन्त्य अव । वर्णों की अस्पृश्यता शास्त्रानुमोदित है, इसका वि ' ( ४.६ ): ' कुछ निर्देश गत निबन्ध में हो चुका है । चरविव परमात्माने ब्राह्मणादि तीन वर्णोंकी सेवाकेलिए शूद्रको पाँव भी निि उत्पन्न किया, उसे मेध्य मुखसे उत्पन्न क्यों नहीं किया? वेदने ' शूद्रक्रोऽस्य मुखमासीत् ' यह क्यों नहीं कहा? अमेध्य पाँबसे उसे नका उपर क्यों उत्पन्न किया? देखिये इसमें शुक्ल ' यजुर्वेद ' ( वा.सं. ) का और उससे ' पुरुषसूक्त ( ३१।११ ) । कृष्णयजुर्वेद ( तैत्तिरीय ) में भी कहा है-उसका ' असतो वा एष सम्भूतो यत् शूद्रः ' ( १ | २ | ३ ) इससे यह रहस्य तव सेव स्पष्ट हुआ कि वेदने ही यह सूचित किया है कि - सेवक सदा कर खासेव्यकी अपेक्षा निकृष्ट होता है । इसलिए वेद में शूद्र के लिए कहा - बैठता है है – ' यो दासं वर्णमधरं गुहाकः ' ( ऋ. २।१२।४ ) यहाँ पर पर-है, फिर मात्माने शूद्रको निम्नवर्ण तथा गुहागत सूचित किया है । ' यो नो है । खा दास आर्थो वा ' ( ऋ. १० । ३८ । ३ ) ' उत शूद्रे उत आयें ' ( अथर्व. १६।६२।१ ) इत्यादि बहुत मन्त्रों में परमात्माने शूद्रको चार्य भी नहीं के कुछ २६१ माना । ' न यो ररे श्रार्यं नाम दस्यवे ' ( ऋ. १०१४६३ ) यहाँ पर दासको वेदने आर्य नाम देना भी उचित नहीं माना । ' असुर्यः शुद्रः ' ( कृ.य.तै. श २०६७ ) यहां शद्रको आसुर माना है । इस पर आ.स.के अनुसन्धाता श्रीभगवद्दत्तजी कुछ अपनी कल्पना करते हुए कहते हैं-' ज्ञानहीन ही शुद्र है; ऐसे मूर्ख के समीप वेदका पढ़ना निरर्थक है । इस लिए ' ब्राह्मण ' कहता है - पांववाला चलता - फिरता ही यह श्मशान है. जो शूद्र है; जिस प्रकार श्मशान में स्वाध्याय वर्जित है, वैसे ही शुद्रके समीप नहीं पढ़ना चाहिये... अज्ञानी होने से ही शूद्रका यज्ञमें अधिकार नहीं है । इसलिए ही कहा है - ' तस्मात् शूद्रो यज्ञे ऽनवक्लप्तः ' ( तै.सं. ७११११।६ ) ( वैदिक वाङ्मयका इतिहास द्वि.मा.प्र. २२०-२२१ ) जो कि – ' रुचं नो घेहि ' इस मन्त्रमें ब्राह्मण बादियों में रुकू ( तेज ) की प्रार्थना की गई है; तो वहाँ वेदको सत्रका समान तेज इष्ट नहीं, अन्यथा उनमें चार संख्या कैसे हो सकती? इस कारण इस मन्त्रकी व्याख्या करते हुए श्रीउवटाचार्यने भी कहा है-- ' अनुत्सन्नधर्माणो यथाशक्यं दीप्ता भवेम, तथा कुरु - इत्याशयः ' । तब जैसे ' ब्राह्मणस्य तपो दानं तपः क्षत्रस्य रक्षणम् । वैश्यस्य तु तपो वार्ता, तपः शूद्रस्य सेवनम् ' ( ११।२३५ ) इस मनुके पद्यमें समान मी ' तप ' अपना भिन्न - भिन्न अर्थ बता रहा है; जैसे कि - ' चाणक्य-नीति ' में ' बलं विद्या च विप्राणां राज्ञां सैन्यं बलं तथा । बलं वित्तं च वैश्यानां, शूद्राणां परिचर्यिका ' ( २६ ) यहां पर समान भी ' बल ' शब्द भिन्न - भिन्न वर्ण के लिए भिन्न - भिन्न कहा गया है । ' कोकि लानां स्वरो रूपं नारीरूपं पतिव्रतम् । विद्यरूपं कुरूपाणां, क्षमा CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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२६६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) रूपं तपस्विनाम् ' ( चाणक्य. ३२६ ) यहाँ पर ' रूप ' शब्द भिन्न - भिन्न अर्थ बता रहा है, वैसे ही उक्त वेदमन्त्र में भी तेजका पर्याय ' रुक् ' भी चारों वर्णोंके लिए अपना भिन्न - भिन्न अर्थ रखता है । जैसे कि-वेदमें ही कहा है-‘ आ ब्रह्मन्! ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम्, आ राष्ट्रे राजन्यः शूर इषव्योऽतिव्याधी महारथो जायताम् ' ( यजुः २२/२२ ) ' ब्रह्मणे ब्राह्मणं, क्षत्राय राजन्यं, मरुद्भ्यो वैश्यं, तपसे ( कृच्छ्राय ) शूद्रम्, ( यजुः ३०/५ ) वेदकी इस साक्षीसे ब्राह्मण के लिए ब्रह्मवर्चस - तप रूप . तेज की, क्षत्रियके लिए बल - रूप क्षात्र तेज की, इस प्रकार वैश्य के लिए धन रूप शक्तिकी, शुद्रकेलिए सेवा रूप सामर्थ्य की प्रार्थना इष्ट है । इसके अतिरिक्त उस मन्त्र में ' नः ब्राह्मणेषु ' ( हमारे ब्राह्मणों में ) ' नः क्षत्रियेषु ' ( हमारे क्षत्रियोंमें ) यहां पर ब्राह्मण और क्षत्रियोंको अपना कहकर उन दोनोंको ऋषिने श्रेष्ठ सूचित किया है । शूद्रको सब वर्णोंके अन्तमें रख कर उसकी निम्नता सूचित की गई है । इससे वेद स्पष्ट - रूपसे चार वर्णोंके लिए अपना अभीष्ट वैषम्यवाद ( मिन्न - भिन्नधर्मता ) बता रहा है । स्मृतिकारोंने इस मन्त्रको हुए भी वेदके पूर्वापर सब मन्त्रोंकी विवेचना करके यही आशय यही माध्य उक्त मन्त्रका अपनी स्मृतियों में दिया है । परन्तु आजकलके वैदिकम्मन्य सुधारकगण पूर्वापररहित एक - दो मन्त्र उपस्थित करके उसमें गद्गद् हुए - हुए, अपने कपोल कल्पित उसके आशयको ही वेदकालीन व्यवहार बताते हुए और स्मार्त-व्यवहारको वाणीमात्रसे वेदविरुद्ध बतानेका साहस करते हुए CC - 0. Ankur Joshi Collection कुछ तर्क २६ देखे गये हैं. पर वेदोंका पूर्ण ज्ञान न होने से वे शोच्य हैं, वे सा माध्यरूप स्मृतिग्रन्थोंपर ‘ श्रुतेरिवार्थं स्मृतिरन्वगच्छत् ( रघुवंशः चा वे आक्रमण कर रहे हैं, यह खेद की बात है । तो क्या उक्त तर्क उपस्थित करनेवाले यही चाहते हैं । उत्कृष्ट कर दिया जाय और द्विजको निकृष्ट? तो क्या वे से पत्रको सिरकी जगह रखना चाहते है? यदि ऐसा है तो प्रसन तब से ऐसा करें । तब उसका फल भी देखें । पांव जाकर गेहूँ लावा? इस उसे पीसता है हाथ, और उसे खा जाता है मुँह । इसहि आलसी मुख तो हुआ निकृष्ट और पांव हुआ उत्कृष्ट! श्र को काटकर सिरके स्थान और सिरको काटकर पांवके स्थान ' लोभ दीजिये, फिर चलाइये व्यवहार | अच्छा रहेगा! वस्तुतः उक्त तर्क तर्काभास ही हैं । वृत्तियां वादीने संगृह की हैं, वे सब शूद्र और अन्त्यजोंके लिए शास्त्रों में नियमित गई हैं, जिससे सेव्य द्विजोंको भी उक्त वस्तुएँ मिल जायें, उसे क्यो ' सेवक शूद्र - अन्त्यजोंकी उदरपूर्तिरूप वृत्ति भी हो जावे । तब इसे व्यव आक्षेपकी क्या बात है? क्या वे वृत्तियां द्विजोंको दिलवाकर ह दूसर दियोंका पेट काट दिया जावे? क्या अब ' शर्मा वूट फैक्टरिय व्यवह खुलें और चमारोंका रुपया भी उनसे हटकर वादीकी बिरादरी पहुँचे; यही क्या बादीकी इच्छा है? आज शूद्र - अन्त्यज आदिको अन्तिम होने से ही निम्न माना गया हैं; वे वादीसे कहे कारणों से नहीं । स्वाद जी जन्मसे तो नहीं, । ' स्वयम मूर्खता से ही शुद्रको निकृष्ट मानते हैं, वे भी चारों बस ठोक Gujajat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातन धर्मालोक ( ६ ) 200 २६६ व्य है, साम्यवाद नहीं मानते । शूद्र वृत्ति चाहता है, ऊँचा बनना नहीं रघुवंश । उचिके पास कुञ्जीके अतिरिक्त रहता ही क्या है? वादों से कहा रा चाहता सभी जातियों में ऐसा ही मिलता है । मुसलमानों में हुआ व्यवहार जो पद ' सैयद ' का होता है, वह उनके भंगी चमारका नहीं होता । किशो या वे जो पद मौलिवीका होता है वह कुटारणा जातिवालेका नहीं होता । सेव तो! तब इस घृणा के कारणसे ही हम हिन्दुओंकी संख्या नही घटी, न प्रसन्न हूँ लाता इससे मुसलमानोंकी संख्या बढ़ी है । उनकी संख्या बढ़नेका कारण है तो कहीं काम - पूर्तिके साधन देनेसे, कहीं लोभ देकर, कहीं बल-इसलि ! श्र पूर्वक, कहीं छल - कपट से धर्म और जीविका आदिसे हीन काम-के स्थान ' लोभादिग्रस्त हिन्दुओं को अपने में मिला लेना है, परन्तु क्या वादी भी हिन्दुओंकी संख्या बढ़ाने के इच्छुक होकर उन्हें भी ऐसे ही दीने संगृह अपकर्म करनेकी सम्मति देते हैं? पर हिन्दुलोग इन बुरे कर्मों नियमित को नहीं करना चाहते; वे धर्म - रहित संख्यावृद्धि के इच्छुक नहीं, जावें, उस क्योंकि हिन्दु - जातिमें धर्मका दृढ बन्धन है । मुसलमानोंके सदृश । तब इसे व्यवहारवादी कर भी नहीं सकते । वे लोग एक ही पात्र में एक-दूसरेका जूठा पानी पीते हैं; क्या वादी भी हिन्दुजाति में ऐसा दलवाकर फैक्टरि व्यवहार चाहते हैं? बिराद वस्तुतः स्वतन्त्रताका मार्ग तथा उसका आस्वाद दिखलाकर आजके सुधारक ही हिन्दुओं के भिन्न जातियों में जाने के कारण बनते माना गया हैं; वे ही फिर हिन्दुजातिको वैसा करनेकेलिए डांटते हैं । इस पर नहीं, ' स्वयमेव अक्षि आकुलीकृत्य स्वयमश्रुकारणं पृच्छसि ' यह लोकोक्ति चारों व ठीक घटती है । इन्हीं सुधारकोंने ही पहले पादस्थानीय - मुसलमानोंको के कुछ तर्क २६६ भी सिरपर चढ़ाया था, उसीके फलस्वरूप ही उन्होंने भारतका एक भाग अपने अधीन करके उसे पाकिस्तान बनाकर वहांके हिन्दुओं को बाहर कर दिया । अब वे ही सुधारक पादादिस्थानीय शुद्र - अन्त्यज आदियों को सिर पर चढ़ाते जा रहे हैं; वे ( शुद्रादि ) भी उसका फल हिन्दुजातिको देंगे ही । किसी कविकी यह ठीक
उक्ति है-' उन्नतं पदमवाप्य यो लघुर्हेलयैव स पतेदिति ब्रुवन् ।
शैलशेखरगतो दृशत्करणः चारु मारुतधुतः पतत्यधः ॥
( ' जो छोटा हो और उसे उन्नत पद दे दिया जावे वह शीघ्र ही गिर जाता है ' यह कहता हुआ पहाड़ की चोटी पर पड़ा हुआ पत्थरका छोटा कण हवासे हिलाया हुआ नीचे गिर रहा है । ) आशा है - वादी दूरदर्शिताका आश्रय करके हिन्दुजातिकी हानि करनेवाले इन तर्कामासों को छोड़ देंगे । तर्क ( २ ) “ यदि किसी घरकी नींव की ईंटोंको उस घरसे अलग कर दिया जाय, तो वह घर शीघ्र गिर पड़ेगा, क्योंकि उस समय उसकी नींव न रहेगी । हिन्दुजाति की भी यही दशा है, उसने अपनी आधारभूत शूद्र जातिको अपनेसे पृथकू कर दिया है, इसलिए उसका भवन भी पतनासन्न है, जिसका पहिला प्रमाण ' पाकिस्तान ' है । तर्क ( ३ ) वृक्षकी रक्षाका कारण मी मूल ही हुआ करता है, जो स्वयं मिट्टी कीचड़ से सना रहकर अपने आपको क्षीण करता है, परन्तु वृक्षको हरा रखता है । उस मूलकी उपेक्षा से वृक्ष भी अस्थिर CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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२७० श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) हो जायगा, इस प्रकार निकृष्टकर्मा शूद्र भी घृणा योग्य नहीं है, अपितु शुद्ध करने पर वह द्विजके ही समान मान पाने योग्य है " । ( भारतीय धर्मशास्त्र पृ. ११० ) विचार ( २ ) वादीका उपन्यास उसीके पक्षकी हानि करनेवाला है, और सनातनधर्म के पक्षका साधक है । देखिये - नींव की टूटी-फूटी ईंटें अपने स्थान पर दृढ की जाती है, उसमें सीमेंट अथवा मिट्टीका लेप रूप अन्तर करके उन पर भवन बनाया जाता है । वह नींव दबी हुई रहती है, मिट्टीसे भरी - पुरी रहती है और अस्पृश्य रहती है । सनातनधर्म उन ईंटों को अस्पृश्य मानकर उनकी उसी रूपमें स्थितिको ही मङ्गलावह समझता है । वह अस्पृश्यता घृणा-मूलक नहीं होती, किन्तु भवनकी रक्षणार्थक वा मङ्गलार्थंक ही हुआ करती है । जैसेकि परकीया स्त्री हमसे अस्पृश्य होती है, वहां घृणा कारण नहीं होती, किन्तु धर्मरक्षणका उद्देश्य होता है. जिससे सन्तानमें सङ्करता न हो । यदि नींव की ईंटों को उसी दशा में न रखा जावे, किन्तु उनका दबा रहना वा उनकी अस्पृश्यता उनकी शोचनीयता मानी जावे, इसीलिए वादी उन अस्पृश्य ईंटोंको वहांसे खींचकर जल आदि से उनको शुद्ध करके, शेष महलकी ईंटोंके समान करना चाहें, तब तो वादी उस भवनको ही गिरा देंगे । वे ईंटें बैसी ही नीची रहें, वैसी ही दबी रहें, वैसी ही अस्पृश्य रहें, उनमें एक भी जलकी बूँद उनके संशोधनके उद्देश्यसे अथवा उसमें लिपी मिट्टी के प्रवाहार्थ न जावे, तब तो भवन स्थिर रहेगा । यह सनातनधर्मका CC - 0. Ankur Joshi Collection कुछ तर्क २५ २७२ पक्ष है । वे नींव की ईंटें महलकी ईंटोंके समान सबसे हुई महलकी तथा नींव की ईंटों के मध्य में कुछ भी मिट्टी आदि का बा अन्य न रहे । उनकी नींव की ईंटोंको जलसे शुद्ध कर दिया जाया ना t. उनको नीचा न रखा जावे, किन्तु वहांसे उनको निकालकर को भ इटों के समान वा उनसे अभिन्न उनको रखा जावे यह मह वे व , वाद अस्पृ पक्ष है । अथ विज्ञ पाठक प्रतिभू ( जमिन ) वर्ने कि- किस प भी मङ्गल तथा किस पक्षमें अमङ्गल है । शूद्र - अन्त्यज जाति श्रार विषय जाति में ही रहे, द्विज - जाति के अन्दर न घुस जाय किन्तु द्विज - नाति नीची होकर रहे; इस पक्ष में दोनों ( द्विज - शूद्रों ) का महल है । वादीकी नीतिसे शूद्रोंकी उत्तेजना होने पर दोनों का ही अमङ्गल है । चाल तमी श्रीमनुजोने भी कहा है कि ' वैश्यशूद्रौ प्रयत्नेन स्वानि कर्मा स्तान कारयेत् । तौ हि च्युतौ स्वकर्मेभ्यः क्षोभयेतामिदं जगत् । ” ( ८१४६ ९ ) फलतः सनातनधर्मं नौंवकी ईंटोंको भवन के नीचे से नहीं नि अन्त मिल रहा, वादी ही उनको नीचेसे निकालकर धो - धाकर ऊपरकी है ते पर रखा चाहते हैं I । उसके दुष्परिणामको स्वयं सोचें । स्पष्ट विचार ( ३ ) इसी तरह वादी यदि यही कीचड़ से सने हुए वृक्षो अन्य अवयवोंसे अस्पृष्ट मूलको अपनी स्थिति में भी रखेंगे, व बनार तो वृक्षका मङ्गल है, पर यदि वे साम्यवादकी माधुरी से मस्त होक कीर मूलको भी वृक्षके अन्य अवयवोंके समान करना चाहें, हमा मूलकी मिट्टी वा कीचड़को जलसे धो डालें, अस्पृश्य - मूलको टि भी प मानकर उसको स्नान कराकर उसे स्पृश्य कर डालें, जिससे च जब बाहरी - वायुके आनन्दको प्राप्त करे, और शुद्ध होकर बद्द वृत्त सिर Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) २७२ से छुई बारे अवयवोंके समान हरियालीको पा ले, यदि वादी यही चाहते दका अन् हैं अन्य , तो उन्हें जानना चाहिए कि वे साम्यवादका प्रचार करके वृक्ष-जाया करे को भी सुखा डालेंगे, मूलको भी । मूलके अस्पृश्य रहने पर ही कर महर वे वृक्षके फलोंको प्राप्त कर सकेंगे, विपरीततासे नहीं । वह यह वाद अस्पृश्यता भी घृणानिमित्तक नहीं है, किन्तु वृक्ष तथा स्वयं मूलके -किस प भी मङ्गलार्थक ही है इस प्रकार वादीको शूद्र अन्त्यज आदिके जा विषयमें भी जान लेना चाहिये । द्विज - जालि ( ख ) वादीसे उपक्षिप्त ' पाकिस्तान ' अंग्रेजोंकी राजनीतिक महल है चाल से बना है कि यहाँ निकटवर्ती रूस न छा जाए; अन्त्यजोंकी अमङ्गल है । अस्पृश्यताके कारण नहीं बना । उस कारण के होने पर तो ' अछूत-चानि कर्मादि स्तान ' बनता; ‘ पाकिस्तान ' नहीं । इस कारण के होने पर तो हिन्दु-( 518 अन्त्य ' पाकिस्तान ' में ही रह जाते, जहाँ उनको समान मान नहीं नि मिलना था, यहाँ ( हिन्दुस्थान में ) फिर वे अछूत बनने के लिए कैसे ऊपरकी से ते? पर वे भी उन हिन्दुओं के साथ वहांसे निकल आये? तब स्पष्ट है कि - वादीसे कहा हुआ कारण सत्य नहीं है । हुए प मुसलमानोंको तो अन्त्यजोंकी तरह किसी ने अस्पृश्य नहीं रखेंगे, ल बनाया । उनके साथ हिन्दुओं का व्यवहार भी था । पर पाकिस्तान-समस्त होक की रचना तो वस्तुतः उनकी अपने धर्ममें दृढताके कारण, और चाहें हमारी अपने धर्म में अदृढता के कारण हुई है । वस्तुतः चे मुसलमान लको पूर्र भी पादस्थानीय हैं । विशेष करके पंजाब में कांग्रेसी हिन्दुओंने जिससे ह जब उन पादस्थानीयको अपने समान कर दिया, बल्कि अपने र वह सिर पर चढ़ा दिया, उसीके फलस्वरूप ही उन्होंने अलग एक CC - 0. Ankur Joshi ढोल गंवार शुद्ध पशु नारी २७३ ' स्तान ' बनवा लिया, और उन ( हिन्दुओं ) को वहांसे बाहर कर दिया । ऐसे ही यदि वादी पादभूत - शूद्रों और पाद - मुखसङ्कर-भूत अन्त्यजों को अपने समान कर देंगे तो यह असम्भव नहीं कि - अवशिष्ट हिन्दुस्तान ' अछूतस्तान ' इस पृथक खण्डमें भी विभक्त हो जावे । एक बार साँपकी पूँछने भी सिरके समान मान पाना चाहा था, उसके फलस्वरूप साँपके शरीरकी जो दुर्दशा हुई, जिस प्रकार कि - उसने प्रहार प्राप्त किये - यह बात सर्वलोक - प्रसिद्ध है । वादिमहाशय के भी वैसा प्रयत्न करने पर समाजकी बहुत दुरवस्था होगी - यह बात उन्हें दूरदर्शितासे विचारनी चाहिये । अन्य तर्क अन्य पुष्प में विचारित होंगे । Collection Gujarat. ( ६ ) " ढोल, गँवार, शूद्र, पशु, नारी " । पाठकगण पहले शास्त्र य विषयोंको पढ़ कर कुछ थकान प्राप्त कर चुके आगे भी उन्होंने कुछ शास्त्रीय विषय पढ़ने हैं, वीचमें कुछ सुगम विषय भी चाहियें; तभी इस पुष्पका ' हिन्दुधर्म के विविध ' विषय ' यह नाम भी सार्थक होगा । स्त्री - शूद्रका विषय पहले से जारी भी है; तदनुसार यह प्रसिद्ध विषय रखा जाता है । स्त्री - शूद्र का साहचर्य धर्मशास्त्रों में देखिये- ' खी - शूद्रस्तु सकृत् सकृत् ' ( मनु. ११३६ ) ' स्त्री - शूद्धपतितांश्चैव नाभिभाषेत ' ( ११।२२३ ) ' स्त्री - शूद्र-विट्क्षत्रवधः ' ( ११/६६ ) ' प्रत्यभिवादेऽशूद्र ' ( पा. मा २१ = ३ ) ' स्त्रियां न ' ( वा. ) ' यदि स्त्री यद्यवरजः ( शूद्रः ) ( मनु. २२२२३ ) स्त्रियो वैश्याः तथा शूद्रा: ' ( गीता ६।३२ ) इत्यादि । स. घ. १८ An eGangotri Initiative
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२७४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ( १ ) ' ढोल, गँवार, शूद्र, पशु, नारी । ये सब ( सकल ) ताडन अधिकारी ' गोस्वामी श्रीतुलसीदासकी ' मानस ' स्थित यह चौपाई कुछ समय से आलोचित हो रही है । आजकल स्त्री - शूद्रों की सहानु-भूतिका युग आया हुआ है । आजकल एक भूसा बेचनेवाला भी अपनी दुकानपर भूसा खरीद रही हुई सुन्दरं स्त्रीका चित्र लगा देता है । शूद्र तथा अन्त्यज भी सुधारक अन्य संस्थाओं तथा कांग्रेसकी कृपासे सिरपर चढ़ते चले आ रहे हैं । तब इन स्त्री-शूद्रोंसे विरुद्ध कोई बात किसी पुस्तक में मिल जावे; तो आजकलके सुधारक उसे माननेको उद्यत नहीं होते, प्रत्युत उसके प्रणेताको खूब खरी - खोटी सुनाई जाती है । ' नमस्ते प्रचार ' ट्रैक्ट में उसके निर्माताने इसकेलिए गोस्वामीजीको खूब खरी - खरी सुनाई है । इस प्रकार कई शास्त्रिपरीक्षोत्तीर्ण आर्यसमाजिन - लड़कियाँ भी इस से गोस्वामीजीकी खूब खवर लेती हुई दीखती हैं । ( २ ) परन्तु जो कई लोग ' रामायण ' के प्रणयनसे गो ० तुलसी-दासजीकी प्रशंसा के पुल बाँधा करते हैं; वे इस उल्लेखसे गोस्वामीजीको डांटते तो नहीं; पर अपने बचाव के लिए कह दिया करते हैं कि - यह चौपाई गोसाईजीकी बनी नहीं, यह तो प्रक्षिप्त है; क्योंकि - वे स्त्री - निन्दक नहीं थे- यह कहकर वे इस चौपाईसे अपना पल्ला सहज ही छुड़ा लिया करते हैं । बिना खण्डनका परिश्रम किये, बिना कुछ दिमागका पसीना बहाये, बिना बोतलकी स्याहीका कुछ खर्च किये - ' यह प्रक्षिप्त है ' कह देना खण्डनका बड़ा सुन्दर प्रकार है, ' न लगा रंग, न लगी फटकरी, रंग चोखा CC - 0. Ankur Joshi Collection शूद्र पशु नारी होगया ' । प्रतिवक्ता प्रत्युत्तर में जो बकता रहे; उसे तक नहीं | सुरते - ( ३ ) वास्तव में यहाँ प्रक्षिप्तता बताना तो निर्मूल है; क्योंकि.. प्रकरणवश जहां जहां - गोस्वामीजीने स्त्री - शूद्रादिकी निन्दा की 1. वहाँ - वहाँ कोई आधार भी उन्होंने रखा ही है, निराधार भी है, कुछ नहीं । लिखा । जैसेकि— ( क ) ' कान ूकरे अचला प्रबल ' वर्षा ऋ _भगवान् राम लक्ष्मणको कहते हैं । इसका मूल - ' अबला यत्र प्रथ बालो राजा, निरक्षरो मन्त्री । नहि नहि तत्र धनाशा, बीि आशापि दुर्लभा भवति ' यह एक प्रसिद्ध वचन है । इसमें से प्रबल कर ( सिर चढ़ा ) देने से जीवनको आशाका भी समाप्त हो जाना लिखा है; जिसके उदाहरण राजा दशरथ हैं; कैकेयेनो सिर चढ़ाना- उनके जीवनसमाप्तिका कारण बना । ( ख ) वर्षाच्चतु भगवान् रामका लक्ष्मणको कहा यह वचन गो ० जीने लिखा है-' जिमि स्वतन्त्र होइ बिगरहिं नारी ' । इसका मूल न स्त्री स्वातन्त्र मर्हति ' ( ६।३-५-७ ) ' पौंश्चल्याञ्चलचित्ताञ्च नैःम्नेह्याञ्च स्वभावतः । .. भर्तृष्वेता विकुर्वते ' ( ६।१५ ) एवं स्वभावं ज्ञात्वाऽऽसां प्रजापति निसर्गजम् ' ( ६।१६ ) इत्यादि मनुवचन तथा ' स्वातन्त्र्येण विनश्यनि
सुलजा अपि योषितः ' ( बृहत्पराशर. ४ । ५८ ) इत्यादि वचन है ।
( ग ) ' नारि - सुभाव सत्य कवि कहहीं । अवगुन आठ सदा उर रहहीं ॥
' साहस, अनृत, चपलता, माया । भय, अविवेक. शौच श्रदान इसका मूल निम्न वचन है - ' अनृतं साहसं माया मूर्खत्त्रमतिलोभिताः -निर्गुणत्वम् ( निर्दयत्वम् ) अशौचं च स्त्रीणां दोषाः स्वभावज्ञ ' Gujarat. An eGangotri Initiative