सनातन धर्मलोक ६ — पृष्ठ 161–170

सनातन धर्मलोक ६ · पृष्ठ 161–170

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) २६६ । देखिये- यह निजी कल्पना नहीं । पणादिदाने ( १३ ) पुराण से इतिहास भी लिया जाता है । इतिहास वाल्मीकि-नैव दद्य रामायण तथा महाभारत दो बहुत प्रसिद्ध हैं । अब देखना चाहिये ( १४६४ कि दोनोंमें भी कहीं उक्त चौपाईका आधार मिल जाय । ( क ) त्मक: ' वाल्मीकि - रामायण ' तो ‘ रामचरितमानस ' का हृदय अथवा उपजीव्य ई वेदानु ही है । वहां पर कहा है— ' स्त्रीत्वाद् दुष्टस्वभावेन ( ३ । ४५/३३ ) - क्रोध क्यो ' वाक्यमप्रतिरूपं तु न चित्रं स्त्रीषु मैथिलि! स्वभावस्त्वेष नारीणामेषु का लोकेषु दृश्यते । विमुक्तधर्माश्चपलास्तीक्ष्णा भेदकराः स्त्रियः ' ( ३।४५ । पद्य कि २६-३० ) स्वा. द. जीने भी स्त्रियोंकी तीक्ष्णता मानी है - यह हम पहले न विश्वसेन् कह ही चुके हैं; उनका वचन उनके अनुयायियों केलिए अवश्य ही - ) ' नाधिकर वैदिक है । अब कहना चाहिये कि जब वाल्मीकि -मुनि इस प्रकार पत्युरर स्त्रियोंका स्वभाव आलोचित करते हैं; तब उसके उपजीवक दूभृत्यान गोस्वामीजीने उनके उक्त दोष हटानेकेलिए उनकी ताड़ना भी लिख सनवाढ दी हो; तो उनके सिर पर डण्डा क्यों? । ( ख ) ( ख ) ' महाभारत ' में कहा है-- ' ईप्सितश्च गुणः स्त्रीणामेकस्या म् । पश्चिम बहुमतृ ता ' ( १।२०४८ ) ' असत्यवचना नार्यः ' ( १ । ७४।७४ ) ' स्त्रियो येत् ' १६६ हि मूलं दोषाणां लघुचित्ता हि ताः स्मृताः ' ( अनुशासन ० ३८ | १ ) कर दी है जब ऐसा है, तो स्त्रीकी ताड़ना अशास्त्रीय कैसे? गोस्वामी ( १४ ) ' नाना- पुराण ' - इस पद्य में गोस्वामीजीने ' क्वचिदन्यतोपि ' है कि उन्हें ( १।७ ) कहा है; अर्थात् वेद, पुराणसे अतिरिक्त अन्य - साहित्यसे नुसरण कि भी मैंने कुछ लिया है । अब उसमें अर्थशास्त्र के ग्रन्थोंसे भी उक्त नाया । उ संवाद देखिये — स्वा.दयानन्दजी से भी मान्य ' चाणक्यनीति ' में शूद्र पशु नारी २६७ कहा है— ( क ) अनृतं साहसं माया मूर्खत्वमतिलोभिता । स्त्रीणां दोषाः स्वभावजाः ' ( २१ ) ' कामश्चाष्टगुणः स्मृतः ' ( चाण. १।१७ ) । ( ख ) स्वा. दयानन्दजी से मान्य तथा ' शुक्रनीतिसार समाजशास्त्रकी दृष्टिसे एक अत्युत्तम और प्रसिद्ध ग्रन्थ है ' ( भारतीय समाजशास्त्रका १७६ पृष्ठ ) इन शब्दों में आर्यसमाजियोंसे मी मान्य ' शुक्रनीति ' में भी कहा है- ' अनृतं साहसं मौख्यं कामाधिक्यं स्त्रियां यतः ' ( ३ | १६४ ) । ( ग ) ' मनुस्मृति ' में तो इससे भी बढ़कर कहा है-' स्वभाव एष नारीणां नराणामिह दूषणम् । श्रतोऽर्थान्न प्रमाद्यन्ति प्रमदासु विपश्चितः ' ( २२१३ ) ' अविद्वांसमलं लोके विद्वांसमपि वा पुनः । प्रमदा ह्युत्पथं नेतुं कामक्रोधवशानुगम् ' ( २।२१४ ) ' रक्षिता यत्नतोपीह भर्तृ ष्वेता विकुर्वते ' ( ६।१५ ) इत्यादि । ( घ ) महाभारत में भी कहा है- ' स्त्रियं हि यः प्रार्थयते संनिकर्षं च गच्छति । ईषच्च कुरुते सेवां तमेवेच्छन्ति योषितः ' ( अनुशासन. ३८।१५ ) । ( ङ ) ‘ श्रीमद्भागवत ' में भी उनके लिए ' स्वैर - वृत्तयः ' ( १४३८ ) शब्द आया है । ( च ) ' स्त्रीणां मनः क्षणिकम् ' ( चाक्यसूत्र ४७६ ) ( छ ) ' अकृतज्ञमनार्यमस्थिरं वनितानामिदमीदृशं मनः ' ( अश्वघोष चौद्ध-प्रणीत सौन्दरनन्द ८ | ४६ ) एतदादिक अनेकस्थलोंमें स्त्रीके मनकी स्थिरता बताई गई है । ( ज ) ' नादिन्याक्रोशे पुत्रस्य ' ( पा. ८४१४८ ) यहां पर ' आदिनी ' शब्द में स्त्रीलिङ्ग देने से स्त्रियोंका कलह - प्रियत्व द्योतित किया गया है - यह उक्तसूत्र की वृत्ति में श्रीहरदत्त तथा श्रीमाधव आदिने बताया है । इस प्रकार उनका अवैदुष्य प्रदर्शित किया गया है । तब इन CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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२६८ श्रीसनातनधर्मालक ( ६ ) दोषोंकी स्वाभाविकतावश स्त्रियोंका ताड़नाधिकारका उल्लेख अनुचित नहीं । यदि यह ऋङ्कुश उनसे उठा लिया जाय; तब वे निरंकुश होकर सब कार्यों में सीमातीतता कर दें; क्योंकि - सीमातीतता कर देना स्त्रियोंकी प्रकृति होती है । स्त्रियोंका हृदय आधिक्य प्रिय हुआ करता है । विलासिता और स्वेच्छाचारिता तथा पर - पुरुषोंकी मीठी-मीठी बातें स्त्रियों के मृदु - हृदयों को बहुत सुगमता से अधिकृत कर लिया करती हैं, इसी कारण हमारे पूर्वजोंने उनका स्वातन्त्र्य अपहृत करके उन पर उक्त नियन्त्रण कर उन्हें ताड़नाकी अधिकारिणी कर दिया है । ताड़ना से ' भूत ' मी डरता है । ( १५ ) ताड़ना भी बहुत प्रकारकी होती है । केवल छड़ीसे मारना ही ताड़ना नहीं होती । वह ताड़ना तो अन्तिम उपाय है । वाणीसे भी ताड़ना हो सकती है, आंख से भी । संकेतसे भी ताड़ना हो सकती है । आजके सुधारकोंके दादागुरु स्वामी दयानन्दजीने तो प्रियवादिनी स्त्रीकी ताड़ना केलिए उसके पतिको तत्क्षण अन्य स्त्रीके साथ नियोगकेलिए नियोग ( आदेश ) कर दिया है । देखिये ' सत्यार्थप्रकाश ' ( ४ र्थ समु. ७३ पृ. ) यदि ऐसा है तो गो. तुलसीदास -जीने ऐसा क्या गुरुतर अपराध कर डाला है कि - ताड़ना में ' नारी ' का नाम लिखनेमात्र से ही नारीभक्त आजका सुधारक - समाज गोस्वामीजीको भी ताड़नाधिकारी समझने लगा है । ( १६ ) ' कचिदन्यतोपि ' ( ११७ ) गोस्वामीजी के इस वचनसे तथा ' आगम ' शब्दसे कई मान्य अन्य शास्त्र भी गृहीत हो जाते हैं; अब उनका भी अनुसन्धान कीजिये । ( क ) ' अन्यत्र पुत्रात् शिष्याद् वा CC - 0. Ankur Joshi Collection शूद्र पशु नारी शिष्ट्यर्थं ताडयेत् तु तौ ' ( ४।१६४ ) ' मनुस्मृति ' के इस प शासन के लिए पुत्र तथा शिष्य भी ताड़नीय माना गया है । इस प्रकार शास्त्रों में शिष्यकी ताड़ना भी लिखी है तब पि गुरुकी शिष्यरूपा नारीकी भी ताड़ना सिद्ध हो गई । इस स्त्री और पुरुषकी समान ताड़ना होनेपर स्त्रीकी ताड़ना में ही क्यों? ( ख ) स्वाद जीने तो स - प्र. के ११ वे समुल्लास में २०५ ह ' लोभी, क्रोधी, मोही, कामी गुरु को भी ' ताडनाका अधि माना है; तब लोभ, क्रोध एवं कामकी प्रकृतिवाली कामिन प्र ताडनाधिकार लिखने पर ही गोस्वामीजी आक्षेपके पात्र क्यों! ( ग ) वस्तुतः सामयिक - ताड़नाका फल सुमधुर हुआ करता प्रा यदि ताड़ना न हो तो प्रजा राजाके, शिष्य गुरुके, पत्नी पतिके, ह तै. पिताके, सेवक स्वामीके कभी अधीन होवें ही नहीं । ठगढ़ स्तुति करते हुए आज के सुधारक स्वाद जीने अपने प्रसिद्ध ( स.प्र. २ समु. १८ पृ. ) में महाभाष्यका निम्न प्रमाण दिया है-' सामृतैः पाणिमिर्ध्नन्ति गुरवो न विषोक्षितैः । लालनाश्रयि दोषास्ताडनाश्रयिणो गुणाः ' ( ८११८ ) । ' गुरु लोग अमृतसने ह पीटते हैं, विषमे हाथ से नहीं । ( घ ) जब ऐसा है; तब नारों कह ताड़ना के उल्लेख गो. तुलसीदास पर अग्निवर्षा क्यों? ( १७ ) ' न्यायदर्शन ' के ४ | १/६३ सूत्र के भाष्य में लोकव्यवहा अ व्यवस्था धर्मशास्त्र ( स्मृति ) के अधीन कही है । अब उन स्मृति अश मूर्धन्य ' मनुस्मृति ' की व्यवस्था भी इस पर देखनी चाहिये | स्व ' भार्या, पुत्रश्च, दासश्च, प्रेष्यो, भ्राता च सोदरः । प्राप्तापराधास्ताङ्ग ज्यो Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ३०० रज्ज्वा वेणुदलेन वा ( ८२६६ ) यहां पर ताड़नाधिकारियों में इस प स्यू बा है भार्या ( नारी ) तथा दास ( शूद्र ) का भी नाम आया है । तब मनुजीका । तब पहिर अनुसरण करके लिखनेवाले गोस्वामीजी पर कोप क्यों? इस मनुस्मृतिकी प्रामाणिकता । नाही मनुस्मृति - प्रणेता श्रीमनुजी जहां सृष्टिके आदिके हैं ( देखिये २०६ हमारी इस पुस्तकका पृष्ठ १८१ ), वहां वादि - प्रतिवादि मान्य भी हैं । आजके सुधारक स्वा.द.जीने भी स्मृतियों में केवल मनुस्मृतिको हो जी कामिर प्रमाण तथा सृष्ट्यादि - प्रणीत माना है । उन्होंने प्रथमसत्यार्थप्र.में क्यों! ' मनुर्वै यत् किञ्चिदवदत् तद् भेपनं भेषजतायाः ' यह मनुकी 2 आ करता है प्रामाणिकताका वचन छान्दोग्यके नामसे दिया है । कृष्णयजुर्वेद-नीपति तै.सं.में भी कहा गया है — ' यद् वै किञ्च मनुरवदत्, तद् भेषजम् ' ( २ | २ | १०१२ ) । यही कृ.य. काठकसंहिता ( १११५ ( ६ ) में, तथा कृ.य. प्रसिद्ध मैत्रायणीसं. ( १।१५ ) में तथा ताड्या. ( २३।१६।७ ) में कहा गया है । दिया है- आर्यसमाजी श्रीतुलसीरामस्वामीने भी अपने ' भास्कर प्रकाश ' में लालना ' वेनके नियोग में मनुस्मृतिको सृष्टिकी आदिमें बना माना है । मृतसने हा उन सृष्ट्यादिजात मनुजीकी यह विशेषता क्यों है, इस पर वेद है; तब नारों कहता है - ' स सुन्वते मघवा जीरदानवे अविन्दद् ज्योतिर्मनवे क्यों? हविष्मते ' ( ऋ.सं. १० | ४३ | ८ ) अर्थात् मघवा ( इन्द्र ) ने सोमका लोकव्यवह श्रभिषव करनेवाले, शीघ्र दान देनेवाले तथा यज्ञकर्ता मनुको ज्योति उन स्मृि अर्थात् ज्ञान दिया । यही अन्य मन्त्रमें भी कहा है- ' विदत् चाहिये स्वर्ज्योतिर्मनवे ज्योतिरार्यम् ' ( ऋ. १० | ४ | ३४ ) ( इन्द्रने मनुको दिव्य नापराधास्त ज्योति प्रदान की ) । यहां ' मनु'का अर्थ ' मनुष्य ' नहीं; क्योंकि— शूद्र पशु नारी ३०१ वैदिक - निघण्टुमें ' मनुष्य ' के नामोंमें ' मनु ' नाम नहीं । बल्कि-निरुक्त में ' मनुष्य ' का निर्वचन किया है - ' मनोरपत्यम् ' ( ३७१२ ) । यहां मनुकी सन्तानको ' मनुष्य ' कहा गया है । इसमें मनुजी 1. मनुष्यों के पिता सिद्ध हुए । तभी निरुक्तकार श्रीयास्कने ' यामथर्वा मनुष्पिता ' ( ऋ. १८०१६ ) मन्त्रकी व्याख्या करते हुए ' मनुः पिता मानवानाम् ' ( नि. १२ । ३४ । १ ) मनुको मानवोंका पिता कहा है । ज्योति प्राप्त होने से ही मनुको सर्वज्ञानमय कहा गया है । जैसे कि-' यः कश्चित् कस्यचिद् धर्मो मनुना परिकीर्तितः । स सर्वोऽभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः ' ( मनुस्मृति २७ ) ( जो किसीका कोई धर्म मनुने कहा है, वह सब वेदों में कहा है, क्योंकि वे मनु सर्वज्ञानमय हैं । ) ज्योति जिसे मिल गई, वह सर्वज्ञानमय होगा ही । तब मनु-प्रोक्त कोई भी वचन उपेक्षणीय नहीं माना जा सकता । मनु परमात्माके अवतार हैं, जैसा कि मनुस्मृतिमें भी कहा है- ' एतमेके वदन्त्यग्निं मनुमन्ये प्रजापतिम् ' ( १२।१२३ ) यह ठीक भी है । इसी कारण वेदमें भी कहा है- ' अहं मनुरभवम् ' ( ऋ. ४।२६।१ ) अर्थात् - मैंने मनुका अवतार लिया । यह ब्रह्मभाव में प्राप्त हुए वामदेव ऋषि कह रहे हैं । तब उन्हीं मनुको अनुसृत करके कहा हुआ गो. तुलसीदासका वचन तिरस्करणीय वा निर्मूल नहीं हो सकता । हम ' मानव ' वा ' मनुष्य ' मनुकी सन्तान होने के नाते से कहलाते हैं; ' मनोरपत्यं मानवः ' ' मनु ' को ' तस्यापत्यम् ' ( पा. ४ | १ | ६२ ) से प्रत्यय करने पर ' मानव ' शब्द बनता है । ' मनोजती CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 164

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३०२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) अब - यतौ षुक् च ' ( पा. ४।१।१६१ ) इसके अनुसार ' मनु ' शब्दको सन्तान और जाति अर्थमें अन प्रत्यय और षुक्का आगम और पूर्व अचूको वृद्धि करके ' मानुष ' शब्द बनता है, और ' यत् ' प्रत्यय तथा षुक्का आगम करके ' मनुष्य ' शब्द बनता है । अथवा ' आगमशास्त्रम नित्यम् ' इस परिभाषा के अनुसार अन! प्रत्यय में धुक्का आगम न होकर भी जाति- अर्थमें ' मानव ' बन जाता है । जब सृष्टिके आदिम व्यक्ति ' मनु ' की सन्तानका नाम मानव है; तब सच्चा मानव, वा मनुष्य वही कहलावेगा; जो अपने पिता मनुके नियमानुकूल चले! मनुने अपने नियम अपनेसे उत्पन्न भृगुके द्वारा सुनाई ' मनुस्मृति ' में कहे हैं; तब उसके अनुकूल व्यवहार करने वाला, वा उस मनुके नियमको माननेवाला, वा उसका अनुसरण करनेवाला पूर्ण ' मानव ' कहलावेगा । जब ऐसा है; तब मनुके अनुकूल उक्त चौपाई लिखने वाले गोस्वामीजी पर वाग्वाणों की वर्षा करना अपनी अमानवताका नग्न दर्शन कराना है । इसमें शास्त्रका कोई विरोध नहीं । अधीनको अपराधमें दण्ड देना लोकव्यवहार - सिद्ध है । ( ख ) इसी कारण वादि - प्रतिवादिमान्य शुक्रनीतिमें भी कहा है ' भार्या पुत्रश्च, भगिनी, शिष्यो, दासः ( शुद्रः ) स्नुषाऽनुजः । कृतापराधा: ताड्यास्ते तनुरज्जुसुवेणुभिः, ( ४/८५ ) पृष्ठ-तस्तु शरीरस्य नोत्तमाङ्ग कदाचन ' ( ८६ ) यहां पर भी शूद्र और नारीको अपराध में ताड़ना कही है । ( ग ) इसके अतिरिक्त स्त्री प्रकृतिस्वरूपा मानी जाती है । प्रकृतिका एक स्वरूप ' अविद्या ' भी है । उसके लिए पुरुषरूप परमात्माका नियन्त्रण भी उसपर होता है । CC - 0. Ankur Joshi Collection शूद्र पशु नारी इस प्रकार प्रकृतिरूप स्त्रीपर भी पुरुषका ताड़नरूप नियन्त्र स्वतः सिद्ध एवं प्राकृतिक है । जहां धर्मशास्त्रों से धार्मिक व्यवस् हुआ करती है; सो हम मनु आदि धर्मशास्त्र-ताड़ना के विषय में साक्षी दे चुके हैं; वहाँ अर्थशास्त्रों मूर्धन्यो राजकीय व्यवहारकी दृष्टिसे बड़ा महत्त्व होता है; सो उनमें अनुसन्धान कर लेना चाहिये, जिससे गोस्वामीजीकी ' नानापुरा निगमागमसम्मतं यद् रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोषि ' ( १४ ) यह प्रतिज्ञा पूर्ण हो जावे । ( १८ ) कौटलीय अर्थशास्त्र एक बहुत ही प्रसिद्ध प्रामाणिक ‘ आगम ' है । उसमें स्त्रीद एडके लिए लिखा है कि भले तो उसे गालीसे सीधा करो, कहो कि - ' नग्ने! विनग्ने! न्हे । अपितृके! अमातृके ' इति श्रनिर्देशेन ( साक्रोशसम्बोधनेन सि विनयग्रहणम् ' । तब भी वह सीधी न हो, उसे अर्थशाखाले ताड़ना बताते हैं - ' वेणुदल - रज्जु - हस्तानामन्यतमेन वा त्रिराघातः ( ३ । ३ । ६० अध्याय ) । यहां पर वेंत वा हाथ आदि से ताड़ना भी कही गई है । ( ख ) इस प्रकार ' शङ्खस्मृति ' में स्त्रीका लाड - प्यार तथा सम ताड़ना सूचित की गई है । जैसे कि - ' लालनीया सदा माई ताडनीया तथैव च । ताडिता लालिता चैव स्त्री श्रीर्भवति नान्यर ( ४/१६ ) यहां धर्मशास्त्र में स्त्रीकी ताडनीयता से भी उसका बनना लिखा है । ( ग ) नीतिशास्त्र - हितोपदेश में भी लिखा है-' सुशासिता स्त्री, नृपतिः सुसेवितः ।... सुदीर्घकालेपि न Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 165

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श्री सनातनधर्मालोक ( ६ ) ३०४ रूप नियन्त्र विक्रियाम् ' ( मित्रलाभ २२ पद्य ) यहां स्त्रीको सुशासना ( ताडना र्मिक व्यवस श्रादिसे वशमें रखने से भी वशमें की हुई स्त्रीकेलिए सदा स्त्र ' अधिकारिणी ' कहा है । ( घ ) हम पहले कह चुके हैं कि - ताड़ना - मूर्धन्यो शास्त्रोका बहुत प्रकारको होती है — ' स्त्रीदण्डश्च पृथक्शय्या ' यह भी उसकी सो उनमें एक बड़ी ताड़ना है । सो इस प्रकार ' नानापुराण निगमागम ' का सार ' नानापुर -लिखनेवाले गो. तुलसीदास पर बौछार क्यों? ( ङ ) यह सब लिखनेका अभिप्राय यह है कि जब शिष्यों को सिर पर चढ़ा दिया जाय, उनका ताडनाभय हट जावे; तब वे न प्रसिद्ध केवल अपना पाठ ही याद नहीं करते, न केवल विद्यालय में समय है कि ह पर प्राप्त नहीं होते, बल्कि कलह आदि भी करते हैं; और मर्यादा !! को भी तोड़ देते हैं । इसी प्रकार नारीके विषय में भी जाना जा धनेन वि सकता है | नारीका जब पति के अधीन रहना धर्म है; तो अधीनकी नर्थशास्त्रपरे शासनाके लिए कुछ नियम एवं नियन्त्रणादि अंकुश अवश्य नवा पृ‍ स्थापनीय होते हैं - इसमें स्वाभाविकता है; आक्षेपार्हता सर्वथा दि नहीं । अपराधी की ताड़ना उनके अपने दर्जे - मुताबिक होती है । वीरबलने एक ही चोरी के अपराधमें पकड़े हुए तीन पुरुषोंको तथा सम उनकी प्रकृतिकी जांच - देखभाल करके उनको भिन्न - भिन्न दण्ड सदा माई दिये । एकको कहा कि - ' मुझे तो तुमसे ऐसी आशा न थी कि -बति नान्यद तुम भी यह बुरा काम कर सकते हो ' यह कहकर छोड़ दिया । उसका ' दूसरेको थप्पड़ मारकर कहा - खबरदार, ऐसा फिर न करना । 7 लिखा है- तीसरेका मुँह काला करवाकर गधेपर चढ़वाकर शहर में घुमाया । पन तीनोंके परिणामका पता लगवाया । पहलेने इस बेइज्जती से लज्जित CC - 0. Ankur Joshi शूद्र पशु नारी ३०५ Collection Gujarat. होकर आत्महत्या कर ली थी । दूसरेने फिर वैसा अपराध कमी नहीं किया । तीसरा फिर उसी चोरीमें पकड़ा गया । इसी प्रकार स्त्रीके भी तीन भेद होते हैं; उनके दण्ड मी तीन प्रकारके होते हैं, यह हम पहले भविष्यपुराण के वचनसे बतला चुके हैं । ( १६ ) इस प्रकार शुद्र अन्त्यजादिके मी तीन वर्णोंके अधीन होने से उनके स्वैराचार में मी वाड़ना अनुचित नहीं । आजकल के समयकी तरह उन्हें सिरपर चढ़ा कर, वा उनसे खुशामद करके, आवश्यकता से अधिक अधिकार उन्हें दे दिये जाएं, उन्हें ताड़ना - निर्भर्त्सनाका भय न रहे; तब परिणाम यह होता है कि-उनका दिमाग ही फिर नहीं मिलता; तब वे धमकियां देते हैं, तङ्ग करते हैं, कभी हड़तालें करते हैं; कभी वेतन न बढ़ाने पर काम बन्द कर देनेकी विभीषिका देते हैं. कभी मनुस्मृति वा भगवद्गीता आदिको जलाते हैं 1 । अतिशूद्र - कोटिके जिन्ना आदि मुसलमानों को सिर चढ़ानेके परिणामस्वरूप ही पाकिस्तानका जन्म हुआ है । ( ख ) यदि बन्दर - आदि पशुओंको ताड़नाका मय न दिया जावे, किन्तु उनको खिलाया - पिलाया ही जाय; तब वे ही पुरुषको घुड़की देते हैं; उनके घर में घुसकर उनका भोजन आदि भी ले जाते हैं, उनके बच्चों को काट लेते हैं । तब उनकी ताड़ना भी अनुचित नहीं । ( ग ) इस प्रकार यदि गँवारों को भी अपने दण्डका भय न रहे; तब वे चोरी करते हैं अन्य असभ्यताएँ करना शुरू कर देते हैं; जैसे कि - नियन्त्रण से पहले दक्षिण- हैदराबाद के ' रिजवी ' आदिको याद रख लेना चाहिये । तब गँवारकी ताड़ना स ० ध ० २० An eGangotri Initiative

पृष्ठ 166

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३०६ श्रीसनातन धर्मालोक ( ६ ) भी उसकी शिक्षार्थ अनुचित नहीं । ( घ ) इस प्रकार ढोल केवल पड़ा ही रहे; उसकी ताड़ना कभी हो ही नहीं; तब उसका चमड़ा ढीला वा कमजोर हो जावे और समय पर बजे भी नहीं । ( ङ ) इस प्रकार पूर्वोक्त प्रकारसे स्त्रीको भी पति आदि द्वारा आंख आदि की भी ताड़नाका भय न रहे; ' स्त्री - दण्डश्च पृथक- शय्या ' आदि दण्डका भय उसे न दिया जाय, केवल पति उसकी खुशामदे ही करता रहे; उसे अपने सिर ही चढ़ाता जाय; तब वह भी निर्भय, मस्त हो जाती है । ' भय बिनु होत न प्रीति ' इस गो. जीके वचनानुसार पतिके प्रेमको भी छोड़ दे सकती है । मान कर बैठती है; पतिको पांव पर गिरवाती है, कभी दुर्लभ बहुमूल्य वस्तुओं के मँगाने के लिए कहकर पतिको तंग करती है, पति के कहे समय में भोजन तैयार नहीं करना चाहती, रातमें आये पतिके अतिथिको भी या तो भोजन नहीं मिलता; या होटलसे उसका भोजन मँगवाना पड़ता है । वैसी स्त्री पतिको ही डांट बताती है, उसका तिरस्कार करती है, सदा ही कामुकी बनी रह सकती है, पर-पुरुषोंके देखनेकी प्रकृतिबाली वा उनसे सम्बन्ध रखनेवाली मी बन सकती है । तब शिष्यादिकी भांति स्त्रियोंकी भी समय पर ताड़ना - आदिसे शासना न्याय्य है, इससे मर्यादा नहीं टूटती । सब काम समयपर होते हैं - यह सब सर्वानुभवसाक्षिक है । अतः इसमें कोई आक्षेपका अवसर नहीं । ( २० ) प्रकृत समुद्र भी यहां इसी रहस्यको बता रहा है । जबकि समुद्रकी प्रसन्नताकेलिए तीन दिनके अनुष्ठानरूप सत्याग्रहसे CC - 0. Ankur Joshi Collection शूद्र पशु नारी मी समुद्रका हृदय - परिवर्तन न हुआ— “ विनय न मानत जलधि य गये तीन दिन बीति । बोले राम सकोप तव ' तब श्रीरामने अर्थको पुष्ट करते हुए कहा- ' भय बिनु होत न प्रीति ' । इसीलिए प्र प्रकृत उन्होंने लक्ष्मणको आदेश दिया- ' लछिमन! बान शरासन आनू । सोखउ वारिधि बिसिख कृसानू ' । तब लक्ष्मण से धनुष लानेपर् ' संघानेऊ प्रभु विशिख कराला । उठी उदधि - वर अन्तर ज्याला तब समुद्रादिस्थित मगरमच्छ - आदि में खलबली पड़ जाने से समुद्रों व्याकुलता प्राप्त हुई । तभी उसका मान टूटा । तभी वह श्रीराम । इच्छानुकूल कार्य करने शुरू हुआ; और क्षमा मांगी - समा सिन्धु पद गहि प्रभु केरे । छमहु नाथ सब अवगुन मेरे ' । तमो उसने स्वयं यह कहा कि - प्रभो! मुझ गँवारकी ताड़ना करते हुए आपने ठीक किया । ताड़ना से पहले मैं कठोर बना बैठा था । ताड़ना वा ताड़ना - भयसे मैं मृदु हो गया । तभी उसने कहा-' ढोल, गँवार, शूद्र, पशु नारी । ये सब ( सकल ) ताड़नके अधिका ताड़नाधिकारी यह पांच उसने पराधीनोंके उपलक्षण में रखे हैं । जो पराधीन होता है; वह कार्यत्रुटि में ताड़नाका पात्र होता ही है, यह स्वाभाविक है । शूद्र से भृत्यका, नारीसे शिष्यका भी उपलक्ष्य जान लेना चाहिये । भृत्य और शिष्य एवं पुत्र स्वामी, गुरु तथ पिताके अधीन होनेसे अपराधी होनेपर ताड़ित होते हैं - इस कोई अन्याय नहीं । उक्त चौपाईकी ' मय बिनु होत न प्रीि ' प्रभु भल कीन्ह मोंहि [ ताड़नासे ] सिख दीनी ' इन चौपाईयो साथ ठीक संगति लग रही है, तब यही इसका यथार्थ अर्थ सिद्ध Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 167

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ३०८ जलघि होता है । इससे गो - तुलसीदास नारीमात्रके निन्दक नहीं हो सकते रामने बड़ कि- पतिव्रता को भी वे व्यर्थकी ताड़ना दिलायें । बिना अपराध के प्रवृत भी साधारण - स्त्रीको ताड़ना दिलायें । समुद्रको भी अपराधी होनेपर । इसीलिए ताडित किया गया । उसे सदा अग्निबाण नहीं मारे जाते, वा नहीं सन आन् । लानेपर- मारे गये । न्तर सो उक्त चौपाईका पूर्वोक्त चौपाईयोंके साथ स्पष्ट अन्वय जा समुद्र हो रहे होनेसे यही उसका यथार्थ अर्थ सिद्ध है । स्त्री - शूद्रोंसे इश्री रामकी डरकर ग्रन्थकारके अनभीष्ट अर्थको करना उचित नहीं ' । महाकवि-समय श्रीभारविने ठीक ही कहा है- ' अमर्षशून्येन जनस्य जन्तुना न रे ' । तमो जातहार्देन न विद्विपा ( ss ) दर: ' ( किरा- १।३३ ) तब जो लोग इस करते हुए 1. चौपाई का यह अर्थ करते हैं कि - " जो पुरुष नारीका ' ताड़न ' कर वैठा था । लेता है, या नारीकी महत्ताको अथवा नारीको ' ताड़ ' अर्थात् पहिचान लेता है; वही पुरुष अपने जीवनको सफल बना सकता के कहा- अधिकार । है; उसी पुरुष के चरणों में नारी हँस - हँसकर अपना सर्वस्व दे में रखे हैं । डालती है, यही पुरुषकी सच्ची विजय है " ऐसा अर्थ करने में होता ही है । लगे हुए, गोस्वामीजीकी निर्दोषता सिद्ध करने में लगे कई-उपलक्षय हिन्दी - कोविदोंका उक्त मीमांसासे खण्डन हो गया, क्योंकि - उक्त गुरु तथा अर्थ गोस्वामीजीको विवक्षित नहीं; और प्रकरणका भी उक्त अर्थ में ते हैं इस समन्वय नहीं । उस अर्थ में पशु आदि सबका अर्थ - समन्वय न वन प्रीि होनेसे तथा इस अर्थके प्रकरणविरुद्ध होने से माननीयता नहीं ।

चौपाईयो ( २१ ) उक्त चौपाईके ' नारी ' शब्द से केवल ' पत्नी ' नहीं; अन्य

अर्थसिद्ध हो सकती है । वह स्त्री भी यदि मर्यादासे पतित

शूद्र पशु नारी ३०६ होती है, तब उसकी ताड़ना भी अनुचित नहीं । तभी भगवान् श्रीरामने ताटका - राक्षसीको - ताड़ना तो छोड़िये प्रत्युत मार डाला; जिसके लिए ऋषि विश्वामित्रने श्रीरामको कहा था— ' नहि ते स्त्री-वघे कापि घृणा कार्या नरोत्तम! अधर्मं सहिता नार्यो हताः पुरुष-सत्तमैः ' ( वाल्मी ० १।२५।१७-२२ ) । इसी प्रकार मर्यादा तोड़ने पर शुर्पणखा नाक - कान कटवाकर श्रीरामने उसको दण्ड दिया । इसके अतिरिक्त शास्त्रसे विरुद्ध तपस्या करते हुए शम्बूक शूद्रको मी भगवान् रामने दण्ड दिया । जब यह बात भगवान् रामको जो कि मर्यादा पुरुषोत्तम थे - सम्मत है, ' इन्द्र! जहि पुमांसं यातुधान-मुत स्त्रियम् । मायया शाशदानाम् ' ( अथर्वसं. ८ | ४ | २४ ) इस प्रकार वेदको भी सम्मत है, पूर्व कहे प्रमाणोंसे धर्मशास्त्रों से मी अनुमोदित है, पुराण और इतिहाससे समर्थित है, और अर्थशास्त्र सेमी सकारी गई है, तब रामभक्त, वेद- स्मृति - पुराण- इतिहास-अर्थशास्त्र आदिके विद्वान् गोस्वामी श्रीतुलसीदासजीका टाड़ना के अधिकारियों में स्त्री एवं शुद्रके नामोल्लेखमात्र से, अपमान करना योग्य नहीं है; और उनके अभिप्रायके विरुद्ध उनकी चौपाईका अपना मनःकल्पित अर्थ कर देना भी न्याय्य नहीं है । ताड़नाधिकारी ये पांच उन्होंने अधीनोंके उपलक्षणमें लिखे हैं । जो पराधीन होता है, वह कार्यकी त्रुटि में ताड़नाका पात्र हुआ करता है - यह स्वाभाविक है । शूद्रसे नौकरका, नारीसे शिष्यका भी उपलक्षण समझ लेना चाहिये । नौकर, तथा शिष्य एवं पुत्र मी स्वामी एवं गुरु तथा पिताके अधीन होने से अपराधी CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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३१० श्री सेनतिनधर्मालोक ( ६ ) अवस्था में ताड़ना पाते हैं- इसमें कोई अन्याय की बात नहीं है । पर इससे गोस्वामीजी नारीमात्रके निन्दक नहीं माने जा सकते; अन्यथा सीता, कौशल्या, सुमित्रा एवम् अनसूया आदियोंके उत्कृष्ट - चरित्रका वे निर्माण कैसे करते? आशा है कि उनके विरुद्ध अर्थको चेष्टा कर रहे हुए व्यक्ति ' यत्परः शब्दः स शब्दार्थः ' इस न्यायसे विरुद्ध अपने मनःकल्पित अर्थके करने की दुष्प्रकृतिको छोड़ देंगे । इस प्रकार स्पष्ट है कि गोस्वामीजीने इतिहास के अतिरिक्त जो बचन लिखे हैं; उनका मूल - नाना पुराण, निगम, आगम जो कि हमारे धर्म - शास्त्र हैं- उनमें पाया जाता है उनने निराधार कुछ नहीं लिखा । तब उनपर हो - हल्ला करना अपना अज्ञान प्रकाशित करना है । कई प्रूफकी अशुद्धियां पाठकगण इस प्रकार सुधार लें — पृ.१६ पं.७ ' तयोर्द्व घे ' | पृ. ६१ पं. ६ ( २ | १६० ) पृ. ८० पं. २१ बनाया । ११७ पं. १७ ' माध्यन्दिन ' । १२२ पं. ७ ‘ ऋग् ' । १२३ पं. १० ' पूर्व ' । १३४ पं. ३ ' धारयिष्णु: ' । १३७ पं. १५ ' त्युपासीत ' । १४२ पं. २० ‘ यजू ंषि ’ । १४३ १६७ पं. १६ ‘ ऋक् ' ( ३।४।२०।७४-७७ ) बहिष्कृत चाण्डाल ' प्रघट्टकोंमें कहीं कई साधारण अशुद्धियां पं. ५ ' वादिप्रतिवादिमान्य ' । पं. १० ' यशार्थ ' ॥ १७६ पं. १६ ' मानुषः ' । २१३ पं. ५ कर्तुमुद्यतः ' । पं. १० ' निस्तेजस्कता ' । २३१ पं. १० ' पात्र-। २६५ पं. २२ ' विद्या ' । २८७ पं. १ ' चाण्डाल ' । अङ्क दुबारा आगये हैं, उनको पाठक सुधार लें 1 नहीं बताई गई । CC - 0. Ankur Joshi Collection ( १० ) क्या ‘ एतद्वै विश्वरूपं ‘ गावः प्रतिष्ठा मातरः । सनातनधर्मका प्राचीन - भारत में गोवध (? ) ३१३ प्राचीन भारतमें गोवध होता था? सर्वरूपं गोरूपम् ' ( अथर्व ० ६१७-११२५ ) वाप अंसत भूतानां ’ ( महा. अनुशा. ७८५ ) ' गावो विश्वमनुष ऐतरेय तथा उसके मुख्य - ग्रन्थ वेदोंका स्वरूप, बेदरे सडमर अधिकारियों, तथा वैदिक देवपूजा के अधिकारियों का निरूपण कर सहस्र वेदी ' या ' देवी गोमाता - जो ३३ कोटि वैदिक - देवताओ ( ३ शरा आधारस्थली है - जिसपर मुसलमानी एवं अंग्रेजी राज्य से क्षेत्र कई स्वराज्य हो जाने तक भी वधकेलिए आक्रमण होता जा रहा है स उसकी अवध्यता को वेदादिशास्त्रों द्वारा बताने जा रहे हैं; पर मोहमे आजके पाश्चात्यानुयायी पौरस्त्य - संसार में यह धारणा श्रमीक विचार भी रूढमूल है कि- ' प्राचीन भारत में गोबध होता था ' । वे इससे इधर प्रमाणस्वरूप कई वचन देते हैं । वे यह हैं- इनके ( १ ) ' शसने न गावः ' ( ऋ. १०१८६१४ ) यहां वे वेदमें गौको समाध की वधशाला मानते हैं । ( २ ) ' मांसौदनं पाचयित्वा सर्पिमानर क्योंकि श्नीयाताम्, औक्ष्णेन वा आर्षमेण वा ' ( बृहदारण्यक ६ । ४ । १ ॥ यहां उनके मतानुसार वैलके मांसको पकाकर खाने से वे वेदविद्वान लड़के की उत्पत्ति मानते हैं । ( ३ ) ' महोक्षं वा, महानं वा पचेत्, एवमस्य आतिथ्यं कुर्वन्ति ' ( ४८ ) वसिष्ठस्मृति के इस वचन से कहते पूर्वकाल में अतिथि सत्कार में बैलका पकाना कहते हैं । ( ४ ) इस इससे वे ' गोघ्नोऽतिथिः ' यह व्याकरणादि- प्रसिद्ध प्रमाण उपरिक्ष था । व करते हैं । ( ५-६-७ ) इसीमें उपोद्बलक स्वरूप वे ' महोतं वा महाव Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ३१३ पचेत् ' ( ३ | ४ | १ | २ ) यह शतपथका, तथा ' अश्नाम्येव अहम्, वा २५ ) श्रंसलं चेद् भवति ' ( शत. ३ | १ | २/२१ ) यह याज्ञवल्क्यका, तथा वो विश्वास ' मनुष्यराजे आगते... उक्षारणं वा वेहतं वा तदन्ते ' ( १।१५ ) यह ऐतरेयत्राह्म एका प्रमाण देकर, उसमें ( 4 ) उत्तररामचरितका ' कल्याणी – रूप, वे मडमडायिता ' तथा ( ६ ) राजा रन्तिदेवका ' अहन्यहनि बध्येते द्वे रूपण करहे सहस्रे गवां तदा । समांसं ददतो ह्यन्न रन्तिदेवस्य नित्यशः ’ -देवताओ ( ३३२।८-६ ) गोवध से अतिथिसत्कार बताया करते हैं । इसी प्रकारके क्य से लेस कई अन्य वचन भी दिये जाते हैं । रहा है- यह बड़े ही प्रसिद्ध प्रमाण हैं । इन्होंने पौरस्त्य विद्वानोंको भी रहे हैं; पर मोहमैं डाल रखा है | हम भी इस विषय में कुछ अपने शास्त्रानुसारी श्रमीक विचार अपने क्रमसे उपस्थित करते हैं । विद्वान् ' आलोक ' पाठक । वे इसके इधर सावधानताकी दृष्टि डालेंगे । ' प्रधान मल्ल - निवर्हण ' न्यायसे इनके समाधान हो जानेसे शेष छोटे - मोटे इन - जैसे वचनका स्वयं वेद में गौओ समाधान हो जाएगा । इस विषयको अवधान से देखना चाहिये, सर्पिष्मन्तर क्योंकि इनमें शास्त्रीय विवेचना दी जायगी । ६४ ) वेदविद्या १ क्या गौत्र की वधशाला वेदसम्मत है? जं वा पचेन ' वेदों को अंग्रेजी - दृष्टिकोण से देखनेवाले आजकल के महाशय वचनसे कहते हैं कि — ' वेदमें निम्नमन्त्र में गौवोंकी वधशाला वर्णित है; ( ४ ) इस इससे सिद्ध है कि प्राचीन - भारत में वेदानुकूल गोबध हुआ करता भी उपस्थित था । वह मन्त्र यह है-वा महाव ' कर्हिस्वित् सा त इन्द्र! चेत्याऽसद् अघस्य यद् मिनदो रक्ष गायको वधशाला (? ) ३१३ एषत् । मित्रवो यत् शसने न गावः पृथिव्या आग् अमुया शयन्ते ' ( ऋ.सं. २०६६/१४ ) यहां गौओंकी बधशाला बताई गई है । इसका अर्थ यह है कि - ' हे इन्द्र! जिस अत्र या वारणको फेंककर तुमने पापी राक्षसको काटा था, वह कहां फेंकने योग्य है? जैसे-गोहत्याके स्थानमें गौवें काटी जाती हैं; वैसे ही तुम्हारे इस असे निहत होकर मित्रद्वेपी- राक्षस लोग पृथिवीपर गिरकर सदाकेलिए सो जाते हैं । ' स्पष्ट है कि - इस मन्त्रका रचनाकाल गोवध - निषेध करनेवाले मन्त्रोंसे प्राचीन है । ( सरिता ) वेदके वा किसी भी ग्रन्थके अर्थ अपनी इच्छानुसार नहीं हुआ करते; किन्तु उसके उत्तरपक्ष के अनुसार हुआ करते हैं । वेदमें गायका नाम ' अन्य ' आया है । जैसे कि - ' इडे! रन्ते! इव्ये! काम्ये! चन्द्रे! ज्योते! अदिते! सरस्वति! महि! विश्रुति! एता ते अघ्न्ये! नामानि ' ( यजुर्वेदसं. ४३ ) यहांपर गायका ' अघ्न्या ' यह मुख्य नामं आया है । ' वैदिक - निघण्टु ' में ' गोनामानि ' कहकर ' ग्रघ्म्या, उस्रा उस्त्रिया, मही, अही, अदिति ' ( २।१४ ) नौ नाम कहे गये हैं । इसमें पहला नाम ' अघ्न्या ' है । वेदमें ' बैलका नाम ' अन्य ' आया है, जैसे कि - ' गवां यः पतिरघ्न्यः ' ( अथर्व ६ । ४ । १७ ) । ' अघ्न्या ' और ' अन्य ' का अर्थ है ' न हनन करने योग्य ' । निरुक्तकार श्रीयास्कने भी निरुक्त ( ११।४३।२ ) में ऐसा ही अर्थ स्वीकार किया है । अन्य किसी भी पशु आदिकेलिए ' अघ्न्या ' यह विशेष - शब्द न कहकर केवल गाय - बल के लिए वेद-द्वारा वैसा कहना वेदके मत में गायकी अवध्यता बताता है । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालौक ( ६ ) ' अघ्न्या ' यह नाम चारों वेद - संहिताओं में मिलता है । जैसे ' यो अघ्न्याया भरति क्षीरं ' ( ऋ.सं. १०१ ७११६ ) ( यजुः १1१ ), ( सामसं. उत्तर. ६।१५।३ ), ( अथर्व -१६।१६।२ ) इत्यादि, तब वेद में उसी गायकी वघशाला कैसे इष्ट हो सकती है E?? वैसा अर्थ किसी भाध्यकारने किया भी तो नहीं । यहां यह भी जानना चाहिये कि - गोशब्द के अर्थ बहुत हुधा करते हैं । अनेकार्थक शब्दों के अर्थ निर्धारक संयोगादियों में एक पदार्थ ' औचिती ' हुआ करता है । उसका उदाहरण है— गौरे- ' का तु मनस्विनः ' यहां यह अर्थ उचित नहीं लगता कि - ' मानी पुरुषकी एक गाय हुआ करती है ' क्योंकि — कदाचित् मानी पुरुष की एक भी गाय न हो, अथवा दो - तीन गायें हों; अतः यह अ यहां उचित नहीं बैठता । तब यहां यह अर्थ है कि- ' मनस्वी पुरुष की एक ही गौ अर्थात् वाणी हुआ करती है ' । इस अर्थ में औचित्य है - अतः इसे सभी स्वीकार करते भी हैं । ' मृग ' शब्द हिरन में प्रसिद्ध है; पर यह केवल विशेष- पशुका नाम न होकर ' पशवोपि मृगाः ' ( अमरकोष ३।३।२० ) इस प्रकार सामान्य - पशुका वाचक भी होता है । जैसे कि - ' मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ' ( नीतिशतक ) । जैसे ' तेल ' शब्द तिलके स्नेह के लिए होता हुआ भी सरसों आदि सब तेलोंकेलिए भी प्रयुक्त होता है; जैसे ' गोष्ठ ' शब्द ' गोस्थान ' वाचक होता हुआ भी ' गोष्ठजादयः स्थानादिषु पशुनामभ्यः ' ( ५२ २६ ) इस कात्यायनप्रोक्त - वार्तिक से सब पशुओंके स्थानका वाचक भी हुआ करता है; वैसे ही ' गो ' शब्द CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An गायकी वधशाला (? ) ३१६ यद्यपि ' गाय ' के नाम में प्रसिद्ध है; तथापि सामान्य- ' पशु ' के नाम -भी प्रयुक्त हुआ करता है । जैसे कि अमरकोषमें कहा है- ' स्वर्ग पाणि मी ' घ पशु - वाग् - वजू - दिग् - नेत्र - घृणि - भू - जले । लक्ष्यदृष्ट्या स्त्रियां पुंसि गो ( ३।३।२५ ) यहां पर ' गो ' शब्द पशुवाचक भी माना गया है । ' मानुप ' गौर्वाहीकः ' में भी ' गो ' शब्द पशुवाचक है । ऋग्वेदसंहिता-( १।११।५ ) के भाष्य में श्रीसायणाचार्य से प्राचीन माध्यकार गायक सामान्य श्रीवेङ्कटमाधवने भी ‘ गोमतः’का अर्थ ' गृहीतपशो: ' किया है । होता, निरुक्तमें भी ‘ अथापि च गौरिति पशुनाम भवति एतस्मादेव ' ( २ राश ३ ) संगत यह कहा है । ऋग्वेदसंहिता ( १०।१४६ ३ ) में श्रीसायणाचार्यने भो शब्द ' गावः ' का अर्थ ' गवयाद्या मृगाः ' यह किया है । इसका अन्य प्रमाण भी देखिये - महाभारत वनपर्वी फ रन्तिदेवकी कथामें ' अहन्यहनि वध्येते े द्व सहस्र गर्दा ब सामान्य ( २०६६ ) यहां ' गो ' शब्द आया है । उसी रन्तिदेवको कथा ि वेदके द्रोणपर्व में भी आई है । वहां यह पद्य है - ' उपस्थिताश्च पशवः स्वयं यं शंसितव्रतम् । बहवः स्वर्गमिच्छन्तो विधिवत् सत्रयाजिनम् । वाचक ( ६७१४ ) यहां पर ' गो ' शब्द के स्थान पर ' पशु ' शब्द है । इससे यही दो बातें सिद्ध होती हैं । एक तो यह कि - रन्तिदेवकी पूर्व कमानें आर्य मी ' गो ' शब्द ' पशु'- वाचक है; दूसरी बात यह कि – ' गो ' शन ऐसा ही पशुका पर्यायवाचक भी हुआ करता है । इसीलिए ' गोयुगच् ' प्रत्यय भी मर ' उष्ट्रगोयुगम्, गो - गोयुगम् ' इत्यादि प्रयोग भी मिलते हैं । नहीं ते सामान्य उष्ट्रका ' ' क्या सम्बन्ध? और ' गो ' शब्दके साथ ' गोयुग ' से उपम प्रयोग व्यर्थं है । इस प्रकार ' अश्वषड्गवम् ' ( ५२२६ ) आदि ( गाय क eGangotri Initiative