श्रीगणेशाय नमः।

सनातन धर्मलोक ६ — पृष्ठ 151–160

सनातन धर्मलोक ६ · पृष्ठ 151–160

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) २७६ ( देवीभागवत || ८३, चाणक्यनीति २/१, हितोपदेश १ १६५, सु पञ्चतन्त्र- मित्रभेद ) । ' शय्यासनमलंकारं कामं क्रोधमनार्जवम् । द्रोह-; क्योंकि मावं कुचर्यां च स्त्रीणां मनु ( प्रजापति ) रकल्पयत् ' ( मनु. ६/७ ) की भी है इत्यादि मनुस्मृति आदि धर्मशास्त्रोंके वचन गोस्वामीजीके स्त्री-र कुछ सम्बन्धी वचनोंके मूल हैं । ( घ ) इस प्रकार गो ० र्ज ने अपराधिनी नहीं वर्षा ऋतु अहल्याको पतिद्वारा पत्थरपनेका शापरूप ताड़ना भी दिलाई है । यत्र प्रयता सतीको महादेव द्वारा अपने उपास्य रामके दर्शनके निषेधको न जीवि मानने पर अन्त में सतीदाहरूप दण्ड भी दिलाया है । इस प्रकार इसमें क्षेत्र चौपाईकी प्रक्षिप्तता तो खण्डित होगई । समाप्त हो ( ङ ) इसी प्रकार स्त्री के स्वभाव के विषय में गो ० जीके अन्य वचन भी द्रष्टव्य हैं - ' जदपि सहज जड़ नारि यानी ' ' हँसिह हुँ वर्षाऋतु सुनि हमरी जडताई ' यहाँ पर पार्वती स्त्रियोंकी प्रतिनिधितासे लिखा है- उऩकी जडता बताती है । इसका मूल वेद - वचन हम आगे लिखेंगे । श्री स्वातन्य ( च ) इस प्रकार अनसूया श्रीसोताको कहती है- ' सहज अपावन स्वभावतः । नारि ' । ' राखिय नारि जदपि उर मांही । जुवती साख नृपति प्रजापति बस नांही ' ( अरण्यकाण्ड ) यहाँ स्त्रीका दूसरे के बस न हो सकना विनश्यति कहा है । इस पर वेद - वचन आगे देखिये । वचन है । ( a ) भरत स्त्रियों के विषय में विचारते हैं- ' विधिहु न नारि-र रहीं । हृदयगति जानी । सकल कपट अघ अवगुन खानी ' । इसके मूल च अदा वचन - स्त्रीणां ' चरित्रं पुरुषस्य भाग्यं देवो न जानाति कुतो मनुष्यः ' तिलोमिना ' मधु तिष्ठति जिह्वाये हृदि हालाहलं स्मृतम् ' इत्यादि हैं । ( ज ) ' अवगुन-स्वमात्रज ' मूल शूलप्रद प्रमदा सब दुख खानि ' यह श्रीराम के प्रति श्रीनारद-शूद्र पशु नारी IIIII का वाक्य है । ( झ ) ' नारि सहज जड अन्न ' यह सतीका वचन है । ( ब ) जदपि ' जोपिता अनअधिकारी ' यहाँ स्त्रीको वेदमें * अनधिकारिणी बताया है इसका मूल ' निरिन्द्रिया श्रमन्त्राश्च स्त्रियोऽनृतमिति स्थितिः ' ( ६१८ ) यह मनुका वचन है । * कई व्यक्तियोंका विचार है कि- ' वेद में जब स्त्री और शूद्र शब्द तथा उनके कर्तव्य श्राते हैं; तब यदि स्त्री - शूद्रोंका बेदाधिकार न होगा; तो उनको अपने कर्तव्यका ज्ञान कैसे होगा? श्रतः स्पष्ट है कि स्त्री-शुद्रका वेदमें श्रनधिकार नहीं, इस पर वक्तव्य यह है कि वेद में स्तनपायी बच्चों तथा पशु - पक्षियोंके नाम तथा उनके कर्तव्य भी श्राते हैं; तब क्या इससे उनको भी वेदाधिकार हो जावेगा? ' अनड्वान ब्रह्मचर्येण श्रश्वो वासं जिगीर्षति ' ( अथर्व. ११/५/१८ ) में घोड़े एवं बैलका कर्तव्य बताया गया है । ' उतस्य वाजी क्षिपणिं तुरण्यति ग्रोबायां बद्धो अपि कक्षे आसनि ' ( ऋ. ४ | ४० | ४ ) यहां घोड़ेका गर्दन बगल तथा मुँह में लगाम श्रादिसे बन्धे जानेका कर्तव्य श्राया है । ' वोढाऽनड्वान ' ( यजुः २२/२२ ) इत्यादि भी । श्रोषधियोंके कर्तव्य भी बताये गये हैं । इसी प्रकार छोटे बच्चोंके भी जातकर्म - चूड़ाकरण - कर्णवैघादिसंस्कारों में भी उनके कर्तव्य बताये गये हैं; तब इससे क्या घोड़े - बैल श्यादि पशुओं तथा छोटे बच्चों का भी वेद अधिकार हो जाएगा? नहीं, किन्तु उन बच्चोंके पिता श्रादि तथा घोड़ों - बैलोंके स्वामी आदि उनके कर्तव्य. को वेदादिसे जानकर उनसे वह कर्तव्य करा लेते हैं, इस प्रकार पति स्त्रियोंसे तथा द्विज शूद्रादिसे वे कर्तव्य करा हो लेते हैं; उन्हें वेदके अधिकार न होने पर भी उनकी कोई हानि वा वेदविरोध नहीं होता । घोड़े श्रादि स्वयं बगल वा मुंह में तंग- लगाम श्रादि नहीं डाल लेते - उनके स्वामी सब उनसे करा लेते हैं, वैसे प्रकृत में भी समझ लें । इस प्रकार इस युक्तिसे स्त्री - शूद्रका वेदाधिकार सिद्ध नहीं हो जाता । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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२७६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ( ट ) ' अधमसे अधम अधम अति नारी ' यह भी स्त्री जाति के विषय में गोस्वामीजीकी चौपाई है; तब नारीकी ताडनीयताको

चौपाई मी गोस्वामीजीकी क्यों न होगी? यह चौपाई भी निर्मूल

नहीं है, इसका मूल भी कृष्णयजुर्वेद में मिलता है । जैसेकि-' तस्मात् स्त्रियो निरिन्द्रिया अदायादीरपि पापात् पुस उपस्तितरं वदन्ति ' ( तै. सं. ६।५।८।२ ) इसका अर्थ श्रीसायणाचार्यने यह किया है - ' तस्माल्लोके स्त्रियः सामर्थ्यरहिताः, अपत्येषु दायभाजो न भवन्ति । पापात् - पतितादपि पुंसोपि, उपस्तितरं क्षीणतरं स्त्रीस्वरूपं वदन्ति ' यहाँ पर स्त्रीको स्वकर्म - पतित पुरुषसे मी अधम कहा कई व्यक्ति ' उत वा स्त्री शशीयसी पुंसो भवति वस्यसी । श्रदेवत्राद् अराधसः ' ( ऋ. ५/६ १ ६ ) इस मन्त्र से स्त्रीको पुरुष से श्रेष्ठ बताते हैं; उन्हें जानना चाहिये कि यह मन्त्र देवपूजन न करने का निन्दार्थवाद है, इसका अर्थ है कि देवताओं की पूजा न करनेवाले और देवताके निमित्त धन - दान न देने वाले पुरुषसे देवताओंकी ओर मन लगाने वाली स्त्री भी श्रेष्ठ है । श्रर्थवाद में विवक्षित श्रंश तात्पर्य हुआ करता है, शब्दों के अर्थ में तात्पर्य नहीं हुआ करता | इसका इतना ही तात्पर्य है कि पुरुषको देवपूजा तथा देवनिमित्तक घन - दान करना चाहिये | इसी अर्थवादसे उल्टा स्त्रीकी पुरुषकी अपेक्षा निम्नता स्पष्ट हो रही है; नहीं तो ऐसी शब्द - योजना न होती 1 । जैसे कहा जावे कि-' परोपकार न करने वाले मनुष्यसे पशु भी श्रेष्ठ है, जो किसीके काम श्राजाता है ' | इससे मनुष्यसे पशुकी श्रेष्ठता नहीं हो जाती; किन्तु इससे परोपकारका प्रशंसार्थवाद, और परोपकार न करनेवाले पुरुषका निन्दार्थवाद सिद्ध हो जाता है । इस प्रकार प्रकृत मन्त्र में भी समझना चाहिये । CC - 0. Ankur Joshi Collection शूद्र पशु नारी गया है । इस प्रकार जब स्त्री - निन्दा गोव्जीने बहुत से स्थलो अधि की है, उसमें धर्मशास्त्र आदिके वचनोंकी साक्षी स्त्रियों की ताडनाधिकारिता गो ० जीसे इष्ट सिद्ध हुई भी है, , अनमीट में पाठ तब मानस में उक्त चौपाईकी प्रक्षिप्तता खण्डित होगई । " ढोल ( ४ ) जो इससे भी बढ़कर गो ० तुलसीदासजी के श्रद्धानु पाठ इधर से जिन्होंने इस युगकी विचारधाराको भी अपनाया हुआ का वे यहां प्रक्षिप्तता न कहकर उसका पाठ ही बदल देते ( क ) कई लिखते हैं कि “ ढोल, गँवार, मूढ, पशु, नारी । " पाठमें वे ' शूद्र'को उड़ाकर उसके स्थान में ' मूढ ' का अभिषे पाठ डालते हैं, और उस पाठको गोस्वामीजीका कह देते हैं । ' मानत और ' मूड'की पुनरुर्ति भी उन्हें प्रतीत नहीं होती । ( ख ) इस प्रकार गोवा दूसरे शूद्र - सहानुभूतिकर्ता “ ढोल, गँवार, छुद्र, पशु, नारी । एक हैं, इ ताड़नाके अधिकारी ' यहां शूद्रके स्थान ' छुद्र ( क्षुद्र ) कर देते । ' नाड़ी यहां भी गँवार और क्षुद्रकी पुनरुक्ति पहले की ही भांति रहती है । पशु ' ' शूद्र ' कहने में तो वह दोष नहीं रहता । ( ग ) कई महाशय " सर्वथा गँवार - शूद्र, पशु - नारी ” यह पाठ लिखकर ' गँवार ' शब्दको ' भी स का विशेषण बनाकर, ' पशु ' शब्दको ' नारी ' का विशेषरण बनक करते उक्त तीनोंको ताड़नाका अधिकारी बना देते हैं । परन्तु यह ' सङ्की व्यर्थ है; क्योंकि विशेषण सदा साभिप्राय होता है । विशेषरण केवल शूद्र और नारीके ही क्यों हों? हो पाठक त्रैवर्णिक और पशुसदृश - पुरुष ताड़ना के अधिकार से बहिनी ' मानस जाएँगे | तब भी गो.जीके मत में शुद्र और नारी हरु ताड़नी Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 153

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श्रीसनातनधर्माल्लोक ( ६ ) २८० ही रहे । इससे वादियोंकी ही हानि हुई - ' मक्षिपि इतसे स्थलो अधिकारी व्याधिः ' ( लहसुन खाया, फिर भी बीमारी न गई ) 7 मी हे लशुने न शान्तो अनमीटर से पर भी उन्हें कोई लाभ न मिला । ( घ ) कई महाशय है । पाठ ढोल “ बदलने , गँबार शुद्र, पशु - नारी । ये चारों ताड़न अधिकारी ” यह पाठ गढ़कर ' नारी'का ' पशु ' विशेषण बनाकर ' चारों ' को ताड़ना के श्रद्धालु का अधिकारी बतलाते हैं । ( ङ ) कई महाशय “ ढोल, गॅवार, शुद्र, नाया हुआ पशु - नाड़ी । ” यह पाठ कल्पितकर ' नाड़ी ' का अर्थ ' अनाड़ी ' करके दल देते है उसे विशेषण तथा ' पशु ' को विशेष्य बना डालते हैं, ( च ) कई लोग नारी | पाठ तो ' पशु नारी ' ही मानते हैं, पर नारीका प्रयोग ' नाड़ी ' के लिए अभिषेक मानते हैं । उनका अभिप्राय है कि ' कर जोड़ी ' आदि के स्थान में गोस्वामीजी ' कर जोरी ' आदि लिखते हैं, अर्थात् ड़ ' को ' र ' लिखते ख ) इस नारी हैं, इसी प्रकार ' नाड़ी ' के स्थान पर भी उन्होंने ' नारी ' लिखा है ॥ ' नाड़ी ' का अर्थ ' अनाड़ी ' है, वह ' पशु का विशेषण है । ' अनाड़ी = ) कर देते है पंति रहती है पशु ' ताड़नाका अधिकारी हैं, यह अर्थ करके वे ' नारी ' ( स्त्री ) को उड़ा ही दिया करते हैं । ऐसे लोग इस प्रकार अपने पक्षको हाशय भी सिद्ध करते हैं; गोस्वामीजीको भी निर्दोष सिद्ध कर दिया शब्दको शेषण बना करते हैं । हम जैसों को - जो उक्त चौपाईका यथाश्रुत अर्थ करते हैं-' सङ्कीर्ण - विचारवाला ' कहकर धता बता दिया करते हैं । परन्तु यह है । त ( ५ ) हम इसपर कुछ मीमांसा उपस्थित करते हैं । ' आलोक'-ततो पाठक इधर अवहित होंगे । उक्त चौपाई सुन्दरकाण्डके अन्त में सबहिन ' मानस ' में आयी है । वक्ता समुद्र, भगवान् रामको इससे अपनी रीठा ताड़नीयता बतला रहा है । ' पशु - नारी ' का ' अनाड़ी शु शुद्ध पशु नारी २८१ बतलाना तो सचमुच विचित्र है । ' नारी'का ' नाड़ी ' और ' नाड़ी ' का ' अनाड़ी ' अर्थ मालूम नहीं कि वे किस आधार पर करते हैं, और फिर उसे ' पशु'का विशेषरण बना देना तो और भी निर्मूल है । ऐसे पुरुष स्त्रीजाति के साथ ऐसी सहानुभूति करते हैं कि ' नारी'को शब्द से तो नहीं, पर अर्थदृष्टिसे तो उड़ा ही देते हैं । पर आजकल के जो लोग खीजाति से सहानुभूति रखते हैं, वे शुद्रसे भी सहानुभूति रखते हैं । परन्तु श्रर्य है कि फिर वे शुद्रको ताड़नाधिकारियोंमें कैसे गिन लेते हैं? ऐसा होने पर वे राष्ट्रिय-शासकोंके बजुर्गे श्री बापूजीके अनुयायियोंकी अदृश्य - कोपाग्निमें पतङ्गा बन सकते हैं । अथवा उक्त शौसन अपने ' रामराज्य ' में ' शास्त्रीय - स्पृश्यास्पृश्यता ' की तरह ' मानस ' की इस चौपाईको भी ' कानून ' बनवाकर बन्द करा सकता है यह वे नहीं जानते । अथवा वैसे महाशय फिर ' वापूजी ' के अनुयायियोंके इस अवसर पर सुलभ आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए ' शूद्र ' का अर्थ - परिवर्तन करनेका सरतोड़ प्रयत्न करें, कोर्षोंमें लंगोट पहनकर कूद पढ़ें, ' शूद्र ' का अर्थ बदलकर ही दम लें । अथवा जैसे वे ' पशु - नारी को एक शब्द बना लेते हैं, वैसे ही ' मंत्रार - शूद्र इस शब्द को भी एक बना लें और उसका ' मूर्ख - शूद्र ' अर्थ बना लें । यदि ' मूर्ख - शूद्र ' को भी ताड़ना ' बापूजी ' के ईश्वरीय अदेशसे विरुद्ध हो; तो ' शूद्र ' का ही ' मूर्ख ' अर्थ करके गंवार'का अर्थ ' गांव का रहनेवाला ' कर दें । तब ' नारी ' की तरह ' शूद्र ' भी ताड़ना से पृथक हो जायगा । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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२८२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ( ख ) जो लोग ' नारी ' को उड़ाना तो नहीं चाहते; पर उसके साथ सहानुभूति भी रखते हैं, वे ' पशु - नारी ' इस शब्दको विशेषण-विशेष्य बनाकर ' पशुकी तरह मूर्खा नारी ' यह अर्थ करके उस मूर्खाको ताड़नाके योग्य सिद्ध करते हैं, सर्वसाधारण - नारीको नहीं । हम उनकी बुद्धिकी प्रशंसा करते हैं, पर यह अवश्य कहते हैं कि वे प्रन्थकारकी बात मानें या न मानें, यह उनकी इच्छा; पर उन्हें उचित है कि अन्यका अर्थ उसकी इच्छा के विरुद्ध न बदलें । ऐसा अर्थ करने पर फिर स्त्री - पुरुष तो ताड़ना के अधिकारी रहेंगे; . चाहे वे मूर्ख क्यों न हों, परन्तु फिर ' पशु ' ताड़नाका अधिकारी न रहेगा, क्योंकि उन्होंने तो ' पशु'का अर्थ ही बदल दिया । ' मनुष्य'को ताड़नाका अधिकारी मानना और ' पशु'को वैसा न मानना यह नैयायिकों की दृष्टिमें असा हो जायगा । अतः उन्हें विवशतासे अपना अर्थ अशुद्ध स्वीकृत करना पड़ेगा । ( ग ) जो कई ' ढोल, गँवार, मूढ अरु नारी ' यह पाठ बनाते हैं; उन्हें याद रखना चाहिये कि एक तो यह रामायण के किसी संस्करणमें नहीं, दूसरा यहां ' गँवार ' तथा ' मूढ ' को पृथक् - पृथक् कहनेसे व्यर्थकी पुनरुक्ति हो जाती है । शूद्र - शब्द तो एक जन्मजात निम्न वरका नाम है, वही गोस्वामीजीको यहां विवक्षित है । ( घ ) जो लोग ' ढोल, गँवार, शूद्र, पशु - नारी । ये चारों यह पाठ कल्पित करते हैं, वह भी ठीक नहीं, क्योंकि ऐसा पाठ रामायण के किसी संस्करणमें है ही नहीं; फिर तो कोई शूद्रका सहानुभूतिकर्ता ' ढोल, गंवार - शुद्र, पशु - नारी, ये तीनों ताड़न अधिकारी ' यह पाठ CC - 0. Ankur Joshi Collection शूद्र पशु नारी २६४ भी बना सकता है, और फिर इस पाठ में भी दोष आता तो वक्ता ' समुद्र ' से भी इस चौपाईका मेल नहीं है ये स पड़ता । होने से तो उसका ग्रहण हो भी सकता था; क्योंकि- ' गगन अनुसा अनल, जल, धरनी । इन्हके नाथ सहज जड़ करनी । ', अधिक यह ' वार ' जीने समुद्र द्वारा कहलवाकर उसकी जड़ता ( गँवारपन ) वाई ' समुद्र पर ' गँवार - शूद्र ' से तो उसका भी ग्रहण नहीं हो सकता, क्योंकि मिश्र श समुद्र शूद्र - वर्णं मनुष्य नहीं । इससे यह स्पष्ट है कि ये सब जीब गो तथा अर्थं जहां गो ० तुलसीदासजीके अभिप्रायसे विरुद्ध ए को ' स्त्र मौलिक हैं, वहां दोषपूर्ण भी हैं । आज के ( ङ ) ‘ नारी ' शब्दका ‘ अनाड़ी ' अर्थ करना और उसे स्त्री भी विशेषण बना देना तो नितराम् अशुद्ध तथा असम्बद् इस निराधार है । गोस्वामीजीने ' जोड़ी ' ' थोड़ी ' के स्थान पर तो में धैर्य से थोरी ' यह पढ़ा हो, यह तो सम्भव है; पर ' नाड़ी ' के स्थान में यह उन उन्होंने कहीं नहीं पढ़ा, न ही उनका कोई ऐसा प्रमाण कहीं मरी न है; और फिर गोस्वामीजीका ऐसा प्रमाण मिलना तो ' शशशृङ्ग लिया । जहां उन्होंने उसी ' नारी'का ' अनाड़ी ' अर्थ रखा हो । अन्य वा है कि ' अनाड़ी ' को ' पशु ' का विशेषण बनाना भी व्यर्थ ही है । सो ' अस्थिच पशु सदा ' अनाड़ी ' ही होता है । यदि कहा जाय कि घोड़े कण्टक ' पशु तो ' अनाड़ी ' नहीं होते; न सही, पर क्या वे ताड़ना नहीं ह तत्र यह अर्थ ठीक न हुआ; अथवा यही कहिये कि गोस्वामी ( चाणक यह अर्थ इष्ट नहीं । सर्वाऽश ( ६ ) वस्तुतः ' ढोल गँवार, शूद्र, पशु, नारी । ये सब ' यह अर्थात् Gujajat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) २६४ - आता है ' शब्दसे ' ये पांच ' पृथक् - पृथक् अभीष्ट हैं । गोस्वामीजी ड़ता ' ये सब पांच ताड़ना अधिकारी हैं । ' ढोल ' तो ताडनाका । गगन अनुसार प्रसिद्ध ही है, इसमें किसी प्रमाणकी अपेक्षा नहीं । , एके अधिकारी नी ' गॅवार'से ' अज्ञानी ' वा जड़ विवक्षित है, जिसमें प्राकरणिक पन ) वढाई ) ' ' भी सन्निविष्ट हो जाता है । ' शूद्र ' शब्दसे त्रैवि समुद्र कता, क्यों मित्र शूद्रादि - निम्नजातीय इष्ट हैं । ' पशु ' शब्दसे ' गदहा ' आदि ये जब गोस्वामीज को विवक्षित हैं; और ' नारी ' शब्द से गोस्वामीजी विश्व इस पर को ' स्त्री ' अभीष्ट है । ' नारी ' का ' स्त्री ' अर्थ स्वीकार करने से तो आजके सभ्य - संसारका डण्डा हमारे सिर पर भी पड़ेगा कि ' ऐं उसे स्त्री भी ताड़नाकी अधिकारिणी? राम राम! अनर्थ एवं अन्याय!! असम्बद्ध इस पर हम कहते हैं कि सभ्यगण! अधीर मत हूजिये । पर तो धैर्य से सुनिये । गोस्वामी तुलसीदासजी पहले स्त्रीके असीम प्रेमी थे स्थान में यह उनके नैश- अभिसार से प्रकट है, वहां उन्होंने वर्षाके जलसे ण कहीं हि मरी नदी, अन्धेरी रात तथा मार्गकी भीषणता इनको नगण्य मान - ' शशश लिया । परन्तु उनको जब उस स्त्रीने प्रेमके स्थान डांटा; तब उनकी अन्य वार आंखें खुल गयीं । उस दिनसे ये स्त्रीको उसीके कहने से ही है; सो ' अस्थिच मेंमय देह ' समझने लगे । ' स्त्री को उस दिन से ' रामपथका कि घोड़े कण्टक ' समझने लगे । तब वे उससे पृथक होगये । उस दिन से बना नहीं पर उन्होंने जान लिया कि - ' न स्त्रैणस्य स्वर्गप्राप्तिधर्मकृत्यं च ' गोस्वामी ( चाणक्यसूत्र ३१६ ) ' अलोहमयं निगलं कलत्रम् ' ( ३५५ ) ' स्त्री नाम सर्वाऽशुभानां क्षेत्रम् ' ( ४७६ ) ' अशुभद्वेषिणः स्त्रीषु न प्रसक्ताः ' ( ४७६ ) · ' अर्थात् स्त्री बिना लोहेकी बेड़ी है । माक्षपथ के पथिककेलिए वह शूद्र पशु नारी २६१ ' एषा कण्ठतटे कृता खलु शिला संसारवारां निधो ' संसारसमुद्र में स्नान करने के समय गले में पहरी हुई बड़ी भारी शिला है । इसीलिए स्वा. शंकराचार्यको भी लिखना पड़ा कि - ' विश्वासपात्र न किमस्ति? नारी ' ' द्वारं किमेकं नरकस्य? नारी ' | ' किं तद् विप भाति सुधोपमं यत्? नारी ' । ' विज्ञान्महाविज्ञतमोस्ति को वा? नार्या पिशाच्या न च वञ्चितो यः । कई आर्यसमाजी आदि यह लिखने से शङ्करस्वामीकी ही निन्दा करते हैं; पर यह उनका अज्ञान है । भोगी लोग तो स्त्रीको प्रशंसा ही करेंगे; पर संन्यासी तथा योगी एवं मुक्तिपथके पथिक उसकी निन्दा ही करेंगे; स्वामी शङ्कराचार्य थे संन्यासी । संन्यासीके लिए ' नारी ' स्पष्टतया ' नरकका द्वार ' है । संन्यासी तो दूर, यदि गृहस्थी भी उसमें लिपटा रहे; तो वह नरकको ही उपार्जित कर रहा होता है । उसे छोड़ने से ही तो गो ० तुलसीदासका उद्धार हुआ । जब स्वा. शङ्कराचार्यने श्रीमण्डनमिश्रको हराकर उसे अपना शिष्य बना लिया; तब उनका स्त्रीसे सम्बन्ध हटवा दिया; क्योंकि-संन्यासी वा मुक्तिपथ के पथिककेलिए स्त्री अविश्वसनीय, विष-सम्पृक्त अन्न एवं पिशाची हैं । तभी तो संन्यासोपनिषत् में कहा है - ' सुजीर्णोपि ( वृद्ध भी ) सुजीर्णासु विद्वान् स्त्रीषु न विश्वसेत् ' ( ६८ ) ' न मम्भावयेत् स्त्रियं काञ्चित् पूर्व - दृष्टां न च स्मरेत् । कथां च वर्जयेत् तासां न पश्येल्लिखितामपि ' ( नारदपरिव्राजकोपनिषत् ४३ ) एतच्चतुष्टयं मोहात् ख णामाचरतो यतेः । चित्तं विक्रियतेऽ वश्यं तद्विकारात् प्रणश्यति ' ( ४ ) इसलिए मनुस्मृति में कामज ' दश CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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२८६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) गणोंमें स्त्रियां भी परिगणित हैं ( ७४७ ) ' पानमक्षाः स्त्रियश्चैव... एतत्कष्टतमं विद्यात् चतुष्कं कामजे गणे ( ७/५० ) इनमें स्त्रीको मनुजीने कष्टतम माना है । तभी स्वा. द. जी जब स्वा. विरजानन्दजीके पास पढ़ते थे; उनके सन्ध्या कर रहे होनेपर एक स्त्रीने उनके चरणोंको सिरसे छू दिया; स्वामीजीने इस पर तीन दिन - रात उपवास किया । इसे सुनकर स्वामी विरजानन्द रोमांचित हो गये । ( श्रीमद्दयानन्द-प्रकाश, वैराग्यकाण्ड नवमसर्ग पृ. ५६ पं. २६ ) वह स्त्री कोई अछूत तो थी नहीं; पर ब्रह्मचारी तथा संन्यासी अथवा परमार्थपथ के पथिक के लिए स्त्री सचमुच पिशाची है, ' हालाहल विषका मरा कनक-घट जैसे ' है । उस अवस्थामें उस पर थोड़ा विश्वास किया कि-नरकका द्वार खुला | वादियोंके स्वामी लिख गये हैं- ' स्त्रियोंको प्रिय वह होता है जो स्त्री - मोग में फंसा हो ( स.प्र. ११ पृ. २३४ ) ' पुरुषसे स्त्री की कामचेष्टा अधिक होती है ' ( स.प्र. ११ पृ. २३६ ) । इसलिए मुक्ति के पथिकको उसे छोड़ देना पड़ता है; उससे पीठ फेर. लेनी पड़ती है । विवाह में स्त्रीके साथ अग्निकी चार परिक्रमा. करनी पड़ती हैं; यह धर्म, अर्थ, काम, मोक्षकी मानी जाती हैं । पहले त्रिवर्गकी परिक्रमा में स्त्री आगे की जाती है, चौथी मोक्षकी परिक्रमामें वर उसे अपनी पीठके पीछे कर देता है । मनु ( ८।७७ ) जीके अनुसार स्त्री अस्थिर बुद्धि होने से भी ' विश्वासपात्र ' सिद्ध नहीं होती । नारदपरिव्राजकोपनिषद्में लिखा है- ' माद्यति प्रमदां दृष्ट्वा सुरां पीत्वा च माद्यति । तस्माद् दृष्टिविषां नारीं दूरतः परिवर्जयेत् ' CC - 0. Ankur Joshi Collection शूद्र पशु नारी ( ६३१-३२ ), ' चाण्डलवाटिकामिव स्त्रियम् ' ( ७/१ ) ' पदापि २८८ योगी योषितं दारवीमपि ।... यतिः संगेषु बध्यते ' न स्पष्ट । अतः जहां ना भी निन्दा आई है, वहां गृहस्थव्यतिरिक्त तीन आश्रमों के विप समझना चाहिये । तब प्रश्नोत्तरी में उक्त बात कहते शङ्करका इसमें कोई दोष नहीं कहा जा सकता; क्योंकि हुए आचा अप वे संन्या होती थे । यही बात जानकर मोक्षपथ के पथिक, रामके पुजारी गोस्वामोई पड़त ' नारी को प्रेमकी अधिकारिणी न मानकर उसे ' ताडनाकी कारिणी ' माना हो; जैसेकि ' लालने बहवो दोषास्ताडने अि , गुण: ' ( चाणक्य. २/१२ ) तो इसमें आश्चर्यका क्या अवकाश वह सब फिर अर्थ बदलने का इसमें प्रश्न ही नहीं उठता स श । ग्रन्यक्र स्वामिलषित भावोंको समय - समय पर ऐतिहासिक पात्रों के मुसई कहलवाया करता है, यह स्वाभाविक है । इसलिए उन्होंने पह विशेषके द्वारा ' अधमते अधम अधम अति नारी ' कहलवाया । नह तब नारीका स्त्री- अर्थ उनके आशय से विरुद्ध न हुआ । भ ( ख ) इस बातको कोई महोदय न मार्ने; तब उन्हें जागर श चाहिए कि गो ० जीको ' ढोल गँवार शूद्र पशु तथा नारी ' इन्हें कि वि के अधीन रखना इष्ट है । जब ऐसा है; तब अधीन हुआ की कार्यको ठीक - ठीक न करने पर ताड़नाको ही तो प्राप्त करता है । शिष्य गुरुके अधीन होता है । अधीन होने से सम्यक कार्य न " करने से उसे भी ताड़ना प्राप्त करनी ही होती हैं । इस प्रकार डि द्वारा पुत्रको भी । श्रीचाणक्यका यह वचन प्रसिद्ध है- ' वस्त शिष्यं च पुत्रं च ताइयेन्न तु लालयेत् ” ( २।१२ ) । इसी तरह ' दोड़ Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 157

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श्री सनातनधर्मालक ( ६ ) २८८ दापि न है गँवार भी अपने किसी सम्बन्धी तः जहाँ नाते मी स्वामी के अधीन होता, वर्णोंके अधीन होता है, पशु भी नोके विप अधीन होता है, शूद्र भी तीन है नारी भी अपने पति के अधोन अधीन होता, हुए आचार अपने स्वामीके इनको ताडना प्राप्त करनी ही के वे होती है. अपने कर्तत्र्यकी प्रच्युतिमें संन्यास वह उचित भी है । गोस्वामी पड़ती है, और है कि गो ० ( ग ) एक बात यह भी ध्यान देने योग्य ' श्र ' यह तो लिखा; पर उक्त चौपाई में ' सदा ठाउने बढ् सब ताड़न के अधिकारी ही रहो । उक्त चौपाई नवकाश शब्द साथ नहीं दिया कि सदा इन्हें पीटते १२ ' पशु ' शब्द भी हैं । तब क्या इनको सदा हो पीटा || अन्यथा ' मैं ' ढोल ' तथा होती है; जब ये कार्य में त्रिोंके जाता है? नहीं | इनकी समय पर ताडना स्वामीकी आज्ञा न मानें । चलते हुए वैलको कोई उन्होंने पा त्रुटि करें, अथवा नहीं देता; तब उसे तपाया नहीं पीटता । ढोल स्वर जब ठीक कहलवाया । है; किनारे पर वांटसे उसे पीटा भी जाता है 1 । फिर भी जाता शब्द के लिए उसे ताडित भी किया जाता है, क्योंकि ताड़ना किये उन्हें जान नहीं करता । इस प्रकार पशु जब प्रगति में इन्हें ि बिना वह शब्द ही है । खेत में जाकर देखिये । • रुकता है; तब उसे भी ताडना मिलती हुआ व्यि अवसरपर ही तांडित होते हैं, सदा इस प्रकार ये सब विशिष्ट करता है । कोई नहीं पीटता । प्रस्तुत- समुद्रकी भी हठ नहीं । पड़े ढोलको स्यक कार्यर पर ताडना हुई, सदा नहीं होती । प्रकार पि प्रकार ' शूद्र ' तथा ' नारी ' के लिए भी समझना चाहिए । ( घ ) इस भी कार्य न करने पर नारी पति अधीन होती है । तब उसे तरह ' दो ' । स्त्री- पक्षपाती स्वा. द. जी मी ' सत्यार्थप्रकाश ' ताडना पानी ही पड़ेगी CC - 0. Ankur Joshi Collection शूद्र पशु नारी २८३ में ' कह गये हैं- " प्रायः स्त्रियोंका स्वभाव तीच्ण और मृदु होता है " ( पृष्ठ ४७ ) तब तीच्णताकाल में ताड़ना उसकी स्वाभाविक है । इधर ' त्रियाहठ ' भी प्रसिद्ध है । उस हटके हटाने का उपाय भी ताड़ना है । स्त्रियोंके आदर में लगे मी अँग्रेजों के श्रेष्ठ कवि ' शेक्सपीयर ' ने ' कर्कशा स्त्रियोंके सुधारनेकी विधि ' नामक एक नाटक लिखा है । उसमें प्रकारान्तरसे उपाय ताड़ना ही बतलाया है । जब ऐसी बात है; तब ' नारी ' का ' नाड़ी ' और ' नाड़ी'का ' अनाड़ी ' अर्थ करना अयुक्त है । ' नाड़ी ' का अर्थ ' नव्ज़ ' ( धमनी ) तो हो सकता है, पर ' अनाड़ी ' नहीं । गो ० तुलसीदासजीने ' अनाड़ी ' के अर्थ में ' नारी ' शब्द कहीं प्रयुक्त नहीं किया । ( ङ ) इसके अतिरिक्त ' भय बिनु होत न प्रीत ' यह गो ० जीने कहा है, तब ताड़ना आदिके भयसे स्त्री पतिके प्रेममें भी लगी रहेगी, क्योंकि - ' अमर्प - शून्येन जनस्य जन्तुना, न जातहार्दन न विद्विषादरः ' ( किरातार्जुनीय ११३३ ) ( क्रोधसे रहित पुरुपसे न कोई डरता है; न उससे कोई प्रेम करता है ) । पति स्त्रीनें कभी मर्पका व्यवहार न करे; तो न पत्नी पतिसे डरेगी, न उसमें प्रेम करेगी । ( ७ ) अन्य बात यह है कि गोस्वामीजीने अपनी रामायण के लिए उसके आरम्भ में कहा है- " नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद्, रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोपि ' ( १७ ) अर्थात् ' रामचरित-मानस ' में मैंने वेद, शास्त्र, पुराण आदि सम्मत बातें कहीं हैं । तब वेद - पुराण आदियोंका अवगाहन भी करना पड़ेगा, कदाचित उक्त स ० [ ० १६ Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 158

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२६० श्री सनातनधर्माल्लोक ( ६ ) गोस्वामीजीने वेद - पुराण आदि के आधार पर कही हो?

चौपाई सिद्ध हो जाने पर फिर गोस्वामीजी अपने उत्तरदायित्व से

ऐसा मुक्त हो जायँगे । अब आइये पाठक! जरा वेद, पुराण, शास्त्र आदिके पन्ने टटोलें । वेदके दो भेद हैं, मन्त्रभाग तथा ब्राह्मण-. माग । ब्राह्मणभागमें उपनिषद् तथा आरण्यक साथ आ जाते हैं । ( क ) पहले इस विषय में मन्त्रभाग के प्रमाण देखिये । ऋग्वेद-संहिता में एक मन्त्र आया है कि ' स्त्रिया अशास्यं मनः । उतो अह ऋतुं रघुम् ” ( शा. सं. ८३३ १७ ) अर्थात् स्त्रीके मन पर शासना नहीं की जा सकती । उसकी बुद्धि वा कर्म क्षुद्र होता है । ( ख ) यहाँ पर सुप्रसिद्ध भाष्यकार श्रीसायण के भी शब्द देखिये- " स्त्रिया मनः-चित्तम्, अशास्यं पुरुषेण अशिष्यं शासितुमशक्यं, प्रबलत्वादिति । उतो - अपि स्त्रियाः क्रतुं - प्रज्ञां रघु - लघुम् अह आह । ( ग ) यहाँ पर आर्यसमाज के पण्डित श्रीपाददामोदर सातवलेकरजीका अर्थ उनके बनाये ऋग्वेदके सुबोध भाष्य ' मेधातिथि के दर्शन ' ७२ पृष्ठमें देखें — " स्त्रियों के मनको संयम में रखना कठिन है, स्त्रियोंके मन पर काबू करना अशक्य है । स्त्रियोंके कर्म छोटे होते हैं, उनका सामर्थ्य कम होता है, उनकी बुद्धि छोटी होती है । " ( घ ) पञ्चतन्त्रमें भी उक्त वेदमन्त्रको मनमें रखकर यह उसका अनुवाद दिया गया है- ' भद्र! शास्त्रविरुद्धमेतद् यत् - स्त्रिया सह मन्त्रः, यतस्ताः [ खियः ] स्वल्पमतयो भवन्ति ' ( अपरीक्षितकारक, मन्थरक- कौलिककी कथा में ) । जब ऐसा है तो उक्त वेदमन्त्र में भी ' रघु ' शब्दका अर्थ ' लघु ' ( छोटा ) ही है; ( ङ ) तत्र ' श्रुवस्य यायादय-शूद्र पशु नारी २६ मन्तमर्भकः, तथा परेषां युधि चेति पार्थिवः । अवेक्ष्य धातोर मवित् चकार नाम्ना रघुमात्मसम्भवम् ' ( ३।२१ ) इस का पद्यके अनुसार ' स्त्रीका मन ज्ञानविषय में शीघ्रगामी रघु स्त्रियोंका ऋतु - ज्ञान विषयके अन्ततक जानेवाला होता होता है स है, का उनकी बुद्धिकी तीव्रता आदि सूचित होती है, न कि होला ऐसा किन्हीं का अर्थ निरस्त हो गया, क्योंकि उक्त मन्त्रमें I वह श्री भी विवक्षित नहीं - यह पूर्वोत्तरमन्त्रोंके संघादसे प्रत्यक्ष है । है मानने पर तो फिर पुरुषों की बुद्धि - मन्दता माननी पड़ेगी; बार मा ह दोनों की बुद्धिकी समतामें ' स्त्री ' शब्दका कहना व्यर्थ हो जात ( च ) ' न वै स्त्रैणानि सख्यानि सन्ति सालावृकारणां हृदयान्ते ( ऋ. १० । ६५।१५ ) इत्यादि अन्य मन्त्रोंकी साक्षी से भी ' रघु मू ' लघु ' ' स्त्रीकी बुद्धि छोटी होती है ' यह है । ( छ ) यदि वहां ' अर्थ ' शीघ्र ' मानें; तो स्त्रोकी बुद्धिकी चंचलता - अस्थिरता सिद्धां जावेगी । जैसे कि मनुजीने मी कहा है – ' स्त्रीबुद्धेर स्थिरत मि ( ८७७ ) इसका अर्थ आर्यसमाजी श्रीतुलसीराम स्वामीने जिर ' स है - ' स्त्रीकी बुद्धि स्थिर नहीं हुआ करती ' । तब भी स्त्री - निन्द्रा ( ४ सिद्ध होगी, तभी तो चतुर लोग स्त्रीको ठग लिया करते हैं । वि ( ज ) ' वेदामृत ' ( प्र. सं. ३५४ पृ. ) में ऋ. सं. ( ४ | ५ | ५ मन्त्र ) के आश ( ३ प्रमुख आर्यसमाजी श्रीशिवशंकर काव्यतीर्थने लिखा है - ' जिससे स्त्रियोंको बहकानेवाले बहुत पुरुष होते हैं; इस हेतु उन्हें ( खियों ) ( ऋ कभी स्वतन्त्र छोड़ना उचित नहीं ' । इससे भी वेदानुसार ( ऋ बुद्धिकी मन्दता वा अस्थिरता स्पष्ट है; तब स्त्रीकी अस्थिरता ' न ' CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 159

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श्री सनातनधर्मालोक ( ६ ) २६२ हृदयघात करनेकेलिए भी उसकी ताड़ना अनिवार्य हो जायगी । इस रघुवं ( झ ) मन्त्रभागात्मक वेद अन्यत्र कहता है - ' न वें स्त्रैणानि सख्यानि बामी होता है सन्ति, सालावृकाणां हृदयान्येता ' ( ऋ. १० / ६५।१५ ) यहां पर स्त्रिय ता है, इ का सख्य विश्वासघातक कहा है, उसकी उपमा भेड़िये वा गीदड़के कि हीनता हृदयसे दी है । ( ञ ) यही बात ब्राह्मणभागात्मक वेद ' शतपथ ' में न्त्रमें बह भी लिखी है –'मा एतद् ( स्त्रैणम् ) आद्यथाः, न वै स्त्रैण ँ सख्य-यक्ष है । मस्ति ' ( ११ | ५ | १ | ६ ) | ( ट ) इसीका अनुवाद श्रीमद्भागवत में भी आया पड़ेगी है— ' कापि सख्यं न वै स्त्रीणां वृकारणां हृदयं यथा ' ( ६ १४।३६-३७ ) र्थ हो जा अर्थात् स्त्रियोंकी मित्रता पर विश्वास नहीं करना चाहिये । ( ठ ) हृदया इसी वेदके मूलको लेकर महाभारत में कहा गया है - ' स्त्रियो हि ' रघु'का श्र मूलं दोषाणां लघुचित्ता हि ताः स्मृताः ' ( अनुशासन. ३८।१ ) । वहां ( ड ) इसीको लक्ष्य करके बौद्धकवि अश्वघोषने भी अपने थरता सिद्धां ' सौन्दरनन्द ' काव्य में कहा है - ' अकृतज्ञमनार्यमस्थिरं वनिताना-द्धेर स्थिरता मिदमीदृशं मनः ( ८।४६ ) । ( ङ ) चाणक्यसूत्रों में भी कहा है-वामीने दि ' स्त्री नाम सर्वांशुमानां क्षेत्रम् ' ( ४७६ ) ' न च स्त्रीणां पुरुष - परीक्षा ' 7 स्त्री - निन्दा - ( ४७ ) ' स्त्रीणां मनः क्षणिकम् ' ( ४७८ ) ' स्त्रीषु किञ्चिदपि न या करते हैं । विश्वसेत् ' ( ३५६ ) ' न समाधिः ( चित्तस्थैर्यं ) स्त्रीषु लोकज्ञता च ' त्र ) के आश ( ३६० ) ।. ( ण ) ' काव्यप्रकाश ' में ' स्त्रीत्वं धैर्यविरोधि ' ( १०/५०७ ) इ- जिस ' स्त्रीको अधीर कहा है । ( त ) इसलिए वेद में भी स्त्रीका ' अधीरा ' न्हें ( खियो ( ऋ. १ । १७६।४ ) यह विशेषण आया है । ( थ ) ' जारं न कन्या ' अनुसार ( ऋ. ६।५६ । ३ ), ‘ योषा जारमिव प्रियम् ' ( ऋ. ६३२५ ) ( पूर्वमन्त्र में अस्थिरता ' न ' उपमांचक है ) इत्यादि मन्त्रभाग के प्रमाणों में स्त्रीका स्वभाव शूद्र पशु नारी I वर्णित किया गया है | अतः उनमें हठ आदि दोष तथा माया आदि सम्भव हैं; तब उनका वशमें रखना आवश्यक है, उसके लिए ताड़ना मी एक उपाय है । ( ८ ) इसलिए मायाविनी - स्त्रियोंकी ताड़ना के लिए अथर्ववेद ( शौ.सं. ) में कहा है- ' इन्द्र! जहि पुमांसं यातुधानम्, उत स्त्रियं मायया शाशदानाम् ' ( ८४ २४ ) यहां पर ' जहि'का अर्थ पोटना है, जैसे कि - ' अघासु हन्यन्ते गाव: ' ( ऋ १०/८५११३ ) इसमें ' गावः हन्यन्ते ' का गौवोंके चलाने के लिए उनका पीटना अर्थ सर्वसम्मत है, जैसे कि सायणाचार्यने ' दण्डस्ताड्यन्ते ' अर्थ किया है । ( ख ) इसी प्रकार ' मा त्वं विकेशी उर श्रावधिष्टाः ' ( काठकगृ. २४ ) यहां भी ' आधिष्ठा ' का ' छाती पीटना ' अर्थ आया है । ( ग ) इस शासनाके बिना ' पञ्चतन्त्र ' की मन्थरककौलिककी कथामें घरका नाश भी एक नीति - पद्यसे दिखलाया है — ' यत्र स्त्री, यत्र कितवो, बालो यत्राड-प्रशासिताः । तद् गृहं क्षयमायाति भार्गवो हीदमत्रवीत् ' । ऐसा न करके स्त्रीकी बात मानने से वहीं मन्थरक - कौलिककी मृत्यु बताई है । ( घ ) इसका ऐतिहासिक उदाहरण स्त्री - कैकेयी की बात मानने-वाले महाराज दशरथकी मृत्यु भी याद रख लेनी चाहिये । ( १ ) इसी प्रकार ' जाया पत्या नुत्तेव ' ( अथर्व ० १०११/३ ) यहां भी स्त्रीका पति से ' नोदन ' ताड़न अर्थ में ही तात्पर्य रखता है । जैसे कि - ' हयाश्च नागाश्च वहन्ति चोदिताः ' ( पञ्चतन्त्र ) इस प्रकार वेदमें भी स्त्रीकी ताड़नीयता बताई गई है! स्पष्ट है कि यह सब ताड़न यदि पतिव्रता स्त्रीकेलिए तो हो नहीं सकते; क्योंकि - वे CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 160

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२६४ श्री सनातनधर्मालोक ( ६ ) भला पति से विरुद्ध क्यों चलने लगीं १ सो यह दूसरी स्वेच्छा-चारिणी स्त्रियों के लिए है - यह स्पष्ट है । इसी प्रकार तुलसी लिखित नारी भी वही इष्ट है; उसका ताड़न ठीक ही है । व्यर्थ की ताड़ना कौन सभ्य करेगा? ( १० ) मन्त्रभागके प्रमाण दिये जा चुके; अब ब्राह्मणभागके प्रमाण देखिये । ब्राह्मणमागमें स्त्रीकी आलोचना इस प्रकार आई है - ' अनृत ँ स्त्री, शूद्रः, श्वा, कृष्णः शकुनिः, तानि न प्रेक्षेत ' ( शव- १४ । १ । १ । ३१ ) यहां पर स्त्री - शूद्रों को अनृतप्रकृति कहा है । ( ख ) ' त्रया वा नैर्ऋता ( निर्ऋतिसम्बन्धिनः ) अक्षाः, स्त्रियः, स्वप्नाः ' ( कृष्णयजुर्वेद - मैत्रायणी सं. ३२६ ३ ) यहां स्त्रियोंको मृत्युका दूत बताया है । ( ग ) ' तस्मादपि एता हि मोघस ँहिताः ' ( स्त्रियां निरर्थक बातोंकी ओर जानेवाली हैं ' यह इसका अनुसन्धाता श्र.स. श्रीभगवद्दत्तजीने ' वैदिकवाङ्मयका इतिहास ' द्वितीयभाग ( प्र. सं. ) के १८८ पृष्ठमें अर्थ किया है । ( घ ) ' तस्मात् य एव नृत्यति, यो गायति, तस्मिन्नेव एता निमिशिलततमा इव ' ( शत. ३ | २ | ४ | ६ ) ' तस्माद् गायन् स्त्रियाः प्रियः ' ( मैत्रायणी सं. ३ ७१३ ) यहां स्त्रियोंका गानविद्या-विशारदों पर रीझ जाना लिखा है - सो एतदादिक दोषों को हटवाने के लिए ताड़ना भी उपाय वेदसम्मत है -यह सिद्ध हो रहा है । ( ११ ) शतपथब्राह्मण तथा उसका अन्तिम काण्ड बहुत प्रसिद्ध है, उसका नाम बृहदारण्यक उपनिषत् भी प्रसिद्ध है । उसमें कहा गया है कि - स्त्री यदि पतिके काम ( इच्छा ) को पूरा न करे, तो CC - 0. Ankur Joshi Collection शूद्र पशु नारो उसे हाथ से वा यष्टि ( छड़ी ) से ताड़न करना चाहिये । देखिये ' सा चेद अस्मै न दद्यात् कामम्, एनामवक्रोणीयात ( भूषणादि तां वशीकुर्यात् —–इति शङ्करस्वामी ); सा चेद् अस्मै व कामम्, एनां यष्ट्या वा, पाणिना वा उपहत्य अतिक्रामन् ( १४/६ ( बृहदा. ६ ( ८ ) । ४ । ५ ) । जब इस प्रकार मन्त्र - त्राह्मणात्मक देदो स्त्रीकी ताड़ना कही है; तब गोस्वामीजीकी उक्त चौपाई वेदानु ह सिद्ध हुई । तब वेदानुकूल लिखनेवाले गोस्वामीजी पर क्रोध करें ( १२ ) अब इस पर गो ० तुलसीदाससम्मत पुराणका प्रभा भी देखिये । ( क ) ' भविष्यपुराण ' के ब्राह्मपर्व में निम्न पद्म ि २ हैं- ' नह्यासां [ स्त्रीणां प्रमदं दद्याद्, न स्वातन्त्र्यं न विश्वसेन विश्वस्तवच्च चेष्टेत न्याय्यं भर्त्सनमाचरेत् ' ( ८।१७ ) ' नाविक क्वचिद् दद्यात् ऋते पाकादिकर्मणः ' ( ८/१८ ) । ' स्त्रीणां पत्युरखं त्वात् पुमानेव हि निन्द्यते । भर्त्तुरेव हि तब्जाड्यं यद् भृत्यारन योग्यता ' ( २५ ) तस्माद् यथोदितास्त्वेता रच्याः शासनवाढ ताडनैश्च यथाकालं यथावत् समुपाचरेत् ' ( ८।२६ ) । ( ख ) ज्य सामदानाभ्यां, मध्यमाभ्यां ( दानभेदाभ्यां तु मध्यमाम् । पश्चिम वह भ्याम् ( भेददण्डाभ्याम् ) उभाभ्यां च अधमां सम्प्रसाधयेत् ' ( ८६. हि यहां पर पुराने इस विषय में स्पष्टता की सीमातीतता कर दी है । ज ' नानापुराण निगमागम ' ( १७ ) इस अपने पद्यमें गोस्वामीगं पुराणका नाम सबसे पूर्व लिखा है - ' इससे स्पष्ट है कि छह ( १ ) उक्त चौपाई में जहां पर मन्त्र ब्राह्मणात्मक वेदका अनुसरण ि मी संग है; वहां पुराणका उक्त वचन भी अपना आधार बनाया । इतं Gujarat. An eGangotri Initiative